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गुरुवार, 9 जुलाई 2026

जुलाई ९, गीता, सॉनेट, रामदास, द्वि इंद्रवज्रा सवैया, सुमेरु छंद, मोहन छंद, दोहा, जान, कमल, कमलिनी

 सलिल सृजन जुलाई ९

*
गीता सार संशय ही है समस्या, समाधान विश्वास। खुद में प्रभु को देखकर, पा सच का आभास।०१। सत्य ज्ञान से ही मिले, समाधान तत्काल। दूर असत से रह सखे!, उन्नत रखकर भाल।०२। स्वार्थ त्याग सर्वार्थ वर, होगी तभी समृद्धि। पल पल कर परमार्थ तू, हो पुण्यों की वृद्धि।०३। कर्मकांड पूजा नहीं, पूजा तेरा कर्म। प्रभु अर्पित कर दे 'सलिल', यही धर्म का मर्म।०४। वहम अहम् का त्यागकर, पाएँ नित आनंद। हों अनंत में लीन जब, तब हो परमानंद।५। उच्च चेतना से जुड़ें, पहुँच उच्चतर नित्य। मिले उच्चतम तब सहज, कर साक्षात् अनित्य।६। मिला ज्ञान जो आपको, जीवन में साकार। करें तभी तो कर सकें, हर भव-बाधा पार।७। खुद को ले जो जीत वह, कभी न सकता हार। खुद से खुद हारे अगर, होगा बंटाढार।८। मिलता आशिर्वाद जो, समझो उसका मोल। व्यर्थ न जाने दो कभी, यह निधि है अनमोल।९। देखो चारों ओर है, ईश्वर महिमावान। उसको अनुभव कीजिए, कण कण में अनुमान।१०। करें समर्पण ईश प्रति, सत्य दिखे तब सत्य। बिना समर्पण समझ कब, पड़ता सत्यासत्य।११। चंचल मन को साधिए, हो हरि-चिंतन लीन। चाहक फल का काम भज, हो जाता है दीन।१२। माया-मोह न बाँध लें, रहें सजग हो दूर। जुड़ें दिव्यता से सदा, जो न जुड़े वह सूर।१३। रखें ईश पर दृष्टि जब, दृष्टिकोण हो शुद्ध। जीवन शैली सात्विक, करती सतत प्रबुद्ध।१४। जीवन में रखते प्रथम, ईश्वर को पहचान। भव बंधन को तोड़ते, तब ही तो मतिमान।१५। उत्तम होना है सखे!, पुरस्कार मत भूल। अधम नहीं होना वरन, जन-जीवन हो शूल।१६। चयन न प्रिय का कीजिए, चुनिए उचित हमेश। अनुचित प्रिय का चयन ही, देता सदा कलेश।१७। जग है जड़-जंजाल यह, परम सत्य पहचान। तजकर प्रभु से एक्य की, राह पकड़ रस-खान।१८। ९.७.२०२६ ०००
सॉनेट
अज्ञान वंदना
*
ज्ञान न मिले प्रयास बिन, मिले आप अज्ञान।
व्यर्थ वंदना प्रार्थना, चल न साधना-राह।
पढ़ना-लिखना क्यों कहो, खा पी मस्त सुजान।।
कभी न कर सत्संग मन, पा कुसंग कर वाह।।
नित नव करें प्रपंच हँस, कभी नहीं सत्संग।
खा-पी जी भर मौज कर, कभी न कुछ भी त्याग।
भोग लक्ष्य कर योग तज, नहीं नहाना गंग।।
प्रवचन कीर्तन हो जहाँ, तुरत वहाँ से भाग।।
सुरापान कर कर्ज ले, करना अदा न जान।
द्यूत निरंतर खेलना, चौर्य कर्म ले सीख।
तज विनम्रता पालकर, निज मन में अभिमान।।
अपराधी सिरमौर बन, दुष्ट-रत्न तू दीख।।
वंदन कर अज्ञान का, मूर्खराज का ताज।
सिर पर रख ले बेहया, बन निर्लज्ज न लाज।।
८-७-२०२३
***
सॉनेट
समर्थ स्वामी रामदास
*
संत 'दीपमाला' सदृश, करते सतत प्रकाश।
'रानी' आत्मा मानते, राजा ब्रह्म अनंत।
'नारायण' की कीर्ति गा, तोड़ें भव का पाश।।
'एकनाथ' छवियाँ अगिन, देखें दिशा-दिगंत।।
नीलगगन खुद 'राणु' बन, 'सूर्या' स्वामी साथ।
'सूर्य स्रोत' के पाठ से, ले 'मोनिका' प्रकाश।
'गंगाधर' अग्रज सहित, गह 'नारायण' हाथ।।
चाहें बनें ग्रहस्थ पर, तोड़ें भव के पाश।।
'सावधान' हो तपस्या, पथ पर बढ़े सुसंत।
'दासबोध' को बताया, 'सुगमोपाय' महान।
हो 'समर्थ' गुरु 'शिवा' के, हुए दिखाया पंथ।
'छत्रसाल' आशीष पा, असि रख पाए तान।।
'रामदास' वैराग से, करें लोक कल्याण।
कंकर से शंकर रचें, शव को कर संप्राण।।
८-७-२०२३
***
स्नेहिल सलिला सवैया ​​ : १.
द्वि इंद्रवज्रा सवैया
सम वर्ण वृत्त छंद इन्द्रवज्रा (प्रत्येक चरण ११-११ वर्ण, लक्षण "स्यादिन्द्र वज्रा यदि तौ जगौ ग:" = हर चरण में तगण तगण जगण गुरु)
SSI SSI ISI SS
तगण तगण जगण गुरु गुरु
विद्येव पुंसो महिमेव राज्ञः, प्रज्ञेव वैद्यस्य दयेव साधोः।
लज्जेव शूरस्य मुजेव यूनो, सम्भूषणं तस्य नृपस्य सैव॥
उदाहरण-
०१. माँगो न माँगो भगवान देंगे, चाहो न चाहो भव तार देंगे।
होगा वही जो तकदीर में है, तदबीर के भी अनुसार देंगे।।
हारो न भागो नित कोशिशें हो, बाधा मिलें जो कर पार लेंगे।
माँगो सहारा मत भाग्य से रे!, नौका न चाहें मँझधार लेंगे।
०२ नाते निभाना मत भूल जाना, वादा किया है करके निभाना।
या तो न ख़्वाबों तुम रोज आना, या यूँ न जाना करके बहाना।
तोड़ा भरोसा जुमला बताया, लोगों न कोसो खुद को गिराया।
छोड़ो तुम्हें भी हम आज भूले, यादों न आँसू हमने गिराया।
_ ८.७.२०१९
***
एक मुक्तिका:
महापौराणिक जातीय, सुमेरु छंद
विधान: १९ मात्रिक, यति १०-९, पदांत यगण
*
न जिंदा है; न मुर्दा; अधमरी है.
यहाँ जम्हूरियत गिरवी धरी है.
*
चली खोटी; हुई बाज़ार-बाहर
वही मुद्रा हमेशा जो खरी है.
*
किये थे वायदे; जुमला बताते
दलों ने घास सत्ता की चरी है.
*
हरी थी टौरिया; कर नष्ट दी अब
तपी धरती; हुई तबियत हरी है.
*
हवेली गाँव की; हम छोड़ आए.
कुठरिया शहर में, उन्नति करी है.
*
न खाओ सब्जियाँ जो चाहता दिल.
भरा है जहर दिखती भर हरी है.
*
न बीबी अप्सरा से मन भरा है
पड़ोसन पूतना लगती परी है.
***
कार्यशाला: एक रचना दो रचनाकार
सोहन परोहा 'सलिल'-संजीव वर्मा 'सलिल'
*
'सलिल!' तुम्हारे साथ भी, अजब विरोधाभास।
तन है मायाजाल में, मन में है सन्यास।। -सोहन परोहा 'सलिल'
मन में है सन्यास, लेखनी रचे सृष्टि नव।
जहाँ विसर्जन वहीं निरंतर होता उद्भव।।
पा-खो; आया-गया है, हँस-रो रीते हाथ ही।
अजब विरोधाभास है, 'सलिल' हमारे साथ भी।। -संजीव वर्मा 'सलिल'
***
दोहा सलिला:
जान जान की जान है
*
जान जान की जान है, जान जान की आन.
जहाँ जान में जान है, वहीं राम-रहमान.
*
पड़ी जान तब जान में, गई जान जब जान.
यह उसके मन में बसी, वह इसका अरमान.
*
निकल गई तब जान ही, रूठ गई जब जान.
सुना-अनसुना कर हुई, जीते जी बेजान.
*
देता रहा अजान यह, फिर भी रहा अजान.
जिसे टेरता; रह रहा, मन को बना मकान.
*
है नीचा किरदार पर, ऊँचा बना मचान.
चढ़ा; खोजने यह उसे, मिला न नाम-निशान.
*
गया जान से जान पर, जान देखती माल.
कुरबां जां पर जां; न हो, जब तक यह कंगाल.
*
नहीं जानकी जान की, तनिक करे परवाह.
आन रहे रघुवीर की, रही जानकी चाह.
*
जान वर रही; जान वर, किन्तु न पाई जान.
नहीं जानवर से हुआ, मनु अब तक इंसान.
*
कंकर में शंकर बसे, कण-कण में भगवान.
जो कहता; कर नष्ट वह, बनता भक्त सुजान.
*
जान लुटाकर जान पर, जिन्दा कैसे जान?
खोज न पाया आज तक, इसका हल विज्ञान.
*
जान न लेकर जान ले, जो है वही सुजान.
जान न देकर जान दे, जो वह ही रस-खान.
*
जान उड़ेले तब लिखे, रचना रचना कथ्य.
जान निकाले ले रही, रच ना; यह है तथ्य.
*
कथ्य काव्य की जान है, तन है छंद न भूल.
अलंकार लालित्य है, लय-रस बिन सब धूल.
*
९.७.२०१८
***
दोहे साहित्यकारों पर
*
नहीं रमा का, दिलों पर, है रमेश का राज.
दौड़े तेवरी कार पर, पहने ताली ताज.
*
आ दिनेश संग चंद्र जब, छू लेता आकाश.
धूप चांदनी हों भ्रमित, किसको बाँधे पाश.
*
श्री वास्तव में साथ ले, तम हरता आलोक.
पैर जमाकर धरा पर, नभ हाथों पर रोक.
*
चन्द्र कांता खोजता, कांति सूर्य के साथ.
अग्नि होत्री सितारे, करते दो दो हाथ.
*
देख अरुण शर्मा उषा, हुई शर्म से लाल.
आसमान के गाल पर, जैसे लगा गुलाल.
*
खिल बसन्त में मंजरी, देती है पैगाम.
देख आम में खास तू, भला करेंगे राम.
*
जो दे सबको प्रेरणा, उसका जीवन धन्य.
गुप्त रहे या हो प्रगट, है अवदान अनन्य.
*
वही पूर्णिमा निरूपमा,जो दे जग उजियार
चंदा तारे नभ धरा, उस पर हों बलिहार
*
श्वास सुनीता हो सदा, आस रहे शालीन
प्यास पुनीता हो अगर, त्रास न कर दे दीन
*
प्रभा लाल लख उषा की, अनिल रहा है झूम
भोर सुहानी हो गई क्यों बतलाये कौन?
***
दोहा सलिला:
*
गुरु न किसी को मानिये, अगर नहीं स्वीकार
आधे मन से गुरु बना, पछताएँ मत यार
*
गुरु पर श्रद्धा-भक्ति बिन, नहीं मिलेगा ज्ञान
निष्ठा रखे अखंड जो, वही शिष्य मतिमान
*
गुरु अभिभावक, प्रिय सखा, गुरु माता-संतान
गुरु शिष्यों का गर्व हर, रखे आत्म-सम्मान
*
गुरु में उसको देख ले, जिसको चाहे शिष्य
गुरु में वह भी बस रहा, जिसको पूजे नित्य
*
गुरु से छल मत कीजिए, बिन गुरु कब उद्धार?
गुरु नौका पतवार भी, गुरु नाविक मझधार
*
गुरु को पल में सौंप दे, शंका भ्रम अभिमान
गुरु से तब ही पा सके, रक्षण स्नेह वितान
*
गुरु गुरुत्व का पुंज हो, गुरु गुरुता पर्याय
गुरु-आशीषें तो खुले, ईश-कृपा-अध्याय
*
तुलसी सदा समीप हो, नागफनी हो दूर
इससे मंगल कष्ट दे, वह सबको भरपूर
***
९-७-२०१७
***
हिंदी ग़ज़ल / मुक्तिका
[रौद्राक जातीय, मोहन छंद, ५,६,६,६]
*
''दिलों के / मेल कहाँ / रोज़-रोज़ / होते हैं''
मिलन के / ख़्वाब हसीं / हमीं रोज़ / बोते हैं
*
बदन को / देख-देख / हो गये फि/दा लेकिन
न मन को / देख सके / सोच रोज़ / रोते हैं
*
न पढ़ अधि/क, ले समझ/-सोच कभी /तो थोड़ा
ना समझ / अर्थ राम / कहें रोज़ / तोते हैं
*
अटक जो / कदम गए / बढ़ें तो मि/ले मंज़िल
सफल वो / जो न धैर्य / 'सलिल' रोज़ / खोते हैं
*
'सलिल' न क/रिए रोक / टोक है स/फर बाकी
करम का / बोझ मौन / काँध रोज़ / ढोते हैं
९-७-२०१६
***
अभिनव प्रयोग- गीत:
कमल-कमलिनी विवाह
*
अंबुज शतदल कमल
अब्ज हर्षाया रे!
कुई कमलिनी का कर
गहने आया रे!...
*
अंभज शीतल उत्पल देख रहा सपने
बिसिनी उत्पलिनी अरविन्दिनी सँग हँसने
कुंद कुमुद क्षीरज अंभज नीरज के सँग-
नीलाम्बुज नीलोत्पल नीलोफर के रंग.
कँवल जलज अंबोज नलिन पुहुकर पुष्कर
अर्कबन्धु जलरुह राजिव वारिज सुंदर
मृणालिनी अंबजा अनीकिनी वधु मनहर
यह उसके, वह भी
इसके मन भाया रे!...
*
बाबुल ताल, तलैया मैया हँस-रोयें
शशिप्रभ कुमुद्वती किराविनी को खोयें.
निशापुष्प कौमुदी-करों मेंहदी सोहे.
शारंग पंकज पुण्डरीक मुकुलित मोहें.
बन्ना-बन्नी, गारी गायें विष्णुप्रिया.
पद्म पुंग पुन्नाग शीतलक लिये हिय.
रविप्रिय शीकर कैरव को बेचैन किया
अंभोजिनी अंबुजा
हृदय अकुलाया रे!...
*
चंद्रमुखी-रविमुखी हाथ में हाथ लिये
कर्णपूर सौगन्धिक सहरापद साथ लिये.
इन्दीवर सरसिज सरोज फेरे
लेते.
मौन अलोही अलिप्रिय सात वचन देते.
असिताम्बुज असितोत्पल-शोभा कौन कहे?
सोमभगिनी शशिकांति-कंत सँग मौन रहे.
'सलिल'ज हँसते नयन मगर जलधार बहे
श्रीपद ने हरिकर को
पूर्ण बनाया रे!...
*
टिप्पणी: कमल, कुमुद, व कमलिनी का प्रयोग कहीं-कहीं भिन्न पुष्प प्रजातियों के रूप में है, कहीं-कहीं एक ही प्रजाति के पुष्प के पर्याय के रूप में. कमल के रक्तकमल, नीलकमल तथा श्वेतकमल तीन प्रकार रंग के आधार पर वर्णित हैं. कमल-कमलिनी का विभाजन बड़े-छोटे आकर के आधार पर प्रतीत होता है. कुमुदको कहीं कमल कहीं कमलिनी कहा गया है. कुमद के साथ कुमुदिनी का भी प्रयोग हुआ है. कमल सूर्य के साथ उदित होता है, उसे सूर्यमुखी, सूर्यकान्ति, रविप्रिया आदि कहा गया है. रात में खिलनेवाली कमलिनी को शाशिमुखी, चन्द्रकान्ति कहा गया है. रक्तकमल के लाल रंग की हरि तथा लक्ष्मी के कर-पद पल्लवों से समानता के कारण हरिपद, श्रीकर जैसे पर्याय बने हैं, सूर्य, चन्द्र, विष्णु, लक्ष्मी, जल, नदी, समुद्र, सरोवर आदि के पर्यायों के साथ जोड़ने पर कमल के अनेक और पर्यायी शब्द बनते हैं. मुझसे अनुरोध था कि कमल के सभी पर्यायों को गूँथकर रचना करूँ. माँ शारदा के श्री चरणों में यह कमल माल अर्पित करने का सुअवसर देने के लिये पाठशाला-संचालकों का आभारी हूँ. सभी पर्यायों को गूंथने से रचना लंबी है. पाठकों की प्रतिक्रिया ही बताएगी कि गीतकार निकष पर खरा उतर सका या नहीं.
९.७.२०१०
***

शनिवार, 8 जुलाई 2023

चित्रगुप्त, कमल, नवगीत, कमलिनी, लोकोक्ति

॥ ॐ यमाय धर्मराजाय श्री चित्रगुप्ताय वै नमः ॥
कायस्थ - धर्मराज चित्रगुप्त के वंसज
वर्ण / जति - द्विज -क्षत्रिय ( राजन्य कायस्थ )
गरुड़ पुराण में कहा गया है कि चित्रगुप्त का राज्य सिंहासन यमपुरी में है और वो अपने न्यायालय में मनुष्यों के कर्मों के अनुसार उनका न्याय करते हैं तथा उनके कर्मों का लेखा जोखा रखते हैं, जो कि निम्नवत स्पष्ट हैं :-
‘धर्मराज चित्रगुप्त: श्रवणों भास्करादय: कायस्थ तत्र पश्यनित पाप पुण्यं च सर्वश:’
चित्रगुप्तम, प्रणम्यादावात्मानं सर्वदेहीनाम। कायस्थ जन्म यथाथ्र्यान्वेष्णे नोच्यते मया।।
☻ भवन्तौ क्षत्रवर्णस्थौ द्विजन्मनौ महाशयी । कृतोप वितीनो स्थान वेद शस्त्रधिकारिणी ॥ (पद्म पुराण )
" चित्रगुप्त को क्षत्रिय वर्ण का बताते हुए कहा गया है की वेदो को समझने व् ज्ञान रखने के वजह से आप यज्ञोपवीत के अधिकारी हैं जिन्हे द्विज -क्षत्रिय कहा जाता है । "
कमलाकरभट्ट क्रित वृहत्ब्रहम्खण्ड् में लिखा है-
भवान क्षत्रिय वर्णश्च समस्थान समुद्भवात्। कायस्थ्: क्षत्रिय: ख्यातो भवान भुवि विराजते॥
☻चित्र वचो मयागुप्तम् चित्रगुप्त स्मृत बुधै । सः गत्वा कोट नगरे चंडी भजन तत्परः ॥ (पद्म पुराण )
" आपका निवास संयम नगरी में है जो नगरकोट में है और आप चंडी के उपाशक हो । "
विष्णु धर्म सूत्र (विष्णु स्मृति ग्रंथ के प्रथम परिहास के प्रथम श्लोक में तो कायस्थ को परमेश्वर का रुप कहा गया है।
येनेदम स्वैच्छया, सर्वम, माययाम्मोहितम जगत। स जयत्यजित: श्रीमान कायस्थ: परमेश्वर:।।
स्कंद पुराण में कायस्थ के सात लक्षणों को बताया गया है ।
" विद्या वाश्च्य शुचि; धीरो , दाता परोप्कराकः ! राज्य सेवी , क्षमाशील; कायस्थ सप्त लक्षणा ; !!
यजुर्वेद आपस्तम्ब शाखा चतुर्थ खंड यम विचार प्रकरण से ज्ञात होता है कि महाराज चित्रगुप्त के वंसज चित्ररथ ( चैत्ररथ ) जो चित्रकुट के महाराजाधिराज थे और गौतम ऋषि के शिष्य थे ।
बहौश्य क्षत्रिय जाता कायस्थ अगतितवे। चित्रगुप्त: सिथति: स्वर्गे चित्रोहिभूमण्डले।।
चैत्ररथ: सुतस्तस्य यशस्वी कुल दीपक:। ऋषि वंशे समुदगतो गौतमो नाम सतम:।।
तस्य शिष्यो महाप्रशिचत्रकूटा चलाधिप:।।
“प्राचीन काल में क्षत्रियों में कायस्थ इस जगत में हुये उनके पूर्वज चित्रगुप्त स्वर्ग में निवास करते हैं तथा उनके पुत्र चित्र इस भूमण्डल में सिथत है उसका पुत्र (वंसज ) चैत्रस्थ अत्यन्त यशस्वी और कुलदीपक है जो ऋषि-वंश के महान ऋषि गौतम का शिष्य है वह अत्यन्त महाज्ञानी परम प्रतापी चित्रकूट का राजा है।”
यमांश्चैके-यमायधर्मराजाय मृतयवे चान्तकाय च। वैवस्वताय, कालाय, सर्वभूत क्षयाय च।।
औदुम्बराय, दघ्नाय नीलाय परमेषिठने। वृकोदराय, चित्रायत्र चित्रगुप्ताय त नम:।।
एकैकस्य-त्रीसित्रजन दधज्जला´जलीन। यावज्जन्मकृतम पापम, तत्क्षणा देव नश्यति।।
यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्वत, काल, सर्वभूतों का क्षय करने वाले, औदुम्बर, चित्र, चित्रगुप्त, एकमेव, आजन्म किये पापों को तत्क्षण नष्ट कर सकने में सक्षम, नील वर्ण आदि विशेषण चित्रगुप्त के परमप्रतापी स्वरूप का बखान करते हैं। पुणयात्मों के लिए वे कल्याणकारी और पापियों के लिए कालस्वरूप है।
☻द्विज - हिन्दू रीती रिवाज के अनुसार जनेऊ ( यज्ञोपवीत ) कराने के बाद दूसरा जन्म मानते हैं जो जातियां इन्हे करती हैं द्विज कहलाती है ।
☻द्विज -क्षत्रिय :- प्राचीन वेद ज्ञान परंपरा के अनुसार ब्राहमणो के सामान वेद ज्ञानी क्षत्रिय को द्विज क्षत्रिय कहा गया है ।

॥ जय माँ चंडी जय धर्मराज ॥

नवगीत:

पैर हमारे लात हैं....
संजीव 'सलिल'
*
*
पैर हमारे लात हैं,
उनके चरण कमल.
ह्रदय हमारे सरोवर-
उनके हैं पंकिल...
*
पगडंडी काफी है हमको,
उनको राजमार्ग भी कम है.
दस पैसे में हम जी लेते,
नब्बे निगल रहा वह यम है.
भारतवासी आम आदमी -
दो पाटों के बीच पिस रहे.
आँख मूँद जो न्याय तौलते
ऐश करें, हम पैर घिस रहे.
टाट लपेटे हम फिरें
वे धारे मलमल.
धरा हमारा बिछौना
उनका है मखमल...
*
अफसर, नेता, जज, व्यापारी,
अवसरवादी-अत्याचारी.
खून चूसते नित जनता का,
देश लूटते भ्रष्टाचारी.
हम मर-खप उत्पादन करते,
लूट तिजोरी में वे भरते.
फूट डाल हमको लड़वाते.
थाना कोर्ट जेल भिजवाते.
पद-मद उनका साध्य है,
श्रम है अपना बल.
वे चंचल ध्वज, 'सलिल' हम
हैं नींवें अविचल...
*
पुष्कर, पुहुकर, नीलोफर हम,
उनमें कुछ काँटें बबूल के.
कुई, कुंद, पंकज, नीरज हम,
वे बैरी तालाब-कूल के.
'सलिल'ज क्षीरज हम, वे गगनज
हम अपने हैं, वे सपने हैं.
हम हरिकर, वे श्रीपद-लोलुप
मनमाने थोपे नपने हैं.
उन्हें स्वार्थ आराध्य है,
हम न चाहते छल.
दलदल वे दल बन करें
हम उत्पल शतदल...
अभिनव प्रयोग- गीत: कमल-कमलिनी विवाह संजीव 'सलिल'
कमल-कमलिनी विवाह
संजीव 'सलिल'
*
* रक्त कमल
अंबुज शतदल कमल
अब्ज हर्षाया रे!
कुई कमलिनी का कर
गहने आया रे!...
*
* हिमकमल
अंभज शीतल उत्पल देख रहा सपने
बिसिनी उत्पलिनी अरविन्दिनी सँग हँसने
कुंद कुमुद क्षीरज अंभज नीरज के सँग-
नीलाम्बुज नीलोत्पल नीलोफर भी दंग.
कँवल जलज अंबोज नलिन पुहुकर पुष्कर
अर्कबन्धु जलरुह राजिव वारिज सुंदर
मृणालिनी अंबजा अनीकिनी वधु मनहर
यह उसके, वह भी
इसके मन भाया रे!...
*
* नील कमल
बाबुल ताल, तलैया मैया हँस-रोयें
शशिप्रभ कुमुद्वती कैरविणी को खोयें.
निशापुष्प कौमुदी-करों मेंहदी सोहे.
शारंग पंकज पुण्डरीक मुकुलित मोहें.
बन्ना-बन्नी, गारी गायें विष्णुप्रिया.
पद्म पुंग पुन्नाग शीतलक लिये हिया.
रविप्रिय श्रीकर कैरव को बेचैन किया
अंभोजिनी अंबुजा
हृदय अकुलाया रे!...
*
श्वेत कमल
चंद्रमुखी-रविमुखी हाथ में हाथ लिये
कर्णपूर सौगन्धिक श्रीपद साथ लिये.
इन्दीवर सरसिज सरोज फेरे लेते.
मौन अलोही अलिप्रिय सात वचन देते.
असिताम्बुज असितोत्पल-शोभा कौन कहे?
सोमभगिनी शशिकांति-कंत सँग मौन रहे.
'सलिल'ज हँसते नयन मगर जलधार बहे
श्रीपद ने हरिकर को
पूर्ण बनाया रे!...
***************
* ब्रम्ह कमल
टिप्पणी:
* कमल, कुमुद, व कमलिनी का प्रयोग कहीं-कहीं भिन्न पुष्प प्रजातियों के रूप में है, कहीं-कहीं एक ही प्रजाति के पुष्प के पर्याय के रूप में. कमल के रक्तकमल, नीलकमल तथा श्वेतकमल तीन प्रकार रंग के आधार पर वर्णित हैं. कमल-कमलिनी का विभाजन बड़े-छोटे आकार के आधार पर प्रतीत होता है. कुमुद को कहीं कमल, कहीं कमलिनी कहा गया है. कुमद के साथ कुमुदिनी का भी प्रयोग हुआ है. कमल सूर्य के साथ उदित होता है, उसे सूर्यमुखी, सूर्यकान्ति, रविप्रिया आदि कहा गया है. रात में खिलनेवाली कमलिनी को शशिमुखी, चन्द्रकान्ति, रजनीकांत, कहा गया है. रक्तकमल के लाल रंग की श्री तथा हरि के कर-पद पल्लवों से समानता के कारण हरिपद, श्रीकर जैसे पर्याय बने हैं, सूर्य, चन्द्र, विष्णु, लक्ष्मी, जल, नदी, समुद्र, सरोवर आदि से जन्म के आधार पर बने पर्यायों के साथ जोड़ने पर कमल के अनेक और पर्यायी शब्द बनते हैं. मुझसे अनुरोध था कि कमल के सभी पर्यायों को गूँथकर रचना करूँ. माँ शारदा के श्री चरणों में यह कमल-माल अर्पित कर आभारी हूँ. सभी पर्यायों को गूंथने पर रचना अत्यधिक लंबी होगी. पाठकों की प्रतिक्रिया ही बताएगी कि गीतकार निकष पर खरा उतर सका या नहीं?
* कमल हर कीचड़ में नहीं खिलता. गंदे नालों में कमल नहीं दिखेगा भले ही कीचड़ हो. कमल का उद्गम जल से है इसलिए वह नीरज, जलज, सलिलज, वारिज, अम्बुज, तोयज, पानिज, आबज, अब्ज है. जल का आगर नदी, समुद्र, तालाब हैं... अतः कमल सिंधुज, उदधिज, पयोधिज, नदिज, सागरज, निर्झरज, सरोवरज, तालज भी है. जल के तल में मिट्टी है, वहीं जल और मिट्टी में मेल से कीचड़ या पंक में कमल का बीज जड़ जमता है इसलिए कमल को पंकज कहा जाता है. पंक की मूल वृत्ति मलिनता है किन्तु कमल के सत्संग में वह विमलता का कारक हो जाता है. क्षीरसागर में उत्पन्न होने से वह क्षीरज है. इसका क्षीर (मिष्ठान्न खीर) से कोई लेना-देना नहीं है. श्री (लक्ष्मी) तथा विष्णु की हथेली तथा तलवों की लालिमा से रंग मिलने के कारण रक्त कमल हरि कर, हरि पद, श्री कर, श्री पद भी कहा जाता किन्तु अन्य कमलों को यह विशेषण नहीं दिया जा सकता. पद्मजा लक्ष्मी के हाथ, पैर, आँखें तथा सकल काया कमल सदृश कही गयी है. पद्माक्षी, कमलाक्षी या कमलनयना के नेत्र गुलाबी भी हो सकते हैं, नीले भी. सीता तथा द्रौपदी के नेत्र क्रमशः गुलाबी व् नीले कहे गए हैं और दोनों को पद्माक्षी, कमलाक्षी या कमलनयना विशेषण दिए गये हैं. करकमल और चरणकमल विशेषण करपल्लव तथा पदपल्लव की लालिमा व् कोमलता को लक्ष्य कर कहा जाना चाहिए किन्तु आजकल चाटुकार कठोर-काले हाथोंवाले लोगों के लिये प्रयोग कर इन विशेषणों की हत्या कर देते हैं. श्री राम, श्री कृष्ण के श्यामल होने पर भी उनके नेत्र नीलकमल तथा कर-पद रक्तता के कारण करकमल-पदकमल कहे गये. रीतिकालिक कवियों को नायिका के अन्गोंपांगों के सौष्ठव के प्रतीक रूप में कमल से अधिक उपयुक्त अन्य प्रतीक नहीं लगा. श्वेत कमल से समता रखते चरित्रों को भी कमल से जुड़े विशेषण मिले हैं. मेरे पढ़ने में ब्रम्हकमल, हिमकमल से जुड़े विशेषण नहीं आये... शायद इसका कारण इनका दुर्लभ होना है. इंद्र कमल (चंपा) के रंग चम्पई (श्वेत-पीत का मिश्रण) से जुड़े विशेषण नायिकाओं के लिये गर्व के प्रतीक हैं किन्तु पुरुष को मिलें तो निर्बलता, अक्षमता, नपुंसकता या पाण्डुरोग (पीलिया ) इंगित करते हैं. कुंती तथा कर्ण के पैर कोमलता तथा गुलाबीपन में साम्यता रखते थे तथा इस आधार पर ही परित्यक्त पुत्र कर्ण को रणांगन में अर्जुन के सामने देख-पहचानकर वे बेसुध हो गयी थीं.
* हिम कमल: विकिपीडिया, एक मुक्त ज्ञानकोष से चीन के सिन्चांग वेवूर स्वायत्त प्रदेश में खड़ी थ्येनशान पर्वत माले में समुद्र सतह से तीन हजार मीटर ऊंची सीधी खड़ी चट्टानों पर एक विशेष किस्म की वनस्पति उगती है, जो हिम कमल के नाम से चीन भर में मशहूर है। हिम कमल का फूल एक प्रकार की दुर्लभ मूल्यवान जड़ी बूटी है, जिस का चीनी परम्परागत औषधि में खूब प्रयोग किया जाता है। विशेष रूप से ट्यूमर के उपचार में, लेकिन इधर के सालों में हिम कमल की चोरी की घटनाएं बहुत हुआ करती है, इस से थ्येन शान पहाड़ी क्षेत्र में उस की मात्रा में तेजी से गिरावट आयी। वर्ष 2004 से हिम कमल संरक्षण के लिए व्यापक जनता की चेतना उन्नत करने के लिए प्रयत्न शुरू किए गए जिसके फलस्वरूप पहले हिम कमल को चोरी से खोदने वाले पहाड़ी किसान और चरवाहे भी अब हिम कमल के संरक्षक बन गए हैं।
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विमर्श
रूढ़ियाँ और तथ्य
पिछले दिनों लेखिकाओं की आपबीती बयान करने वाली तथा नारी की निष्ठुर नियति का सर्जनात्मक चित्रण करने वाली आत्मकथाओं के अंशों का संकलन कर सुविख्यात कथाकार, सम्पादक और चिन्तक राजेन्द्र यादव के सम्पादन में प्रकाशित पुस्तक ’देहरी भई बिदेस’ की चर्चा चली तो हमारे मानस में वह दिलचस्प और रोमांचक तथ्य फिर उभर आया कि बहुधा कुछ उक्तियाँ, फिकरे या उद्धरण लोककंठ में इस प्रकार समा जाते हैं कि कभी-कभी तो उनका आगा-पीछा ही समझ में नहीं आता, कभी यह ध्यान में नहीं आता कि वह उद्धरण ही गलत है, कभी उसके अर्थ का अनर्थ होता रहता है और पीढी-दर-पीढी हम उस भ्रान्ति को ढोते रहते हैं जो उस फिकरे में लोककंठ में आ बसी है।
’देहरी भई बिदेस’ भी ऐसा ही उद्धरण है जो कभी था नहीं, किन्तु सुप्रसिद्ध गायक कुन्दनलाल सहगल द्वारा गाई गई कालजयी ठुमरी में भ्रमवश इस प्रकार गा दिये जाने के कारण ऐसा फैला कि इसे गलत बतलाने वाला पागल समझे जाने के खतरे से शायद ही बच पाये।
पुरानी पीढी के वयोवृद्ध गायकों को तो शायद मालूम ही होगा कि वाजिद अली शाह की सुप्रसिद्ध शरीर और आत्मा के प्रतीकों को लेकर लिखी रूपकात्मक ठुमरी "बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय" सदियों से प्रचलित है जिसके बोल लोककंठ में समा गये हैं - "चार कहार मिलि डोलिया उठावै मोरा अपना पराया छूटो जाय" आदि। उसमें यह भी रूपकात्मक उक्ति है - "देहरी तो परबत भई, अँगना भयो बिदेस, लै बाबुल घर आपनो मैं चली पिया के देस"। जैसे परबत उलाँघना दूभर हो जाता है वैसे ही विदेश में ब्याही बेटी से फिर देहरी नहीं उलाँघी जाएगी, बाबुल का आँगन बिदेस बन जाएगा। यही सही भी है, बिदेस होना आँगन के साथ ही फबता है, देहरी के साथ नहीं, वह तो उलाँघी जाती है, परबत उलाँघा नहीं जा सकता, अतः उसकी उपमा देहरी को दी गई। हुआ यह कि गायक शिरोमणि कुन्दनलाल सहगल किसी कारणवश बिना स्क्रिप्ट के अपनी धुन में इसे यूँ गा गये "अँगना तो परबत भया देहरी भई बिदेस" और उनकी गाई यह ठुमरी कालजयी हो गई। सब उसे ही उद्धृत करेंगे। बेचारे वाजिद अली शाह को कल्पना भी नहीं हो सकती थी कि बीसवीं सदी में उसकी उक्ति का पाठान्तर ऐसा चल पडेगा कि उसे ही मूल समझ लिया जाएगा। सहगल साहब तो ’चार कहार मिल मोरी डोलियो सजावैं" भी गा गये जबकि कहार डोली उठाने के लिए लगाये जाते हैं, सजाती तो सखियाँ हैं। हो गया होगा यह संयोगवश ही अन्यथा हम कालजयी गायक सहगल के परम प्रशंसक हैं।
नई पीढी को उस गीत की तो शायद याद भी नहीं होगी जो सुप्रसिद्ध सुगम संगीत गायक जगमोहन ने गाया था और गैर-फिल्मी सुगम संगीत में सिरमौर हो गया था - ’ये चाँद नहीं, तेरी आरसी है।’ उसमें गाते-गाते एक बार उनके मुँह से निकल गया "ये चाँद नहीं तेरी आरती है।" बरसों तक यह बहस चलती रही कि मूल पाठ में ’आरसी"शब्द है या ’आरती"।
लोकप्रसिद्धि और चलन में आ जाने के कारण खोटे-खरे सिक्के के अन्तर करने में तथा मूलतः किसी उक्ति का क्या आशय रहा होगा इसके निर्णय में कैसी मुश्किलें आती हैं इसके अनेक उदाहरण हैं। केवल दो-एक ही नमूने की दृष्टि से प्रस्तुत हैं। एक बहुत प्रसिद्ध लोकोक्ति है - ’अक्ल बडी कि भैंस "? इसका अर्थ दशकों से हमारे समझ में नहीं आता था, भला अक्ल और भैंस की तुलना क्यों की जा रही है ? क्या भैंस को बेअक्ल मानने के कारण ? हमने बुजुर्गों से पूछा तो जितने मुँह उतने निर्वचन सामने आये। कुछ ने कहा भैंस जैसी मोटी अक्ल की दृष्टि से यह कहा गया होगा। कुछ समझदारों ने यह तरीका निकाला कि यह मूलतः ’अक्ल बडी कि बहस"? रहा होगा। बहस करने से गलत को सही थोडे ही बताया जा सकता है। जिन्होंने यह समझाया कि हमारे यहाँ प्राचीनकाल से यह अवधारणा चली आ रही है कि केवल उम्रदराज होने से ही आदमी बडा नहीं हो जाता, जो बुद्धिमान है वही बडा होता है - "अक्ल बडी कि वयस (उम्र) "?, वह बात अवश्य हमारे गले उतरी। मनुस्मृति से लेकर आज तक संस् त की उक्ति प्रसिद्ध है कि जो बुद्धिमान है वह महान् है, केवल वयोवृद्ध नहीं, हमें ज्ञानवृद्ध होना चाहिए आदि। "अक्ल बडी कि वयस" में वयस भैंस हो गई। अपभ्रंश की यही तो सरणि होती है।
इसी प्रकार हमारे समय में इस लोकोक्ति का अर्थ कभी नहीं आया था - "दूर के ढोल सुहावने होते हैं।" लोगों ने बहुत विवेचन किया कि पास से ढोल कर्णकटु लगता है, दूर से ही सुहावना लगता है पर यह इसलिए ठीक नहीं लगा कि सुहावना दृश्य होता है, श्रव्य नहीं। इसका रहस्य तब समझ में आया जब संस् त की वह प्रसिद्ध सूक्ति ध्यान में आई जिसमंि कहा गया कि तीन चीजें दूर से ही सुहावनी लगती हैं - पहाड दूर से रम्य लगते हैं, वेश्या का शृंगार दूर से ही अच्छा लगता है, युद्ध की चर्चा ही अच्छी होती है, युद्ध वस्तुतः विनाशक होता है। ’दूरस्थाः पर्वता रम्याः" उक्ति सुप्रसिद्ध है। यह पहले राजस्थानी में गई ’दूर के टोल सुहावने लगते हैं" बनकर और हिन्दी में बन गई "दूर के ढोल" क्योंकि वहाँ ढोल नहीं होते। राजस्थानी में टोळ अनगढ पत्थर पहाडी, टीला आदि के लिए आता है जो ऊबड-खाबड होता है पर दूर से हरियाली आदि के कारण सुरम्य लगता है।
इसी प्रकार की एक प्रसिद्ध लोकोक्ति है - ’कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली ’? इसका अर्थ समझे बिना हम इसका प्रयोग ऐसे अवसरों पर करते हैं जब कोई किसी अत्यन्त समर्थ या समृद्ध व्यक्ति की तुलना किसी दरिद्र से करने लगता है। इसका अर्थ भी किसी ने हमें सही ढंग से नहीं बतलाया था। हम यही समझते थे कि राजा भोज के राज में कोई तेली गंगाराम नाम का रहा होगा जिसकी तुलना राजा भोज से करना नितान्त हास्यास्पद माना गया। इस लोकोक्ति का सही अर्थ तब समझ में आया जब डॉ. विद्यानिवास मिश्र जैसे कुछ प्राच्य विद्याविदों ने मध्यकालीन इतिहास में एक तथ्य की ओर संकेत कर यह समझाया कि यह लोकोक्ति धारानगरी के नरेश राजा भोज की वीरता को लक्ष्य कर कही गई थी। भोज के समकालीन दो राज्य और थे जिन्होंने धारानगरी पर चढाई कर राजा भोज को हराना चाहा था। ये थे कलचुरिनरेश राजा गांगेय और चालुक्यनरेश तैलप। इन्होंने मिलकर राजा भोज पर आक्रमण किया था पर उसे नहीं हरा सके थे। ये ही गंगू और तेली हैं। दोनों मिलकर भी राजा भोज की बराबरी नहीं कर पाये यह बतलाने के लिए यह उक्ति चल पडी "कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू और तेली"? और हम समझते हैं कि गंगू नाम का एक कोई तेली था जिसकी तुलना राजा भोज से करने पर तुलना करने वाले की हँसी उडाई जाती है। डॉ. विद्यानिवास मिश्र ने अपने प्रसिद्ध निबन्ध "कलचुरियों की राजधानी" में इस सारे इतिहास का विवरण दिया है।
यह तो बात हुई लोकोक्तियों की जिनका अर्थ लगाने में भ्रान्तियों के कैसे-कैसे कुहासे हमारी दृष्टि को ढके रखते हैं इसका कुछ अन्दाजा अब आपको हो गया होगा। कुछ प्रसिद्ध दोहे भी ऐसे हैं जिनके अर्थ के बीच में कुहासे आ जाते हैं। बिहारी सतसई के दोहे प्रसिद्ध हैं। उनकी तारीफ में यह दोहा बहुत प्रचलित हो गया है - ;सतसैया के दोहरे ज्यों नावक के तीर’। देखन में छोटे लगैं, घाव करैं गंभीर। इसमें नावक के तीर क्या होते हैं यह तो हम समझते नहीं, इसे बोलते हैं "नाविक के तीर" क्योंकि नाविक का अर्थ हम जानते हैं नाव चलाने वाला। पर नाव चलाने वाला तो पतवार चलाता है, तीर नहीं चलाता। फिर इसका अर्थ क्या होगा ? इसका अर्थ भी मध्यकालीन "नावक" का अर्थ समझे बिना नहीं लगाया जा सकता। जब बारूद का प्रचलन हो गया तो नुकीले लोहे के तीर छोटी तोप में बारूद भरकर उससे इतनी जोर से छोडे जाते थे कि शरीर के आरपार भी हो जाते थे। इस छोटी तोपची या तोप को ही "नावक" कहा जाता था (यह फारसी शब्द है)। उससे चले तीर छोटे तो होते थे पर तेजी से घुस जाते थे शरीर में। ये नावक ज्यादातर ऊँट या हाथी की पीठ पर लादकर सेना के साथ ले जाए जाते थे। अब नावकों का चलन तो रहा नहीं, अतः हमें "नाविक" ही समझ में आता है और बडे-बडे विद्वान भी कुछ इसी प्रकार का अर्थ करने लग जाते हैं। क्या किया जाए ?
ये कुछ दिलचस्प उदाहरण है बहुप्रचलित भ्रान्तियों के। जब तक इनका वास्तविक अर्थ समझने के स्रोत उपलब्ध हैं तब तक भले ही इनका सही रहस्य हम समझ लें अन्यथा लोक प्रचलन अर्थ को कहाँ से कहाँ ले जा सकता है, इसका अन्दाजा आप इन्हें देखकर भलीभाँति लगा सकते हैं।
इसी प्रकार सामन्तकालीन अभिवादन शैली का एक वाक्यांश सदियों से सुप्रचलित है। जनतंत्र् के सुप्रतिष्ठित होने के बाद ऐसी अभिवादन शैलियाँ विरल अवश्य हो गई थीं, किन्तु सामन्तकालीन परिवेश पर बने दूरदर्शन आदि के धारावाहिकों के कारण यह अभिवादन फिर सुना जाने लगा है। यह है अनुयायियों, अधीनस्थों तथा कनिष्ठों आदि के द्वारा राजा, राजवर्गीय वरिष्ठ व्यक्ति या सामन्त के अभिवादन करते समय बोला जाने वाला वाक्यांश - ’घणी खम्मा’ या ’खम्मा घणी’। यह क्यों बोला जाता है इस पर हमें सदा जिज्ञासा रही थी। सदियों से अधिकांश लोग अर्थ समझे बिना इसे राजवर्गीय सम्मानित व्यक्ति को अभिवादन करते समय बोल देते थे। हाल ही में एक सीरियल में तो इसे उत्तर-प्रत्युत्तर शैली द्वारा इस प्रकार बोलते देखा गया है कि पहला ’घणी खम्मा’ कहता है, दूसरा प्रत्युत्तर में ’खम्मा घणी’ कहता है,जैसे ’सलाम अलैकुम’ सुनकर प्रत्युत्तर में ’अलैकुम अस सलाम"बोला जाता है।
अधिकतर लोग इसका अर्थ क्षमा शब्द से लगाते हैं और समझते हैं कि अभिवादक चाहता है कि उस पर घणी (बहुत) क्षमा रखी जाए, अर्थात् वह अपराध करता भी जाए तो उसे क्षमा किया जाता रहे। हमें सदा से यह जिज्ञासा रही थी कि ’क्षमा’ शब्द की बजाय ’ कृपा’, ’दया’ बनी रहे ऐसे शब्द उचित रहते, क्षमा तो गलती होने पर ही की जाती है। संस् त, प्रा त, राजस्थानी और मध्यकालीन इतिहास के परिनिष्ठित प्राचीन पंडितों से जब इसका रहस्य पूछा गया तो उन्होंने इसका जो अर्थ बताया उसे सुनकर हमें विनोदमिश्रित आश्चर्य हुआ, यह भय भी लगा कि यदि इसका यह वास्तविक अर्थ किसी को बताएँगे तो वह शायद ही विश्वास करे, हमें पागल भी समझ सकता है पर इसका वास्तविक रहस्य यही है।
वस्तुतः सामन्त लोग अपने राजा को इसी कामना के साथ अभिवादन करते थे कि ’आपकी दीर्घ आयु हो"। सर्वत्र् सामन्तीकाल में ऐसे ही अभिवादन होते थे जैसे अंग्रेजी में लॉङ्ग लिव द किंग अभिव्यक्ति सुविदित है। इसके लिए बोला जाता था ’घणी आयुष्यम्" (घणी आयु हो आपकी) राजस्थानी में आयुष्यम् ’आयुख्यम्म" बोला जाता है। अतः यों बोला जाता था यह वाक्यांश "घणी आयुख्यम्मा" धीरे-धीरे ’अ’ गायब हुआ, "युख्यम्मा’ रह गया, फिर ’यु’ भी गायब हुआ, ’घणी ख्यम्मा’ रह गया और आज जो बोला जाता है वह आप जानते ही हैं। ’ख्यम्मा घणी’ और ’घणी ख्यम्मा’ दोनों का अर्थ एक ही है, किन्तु जिस प्रकार चलन में इसका अपभ्रंश कर दिया है उसके कारण इसका वास्तविक अर्थ बतलाने वाला पागल या झाँसेबाज समझा जाएगा, इसमें कोई संदेह नहीं। हमने भी इस अर्थ को झाँसा ही समझा था पर जब मुनि जिनविजय जी से लेकर स्वामी नरोत्तमदास जी, पं. गोपालनारायण वहुरा आदि सभी ने इसी तथ्य की पुष्टि की तब हमें विश्वास हुआ।
चलन में सदियों से आकर शब्द किस प्रकार बदल जाते हैं इसके ठीक इसी प्रकार के अनेक उदाहरण वयोवृद्ध व्यक्तियों को आज भी याद होंगे, यद्यपि नई पीढी को तो वे शब्द ही अजूबा लग सकते हैं। राजस्थानी में एक शब्द बोला जाने लगा था ’’खैरसल्ला’। इसका प्रयोग कभी तो बात की समाप्ति हेतु होता था, कभी लापरवाही बताने के लिए, कभी ’सब कुछ चलता है’ के अर्थ में। इसका अर्थ क्या है यह भी जब विद्वानों ने बताया तो हमारी आँख खुली। पूरा वाक्य इस प्रकार बोला जाता था ’अल्ला-अल्ला, खैर सल्ला’ अर्थात् भगवान की कृपा से सब कुछ ठीक है। अल्ला अल्ला तो इसमें समझ में आता ही है ’खैर सल्ला’ क्या है ? यह वस्तुतः ’खैर-उल-इस्लाम’ का अपभ्रंश है जिसका अर्थ है इस्लाम की खैर हो। वह उसी पद्धति के अनुरूप बोला जाता था जिसमें ’अस सलाम अलैकुम’ बोलकर सवाल का जवाब दिया जाता है। ’खैर उल इस्लाम’, ’खैर सल्लाम’ बना, फिर ’खैर सुल्ला’ रह गया। आज इसका यह रहस्य बतलाने वाले को भी पागल समझा जाने का डर अवश्य लगेगा। हो सकता है ’खैर सल्ला’ ही कम लोगों ने सुना हो।
बहुत कम लोगों को यह मालूम होगा कि अंग्रेजी राज में रात को गश्त लगाने वाले संतरी (जो सेंटिनल शब्द का अपभ्रंश है) सुरक्षा के अन्तर्गत आने वाले स्थल के आगे घूमते रहते थे और कई बार यह नारा लगाते थे ’हुकम सदर’। हमने बाल्यकाल में (स्वतंत्र्ता से पूर्व अंग्रेजी राज में) जब यह फिकरा सुना तो इसका यही अर्थ समझा कि ’सदर’ (मालिक) के हुकम से यह हो रहा है पर इसका यह अर्थ नहीं था। जब पुलिस के सर्वोच्च अधिकारी ने इसका रहस्य समझाया तब विनोदमिश्रित आश्चर्य होना ही था। वस्तुतः यह अंग्रेजी वाक्य है जो संतरी किसी भी अजनबी को गश्त के समय देखते ही यह पूछने हेतु बोला था - ’तुम कौन हो’ ? ’कौन आ रहा है’ ? ’हू कम्स देयर’ ? (Who comes there ?) यह ’हुकमसदेयर’ हुआ, फिर ’हुकम सदर’ हो गया। ऐसे अनेक फिकरे हैं जो अन्य भाषाओं से हमारी अपनी भाषाओं में आते-आते बदल गए हैं, जिनका अध्ययन ज्ञानवर्धक और मनोरंजक होगा।
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