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शुक्रवार, 10 जुलाई 2020

विमर्श : भाषिक शुद्धता

विमर्श : भाषिक शुद्धता  
संजीव 
*

भाषा वाहक भाव की, करे कथ्य अभिव्यक्त
शब्द यथोचित यदि नहीं, तो मानें है त्यक्त
अनुभूत को अभिव्यक्त करने का माध्यम है भाषा। बच्चा भाषा सीखता है माँ और स्वजनों से। माता-पिता दोनों की भाषिक पृष्ठ भूमि प्राय: भिन्न होती है। भाषा कोई भी हो लोक दैनंदिन कार्य व्यापार में विविध भाषाओं-बोलिओं के शब्दों का प्रयोग करता है। ग्रामीण बोली और बाजारू भाषा इसी तरह बनती है। अध्ययन की भाषा शिक्षा के स्तर और विषयानुसार रूप ग्रहण करती है। प्राथमिक स्तर का भाषा शोधकार्य के उपयुक्त नहीं हो सकती। इसी तरह प्राणीशास्त्र में प्रयुक्त भाषा वाणिज्य अथवा यांत्रिकी को लिए अनुपयुक्त होगी।
भाषिक शुद्धता का शब्दों से संबंध नहीं 
सामान्यतः भाषिक शुद्धता के शब्द-प्रयोग से जोड़ दिया जाता है। मैं इससे सहमत नहीं हूँ। शब्द साझा होते हैं। मनुष्य जहाँ जाता है, जिनसे मिलता है, जो पढ़ता है, उससे शब्द ग्रहण करता है। वर्तमान में दूरदर्शन व अंतर्जाल ने 'छोटी सी ये दुनिया' की सोच को साकार कर दिया है। इसे शब्दों की यात्रा और सहज हो गयी है। जिस देश के पात्र, स्थान और लोकाचार की चर्चा की जाएगी, उस देश के शब्द प्रयोग में आएंगे ही। रूसी परिवेश की कहानी में रूस के पात्र, स्थान और लोकाचार स्वाभाविक है। वहाँ भारतीय वनस्पतियों, नामों, शहरों का उल्लेख अनुपयुक्त होगा। कहते हैं "पाँच कोस पे पानी बदले, बीस कोस पे बानी" अगर भाषा के स्वाभाविकता ही न होगी तो कृत्रिम भाषा से रसानंद कैसे मिलेगा?  
भाषिक शुद्धता का आधार व्याकरण और पिंगल 
भाषिक शुद्धता या अशुद्धता को देखने का आधार भाषा का व्याकरण और पिंगल होता है। हर भाषा की भिन्न प्रकृति और संस्कार होता है। हिंदी में २ लिंग हैं, संस्कृत में ३, अंग्रेजी में ४। भाषिक शुद्धता को महत्वहीन समझनेवाले यह बताएं की अंग्रेजी में हिंदी की तरह दो लिंग मानकर लिखा जाए तो उन्हें हजम होगा? यदि अंग्रेजी के पर्चे में परीक्षार्थी हिंदी की क्रिया, विशेषण आदि का प्रयोग करे तो उसे सही मानेंगे? अंग्रेजी में उचित शब्द होते हुए भी तमिल, मराठी या हिंदी के शब्द उपयोग करने पर अंक देंगे? 
भाषिक संस्कार 
इसी तरह हिंदी में जो सम्यक शब्द हैं उनका प्रयोग किया ही जाना चाहिए। गाँव के किसान 'गेहूं' की जगह 'व्हीट' कहे तो असहनीय होगा। लोक अन्य भाषिक शब्दों को अपने संस्कार में ढालता है। तभी 'मास्टर साहेब' को 'मास्साब', 'डॉक्टर साहेब' को 'डाक्साब' बनाकर ग्रहण कर लेता है। 'स्टेशन' को 'टेशन' कहे  तो भी स्वाभाविकता बनी रहती है। किन्तु पौधरोपण की जगह 'प्लांटेशन' का प्रयोग भाषिक प्रदूषण ही है। 
साहित्य में भाषा 
लोक साहित्य के माध्यम से भाषा को संस्कारित करता है। साहित्य की भाषा लक्ष्य पाठक के अनुरूप होती है। हिंदी साहित्य के स्नातक को जिस भाषा में पढ़ाया जायेगा वह चिकित्सा के स्नातक विद्यार्थी के लिए प्रयोग नहीं की जा सकती। साहित्य में भाषिक शुद्धता का आग्रह बिलकुल उचित है। हिंदी में अंग्रेजी, अरबी-फ़ारसी शब्दों के आग्रही क्या अंग्रेजी रचना कर्म में हिंदी शब्दों का प्रयोग करेंगे? प्रो. अनिल जी ने 'ऑफ़ एन्ड ऑन' या 'द सेकेण्ड थॉट' में शुद्ध अंग्रेजी नहीं लिखी क्या? इन किताबों कितने हिंदी शब्द हैं? अंग्रेजी में लिखें तो भाषा शुद्ध हो, हिंदी में लिखें तो भाषिक शुद्धता का प्रश्न गलत कैसे ?  
रचना का कथ्य और भाषा  
बाल साहित्य की भाषा तकनीकी लेख या व्यंग्य लेख की तरह नहीं होगी। कबीर और तुलसी की भाषा में भिन्नता स्वाभाविक है और दोनों में से किसी को अशुद्ध नहीं कहा जाता। क्या रामचरित मानस ग़ालिब की भाषा में लिखा जा सकता है? सपना जी! बहुत विनम्रता से महान है कि उर्दू का तो कोई शब्द ही नहीं है। उर्दू शब्द कोष में सम्मिलित सब और हर शब्द किसी अन्य भाषा से लिया गया है। उर्दू हिंदी की एक शैली है जिसमें कुछ विदेशी  (अरबी, फ़ारसी) और कुछ भारतीय भाषाओँ के शब्दों का संकलन है। इसी तरह जबलपुर के निकट पचेली बोली जाती है जिसमें ५ भारतीय भाषाओँ के शब्द सम्मिलित हैं। 
भाषिक सहजता जरूरी  
अनिल जी! यह सही है कि अनावश्यक क्लिष्टता नहीं होना चाहिए, पर यह लेखक की शैली से जुड़ा बिंदु है। मैथिलीशरण गुप्त और हजारी प्रसाद द्विवेदी दोनों की भाषा और शब्द चयन भिन्न हों तो दोनों में से किसी को निरस्त नहीं किया जा सकता जबकि एक की भाषा सरल दूसरे की क्लिष्ट है। 
देवकांत जी से सहमत हूँ कि जहाँ भाषा में उपयुक्त शब्द हों वहाँ अनावश्यक अन्य भाषा के शब्दों का प्रयोग नहीं चाहिए। 
सारांश जी की बात सही है। मिलमा दाल, सब्जी तो खाई जा सकती है पर खीर और कढ़ी को मिलाकर नहीं खाया जा सकता। 
भाषा की नदी में सहायक नदियों क पानी मिले तो आपत्ति नहीं है किन्तु रासायनिक कारखाने का दूषित जल मिले तो आपत्ति करनी ही होगी। 
पाखी जी हिंदी में शोध निरंतर हो रहा है। हमें अंग्रेजी से स्नेह रखते हुए अंग्रेजियत से दूरी बनानी होगी। अंग्रेजी के प्राध्यापक को  भी पूरी तरह भारतीय संस्कार, हिंदी भाषा और स्थानीय बोली से जुड़ा होना चाहिए। 
भाषी प्रदूषण गलत शब्द प्रयोग से भी होता है। रेल लेट है। इसे हिंदी कैसे स्वीकार करे? रेल का अर्थ पटरी होता है। ट्रेन का समानार्थी रेलगाड़ी है। जबलपुर आ रहा है। जबलपुर नहीं आता-जाता, आती-जाती रेलगाड़ी है। हमें भाषिक शुद्धता के प्रति सजग होना ही होगा। मेरी एक द्विपदी का आनंद लें- 
क्या पूछते हो, राह यह जाती कहाँ है? 
आदमी जाते हैं नादां रास्ते जाते नहीं हैं। 
पौधरोपण का प्रयोग न कर वृक्षारोपण का प्रत्योग करने के पक्षधर क्या प्लांटेशन की जगह ट्री टेशन कहेंगे? हम हिंदी के प्रति स्वस्थ्य दृष्टिकोण अपनाएं और भाषिक शुद्धता, सरलता तथा सहजता को अपनाएँ यह आवश्यक है। 
अभी कल ही मिजोरम विश्वविद्यालय द्वारा हिंदी में अनुवाद कार्य पर अन्तर्राष्ट्रीय वेब संगोष्ठी थी। उसमें बुगरिया और अन्य देशों के विदेशी प्राध्यापक शुद्ध हिंदी पूरी तरह भारतीय लहजे में बोल रहे थे किन्तु कुलपति महोदय पूरे समय अंग्रेजी बोलते रहे। विदेशी प्राध्यापक द्वारा अंग्रेजी समझने में कठिनाई व्यक्त करने पर भी उन्हें अंग्रेजी बोलने में शर्म नहीं आई। अंत में भारतेन्दु के दोहे के साथ अपने बात समाप्त करता हूँ -
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा ज्ञान के मिठे न हिय को सूल 
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बहुमुखी प्रतिभा के धनी आचार्य संजीव वर्मा "सलिल" विजय प्रशांत दिल्ली


बहुमुखी प्रतिभा के धनी आचार्य संजीव वर्मा "सलिल" 
विजय प्रशांत दिल्ली 
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सलिल जी का नाम हिंदी साहित्यकारों में बड़ी श्रद्धा से लिया जाता है | अनेक पुस्तकों के रचनाकार श्री सलिल जी लगभग तीन दशकों से गद्य पद्य की सभी विधाओं में अपनी लेखनी से हिंदी साहित्य को समृद्ध कर रहें हैं | गीत, नवगीत, गीतिका, ग़ज़ल, व्याकरण, संस्मरण और यात्रा वृत्त आदि कोई विधा शेष नहीं जिस पर इनकी कहनी न चली हो। इनके काव्य में रस,छंद, अलंकार का सुन्दर समन्वय दिखाई देता है |
विश्व प्रसिद्ध कवियत्री महादेवी वर्मा के भतीजे का गौरव इन्हे प्राप्त होते हुए ये स्वयं सिद्ध कवि हैं | ये शब्दों के ऐसे बाजीगर की श्रोता सुनकर आत्म विभोर हो तालिया बजाना भी भूल जाता हैं | शब्द इनकी लेखनी से निकलने के लिए आतुर रहते हैं |
अनेक राज्यों से अनेक पुरस्कार से सम्मानित श्री संजीव वर्मा सलिल जी पेशे से अभियन्ता के साथ अधिवक्ता भी हैं | आपका हिन्दी भाषा के साथ साथ ब्रज, भोजपुरी,अवधी, बुंदेली, राजस्थानी, हरयाणवी तथा अंग्रेजी भाषाओँ पर भी समान अधिकार है | ट्रू मीडिया पत्रिका के प्रधान सम्पादक श्री ओम प्रकाश जी द्वारा प्रकाशित आपके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केन्द्रित विशेषांक साहित्यिक जगत में विशेष आलोकित हो ऐसी मेरी शुभेच्छा है | अंत में मेरी ईश्वर से कामना है कि सलिल जी इसी प्रकार साहित्य सृजन करते रहें तथा युवाओं के प्रेरणा श्रोत्र बने रहें| ईश्वर इन्हे सुन्दर स्वास्थ्य के साथ शतायु करे |
विजय प्रशान्त

अभियांत्रिकी और साहित्य का अलौकिक संगम - संजीव वर्मा " सलिल


" अभियांत्रिकी और साहित्य का अलौकिक संगम - संजीव वर्मा " सलिल " 
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संजीव भैया के बारे में लिखना वैसा ही है, जैसे समुंदर की बूँदें गिनना - मैं उन्हें सदा भैया से संबोधित करता हूँ और मुझे भी उनसे एक बड़े भाई का प्यार और आशीर्वाद हमेशा मिला है I मेरी उनसे आरंभिक मुलाकात १६ मई २००४ को हुई थी, जब राष्ट्रीय संस्था आई. जी. एस. जबलपुर चैप्टर की स्थापना का विधिवत उद्घाटन हुआ था और तब शायद वो पी. डब्ल्यू. डी. शहडोल में पदस्थ थे I उसके बाद तो उनसे लगातार मुलाक़ातें होती रहीं I आई. जी. एस. जबलपुर चैप्टर के संस्थापक चेयरमैन प्रोफ़े . व्ही के श्रीवास्तव और मानसेवी सचिव डॉ दिनेश खरे के साथ उनसे मुलाक़ातों का क्रम शुरू हो गया , बाद में वो स्थानांतरित होकर जबलपुर आ गये, और फिर तो शहर की तमाम तकनीकी संस्थाओं यथा - इंस्टीट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स ( इंडिया) जबलपुर लोकल सेंटर, प्रेक्टसिंग इंजीनियर्स एसोशिएशन, आई.जी.एस. जबलपुर चैप्टर और अन्य सामाजिक एवम् साहित्यक संस्थाओं के कार्यक्रमों में लगातार उनसे मुलाक़ातें होती रही I आगे चलकर हमने आई.जी.एस. जबलपुर चैप्टर संस्था में साथ काम किया I उन्होने इस संस्था द्वारा आयोजित दो राष्ट्रीय सेमिनारों में प्रकाशित सोविनयर का संपादन किया, जिनमें वर्ष २००८ में बीटुमीन सरफ़ेस - डिजाइन कंस्ट्रक्शन और फेलुअर विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार के लिए पत्रिका " मार्ग " और वर्ष २०११ में एडवान्सेस इन जियोटेकनिकल इंजीनियरिंग, कॉंक्रीट एंड मेसनरी कंस्ट्रक्शन विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार के लिए पत्रिका " निर्माण " का सफल संपादन किया I अपने अनेकों सेमिनार में तकनीकी प्रपत्र प्रस्तुत किए है I
आपने हमेशा हमारी राजभाषा हिन्दी के उन्नयन के लिए कार्य किया I साहित्य की लगभग हर विधा के आप विद्वान है, ये हम सब जानते ही है, अभियांत्रिकी के क्षेत्र में भी आपने हमारा और हमारे नगर का गौरव बढ़ाया है I राष्ट्रीय संस्था इंस्टीट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स (इंडिया) के लिए आपके द्वारा संपादित राष्ट्रीय पत्रिका “अभियंता बंधु “ ने पूरे राष्ट्र में ख्याति प्राप्त की I आपके लिखे हिन्दी लेख को पूरे भारत वर्ष में सर्वोत्कृष्ट रचना के रूप में इंस्टीट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स (इंडिया) द्वारा आपको राष्ट्रीय पुरूस्कार से सम्मानित किया गया I वर्तमान में आप आई.जी.एस. जबलपुर चैप्टर संस्था के चेयरमैन के रूप में हम सबका मार्गदर्शन कर रहे है I बचपन से हम मैथिली शरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर, महादेवी वर्मा, माखनलाल चतुर्वेदी, मुंशी प्रेमचंद जैसे साहित्यकारों को पढ़कर बढ़े हुए है I हमें गर्व है, कि हम आचार्य संजीव वर्मा " सलिल " के युग में पैदा हुए और इन्हे देखने और सुनने का मौका मिला I हम आपके यशस्वी और स्वस्थ्य जीवन की प्रभु से प्रार्थना करते है I सादर - इंजी संजय वर्मा, मानसेवी सचिव - आई. जी. एस. जबलपुर चैप्टर - 9425803337

बेटी पचीसा

बेटी पचीसा
(बेटी पर २५ दोहे)
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सपना है; अरमान है, बेटी घर का गर्व।
बिखरा निर्झर सी हँसी, दुख हर लेती सर्व।।
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बेटी है प्रभु की कृपा, प्रकृति का उपहार।
दिल की धड़कन सरीखी, करे वंश-उद्धार।।
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लिए रुदन में छंद वह, मधुर हँसी में गीत।
मृदुल-मृदुल मुस्कान में, लुटा रही संगीत।।
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नन्हें कर-पग हिलाकर, मुट्ठी रखती बंद।
टुकुर-टुकुर जग देखती, दे स्वर्गिक आनंद।।
*
छुई-मुई चंपा-कली, निर्मल श्वेत कपास।
हर उपमा फीकी पड़े, दे न सके आभास।।
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पूजा की घंटी-ध्वनि, जैसे पहले बोल।
छेड़े तार सितार के, कानों में रस घोल।।
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बैठ पिता के काँध पर, ताक रही आकाश।
ऐंठ न; बाँधूगी तुझे, निज बाँहों के पाश।।
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अँगुली थामी चल पड़ी, बेटी ले विश्वास।
गिर-उठ फिर-फिर पग धरे, होगा सफल प्रयास।।
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बेटी-बेटा से बढ़े, जनक-जननि का वंश।
एक वृक्ष के दो कुसुम, दोनों में तरु-अंश।।
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बेटा-बेटी दो नयन, दोनों कर; दो पैर।
माना नहीं समान तो, रहे न जग की खैर।।
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गाइड हो-कर हो सके, बेटी सबसे श्रेष्ठ।
कैडेट हो या कमांडर, करें प्रशंसा ज्येष्ठ।।
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छुम-छुम-छन पायल बजी, स्वेद-बिंदु से सींच।
बेटी कत्थक कर हँसी, भरतनाट्यम् भींच।।
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बेटी मुख-पोथी पढ़े, बिना कहे ले जान।
दादी-बब्बा असीसें, 'है सद्गुण की खान'।।
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दादी नानी माँ बुआ, मौसी चाची सँग।
मामी दीदी सखी हैं, बिटिया के ही रंग।।
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बेटी से घर; घर बने, बेटी बिना मकान।
बेटी बिन बेजान घर, बेटी घर की जान।।
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बेटी से किस्मत खुले, खुल जाती तकदीर।
बेटी पाने के लिए, बनते सभी फकीर।।
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बेटी-बेटे में 'सलिल', कभी न करिए फर्क।
ऊँच-नीच जो कर रहे, वे जाएँगे नर्क।।
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बेटी बिन निर्जीव जग, बेटी पा संजीव।
नेह-नर्मदा में खिले, बेटी बन राजीव।।
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सुषमा; आशा-किरण है, बेटी पुष्पा बाग़।
शांति; कांति है; क्रांति भी, बेटी सर की पाग।।
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ऊषा संध्या निशा ऋतु, धरती दिशा सुगंध।
बेटी पूनम चाँदनी, श्वास-आस संबंध।।
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श्रृद्धा निष्ठा अपेक्षा, कृपा दया की नीति।
परंपरा उन्नति प्रगति, बेटी जीवन-रीति।।
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ईश अर्चना वंदना, भजन प्रार्थना प्रीति।
शक्ति-भक्ति अनुरक्ति है, बेटी अभय अभीति।।
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धरती पर पग जमाकर, छूती है आकाश।
शारद रमा उमा यही, करे अनय का नाश।।
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दीपक बाती स्नेह यह, ज्योति उजास अनंत।
बेटी-बेटा संग मिल, जीतें दिशा-दिगंत।।
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१०.७.२०१८, ७९९९५५९६१८

दोहा सलिला

दोहा सलिला
: विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर :
गुरु पूर्णिमा पर दोहोपहार
*
दर्शन को बेज़ार हूँ, अर्पित करूँ प्रणाम
सिखा रहे गुरु ज्ञात कुछ, कुछ अज्ञात-अनाम
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नहीं रमा का, दिलों पर, है रमेश का राज।
दौड़े तेवरी कार पर, पहने ताली ताज।।
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आ दिनेश संग चंद्र जब, छू लेता आकाश।
धूप चाँदनी हों भ्रमित, किसको बाँधे पाश।।
*
श्री वास्तव में साथ ले, तम हरता आलोक।
पैर जमाकर धरा पर, नभ हाथों पर रोक।।
*
चन्द्र कांता खोजता, कांति सूर्य के साथ।
अग्नि होत्री सितारे, करते दो दो हाथ।।
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देख अरुण शर्मा उषा, हुई शर्म से लाल।
आसमान के गाल पर, जैसे लगा गुलाल।।
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खिल बसन्त में मंजरी, देती है पैगाम।
देख आम में खास तू, भला करेंगे राम।।
*
जो दे सबको प्रेरणा, उसका जीवन धन्य।
गुप्त रहे या हो प्रगट, है अवदान अनन्य।।
*
जो दे सबको प्रेरणा, उसका जीवन धन्य।
गुप्त रहे या हो प्रगट, है अवदान अनन्य।।
*
वही पूर्णिमा निरूपमा, जो दे जग उजियार।
चंदा तारे नभ धरा, उस पर हों बलिहार।।
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प्रभा लाल लख उषा की, अनिल रहा है झूम।
भोर सुहानी क्यों हुई, किसको है मालूम?
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श्वास सुनीता हो सदा, आस रहे शालीन।
प्यास पुनीता हो अगर, त्रास न कर दे दीन।।
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भाव अल्पना डालिए, कर कल्पना नवीन।
शब्दों का ऐपन सरस, बिम्ब-प्रतीक नवीन।।
*
हीरा लाल न जोड़ते, लखे नेह अनिमेष।
रहे विनीता मनीषा, मन मोहे मिथलेश।।
*
जिया न रज़िया बिन लगे,बेकल बहुत दिनेश।
उषा दुपहरी साँझ की, आभा शेष अशेष।।
*
कांता-कांति न घट सके, साक्षी अरुण-उजास।
जय प्रकाश की हो सदा, वर दे इंद्र हुलास ।।
*

मुक्तिका मोहन छंद

हिंदी ग़ज़ल / मुक्तिका
[रौद्राक जातीय, मोहन छंद, ५,६,६,६]
*
''दिलों के / मेल कहाँ / रोज़-रोज़ / होते हैं''
मिलन के / ख़्वाब हसीं / हमीं रोज़ / बोते हैं
*
बदन को / देख-देख / हो गये फि/दा लेकिन
न मन को / देख सके / सोच रोज़ / रोते हैं
*
न पढ़ अधि/क, ले समझ/-सोच कभी /तो थोड़ा
ना समझ / अर्थ राम / कहें रोज़ / तोते हैं
*
अटक जो / कदम गए / बढ़ें तो मि/ले मंज़िल
सफल वो / जो न धैर्य / 'सलिल' रोज़ / खोते हैं
*
'सलिल' न क/रिए रोक / टोक है स/फर बाकी
करम का / बोझ मौन / काँध रोज़ / ढोते हैं
***
९-७-२०१६

समीक्षा काल है संक्रांति का - डाॅ. अंसार क़म्बरी

पुस्तक समीक्षा -
नव आयामी नवगीत संग्रह 'काल है संक्रांति का'
डाॅ. अंसार क़म्बरी
*

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी का गीत-नवगीत संग्रह ‘‘काल है संक्रांति का’’ प्राप्त कर हार्दिक प्रसन्नता हुई। गीत हिन्दी काव्य की प्रभावी एवं सशक्त विधा है । इस विधा में कवि अपनी उत्कृष्ट अनुभूति एवं उन्नत अभिव्यक्ति व्दारा काव्य का ऐसा उदात्त रूप प्रस्तुत करता है जिसके अंतर्गत तत्कालीन, सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक एवं साहित्यिक परिस्थितियों को साकार करते हुये मानव-मनोवृृत्तियों की अनेक प्रतिमायें (बिम्ब)चित्रित करता है। आत्मनिरीक्षण और शुक्ताचरण की प्रेरणा देते हुये कविवर आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है तथा नवगीत को नए आयाम दिए हैं।
इधर समकालीन कवियों ने भी विचार बोझिल गद्य-कविता की शुष्कता से मुक्ति के लिये गीत एवं नवगीत मात्रिक छंद को अपनाना श्रेष्ठकर समझा है, जैसा कि सलिल जी ने प्रस्तुत संग्रह में बड़ी सफलता से प्रस्तुत किया हैं। प्रस्तुत संग्रह में उनकी भाषा भाव-सम्प्रेषण में कहीं अटकती नहीं है। उन्होंने आम बोलचाल के शब्दों को धड़ल्ले से प्रयोग करते हुये आंचलिक भाषा का भी समावेश किया है जो उनके गीतों का प्राण है। उनके गीत नवीन विषयों को स्वयम् में समाहित करने के उपरान्त अपनी अनुशासनबध्दता यथा- आत्माभिव्यंजकता, भाव-प्रवणता, लयात्मकता, गेयता, मधुरता एवं सम्प्रेषणीयता आदि प्रमुख तत्वों से सम्पूरित हैं अर्थात उन्होंने हिन्दी-गीत की निरंतर प्रगतिशील बहुभावीय परम्परा एवं नवीनतम विचारों के साथ गतिमान होने के बावजूद गीति-काव्य की सर्वांगीणता को पूर्णरुपेण समन्वित किया है।
'काल है संक्रान्ति का' में नवगीतकार ने प्रत्येक गीत को एक शीर्षक दिया है जो कथ्य तक पहुँचने में सहायक होता है। आचार्य जी, चित्रगुप्त प्रभु एवं वीणापाणि के चरणों में बैठकर रचनाधर्मिता, जीवंतता तथा युगापेक्षी सारस्वत साधनारत समर्थ प्रतीक रस सिध्द कवि हैं। वंदन करते हुये वो अपनी लेखनी से विनती करते हैं:
शरणागत हम
चित्रगुप्त प्रभु !
हाथ पसारे आये।
अनहद, अक्षय, अजर, अमर हे !
अमित, अभय, अविजित, अविनाशी
निराकार-साकार तुम्हीं हो
निर्गुण-सगुण देव आकाशी।
पथ-पग, लक्ष्य, विजय-यश तुम हो
तुम मत-मतदाता प्रत्याशी।
तिमिर मिटाने
अरुणागत हम
व्दार तिहारे आये।
$ः$ः$ः
माॅै वीणापाणि को - स्तवन
सरस्वती शारद ब्रम्हाणी।
जय-जय वीणापाणी।।
अमल-धवन शुचि, विमल सनातन मैया।
बुध्दि-ज्ञान-विज्ञान प्रदायिनी छैंया।
तिमिरहारिणी, भयनिवारिणी सुखदा,
नाद-ताल, गति-यति खेलें तब कैंया।
अनहद सुनवा दो कल्याणी।
जय-जय वीणापाणी।।
उनके नवीन गीत-सृजन समसामयिक चेतना की अनुभूति एवं अभिव्यक्ति से संपन्न हैं किंतु वे प्रारम्भ में पुरखों को स्मरण करते हुए कहते है। यथा:
सुमिर लें पुरखों को हम
आओ ! करें प्रणाम।
काया-माया-छायाधारी
जिन्हें जपें विधि-हरि-त्रिपुरारी
सुर, नर, वानर, नाग, द्रविण, मय
राजा-प्रजा, पुरुष-शिशु-नारी
मूर्त-अमूर्त, अजन्मा-जन्मा
मति दो करें सुनाम।
आओ! करें प्रणाम।
पुस्तक शीर्षक को सार्थकता प्रदान करते हुये ‘संक्रांति काल है’ रचना में जनमानस को कवि झकझोरते हुये जगा रहा है। यथा:
संक्रांति काल है
जगो, उठो
प्रतिनिधि होकर जन से दूर
आॅैखें रहते भी हो सूर
संसद हो चैपालों पर
राजनीति तज दे तंदूर।
अब भ्रांति टाल दो
जगो, उठो।
उक्त भावों को शब्द देते हुये कवि ने सूरज के माध्यम से कई रचनाएँ दी हैं जैसे - उठो सूरज, हे साल नये, जगो सूर्य आता है, उगना नित, आओ भी सूरज, उग रहे या ढल रहे, सूरज बबुआ, छुएँ सूरज आदि - यथा:
आओ भी सूरज।
छट गये हैं फूट के बादल
पतंगें एकता की मिल उड़ाओ।
गाओ भी सूरज।
$ः$ः$ः$ः$ः
उग रहे या ढल रहे तुम
क्रान्त प्रतिपल रहे तुम ।
उगना नित
हँस सूरज।
धरती पर रखना पग
जलना नित, बुझना मत।
उनके गीत जीवन में आये उतार-चढ़ाव, भटकाव-ठहराव, देश और समाज के बदलते रंगों के विस्तृत व विश्वसनीय भावों को उकेरते हुये परिलक्षित होते हैं। इस बात की पुष्टि के लिये पुस्तक में संग्रहीत उनके गीतों के कुछ मुखड़े दे रहा हूँ। यथा:
तुम बंदूक चलाओ तो
हम मिलकर
क़लम चलायेंगे।
$ः$ः$ः$ः
अधर पर धर अधर छिप
नवगीत का मुखड़ा कहा।
$ः$ः$ः$ः
कल के गैर
आज हैं अपने।
$ः$ः$ः$ः
कल का अपना
आज गैर है।
$ः$ः$ः$
काम तमाम, तमाम का
करतीं निश-दिन आप।
मम्मी, मैया, माॅै, महतारी
करुॅै आपका जाप।
अंत में इतना ही कह सकता हूॅै कि आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ आदर्शवादी संचेतना के कवि हैं लेकिन यथार्थ की अभिव्यक्ति करने में भी संकोच नहीं करते। अपने गीतों में उन्होंने भारतीय परिवेश की पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक आदि विसंगतियों को सटीक रूप में चित्रित किया है। निस्संदेह, उनका काव्य-कौशल सराहनीय एवं प्रशंसनीय है। उनके गीतों में उनका समग्र व्यक्तित्व स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। निश्चित ही उनका प्रस्तुत गीत-नवगीत संग्रह ‘काल है संक्रांति का’ साहित्य संसार में सराहा जायेगा। मैं उन्हें कोटिशः बधाई एवं शुभकामनाएँ देता हूॅै और ईश्वर से प्रार्थना करता हूॅै कि वे निरंतर स्वस्थ व सानंद रहते हुए चिरायु हों और माँ सरस्वती की ऐसे ही समर्पित भाव से सेवा करते रहें।
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संपर्क - ज़फ़र मंज़िल’, 11/116, ग्वालटोली, कानपुर-208001, चलभाष 9450938629

समीक्षा काल है संक्रांति का - डॉ. रोहिताश्व अस्थाना

पुस्तक समीक्षा
आधुनिक समय का प्रमाणिक दस्तावेज 'काल है संक्रांति का'
समीक्षक- डॉ. रोहिताश्व अस्थाना, हरदोई
*

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 2 लोगगीत संवेदनशील हृदय की कोमलतम, मार्मिक एवं सूक्ष्मतम अभिव्यक्तियों की गेयात्मक, रागात्मक एवं संप्रेषणीय अभिव्यक्ति का नाम है। गीत में प्रायः व्यष्टिवदी एवं नवगीत में समष्टिवादी स्वर प्रमुख होता है। गीत के ही शिल्प में नवगीत के अंतर्गत नई उपमाओं, एवं टटके बिंबों के सहारे दुनिया जहान की बातों को अप्रतिम प्रतीकों के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता है। छन्दानुशासन में बँधे रहने के कारण गीत शाश्वत एवं सनातन विधा के रूप में प्रचलित रहा है किंतु प्रयोगवादी काव्यधारा के अति नीरस स्वरूप के विद्रोह स्वरूप नवगीत, ग़ज़ल, दोहा जैसी काव्य विधाओं का प्रचलन आरम्भ हुआ।
अभी हाल में भाई हरिशंकर सक्सेना कृत 'प्रखर संवाद', सत्येंद्र तिवारी कृत 'मनचाहा आकाश' तथा यश मालवीय कृत 'समय लकड़हारा' नवगीत के श्रेष्ठ संकलनों के रूप में प्रकाशित एवं चर्चित हुए हैं। इसी क्रम में समीक्ष्य कृति 'काल है संक्रांति का' भाई आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' के गीतों और नवगीतों की उल्लेखनीय प्रस्तुति है। सलिल जी समय की नब्ज़ टटोलने की क्षमता रखते हैं। वस्तुत: यह संक्रांति का ही काल है। आज सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों में टूटने एवं बिखरने तथा उनके स्थान पर नवीन मूल्यों की प्रतिस्थापना का क्रम जारी है। कवि ने कृति के शीर्षक में इन परिस्थितियों का सटीक रेखांकन करते हुए कहा है- "काल है संक्रांति / तुम मत थको सूरज / प्राच्य पर पाश्चात्य का / चढ़ गया है रंग / शराफत को शरारत / नित का कर रही है तंग / मनुज-करनी देखकर खुद नियति भी है दंग' इसी क्रम में सूरज को सम्बोधित कई अन्य गीत-नवगीत उल्लेखनीय हैं।
कवि सत्य की महिमा के प्रति आस्था जाग्रत करते हुए कहता है-
''तक़दीर से मत हों गिले
तदबीर से जय हों किले
मरुभूमि से जल भी मिले
तन ही नहीं, मन भी खिले
करना सदा- वह जो सही।''

इतना ही नहीं कवि ने सामाजिक एवं आर्थिक विसंगति में जी रहे आम आदमी का जीवंत चित्र खींचते हुए कहा है-
"मिली दिहाड़ी
चल बाजार।
चवल-दाल किलो भर ले ले,
दस रुपये की भाजी।
घासलेट का तेल लिटर भर
धनिया मिर्ची ताज़ी।"

सचमुच रोज कुआं खोदकर पानी पीनेवालों की दशा अति दयनीय है। इसी विषय पर 'राम बचाये' शीर्षक नवगीत की निम्न पंक्तियाँ भी दृष्टव्य है -
"राम-रहीम बीनते कूड़ा
रजिया-रधिया झाड़ू थामे
सड़क किनारे बैठे लोटे
बतलाते कितने विपन्न हम ?"

हमारी नयी पीढ़ी पाश्चात्य सभ्यता के दुष्प्रभाव में अपने लोक जीवन को भी भूलती जा रही है। कम शब्दों में संकेतों के माध्यम से गहरे बातें कहने में कुशल कवि हर युवा के हाथ में हर समय दिखेत चलभाष (मोबाइल) को अपसंस्कृति का प्रतीक बनाकर एक और तो जमीन से दूर होने पर चिंतित होते हैं, दूसरी और भटक जाने की आशंका से व्यथित भी हैं-
" हाथों में मोबाइल थामे
गीध-दृष्टि पगडण्डी भूली,
भटक न जाए।
राज मार्ग पर जाम लगा है
कूचे-गली हुए हैं सूने।
ओवन-पिज्जा का युग निर्दय
भटा कौन चूल्हे में भूने ?"

सलिल जी ने अपने कुछ नवगीतों में राजनैतिक प्रदूषण के शब्द-चित्र कमाल के खींचे हैं। वे विविध बिम्बों और प्रतीकों के माध्यम से बहुत कुछ ऐसा कह जाते हैं जो आम-ख़ास हर पाठक के मर्म को स्पर्श करता है और सोचने के लिए विवश भी करता है-
"लोकतंत्र का पंछी बेबस
नेता पहले दाना डालें
फिर लेते पर नोच।
अफसर रिश्वत-गोली मारें
करें न किंचित सोच।"

अथवा
"बातें बड़ी-बड़ी करते हैं,
मनमानी का पथ वरते हैं।
बना-तोड़ते संविधान खुद
दोष दूसरों पर धरते हैं।"

इसी प्रकार कवि के कुछ नवगीतों में छोटी-छोटी पंक्तियाँ उद्धरणीय बन पड़ी हैं। जरा देखिये- "वह जो खासों में खास है / रूपया जिसके पास है। ", "तुम बंदूक चलो तो / हम मिलकर कलम चलायेंगे। ", लेटा हूँ मखमल गादी पर / लेकिन नींद नहीं आती है। ", वेश संत का / मन शैतान। ", "अंध श्रृद्धा शाप है / बुद्धि तजना पाप है। ", "खुशियों की मछली को। / चिंता बगुला / खा जाता है। ", कब होंगे आज़ाद? / कहो हम / कब होंगे आज़ाद?" आदि।
अच्छे दिन आने की आशा में बैठे दीन-हीन जनों को सांत्वना देते हुए कवि कहता है- "उम्मीदों की फसल / उगाना बाकी है
अच्छे दिन नारों-वादों से कब आते हैं ?
कहें बुरे दिन मुनादियों से कब जाते हैं??"

इसी प्रकार एक अन्य नवगीत में कवि द्वारा प्रयुक्त टटके प्रतीकों एवं बिम्बों का उल्लेख आवश्यक है-
"खों-खों करते / बादल बब्बा
तापें सूरज सिगड़ी।
पछुआ अम्मा / बड़बड़ करतीं
डाँट लगातीं तगड़ी।"

निष्कर्षत: कृति के सभी गीत-नवगीत एक से बरहकर एक सुन्दर, सरस, भाव-प्रवण एवं नवीनता से परिपूर्ण हैं। इन सभी रचनाओं के कथ्य का कैनवास अत्यन्त ही विस्तृत और व्यापक है। यह सभी रचनाएँ छन्दों के अनुशासन में आबद्ध और शिल्प के निकष पर सौ टंच खरी उतरने वाली हैं।
कविता के नाम पर अतुकांत और व्याकरणविहीन गद्य सामग्री परोसनेवाली प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं को प्रस्तुत कृति आइना दिखने में समर्थ है। कुल मिलाकर प्रस्तुत कृति पठनीय ही नहीं अपितु चिन्तनीय और संग्रहणीय भी है। इस क्षेत्र में कवि से ऐसी ही सार्थक, युगबोधक परक और मन को छूनेवाली कृतियों की आशा की सकती है।
***
[पुस्तक परिचय - काल है संक्रांति का, गीत-नवगीत संग्रह, कवि आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', प्रकाशक- समन्वय प्रकाशन अभियान, २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१ म. प्र., प्रकाशन वर्ष २०१६,मूल्य सजिल्द ३००/-, पेपरबैंक २००/-, चलभाष ९४२५१८३२४४]
समीक्षक- डॉ. रोहिताश्व अस्थाना, निकट बावन चुंगी चौराहा, हरदोई २४१००१ उ. प्र. दूरभाष ०५८५२ २३२३९२।
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गुरुवार, 9 जुलाई 2020

विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर दोहा शतक मंजूषा ४

विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर
दोहा शतक मंजूषा ४
दोहा है आशा-किरण
*
दोहा है आशा-किरण में ११ दोहाकारों के १००-१०० दोहे, चित्र, परिचय, दोहों पर समीक्षा, सम्मिलित हैं। हर सहभागी को ११ प्रतियाँ डाक व्यय निशुल्क सुविधा सहित प्राप्त होंगी। सहभागिता निधि ३०००/- मात्र दोहे स्वीकृत होने के पश्चात बताये बैंक लेखा में जमा करनी होगी। पूर्व प्रकाशित ३ भाग तथा संस्थान के निम्न प्रकाशन मूल्य ८००/-, ५०% छूट सहित उपलब्ध हैं।
शांति-राज स्व-पुस्तकालय योजना
निम्न में से ५००/- से अधिक की पुस्तकें मँगाने पर मूल्य में ४०% छूट, पैकिंग व डाक व्यय निशुल्क की सुविधा उपलब्ध है। राशि बैंक ऑफ़ इण्डिया, राइट टाउन शाखा जबलपुर IFSC- BKDN ०८११११९, लेखा क्रमांक १११९१०००२२४७ में जमा करें।
पुस्तक सूची
०१. मीत मेरे कविताएँ -आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' १५०/-
०२. काल है संक्रांति का गीत-नवगीत संग्रह -आचार्य संजीव 'सलिल' १५०/-
०३. कुरुक्षेत्र गाथा खंड काव्य -स्व. डी.पी.खरे -आचार्य संजीव 'सलिल' ३००/-
०४. पहला कदम काव्य संग्रह -डॉ. अनूप निगम १००/-
०५. कदाचित काव्य संग्रह -स्व. सुभाष पांडे १२०/-
०६. Off And On -English Gazals -Dr. Anil Jain ८०/-
०७. यदा-कदा -उक्त का हिंदी काव्यानुवाद- डॉ. बाबू जोसफ-स्टीव विंसेंट
०८. Contemporary Hindi Poetry - B.P. Mishra 'Niyaz' ३००/-
०९. महामात्य महाकाव्य -दयाराम गुप्त 'पथिक' ३५०/-
१०. कालजयी महाकाव्य -दयाराम गुप्त 'पथिक' २२५/-
११. सूतपुत्र महाकाव्य -दयाराम गुप्त 'पथिक' १२५/-
१२. अंतर संवाद कहानियाँ -रजनी सक्सेना २००/-
१३. दोहा-दोहा नर्मदा दोहा संकलन -सं. सलिल-डॉ. साधना वर्मा २५०/-
१४. दोहा सलिला निर्मला दोहा संकलन -सं. सलिल-डॉ. साधना वर्मा २५०/-
१५. दोहा दिव्य दिनेश दोहा संकलन -सं. सलिल-डॉ. साधना वर्मा ३००/-
१६. सड़क पर गीत-नवगीत संग्रह आचार्य संजीव 'सलिल' ३००/-
१७. The Second Thought - English Poetry - Dr .Anil Jain​ १५०/-
१८. मौसम अंगार है नवगीत संग्रह -अविनाश ब्योहार १६०/-
१९. सार्थक लघुकथाएँ -सं. संजीव सलिल-कांता रॉय प्रकाशनाधीन
२०. आदमी जिन्दा है लघुकथा संग्रह -आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' २००/- यंत्रस्थ
२१. दिव्य गृह - खंड काव्य -आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' १५०/- यंत्रस्थ
(रोमानियन काव्य लुसिआ फेरुल का दोहा भावानुवाद)
२२. हस्तिनापुर की बिथा-कथा (बुंदेली महाकाव्य ) डॉ. मुरारीलाल खरे ३००/-
२३ दोहा है आशा-किरण दोहा संकलन -सं. सलिल-डॉ. साधना वर्मा प्रकाशनाधीन
२४. प्रतिनिधि लघुकथाएँ -सं. -संजीव सलिल, छाया सक्सेना प्रकाशनाधीन
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द्वि इंद्रवज्रा सवैया

स्नेहिल सलिला सवैया ​​ : १.
द्वि इंद्रवज्रा सवैया
सम वर्ण वृत्त छंद इन्द्रवज्रा (प्रत्येक चरण ११-११ वर्ण, लक्षण "स्यादिन्द्र वज्रा यदि तौ जगौ ग:" = हर चरण में तगण तगण जगण गुरु)
SSI SSI ISI SS
तगण तगण जगण गुरु गुरु
विद्येव पुंसो महिमेव राज्ञः, प्रज्ञेव वैद्यस्य दयेव साधोः।
लज्जेव शूरस्य मुजेव यूनो, सम्भूषणं तस्य नृपस्य सैव॥
उदाहरण-
०१. माँगो न माँगो भगवान देंगे, चाहो न चाहो भव तार देंगे। होगा वही जो तकदीर में है, तदबीर के भी अनुसार देंगे।। हारो न भागो नित कोशिशें हो, बाधा मिलें जो कर पार लेंगे।
माँगो सहारा मत भाग्य से रे!, नौका न चाहें मँझधार लेंगे।
०२ नाते निभाना मत भूल जाना, वादा किया है करके निभाना।
या तो न ख़्वाबों तुम रोज आना, या यूँ न जाना करके बहाना। तोड़ा भरोसा जुमला बताया, लोगों न कोसो खुद को गिराया।
छोड़ो तुम्हें भी हम आज भूले, यादों न आँसू हमने गिराया।
_ ८.७.२०१९ संजीव __________

मुक्तिका: सुमेरु छंद

एक मुक्तिका:
महापौराणिक जातीय, सुमेरु छंद
विधान: १९ मात्रिक, यति १०-९, पदांत यगण
*
न जिंदा है; न मुर्दा अधमरी है.
यहाँ जम्हूरियत गिरवी धरी है.
*
चली खोटी; हुई बाज़ार-बाहर
वही मुद्रा हमेशा जो खरी है.
*
किये थे वायदे; जुमला बताते
दलों ने घास सत्ता की चरी है.
*
हरी थी टौरिया; कर नष्ट दी अब
तपी धरती; हुई तबियत हरी है.
*
हवेली गाँव की; हम छोड़ आए.
कुठरिया शहर में, उन्नति करी है.
*
न खाओ सब्जियाँ जो चाहता दिल.
भरा है जहर दिखती भर हरी है.
*
न बीबी अप्सरा से मन भरा है
पड़ोसन पूतना लगती परी है.
*
slil.sanjiv@gmail.com
९.७.२०१८, ७९९९५५९६१८

कार्यशाला: सोहन परोहा 'सलिल'-संजीव वर्मा 'सलिल' *

कार्यशाला: एक रचना दो रचनाकार
सोहन परोहा 'सलिल'-संजीव वर्मा 'सलिल'
*
'सलिल!' तुम्हारे साथ भी, अजब विरोधाभास।
तन है मायाजाल में, मन में है सन्यास।। -सोहन परोहा 'सलिल'
मन में है सन्यास, लेखनी रचे सृष्टि नव।
जहाँ विसर्जन वहीं निरंतर होता उद्भव।।
पा-खो; आया-गया है, हँस-रो रीते हाथ ही।
अजब विरोधाभास है, 'सलिल' हमारे साथ भी।। -संजीव वर्मा 'सलिल'
*
९.७.२०१८

दोहा सलिला

दोहा सलिला:
जान जान की जान है
*
जान जान की जान है, जान जान की आन.
जहाँ जान में जान है, वहीं राम-रहमान.
*
पड़ी जान तब जान में, गई जान जब जान.
यह उसके मन में बसी, वह इसका अरमान.
*
निकल गई तब जान ही, रूठ गई जब जान.
सुना-अनसुना कर हुई, जीते जी बेजान.
*
देता रहा अजान यह, फिर भी रहा अजान.
जिसे टेरता; रह रहा, मन को बना मकान.
*
है नीचा किरदार पर, ऊँचा बना मचान.
चढ़ा; खोजने यह उसे, मिला न नाम-निशान.
*
गया जान से जान पर, जान देखती माल.
कुरबां जां पर जां; न हो, जब तक यह कंगाल.
*
नहीं जानकी जान की, तनिक करे परवाह.
आन रहे रघुवीर की, रही जानकी चाह.
*
जान वर रही; जान वर, किन्तु न पाई जान.
नहीं जानवर से हुआ, मनु अब तक इंसान.
*
कंकर में शंकर बसे, कण-कण में भगवान.
जो कहता; कर नष्ट वह, बनता भक्त सुजान.
*
जान लुटाकर जान पर, जिन्दा कैसे जान?
खोज न पाया आज तक, इसका हल विज्ञान.
*
जान न लेकर जान ले, जो है वही सुजान.
जान न देकर जान दे, जो वह ही रस-खान.
*
जान उड़ेले तब लिखे, रचना रचना कथ्य.
जान निकाले ले रही, रच ना; यह है तथ्य.
*
कथ्य काव्य की जान है, तन है छंद न भूल.
अलंकार लालित्य है, लय-रस बिन सब धूल.
*
९.७.२०१८, ७९९९५५९६१८

दोहा सलिला

दोहा सलिला 
*
प्रभा लाल लख उषा की, अनिल रहा है झूम
भोर सुहानी हो गई, क्यों बतलाये कौन?
*
श्वास सुनीता हो सदा, आस रहे शालीन
प्यास पुनीता हो अगर, त्रास न कर दे दीन
*
वही पूर्णिमा निरूपमा, जो दे जग उजियार
चंदा तारे नभ धरा, उस पर हों बलिहार
*
जो दे सबको प्रेरणा, उसका जीवन धन्य.
गुप्त रहे या हो प्रगट, है अवदान अनन्य.
*
खिल बसन्त में मंजरी, देती है पैगाम.
देख आम में खास तू, भला करेंगे राम.
*
देख अरुण शर्मा उषा, हुई शर्म से लाल.
आसमान के गाल पर, जैसे लगा गुलाल.
*
चन्द्र कांता खोजता, कांति सूर्य के साथ.
अग्नि होत्री सितारे, करते दो दो हाथ.
*
श्री वास्तव में साथ ले, तम हरता आलोक.
पैर जमाकर धरा पर, नभ हाथों पर रोक.
*
आ दिनेश सह चंद्र जब, छू लेता आकाश.
धूप चाँदनी हों भ्रमित, किसको बाँधे पाश.
*
नहीं रमा का, दिलों पर, है रमेश का राज.
दौड़े तेवरी कार पर, पहने ताली ताज.
*
९-७-२०१८ 

दोहा सलिला

दोहा सलिला:
*
गुरु न किसी को मानिये, अगर नहीं स्वीकार
आधे मन से गुरु बना, पछताएँ मत यार
*
गुरु पर श्रद्धा-भक्ति बिन, नहीं मिलेगा ज्ञान
निष्ठा रखे अखंड जो, वही शिष्य मतिमान
*
गुरु अभिभावक, प्रिय सखा, गुरु माता-संतान
गुरु शिष्यों का गर्व हर, रखे आत्म-सम्मान
*
गुरु में उसको देख ले, जिसको चाहे शिष्य
गुरु में वह भी बस रहा, जिसको पूजे नित्य
*
गुरु से छल मत कीजिए, बिन गुरु कब उद्धार?
गुरु नौका पतवार भी, गुरु नाविक मझधार
*
गुरु को पल में सौंप दे, शंका भ्रम अभिमान
गुरु से तब ही पा सके, रक्षण स्नेह वितान
*
गुरु गुरुत्व का पुंज हो, गुरु गुरुता पर्याय
गुरु-आशीषें तो खुले, ईश-कृपा-अध्याय
*

तुलसी सदा समीप हो, नागफनी हो दूर
इससे मंगल कष्ट दे, वह सबको भरपूर
***

गीत: कमल-कमलिनी विवाह

अभिनव प्रयोग-
गीत:
कमल-कमलिनी विवाह
संजीव 'सलिल'
*
*
अंबुज शतदल कमल
अब्ज हर्षाया रे!
कुई कमलिनी का कर
गहने आया रे!...
*
अंभज शीतल उत्पल देख रहा सपने
बिसिनी उत्पलिनी अरविन्दिनी सँग हँसने
कुंद कुमुद क्षीरज अंभज नीरज के सँग-
नीलाम्बुज नीलोत्पल नीलोफर के रंग.
कँवल जलज अंबोज नलिन पुहुकर पुष्कर
अर्कबन्धु जलरुह राजिव वारिज सुंदर
मृणालिनी अंबजा अनीकिनी वधु मनहर
यह उसके, वह भी
इसके मन भाया रे!...
*
बाबुल ताल, तलैया मैया हँस-रोयें
शशिप्रभ कुमुद्वती किराविनी को खोयें.
निशापुष्प कौमुदी-करों मेंहदी सोहे.
शारंग पंकज पुण्डरीक मुकुलित मोहें.
बन्ना-बन्नी, गारी गायें विष्णुप्रिया.
पद्म पुंग पुन्नाग शीतलक लिये हिय.
रविप्रिय शीकर कैरव को बेचैन किया
अंभोजिनी अंबुजा
हृदय अकुलाया रे!...
*
चंद्रमुखी-रविमुखी हाथ में हाथ लिये
कर्णपूर सौगन्धिक सहरापद साथ लिये.
इन्दीवर सरसिज सरोज फेरे
लेते.
मौन अलोही अलिप्रिय सात वचन देते.
असिताम्बुज असितोत्पल-शोभा कौन कहे?
सोमभगिनी शशिकांति-कंत सँग मौन रहे.
'सलिल'ज हँसते नयन मगर जलधार बहे
श्रीपद ने हरिकर को
पूर्ण बनाया रे!...
***************
टिप्पणी: कमल, कुमुद, व कमलिनी का प्रयोग कहीं-कहीं भिन्न पुष्प प्रजातियों
के रूप में है, कहीं-कहीं एक ही प्रजाति के पुष्प के पर्याय के रूप में.
कमल के रक्तकमल, नीलकमल तथा श्वेतकमल तीन प्रकार रंग के आधार पर वर्णित हैं. कमल-कमलिनी का विभाजन बड़े-छोटे आकर के आधार पर प्रतीत होता है. कुमुदको कहीं कमल कहीं कमलिनी कहा गया है. कुमद के साथ कुमुदिनी का भी प्रयोग हुआ है. कमल सूर्य के साथ उदित होता है, उसे सूर्यमुखी, सूर्यकान्ति, रविप्रिया आदि कहा गया है. रात में खिलनेवाली कमलिनी को शाशिमुखी, चन्द्रकान्ति कहा गया है. रक्तकमल के लाल रंग की हरि तथा लाक्स्मी के कर-पद पल्लवों से समानता के कारण हरिपद, श्रीकर जैसे पर्याय बने हैं, सूर्य, चन्द्र, विष्णु, लक्ष्मी, जल, नदी, समुद्र, सरोवर आदि के पर्यायों के साथ जोड़ने पर कमल के अनेक और पर्यायी शब्द बनते हैं. मुझेसे अनुरोध था कि कमल के सभी पर्यायों को गूँथकर रचना करूँ. मान शारदा के श्री चरणों में यह कमल माल अर्पित करने का सुअवसर देने के लिये पाठशाला-संचालकों का आभारी हूँ.
सभी पर्यायों को गूंथने पर रचना अत्यधिक लंबी होगी. पाठकों की प्रतिक्रिया
ही बताएगी कि गीतकार निकष पर खरा उतर सका या नहीं.

दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम
९-७-२०१०

मुक्तिका मोहन छंद

हिंदी ग़ज़ल / मुक्तिका
[रौद्राक जातीय, मोहन छंद, ५,६,६,६]
*
''दिलों के / मेल कहाँ / रोज़-रोज़ / होते हैं''
मिलन के / ख़्वाब हसीं / हमीं रोज़ / बोते हैं
*
बदन को / देख-देख / हो गये फि/दा लेकिन
न मन को / देख सके / सोच रोज़ / रोते हैं
*
न पढ़ अधि/क, ले समझ/-सोच कभी /तो थोड़ा
ना समझ / अर्थ राम / कहें रोज़ / तोते हैं
*
अटक जो / कदम गए / बढ़ें तो मि/ले मंज़िल
सफल वो / जो न धैर्य / 'सलिल' रोज़ / खोते हैं
*
'सलिल' न क/रिए रोक / टोक है स/फर बाकी
करम का / बोझ मौन / काँध रोज़ / ढोते हैं
***

९-७-२०१६ 

यौन और ध्यान : ऊर्जा संतुलन

यौन  ऊर्जा को सामान्य व्यक्ति बिल्कुल नहीं समझता। कोई समझाने का प्रयत्न करता है, तो उसको 'यौन गुरु' कह दिया जाता है। व्यापारिक यौन गुरु इसे व्यवसाय बनाकर ठगते हैं। प्रत्यक्ष और सहज रूप में अध्यात्मिक दृष्टिकोण से समझकर इस दुविधा से  मुक्त होना आवश्यक है। धर्म और सामाजिक मान्यताएँ कहती हैं सेक्स से बचो,‌  दूसरी ओर हमारा शरीर और मन को यौन की भूख निरंतर सताती है। इंसान सेक्स करे तो अपराध भाव से पीड़ित है और ना करे तो प्रकृति पागल कर देती है और फिर इस पागलपन से कई अपराध उत्पन्न होते हैं। इंसान की हालत एक  प्रेशर कुकर जैसी है - एक ऐसा प्रेशर कुकर जिसके नीचे आग सुलगाकर ऊपर सीटी लगा दी गई है और उस सीटी को एक अत्यंत वजनदार वस्तु से दबा दिया गया है। प्रकृति की आग है और सांसारिक और धार्मिक मान्यताएँ वजनदार वस्तुएँ ऊर्जा को बहने से रोकती हैं। इस दबाव के कारण जो ऊर्जा प्रकृति अनुसार सेक्स सेंटर से बहनी थी, वह क्रोध, ईर्ष्या, घृणा, हिंसा आदि के रूप में बाहर आती है।
यौन इच्छाओं से ऊपर उठने की बात इसलिए की गई थी कि इंसान स्वत: शांत और उल्लास पूर्ण हो सके परंतु जो हो रहा है वह उसका बिल्कुल उल्टा है। कुछ तो गलती हुई है इस यौन को समझने में। अगर यौन पाप है तो इस पूरी दुनिया का जन्म पाप से ही है और पूरी दुनिया तो परमात्मा का ही रूप है। तो परमात्मा को भी हमने पापी बना दिया। यौन शब्द इंसान के मन पर हावी है। मैं यह नहीं कहता कि इंसान सेक्स की तरफ अग्रसर है। मैं यह कहता हूं कि या तो इंसान बहुत ही कामोत्तेजक है या फिर यौन का अत्यंत दमित है। दोनों  अवस्थाओं में इंसान बहुत ऊर्जा व्यर्थ करता है। बहुत अजीब है कि यौन के दमन अथवा काम उत्तेजना में जितनी ऊर्जा व्यर्थ जाती है, उसके सामने सेक्स कर लेने में बहुत ही नाममात्र ऊर्जा इस्तेमाल होती है। यौन एक ऊर्जा है जो कि आपके मूलाधार पर केंद्रित है। यह आटे की तरह है जिससे आप पूरी, रोटी,‌ परांठे  बहुत कुछ बना सकते हैं, जिसमें आटा मूल तत्व है और उससे उत्पन्न होने वाली वस्तु एक सुंदर रूपांतरण है। इस उत्तर को सही अर्थों में समझने के लिए यौन को पाप की तरह नहीं, एक ऊर्जा की तरह देखना होगा। धार्मिक और सामाजिक मान्यताओं से ऊपर उठकर धर्म सत्य में क्या कहना चाहता है, उसे समझना होगा। जान लीजिए कि अध्यात्म यौन के विरुद्ध नहीं है।  
यौन इच्छाओं पर काबू पाना ही क्यों है? एक ओर तो धर्म प्रचारक यौन न करने की बात करते हैं और दूसरी ओर पूरा विश्व यौन करता चला जाता है। समाज यौन को समझने में असमर्थ रहा है। बचपन से ही आपको यह सिखा दिया गया कि यौन बुरा है, उससे बचना है क्योंकि वह पाप अथवा अशुद्ध है। अत्यंत ही दुख की बात है कि जिस क्रीड़ा से जीवन इस पृथ्वी पर बहता है, उसी को पाप कह दिया गया। ऐसी भूल अज्ञानता वश की जा रही है। यह बात एक बच्चे के कोमल मन में इतनी गहराई से उतार दी जाती है कि वह युवावस्था में पहुँचने के बाद अपराध भाव से ग्रस्त रहता है।सही समझ ना मिलने के कारण यह दुख जीवन भर बना रहता है, बुढ़ापे में भी।मान्यताओं उन पर प्रश्न करनेसे आपको ऊर्जा के विज्ञान को समझने में सहायता मिलेगी।
दूसरी बात यह समझनी होगी कि यौन इच्छाओं को काबू करने का सिलसिला कैसे हुआ। हमारे कई महान् ऋषि-मुनियों ने जाना कि ऊर्जा का स्रोत हमारे मूलाधार चक्र पर ही है जिसे कुंडलिनी भी कहते हैं। अगर इसको जगा कर रूपांतरित किया जा सके या इसको ऊपर की ओर निर्देशित किया जा सके तो यही ऊर्जा प्रेम शांति और आनंद हो जाती है। तो बात इतनी सरल है। किसी भी महर्षि ने यौन शक्ति के दमन की बात नहीं की। केवल और केवल ऊर्जा रूपांतरण और ऊर्जा प्रवाह को निर्देशित करने की बात की है। धर्म के शिक्षक इस स्तर पर नहीं है कि इस ऊर्जा को पूर्णतया जान सके, इसके बारे में बहुत भ्रांतियाँ फैला दी गई। वह ऊर्जा जो जीवन का स्रोत है, वह तो जीवन का एक उपहार है। यह जान लेने के बाद कि सेक्स तो केवल एक ऊर्जा है, न्यूट्रल है, उसको रूपांतरण करने करने की जिम्मेदारी हम पर है। बहुत लोग हैं जो कह देते हैं कि ध्यान कहीं और लगाओ, स्वयं को कार्य में व्यस्त रखो अथवा कुछ। यह उपाय कुछ ही दिनों में खंड-खंड हो जाते हैं क्योंकि उद्देश्य सेक्स के दमन का है।
सबसे जरूरी और तीसरी बात - अगर सेक्स के प्रति अपराध भाव है, तो सेक्स इच्छाओं से मुक्ति नहीं पाई जा सकती, केवल दमन हो सकता है जो अक्सर विनाशकारी होता है। अगर इच्छाओं पर काबू पाना चाहते हो, तो पहले सेक्स के प्रति अपराध भाव को त्यागना होगा। उसको एक ऊर्जा की भांति देखना होगा, समझना होगा। केवल और केवल ऊर्जा के विज्ञान को समझ कर इस ऊर्जा का श्रेष्ठ इस्तेमाल किया जा सकता है। सेक्स की इच्छा की उत्पत्ति इतनी तीव्र है ही इसलिए क्योंकि हमने सेक्स का बहुत दमन कर दिया। इसको इस तरह समझिए- जब भूख लगती है तो क्या आप यह कहते हुए फिरते हैं कि कुछ खाने की इच्छा है, मैं इसे किस तरह काबू करूं? लेकिन सेक्स के लिए आप यह कहते फिरते हैं जबकि शारीरिक स्तर पर यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। गौर कीजिए, ऐसा क्यों है और सेक्स के साथ ही क्यों, भोजन के साथ क्यों नहीं? कहीं ऐसा तो नहीं जिन्हें खुद ही ज्ञान नहीं, उन्होंने आपको बहुत कुछ सिखा दिया? 
शक्ति तो जीवनदायिनी है - केवल भीतर शक्ति का रूपांतरण कर शिव तक पहुंचा जा सकता है, शक्ति का निरादर कर नहीं। अब शक्ति के रूपांतरण की बात करते हैं। जैसा मैंने पहले कहा, रूपांतरण पूर्णत: तभी संभव है जब सेक्स के प्रति अपराध भाव से व्यक्ति मुक्त है। शुरुआत की जा सकती है अपराध भाव होते हुए भी लेकिन अंत तभी हो पाएगा या यूं कह लीजिए की रूपांतरण तभी पूर्ण हो पाएगा जब सेक्स के प्रति अपराध भाव पूरा समाप्त हो जाए। इस उत्तर में मैं जो भी विद्या लिख रहा हूं वह एक आम व्यक्ति के लिए है। हो सकता है कि कोई साधक किसी ऐसे सत्यगुरु के पास हो जो सेक्स ना करने को कहता हूं और वह उसके लिए अपने शिष्य को कुछ विधियाँ बताए। लेकिन ऐसी विद्या केवल बहुत ही कम लोगों के लिए होती है और यह संसार से दूर रहकर अर्जित की जाती है। संसारी को अगर संसार में रहते हुए ही योग करना है, तो उसमें उचित है कि सरल मार्ग से चला जाए।
तो इस विद्या का पहला मुख्य उपाय है यह समझना कि सेक्स शरीर से संबंधित है। उसे मन पर हावी नहीं होने देना। सेक्स मन पर तब हावी होता है या तीव्र इच्छाओं के रूप में तब प्रकट होता है जब शरीर को सेक्स ना मिले अथवा मिले परंतु साथ ही अपराध भाव भी मिले, जिससे संतुष्टि हो नहीं पाती। तो पहली बात, अगर सेक्स कर ही रहे हो,‌ तो पूर्णतया करो। उसमें अपराध भाव मत लाओ। जितनी ऊर्जा सेक्स पर लगाओगे उससे कई गुना अधिक ऊर्जा सेक्स की इच्छाओं में व्यर्थ करोगे, अगर शरीर के स्तर पर तृप्ति नहीं है तो।
एक संसारी के लिए यह वह आधार है जिस पर खड़े हो ऊर्जा का रूपांतरण सही अर्थों में शुरू किया जा सकता है। बात को समझिए - सेक्स के दमन से आप मन के स्तर पर सेक्स ऊर्जा से इतनी दूर हो गए हैं की ऊर्जा पर काम ही नहीं हो पाता। जब आप खाना बनाते हैं तो क्या दूर से रहकर ही खाना बन जाएगा? नहीं, सब्जियाँ काटनी होंगी, पकानी होंगी। खाना बनाने के लिए मूल वस्तुओं पर काम करना ही पड़ेगा और वह दूर रहकर हो नहीं सकता। इसी प्रकार सेक्स ऊर्जा के रूपांतरण के लिए सेक्स उर्जा को समझ कर उस पर काम करना होगा। जिसे रूपांतरण करना चाहते हो, उसे प्रेम से अपनाना होगा। अगर यह मूल समझ में आ गया तो अब रूपांतरण की बात की जा सकती है। रूपांतरण के लिए बहुत सी क्रियाएँ और साधन उपलब्ध है। मैं एक सरल मार्ग की बात करूँगा जो कि एक आम व्यक्ति जीवन में अपना सकता है।
इस मार्ग के दो स्तंभ समझिए- हृदय विकास और ध्यान। हमें सेक्स के दमन या उसकी ओर काम करने की जरूरत कम और ध्यान और हृदय विकास की तरफ काम करने की जरूरत ज्यादा है। कहने की कोशिश यह है की उल्टी उंगली से कान पकड़ा जाएगा। अत्याधिक दमन के कारण सेक्स ऊर्जा के ऊपर सीधा सीधा काम करना एक आम व्यक्ति के लिए बहुत मुश्किल है। इसलिए सेक्स जैसा चलता है ठीक है, पर्याप्त है - वह इस प्रक्रिया का केंद्र है ही नहीं। हमारा केंद्र है ह्रदय विकास और ध्यान। इस प्रकार सेक्स की इच्छाएँ धीरे-धीरे स्वयं से ही गिरनी शुरू हो जाती हैं। क्योंकि वही उर्जा जो सेक्स में जानी थी अब ह्रदय और ध्यान पर जाने लगे हैं। जितना हृदय का विकास होगा उतनी ही ऊर्जा मूलाधार से ह्रदय की ओर प्रस्थान करने लगेगी।  हृदय और ध्यान की प्रक्रिया के लिए यह उपाय हैं:
१) जो भी काम रचनात्मक या सेवाभाव युक्त होता है वह हृदय से संबंधित होता है। तो एक बच्चे की तरह अगर किसी को गाना, बजाना, खेलना, नृत्य, संगीत,‌चित्रकारी, काव्य रचना, सेवा भाव जैसे खाना पकाना, अन्न बाँटना या इस तरह के कार्य अच्छे लगे उसमें पूर्ण रुचि से शामिल हों। पशु पक्षियों और प्रकृति के साथ रहने में भी हृदय का विकास होता है और ध्यान में भी सहायता मिलती है। जितना रचनात्मक कार्य बढ़ेगा, उतनी ही उर्जा स्वयं से ही हृदय की तरफ आकर्षित होती चली जाएगी इसमें कुछ वक्त लग सकता है परंतु होगा यही।
२) जीवन में ध्यान को स्थान दीजिए ।बहुत ही सुंदर ध्यान विधियाँ आजकल यूट्यूब और कई जगह पर उपलब्ध है। इसमें भी वह विधि जो हृदय का विकास करे ज्यादा लाभकारी सिद्ध हो सकती है -जैसे हार्टफुलनेस। सुंदर होगा अगर आप किसी ऐसे संगठन या सत्संगति में जाते हैं जहाँ ध्यान पर जोर हो सेक्स के दमन पर नहीं। सेक्स तो मन से निकाल ही दीजिए जैसा चल रहा है ठीक है- हम इस प्रक्रिया में सेक्स के दमन या सेक्स को खत्म करने पर जोर दे ही नहीं रहे। पूरे का पूरा काम ऊर्जा को ह्रदय और ध्यान की ओर प्रेरित करने के लिए है। फल स्वरूप, जो सेक्स के साथ होना है वह स्वयं से होता रहेगा।
३) यह आवश्यक है की एक गुरु जीवन में हो जो आपको ऊर्जा के रहस्य से अवगत करा सके। एक सही समझ दे सके जो कि आपके जीवन के अनुसार हो। जिस समझ का अनुसरण कर आप अपने जीवन को खूबसूरत बना सकें।
बस इतना सा ही है - अगर यह उपाय उत्तम जीवन में पूर्ण रूप से उतार लिए गए तो सेक्स पर काम स्वयं से ही हो जाएगा। ना ही अपराध भाव की जरूरत है, ना ही प्रताड़ित होने की। यह एक आम व्यक्ति के लिए अति सुंदर व सरल मार्ग है। जिस तरह जीवन में कक्षा को पास करने के लिए समय लगता है उसी तरह इसमें भी कुछ समय लगेगा।