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गुरुवार, 12 मार्च 2026

मार्च १२, राम किंकर, सॉनेट, सोरठा, नीरा आर्य, लीलावती, शिव, भव छंद, सवैया, ग़ज़लिका, नवगीत, सरहद

 सलिल सृजन मार्च १२

*
ग़ज़लिका ० बहुत बोला, तनिक सुन भी आँख मूँदे, ख्वाब बुन भी . पढ़ रहा तो समझ भी ले समझकर सच जरा गुन भी . गला है तो गा सकेगा सीख पगले! सही धुन भी . समय की चक्की निठुर है साथ गेहूँ पिसे घुन भी . है महज़ बाज़ार दुनिया क्या जरूरी 'सलिल' चुन भी १२.३.२०२६ ०००
०००
स्मरण युग तुलसी
मुक्तक
युगतुलसी के ग्रंथ पढ़ें नित।
रामभक्ति के सूत्र गुनें नित॥
भवसागर से मुक्ति मिलेगी-
रखें भरोसा स्वप्न बुनें नित॥
*
रामभक्ति मंदाकिनी पावन।
रूप राम जी का मनभावन॥
युगतुलसी का हाथ पकड़ बढ़-
राम नाम जप पाप नसावन॥
*
हनुमत कृपा मिलेगी उसको।
सिया-राम रुचते हैं जिसको॥
अगर न किंकर-धर्म सुहाता-
जन्म-जन्म भव सागर भटको॥
*
किंकर का किंकर बन जा मन।
सिया-राम जी के गुन गा मन॥
हनुमत चरण न छोड़ रख हृदय-
भक्ति-भाव रस में सन जा मन॥
*
रामायणम् सुपावन आश्रम।
राम-नाम गुंजित हो हर दम॥
मूर्ति मनोहर किंकर जी की-
कार दर्शन मिट जाते दुख-गम॥
***
सॉनेट
नटखट
*
नटखट चंचल पवन छेड़ता,
आँचल उड़ा-उड़ा मुस्काता,
भँवरा गुन-गुन गीत सुनाता,
ज़ुल्फ़ों से हँस खेल खेलता।
तिरस्कार रह मौन झेलता,
कली-कली पर जान लुटाता,
रंग देख जग दूर भगाता,
मन बेदाग न कोई देखता।
नटखट भ्रमर न धर्म छोड़ता,
सुंदरता की करता पूजा,
जिसको जो कहना हो कह ले।
नटखट पवन न हृदय तोड़ता,
मंदिर मन समान नहिं दूजा,
प्रेम भाव से इसमें रह ले।
१२.३.२०२४
***
सोरठा सलिला
*
मन के अंदर झाँक, सुन्दरतम है ह्रदय में।
नहीं रूप को ताक, मिट्टी मिट्टी में मिले।।
*
गेह गेह का नाथ, है केवल विश्वास तक।
देह देह के साथ, रहती केवल श्वास तक।।
*
करने रास का पान, भँवरा झूमे कली पर।
कली न छोड़े आन, नहीं शाख को छोड़ती।।
*
नहीं गुलामी नाम, अनुशासन को दीजिए।
आजादी का काम, उच्छंखलता करती नहीं।।
*
चरणबद्ध हो कार्य, हो विकास केवल तभी।
मनमानी स्वीकार्य, उन्नति को होती नहीं।।
*
ग्यारह होते रूद्र, त्रयोदिशी तिथि तेरहीं।
पीकर शोक समुद्र, शिव भज अमृत पाइए।।
*
नेह नर्मदा स्नान, सलिल पान कर मौन हो।
करिए तट पर ध्यान, नाद अनहद भी सुनें।।
१२-३-२०२३
***
अमर शहीद नीरा आर्य
एक थीं श्रीमती नीरा आर्य ( ०५-०३-१९०२ / २६-०७-१९९८) - नेताजी सुभाषचंद्र बोस की रक्षा के लिए इस बहादुर महिला का "स्तन" तक काट दिया गया। नीरा आर्य ने श्रीकांत जोइरोंजोन दास से शादी की, जो ब्रिटिश पुलिस में एक सीआईडी ​​इंस्पेक्टर थे।
नीरा आर्य एक सच्ची राष्ट्रवादी थीं, उनके पति एक सच्चे ब्रिटिश नौकर थे। देशभक्त होने के नाते नीरा सुभाषचंद्र बोस के नेतृत्व वाली भारतीय राष्ट्रीय सेना की झांसी रेजिमेंट में शामिल हुईं। नीरा आर्य के पति इंस्पेक्टर श्रीकांत जोइरोंजोन दास सुभाषचंद्र बोस की जासूसी कर रहे थे और जोइरोंजोन दास ने एक बार सुभाषचंद बोस पर गोलियाँ चला दीं लेकिन सौभाग्य से सुभाष चंद जी बाल-बाल बच गए। सुभाष चंद बोस को बचाने के लिए नीरा आर्य ने अपने पति की चाकू मार कर हत्या कर दी थी।
I.N.A के आत्म समर्पण के बाद लाल किले में फ़ौज के सैनिकों पर एक मुकदमा नवंबर-१९४५ से मई-१९४६ तक चला। नीरा आर्य को छोड़कर सभी कैदियों को रिहा कर दिया गया । वहीं उसे सेलूर जेल, अंडमान ले जाया गया, जहाँ उसे हर दिन प्रताड़ित किया जाता था। एक लोहार लोहे की जंजीरें और बेड़ियाँ हटाने आया। उसने जान बूझकर बेड़ियाँ हटाने के बहाने उनकी त्वचा का थोड़ा सा हिस्सा भी काट दिया और उनके पैरों को हथौड़े से कई बार जानबूझ चोट पहुँचाई। नीरा आर्य ने असहनीय दर्द को असाधारण धैर्य रखकर सहा। जेलर, जो इस पर पीड़ा का आनंद ले रहा था, जेलर ने नीरा को रिहा करने की पेशकश इस शर्त के साथ की कि वह सुभाष चंद बोस के ठिकाने का भेद बता दें। नीरा आर्य ने जवाब दिया कि बोस की मृत्यु एक विमान दुर्घटना में हुई थी और पूरी दुनिया इसके बारे में जानती है।
जेलर ने विश्वास करने से इनकार कर दिया और जवाब दिया, तुम झूठ बोल रही हो, सुभाष चंद बोस अभी भी जीवित हैं। तब नीरा आर्य ने कहा "हाँ, वो ज़िंदा हैं, वो मेरे दिल में रहते हैं ! जेलर ने गुस्से में आकर कहा, "फिर हम सुभाष चंद बोस को तुम्हारे दिल से निकाल देंगे" जेलर ने उनको गलत तरीके से छुआ और कपड़ों को फाड़ दिया। कपड़े अलग किए और लोहार को उनके स्तन काटने का आदेश दिया। लोहार ने तुरंत ब्रेस्ट रिपर लिया और उसके दाहिने शरीर को कुचलने लगा। बर्बरता यहीं नहीं रुकी, जेलर ने उनकी गर्दन पकड़ ली और कहा कि मैं आपके दोनों 'हिस्सों" को उनके स्थान से अलग कर दूँगा।
उन्होंने आगे बर्बर मुस्कान के साथ कहा गनीमत है "ये ब्रेस्ट रिपर गर्म नहीं हुआ है वरना आपके ब्रेस्ट पहले ही कट चुके होते"। नीरा आर्य ने अपने जीवन के अंतिम दिन फूल बेचने में बिताए और वह फलकनुमा, भाग्य नगरम में एक छोटी सी झोपड़ी में रहती थीं। सरकार ने उनकी झोपड़ी को सरकारी जमीन पर बनाने का आरोप लगाते हुए गिरा दिया।
नीरा आर्य की मृत्यु २६-०७- १९९८ को एक बेसहारा, लावारिस, अनजानी के रूप में हुई, जिसके लिए पूरी पृथ्वी पर कोई रोने वाला तक नहीं था।
***
लीलावती
गणितज्ञ लीलावती का नाम हममें से अधिकांश लोगों ने नहीं सुना है। उनके बारे में कहा जाता है कि वो पेड़ के पत्ते तक गिन लेती थी। आज यूरोप सहित विश्व के सैंकड़ो देश जिस गणित की पुस्तक से गणित को पढ़ा रहे हैं, उसकी रचयिता भारत की एक महान गणितज्ञ महर्षि भास्कराचार्य की पुत्री “लीलावती” है।
दसवीं सदी की बात है, दक्षिण भारत में भास्कराचार्य नामक गणित और ज्योतिष विद्या के एक बहुत बड़े पंडित थे। उनकी कन्या का नाम लीलावती था। वही उनकी एकमात्र संतान थी। उन्होंने ज्योतिष की गणना से जान लिया कि वह विवाह के थोड़े दिनों के ही बाद विधवा हो जाएगी। उन्होंने बहुत कुछ सोचने के बाद ऐसा लग्न खोज निकाला, जिसमें विवाह होने पर कन्या विधवा न हो। विवाह की तिथि निश्चित हो गई। जलघड़ी से ही समय देखने का काम लिया जाता था।
एक बड़े कटोरे में छोटा-सा छेद कर पानी के घड़े में छोड़ दिया जाता था। सूराख के पानी से जब कटोरा भर जाता और पानी में डूब जाता था, तब एक घड़ी होती थी। कहते हैं अपने मन कुछ और है, कर्ता के कुछ और, होनी होकर ही रहती है। लीलावती सोलह श्रृंगार किए सजकर बैठी थी, सब लोग उस शुभ लग्न की प्रतीक्षा कर रहे थे कि एक मोती लीलावती के आभूषण से टूटकर कटोरे में गिर पड़ा और सूराख बंद हो गया; शुभ लग्न बीत गया और किसी को पता तक न चला।
विवाह दूसरे लग्न पर ही करना पड़ा। लीलावती विधवा हो गई, पिता और पुत्री के धैर्य का बांध टूट गया। लीलावती अपने पिता के घर में ही रहने लगी। पुत्री का वैधव्य-दु:ख दूर करने के लिए भास्कराचार्य ने उसे गणित पढ़ाना आरंभ किया। उसने भी गणित के अध्ययन में ही शेष जीवन की उपयोगिता समझी। थोड़े ही दिनों में वह उक्त विषय में पूर्ण पंडिता हो गई। पाटी-गणित, बीजगणित और ज्योतिष विषय का एक ग्रंथ ‘सिद्धांतशिरोमणि’ भास्कराचार्य ने बनाया है। इसमें गणित का अधिकांश भाग लीलावती की रचना है।
पाटीगणित के अंश का नाम ही भास्कराचार्य ने अपनी कन्या को अमर कर देने के लिए ‘लीलावती’ रखा है। भास्कराचार्य ने अपनी बेटी लीलावती को गणित सिखाने के लिए गणित के ऐसे सूत्र निकाले थे जो काव्य में होते थे। वे सूत्र कंठस्थ करना होते थे। उसके बाद उन सूत्रों का उपयोग करके गणित के प्रश्न हल करवाए जाते थे। कंठस्थ करने के पहले भास्कराचार्य लीलावती को सरल भाषा में, धीरे-धीरे समझा देते थे। वे बच्ची को प्यार से संबोधित करते चलते थे, “हिरन जैसे नयनों वाली प्यारी बिटिया लीलावती, ये जो सूत्र हैं…।” बेटी को पढ़ाने की इसी शैली का उपयोग करके भास्कराचार्य ने गणित का एक महान ग्रंथ लिखा, उस ग्रंथ का नाम ही उन्होंने “लीलावती” रख दिया।
आजकल गणित एक शुष्क विषय माना जाता है पर भास्कराचार्य का ग्रंथ ‘लीलावती‘ गणित को भी आनंद के साथ मनोरंजन, जिज्ञासा आदि का सम्मिश्रण करते हुए कैसे पढ़ाया जा सकता है। लीलावती का एक उदाहरण देखें- ‘निर्मल कमलों के एक समूह के तृतीयांश, पंचमांश तथा षष्ठमांश से क्रमश: शिव, विष्णु और सूर्य की पूजा की, चतुर्थांश से पार्वती की और शेष छ: कमलों से गुरु चरणों की पूजा की गई।
अये, बाले लीलावती, शीघ्र बता कि उस कमल समूह में कुल कितने फूल थे..?‘
उत्तर-कमल के १२० फूल।
वर्ग और घन को समझाते हुए भास्कराचार्य कहते हैं ‘अये बाले,लीलावती, वर्गाकार क्षेत्र और उसका क्षेत्रफल वर्ग कहलाता है। दो समान संख्याओं का गुणन भी वर्ग कहलाता है। इसी प्रकार तीन समान संख्याओं का गुणनफल घन है और बारह कोष्ठों और समान भुजाओं वाला ठोस भी घन है।‘
‘मूल” शब्द संस्कृत में पेड़ या पौधे की जड़ के अर्थ में या व्यापक रूप में किसी वस्तु के कारण, उद्गम अर्थ में प्रयुक्त होता है। इसलिए प्राचीन गणित में वर्ग मूल का अर्थ था ‘वर्ग का कारण या उद्गम अर्थात् वर्ग एक भुजा‘।
इसी प्रकार घनमूल का अर्थ भी समझा जा सकता है। वर्ग तथा घनमूल निकालने की अनेक विधियां प्रचलित थीं।
लीलावती के प्रश्नों का जबाब देने के क्रम में ही “सिद्धान्त शिरोमणि” नामक एक विशाल ग्रन्थ लिखा गया, जिसके चार भाग हैं- (१) लीलावती (२) बीजगणित (३) ग्रह गणिताध्याय और (४) गोलाध्याय।
‘लीलावती’ में बड़े ही सरल और काव्यात्मक तरीके से गणित और खगोल शास्त्र के सूत्रों को समझाया गया है।
बादशाह अकबर के दरबार के विद्वान फैजी ने सन् १५६७ में “लीलावती” का फारसी भाषा में अनुवाद किया। अंग्रेजी में “लीलावती” का पहला अनुवाद जे. वेलर ने सन् १७१६ में किया। कुछ समय पहले तक भी भारत में कई शिक्षक गणित को दोहों में पढ़ाते थे। जैसे कि पन्द्रह का पहाड़ा…तिया पैंतालीस, चौके साठ, छक्के नब्बे… अट्ठ बीसा, नौ पैंतीसा…।
इसी तरह कैलेंडर याद करवाने का तरीका भी पद्यमय सूत्र में था-
सित अप जू नव तीस के, बाकी के इकतीस।
अट्ठाइस की फरवरी चौथे सन उनतीस।।
गणित अपने पिता से सीखने के बाद लीलावती भी एक महान गणितज्ञ एवं खगोल शास्त्री के रूप में जानी गयी। मनुष्य के मरने पर उसकी कीर्ति ही रह जाती है। आज गणितज्ञो को गणित के प्रचार और प्रसार के क्षेत्र में "लीलावती पुरूस्कार" से सम्मानित किया जाता है।
***
शिव पूजन
शिवलिंग पर बेलपत्र, धतूरा, चंदन और अक्षत चढ़ाने से शंकर भगवान जल्दी प्रसन्न होते हैं।शिव पुराण के अनुसार किस द्रव्य से अभिषेक करने से क्या फल मिलता है? जानिए-
जल से रुद्राभिषेक करने पर वृष्टि होती है।
- कुशा जल से अभिषेक करने पर रोग व दु:ख से छुटकारा मिलता है।
- दही से अभिषेक करने पर पशु, भवन तथा वाहन की प्राप्ति होती है।
- गन्ने के रस से अभिषेक करने पर लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।
- मधुयुक्त जल से अभिषेक करने पर धनवृद्धि होती है।
- तीर्थ जल से अभिषेक करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।
- इत्र मिले जल से अभिषेक करने से रोग नष्ट होते हैं।
- दूध से अभिषेक करने से पुत्र प्राप्ति होगी। प्रमेह रोग की शांति तथा मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
- गंगा जल से अभिषेक करने से ज्वर ठीक हो जाता है।
- दूध-शर्करा मिश्रित अभिषेक करने से सद्बुद्धि की प्राप्ति होती है।
- घी से अभिषेक करने से वंश विस्तार होता है।
१२-३-२०२२
***
मुक्तक
सूरज चमक रहा माथे पर, बिखरी धूप कपोलों पर
नव विचार कर रहे सवारी, बहते पवन-झकोरों पर
शांत सलिल में बिंबित रवि-छवि, लहर-लहर सिंदूरी कर
कांति नई पाकर कांता से, हो कविता दृग-कोरों पर
*
क्षणिका
*
जानेमन
अब तक रही
क्यों दुश्मने-जां हो गई?
चैन उसके बिन न था
बेचैनियाँ क्यों बो रही?
आस मेरी
प्यास मेरी
श्वास की दुश्मन बनी
हास को छोड़ा नहीं
संत्रास फिर-फिर बो गई।
*
अठ सलल सवैया
११२-११२-११२-११२-११२-११२-११२-११२-११
*
जय हिंद कहें, सब संग रहें, हँस हाथ गहें, मिल जीत वरें हम
अरि जूझ थकें, हथियार धरें, अरमान यही, कबहूँ न डरें हम
मत-भेद भले, मन-भेद नहीं, हम एक रहे, सच नेक रहें हम
अरि मार सकें, रण जीत तरें, हँस स्वर्ग वरें, मर के न मरें हम
१२-३-२०१९
***
नवगीत:
सरहद
*
तुम
स्वीकार सकीं मुझको
जब, सरहद पार
गया मैं लेने।
*
उठा हुआ सर
हद के पार
चला आया तब
अनजाने का
हाथ थाम कर।
मैं बहुतों के
साथ गया था
तुम आईं थीं
निपट अकेली।
किन्तु अकेली
कभी नहीं थीं,
सँग आईं
बचपन-यौवन की
यादें अनगिन।
तुम
स्वीकार सकीं मुझको
जब, पहुँच गया
मैं खुद को देने।
*
था दहेज भी
मैके की
शुभ परम्पराओं
शिक्षा, सद्गुण,
संस्कार का।
ले पतवारें
अपनेपन की
नाव हमें थी
मिलकर खेनी।
मतभेदों की
खाई, अंतरों के
पर्वत लँघ
मधुर मिलन के
सपने बुन-बुन।
तुम
स्वीकार सकीं मुझको
जब, संग हुए हम
अंतर खोने।
*
खुद को खोकर
खुद को पाकर
कही कहानी
मन से मन ने,
नित मन ही मन।
खन-खन कंगन
रुनझुन पायल
केश मोगरा
लटें चमेली।
शंख-प्रार्थना
दीप्ति-आरती
सांध्य-वंदना ,
भुवन भारती
हँसी कीर्ति बन।
तुम
स्वीकार सकीं मुझको
जब, मिली राजश्री
सार्थक होने।
*
भवसागर की
बाधाओं को
मिल-जुलकर
था हमने झेला
धैर्य धारकर।
सावन-फागुन
खुशियाँ लाये
सोहर गूँजे
बजी ढोलकी।
किलकारी
पट्टी पूजन कर,
धरा नापने
नभ को छूने
बढ़ी कदम बन।
तुम
स्वीकार सकीं मुझको
जब, अँगना खेले
मूर्त खिलौने।
*
देख आँख पर
चश्मे की
मोहिनी हँसे हम,
धवल केश की
आभा देखें।
नव पीढ़ी
दौड़े, हम थकते
शांति अंजुला
हुई सहेली।
अन्नपूर्णा
कम साधन से
अधिक लक्ष्य पा
अर्थशास्त्र को
करतीं सार्थक।
तुम
स्वीकार सकीं मुझको
जब, सपने देखे
संग सलोने।
१२-३-२०१६
***
छंद सलिला:
भव छंद
*
लक्षण: जाति रौद्र, पद २, चरण ४, प्रति चरण मात्रा ११, चरणान्त लघु गुरु गुरु या गुरु
लक्षण छंद:
एकादश पग रखो, भवसिंधु पार करो
चरण आदि मन चाहा, चरण अंत गुरु से हो
उदाहरण:
१. आशा का बीज बो, कोशिश से फसल लो
श्रम सीकर नर्मदा, भव तारें वर्मदा
२. सूर्य चन्द्र सितारा, सकल जगत निखारा
भव को जब निहारा, खुद को भी बिसारा
रूप-रंग सँवारा, असुंदर न गवारा
सच जिसने बिसारा, रण न लड़ रण हारा
३. समय शिला पर लिखो, सबसे आगे दिखो
शब्द नये उकेरो, नव उजास बिखेरो
४. नित्य हरि गुण गाओ, मन में शांति पाओ
छन्दों में मन रमा, कष्टों को दो भुला
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, ककुभ, कीर्ति, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, छवि, जाया, तांडव, तोमर, दीप, दोधक, नित, निधि, प्रदोष, प्रेमा, बाला, भव, मधुभार, मनहरण घनाक्षरी, माया, माला, ऋद्धि, रामा, लीला, वाणी, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शिव, शुभगति, सार, सिद्धि, सुगति, सुजान, हंसी)
१२-३-२०१४
***
नव गीत:
ऊषा को लिए बाँह में
*
ऊषा को लिए बाँह में,
संध्या को चाह में.
सूरज सुलग रहा है-
रजनी के दाह में...
*
पानी के बुलबुलों सी
आशाएँ पल रहीं.
इच्छाएँ हौसलों को
दिन-रात छल रहीं.
पग थक रहे, मंजिल
कहीं पाई न राह में.
सूरज सुलग रहा है-
रजनी के दाह में...
*
तृष्णाएँ खुद ही अपने
हैं हाथ मल रहीं.
छायाएँ तज आधार को
चुपचाप ढल रहीं.
मोती को रहे खोजते
पाया न थाह में.
सूरज सुलग रहा है-
रजनी के दाह में...
*
शिशु शशि शशीश शीश पर
शशिमुखी विलोकती.
रति-मति रतीश-नाश को
किस तरह रोकती?
महाकाल ही रक्षा करें
लेकर पनाह में.
सूरज सुलग रहा है-
रजनी के दाह में...
***
कुण्डलिया
*
हिंदी की जय बोलिए, हो हिंदीमय आप.
हिंदी में नित कार्य कर, सकें विश्व में व्याप..
सकें विश्व में व्याप, नाप लें सकल ज्ञान का.
नहीं व्यक्ति का, बिंदु 'सलिल' राष्ट्रीय आन का..
नेह-नरमदा नहा बोलिए होकर निर्भय.
दिग्दिगंत में गूँज उठे, फिर हिंदी की जय..
१२-३-२०१०
***

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

२७ फरवरी, सॉनेट, पंकज उधास, सरस्वती, तुम, सवैया, कला त्रयोदशी छंद, मुक्तक, दोहा, गीत

सलिल सृजन २७ फरवरी
कार्य शाला दोहा पर कुंडलिया 
० 
इन्दु गगन का एक जो, उगे नियति अनुपात। 
इन्दु नयन के द्वय उगे, मन अंबर दिन-रात।। -अशोक 'व्यग्र' भोपाल 
मन अंबर दिन-रात, नयन का इंदु चमकता। 
लगे ग्रहण तो जीव, एक अक्षी हो खलता।। 
करे अमावस सूरदास, दिख सके न बिंदु। 
ताल-मेल बिन अलग, अलग देखें नयन-इंदु।। - संजीव
***
लघुकथा 
ईमान 
० 
वकील साहब को शिकायत थी कि पेशी बढ़वाने, स्टैंप लेने, रिकार्ड निकलवाने जैसे काम बिना रुपए दिए होते ही नहीं। 
समय का फेर कि वे काजी बना दिए गए और कड़ी मेहनत कर सदर काजी भी बन गए। 
एक अखबारनवीस ने अदालती कामों में हो रही रिश्वतखोरी पर लंबा लेख छाप दिया। यह जानकारी मिलते ही सदर काजी का होता जमीर ज़ख़्मी हो गया, फौरन से पेश्तर फतवा जारी कर अखबार को बंद और अखबारनवीस के कैदे-बा-मशक्कत की सजा सुनाकर बचा लिया अपना और अदालत का ईमान।
०००
कार्य शाला साहित्यकार को शब्दों का चयन करते समय सजग होना चाहिए। रचना पूर्ण होने पर भाव, अर्थ, प्रभाव आदि के प्रति सजग रहना चाहिए। कभी कभी अनजाने ही रचना से वह आशय सामने आता है जो रचनाकार कहना नहीं चाहता। निम्न पंक्तियाँ पढ़ें- साईं गुलाब से बगिया महके, दे जाए आनंद, सुख दुख है, जीवन का फेरा, साईं परमानंद प्रथम चरण में दो मात्रा अधिक हैं जिन्हें साई के स्थान पर 'हरि' या 'प्रभु' का प्रयोग कर ठीक किया जा सकता है। कथ्य पर विचार करें। प्रथम पंक्ति में 'दे जाए आनंद' अर्थात आनंद देकर (बगिया चली) जाए, सूख जाए। यह आशय रचनाकार का प्रतीत नहीं होता। यदि 'दे पाए आनंद' कर दिया जाए तो अर्थ यह कि बगिया आनंद दे और स्वयं भी आनंद पाए अर्थात हरी,-भरी रहे इसी तरह तीसरे चरण में 'सुख-दुख है जीवन का फेरा' या 'जीवन है सुख दुख का फेरा'? जीवन में सुख-दुख आते हैं या सुख-दुख में जीवन आता है? इस दृष्टिकोण से विचार करें तो सुख-दुख क्षणिक हैं, जीवन उससे अधिक बड़ा है अगर सृष्टि या प्रभु के संदर्भ में बात हो तो जीवन छोटा है, आ-जा सकता है लेकिन जीवन और सुख-दुख के संदर्भ में जब बात हो तो सुख-दुख की अवधि छोटी होती है जीवन की अवधि बड़ी। यह रचना अपने आप में सरसरी तौर पर पड़ने पर निर्दोष प्रतीत होती है लेकिन मनन करने पर परिस्थिति बदल जाती है। मेरा आशय रचनाकार को हतोत्साहित करना नहीं है, निवेदन सिर्फ यह है कि हम सब रचना करने के बाद उसको स्वयं पढ़ें और प्रकाशन के पूर्व सुधार कर लें। मेरे घनिष्ठ मित्र चंद्र सेन विराट कहा करते थे "सलिल भाई! प्रकाशन के पहले रचनाकार रचना सृष्टि का ब्रह्मा है लेकिन छप जाने के बाद वह सिर्फ आलोचना का पात्र बन सकता है, कोई सुधार नहीं कर सकता।" रचनाकार के नाते मुझसे भी कई बार ऐसी चूक होती है तथापि सजग रहने का प्रयास हम सब करते रहें यही निवेदन है। धन्यवाद।
०००
प्रिय अंशु की ५० वीं सालगिरह पर 
० 
अंशुमान का पचास सोनल किरण कर रहीं अभिनंदन 
ॐ प्रकाश लखे पुष्पा कर, आशा करें तिलक वंदन 
आशुतोष दर पर छवि निरखें, अर्णव लगा रहा चंदन 
श्री-समृद्धि श्रेया-आरोही, गृह बगिया है नंदन वन 

करे मेघना हँस शुभ वर्षण, ऋत्विक अवि कान्हा सरनाम 
कर अभिषेक मुदित मन्वन्तर, नेहा-निशिता तुहिन ललाम 
जुही अर्पिता टीना तनु अंबिका, कुहू-काव्या हुलसित  
भेज साधना सुषमा पूनम शुभाशीष अतिशय हर्षित 

अक्षौहिणी दिया की सज्जित, दें सिद्धार्थ पुलक आशीष 
अतुल प्रसून सलिल करतल ध्वनि, करें मनाएँ शुभ कर ईश
हो हो शतायु सानंद स्वस्थ्य रह, कीर्ति पताका फहराओ 
नेह नर्मदा सुमन-लक्ष्मण, करो नमन आशीष पाओ 
००० 
सॉनेट
पंकज उधास
नाद के अनुपम पुजारी,
वाक् के थे धनी अनुपम,
कीर्ति है दस दिश तुम्हारी,
रेशमी आवाज मद्धम।
मर्म छूते तराने गा,
भा गए माँ शारदा को,
लोक ने तुमको सराहा,
वरा गायन शुद्धता को।
गीत ग़ज़लें भजन गाए,
प्राण फूँके भाव रस भर,
विधाता को खूब भाए,
बुलाया अब सुने जी भर।
नाम पंकज का अमर है,
काम पंकज का अमर है।
२७-२-२०२४
•••
कार्यशाला
एक कुण्डलिया- दो कवि
घाट कुआँ खग मृग जगे,तेरी नींद विचत्र।
देख उठाता तर्जनी, सूरज तुझ पर मित्र। -राजकुमार महोबिया
सूरज तुझ पर मित्र, चढ़ाते जल अंजुरी भर।
नेह नर्मदा सलिल, समर्पित भास्कर भास्वर।।
उजियारो मन-प्राण, प्रकाशित कर घर-बाट।
शत वंदन जग-नाथ, न तम व्यापे घर-घाट।। -संजीव
***
सॉनेट
शारदा
*
हृदय विराजी मातु शारदा
सलिल करे अभिषेक निरंतर
जन्म सफल करता नित यश गा
सुमति मिले विनती सिर, पग धर
वीणा अनहद नाद गुँजाती
भव्य चारुता अनुपम-अक्षय
सातों स्वर-सरगम दे थाती
विद्या-ज्ञान बनाते निर्भय
अपरा-परा नहीं बिसराएँ
जड़-चेतन में तुम ही तुम हो
देख सकें, नित महिमा गाएँ
तुमसे आए, तुममें गुम हों
सरस्वती माँ सरसवती हे!
भव से तार, दिव्य दर्शन दे
४-२-२०२३
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पुस्तक परिचय
श्रीमद्भागवत रसामृतम् - सनातन मूल्यों एवं मान्यताओं का कोष
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
[कृति विवरण - श्रीमद्भागवत रसामृतम्, विधा आध्यात्मिक समालोचना, लेखक - व्याकरणाचार्य डॉ. विनोद शास्त्री, आवरण सजिल्द क्लॉथ बाइंडिंग, आकार २५ से.मी. x २१ से.मी., द्वितीय संस्करण बसंत पंचमी २०२१, पृष्ठ संख्या ८००, मूल्य रु ७४०/-, प्रकाशक भागवत पीयूषधाम समिति दिल्ली।]
*
पुस्तकें मनुष्य की श्रेष्ठ मित्र और मार्गदर्शक हैं। मानव जीवन के हर मोड़ पर पुस्तकों की उपादेयता होती है। अधिकांश पुस्तकें जीवन के एक सोपान पर उपयोगी होने के पश्चात् अपनी उपयोगिता खो बैठती हैं किन्तु कुछ पुस्तकें ऐसी भी होती है जो सतत सनातन ज्ञान सलिला प्रवाहित करती हैं। ऐसी पुस्तकें मित्र मात्र नहीं पथ प्रदर्शक और व्यक्तित्व विकासक भी होती हैं। ऐसी ही एक पुस्तक है 'श्रीमद्भागवत रसामृतम्'। वास्तव में यह ग्रंथराज है। महर्षि वेदव्यास द्वारा प्रणीत श्रीमद्भागवत महापुराण पर की कथा को सात भागों में विभाजित कर साप्ताहिक कथा वाचन की उद्देश्य पूर्ति इस ग्रंथ ने की है। ग्रंथकार डॉ. विनोद शास्त्री जी ने श्रीमद्भागवत पर ही शोधोपाधि प्राप्त की है। यह ग्रंथ प्रामाणिक और सरस बन पड़ा है।
ग्रंथारंभ में श्रीगोवर्धन मठ पुरी पीठाधीश्वर श्रीमज्जगद्गुरु स्वामी निश्चलानंद जी सरस्वती आशीष देते हुए लिखते हैं- 'डॉ. विनोद शास्त्री महाभागके द्वारा विरचित श्रीमद्भागवत रसामृतम् (साप्ताहिक कथा) आस्थापूर्वक अध्ययन, अनुशीलन और श्रवण करने योग्य है। श्री शास्त्री जी ने अत्यंत गहन विषय को सरलतम शब्दों में व्यक्त किया है। इस ग्रंथ में शब्द विमर्श सहित तात्विक विवेचन के माध्यम से दार्शनिक भाव व्यक्त किए गए हैं।' रमणरेती गोकुल से जगद्गुरु कार्ष्णि श्री गुरु शरणानंद जी महामंडलेश्वर के शब्दों में - 'ग्रंथ में दुरूह स्थलों एवं प्रसंगों को अत्यंत सरल शब्दों एवं भावों में व्यक्त किया गया है। बीच-बीच में संस्कृत श्लोकों की व्याख्या एवं वैयाकरण सौरभ दृष्टिगोचर होता है। रणचरित मानस एवं भगवद्गीता के उद्धरण देने से ग्रंथ की उपादेयता और भी बढ़ गई है। जगद्गुरु द्वाराचार्य मलूक पीठाधीश्वर श्री राजेंद्रदास जी के अनुसार 'श्री वंशीधरी आदि टीकाओं का भाव, सभी प्रसंगों का सरल तात्विक विवेचन, प्रत्येक स्कंध, अध्याय, प्रमुख श्लोकों का व्याख्यान इस ग्रंथ का अनुपम वैशिष्ट्य है। इस अनुपम ग्रंथ की श्री गोदा हरिदेव पीठाधीश्वर जगद्गुरु देवनारायणाचार्य, स्वामी श्री किशोरीरमणाचार्य जी, मारुतिनन्दन वागीश जी, कृष्णचन्द्र शास्त्री जी जैसे विद्वानों ने भी भूरि-भूरि प्रशंसा की है।
ग्रंथ में श्रीमद्भागवद माहात्म्य के पश्चात् बारह स्कन्धों में कथा का वर्णन है। माहत्म्य के अंतर्गत नाद-भक्ति संवाद, भक्ति का कष्ट विमोचन, गोकर्ण की कथा, धुंधकारी की मुक्ति तथा सप्ताह यज्ञ की विधि वर्णित है। प्रथम स्कंध में भगवद्भक्ति का माहात्म्य, अवतारों का वर्ण, व्यास-नारद संवाद, भागवत रचना, द्रौपदी-सुतों का वध, अश्वत्थामा का मान मर्दन, परीक्षित की रक्षा, भीष्म का देह त्याग, कृष्ण का द्वारका में स्वागत, परीक्षित जन्म, धृतराष्ट्र-गांधारी का हिमालय गमन, परीक्षित राज्याभिषेक, पांडवों का स्वर्ग प्रस्थान, परीक्षित की दिग्विजय, कलियुग का दमन, शृंगी द्वारा शाप तथा शुकदेव द्वारा उपदेश वर्णित हैं। दूसरे स्कंध में ध्यान विधि, विराट स्वरूप, भक्ति माहात्म्य, शुकदेव द्वारा सृष्टि वर्णन, विराट रूप की विभूति का वर्णन, अवतार कथा, ब्रह्मा द्वारा चतुश्लोकी भगवत तथा भागवत के दस लक्षण समाहित हैं। तृतीय स्कंध में उद्धव-विदुर भेंट, कृष्ण की बाल लीला, विदुर - मैत्रेय संवाद, ब्रह्मा की उत्पत्ति, सृष्टि व काल का वर्णन, वाराह अवतार, जय-विजय कथा, हिरण्याक्ष- हिरण्यकशिपु प्रसंग, देवहूति-कर्दम प्रसंग, कपिल जन्म, सांख्ययोग, अष्टांग योग, भक्तियोग आदि प्रसंग हैं। चतुर्थ स्कंध में स्वायंभुव मनु प्रसंग, शंकर-दक्ष प्रसंग, ध्रुव की कथा, वेन, पृथु तथा पुरंजन की कथाओं का विवेचन किया गया है। पंचम स्कंध में प्रियव्रत, आग्नीध्र, नाभि, ऋषभदेव, भारत, राजा रहूगण के प्रसंग, गंगावतरण, भारतवर्ष, षडद्वीप, लोकलोक पर्वत, सूर्य, राहु तथा नरकादि का वर्णन किया गया है। षष्ठ स्कंध में अजामिल आख्यान, नारद-दक्ष प्रसंग, विश्वरूप प्रसंग, दधीचि प्रसंग, वृत्तासुर वध, चित्रकेतु प्रसंग तथा अदिति व दिति प्रसंगों की व्याख्या की गई है।
नारद-युधिष्ठिर संवाद, जय-विजय कथा, हिरण्यकशिपु-प्रह्लाद-नृसिंह प्रसंग, मानव-धर्म, वर्ण-धर्म, स्त्री-धर्म, सन्यास धर्म तथा गृहस्थाश्रम महत्व का वर्णन सप्तम स्कंध में है। आठवें स्तंभ में मन्वन्तरों का वर्णन, गजेंद्र प्रसंग, समुद्र मंथन, शिव द्वारा विष-पान, देवासुर प्रसंग, वामन-बलि प्रसंग तथा मत्स्यावतार की कथा मही गयी है। नौवें स्कंध में वैवस्वत मनु, महर्षि च्यवन, रहा शर्याति, अम्ब्रीश, दुर्वासा, इक्ष्वाकु वंश, मान्धाता, त्रिशंकु, हरिश्चंद्र, सगर, भगीरथ, श्री राम, निमि, चन्द्रवंश, परशुराम, ययाति, पुरु वंश, दुष्यंत, भरत आदि प्रांगण पर प्रकश डाला गया है। दसवें स्कंध के पूर्वार्ध में वासुदेव-देवकी विवाह, श्री कृष्ण जन्म, पूतनादि उद्धार, ब्रह्मा को मोह, कालिय नाग, चीरहरण, गोवर्धन-धारण, रासलीला, अरिष्टासुर वध, कुब्जा पर कृपा, भ्रमर गीत आदि पतसंग हैं। दसवें स्कंध के उत्तरार्ध में जरासंध वध, द्वारका निर्माण, कालयवन-मुचुकुंद प्रसंग, रुक्मिणी से विवाह, प्रद्युम्न जन्म, शंबरासुर वध, जांबवती व सत्यभाभा के साथ विवाह, सीमन्तक हरण. भौमासुर उद्धार, रुक्मि वध, उषा-अनिरुद्ध प्रसंग, श्रीकृष्ण-बाणासुर युद्ध, राजसूय यज्ञ, शिशुपाल उद्धार, शाल्व उद्धार, सुदामा प्रसंग, वसुदेव यज्ञोत्सव, त्रिदेव परीक्षा लीलाविहार आदि प्रसंगों का वर्णन है। ग्यारहवें स्कंध में यदुवंश को ऋषि-शाप, कर्म योग निरूपण, अवतार कथा, अवधूत प्रसंग, भक्ति योग की महिमा, भगवन की विभूतियों का वर्णन, वर्ण धर्म, ज्ञान योग, सांख्य योग, क्रिया योग, परमार्थ निरूपण आदि प्रसंगों का विश्लेषण है। अंतिम बारहवें स्कंध में कलियुग के राजाओं का वर्णन, प्रलय, परीक्षित प्रसंग, अथर्ववेद की शाखाएँ, मार्कण्डेय प्रसंग, श्रीमद्भागवत महिमा आदि का समावेश है।
डॉ. विनोद शास्त्री जी ने श्रीमद्भागवत के विविध प्रसंगों का वर्णन मात्र नहीं किया अपितु उनमें अन्तर्निहित गूढ़ सिद्धांतों, सनातन मूल्यों आदि का सहल-सरल भाषा में सम्यक विश्लेषण भी किया है। श्रीमद्भागवत के हर प्रसंग का समावेश इस ग्रंथ में है। अध्यायों में प्रयुक्त श्लोकों का शब्द विमर्श, पाठक को श्लोक के हर शब्द को समझकर अर्थ ग्रहण करने में सहायक है। शब्द विमर्श में श्लोक का अर्थ, समास, व्युत्पत्ति आदि का अध्ययन कर पाठक अपने ज्ञान, भाषा और अभिव्यक्ति सामर्थ्य की गुणवत्ता वृद्धि कर सकता है। विविध प्रांगण पर प्रकाश डालते समय श्रीमद्भगवतगीता, श्री रामचरित मानस से संबंधित उद्धरणों का समावेश कथ्य के मूलार्थ के साथ-साथ भावार्थ, निहितार्थ को भी समझने में सहायक है। दर्शन के गूढ़ सिद्धांतों को जन सामान्य के लिए सुग्राह्य तथा सहज बोधगम्य बनाने के लिए विनोद जी ने मुख्य आख्यान के साथ-साथ सहायक उपाख्यानों का यथास्थान सटीक प्रयोग किया है। किसी मांगलिक कार्य का श्री गणेश करने के पूर्व ईश वंदना की सनातन परंपरा का पालन करते हुए कृत्यारंभ में मंगलाचरण के अंतर्गत बारह श्लोकों में देव वंदना की गई है। ग्रंथ की श्रेष्ठता का पूर्वानुमान विद्वान् जगद्गुरुओं द्वारा दिए गए शुभाशीष संदेशों से किया जा सकता है।
विनोद जी द्वारा प्रयुक्त शैली के परिचयार्थ स्कंध १, अध्याय ४ से 'विरक्त' का तात्पर्य प्रसंग प्रस्तुत है-
'विष्णो: रक्त: विरक्त:' अर्थात भगवन की भक्ति में अनुरक्त होकर जीवन यापन करो। 'जीवस्यतत्वजिज्ञासा' (भाग. १/२/१०) - जीवन का लक्ष्य है परमात्मा के स्वरूप (तत्व) का ज्ञान करना।
विवेकेन भवत्किं में पुत्रं देहि ब्लादपि।
नोचेत्तयजाम्यहं प्राणांस्त्वदग्रे शोकमूर्छित:।। ३७
आत्मदेव ने कहा- मुझे विवेक से क्या मतलब है? मुझे तो संतान दें। यदि मेरे भाग्य में संतान नहीं है तो अपने भाग्य से दें, नहीं तो मैं शोक मूर्छित हो प्राण त्याग करता हूँ। आत्मदेव - मरने के बाद मेरा पिंडदान कौन करेगा? सन्यासी ने कहा- केवल इतनी सी बात के लिए प्राण त्याग करना चाहते हो। संतान बुढ़ापे में सेवा करेगी, इसकी क्या गारंटी है? आशा ही दुख का कारण है। दशरथ जी के चार पुत्र थे लेकिन अंतिम समय में कोई पास में नहीं था। २० दिन तक तेल की कढ़ाई में शव रखा रहा। इसलिए इस शरीर रूपी पिंड को भगवद्कार्य (सेवा) में समर्पित करो।
उद्धरेदात्म नात्मानं नात्मानमवसादयेत्। (गीता) ६/५
आत्मा से ही आत्मा का उद्धार होगा। याद रखो संतान से तुम्हें सुख मिलनेवाला नहीं है। सन्यासी ने कहा पुत्र ही पिंडदान करेगा, ऐसी आशा छोड़ दो। परमात्मा के अपरोक्ष साक्षात्कार के बिना मुक्ति नहीं मिलती। तमेव विदित्वा अति मृत्युं एति नान्य: पंथा: विद्यते अनयाय। शास्त्रों में कहा है- ऋते ज्ञानान्नमुक्ति: बिना ज्ञान के मुक्ति नहीं मिलती। अपना पिंडदान अपने हाथ से करो। सन्यासी के उपदेश का आत्मदेव के मन पर कोइ प्रभाव नहीं हुआ। तब सन्यासी को ब्राह्मण पर दया आ गई और उन्होंने आम का एक फल आत्मदेव के हाथ में दिया और कहा- जाओ अपनी पत्नी को यह फल खिला दो।
इदं भक्षय पत्न्या त्वं तट: पुत्रो भविष्यति। ४१
सत्यं शौचं दयादानमेकभक्तं तू भोजनम्।। ४२
इस फल के खाने से तुम्हारी स्त्री के गर्भ से एक सुंदर सात्विक स्वभाववाला पुत्र होगा।
वर्षावधि स्त्रिया कार्य तेन पुत्रोsतिनिर्मल:।। ४२
तुम्हारी स्त्री को सत्य, शौच, दया, एक समय नियम लेना होगा। यह कहकर सन्यासी (योगिराज) चले गए। ब्राम्हण ने घर आकर वह फल अपनी पत्नी (धुंधली) के हाथ में दिया और स्वयं किसी कार्यवश बाहर चला गया। कुटिल पत्नी अपनी सखी से रो-रोकर अपनी व्यथा कहने लगी, बोली- फल खाकर गर्भ रहने पर मेरा पेट बढ़ेगा। मैं अस्वस्थ्य हो जाऊँगी। मेरी जैसी कोमल सुकुमार स्त्री से एक वर्ष तक नियम पालन नहीं होगा। उसने उस फल को नहीं खाया, अपने पति से असत्य कह दिया कि मैंने फल खा लिया है।
पत्या पृष्टं फलं भुक्तं चेति तयेरितं। ५०
धुंधली को पुत्र (फल) प्राप्त करने की इच्छा तो है किंतु बिना दुःख झेले। मनुष्य पुण्य करना नहीं, फल भोगना चाहता है। शास्त्र न जानने के कारण धुंधली ने अनर्थ किया। आत्मा पर बुद्धि का वर्चस्व आ जाता है तो सर्वनाश हो जाता है। पत्नी यदि परमात्मा की और चले तो कल्याण होता है।
पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीमं। (दुर्गा सप्तशती)
सरस्वती की कृपा होने पर गृहस्थ को अच्छी पत्नी मिलती है। संतों पर सरस्वती की कृपा होने पर विद्वान बनते हैं। भारतीय पत्नी को पति में ही नारायण के दर्शन होते हैं। पति की सेवा नारायण सेवा ही है। प्रसंग में आगे धुंधकारी कौन है (दार्शनिक भाव), आत्मदेव का चरित्र (दार्शनिक भाव) जोड़ते हुए अंत में धुंधकारी के चरित्र से शिक्षा वर्णित है। विनोद जी ने पौराणिक प्रसंगों को समसामयिक परिस्थितियों और परिवेश से जोड़ते हुए व्यावहारिक उपयोगिता बनाये रखने में सफलता पाई है।
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सॉनेट
मानव वह जो कोशिश करता।
कदम-कदम नित आगे बढ़ता।
गिर-गिर, उठ-उठ फिर-फिर चलता।।
असफल होकर वरे सफलता।।
मानव ऐंठे नहीं अकारण।
लड़ बाधा का करे निवारण।
शरणागत का करता तारण।।
संयम-धैर्य करें हँस धारण।।
मानव सुर सम नहीं विलासी।
नहीं असुर सम वह खग्रासी।
कुछ यथार्थ जग, कुछ आभासी।।
आत्मोन्नति हित सदा प्रयासी।।
मानव सलिल-धार सम निर्मल।
करे साधना सतत अचंचल।।
२७-२-२०२२
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मुक्तक
हम मतवाले पग पगडंडी पर रख झूमे।
बाधाओं को जय कर लें मंज़िल पग चूमे।।
कंकर को शंकर कर दें हम रखें हौसला-
मेहनत कोशिश लगन साथ ले सब जग घूमे।।
*
मंज़िल की मत फ़िक्र करो हँस कदम बढ़ाओ।
राधा खुद आए यदि तुम कान्हा बन जाओ।।
शिव न उमा के पीछे जाते रहें कर्मरत-
धनुष तोड़ने काबिल हो तो सिय को पाओ।।
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यायावर राही का राहों से याराना।
बिना रुके आगे, फिर आगे, आगे जाना।।
नई चुनौती नित स्वीकार उसे जय करना-
मंज़िल पर पग धर झट से नव मंज़िल वरना।।
*
काव्य मंजरी छंद राज की जय जय गाए।
काव्य कामिनी अलंकार पर जान लुटाए।।
रस सलिला में नित्य नहा, आनंद पा-लुटा-
मंज़िल लय में विलय हो सके श्वास सिहाए।।
*
मंज़िल से याराना अपना।
हर पल नया तराना अपना।।
आप बनाते अपना नपना।
पूरा करें देख हर सपना।।
२७-२-२०२१
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छंद सलिला
२९ मात्रिक महायौगिक जातीय, कला त्रयोदशी छंद
*
विधान :
प्रति पद प्रथम / विषम चरण १६ कला (मात्रा)
प्रति पद द्वितीय / सम चरण १३ कला
नामकरण संकेत: कला १६, त्रयोदशी तिथि १३
यति १६ - १३ पर, पदांत गुरु ।
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लक्षण छंद:
कला कलाधर से गहता जो, शंकर प्रिय तिथि साथी।
सोलह-तेरह पर यति सज्जित, फागुन भंग सुहाती।।
उदाहरण :
शिव आभूषण शशि रति-पति हँस, कला सोलहों धारता।
त्रयोदशी पर व्रत कर चंदा, बाधा-संकट टारता।।
तारापति रजनीश न भूले, शिव सम देव न अन्य है।
कालकूट का ताप हर रहा, शिव सेवा कर धन्य है।।
२२.४.२०१९
*
मुक्तक
सरहद पर संकट का हँसकर, जो करता है सामना।
उसकी कसम तिरंगा कर में, सर कटवाकर थामना।।
बड़ा न कोई छोटा होता, भला-बुरा पहचानना-
वह आदम इंसान नहीं जो, करे किसी का काम ना।।
***
दोहा सलिला
*
नदी नेह की सूखती, धुँधला रहा भविष्य
महाकाल का हो रहा, मानव आप हविष्य
*
दोहा सलिला निर्मला, प्रवहित सतत अखंड
नेह निनादित नर्मदा, रखिए प्रबल प्रचंड
*
कलकल सलिल प्रवाहमय, नदी मिटाती प्यास
अमल विमल जल कमल दल, परिमल हरते त्रास
*
नदी तीर पर सघन वन, पंछी कलरव गान
सनन सनन प्रवहे पवन, पड़े जान में जान
*
नदी न गंदी कीजिए, सविनय करें प्रणाम
मैया कह आशीष लें, स्वर्ग बने भू धाम
*
नदी तीर पर सभ्यता, जन्मे विकसे नित्य
नदी मिटा खुद भी मिटे, अटल यही है सत्य
*
नद निर्झर सर सरोवर, ईश्वर के वरदान
करे नष्ट खुद नष्ट हो, समझ सँभल इंसान
२७-२-२०२०
***
एक रचना
*
जब
जिद, हठधर्मी और
गुंडागर्दी को
मान लिया जाए
एक मात्र राह,
जब
अनदेखी-अनसुनी
बना ली जाए
अंतर्मन की चाह,
तब
विनाश करता है
नंगा नाच
जब
कमर कसकर कोई
दृढ़संकल्पी
उतरता है
जमीन पर,
जब
होता है भरोसा
नायक को
सही दिशा और
गति का
तब
लोगों में सद्भावना
जागती है
भाषणबाज नेताओ
अपने आप पर
शर्म करो
पछताओ
तुम सब सिद्ध हुए
हो नाकारा
और कायर,
अब नहीं है
कोई गाँधी
हम
भारत की संतानें
भाईचारा
मजबूत करें
न डराएँ,
न डरें
राजनीति-दलनीति
जिम्मेदार हैं
दूरियों के लिए
हम बढ़ाएँ
नजदीकियाँ
घृणा की आँधी
रोकें
हमें
अंकित शर्मा के
बलिदान की
कसम है
हम जागें
भड़कानेवाले
नेताओं को
दिखाएँ ठेंगा
देश में कायम करें
अमन-शांति
देश हमारा और
हम देश के हैं
***
कार्यशाला
दोहा से कुंडलिया
*
तुम्हें पुकारे लेखनी, पकड़ नाम की डोर ।
हे बजरंगी जानिए, तिमिर घिरा चहुँ ओर ।। - आशा शैली
तिमिर घिरा चहुँ ओर, हाथ को हाथ न सूझे
दूर निराशा करें, देव! हल अन्य न सूझे
सलिल बुझाने प्यास, तुम्हारे आया द्वारे
आशा कर दो पूर्ण, लेखनी तुम्हें पुकारे - सलिल
*
२७-२-२०२०
***
कार्यशाला
दोहा से कुंडलिया
*
तुम्हें पुकारे लेखनी, पकड़ नाम की डोर ।
हे बजरंगी जानिए, तिमिर घिरा चहुँ ओर ।। - आशा शैली
तिमिर घिरा चहुँ ओर, हाथ को हाथ न सूझे
दूर निराशा करें, देव! हल अन्य न सूझे
सलिल बुझाने प्यास, तुम्हारे आया द्वारे
आशा कर दो पूर्ण, लेखनी तुम्हें पुकारे - सलिल
***
सवैया
विधान : प्रति पद २४ वर्ण, पदांत मगण
*
छंद नहीं स्वच्छंद, नहीं प्रच्छंद सहज छा पाते हैं, मन भाते हैं
सुमन नहीं निर्गंध, लुटाएँ गंध, सु मन मुस्काते हैं, जी जाते हैं
आप करें संतोष, न पाले रोष, न जोड़ें कोष, यहीं रह जाते हैं
छंद मिटाते प्यास, हरें संत्रास, लुटाते हास, होंठ हँस पाते हैं
२७-२-२०२०
***
सावरकर
सावरकर को प्रिय नहीं, रही स्वार्थ अनुरक्ति
उन सा वर कर पंथ हम, करें देश की भक्ति
वीर विनायक ने किया, विहँस आत्म बलिदान
डिगे नहीं संकल्प से, कब चाहा प्रतिदान?
भक्तों! तजकर स्वार्थ हों, नीर-क्षीर वत एक
दोषारोपण बंद कर, हों जनगण मिल एक
मोटी-छोटी अँगुलियाँ, मिल मुट्ठी हों आज
गले लगा-मिल साधिए, सबके सारे काज
२६-२-२०२०
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एक रचना
यमराज मिराज ने
*
छोड़ दिए अनलास्त्र
यमराज बने मिराज ने
*
कठपुतली सरकार के
बनकर खान प्रधान
बोल बोलते हैं बड़े,
बुद्धू कहे महान
लिए कटोरा भीख का
साड़ी दुनिया घूम-
पाल रहे आतंक का
हर पगलाया श्वान
भारत से कर शत्रुता
कोढ़ पाल ली खाज ने
छोड़ दिए अनालास्त्र
यमराज बने मिराज ने
*
कोई साथ न दे रहा
रोज खा रहे मार
पाक हुआ दीवालिया
फ़ौज भीरु-बटमार
एटम से धमका रहा
पाकर फिर-फिर मात
पाठ पढ़ा भारत रहा
दे हारों का हार
शांति कपोतों से घिरा
किया समर्पण बाज ने
छोड़ दिए अनालास्त्र
यमराज बने मिराज ने
*
सैबरजेटों को किया
था नैटों ने ढेर
बोफ़ोर्सों ने खदेड़ा
करगिल से बिन देर
पाजी गाजी डुबो दी
सागर में रख याद
छेड़ न, छोड़ेंगे नहीं
अब भारत के शेर
गीदड़भभकी दे रहा
छोड़ दिया क्या लाज ने?
छोड़ दिए अनालास्त्र
यमराज बने मिराज ने
२६-२-२०१९
***
एक गीत
*
सरहद से
संसद तक
घमासान जारी है
*
सरहद पर आँखों में
गुस्सा है, ज्वाला है.
संसद में पग-पग पर
घपला-घोटाला है.
जनगण ने भेजे हैं
हँस बेटे सरहद पर.
संसद में.सुत भेजें
नेता जी या अफसर.
सरहद पर
आहुति है
संसद में यारी है.
सरहद से
संसद तक
घमासान जारी है
*
सरहद पर धांय-धांय
जान है हथेली पर.
संसद में कांव-कांव
स्वार्थ-सुख गदेली पर.
सरहद से देश को
मिल रही सुरक्षा है.
संसद को देश-प्रेम
की न मिली शिक्षा है.
सरहद है
जांबाजी
संसद ऐयारी है
सरहद से
संसद तक
घमासान जारी है
*
सरहद पर ध्वज फहरे
हौसले बुलंद रहें.
संसद में सत्ता हित
नित्य दंद-फंद रहें.
सरहद ने दुश्मन को
दी कड़ी चुनौती है.
संसद को मिली
झूठ-दगा की बपौती है.
सरहद जो
रण जीते
संसद वह हारी है.
सरहद से
संसद तक
घमासान जारी है
२७-२-२०१८
***
एक रचना :
मानव और लहर
*
लहरें आतीं लेकर ममता,
मानव करता मोह
क्षुब्ध लौट जाती झट तट से,
डुबा करें विद्रोह
*
मानव मन ही मन में माने,
खुद को सबका भूप
लहर बने दर्पण कह देती,
भिक्षुक! लख निज रूप
*
मानव लहर-लहर को करता,
छूकर सिर्फ मलीन
लहर मलिनता मिटा बजाती
कलकल-ध्वनि की बीन
*
मानव संचय करे, लहर ने
नहीं जोड़ना जाना
मानव देता गँवा, लहर ने
सीखा नहीं गँवाना
*
मानव बहुत सयाना कौआ
छीन-झपट में ख्यात
लहर लुटाती खुद को हँसकर
माने पाँत न जात
*
मानव डूबे या उतराये
रहता खाली हाथ
लहर किनारे-पार लगाती
उठा-गिराकर माथ
*
मानव घाट-बाट पर पण्डे-
झण्डे रखता खूब
लहर बहाती पल में लेकिन
बच जाती है दूब
*
'नानक नन्हे यूँ रहो'
मानव कह, जा भूल
लहर कहे चंदन सम धर ले
मातृभूमि की धूल
*
'माटी कहे कुम्हार से'
मनुज भुलाये सत्य
अनहद नाद करे लहर
मिथ्या जगत अनित्य
*
'कर्म प्रधान बिस्व' कहता
पर बिसराता है मर्म
मानव, लहर न भूले पल भर
करे निरंतर कर्म
*
'हुईहै वही जो राम' कह रहा
खुद को कर्ता मान
मानव, लहर न तनिक कर रही
है मन में अभिमान
*
'कर्म करो फल की चिंता तज'
कहता मनुज सदैव
लेकिन फल की आस न तजता
त्यागे लहर कुटैव
*
'पानी केरा बुदबुदा'
कह लेता धन जोड़
मानव, छीने लहर तो
डूबे, सके न छोड़
*
आतीं-जातीं हो निर्मोही,
सम कह मिलन-विछोह
लहर, न मानव बिछुड़े हँसकर
पाले विभ्रम -विमोह
२७-२-२०१८
***
नवगीत:
जब तुम आईं
*
कितने रंग
घुले जीवन में
जब तुम आईं।
*
हल्दी-पीले हाथ द्वार पर
हुए सुशोभित।
लाल-लाल पग-चिन्ह धरा को
करें विभूषित।
हीरक लौंग, सुनहरे कंगन
करें विमोहित।
स्वर्ण सलाई ले
दीपक की
जोत मिलाईं।
*
गोर-काले भाल-बाल
नैना कजरारे।
मैया ममता के रंग रंगकर
नजर उतारे।
लिये शरारत का रंग देवर
नकल उतारे।
लिए चुहुल का
रंग, ननदी ने
गजल सुनाईं।
*
माणिक, मूंगा, मोती, पन्ना,
हीरा, नीलम,
लहसुनिया, पुखराज संग
गोमेद नयन नम।
नौरत्नों के नौ रंगों की
छटा हरे तम।
सतरंग साड़ी
नौरंग चूनर
मन को भाईं।
*
विरह-मिलन की धूप-छाँव
जाने कितने रंग।
नाना नाते नये जुड़े जितने
उतने संग।
तौर-तरीके, रीति-रस्म के
नये-नये ढंग।
नीर-क्षीर सी मिलीं, तनिक
पहले सँकुचाईं
२७-२-२०१६
***
*
नवगीत:
.
सूरज
मुट्ठी में लिये,
आया लाल गुलाल.
देख उषा के
लाज से
हुए गुलाबी गाल.
.
महुआ महका,
टेसू दहका,
अमुआ बौरा खूब.
प्रेमी साँचा,
पनघट नाचा,
प्रणय रंग में डूब.
अमराई में,
खलिहानों में,
तोता-मैना झूम
गुप-चुप मिलते,
खुस-फुस करते,
सबको है मालूम.
चूल्हे का
दिल भी हुआ
हाय! विरह से लाल.
कुटनी लकड़ी
जल मरी
सिगड़ी भई निहाल.
सूरज
मुट्ठी में लिये,
आया लाल गुलाल.
देख उषा के
लाज से
हुए गुलाबी गाल.
.
सड़क-इमारत
जीवन साथी
कभी न छोड़ें हाथ.
मिल खिड़की से,
दरवाज़े ने
रखा उठाये माथ.
बरगद बब्बा
खों-खों करते
चढ़ा रहे हैं भाँग.
पीपल भैया
शेफाली को
माँग रहे भर माँग.
उढ़ा
चमेली को रहा,
चम्पा लकदक शाल.
सदा सुहागन
छंद को
सजा रही निज भाल.
सूरज
मुट्ठी में लिये,
आया लाल गुलाल.
देख उषा के
लाज से
हुए गुलाबी गाल.
२६.२.२०१५
***

रविवार, 22 फ़रवरी 2026

फरवरी २२, चौबोला, छंद, गीत, पहेली, सवैया, सदोका, ग़ज़लिका, सॉनेट, मैथिली हाइकु, दुर्योधन, मातृभाषा, भाभी जी,

सलिल सृजन फरवरी २२
*

बाल गीत
परी नन्हीं 'आस्था' खुश झूमती
चाँदनी आशीष देती चूमती
छू सकें 'आकाश' ये नन्हें कदम
कहे 'कृष्णा' पाओ हर सुख नाम तुम
मुदित मन मुकेश खेलें गोद ले
मुग्ध अनिता और अंबर मोद से
दुआ दे राकेश हँस चुंबन करे
हरि-रमा आशीष का वर्षण करें
साधना-संजीव की आशा यही
हो अशोक विलोकना मंजिल सभी
हर बरस नटखटपना बढ़ता रहे
सफलता की नव कथा गढ़ता रहे
२२.२.२०२५
०००
अनुवाद ऐसा भी :
एक बहुत पुराना गीत:
भीगा-भीगा है समा,
ऐसे में है तू कहाँ
मेरा दिल ये पुकारे आजा
मेरे गम के सहारे आजा
अंग्रेजी अनुवाद:
wet wet atmoshphere
where are you my dear!
my heart calls you come on
my support in sorrow come on
यह अनुवाद गीत की मूल धुन में गाया जा सकता है।
आप भी किसी गीत के साथ ऐसा प्रयोग कीजिए।
०००
इटेलियन सॉनेट
राम राज्य
*
राम-राज्य में नहीं व्यापती,
तन की पीड़ा सुख भी मिलता,
भाग्य सूर्य हो उदित न ढलता,
कमी पदार्थों की नहिं होती।
जनता स्नेह परस्पर करती,
चंद्र धर्म का पल पल खिलता,
हर पग धर्म-राह पर चलता,
श्रुति की नीति सब जगह पलती।
अधिक राम से दास राम का,
मिले राम किंकर की पग-रज,
मस्तक लगा सके जो तरता।
हो जा सेवक बिना दाम का,
मनुआ पल-पल सिया राम भज,
जो जीत भव-पार उतरता।
२२.२.२०२४
***
इंग्लिश सॉनेट
# माँ शारदे काव्य_मंच
# विषय - आ जरा मेरे पास आ।
# दिनांक- २२.२.२०२४
# विधा - इंग्लिश सॉनेट
*
मेरे पास जरा आ जा,
बुला शरण देते भगवन,
केवट शबरी बन प्रभु पा,
राम नाम सर कर मज्जन।
सिया-राम की छवि अनुपम,
आँख मूँद लख नाम सुमिर,
राम कृपा से मिटता तम,
राम नाम जप भव से तर।
सलिल राम किंकर पद-रज,
शीश लगा सब पाप कटे,
मंदाकिनी सदृश प्रभु नाम,
अवगाहे भव बंध कटे।
हनुमत दरश दिला दीजै,
राम भगति अमरित पीजै।
२२.२.२०२४
***
सॉनेट
*
पंछी जा परदेस बिसारे,
मन मोहे परबत वन नदिया,
टुकुर-टुकुर देखे नव दुनिया,
घर-अँगना नित राह निहारे।
सूरज इतै सोई ऊगत रे!
घर की मुरगी दाल कहाउत,
आन गाँव बन संत पुजाउत,
डूबत सूरज काए हेरे।
लुका-छिपी अउ कन्नागोटी,
बिसर चिरैया किट्टी खेले,
मठा पना तज कोला पी रई।
चाल समय की खाँटी खोटी,
उड़न खटोला हाँके-ठेले,
अरई लगा भारी खुस हो गई।
२२.२.२४
•••
भाभी श्री स्व. शकुंतला देवी जी की पुण्य स्मृति में
*
स्मृति काव्य
हे क्षणभंगुर भव राम राम
भाभी श्री को अगणित प्रणाम।
वे जीवट की परिभाषा थीं।
वे अन्नपूर्णा आशा थीं।।
उनमें थीं शारद-रमा-उमा।
उनमें जीवित थी सदा क्षमा।।
वे अमरनाथ का संबल थीं।
वे नाद अनाहद अविचल थीं।।
सौभाग्य मिली पद-रज मुझको।
हा! चली गईं तुम तज जग को।।
सुधियों से जा न सकोगी तुम।
संबल बन सदा मिलेगी तुम।।
मुस्कान तुम्हारी माता सी।
तुम अद्भुत ममतादाता थीं।।
तुमसे पाया कितना दुलार।
प्रेरणा मिली है बार-बार।।
छोड़ी है देह, नहीं नाता।
तुम होगी साथ सदा माता।।
यादों को सिहर सहेजेंगे।
सिर पर है हाथ समझ लेंगे।।
***
सवैया
गई हो तुम नहीं, हो दिलों में बसी, गई है देह ही, रहोगी तुम सदा।
तुम्हीं से मिल रही, है हमें प्रेरणा, रहेंगे मोह से, हमेशा हम जुदा।
तजेंगे हम नहीं, जो लिया काम है, करेंगे नित्य ही, न चाहें फल कभी।
पुराने वसन को, है दिया त्याग तो, नया ले वस्त्र आ, मिलोगी फिर यहीं।
*
सॉनेट
सूरज
रोज निकलता नभ पर सूरज।
उषा-धरा को तकता सूरज।
आँख सेकता घर-घर सूरज।।
फिर भी कभी न थकता सूरज।।
रुके नहीं यायावर सूरज।
दोपहरी भर रास रचाता।
झुके नहीं, पछताकर सूरज।।
संध्या को ठेंगा दिखलाता।।
रजनी को अपनाता सूरज।
सारी रैन बिताता सूरज।।
राज नहीं बतलाता सूरज।
हाथ नहीं फिर आता सूरज।।
जग में पूजा जाता सूरज।
क्यों आँखें दिखलाता सूरज।।
•••
सॉनेट
आँसू
यम सम्मुख सब झुके राम रे!
बन न सके क्यों कहो काम रे!
हाय! न यम से बचे राम रे!
मिट ही जाते सकल नाम रे!
कहें विधाता हुआ वाम रे!
हाथ न लेता कभी थाम रे!
मिटना तो क्यों दिया चाम रे!
हुई भोर की सदा शाम रे!
नाहक करते इंतिजाम रे!
यहाँ-वहाँ है कहाँ गाम रे!
कौन कहे कब हो विराम रे!
खास न कोई सभी आम रे!
काश हो सकें हम अकाम रे!
सम हो पाए छाँह-घाम रे!
२२-२-२०२२
•••
सॉनेट
मातृभाषा
माँ की भाषा केवल ममता।
वात्सल्य व्याकरण अनोखा।
हर अक्षर है प्यारा चोखा।।
खूब लुटाती नेह न कमता।।
बारहखड़ी दूध की धारा।
शब्द-शब्द का अर्थ त्याग है।
वाक्य-छंद में भरा राग है।।
कथ्य गीत का तन-मन वारा।।
अलंकार लोरी में अनगिन।
रस सागर की लहरें मत गिन।
शिशु बन हो आनंदित पल-छिन।।
पल में तोला, पल में माशा।
श्वास-श्वास दे जन्म तराशा।
माँ की भाषा दूध-बताशा।।
२२-२-२०२२
•••
ग़ज़लिका
*
कुछ सपने हैं, कुछ सवाल भी
सादा लेकिन बाकमाल भी
सावन - फागुन, ईद - दिवाली
मिलकर हो जाते निहाल जी
मौन निहारा जब जब तुमको
चेहरा क्यों होता गुलाल जी
हो रजनीश गजब ढाते हो
हाथों में लेकर मशाल जी
ब्रह्मानंद अगर पाना है
सलिल संग कर लो धमाल जी
२२-२-२०२०
***
दोहा
अमर नाथ सेवक मरे, यह कैसा है न्याय?
अरबों लुटे न फिक्र क्या, नेता का अभिप्राय।।
***
सदोका पंचक
*
ई​ कविता में
करते काव्य स्नान ​
कवि​-कवयित्रियाँ .
सार्थक​ होता
जन्म निरख कर
दिव्य भाव छवियाँ।
*
ममता मिले
मन-कुसुम खिले,
सदोका-बगिया में।
क्षण में दिखी
छवि सस्मित मिले
कवि की डलिया में।
*
​न​ नौ नगद ​
न​ तेरह उधार,
लोन ले, हो फरार।
मस्तियाँ कर
किसी से मत डर
जिंदगी है बहार।
*
धूप बिखरी
कनकाभित छवि
वसुंधरा निखरी।
पंछी चहके
हुलस, न बहके
सुनयना सँवरी।
* ​
श्लोक गुंजित
मन भाव विभोर,
पूज्य माखनचोर।
उठा हर्षित
सक्रिय नीरव भी
क्यों हो रहा शोर?
२२-२-२०१८
***
नवगीत
दुर्योधन
*
गुरु से
काम निकाल रहा,
सम्मान जताना
सीख न पाया
है दुर्योधन.
*
कहते हैं इतिहास स्वयं को दुहराता है.
सुनते हैं जो सबक न सीखे पछताता है.
लिखते हैं कवि-लेखक, पंडित कथा सुनाते-
पढ़ता है विद्यार्थी लेकिन बिसराता है.
खुद ही
नाम उछल रहा,
पर दाम चुकाना
जान न पाया
है दुर्योधन.
*
जो बोता-उपजाता, वह भूखा मरता है.
जो करता मेहनत वह पेट नहीं भरता है.
जो प्रतिनिधि-सेवक वह करता ऐश हमेशा-
दंदी-फंदी सेठ ना डर, मन की करता है.
लूट रहा,
छल-कपट, कर्ज
लेकर लौटाना
जान न पाया
है दुर्योधन.
*
वादा करता नेता, कब पूरा करता है?
अपराधी कब न्याय-पुलिस से कुछ डरता है?
जो सज्जन-ईमानदार है आम आदमी-
जिंदा रहने की खातिर पल-पल मरता है.
बात विदुर की
मान शकुनी से
पिंड छुड़ाना
जान न पाया
है दुर्योधन.
२१.२.२०१८
***
मैथिली हाइकु
(त्रुटियों हेतु क्षमा प्रार्थना सहित)
१.
ई दुनिया छै
प्रभुक बनाओल
प्रेम स रहू
२.
लिट्टी-चोखा
मधुबनी पेंटिंग
मिथिला केर
३.
सभ सs प्यार
घृणा ककरो सय
नैई करब
४.
संपूर्ण क्रांति
जयप्रकाश बाबू
बिसरि गेल
५.
बिहारी जन
भगायल जैतई
दोसर राज?
६.
चलि पड़ल
विकासक राह प'
बिहारी बाबू
७.
चलै लागल
विकासक बयार
नीक धारणा
८.
हम्मर गाम
भगवाने के नाम
लSक चलब
९.
हाल-बेहाल
जनता परेशान
मँहगाई से
१०.
लोकतंत्र में
चुनावक तैयारी
बड़का बात
***
गीत
भैया जी की जय
*
भाभी जी भाषण में बोलीं
भैया जी की जय बोलो.
*
फ़िक्र तुम्हारी कर वे दुबले
उतने ही जिंतने हैं बगुले
बगुलों जैसा उजला कुरता
सत्ता की मछली झट निगले
लैपटॉप की भीख तुम्हें दी
जुबां नहीं अपनी खोलो
भाभी जी भाषण में बोलीं
भैया जी की जय बोलो.
*
बहिना पीछे रहती कैसे?
झपट उठी झट जैसे-तैसे
आम लोग लख हक्के-बक्के
अटल इरादे इनके पक्के
गगनविहारी साईकिलधारी
वजन बात का मत तोलो
भाभी जी भाषण में बोलीं
भैया जी की जय बोलो.
*
धन्य बुआ जी! आग उगलतीं
फूट देख, चुप रहीं सुलगतीं
चाह रहीं जनता को ठगना
चलता बस कुर्सियाँ उलटतीं
चल-फिर कर भी क्या कर लोगे?
बनो मूर्ति सब, मत डोलो
भाभी जी भाषण में बोलीं
भैया जी की जय बोलो.
*
भाई-भतीजा मिल दें गच्चा
क्या कर लेंगे बोलो चच्चा?
एक जताता है हक अपना
दूजा कहे चबा लूँ कच्चा
दाग लग रहा है निष्ठा पर
कथनी-करनी भी तोलो
भाभी जी भाषण में बोलीं
भैया जी की जय बोलो.
*
छप्पन इंची छाती-जुमले
काले धन की रौंदी फसलें
चैन न ले, ना लेने देता
करे सर्जिकल, रोके घपले
मत मत-दान करो, मत बेचो
सोच-समझ दो, फिर सो लो
भाभी जी भाषण में बोलीं
भैया जी की जय बोलो.
२२-२-२०१७
***
मुक्तक:
*
करता करनी मनुज ख़राब
फिर कह देता समय ख़राब
वन, गिरि, नदी मिटाता रोज
फिर कहता है प्रलय ख़राब
*
पहेली
*
एक पहेली
बूझ सहेली
*
कौन गधे से ज्यादा मूरख
खड़ा करे खुद अपनी खाट?
एक पहेली
बूझ सहेली
*
कौन जलाये खुद अपना घर
अपनी आप लगाते वाट?
एक पहेली
बूझ सहेली
*
कौन देश का दुश्मन बनकर
अपना थूका खुद ले चाट?
एक पहेली
बूझ सहेली
*
कौन खोदता सडक-रेल भी
ज्यों पागल कुत्ता ले काट?
एक पहेली
बूझ सहेली
*
कौन जला संपत्ति देश की
चाह रहा आरक्षण-ठाट?
एक पहेली
बूझ सहेली
*
कौन माँगता भीख बताओ
धरकर धन-बल जैसे लाट
एक पहेली
बूझ सहेली
*
जो न जान कर नाम बताये
उस पर हँसते चारण-भाट
एक पहेली
बूझ सहेली
२२.२.२०१६
***
एक गीत :
का बिगार दओ?
*
काए फूँक रओ बेदर्दी सें
हो खें भाव बिभोर?
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
हँस खेलत ती
संग पवन खें
पेंग भरत ती खूब।
तेंदू बिरछा
बाँह झुलाउत
रओ खुसी में डूब।
कें की नजर
लग गई दइया!
धर लओ मो खों तोर।
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
काट-सुखा
भर दई तमाखू
डोरा दओ लपेट।
काय नें समझें
महाकाल सें
कर लई तुरतई भेंट।
लत नें लगईयो
बीमारी सौ
दैहें तोय झिंझोर
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
जिओ, जियन दो
बात मान ल्यो
पीओ नें फूकों यार!
बढ़े फेंफडे में
दम तुरतई
गाड़ी हो नें उलार।
चुप्पै-चाप
मान लें बतिया
सुनें न कौनऊ सोर।
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
अपनों नें तो
मेहरारू-टाबर
का करो ख़याल।
गुटखा-पान,
बिड़ी लत छोड़ो
नई तें होय बबाल।
करत नसा नें
कब्बऊ कौनों
पंछी, डंगर, ढोर।
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
बात मान लें
निज हित की जो
बोई कहाउत सयानो।
तेन कैसो
नादाँ है बीरन
साँच नई पहचानो।
भौत करी अंधेर
जगो रे!
टेरे उजरी भोर।
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
२१-११-२०१५
कालिंदी विहार लखनऊ
***
नवगीत
.
दहकते पलाश
फिर पहाड़ों पर.
.
हुलस रहा फागुन
बौराया है
बौराया अमुआ
इतराया है
मदिराया महुआ
खिल झाड़ों पर
.
विजया को घोंटता
कबीरा है
विजया के भाल पर
अबीरा है
ढोलक दे थपकियाँ
किवाड़ों पर
.
नखरैली पिचकारी
छिप जाती
हाथ में गुलाल के
नहीं आती
पसरे निर्लज्ज हँस
निवाड़ों पर
२२.२.२०१५
***
छंद सलिला:
१५ मात्रा का तैथिक जातीय छंद : चौबोला
*
लक्षण: २ पद, ४ चरण, प्रतिचरण १५ मात्रा, चरणान्त लघु गुरु
लक्षण छंद:
बाँचौ बोला तिथि पर कथा, अठ-सत मासा भोगे व्यथा
लघु गुरु हो तो सब कुछ भला, उलटा हो तो विधि ने छला
(संकेत: तिथि = १५ मात्रा, अठ-सत = आठ-सात पर यति, लघु-गुरु चरणान्त)
उदाहरण:
१. अष्टमी-सप्तमी शुभ सदा, हो वही विधि लिखा जो बदा
कौन किसका हुआ कब कहो, 'सलिल' जल में कमल सम रहो
२. निर्झरिणी जब कलकल बहे, तब निर्मल जल धारा गहे
रुके तड़ाग में पंक घुले, हो सार्थक यदि पंकज खिले
३. लोकतंत्र की महिमा यही, ताकत जन के हाथों रही
जिसको चाहा उसको चुना, जिसे न चाहा बाहर किया

२२-२-२०१४