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मंगलवार, 21 जुलाई 2026

जुलाई २१, सेमल, सॉनेट, हाइकु, माहिया, दोह, मुक्त्क, सुगती, दीप, निधि, छंद, लघुकथा, वर्ष गीत

 सलिल सृजन जुलाई २१

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सामयिक गीत . देश हमारा है, सरकार हमारी है फिर क्यों आईं बुलडोजर की बारी है? . हमने जिनको जनसेवा के हेतु चुना। वे ही जन से दूर हुए सिर लिए तना।। अहंकार ने नाप बताया छाती का- निज महिमा मंडन का भ्रामक पंथ चुना।। आत्म मोह की नागिन नित फुँफकारी है देश हमारा है, सरकार हमारी है फिर क्यों आईं बुलडोजर की बारी है? . पक्ष-विपक्ष न दुश्मन, हैं दोनों आँखें। कैसे उड़े परिंदा अगर न दो पाँखें।। जड़ होती मजबूत वृक्ष की केवल तब जब होती हैं अलग दिशाओं में शाखें।। मतभेदों में सहमति, राह बिसारी है देश हमारा है, सरकार हमारी है फिर क्यों आईं बुलडोजर की बारी है? . हर दल हिस्सा लोकतंत्र का है मानो। बहुमत पा मत कुचलो औरों को स्यानो।। सबका सबसे स्नेह बढ़े वह राह चुनो- सिर्फ तुम्हीं हो सही, गलत मत अनुमानो।। सहें असहमति, यह तहजीब हमारी है देश हमारा है, सरकार हमारी है फिर क्यों आईं बुलडोजर की बारी है? . सिक्के के दो पहलू पक्ष-विपक्ष रहें। नाव और पतवार सरीखे साथ बहें।। देश और जनता की उन्नति हो कैसे? नीति बनाएँ, नव उपाय नित सुनें-कहें।। बहु दल जनहित लक्ष्य, भोर उजियारी है देश हमारा है, सरकार हमारी है फिर क्यों आईं बुलडोजर की बारी है? . दो एंजिन सरकार न संविधान में है। कोटि-कोटि इंजन अपनी पहचान में है।। अगिन देवता अगिन भक्त हैं एक सखे! है कुटुंब दुनिया सारी, भगवान में है।। गैर विपक्षी नहीं, शक्ति दोधारी है देश हमारा है, सरकार हमारी है फिर क्यों आईं बुलडोजर की बारी है? २१.७.२०२६ ०००
सेमल
अनुभूति की मिट्टी में
विचारों के बीज
संवेदना का पानी पीकर
फूले न समाए।
फट गया कठोरता का
कृत्रिम आवरण,
सृजन के अंकुर
पैर जमाकर मुस्काए।
संकल्प की जड़ें
जमीं में जमीँ,
प्रयास के पल्लव हरियाए।
गगन चूमने को आतुर
तना तना और
शाखाओं ने हाथ फैलाए।
सूर्य की तपिश झेली
पवन संग करी अठखेली
चाँदनी संग आँख मिचौली
चाँद संग खिलखिलाए।
कभी सब्जी बन मिटाई क्षुधा
कभी चर्म रोग मिटाए
घटाकर बढ़ती उम्र के प्रभाव
रक्त शोधन के काम आए।
लोक कल्याण के लिए
किया आत्म बलिदान
रहकर मौन और बेदाम
इसलिए कुदरत ने सिर पर
लाल फूलों के मुकुट सजाए।
रेशमी कपास का देकर उपहार
बीजों से भरकर पशुओं का पेट
काष्ठ से बनाकर नाव और वाद्य यंत्र
हम पर्णपाती शाल्मली उर्फ़ सेमल
मरकर भी जी पाए,
जिंदगी के तराने गुंजाए।
२१.७.२०२५
***
छंद सलिला
हाइकु
पानी बरसे
मेघ-नयन से
रुके न रोके।।
घन श्याम से
वर माँगते सब
घनश्याम से।।
आँखों में आँखें
डाल डाल झूमती
शाखें ही शाखें।।
माहिया
बिन बारिश रोते हैं
बारिश हो जमकर
झट नयन भिगोते हैं।
बुलडोजर बाबा जी!
अपने न रहे अपने
काशी या काबा जी।।
किस्से ही किस्से हैं,
सुख भोगें नेता
दुख जन के हिस्से हैं।।
•••
जनक छंद
कंकर में शंकर मिले
देख सके तो देख ले
व्यर्थ न कर शिकवे गिले।।
हरयाया है ठूँठ हर
हैं विषाक्त फिर भी शहर
हुआ प्रदूषण ही कहर।।
खुशगवार मौसम कहे
नाच-झूम, चिंता न कर
होनी होकर ही रहे।।
•••
मुक्तक
आपमें बच्चा सदा जिंदा रहे
झूठ में सच्चा सदा जिंदा रहे
पक रहे, थक-चुक रहे हैं तन सभी
सभी का मन मृदुल अरु कच्चा रहे
कौन किसका कब हुआ कहिए कभी
खुद खुदी को जान पाए क्या सभी?
और पर रहते उठाते अँगुलियाँ
अँगुलियाँ खुद पर उठी देखें अभी।।
बात मत कर, काम कर
यह न हो बस नाम कर
आत्मश्लाघा दूर रख
नहीं विधि को वाम कर।।
•••
दोहा
कृष्णा कृष्णा कह रहे, रहे कृष्ण से दूर।
दो न, एक यह जान जप, हो दीदार जरूर।।
गुरु से गुर जो सीख ले, वही शिष्य मतिमान।
जान, अजान न रह कभी, गुरु ही गुण की खान।।
सरला वसुधा दे सदा, जोड़े कभी न कोष।
झोली खाली हो नहीं, यदि मन में संतोष।।
•••
सोरठा
करिए सरस विनोद, अगर समय विपरीत हो।
दे आलोक प्रमोद, संकट टल जाते सभी।।
रेखा लंबी आप, खींचें सदा हुजूर जी!
मिटा और की पाप, करें न पाल गुरूर जी।।
करें प्रशंसा गैर, निज मुख से करिए नहीं।
सदा रहेगी खैर, करें न निंदा गैर की।।
•••
सुगती छंद
जो भला है
झुक चला है।
बुरा है जो
तना है वो।
आइए हम
मिटाएँ तम।
बाँट दें सुख
माँग लें दुख।
खुश रहें प्रभु!
जीव सब विभु।
•••
छबि छंद
जपिए रमेश
हर दिन हमेश।
छबि में निखार
लाता सुधार।
कर ले प्रयास
फैले सुवास।
मत चाह मोह
मत पाल द्रोह।
चल अंत नाम
कह राम राम।
•••
गंग छंद
घन गरज घूमे
गिरि शिखर चूमे।
झट हुई वर्षा
मन मुकुल हर्षा।
बीज अंँकुराया
भू यश गुँजाया।
फुदक गौरैया
कर ता ता थैया।
मिल बजा ताली
वरो खुशहाली।
•••
निधि छंद
सिय राम निहार
गईं सुधि बिसार।
लख राम सीता
कहते पुनीता।
रसना न बोले
दृग राज खोले।
पल में बनाया
अपना पराया।
दीपक दिपा है
प्रभु की कृपा है।
•••
दीप छंद
दीपक अगिन बाल
नर्तित विहँस बाल।
किरणें थिरक गोल
लाईं मुदित ढोल।
गातीं हुलस गीत
पालें पुलक प्रीत।
सज्जित सुगृह द्वार
हर्षित सुमन वार।
गृहणी मदिर नैन
रुचिकर सुखद बैन।
हैं प्रि‌यतम निहाल
कुंजित पिंक रसाल।
गुरु पूर्णिमा
२१.७.२०२४
•••
सॉनेट
बूँदें
तपती धरती पर पड़ीं बूँदें
तपिश मन की हो गई शांत
भीगकर घर आ गए कांत
पर्ण पर मणि सम जड़ी बूँदें
हाय! लज्जा से गड़ीं बूँदें
देखकर गंदी नदी सूखी
गृह लक्ष्मी हो ज्यों दुखी-भूखी
ठिठक मेघों संग उड़ी बूँदें
हैं महज शुभ की सगी बूँदें
बिकें नेता सम नहीं बूँदें
स्नेह से मिलती पगी बूँदें
आँख से छिप-छिप बहीं बूँदें
गाल पर छप-छप गईं बूँदें
धैर्य धर; ढहती नहीं बूँदें
२१-७-२०२२
***
लघुकथा
सिसकियाँ
सिसकियों की आवाज सुनकर मैंने पीछे मुड़के देखा। सांझ के झुरमुट में घुटनों में सर झुकाए वह सिसक रही थी। उसकी सिसकियाँ सुनकर पूछे बिना न रहा गया। पहले तो उसने कोई उत्तर न दिया, फिर धीरे धीरे बोली- 'क्या कहूँ? मेरे अपने ही जाने-अनजाने मेरे बैरी हो गए।
- तुम उनसे कोई अपेक्षा ही क्यों करती हो?
= अपेक्षा मैं नहीं करती, मुझसे ही अपेक्षा की जाती है कि मैं सबके और हर एक के मन के अनुसार ही खुद को ढाल लूँ। मैं किस-किस के अनुसार खुद को बदलूँ?
- बदलाव ही तो जीवन है। सृष्टि में बदलाव न हो एक सा मौसम, एक से हालात रहें तो विकास ही रुक जाएगा।
= वही तो मैं भी कहती हूँ। मेरा जन्म लोक में हुआ। माताएँ अपने बच्चों को बहलाने के लिए मुझे बुला लेतीं। किसान-मजदूर अपनी थकान भुलाने के लिए मुझे अपना हमसाया पाते। गुरुजन अपने विद्यार्थियों को समझाने, राह दिखाने के लिए मुझे सहायक पाते रहे।
- यह तो बहुत अच्छा है, तुम्हारा होना तो सार्थक हो गया।
= होना तो ऐसा ही चाहिए पर जो होना चाहिए वह होता कहाँ है? हुआ यह कि वर्तमान ने अतीत को पहचनाने से ही इंकार कर दिया। पत्तियों और फूलों ने बीज, अंकुर और जड़ों को अपना मूल मानने से ही इंकार कर दिया।
- यह तो वाकई दुर्भाग्यपूर्ण है।
= बात यहीं तक नहीं है। अब तो अलग अलग फलों ने अलग-अलग यह निर्धारित करना शुरू कर दिया है कि जड़ों, तने और शाखाओं को कैसा होना चाहिए, उनका आकार-प्रकार कैसा हो?, रूप रंग कैसा हो?
- ऐसा तो नहीं होना चाहिए। पत्तियों, फूलों और फलों को समझना चाहिए कि अतीत को बदला नहीं जा सकता, न झुठलाया जा सकता है।
= कौन किसे समझाए? हर पत्ती, फूल और फल खुद को नियामक मानकर नित नए मानक तय कर खुद को मसीहा मान बैठे हैं।
- तुम कौन हो? किसके बारे में बात कर रही हो?
= मैं उस वृक्ष की जीवन शक्ति हूँ जिसे तुम कहते हो लघुकथा।
२१.७.२०२१ ***
दोहा सलिला
*
प्रभु सारे जग का रखे, बिन चूके नित ध्यान।
मैं जग से बाहर नहीं, इतना तो हैं भान।।
*
कौन किसी को कर रहा, कहें जगत में याद?
जिसने सब जग रचा है, बिसरा जग बर्बाद
*
जिसके मन में जो बसा वही रहे बस याद
उसकी ही मुस्कान से सदा रहे दिलशाद
*
दिल दिलवर दिलदार का, नाता जाने कौन?
दुनिया कब समझी इसे?, बेहतर रहिए मौन
*
स्नेह न कांता से किया, समझो फूटे भाग
सावन की बरसात भी, बुझा न पाए आग
*
होती करवा चौथ यदि, कांता हो नाराज
करे कृपा तो फाँकिये, चूरन जिस-तिस व्याज
*
प्रभु सारे जग का रखें, बिन चूके नित ध्यान।
मैं जग से बाहर नहीं, इतना तो हैं भान।।
*
कौन किसी को कर रहा, कहें जगत में याद?
जिसने सब जग रचा है, बिसरा जग बर्बाद
*
जिसके मन में जो बसा वही रहे बस याद
उसकी ही मुस्कान से सदा रहे दिलशाद
*
दिल दिलवर दिलदार का, नाता जाने कौन?
दुनिया कब समझी इसे?, बेहतर रहिए मौन
*
स्नेह न कांता से किया, समझो फूटे भाग
सावन की बरसात भी, बुझा न पाए आग
*
होती करवा चौथ यदि, कांता हो नाराज
करे कृपा तो फाँकिये, चूरन जिस-तिस व्याज
***
बरसाती गीत
*
नहा रहे हैं
बरसातों में
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़
*
सूर्य-बल्ब
जब होता रौशन
मेक'प करते बिना छिपे.
शाखाओं,
कलियों फूलों से
मिलते, नहीं लजाते झाड़
नहा रहे हैं
बरसातों में
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़
*
बऊ धरती
आँखें दिखलाये
बहिना हवा उड़ाये मजाक
पर्वत दद्दा
आँख झुकाये,
लता संग इतराते झाड़
नहा रहे हैं
बरसातों में
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़
*
कमसिन सपने
देख थिरकते
डेटिंग करें बिना हिचके
बिना गये
कर रहे आउटिंग
कभी नहीं पछताते
नहा रहे हैं
बरसातों में
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़
***
हाइकू सलिला
*
हाइकू लिखा
मन में झाँककर
अदेखा दिखा।
*
पानी बरसा
तपिश शांत हुई
मन विहँसा।
*
दादुर कूदा
पोखर में झट से
छप - छपाक।
*
पतंग उड़ी
पवन बहकर
लगा डराने
*
हाथ ले डोर
नचा रहा पतंग
दूसरी ओर
२१.७.२०१९
***
नवगीत:
*
मेघ बजे
नभ ठाकुर की ड्योढ़ी पर
फिर मेघ बजे
ठुमुक बिजुरिया
नचे बेड़नी बिना लजे
*
दादुर देते ताल,
पपीहा-प्यास बुझी
मिले मयूर-मयूरी
मन में छाई खुशी
तोड़ कूल-मरजाद
नदी उफनाई तो
बाबुल पर्वत रूठे
तनया तुरत तजे
*
पल्लव की करताल
बजाती नीम मुई
खेत कजलियाँ लिये
मेड़ छुईमुई हुई
जन्मे माखनचोर
हरीरा भक्त पिये
गणपति बप्पा, लाये
मोदक हुए मजे
*
टप-टप टपके टीन
चू गयी है बाखर
डूबी शाला हाय!
पढ़ाये को आखर?
डूबी गैल, बके गाली
अभियंता को
डुकरो काँपें, 'सलिल'
जोड़ कर राम भजे
***
दोहा सलिला:
कुछ दोहे बरसात के
*
गरज नहीं बादल रहे, झलक दिखाकर मौन
बरस नहीं बादल रहे, क्यों? बतलाये कौन??
*
उमस-पसीने से हुआ, है जनगण हैरान
जल्द न देते जल तनिक, आफत में है जान
*
जो गरजे बरसे नहीं, हुई कहावत सत्य
बिन गरजे बरसे नहीं, पल में हुई असत्य
*
आँख और पानी सदृश, नभ-पानी अनुबंध
बन बरसे तड़पे जिया, बरसे छाये धुंध
*
पानी-पानी हैं सलिल, पानी खो घनश्याम
पानी-पानी हो रहे, दही चुरा घनश्याम
*
बरसे तो बरपा दिया, कहर न बाकी शांति
बरसे बिन बरपा दिया, कहर न बाकी कांति
*
धन-वितरण सम विषम क्यों, जल वितरण जगदीश?
कहीं बाढ़ सूखा कहीं, पूछे क्षुब्ध गिरीश
*
अधिक बरस तांडव किया, जन-जीवन संत्रस्त
बिन बरसे तांडव किया, जन-जीवन अभिशप्त
*
महाकाल से माँगते, जल बरसे वरदान
वर देकर डूबे विवश, महाकाल हैरान
२०.७.२०१९
***
जा विदेश में बोलिए, हिन्दी तब हो गर्व.
क्या बोला सुन समझ लें, भारतीय हम सर्व.
कर किताब से मित्रता, रह तनाव से दूर.
शान्त चित्त खेलो क्रिकेट, मिले वाह भरपूर.
चौको से यारी करो, छक्को से हो प्यार.
शतक साथ डेटिग करो, मीताली सौ बार.
अंग्रेजी का मोह तज, कर हिन्दी में बात.
राज दिलों पर राज का, यह मीताली राज.
राज मिताली राज का, तूफानी रफ़्तार.
राज कर रही विकेट पर, दौड़ दौड़ हर बार.
खेलो हर स्ट्रोक तुम, पीटो हँस हर गेंद.
गेंदबाज भयभीत हो, लगा न पाए सेंध.
दस हजार का लक्ष्य ले, खेलो धरकर धीर.
खेल नायिका पा सको, नया नाम रन वीर.
चौको छक्को की करी, लगातार बरसात.
हक्का बक्का रह गए, कंगारू खा मात.
हरमन पर हर मन फिदा, खूब दिखाया खेल.
कंगारू पीले पड़े, पल में निकला तेल.
सरहद सारी सुरक्षित, दुश्मन फौज फ़रार.
पता पड़ गया आ रही, हरमन करने वार.
हरमन ने की दनादन, चोट, चोट पर चोट.
दीवाली की बम लडी, ज्यों करती विस्फ़ोट.
षटपदी
गेंदबाज चकरा गए, भूले सारे दाँव.
पंख उगे हैं गेंद के, या ऊगे हैं पाँव.
या ऊगे हैं पाँव विकेटकीपर को भूली.
आँख मिचौली खेल, भीड़ के हाथों झूली.
हरमन से कर प्रीत, शोट खेल में छा गए.
भूले सारे दाँव, गेदबाज चकरा गए.
***
मुक्तिका:
बरसात में
*
बन गयी हैं दूरियाँ, नज़दीकियाँ बरसात में.
हो गये दो एक, क्या जादू हुआ बरसात में..
आसमां का प्यार लाई जमीं तक हर बूँद है.
हरी चूनर ओढ़ भू, दुल्हन बनीं बरसात में..
तरुण बादल-बिजुरिया, बारात में मिल नाचते.
कुदरती टी.वी. का शो है, नुमाया बरसात में..
डालियाँ-पत्ते बजाते बैंड, झूमे है हवा.
आ गयीं बरसातियाँ छत्ते लिये बरसात में..
बाँह उनकी राह देखे चाह में जो हैं बसे.
डाह हो या दाह, बहकर गुम हुई बरसात में..
चू रहीं कवितायेँ-गज़लें, छत से- हम कैसे बचें?
छंद की बौछार लायीं, खिड़कियाँ बरसात में..
राज-नर्गिस याद आते, भुलाये ना भूलते.
बन गये युग की धरोहर, काम कर बरसात में..
बाँध,झीलें, नदी विधवा नार सी श्री हीन थीं.
पा 'सलिल' सधवा सुहागन, हो गयीं बरसात में..
मुई ई कविता! उड़ाती नींद, सपने तोड़कर.
फिर सजाती नित नये सपने 'सलिल' बरसात में..
***
मुक्तिका
*
कल दिया था, आज लेता मैं सहारा
चल रहा हूँ, नहीं अब तक तनिक हारा
सांस जब तक, आस तब तक रहे बाकी
जाऊँगा हँस, ईश ने जब भी पुकारा
देह निर्बल पर सबल मन, हौसला है
चल पड़ा हूँ, लक्ष्य भूलूँ? ना गवारा
पाँव हैं कमजोर तो बल हाथ का ले
थाम छड़ियाँ खड़ा पैरों पर दुबारा
साथ दे जो मुसीबत में वही अपना
दूर बैठा गैर, चुप देखे नज़ारा
मैं नहीं निर्जीव, हूँ संजीव जिसने
अवसरों को खोजकर फिर-फिर गुहारा
शक्ति हो तब संग जब कोशिश करें खुद
सफलता हो धन्य जब मुझको निहारा
२१.७.२०१६
***
दोहा - सोरठा गीत
पानी की प्राचीर
*
आओ! मिलकर बचाएँ,
पानी की प्राचीर।
पीर, बाढ़ - सूखा जनित
हर, कर दे बे-पीर।।
*
रखें बावड़ी साफ़,
गहरा कर हर कूप को।
उन्हें न करिये माफ़,
जो जल-स्रोत मिटा रहे।।
चेतें, प्रकृति का कहीं,
कहर न हो, चुक धीर।
आओ! मिलकर बचाएँ,
पानी की प्राचीर।।
*
सकें मछलियाँ नाच,
पोखर - ताल भरे रहें।
प्रणय पत्रिका बाँच,
दादुर कजरी गा सकें।।
मेघदूत हर गाँव को,
दे बारिश का नीर।
आओ! मिलकर बचाएँ,
पानी की प्राचीर।।
*
पर्वत - खेत - पठार पर
हरियाली हो खूब।
पवन बजाए ढोलकें,
हँसी - ख़ुशी में डूब।।
चीर अशिक्षा - वक्ष दे ,
जन शिक्षा का तीर।
आओ मिलकर बचाएँ,
पानी की प्राचीर।।
२०-७-२०१६
-----------------
सोरठा - दोहा गीत
संबंधों की नाव
*
संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही।
अनचाहा अलगाव,
नदी-नाव-पतवार में।।
*
स्नेह-सरोवर सूखते,
बाकी गन्दी कीच।
राजहंस परित्यक्त हैं,
पूजते कौए नीच।।
नहीं झील का चाव,
सिसक रहे पोखर दुखी।
संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही।।
*
कुएँ - बावली में नहीं,
शेष रहा विश्वास।
निर्झर आवारा हुआ,
भटके ले निश्वास।।
घाट घात कर मौन,
दादुर - पीड़ा अनकही।
संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही।।
*
ताल - तलैया से जुदा,
देकर तीन तलाक।
जलप्लावन ने कर दिया,
चैनो - अमन हलाक।।
गिरि खोदे, वन काट
मानव ने आफत गही।
संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही।।
२०-७-२०१६
***
अश्'आर
बसा लो दिल में, दिल में बस जाओ / फिर भुला दो तो कोई बात नहीं
*
खुद्कुशी अश्क की कहते हो जिसे / वो आंसुओं का पुनर्जन्म हुआ
*
अल्पना कल्पना की हो ऐसी / द्वार जीवन का जरा सज जाये.
*
गौर गुरु! मीत की बातों पे करो / दिल किसी का दुखाना ठीक नहीं
*
श्री वास्तव में हो वहीं, जहां रहे श्रम साथ / जीवन में ऊन्चा रखे श्रम ही हरदम माथ
*
खरे खरा व्यव्हार कर, लेते हैं मन जीत / जो इन्सान न हो खरे, उनसे करें न प्रीत.
*
गौर करें मन में नहीं, 'सलिल' तनिक हो मैल / कोल्हू खीन्चे द्वेष का, इन्सां बनकर बैल
*
काया की माया नहीं जिसको पाती मोह, वही सही कायस्थ है, करे गलत से द्रोह.
२१.७.२०१४
०००
नवगीत:
संजीव
*
हर चेहरे में
अलग कशिश है
आकर्षण है
*
मिलन-विरह में,
नयन-बयन में
गुण-अवगुण या
चाल-चलन में
कहीं मोह का
कहीं द्रोह का
संघर्षण है
*
मन की मछली,
तन की तितली
हाथ न आयी
पल में फिसली
क्षुधा-प्यास का
हास-रास का
नित तर्पण है
*
चितवन चंचल
सद्गुण परिमल
मृदु मिठासमय
आनन मंजुल
हाव-भाव ये
ताव-चाव ये
प्रभु-अर्पण है
*
गिरि सलिलाएँ
काव्य-कथाएँ
कहीं-अनकहीं
सुनें-सुनाएँ
कलरव-गुंजन
माटी-कंचन
नव दर्पण है
*
बुनते सपने
मन में अपने
समझ न आते
जग के नपने
जन्म-मरण में
त्याग-वरण में
संकर्षण है
*
प्रयास अलीगढ में दिसंबर २००७ में प्रकाशित


सोमवार, 20 अप्रैल 2026

२० अप्रैल, ग़ज़लिका, सॉनेट, दोहा, अरुण छंद, शास्त्र छंद, नवगीत, कुण्डलिया, माहिया

सलिल सृजन २० अप्रैल

*
माहिया ० हरिऔध न बिसराना हैं पितृ पुरुष अपने नत शिर आशिष पाना।। ० है सहज सरल हिंदी जन के हृदय बसी हरिऔध-विरासत सी। ० हो प्रिय प्रवास मन में हर जन की चाहत देखें प्रभु हरिजन में। ० हिंदी का रूप गढ़ा तिल-तिल खुद जलकर हरिऔधी पीढ़ी ने। ० रसधार नर्मदा में भाव-बिंब लहरें हरिऔध बहाते थे। ० हिंदी हो जनवाणी दायित्व हमारा है हिंदी हो जगवाणी। २०.४.२०२६ ०००
छंद शाला
दोहा+रोला=कुंडलिया
नयन वासना से भरे, सदा साधते स्वार्थ।
नयन वासना से परे, करते सदा कृतार्थ।। - अशोक व्यग्र
करते सदा कृतार्थ, नयन उपकृत भी होते।
नयन मौन हों कभी, कभी हँसते या रोते।।
बंजर मरु हों नयन, कभी हों नयन नव हरे।
अंधे होते आप, नयन वासना से भरे।।
नयन वासना से भरे, सदा साधते स्वार्थ।
नयन वासना से परे, करते सदा कृतार्थ।। - अशोक व्यग्र
करते सदा कृतार्थ, धन्य कृतकृत्य नयन हों।
नयन करें पुरुषार्थ, नयन उपयुक्त चयन हों।।
शौर्य-पराक्रम शील, विनय से युक्त मृदु वचन।
नयन करें परमार्थ, साध सर्वार्थ नित नयन।।
नयन वासना से भरे, सदा साधते स्वार्थ।
नयन वासना से परे, करते सदा कृतार्थ।। -अशोक व्यग्र
करते नयन कृतार्थ, नयन जन-गण हितकारी।
निर्बल के बल नयन, सर्व हित मंगलकारी।।
त्याग-भोग वैराग, राग हों नयन कामना।
नयन आँधरे सूर, पले यदि नयन वासना।।
२०.४.२०२६
०००
ग़ज़लिका
चंद्र विजय अभियान निरंतर जारी है।
केश टूटते देख करी तैयारी है
.
गृह लछमी सुन 'चंद्रमुखी' हो गई कुपित
क्यों बोला?, अपनी ही मति गई मारी है
.
उठा चमीटा झाड़ू बेलन बन काली
गरज रही कह आ अब तेरी बारी है
.
चाँद-चाँदनी देख हुआ मन तभी तरल
शरत्पूर्णिमा 'सलिल' हुई उजियारी है
.
चाँद सरीखे चेहरे को हमने थामा
चाँद सरीखी चांद उन्हें हुई प्यारी है
२०.४.२०२५
०००
सॉनेट
जनगण-मत
चित्र गुप्त है जनगण-मत का,
देख सके तो देख बावरे!
मिले श्वेत में छिपे साँवरे,
गत में चित्र मिला आगत का।
चित्र सुप्त है जनगण-मत का,
लेख सके तो लेख छाँव रे!
मिलें न खोजे गुमे गॉंव रे!
है आसार नहीं राहत का।
जनगण-मत का है अपहर्ता,
दल का दलदल देश गौड़ क्यों?
गारंटी की मची होड़ क्यों?
अहम् कह रहा खुद को भर्ता,
सत्ता खातिर अंध दौड़ क्यों?
२०.४.२०२४
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मुक्तक
सौ वर्षों सानंद रहो तुम
गीत मुक्तिका छंद रहो तुम
भाव बिंब अनुभूति कथ्य गह
रसमय मुट्ठी बंद रहो तुम।।
२०.४.२०२४
***
मुक्तिका
*
मेहनत अधरों की मुस्कान
मेहनत ही मेरा सम्मान
बहा पसीना, महल बना
पाया आप न एक मकान
वो जुमलेबाजी करते
जिनको कुर्सी बनी मचान
कंगन-करधन मिले नहीं
कमा बनाए सच लो जान
भारत माता की बेटी
यही सही मेरी पहचान
दल झंडे पंडे डंडे
मुझ बिन हैं बेदम-बेजान
उबटन से गणपति गढ़ दूँ
अगर पार्वती मैं लूँ ठान
सृजन 'सलिल' का है सार्थक
मेहनतकश का कर गुणगान
२०-४-२१
***
दोहा सलिला
नियति रखे क्या; क्या पता, बनें नहीं अवरोध
जो दे देने दें उसे, रहिए आप अबोध
*
माँगे तो आते नहीं , होकर बाध्य विचार
मन को रखिए मुक्त तो, आते पा आधार
*
सोशल माध्यम में रहें, नहीं हमेशा व्यस्त
आते नहीं विचार यदि, आप रहें संत्रस्त
*
एक भूमिका ख़त्म कर, साफ़ कीजिए स्लेट
तभी दूसरी लिख सकें,समय न करता वेट
*
रूचि है लोगों में मगर, प्रोत्साहन दें नित्य
आप करें खुद तो नहीं, मिटे कला के कृत्य
*
विश्व संस्कृति के लगें, मेले हो आनंद
जीवन को हम कला से, समझें गाकर छंद
*
भ्रमर करे गुंजार मिल, करें रश्मि में स्नान
मन में खिलते सुमन शत, सलिल प्रवाहित भान
*
हैं विराट हम अनुभूति से, हुए ईश में लीन
अचल रहें सुन सकेंगे, प्रभु की चुप रह बीन
*
तुलसी, मानस और कोविद
भविष्य दर्शन की बात हो तो लोग नॉस्ट्राडेमस या कीरो की दुहाई देते हैं। गो. तुलसीदास की रामभक्ति असंदिग्ध है, वर्तमान कोविद प्रसंग तुलसी के भविष्य वक्ता होने की भी पुष्टि करता है। कैसे? कहते हैं 'प्रत्यक्षं किं प्रमाणं', हाथ कंगन को आरसी क्या? चलिए मानस में ही उत्तर तलाशें। कहाँ? उत्तर उत्तरकांड में न मिलेगा तो कहाँ मिलेगा? तुलसी के अनुसार :
सब कई निंदा जे जड़ करहीं। ते चमगादुर होइ अवतरहीं।
सुनहु तात अब मानस रोगा। जिन्ह ते दुःख पावहिं सब लोग।। १२० / १४
वाइरोलोजी की पुस्तकों व् अनुसंधानों के अनुसार कोविद १९ महामारी चमगादडो से मनुष्यों में फैली है।
मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला।।
काम बात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा।। १२० / १५
सब रोगों की जड़ 'मोह' है। कोरोना की जड़ अभक्ष्य जीवों (चमगादड़ आदि) का को खाने का 'मोह' और भारत में फैलाव का कारण विदेश यात्राओं का 'मोह' ही है। इन मोहों के कारण बहुत से कष्ट उठाने पड़ते हैं। आयर्वेद के त्रिदोषों वात, कफ और पित्त को तुलसी क्रमश: काम, लोभ और क्रोध जनित बताते हैं। आश्चर्य यह की विदेश जानेवाले अधिकांश जन या तो व्यापार (लोभ) या मौज-मस्ती (काम) के लिए गए थे। यह कफ ही कोरोना का प्रमुख लक्षण देखा गया। जन्नत जाने का लोभ पाले लोग तब्लीगी जमात में कोरोना के वाहक बन गए। कफ तथा फेंफड़ों के संक्रमण का संकेत समझा जा सकता है।
प्रीती करहिं जौं तीनिउ भाई। उपजइ सन्यपात दुखदाई।।
विषय मनोरथ दुर्गम नाना। ते सब स्कूल नाम को जाना।। १२०/ १६
कफ, पित्त और वात तीनों मिलकर असंतुलित हो जाएँ तो दुखदायी सन्निपात (त्रिदोष = कफ, वात और पित्त तीनों का एक साथ बिगड़ना। यह अलग रोग नहीं ज्वर / व्याधि बिगड़ने पर हुई गंभीर दशा है। साधारण रूप में रोगी का चित भ्रांत हो जाता है, वह अंड- बंड बकने लगता है तथा उछलता-कूदता है। आयुर्वेद के अनुसार १३ प्रकार के सन्निपात - संधिग, अंतक, रुग्दाह, चित्त- भ्रम, शीतांग, तंद्रिक, कंठकुब्ज, कर्णक, भग्ननेत्र, रक्तष्ठीव, प्रलाप, जिह्वक, और अभिन्यास हैं।) मोहादि विषयों से उत्पन्न शूल (रोग) असंख्य हैं। कोरोना वायरस के असंख्य प्रकार वैज्ञानिक भी स्वीकार रहे हैं। कुछ ज्ञात हैं अनेक अज्ञात।
जुग बिधि ज्वर मत्सर अबिबेका। कहँ लागि कहौं कुरोग अनेका।।१२० १९
इस युग (समय) में मत्सर (अन्य की उन्नति से जलना) तथा अविवेक के कारण अनेक विकार उत्पन्न होंगे। देश में राजनैतिक नेताओं और सांप्रदायिक शक्तियों के अविवेक से अनेक सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक विकार हुए और अब जीवननाशी विकार उत्पन्न हो गया।
एक ब्याधि बस नर मरहिं ए असाधि बहु ब्याधि।
पीड़हिं संतत जीव कहुँ सो किमि लहै समाधि॥१२१ क
एक ही व्याधि (रोग कोविद १९) से असंख्य लोग मरेंगे, फिर अनेक व्याधियाँ (कोरोना के साथ मधुमेह, रक्तचाप, कैंसर, हृद्रोग आदि) हों तो मनुष्य चैन से समाधि (मुक्ति / शांति) भी नहीं पा सकता।
नेम धर्म आचार तप, ज्ञान जग्य जप दान।
भेषज पुनि कोटिन्ह नहिं, रोग जाहिं हरिजान।। १२१ ख
नियम (एकांतवास, क्वारेंटाइन), धर्म (समय पर औषधि लेना), सदाचरण (स्वच्छता, सामाजिक दूरी, सेनिटाइजेशन,गर्म पानी पीना आदि ), तप (व्यायाम आदि से प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाना), ज्ञान (क्या करें या न करें जानना), यज्ञ (मनोबल हेतु ईश्वर का स्मरण), दान (गरीबों को या प्रधान मंत्री कोष में) आदि अनेक उपाय हैं तथापि व्याधि सहजता से नहीं जाती।
एहि बिधि सकल जीव जग रोगी। सोक हरष भय प्रीति बियोगी।।
मानस रोग कछुक मैं गाए। हहिं सब कें लखि बिरलेहिं पाए।।१२१ / १
इस प्रकार सब जग रोग्रस्त होगा (कोरोना से पूरा विश्व ग्रस्त है) जो शोक, हर्ष, भय, प्यार और विरह से ग्रस्त होगा। हर देश दूसरे देश के प्रति शंका, भय, द्वेष, स्वार्थवश संधि, और संधि भंग आदि से ग्रस्त है। तुलसी ने कुछ मानसिक रोगों का संकेत मात्र किया है, शेष को बहुत थोड़े लोग (नेता, अफसर, विशेषज्ञ) जान सकेंगे।
जाने ते छीजहिं कछु पापी। नास न पावहिं जन परितापी।।
बिषय कुपथ्य पाइ अंकुरे। मुनिहु हृदयँ का नर बापुरे।। १२१ / २
जिनके बारे में पता च जाएगा ऐसे पापी (कोरोनाग्रस्त रोगी, मृत्यु या चिकित्सा के कारण) कम हो जायेंगे , परन्तु विषाणु का पूरी तरह नाश नहीं होगा। विषय या कुपथ्य (अनुकूल परिस्थिति या बदपरहेजी) की स्थिति में मुनि (सज्जन, स्वस्थ्य जन) भी इनके शिकार हो सकते हैं जैसे कुछ चिकित्सक आदि शिकार हुए तथा ठीक हो चुके लोगों में दुबारा भी हो सकता है।
तुलसी यहीं नहीं रुकते, संकेतों में निदान भी बताते हैं।
राम कृपाँ नासहिं सब रोगा। जौं एहि भाँति बनै संजोगा॥
सदगुर बैद बचन बिस्वासा। संजम यह न बिषय कै आसा॥ १२१ / ३
ईश्वर की कृपा से संयोग (जिसमें रोगियों की चिकित्सा, पारस्परिक दूरी, स्वच्छता, शासन और जनता का सहयोग) बने, सद्गुरु (सरकार प्रमुख) तथा बैद (डॉक्टर) की सलाह मानें, संयम से रहे, पारस्परिक संपर्क न करें तो रोग का नाश हो सकता है।
रघुपति भगति सजीवन मूरी। अनूपान श्रद्धा मति पूरी॥
एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं। नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं॥
ईश्वर की भक्ति संजीवनी जड़ी है। श्रद्धा से पूर्ण बुद्धि ही अनुपान (दवा के साथ लिया जाने वाला मधु आदि) है। इस प्रकार का संयोग हो तो वे रोग भले ही नष्ट हो जाएँ, नहीं तो करोड़ों प्रयत्नों से भी नहीं जाते।
२०-४-२०२०
***
मुक्तिका
*
वतन परस्तों से शिकवा किसी को थोड़ी है
गैर मुल्कों की हिमायत ही लत निगोड़ी है
*
भाईचारे के बीच मजहबी दखल क्यों हो?
मनमुटावों का हल, नाहक तलाक थोड़ी है
*
साथ दहशत का न दोगे, अमन बचाओगे
आज तक पाली है, उम्मीद नहीं छोड़ी है
*
गैर मुल्कों की वफादारी निभानेवालों
तुम्हारे बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है
*
है दुश्मनों से तुम्हें आज भी जो हमदर्दी
तो ये भी जान लो, तुमने ही आस तोड़ी है
*
खुदा न माफ़ करेगा, मिलेगी दोजख ही
वतनपरस्ती अगर शेष नहीं थोड़ी है
*
जो है गैरों का सगा उसकी वफा बेमानी
हाथ के पत्थरों में आसमान थोड़ी है
*
छंद बहर का मूल है: ७
*
छंद परिचय:
संरचना: SIS SIS IS / SISS ISIS
सूत्र: ररलग।
आठ वार्णिक जातीय छंद।
तेरह मात्रिक जातीय छंद।
बहर: फ़ाइलुं फ़ाइलुं फ़अल / फ़ाइलातुं मुफ़ाइलुं ।
*
देवता है वही सही
जो चढ़ा वो मँगे नहीं
*
बाल सारे सफेद हैं
धूप में ये रँगे नहीं
*
लोग ईसा बनें यहाँ
सूलियों पे टँगे नहीं
*
दर्द नेता न भोगता
सत्य है ये सभी कहीं
*
आम लोगों न हारना
हिम्मतें ही जयी रहीं
*
SISS ISIS
जी न चाहे वहीं चलो
धार ही में बहे चलो
*
दूसरों की न बात हो
हाथ खाली मले चलो
*
छोड़ भी दो तनातनी
ख्वाब हो तो पले चलो
*
दुश्मनों की निगाह में
शूल जैसे चुभे चलो
*
व्यर्थ सीना न तान लो
फूल पाओ झुके चलो
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२०.४.२०१७
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छंद सलिला:
अरुण छंद
*
छंद-लक्षण: जाति महादैशिक , प्रति चरण मात्रा २० मात्रा, चरणांत गुरु लघु गुरु (रगण), यति ५-५-१०
लक्षण छंद:
शिशु अरुण को नमन कर ;सलिल; सर्वदा
मत रगड़ एड़ियाँ मंज़िलें पा सदा
कर्म कर, ज्ञान वर, मन व्रती पारखी
एक दो एक पग अंत में हो सखी
उदाहरण:
१. प्रेयसी! लाल हैं उषा से गाल क्यों
मुझ अरुण को कहो क्यों रही टाल हो?
नत नयन, मृदु बयन हर रहे चित्त को-
बँधो भुज पाश में कहो क्या हाल हो?
२. आप को आप ने आप ही दी सदा
आप ने आप के भाग्य में क्या लिखा"
व्योम में मोम हो सोम ढल क्यों गया?
पाप या शाप चुक, कल उगे हो नया
३. लाल को गोपियाँ टोंकती ही रहीं
'बस करो' माँ उन्हें रोकती ही रहीं
ग्वाल थे छिप खड़े, ताक में थे अड़े
प्रीत नवनीत से भाग भी थे बड़े
घर गयीं गोपियाँ आ गयीं टोलियाँ
जुट गयीं हट गयीं लूटकर मटकियाँ
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(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, ककुभ, कज्जल, कामिनीमोहन कीर्ति, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, छवि, जाया, तांडव, तोमर, दीप, दोधक, नित, निधि, प्रतिभा, प्रदोष, प्रेमा, बाला, भव, मदनअवतार, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, योग, ऋद्धि, राजीव, रामा, लीला, वाणी, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, सरस, सार, सिद्धि, सुगति, सुजान, हंसगति, हंसी)
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छंद सलिला:
शास्त्र छंद
*
छंद-लक्षण: जाति महादैशिक , प्रति चरण मात्रा २० मात्रा, चरणांत गुरु लघु (तगण, जगण)
लक्षण छंद:
पढ़ो उठकर शास्त्र समझ-गुन कर याद
रचो सुमधुर छंद याद रख मर्याद
कला बीसी रखें हर चरण पर्यन्त
हर चरण में कन्त रहे गुरु लघु अंत
उदाहरण:
१. शेष जब तक श्वास नहीं तजना आस
लक्ष्य लाये पास लगातार प्रयास
शूल हो या फूल पड़े सब पर धूल
सम न हो समय प्रतिकूल या अनुकूल
२. किया है सच सचाई को ही प्रणाम
हुआ है सच भलाई का ही सुनाम
रहा है समय का ईश्वर भी गुलाम
हुआ बदनाम फिर भी मिला है नाम
३. निर्भय होकर वन्देमातरम बोल
जियो ना पीटो लोकतंत्र का ढोल
कर मतदान, ना करना रे मत-दान
करो पराजित दल- नेता बेइमान
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विशेष टिप्पणी :
हिंदी के 'शास्त्र' छंद से उर्दू के छंद 'बहरे-हज़ज़' (मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन) की मुफ़र्रद बह्र 'मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन मफ़ाईल' की समानता देखिये.
उदाहरण:
१. हुए जिसके लिए बर्बाद अफ़सोस
वो करता भी नहीं अब याद अफ़सोस
२. फलक हर रोज लाता है नया रूप
बदलता है ये क्या-क्या बहुरूपिया रूप
३. उन्हें खुद अपनी यकताई पे है नाज़
ये हुस्ने-ज़न है सूरत-आफ़रीं से
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, ककुभ, कज्जल, कामिनीमोहन कीर्ति, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, छवि, जाया, तांडव, तोमर, दीप, दोधक, नित, निधि, प्रतिभा, प्रदोष, प्रेमा, बाला, भव, मदनअवतार, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, योग, ऋद्धि, राजीव, रामा, लीला, वाणी, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, सरस, सार, सिद्धि, सुगति, सुजान, हंसगति, हंसी)
२०-४-२०१४
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दोहा मुक्तक
पीर पराई हो सगी, निज सुख भी हो गैर.
जिसको उसकी हमेशा, 'सलिल' रहेगी खैर..
सबसे करले मित्रता, बाँट सभी को स्नेह-
'सलिल' कभी मत किसी के, प्रति हो मन में बैर..
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नव गीत
*
जीवन की जय बोल, धरा का दर्द तनिक सुन...
तपता सूरज आँख दिखाता, जगत जल रहा.
पीर सौ गुनी अधिक हुई है, नेह गल रहा.
हिम्मत तनिक न हार- नए सपने फिर से बुन...
निशा उषा संध्या को छलता सुख का चंदा.
हँसता है पर काम किसी के आये न बन्दा...
सब अपने में लीन, तुझे प्यारी अपनी धुन...
महाकाल के हाथ जिंदगी यंत्र हुई है.
स्वार्थ-कामना ही साँसों का मन्त्र मुई है.
तंत्र लोक पर, रहे न हावी कर कुछ सुन-गुन...
२०-४-२०१०
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