कुल पेज दृश्य

डॉ. राजेंद्र प्रसाद लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
डॉ. राजेंद्र प्रसाद लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

फरवरी ३, मुक्तिका, सॉनेट, संस्मरण, उल्लाला मुक्तक, दोहा, संस्मरण, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, लघुकथा

सलिल सृजन फरवरी ३
मुक्तिका
'शुभ संध्या हो' सूर्य अस्त हो कहता है।
नहा नर्मदा में न ताप से दहता है।।

भला-बुरा जो भी चाहे बोले दुनिया।
दिनकर दिन कर मौन साध सब सहता है।।
निशा अमावस हो या पूनम दोनों की
सुधियों को रवि अंतर्मन में तहता है।।

गले चाँद से भले नहीं मिलता लेकिन
गगन गेह में साथ चाँद के रहता है

किरण करों से लुटा उजाला तम हरता
खाली हाथों रहे न कुछ भी गहता है।।
०००

लघुकथा

                                                                               क्या रखा है नाम में?

०           

            नाम व्यक्ति की पहचान होता है। शिशु को नाम माता-पिता या अन्य पारिवारिक बड़े जन देते हैं। हम सब समाज में अपने नाम से ही जाने जाते हैं। एक ही नाम एक से अधिक व्यक्तियों के हो सकते हैं। पहचान सुनिश्चित करने के लिए पिता, पति या गाँव के नाम तथा कुलनाम भी जोड़ लिया जाता है। नेकनाम होना तथा नाम कमाना सबकी चाह होती है जबकि गुमनाम, बदनाम होना कोई नहीं चाहता।

                 मेरे कार्यालय में एक अधिकारी आए जिनका नाम था राम लाल शर्मा। संयोगवश दफ्तर में एक भृत्य का भी यही नाम था। अधिकारी के कक्ष के बाहर उनकी नाम पट्टिका लगाई गई तो उन्होंने उसे हटाने का आदेश देते हुए कहा कि आर. एल. शर्मा आई.ए.एस. लिखवाओ।

                एक बच्चे का नाम गरीब दास था। वह पढ़-लिखकर नौकरी में लगा तो यह नाम चुभने लगा उसने शपथ पत्र देकर नाम बदल लिया। उसके रिश्तेदार आते तो उसे बचपन के नाम से पुकारते, यह उसे बहुत खराब लगता। माता-पिता से अक्सर बहस कर लेता और डाँट खाता।

                कुछ लोग अपने पेशे को अपने व्यक्तित्व से अहमियत देते हैं, वे नाम के पहले डॉक्टर या प्रोफेसर लिखने लगते हैं। यह लत इतनी बढ़ जाती है कि केवल नाम लिखा या लिया जाने पर वे खुद को अपमानित या शर्मिंदा अनुभव करते हैं।

                जब समाज में शिक्षा का प्रसार कम था तब नाम के साथ उपाधि बी.ए., एम.ए., विशारद, शास्त्री आदि लिखने का चलन था। मेरे एक पड़ोसी सेवा निवृत्त उच्च अधिकारी हैं, वे नाम पट्टिका पर अपना पदनाम लिखने का मोह नहीं छोड़ पाए। एक सामाजिक कार्यकर्ता खुद का परिचय पत्नी के पद से से पार्षद पति कहकर देते हैं।

                    एक दिन मेरी बेटी ने मेरे पिता श्री पूछ लिया कि व्यक्ति की सही पहचान नाम, कुलनाम या पदनाम क्या होती है? पिता जी बोले- पानी केरा बुदबुदा अस मानुस की जात, क्या धरा है नाम में? मनुष्य की सही पहचान उसके काम से होती है। दुनिया को काम ही प्यारा होता है, नाम या चाम नहीं।''

०००

मुक्तिका
*
बादलों का मन धरा पर आ गया।
बूँद होकर भेंट करना भा गया।।
ताब किसमें थी हराता जो हमें।
क्या करे दिल हारकर दिल पा गया।।
नामवर होकर हुआ बदनाम क्यों।
जो रहा गुमनाम नाम कमा गया।।
अब न मन-मंदिर विराजें राम जी।
स्वर्ण मंदिर मोह मन भरमा गया।।
बैठ सत्ता पंक भी चंदन हुआ।
कायलों पे काग गा जाए पा गया।।
३.२.२०२४
***
सॉनेट
सुतवधु
*
सुतवधु आई, पर्व मन रहा।
गूँज रही है शहनाई भी।
ऋतु बसंत मनहर आई सी।।
खुशियों का वातास तन रहा।।
ऊषा प्रमुदित कर अगवानी।
रश्मिरथी करता है स्वागत।
नज़र उतारे विनत अनागत।।
शुभद सुखद हों मातु भवानी।।
जाग्रत धूम्रित श्वास वेदिका।
गुंजित दस दिश ऋचा गीतिका।
परचम ऊँचा रहे प्रीति का।।
वरद रहें नटवर अभ्यंकर।
रहे सुवासित नित मन्वन्तर।
सलिल साधना हो हरी सुखकर।।
३-१-२०२२
***
मुक्तिका
*
लिखें हजल
कहें गजल
न जा शहर
उगा फसल
भुला बहर
कहें सजल
पुरा न तज
बना नवल
लिखें न खुद
करें नकल
रहे विमल
बहे सलिल
जमा कदम
नहीं फिसल
३-२-२०२०
***
दोहा
चाह रही मनुहार पर, करती है तकरार।
श्वास-आस में पल रहा, 'सलिल' सनातन प्यार।।
*
व्योम बसे जगदीश से, मिल पाएं कब नैन।
सलिल कर रहा प्रार्थना, मिल जाए अब चैन।।
३.२.२०१८
***
संस्मरण
जैसे को तैसा
एक बार पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद नाव से अपने गाँव जा रहे थे। नाव में कई लोग सवार थे। राजेंद्र बाबू के नजदीक ही एक अंग्रेज बैठा हुआ था। वह बार-बार राजेंद्र बाबू की तरफ व्यंग्य से देखता और मुस्कराने लगता। कुछ देर बाद अंग्रेज ने उन्हें तंग करने के लिए एक सिगरेट सुलगा ली और उसका धुआँ जानबूझकर राजेंद्र बाबू की ओर फेंकता रहा।
कुछ देर तक राजेंद्र बाबू चुप रहे। लेकिन वह काफी देर से उस अंग्रेज की ज्यादती बर्दाश्त कर रहे थे। उन्हें लगा कि अब उसे सबक सिखाना जरूरी है। कुछ सोचकर वह अंग्रेज से बोले- 'महोदय! यह जो सिगरेट आप पी रहे हैं क्या आपकी है?' यह प्रश्न सुनकर अंग्रेज व्यंग्य से मुस्कराता हुआ बोला 'मेरी नहीं तो क्या तुम्हारी है? मँहगी और विदेशी सिगरेट है।'
अंग्रेज के इस वाक्य पर राजेंद्र बाबू बोले, 'बड़े गर्व से कह रहे हो कि विदेशी और मँहगी सिगरेट तुम्हारी है तो फिर इसका धुआँ भी तुम्हारा ही हुआ न? हम पर क्यों फेंक रहे हो? तुम्हारी सिगरेट तुम्हारी चीज है। इसलिए अपनी हर चीज संभाल कर रखो। इसका धुआँ हमारी ओर नहीं आना चाहिए। अगर इस बार धुआँ हमारी ओर मुड़ा तो सोच लेना कि तुम अपनी जबान से ही मुकर जाओगे। तुम्हारी चीज तुम्हारे पास ही रहनी चाहिए, चाहे वह सिगरेट हो या धुआँ।'
राजेंद्र प्रसाद का यह दो टूक जवाब सुनकर अंग्रेज दंग रह गया। उसे सबके सामने लज्जित होना पड़ा और उसने उसी क्षण वह सिगरेट बुझाकर फेंक दी। पूरे रास्ते वह मुँह झुकाकर बैठा रहा और समझ गया कि किसी पर व्यर्थ व्यंग्य करना भारी भी पड़ सकता है।
३-२-२०१४
***
मुक्तक
रचा पाँव में आलता,
कर-मेंहदी पूछे पता.
नाम लिखा छलिया हुआ-
कहो कहाँ-क्यों लापता?
*
अभिनव प्रयोग-
उल्लाला मुक्तक:
*
उल्लाला है लहर सा,
किसी उनींदे शहर सा.
खुद को खुद दोहरा रहा-
दोपहरी के प्रहर सा.
*
झरते पीपल पात सा,
श्वेत कुमुदनी गात सा.
उल्लाला मन मोहता-
शरतचंद्र मय रात सा..
*
दीप तले अँधियार है,
ज्यों असार संसार है.
कोशिश प्रबल प्रहार है-
दीपशिखा उजियार है..
*
मौसम करवट बदलता,
ज्यों गुमसुम दिल मचलता.
प्रेमी की आहट सुने -
चुप प्रेयसी की विकलता..
*
दिल ने करी गुहार है,
दिल ने सुनी पुकार है.
दिल पर दिलकश वार या-
दिलवर की मनुहार है..
*
शीत सिसकती जा रही,
ग्रीष्म ठिठकती आ रही.
मन ही मन में नवोढ़ा-
संक्रांति कुछ गा रही..
*
श्वास-आस रसधार है,
हर प्रयास गुंजार है.
भ्रमरों की गुन्जार पर-
तितली हुई निसार है..
*
रचा पाँव में आलता,
कर-मेंहदी पूछे पता.
नाम लिखा छलिया हुआ-
कहो कहाँ-क्यों लापता?
*
वह प्रभु तारणहार है,
उस पर जग बलिहार है.
वह थामे पतवार है.
करता भव से पार है..
३-२-२०१३
***
दोहा सलिला
दोहा-दर्पण में दिखे, देश-काल का सत्य.
देख सके तो देख ले, कितना कहाँ असत्य..
सुर नर मुनि सबने कहे दोहे, होकर मस्त.
असुर न दोहा कह सके, नष्ट हुए हो त्रस्त..
काव्य-गगन का सूर्य है, दोहा कीर्ति अनंत.
जो दोहे में लीन हो, उसका मन हो संत..
श्री वास्तव में समाहित, है दोहे में मीत.
स्नेह-सलिल की लहर बन, दोहा बाँटे प्रीत..
१८.१२.२००९

*** 

बुधवार, 7 अक्टूबर 2020

संस्मरण: सादगी और ईमानदारी की मिसाल राजेंद्र प्रसाद जी महादेवी वर्मा

संस्मरण: 
सादगी और ईमानदारी की मिसाल राजेंद्र प्रसाद जी 
महादेवी वर्मा 
*
कवियत्री महादेवी वर्मा जी का एक संस्मरण जो उन्होंने प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद जी के सादगी और कर्तव्यबोध के बारे में लिखा है ...
महादेवी वर्मा जी के शब्दों में :--
" मै एक बार राजेन्द्र प्रसाद जी के धर्मपत्नी जी के साथ राष्ट्रपति भवन में बैठी थी .. वो खुद खाना पका भी रही थी .. वो थाली के चावल बीनते मेरे से बात कर रही थी ... फिर जैसे ही उन्हें पता चला की मै इलाहबाद से हूँ तो उन्होंने मेरे से भोजपुरी में कहा " ये बहिनी हमके चाउर बीनले में बड़ा समय लालेगा .. राऊआ तो इलाहबाद के हई त एक ठो सुपा जवन यूपी अउर बिहार में मिलेला ऊ भेजवा देती त हमके बड़ा आराम रहत"
मतलब "बेटी मुझे चावल बीनने में बहुत समय लगता है ..आप तो इलाहबाद की है तो क्या आप मेरे लिए एक सुपा जो पूर्वी यूपी और बिहार में मिलता है वो भिजवा सकती है ?
महादेवी जी ने कहा क्यों नही .. फिर दो दो हप्तो के बाद दस सुपे लेकर उनके पास गयी .. संयोग से उस समय राजेन्द्र प्रशाद जी भी बैठे थे .. उनकी धर्मपत्नी जी ने सूप ले लिए ..
फिर जानते है बाद में क्या हुआ ??
राजेन्द्र प्रशाद जी के वो सारे सूप राष्ट्रपति भवन के सरकारी मालखाने में जमा करवा दिया ..और अपने धर्मपत्नी जी के कहा की तुम राष्ट्रपति की पत्नी हो तुमको जो भी भेंट मिलेगा वो सरकार का है हमारा नही ..
आज भी वो सारे सूप राष्ट्रपति भवन के मालखाने में रखे है ... और दर्शक एक बार उन्हें देखकर सोच में पड़ जाते है की आखिर ये सूप यहाँ क्यों रखे है

जीतेन्द्र प्रताप जी के सौजन्य से...!!