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सोमवार, 13 जुलाई 2026

जुलाई १३, शिला दिवस, सोरठे, सॉनेट, गुरु, सवैया, भाषा, कुंडलिया, हाइकु, पोयम, शिव, शक्ति

सलिल सृजन जुलाई १३
शिला दिवस
*
ग़ज़लिका . भोर भई रे! बदरी छाई। धरा-सूर्य की भइ कुड़माई।। . नखरेबारी बिजुरी नच रइ बदरा ने ढोलकी बजाई।। . सज-धज दादुर बनें बराती हरियाली कर रई पहुनाई।। . दरवज्जे पे ठांड़ी ऊसा हुलस उमग जी भर मुसकाई।। . पवन ससुर बाँटत नजराना सुनत बेड़ी तुरतइ धाई १३.७.२०२६ ०००
सोरठे
हृदय लिली के नाम, जब से किया गुलाब ने।
खुशियों के पैगाम, तबसे नित मिलने लगे।।
.
चैनो-अमन हराम, रजनीगंधा ने किया।
मुफ्त हुआ बदनाम, अमलतास बाजार में।।
.
कान पकड़ गुलफाम, माफी माँगे रात-दिन।
कर दी नींद हराम, नागफनी ने धौंस दे।।
.
करती काम तमाम, शौहर का दे सुपारी।
सबकी नींद हराम, कर दी गाजर घास ने।।
.
हुए विधाता वाम, भाग गई घर छोड़कर।
डुबा दिया कुलनाम, लिव इन में जा जुही ने।।
.
हाथ गैर का थाम, ठगी जा रही चमेली।
रुचा नहीं गृह-धाम, डायवोर्स खुश रही ले।
.
हैरां खासो-आम, हवा बदलती देखकर।
बहुएँ नींद हराम, करें ननदियां सांस की ।।
१२.७.२०२५
०0०
श, ष, स भेद , उच्चारण स्थान
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श ष स के उच्चारण भेद को बहुधा लोग नहीं जानते, यदि जानते भी होंगे तो जानबूझ त्रुटि करते हैं अथवा स्वाभविक सुगमतावश गलत उच्चारण होता है। संस्कृत ही एक मात्र व्यवस्थित जिसका विज्ञानपरक व्याकरण को समूचा विश्व अपनी आवश्यकतानुकूल ग्रहण कर रहा है। हमें समझना होगा उच्चारण स्थान को -
1 अकुहविसर्जनीयानां कण्ठः
क वर्ग (क, ख, ग, घ, ङ) अ, आ, ह और विसर्ग का उच्चारण स्थान कण्ठ है।
2 इचुयशानां तालुः
च वर्ग (च, छ, ज, झ, ´) इ, ई, य, श का उच्चारण स्थान तालु है। इसी आधार पर श के तालव्यी होने की पहचान सर्व विदित है।
3 ऋटुरषानां मूर्घाः
ट वर्ग (ट, ठ, ड, ढ, ण) ऋ, र, ष का उच्चारण स्थान मूर्धा है। इसी आधार पर ष के मूर्धन्नी होने की पहचान सर्व विदित है।
4 लृतुलसानां दन्तः
त वर्ग (त, थ, द, ध, ना) लृ, ल, स का उच्चारण स्थान दंत है। इसी आधार पर स के दन्ती होने की पहचान सर्व विदित है।
5 उपूपध्मानीयानामोष्ठौ
प वर्ग (प, फ, ब, भ, म) )( उ, ऊ का उच्चारण स्थान ओष्ठ है।
तालव्यी, मूर्धन्नी, दन्ती रूपी पहचान ही श,ष,स के भेद को प्रकट करती है। च वर्ग के फ्लो में जीभ का तालु से स्पर्श होते हुए निकलने वाली शकार ध्वनि तालव्यी है। टवर्ग के फ्लो में मुंह के खुलने से निकलने वाली षकार ध्वनि मूर्धन्नी है, जबकि त वर्ग के फ्लो में दंतपंक्तियों के परस्पर मिलने से होने वाली सकार ध्वनि दन्ती है।
*
सॉनेट
गट्टू
नटखट-चंचल है गट्टू,
करे शरारत जी भरकर,
सीधा-साधा है बिट्टू,
रहे मस्त पुस्तक पढ़कर।
तुहिना जीजी के प्यारे,
भैया सनी लड़ाते लाड़,
दादी के चंदा-तारे,
बब्बा करते जान निसार।
शैंकी जी को दुलराते,
धमाचौकड़ी करते खूब,
मिल चिंकी को दुलराते,
हिल-मिल रहें स्नेह में डूब।
खड़ी करें मिल सबकी खाट।
एक एक से बढ़कर ठाठ।।
१३-७-२०२३
•••
सॉनेट
प्राण निकलते गर्मी से, नवगीतों में गाया,
धरती की छाती फटती, सुन इंद्र देव पिघले,
झुलस रहा लू से तन-मन, सूरज को गरियाया,
रूठा छिपा मेघ पीछे, बोला जी भर जल ले।
हुई मूसलाधार वृष्टि, हो कुपित गिरी बिजली,
वन काटे रूठे पर्वत, हो गीले फिसल गिरे,
कर विनाश कहकर विकास, हँस राजनीति पगली,
अच्छे सोच बुरे दिन पा, जुमलों से लोग घिरे।
पानी मरा आँख का तो, तू पानी-पानी हो,
रौंद प्रकृति को ठठा रहा, पानी आँखों में भर,
भोग कर्म का दंड न अब, तुझसे नादानी हो,
हाय हाय क्यों करता है, गलती करने से डर।
गीत खुशी के मत बिसरा, गा बंबुलिया कजरी।
पूज प्रकृति को सुत सम तब देखे हालत सुधरी।।
१३-७-२०२३
•••
सॉनेट
गुरु
गुरु को नतशिर नमन करो रे!
गुरु की महिमा कही न जाए
गुरु ही नैया पार लगाए
गुरु पग रज पा अमन वरो रे!
गुरु वचनामृत पान करो रे!
गुरु शब्दों में सत्य समाहित
गुरु वाणी में अर्थ विराजित
गुरु का महिमा-गान करो रे!
गुरु का मन में मान करो रे!
गुरु-दर्पण में निज छवि देखो
गुरु-परखे तो निज सच लेखो
गुर-वचनों का ध्यान धरो रे!
गुरु को सत्-शिव सुंदर मानो
गुरु का खुद को चाकर मानो
१३-७-२०२२
रुद्राक्ष, गुलमोहर, भोपाल
•••
सॉनेट
गुरु
गुरु गुर सिखलाता है उत्तम
दिखलाता है राह हमेशा
हरता है अज्ञानजनित तम
दिलवाता है वाह हमेशा
लेता है गुरु कड़ी परीक्षा
ठोंक-पीटकर खोट निकाले
देता केवल तब ही दीक्षा
दीप-ज्योति अंतर में बाले
कहे दीप अपना खुद होओ
गिरकर रुको न, उठ फिर भागो
तम पी, उजियारा बो जाओ
खुद समर्थ हो भीख न माँगो
गुरु-वंदन कर शिष्य तर सके
अपनी मंजिल आप वर सके
१३-७-२०२२
रुद्राक्ष, गुलमोहर, भोपाल
•••
नवान्वेषित द्वि इंद्रवज्रा सवैया
२ x (त त ज ग ग), २२ वर्ण, सम पदांत।
*
दूरी मिटा दे मिल ले गले आ, श्वासें करेंगी मनुहार तेरा।
आँखें मिलीं तो हट ही न पाई, आसें बनेंगी गलहार तेरा।
तू-मैं किनारे नद के भले हों, है सेतु प्यारी शुभ प्यार तेरा।
पूरा करेंगे हम वायदों को, जीना मुझे है बन हार तेरा।
१३-७-२०१९
***
भाषा व्याकरण
*
*ध्वनि*
कान सुन रहे वह ध्वनि, जो प्रकृति में व्याप्त।
अनहद ध्वनि गुंजरित है, सकल सृष्टि में आप्त।।
*
*रसानुभूति*
ध्वनि सुनकर प्रतिक्रिया हो, सुख-दुख की अनुभूति।
रस अनुभूति सजीव को, जड़ को हो न प्रतीति।।
*
*उच्चार*
जो स्वतंत्र ध्वनि बोलते, वह ही है उच्चार।
दो प्रकार लघु-गुरु कहें, इनको मात्रा भार।।
*
*अर्थ*
ध्वनि सुनकर जो समझते, उसको कहते अर्थ।
अगर न उसका भान तो, बनता अर्थ अनर्थ।।
*
*सार्थक ध्वनि*
कलकल कलरव रुदन में, होता निश्चित अर्थ।
शेर देख कपि हूकता, दे संकेत न व्यर्थ।।
*
*निरर्थक ध्वनि*
अंधड़ या बरसात में, अर्थ न लेकिन शोर।
निरुद्देश्य ध्वनि है यही, मंद या कि रव घोर।।
*
*सार्थक ध्वनि*
सार्थक ध्वनियाँ कह-सुनें, जब हम बारंबार।
भाव-अर्थ कह-समझते, भाषा हो साकार।।
*
*भाषा*
भाषा वाहक भाव की, मेटे अर्थ अभाव।
कहें-गहें हम बात निज, पड़ता अधिक प्रभाव।।
*
*लिपि*
जब ध्वनि को अंकित करें देकर चिन्ह विशेष।
चिन्ह देख ध्वनि विदित हो, लिपि विग्यान अशेष।।
*
*अक्षर*
जो घटता-कमता नहीं,
ऐसा ध्वनि-संकेत।
अक्षर अथवा वर्ण से,
यही अर्थ अभिप्रेत।।
*
*मात्रा*
लघु-गुरु दो उच्चार ही, लघु-गुरु मात्रा मीत।
नीर-क्षीर वत वर्ण से, मिल हों एक सुनीत।।
*
*वर्ण माला*
अक्षर मात्रा समुच्चय, रखें व्यवस्थित आप।
लिख-पढ़ सकते हैं सभी, रखें याद कर जाप।।
*
*शब्द*
वर्ण जुड़ें तो अर्थ का, और अधिक हो भान।
अक्षर जुड़कर शब्द हों, लक्ष्य एकता जान।।
*
*रस*
स्वाद भोज्य का सार है, गंध सुमन का सार।
रस कविता का सार है, नीरस बेरस खार।।
*
*रस महिमा*
गो-रस मधु-रस आम्र-रस,
गन्ना रस कर पान।
जौ-रस अंगूरी चढ़़े, सिर पर बच मतिमान।।
.
बतरस, गपरस दे मजा, नेतागण अनजान।
निंदारस में लीन हों, कभी नहीं गुणवान।।
.
पी लबरस प्रेमी हुए, धन्य कभी कुर्बान।
संजीवित कर काव्य-रस, फूँके सबमें प्राण।।
*
*अलंकार*
पत्र-पुष्प हरितिमा है, वसुधा का श्रृंगार।
शील मनुज का; शौर्य है, वीरों का आचार।।
.
आभूषण प्रिय नारियाँ, चला रहीं संसार।
गह ना गहना मात्र ही, गहना भाव उदार।।
.
शब्द भाव रस बिंब लय, अर्थ बिना बेकार।
काव्य कामिनी पा रही, अलंकार सज प्यार।।
.
शब्द-अर्थ संयोग से, अलंकार साकार।
मम कलियों का मोहकर, हरे चित्त हर बार।।
*
*ध्वनि खंड*
कुछ सार्थक उच्चार मिल, बनते हैं ध्वनि खंड।
ध्वनि-खंडों के मिलन से, बनते छंद अखंड।।
*
*छंद*
कथ्य भाव रस बिंब लय, यति पदांत मिल संग।
अलंकार सज मन हरें, छंद अनगिनत रंग।।
*
*पिंगल*
वंदन पिंगल नाग ऋषि, मिला बीन फुँफकार।
छंद-शास्त्र नव रच दिया, वेद-पाद रस-सार।।
*
*पाद*
छंद-पाद हर पंक्ति है, पग-पग पढ़-बढ़ आप।
समझ मजा लें छंद का, रस जाता मन व्याप।।
*
*चरण*
चरण पंक्ति का भाग है, कदम-पैर संबंध।
द्वैत मिटा अद्वैत वर, करें सहज अनुबंध।।
*गण*
मिलें तीन उच्चार जब, तजकर लघु-गुरु भेद।
अठ गण बन मिल-जुल बनें, छंद मिटा दें खेद।।
.
यमत रजभ नस गण लगग, गगग गगल के बाद।
गलग लगल फिर गलल है, ललल ललग आबाद।।
*वाक्*
वाक् मूल है छंद का, ध्वनि-उच्चार स-अर्थ।
अर्थ रहित गठजोड़ से, रचना करे अनर्थ।।
*
*गति*
निर्झर-नीर-प्रवाह सम, तीव्र-मंद हो पाठ।
गति उच्चारों की सधे, कवि जनप्रियता हों ठाठ।।
.
कथ्य-भाव अनुरूप हो, वाक्-चढ़ाव-उतार।
समय कथ्य जन ग्राह्य हो, करतल गूँज अपार।।
*
*यति*
कुछ उच्चारों बाद हो, छंदों में ठहराव।
है यति इसको जानिए, यात्रा-मध्य पड़ाव।।
.
यति पर रुककर श्वास ले, पढ़िए लंबे छंद।
कवित-सवैया का बढ़े, और अधिक आनंद।।
.
श्वास न उखड़े आपकी, गति-यति लें यदि साध।
शुद्ध रखें उच्चार तो, मिट जाए हर व्याध।।
*
*उप यति*
दो विराम के मध्य में, निश्चित जो न विराम।
स्थिर न रहें- जो बदलते, उपरति उनका नाम।।
*
*विराम चिह्न*
मध्य-अंत में पाद के, यति संकेत-निशान।
रखता कवि पाठक सके, उनको झट पहचान।।
*
विस्मय संबोधन कहाँ, कहाँ प्रश्न संकेत।
कहाँ उद्धरण या कथन, चिन्हों का अभिप्रेत।।
१२-७-२०१९
***
एक रचना:
*
मन-वीणा पर चोट लगी जब,
तब झंकार हुई.
रिश्तों की तुरपाई करते
अँगुली चुभी सुई.
खून जरा सा सबने देखा
सिसक रहा दिल मौन?
आँसू बहा न व्यर्थ
पीर कब,
बाँट सका है कौन?
१३-७-२०१८
*
दोहा सलिल- रूप धूप का दिव्य
*
धूप रूप की खान है, रूप धूप का दिव्य।
छवि चिर-परिचित सनातन, पल-पल लगती नव्य।।
*
रश्मि-रथी की वंशजा, या भास्कर की दूत।
दिनकर-कर का तीर या, सूर्य-सखी यह पूत।।
*
उषा-सुता जग-तम हरे, घोर तिमिर को चीर।
करती खड़ी उजास की, नित अभेद्य प्राचीर।।
*
धूप-छटा पर मुग्ध हो, करते कलरव गान।
पंछी वाचिक काव्य रच, महिमा आप्त बखान।।
*
धूप ढले के पूर्व ही, कर लें अपने काम।
संध्या सँग आराम कुछ, निशा-अंक विश्राम।।
*
कलियों को सहला रही, बहला पत्ते-फूल।
फिक्र धूप-माँ कर रही, मलिन न कर दे धूल।।
*
भोर बालिका; यौवना, दुपहर; प्रौढ़ा शाम।
राग-द्वेष बिन विदा ले, रात धूप जप राम।।
*
धूप राधिका श्याम रवि, किरण गोपिका-गोप।
रास रचा निष्काम चित, करें काम का लोप।।
*
धूप विटामिन डी लुटा, कहती- रहो न म्लान।
सूर्य-़स्नान कर स्वस्थ्य हो, जीवन हो वरदान।।
*
सलिल-लहर सँग नाचती, मोद-मग्न हो धूप।
कभी बँधे भुजपाश में, बाँधे कभी अनूप।।
*
रूठ क्रोध के ताप से, अंशुमान हो तप्त।
जब तब सोनल धूप झट, हँस दे; गुस्सा लुप्त।।
*
आशुतोष को मोहकर, रहे मेघ ना मौन।
नेह-वृष्टि कर धूप ले, सँग-सँग रोके कौन।।
*
धूप पकाकर अन्न-फल, पुष्ट करे बेदाम।
अनासक्त कर कर्म वह, माँगे दाम न नाम।।
*
कभी न ब्यूटीपारलर, गई एक पल धूप।
जगती-सोती समय पर, पाती रूप अनूप।।
*
दिग्दिगंत तक टहलती, खा-सो रहे न आप।
क्रोध न कर; हँसती रहे, धूप न करे विलाप।।
१३-७-२०१८
***
कुंडलिया
*
विधान: एक दोहा + एक रोला
अ. २ x १३-११, ४ x ११-१३ = ६ पंक्तियाँ
आ. दोहा का आरंभिक शब्द या शब्द समूह रोला का अंतिम शब्द या शब्द समूह
इ. दोहा का अंतिम चरण, रोला का प्रथम चरण
*
परदे में छिप कर रहे, हम तेरा दीदार।
परदा ऐसा अनूठा, तू भी सके निहार।।
तू भी सके निहार, आह भर, देख हम हँसे।
हँसे न लेकिन फँसे, ह्रदय में शूल सम धँसे।।
मुझ पर मर, भर आह, न कहना कर में कर दे।
हो जा तू संजीव, हटाकर आ जा परदे।।
१४-७-२०१७
***
हाइकु सलिला
*
कल आएगा?
सोचना गलत है
जो करो आज।
*
लिखो हाइकु
कागज़-कलम ले
हर पल ही।
*
जिया में जिया
हर पल हाइकु
जिया ने रचा।
*
चाह कलम
मन का कागज़
भाव हाइकु।
*
शब्द अनंत
पढ़ो-सुनो, बटोरो
मित्र बनाओ।
*
शब्द संपदा
अनमोल मोती हैं
सदा सहेजो।
*
श्वास नदिया
आस नद-प्रवाह
प्रयास नौका।
*
ध्यान में ध्यान
ध्यान पर न ध्यान
तभी हो ध्यान।
*
मुक्ति की चाह
रोकती है हमेशा
मुक्ति की राह।
*
खुद से ऊब
कैसे पायेगा राह?
खुद में डूब।
***
एक कुण्डलिया
औकात
अमिताभ बच्चन-कुमार विश्वास प्रसंग
*
बच्चन जी से कर रहे, क्यों कुमार खिलवाड़?
अनाधिकार की चेष्टा, अच्छी पड़ी लताड़
अच्छी पड़ी लताड़, समझ औकात आ गयी?
क्षमायाचना कर न समझना बात भा गयी
रुपयों की भाषा न बोलते हैं सज्जन जी
बच्चे बन कर झुको, क्षमा कर दें बच्चन जी
१३-७-२०१७
***
मुक्तक
था सरोवर, रह गया पोखर महज क्यों आदमी?
जटिल क्यों?, मिलता नहीं है अब सहज क्यों आदमी?
काश हो तालाब शत-शत कमल शतदल खिल सकें-
आदमी से गले मिलकर 'सलिल' खुश हो आदमी।।
१३-७-२०१६
***
पुस्तक सलिला-
स्व. श्याम़ श्रीवास्तव गीत-नवगीत ‘यादों की नागफनी’
आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
[पुस्तक परिचय- यादों की नागफनी, गीत संग्रह, स्व. श्याम़ श्रीवास्तव, प्रथम संस्करण २०१६, आकार २१.५ से.मी. x १४ से.मी., आवरण बहुरंगी पेपरबैक लेमिनेटेड, पृष्ठ ६२, मूल्य १५० रु., शैली प्रकाशन, २०सहज सदन, शुभम विहार, कस्तूरबा मार्ग, रतलाम, संपादन- डाॅ. सुमनलता श्रीवास्तव sumanshrivastava2003@yahoo.com ]
00000
‘यादों की नागफनी’सनातन सलिला नर्मदा के तट पर बसी संस्कारधानी जबलपुर के लाड़ले रचनाकार स्व. श्याम़ श्रीवास्तव की प्रतिनिधि रचनाओं का संकलन है जिसे उनके स्वजनों ने अथक प्रयास कर उनके ७५ वें जन्म दिवस पर प्रकाशित कर उनके सरस-सरल व्यक्तित्व को पुनः अपने बीच महसूसने का श्लाघ्य प्रयास किया। स्व. श्याम ने कभी खुद को कवि, गायक, गीतकार नहीं कहा या माना, वे तो अपनी अलमस्ती में लिखते - गाते रहे। आकाशवाणी ए ग्रेड कलाकार कहे या श्रोता उनके गीतों-नवगीतों पर वाह-वाह करें, उनके लिये रचनाकर्म हमेशा आत्मानंद प्राप्ति का माध्यम मा़त्र रहा। आत्म में परमात्म को तलाशता-महसूसता रचनाकार विधाओं और मानकों में बॅंधकर नहीं लिखता, उसके लिखे में कहाॅं-क्या बिना किसी प्रयास के आ गया यह उसके जाने के बाद देखा-परखा जाता है।
यादों की नागफनी में गीत-नवगीत, कविता तीेनों हैं। श्याम का अंदाज़े-बयाॅं अन्य समकालिकों से जुदा है-
‘‘आकर अॅंधेरे घर में / चौंका दिया न तुमने
मुझको अकेले घर में / मौका दिया न तुमने
तुम दूर हो या पास /क्यों फर्क नहीं पड़ता?
मैं तुमको गा रहा हूॅं / हूॅंका दिया न तुमने
‘जीवन इक कुरुक्षेत्र’ में श्याम खुद से ही संबोधित हैं- "जीवन / इक कुरुक्षेत्र है / मैं अकेला युद्ध लड़ रहा /अपने ही विरुद्ध लड़ रहा ......... शांति / अहिंसा क्षमा को त्याग / मुझमें मेरा बुद्ध लड़ रहा।"
यह बुद्ध आजीवन श्याम की ताकत भी रहा और कमजोरी भी। इसने उन्हें बड़े से बड़े आघात को चुपचाप सहने और बिल्कुल अपनों से मिले गरल को पीने में सक्षम बनांया तो अपने ‘स्व’ की अनदेखी करने की ओर प्रवृत्त किया। फलतः, जमाना ठगकर खुश होता रहा और श्याम ठगे जाकर।
श्याम के नवगीत किसी मानक विधान के मोहताज नहीं रहे। आनुभूतिक संप्रेषण को वरीयता देते हुए श्याम ‘कविता कोख में’ शीर्षक नवगीत में संभवतः अपनी और अपने बहाने हर कवि की रचना प्रक्रिया का उल्लेख करते हैं।
तुमने जब / समर्पण किया
धरती आसमान मुझे / हर जगह क्षितिज लगे।
छुअन - छुअन मनसिज लगे।
कविता आ गई कोख में।
वैचारिक लयता / उगी /मिटटी पगी
राग के बयानों की/भाषा जगी
छंद-छंद अलंकार- पोषित हुए
नव रसों को ले कूदी /चिंतन मृगी
सृष्टि का / अर्पण किया
जनपद की खान मुझे
समकालिक क्षण खनिज लगे।
कथ्य उकेरे स्याहीसोख में।
कविता आ गई कोख में।
श्याम के श्रृंगारपरक गीत सात्विकता के साथ-साथ सामीप्य की विरल अनुभूति कराते हैं। ‘नमाज़ी’शीर्षक नवगीत श्याम की अन्वेषी सोच का परिचायक है-
पूर्णिमा का चंद्रमा दिखा
विंध्याचल-सतपुड़ा से प्रण
पत्थरों से गोरे आचरण
नर्मदा का क्वांरापन नहा
खजुराहो हो गये हैं क्षण
सामने हो तुम कुरान सी
मैं नमाज़ी बिन पढ़ा-लिखा
‘बना-ठना गाॅंव’ में श्याम की आंचलिक सौंदर्य से अभिभूत हैं। उरदीला गोदना, माथे की लट बाली, अकरी की वेणी, मक्का सी मुस्कान, टिकुली सा फूलचना, सरसों की चुनरिया, अमारी का गोटा, धानी किनार, जुन्नारी पैजना, तिली कम फूल जैसे कर्णफूल, अरहर की झालर आदि सर्वथा मौलिक प्रतीक अपनी मिसाल आप हैं। समूचा परिदृश्य श्रोता/पाठक की आॅंखों के सामने झूलने लगता है।
गोरी सा / बना-ठना गाॅंव
उरदीला गोदना गाॅंव।
माथे लट गेहूॅं की बाली
अकरी ने वेणी सी ढाली,
मक्का मुस्कान भोली-भाली
टिकुली सा फूलचना गाॅंव।
सरसों की चूनरिया भारी
पल्लू में गोटा अमारी,
धानी-धानी रंग की किनारी
जुन्नारी पैंजना गाॅंव।
तिली फूल करनफूल सोहे
अरहर की झालर मन मोहे,
मोती अजवाइन के पोहे।
लौंगों सा खिला धना गाॅंव।
श्रेष्ठ-ज्येष्ठ गीतकार स्व, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ ने श्याम की रचनाओं को ‘विदग्ध, विलोलित, विभिन्न आयामों से गुजरती हुई अनुभूति के विरल क्षणों को समेटने में समर्थ, पौराणिक संदर्भों के साथ-साथ नई उदभावनाओं को सॅंजोने में समर्थ तथा भावना की आॅंच में ढली भाषा से संपन्न‘’ ठीक ही कहा है। किसी रचनाकार के महाप्रस्थान के आठ वर्ष पश्चात भी उसके सृजन को केंद्र में रखकर सारस्वत अनुष्ठान होना ही इस बात का परिचायक है कि उसका रचनाकर्म जन-मन में पैठने की सामथ्र्य रखता है। स्व. रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ के अनुसार ‘‘कवि का निश्छल सहज प्रसन्न मन अपनम कथ्य के प्रति आश्वस्त है और उसे अपनी निष्ठा पर विश्वास है। पुराने पौराणिक प्रतीकों की भक्ति तन्मयता को उसने अपनी रूपवर्णना और प्रमोक्तियों में नये रूप् में ढालकर उन्हें नयी अर्थवत्ता प्रदान की हैं।’’
श्याम के समकालीन चर्चित रचनाकारों सर्व श्री मोहन शशि, डाॅ. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’, संजीव वर्मा ‘सलिल’ की शब्दांजलियों से समृद्ध और श्रीमती पुष्पलता श्रीवास्तव, माधुरी श्रीवास्तव, मनोज श्रीवास्तव, रचना खरे तथा सुमनलता श्रीवास्तव की भावांजलियों से रससिक्त हुआ यह संग्रह नयी पीढ़ी के नवगीतकारों ही नहीं तथाकथित समीक्षकों और पुरोधाओं को नर्मदांचल के प्रतिनिधि गीतकार श्याम श्रीवास्तव के अवदान सें परिचित कराने का सत्प्रयास है जिसके लिये शैली निगम तथा मोहित श्रीवास्तव वास्तव में साधुवाद के पात्र हैं।
श्याम सामाजिक विसंगतियों पर आघात करने में भी पीछे नहीं हैं। "ये रामराजी किस्से / जनता की सुख-कथाएॅं / भूखे सुलाते बच्चों को / कब तलक सुनायें", "हम मुफलिस अपना पेट काट / पत्तल पर झरकर परस रहे", "गूँथी हुई पसीने से मजदूर की रोटी, पेट खाली लिये गीत गाता रहा" आदि अनेक रचनाएॅं इसकी साक्षी हैं।
तत्सम-तदभव शब्द प्रयोग की कला में कुशल श्याम श्रीवास्तव हिंदी, बुंदेली, उर्दू, अंग्रेजी के शब्दों को भाव-भंगिमाओं की टकसाल में ढालकर गीत, नवगीत, ग़ज़ल, कविता के खरे सिक्के लुटाते चले गये। समय आज ही नहीं, भविष्य में भी उनकी रचनाओं को दुहराकर आश्वस्ति की अनुभूति करता रहेगा।
***
मुक्तिका:
*
जिसे भी देखिये वो बात कर रहा प्रहार की
नहीं किसी को फ़िक्र तनिक है यहाँ सुधार की
सुबह से शाम चीखते ही रह गये न बात की
दूरदर्शनी बहस न आर की, न पार की
दक्षिणा लिये बिना टले न विप्र द्वार से
माँगता नगद न बात मानता उधार की
सियासती नुमाइशें दिखा रही विधायिका
नफरतों ने लीं वसूल कीमतें गुहार की
बाँध बनाने की योजना बना रहे हो तुम
ज़िक्र कर नहीं रहे हो तुम तनिक दरार की
***
1. Water
There is an ocean
In every drop of water.
Can you see it?
There is a life
In every drop of water
Can you live it?
There is a civilization
In every drop of water
Can you save it?
If not:
See by Heart and not through Eyes
You will certainly notice that
There is Past
There is Present
There is Future
There is Culture
In every drop of water.
If You will forget Heart
And will see through Eyes
You will say with fear that
There is flood
There is death
There is an end.
It depend upon you
What do you want to see?
Try to be neat, clean and
Transparent as Water.
Then only You will be
Able to witness
Water in it's reality & totality.
***
विमर्श
शिव, शक्ति और सृष्टि
सृष्टि रचना के सम्बन्ध में भारतीय दर्शन में वर्णित एक दृष्टान्त के अनुसार शिव निद्रालीन थे. शिव के साथ क्रीड़ा (नृत्य) करने की इच्छा लिये शक्ति ने उन्हें जाग्रत किया. आरंभ में शिव नहीं जागे किन्तु शक्ति के सतत प्रयास करने पर उग्र रूप में गरजते हुए क्रोध में जाग्रत हुए. इस कारण उन्हें रूद्र (अनंत, क्रोधी, महाकाल, उग्ररेता, भयंकर, क्रंदन करने वाला) नाम मिला। शिव ने शक्ति को देखा, वह शक्ति पर मोहित हो उठ खड़े हुए. शक्ति के प्रेम के कारण वे शांत होते गये. उन्होंने दीर्घवृत्ताभ (इलिप्सॉइड) का रूप लिया जिसे लिंग (स्वगुण, स्वभाव, विशेषता, रूप) कहा गया.
शिव कोई सशरीर मानव या प्राणी नहीं हैं. शिव का अर्थ है निर्गुण, गुणातीत, अक्षर, अजर, अमर, अजन्मा, अचल, अज्ञेय, अथाह, अव्यक्त, महाकाल, अकर्ता आदि. शिव सृष्टि-कर्ता भी हैं. शक्ति सामान्य ताकत या बल नहीं हैं. शक्ति का अर्थ आवेग, ऊर्जा, ओज, प्राण, प्रणोदन, फ़ोर्स, एनर्जी, थ्रस्ट, त्रिगुणा, माया, प्रकृति, कारण आदि है. शिव अर्थात “वह जो है ही नहीं”। जो सुप्त है वह होकर भी नहीं होता। शिव को हमेशा श्याम बताया गया है. निद्रावस्था को श्याम तथा जागरण को श्वेत या उजला कहकर व्यक्त किया जाता है.
शक्ति के उपासकों को शाक्त कहा जाता है. इस मत में ईश्वर की कल्पना स्त्री रूप में कर उसे शक्ति कहा गया है. शक्ति के आनंदभैरवी, महाभैरवी, त्रिपुरसुंदरी, ललिता आदि नाम भी हैं.
विज्ञान सृष्टि निर्माण के कारक को बिग-बैंग कहता है और भारतीय दर्शन शिव-शक्ति का मिलन. विज्ञान के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति के पीछे डार्क मैटर और डार्क इनर्जी की भूमिका है. योग और दर्शन के अनुसार डार्क मैटर (शिव) और डार्क एनर्जी (महाकाली) का मिलन ही सृष्टि-उत्पत्ति का कारण है. स्कॉटिश यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के अनुसार डार्क मैटर और डार्क एनर्जी के बीच संबंध (लिंक) है. पहले वे इन्हें भिन्न मानते थे अब अभिन्न कहते हैं. विज्ञान के अनुसार डार्क मैटर और डार्क इनर्जी के मिलन से एक विस्फोट नहीं विस्फोटों की श्रृंखला उत्पन्न होती है. क्या यह विस्फोट श्रंखला जागकर क्रुद्ध हुए शिव के हुंकारों की ध्वनि है?
वैज्ञानिकों के अनुसार आरम्भ में समूची सृष्टि दीर्घवृत्ताभ आकार के विशाल गैस पिंड के रूप में गर्जना कर रही थी. धीरे-धीरे वह गैसीय पिंड ठंडा होता गया. शीतल होने की प्रक्रिया के कारण इस जगत की रचना हुई. योग कहता है कि जब शक्ति ने शिव को जगा दिया तो वह गुस्से में दहाड़ते हुए उठे। वह कुछ समय के लिये रूद्र बन गये थे. शक्ति को देखकर उनका गुस्सा ठंडा हुआ. शक्ति पर मोहित होकर वह दीर्घवृत्ताभ बन गये, जिसे लिंग कहा गया.
वैज्ञानिक बड़ा धमाकों के बाद की स्थिति एक खंभे की तरह बताते हैं, जिसमें ऊपर के सिरे पर छोटे-छोटे मशरूम लगे हैं. यह ठीक वैसा है जैसा योग-विद्या में बताया गया है. सृष्टि दीर्घवृत्त के आकार में है, जो ऊष्मा, गैसों के फैलाव और संकुचन तथा उनके द्रव्यमान की सघनता पर निर्भर है. इसका ज्यादातर हिस्सा खाली है जिसमें द्रव्य कण, तारे, ग्रह और आकाशीय पिंड बिखरे हुए हैं। सम्भवत:ज्यादातर चीजें अब तक आकार नहीं ले सकी हैं।
विज्ञान जो बात अब समझा है, उसे दर्शन बहुत पहले समझा चुका था। यह शरीर भी वैसे ही है, जैसे कि यह संपूर्ण सृष्टि। पेड़ के तने में बने छल्लों से पेड़ के जीवन-काल में धरती पर घटित हर घटना का ज्ञान हो सकता है. मानव शरीर में अन्तर्निहित ऊर्जा से साक्षात हो सके तो ब्रह्मांड के जन्म और विकास की झाँकी अपने भीतर ही मिल सकती है।
संदर्भ:
१. हिंदी साहित्य कोष, सं. डॉ. धीरेन्द्र वर्मा, डॉ. ब्रजेश्वर वर्मा, डॉ. धर्मवीर भारती, श्री रामस्वरूप चतुर्वेदी, डॉ. रघुवंश
२. बृहत् हिंदी कोष सं. कलिका प्रसाद, राजवल्लभ सहाय, मुकुन्दीलाल श्रीवास्तव
३. समान्तर कोष, अरविन्द कुमार, कुसुम कुमार,
१३-७-२०१५
***
गीतः
सुग्गा बोलो
*
सुग्गा बोलो
जय सिया राम...
*
काने कौए कुर्सी को
पकड़ सयाने बन बैठे
भूल गये रुकना-झुकना
देख आईना हँस एँठे
खिसकी पाँव तले धरती
नाम हुआ बेहद बदनाम...
*
मोहन ने फिर व्यूह रचा
किया पार्थ ने शर-सन्धान
कौरव हुए धराशायी
जनगण सिद्ध हुआ मतिमान
खुश मत हो, सच याद रखो
जन-हित बिन होगे गुमनाम...
*
हर चूल्हे में आग जले
गौ-भिक्षुक रोटी पाये
सांझ-सकारे गली-गली
दाता की जय-जय गाये
मौका पाये काबलियत
मेहनत पाये अपना दाम...
*
***
गीत:
हम मिले…
*
हम मिले बिछुड़ने को
कहा-सुना माफ़ करो...
*
पल भर ही साथ रहे
हाथों में हाथ रहे.
फूल शूल धूल लिये-
पग-तल में पाथ रहे
गिरे, उठे, सँभल बढ़े
उन्नत माथ रहे
गैरों से चाहो क्योँ?
खुद ही इन्साफ करो...
*
दूर देश से आया
दूर देश में आया
अपनों सा अपनापन
औरों में है पाया
क्षर ने अक्षर पूजा
अक्षर ने क्षर गाया
का खा गा, ए बी सी
सीन अलिफ काफ़ करो…
*
नर्मदा मचलती है
गोमती सिहरती है
बाँहों में बाँह लिये
चाह जब ठिठकती है
डाह तब फिसलती है
वाह तब सँभलती है
लहर-लहर घहर-घहर
कहे नदी साफ़ करो...
१३-७-२०१४
***
एक कविता:
सीखते संज्ञा रहे...
*
सीख पाए हम न संज्ञा.
बन न पाए सर्वनाम.
क्रिया कैसी?
क्या विशेषण?
कहाँ है कर्ता अनाम?
कर न पाए
साधना हम
वंदना ना प्रार्थना.
किरण आशा की लिये
करते रहे शब्द-अर्चना.
साथ सुषमा को लिये
पुष्पा रहे रचना कमल.
प्रेरणा देती रहें
नित भावनाएँ नित नवल.
****

१३-७-२०११ 

मंगलवार, 26 मई 2026

मई २७, संवाद कथाएँ, नीबू, सॉनेट, दोहा, मिर्च, स्वास्थ्य, नवगीत, प्रकृति, बुंदेली, ग़ज़ल, कुंडलिया

सलिल सृजन मई २७ 
आज की संवाद कथाएँ
१. फर्ज
*
''आपका कुत्ता चाहे जब भौंकता रहता है, उसका ध्यान रखिए और पौधों में पानी रोज डालिए।'' बात-बेबात हर किसी को नसीहत देनेवाले पड़ोसी ने कहा।

''धन्यवाद। आप बिल्कुल ठीक कह रहे है। आपकी लड़की पड़ोस के लड़के के साथ आपको बिना बताए भाग गई थी और लड़का जुआँ खेलते हुए पकड़ गया था। आप भी कृपया, बच्चों का ध्यान रखा कीजिए''। मैंने अच्छे पड़ोसी का फर्ज निभाते हुए कहा।
***

२. नकाब
*
''तुम कंजूस ही नहीं, पक्के मक्खी चूस भी हो, न ब्याह की साल गिरह, न पोते का जन्म दिन, न बेटे की पदोन्नति किसी मौके पर दोस्तों को कुछ खिलते-पिलाते नहीं।'' दोस्तों ने शिकायत की।

रूस-यूक्रेन, इस्राइल-ईरान, रेल दुर्घटना, क्रूज डूबने, भु स्खलन आदि में निरंतर हो रही अकाल मौतों की ओर इशारा करते हुए मैंने कहा '' हंसुआ के ब्याह में खुरपा के गीत नहीं गाए जाते, मरनी पर सोहर नहीं गाया जाता, घर में आग लगी हो चुटकुले नहीं सुनाए जाते।''

''तुम्हें इस सबसे क्या लेना-देना?'' रोज दूरदर्शन पर विश्व एक नीड़ है पर गर्व होने की घोषणा करनेवाले नेता ने कहा और विश्व मानवता के लिए खुद को समर्पित बतानेवाले पत्रकार ने अविलंब उनका समर्थन किया।

मैं अवाक हो देखता रह गया उनके चेहरे पर लगे नकाब।
***

३. मर्द
*
''एक अदना से देश की अदना सी पत्रकार की यह मजाल कि विश्व के सबसे महान लोकतंत्र और विश्व गुरु कहलाने देश के महाबली प्रधान मंत्री से प्रश्न पूछे?'' सत्ता पक्ष के प्रवक्ता दूरदर्शनी बहस में आग बबूला हो रहे थे।

''प्रश्न ही तो पूछा था, क्या यह बेहतर न होता कि माननीय प्रधान मंत्री जी शालीनतापूर्वक उत्तर दे देते या उन्हें कुछ नहीं कहना है यही कहते।'' अन्य दल के प्रवक्ता ने कहा।

''क्यों उत्तर देते, वह पत्रकार दुश्चरित्र है, देखिए कैसी पोशाक पहने है?'' प्रश्न पूछनेवाली युवा पत्रकार का बिकनी पहने चित्र दिखाते हुए भारतीय संस्कृति और नैतिकता की दुहाई देते हुए नेता जी ने फरमाया।

''इसमें चरित्र की बात कहाँ से आ गई? बिकनी समुद्र तट पर स्नान करते समय आम तौर से पहनी जाती है वहाँ, संभ्रांत महिलाएँ भी पहनती हैं।'' उद्घोषक ने हस्तक्षेप किया।

''इससे हमें क्या लेना-देना? हमारे देश में मर्यादा का पालन सर्वोपरि है।''

''तो फिर आप सार्वजनिक स्थल पर केवल अंतर्वस्त्र पहन कर चित्र क्यों खिंचाते हैं वह भी महिलाओं की भीड़ में?'' एक अन्य वक्ता ने संस्कृति के तथाकथित दावेदार का छोटी सी जाँघिया पहने चित्र दिखाया जिसमें वे अनेक महिलाओं से घिरे हुए नदी को चूनर चढ़ाने जा रहे थे।

''तो क्या हुआ मैं मर्द हूँ?'' उत्तर मिला।
***

४. समाज का सच 
*
एक साहित्यिक आयोजन में वरिष्ठ समीक्षक समीक्षक चिंता व्यक्त कर रहे थे साहित्य में पूरी तरह नकरात्मकता भरी है। रचनाकार भक्ति, नैतिकता, संस्कार, धर्म, संस्कृति की चिंता ही नहीं करते। देश का इतना विकास हुआ है, अयोध्या, काशी, मथुरा, उज्जैन, सोमनाथ जाकर देखिए, आपकी आँखें खुली की खुली रह जाएँगी।

आँखें तो आपकी खुली रह जाएँगी, कभी विश्व विद्यालय के वातानुकूलित कमरे से निकलकर देखिए झुग्गी-बस्तियों में नंग-धड़ंग भटकते शैशव, निरक्षर बचपन, भूख के मारे अपराधी बन रहे कैशोर्य और नशे की गिरफ्त में पड़े यौवन को। यह समाज का सच है जिससे समीक्षक आँख मूँदे हुए हैं।   
***

५. साहित्य और समाज 
*
''साहित्य समाज का दर्पण होता है। जैसा समाज होगा वैसा ही साहित्य रचा जाएगा। समाज में शोषण है, दर्द है, दुख है तो उसकी व्यथा-कथा ही लिखी जाएगी साहित्य में।'' प्राध्यापक ने कहा। 

''निवेदन है कि साहित्य को समाज का दर्पण कहकर उसकी भूमिका को कब तक हाशिए पर रखा जाएगा? दर्पण बिम्ब का प्रतिबिंब मात्र दिखाता है वह भी बाएँ को दायाँ और दायें को बायाँ दिखाता है। साहित्य आइस नहीं करता। साहित्य समाज को प्रभावित करता है, बदलता है, क्रांति कराता है, साहित्य को समाज का दर्पण कहना साहित्य का अपमान करना है, वस्तुत: साहित्य समाज का प्रेरक, उन्नायक और निर्माता भी होता है।'' एक विद्यार्थी बोल पड़ा।  

उस विद्यार्थी को आग्नेय नेत्रों से घूरते हुए प्राध्यापक ने कक्षा छोड़ दी।
***  
छंद शाला 
दोहा+रोला = कुंडलिया 
*
नयन रुदन करने लगे, ले ले लम्बी साँस। 
मध्य हृदय में फँस गयी, नयन बाँस की फाँस।। - अशोक व्यग्र 
नयन बाँस की फाँस, निकाले नहीं निकलती। 
खुलें या कि हों बंद, नयन में फाँस कसकती।। 
कहें न कड़वे कभी, उर में चुभते हैं बयन। 
जैसे चुभती फाँस, तब रोते चुप हो नयन।। 
००० 
बन्द कभी रहते खुले, नयन सभी स्वच्छन्द। 
किन्तु कभी रहते नहीं, नयन मीन के बन्द।।  - अशोक व्यग्र 
नयन मीन के बन्द, न होते चुरा न पाए। 
बुजदिल दिल का चैन, न दिल में घर कर पाए।। 
कहे 'सलिल' कविराय, छंद के बंद लिख नयन। 
लेते लंबी साँस, न तजते काव्य को नयन।।
००० 
छंद शाला
दोहा+रोला=कुंडलिया
करें स्वयंवर सर्वदा, नारी नयन स्वतंत्र।
बने स्वयंभू घूमते, पुरुष नयन परतंत्र।। - अशोक व्यग्र- भोपाल
पुरुष नयन परतंत्र, चाहते रहे सुरक्षा।
करें प्रेम का दान, प्रीत की माँगें भिक्षा।।
करें सदा स्वीकार, भाग्य में जो हो बदा।
मिला नयन से नयन, करें स्वयंवर सर्वदा।।
करें स्वयंवर सर्वदा, नारी नयन स्वतंत्र।
बने स्वयंभू घूमते, पुरुष नयन परतंत्र।। - अशोक व्यग्र- भोपाल
पुरुष नयन परतंत्र, न लेकिन सच स्वीकारें।
कहें लिया मन जीत, हृदय पहले खुद हारें।।
नारी वरे सदैव, न नर वर सके कभी वर।
नारी का ही हुआ, न नर का हुआ स्वयंवर।।
०००
छंद शाला
दोहा+रोला=कुंडलिया
इक तो विरहानल तपे, दूजे सूरज ताप।
गोरी काली हो गयी, तपकर अपने आप।। - अशोक व्यग्र
तपकर अपने आप, जले भुन बना रसोई।
वंदन करिए नित्य, आब निज हँसकर खोई।।
सींचें प्यार फुहार, लाज बन गाल पर छपे ।
सुधियाँ लेंय सँभाल, जब जब विरहानल तपे।।
इक तो विरहानल तपे, दूजे सूरज ताप।
गोरी काली हो गयी, तपकर अपने आप।। - अशोक व्यग्र
तपकर अपने आप, न हो सचमुच वह काली।
कर में शीतल पेय, पलक पर रख घरवाली।।
करे प्रशंसा नित्य, न घर में हो बड़वानल।
शत्रु प्रेम के कई, निकट इक तो विरहानल।।
२१.५.२०२६
०००
सॉनेट
द्रोण
*
द्रोण छल कर पल रहे थे,
दास सत्ता मानती थी,
हमेशा अपमानती थी।
ऊगते दिख; ढल रहे थे।
पुत्र से मिथ्या कहा था,
शिष्य का काटा अँगूठा,
अहं पाला निरा झूठा।
ज्ञान बिसरा मन दहा था।
चक्रव्यूह कलंक गाथा
सत्पुरुष का झुका माथा
मोह सुत का उर बसा था।
शत्रु पर विश्वास गलती
बात पूरी सुन; न समझी
हुए विचलित मौत आई।
***
मिर्ची लगी तो .....?
मिर्च को आयुर्वेद में कुमऋचा के नाम से भी जाना जाता है। गुणों में लाल मिर्च और हरी मिर्च में कोई अंतर नहीं होता। आयुर्वेदिक मतानुसार लालमिर्च अग्निदीपक, दाहजनक, कफनाशक तथा अजीर्ण, विषूचिका, दारुणवृण, तंद्रा, मोह, प्रलाप, स्वरभेद और अरुचि को दूर करने वाली होती है।
आत्रेयसंहिता के अनुसार, "जिसकी देखने की, सुनने की ओर बोलने की शक्ति नष्ट हो गई हो, जिसकी नाड़ी भी डूब गई हो ऐसे सन्निपात के रोगी को मृत्यु के मुख में से छुड़ा कर मिर्ची जीवन दान देती है।"
हैजा में मिर्च के चूर्ण का आश्चर्यजनक लाभ लगभग सभी लोगों को पता है। दाढ़ के दर्द में मिर्ची का तेल उत्तम काम करता है। मिर्ची अफरा को भी नष्ट करती है। देशी चिकित्सक टायफस ज्वर, पार्यायिक ज्वर, जलोदर, गठिया, अजीर्ण और हैजे में इसका उपयोग करते हैं।
यूनानी मत के अनुसार मिर्ची कड़वी, चरपरी, कफ निस्सारक, मस्तिष्क की शिकायतों को दूर करनेवाली, स्नायविक वेदना में लाभदायक, पित्त को बढ़ाने वाली और गुदा स्थान सें जलन करनेवाली होती है।
मिर्च के तीखेपन से मिर्च के नुकसान तय होते हैं जैसे कश्मीरी मिर्च कम तिक्त होती है इसलिए ज्यादा खाई जा सकती है। शिमला मिर्च की सब्जी से हानि नहीं है क्योंकि उसमें तीखापन नहीं है। काली मिर्च से कई फायदे होते हैं। अधिक तीखी और ज्यादा खाने से मिर्च से अनेक बीमारियाँ होती हैं।
***
मुक्तिका:
आए हो
*
बहुत दिनों में मुझसे मिलने आए हो.
यह जाहिर है तनिक भुला न पाए हो..
मुझे भरोसा था-है, बिछुड़ मिलेंगे हम.
नाहक ही जा दूर व्यर्थ पछताए हो..
खलिश शूल की जो हँसकर सह लेती है.
उसी शाख पर फूल देख मुस्काए हो..
अस्त हुए बिन सूरज कैसे पुनः उगे?
जब समझे तब खुद से खुद शर्माए हो..
पूरी तरह किसी को कब किसने समझा?
समझ रहे यह सोच-सोच भरमाए हो..
ढाई आखर पढ़ बाकी पोथी भूली.
जब तब ही उजली चादर तह पाए हो..
स्नेह-'सलिल' में अवगाहो तो बात बने.
नेह नर्मदा कब से नहीं नहाए हो..
२२-५-२०११
***
मुक्तिका:
चाह में
*
नील नभ को समेटूँ निज बाँह में.
जी रहा हूँ आज तक इस चाह में..
पड़ोसी को कभी काना कर सके.
हुआ अंधा पाक दुर्मति-डाह में..
मंजिलें कब तक रहेंगी दूर यों?
बनेंगी साथी कभी तो राह में..
प्यार की गहराई मिलने में नहीं.
हुआ है अहसास बिछुड़न-आह में..
काट जंगल, खोद पर्वत, पूर सर.
किस तरह सुस्ता सकेंगे छाँह में?
रोज रुसवा हो रहा सच देखकर.
जल रहा टेसू सा हर दिल दाह में..
रो रही है खून के आँसू धरा.
आग बरसी अब के सावन माह में..
काश भिक्षुक मन पले पल भर 'सलिल'
देख पाये सकल दुनिया शाह में..
देख ऊँचाई न बौराओ 'सलिल'
दूब सम जम जाओ गहरी थाह में..
२२-५-२०११
***
बुंदेली ग़ज़ल
*
१.बात नें करियो
*
बात नें करियो तनातनी की.
चाल नें चलियो ठनाठनी की..
होस जोस मां गंवा नें दइयो
बाँह नें गहियो हनाहनी की..
जड़ जमीन मां हों बरगद सी
जी न जिंदगी बना-बनी की..
घर नें बोलियों तें मकान सें
अगर न बोली धना-धनी की..
सरहद पे दुसमन सें कहियो
रीत हमारी दना-दनी की..
================
२ बखत बदल गओ
*
बखत बदल गओ, आँख चुरा रए।
सगे पीठ में भोंक छुरा रए।।
*
लतियाउत तें कल लों जिनखों
बे नेतन सें हात जुरा रए।।
*
पाँव कबर मां लटकाए हैं
कुर्सी पा खें चना मुरा रए।।
*
पान तमाखू गुटका खा खें
भरी जवानी गाल झुरा रए।।
*
झूठ प्रसंसा सुन जी हुमसें
सांच कई तेन अश्रु ढुरा रए।।
*
३ मंजिल की सौं...
*
मंजिल की सौं, जी भर खेल
ऊँच-नीच, सुख-दुःख. हँस झेल
रूठें तो सें यार अगर
करो खुसामद मल कहें तेल
यादों की बारात चली
नाते भए हैं नाक-नकेल
आस-प्यास के दो कैदी
कार रए साँसों की जेल
मेहनतकश खों सोभा दें
बहा पसीना रेलमपेल
*
४ काय रिसा रए
*
काय रिसा रए कछु तो बोलो
दिल की बंद किवरिया खोलो
कबहुँ न लौटे गोली-बोली
कओ बाद में पैले तोलो
ढाई आखर की चादर खों
अँखियन के पानी सें धो लो
मिहनत धागा, कोसिस मोती
हार सफलता का मिल पो लो
तनकउ बोझा रए न दिल पे
मुस्काबे के पैले रो लो
=============
५ बात करो ..
*
बात करो जय राम-राम कह।
अपनी कह औरन की सुन-सह।।
मन खों रखियों आपन बस मां।
मत लालच मां बरबस दह-बह।।
की की की सें का-का कहिए?
कडवा बिसरा, कछु मीठो गह।।
रिश्ते-नाते मन की चादर।
ढाई आखर सें धोकर-तह।।
संयम-गढ़ पै कोसिस झंडा
फहरा, माटी जैसो मत ढह।।
खैंच लगाम दोउ हातन सें
आफत घुड़वा चढ़ मंजिल गह।।
दिल दैबें खेन पैले दिलवर
दिल में दिलवर खें दिल बन रह।।
***
वह एक है, हम एक हों रस-छंद की तरह
करिए विमर्श नित्य परमानंद की तरह
जात क्या? औकात क्या? सच गुप्त चित्त में
आत्म में परमात्म ब्रह्मानंद की़ तरह
व्योम में राकेश औ' दिनेश साथ-साथ
बिखेरते उजास काव्यानंद की तरह
काया नहीं कायस्थ है निज आत्म तत्व ही
वह एक है, हम एक हैं आनंद की तरह
जो मातृशक्ति है उसे भी पूजिए हुजूर
बिन शक्ति शक्तिवान निरानंद की तरह
***
कविता की जय
हिंदीप्रेमी कलमकार मिल कविता की जय बोल रहे
दिल से दिल के बीच बनाकर पुल नित नव रस घोल रहे
सुख-दुख धूप-छाँव सम आते-जाते, पूछ सवाल रहे
शब्द-पुजारी क्या तुम खुद को कर्म तुला में तोल रहे?
को विद? है विद्वान कौन? यह कोविद उन्निस पूछ रहा
काहे को रोना?, कोरोना कहे न बाकी झोल रहे
खुद ही खुद का कर खयाल, घर में रह अमन-चैन से तू
सुरा हेतु मत दौड़ लगा तू, नहीं ढोल में पोल रहे
अनुशासित परउपकारी बन, कर सहायता निर्बल की
सज नहीं जो रहा 'सलिल' उसका तो बिस्तर गोल रहे
२२-५-२०२०
***
नवगीत:
.
धरती की छाती फ़टी
फैला हाहाकार
.
पर्वत, घाटी या मैदान
सभी जगह मानव हैरान
क्रंदन-रुदन न रुकता है
जागा क्या कोई शैतान?
विधना हमसे क्यों रूठा?
क्या करुणासागर झूठा?
किया भरोसा क्या नाहक
पल भर में ऐसे टूटा?
डँसते सर्पों से सवाल
बार-बार फुँफकार
धरती की छाती फ़टी
फैला हाहाकार
.
कभी नहीं मारे भूकंप
कभी नहीं हांरे भूकंप
एक प्राकृतिक घटना है
दोष न स्वीकारे भूकंप
दोषपूर्ण निर्माण किये
मानव ने खुद प्राण दिए
वन काटे, पर्वत खोदे
खुद ही खुद के प्राण लिये
प्रकृति के अनुकूल जिओ
मात्र एक उपचार
.
नींव कूटकर खूब भरो
हर कोना मजबूत करो
अलग न कोई भाग रहे
एकरूपता सदा धरो
जड़ मत हो घबराहट से
बिन सोचे ही मत दौड़ो
द्वार-पलंग नीचे छिपकर
राह काल की भी मोड़ो
फैलाता अफवाह जो
उसको दो फटकार
धरती की छाती फ़टी
फैला हाहाकार
.
बिजली-अग्नि बुझाओ तुरत
मिले चिकित्सा करो जुगत
दीवारों से लग मत सो
रहो खुले में, वरो सुगत
तोड़ो हर कमजोर भवन
मलबा तनिक न रहे अगन
बैठो जा मैदानों में
हिम्मत देने करो जतन
दूर करो सब दूरियाँ
गले लगा दो प्यार
धरती की छाती फ़टी
फैला हाहाकार
***
नवगीत:
.
पशुपतिनाथ!
तुम्हारे रहते
जनगण हुआ अनाथ?
.
वसुधा मैया भईं कुपित
डोल गईं चट्टानें.
किसमें बूता
धरती कब
काँपेगी अनुमाने?
देख-देख भूडोल
चकित क्यों?
सीखें रहना साथ.
अनसमझा भूकम्प न हो अब
मानवता का काल.
पृथ्वी पर भूचाल
हुए, हो रहे, सदा होएंगे.
हम जीना सीखेंगे या
हो नष्ट बिलख रोएँगे?
जीवन शैली गलत हमारी
करे प्रकृति से बैर.
रहें सुरक्षित पशु-पक्षी, तरु
नहीं हमारी खैर.
जैसी करनी
वैसी भरनी
फूट रहा है माथ.
पशुपतिनाथ!
तुम्हारे रहते
जनगण हुआ अनाथ?
.
टैक्टानिक हलचल को समझें
हटें-मिलें भू-प्लेटें.
ऊर्जा विपुल
मुक्त हो फैले
भवन तोड़, भू मेटें.
रहे लचीला
तरु ना टूटे
अड़ियल भवन चटकता.
नींव न जो
मजबूत रखे
वह जीवन-शैली खोती.
उठी अकेली जो
ऊँची मीनार
भग्न हो रोती.
वन हरिया दें, रुके भूस्खलन
कम हो तभी विनाश।
बंधन हो मजबूत, न ढीले
रहें हमारे पाश.
छूट न पायें
कसकर थामें
'सलिल' हाथ में हाथ
पशुपतिनाथ!
तुम्हारे रहते
जनगण हुआ अनाथ?
***
हाइकु सलिला:
.
सागर माथा
नत हुआ आज फिर
देख विनाश.
.
झुक गया है
गर्वित एवरेस्ट
खोखली नीव
.
मनमानी से
मानव पराजित
मिटे निर्माण
.
अब भी चेतो
न करो छेड़छाड़
प्रकृति संग
.
न काटो वृक्ष
मत खोदो पहाड़
कम हो नाश
.
न हो हताश
करें नव निर्माण
हाथ मिलाएं.
.
पोंछने अश्रु
पीड़ितों के चलिए
न छोड़ें कमी
.....
जबलपुर भूकंप की बरसी पर
दोहा गीत :
करो सामना
*
जब-जब कंपित भू हुई
हिली आस्था-नीव
आर्तनाद सुनते रहे
बेबस करुणासींव
न हारो करो सामना
पूर्ण हो तभी कामना
*
ध्वस्त हुए वे ही भवन
जो अशक्त-कमजोर
तोड़-बनायें फिर उन्हें
करें परिश्रम घोर
सुरक्षित रहे जिंदगी
प्रेम से करो बन्दगी
*
संरचना भूगर्भ की
प्लेट दानवाकार
ऊपर-नीचे चढ़-उतर
पैदा करें दरार
रगड़-टक्कर होती है
धरा धीरज खोती है
*
वर्तुल ऊर्जा के प्रबल
करें सतत आघात
तरु झुक बचते, पर भवन
अकड़ पा रहे मात
करें गिर घायल सबको
याद कर सको न रब को
*
बस्ती उजड़ मसान बन
हुईं प्रेत का वास
बसती पीड़ा श्वास में
त्रास ग्रस्त है आस
न लेकिन हारेंगे हम
मिटा देंगे सारे गम
*
कुर्सी, सिल, दीवार पर
बैंड बनायें तीन
ईंट-जोड़ मजबूत हो
कोने रहें न क्षीण
लचीली छड़ें लगाओ
बीम-कोलम बनवाओ
*
दीवारों में फंसायें
चौखट काफी दूर
ईंट-जुड़ाई तब टिके
जब सींचें भरपूर
रैक-अलमारी लायें
न पल्ले बिना लगायें
*
शीश किनारों से लगा
नहीं सोइए आप
दीवारें गिर दबा दें
आप न पायें भाँप
न घबरा भीड़ लगायें
सजग हो जान बचायें
*
मेज-पलंग नीचे छिपें
प्रथम बचाएं शीश
बच्चों को लें ढांक ज्यों
हुए सहायक ईश
वृद्ध को साथ लाइए
ईश-आशीष पाइए
१३-५-२०१५
***
नवगीत:
.
जो हुआ सो हुआ
.
बाँध लो मुट्ठियाँ
चल पड़ो रख कदम
जो गये, वे गये
किन्तु बाकी हैं हम
है शपथ ईश की
आँख करना न नम
नीलकण्ठित बनो
पी सको सकल गम
वृक्ष कोशिश बने
हो सफलता सुआ
.
हो चुका पूर्व में
यह नहीं है प्रथम
राह कष्टों भरी
कोशिशें हों न कम
शेष साहस अभी
है बहुत हममें दम
सूर्य हैं सच कहें
हम मिटायेंगे तम
उठ बढ़ें, जय वरें
छोड़कर हर खुआ
.
चाहते क्यों रहें
देव का हम करम?
पालते क्यों रहें
व्यर्थ मन में भरम?
श्रम करें तज शरम
साथ रहना धरम
लोक अपना बनाएंगे
फिर श्रेष्ठ हम
गन्स जल स्वेद है
माथ से जो चुआ
मंगलवार, २८ अप्रैल २०१५
***
नवगीत:
.
धरती काँपी,
नभ थर्राया
महाकाल का नर्तन
.
विलग हुए भूखंड तपिश साँसों की
सही न जाती
भुज भेंटे कंपित हो भूतल
भू की फटती छाती
कहाँ भू-सुता मातृ-गोद में
जा जो पीर मिटा दे
नहीं रहे नृप जो निज पीड़ा
सहकर धीर धरा दें
योगिनियाँ बनकर
इमारतें करें
चेतना-कर्तन
धरती काँपी,
नभ थर्राया
महाकाल का नर्तन
.
पवन व्यथित नभ आर्तनाद कर
आँसू धार बहायें
देख मौत का तांडव चुप
पशु-पक्षी धैर्य धरायें
ध्वंस पीठिका निर्माणों की,
बना जयी होना है
ममता, संता, सक्षमता के
बीज अगिन बोना है
श्वास-आस-विश्वास ले बढ़े
हास, न बचे विखंडन
सोमवार, २७ अप्रैल २०१५
***
दोहा सलिला:
.
रूठे थे केदार अब, रूठे पशुपतिनाथ
वसुधा को चूनर हरी, उढ़ा नवाओ माथ
.
कामाख्या मंदिर गिरा, है प्रकृति का कोप
शांत करें अनगिन तरु, हम मिलकर दें रोप
.
भूगर्भीय असंतुलन, करता सदा विनाश
हट संवेदी क्षेत्र से, काटें यम का पाश
.
तोड़ पुरानी इमारतें, जर्जर भवन अनेक
करे नये निर्माण दृढ़, जाग्रत रखें विवेक
.
गिरि-घाटी में सघन वन, जीवन रक्षक जान
नगर बसायें हम विपुल, जिनमें हों मैदान
.
नष्ट न हों भूकम्प में, अपने नव निर्माण
सीखें वह तकनीक सब, भवन रहें संप्राण
.
किस शक्ति के कहाँ पर, आ सकते भूडोल
ज्ञात, न फिर भी सजग हम, रहे किताबें खोल
.
भार वहन क्षमता कहाँ-कितनी लें हम जाँच
तदनसार निर्माण कर, प्रकृति पुस्तिका बाँच
***
नवगीत:
.
आपद बिना बुलाये आये
मत घबरायें.
साहस-धीरज संग रखें
मिलकर जय पायें
.
भूगर्भी चट्टानें सरकेँ,
कांपे धरती.
ऊर्जा निकले, पड़ें दरारें
उखड़े पपड़ी
हिलें इमारत, छोड़ दीवारें
ईंटें गिरतीं
कोने फटते, हिल मीनारें
भू से मिलतीं
आफत बिना बुलाये आये
आँख दिखाये
सावधान हो हर उपाय कर
जान बचायें
आपद बिना बुलाये आये
मत घबरायें.
साहस-धीरज संग रखें
मिलकर जय पायें
.
द्वार, पलंग तले छिप जाएँ
शीश बचायें
तकिया से सर ढाँकें
घर से बाहर जाएँ
दीवारों से दूर रहें
मैदां अपनाएँ
वाहन में हों तुरत रोक
बाहर हो जाएँ
बिजली बंद करें, मत कोई
यंत्र चलायें
आपद बिना बुलाये आये
मत घबरायें.
साहस-धीरज संग रखें
मिलकर जय पायें
.
बाद बड़े झटकों के कुछ
छोटे आते हैं
दिवस पाँच से सात
धरा को थर्राते हैं
कम क्षतिग्रस्त भाग जो उनकी
करें मरम्मत
जर्जर हिस्सों को तोड़ें यह
अतिआवश्यक
जो त्रुटिपूर्ण भवन उनको
फिर गिरा बनायें
आपद बिना बुलाये आये
मत घबरायें.
साहस-धीरज संग रखें
मिलकर जय पायें
.
है अभिशाप इसे वरदान
बना सकते हैं
हटा पुरा निर्माण, नव नगर
गढ़ सकते हैं.
जलस्तर ऊपर उठता है
खनिज निकलते
भू संरचना नवल देख
अरमान मचलते
आँसू पीकर मुस्कानों की
फसल उगायें
आपद बिना बुलाये आये
मत घबरायें.
साहस-धीरज संग रखें
मिलकर जय पायें
२२-५-२०१७
***
गीत
*
पूजन से
पापों का क्षय
हो पाता तो
सारे पापी
देव पूजकर तर जाते।
गुप्त न रहता चित्र
मनुज के कर्मों का
गीतकार
नित हत्यारों के गुण गाते ।
*
कर्मयोग की सीख, न अर्जुन को मिलती
सूर्य न करता मेहनत, साँझ नहीं ढलती।
बाँझ न होती नींव, न दबकर चुप रहती-
महक बिखेर न कली, भ्रमर खातिर खिलती।
सृजन अगर
तापों का भय
हर पाता तो,
सारे सर्जक
निहित सर्जना
घर लाते।
*
स्वेद न गंगा-जल सम, पूजा गया अगर
दौलत देख प्रेम भी, भूला गया अगर।
वादों को 'जुमला' कह, जन विश्वास-छला
लोकतंत्र की मीन निगल, जन-द्रोह-मगर
पूछेगा
जनप्रतिनिधि
आम जनों जैसा
रहन-सहन, आचरण
नहीं क्यों अपनाते?
*
संसद आकर स्नान, कुम्भ में क्यों न करे?
मतभेदों को सलिल-धार में क्यों न तजे?
पेशवाई में 'कल' की 'कल' को 'आज' वरे-
ख़ास न क्यों वह जो जनगण की पीर हरे?
प्रश्नों के उत्तर
विधायिका
खोजे तो
विनत प्रशासक
नागरिकों के दर जाते
***
२२.५.२०१६
मुक्तिका
*
घुलें-मिल, बनें हम
न मैं-तुम, रहें अब
.
कहो तुम, सुनें हम
मिटें दूरियाँ सब
.
सभी सच, सुनें हम
न कोई नबी-रब
.
बढ़ो तुम, बढ़ें हम
मिलें मंज़िलें तब
.
लिखो तुम, पढ़ें हम
रहें चुप, सुनें जब
.
सिया-सत वरें हम
सियासत अजब ढब
.
बराबर हुए हम
छिना मत, नहीं दब
.
[दस मात्रिक दैशिक छन्द,
मापनी- १२ ११ १२११,
रुक्न- फऊलुन फऊलुन]
१०-५-२०१६, हरदोई
***
नवगीत:
प्रयासों की अस्थियों पर
*
प्रयासों की अस्थियों पर
सुसाधन के मांस बिन
सफलता-चमड़ी शिथिल हो झूलती.
*
सांस का व्यापार
थमता अनथमा सा
आस हिमगिरि पर
निरंतर जलजला सा.
अंकुरों को
पान गुटखा लीलता नित-
मुँह छिपाता नीलकंठी
फलसफा सा.
ब्रांडेड मँहगी दवाई
अस्पताली भव्यताएँ
रोग को मुद्रा-तुला पर तौलती.
प्रयासों की अस्थियों पर
सुसाधन के मांस बिन
सफलता-चमड़ी शिथिल हो झूलती.
*
वीतरागी चिकित्सक को
रोग से लेना, न देना
कई दर्जन टेस्ट
सालों औषधि, राहत न देना.
त्रास के तूफ़ान में
बेबस मरीजों को खिलौना-
बना खेले निष्ठुरी
चाबे चबेना.
आँख पीड़ा-हताशा के
अनलिखे संवाद
पल-पल मौन रहकर बोलती.
प्रयासों की अस्थियों पर
सुसाधन के मांस बिन
सफलता-चमड़ी शिथिल हो झूलती.
२२-५-२०१५
***
मुक्तिका:
चाह में
*
नील नभ को समेटूँ निज बाँह में.
जी रहा हूँ आज तक इस चाह में..
पड़ोसी को कभी काना कर सके.
हुआ अंधा पाक दुर्मति-डाह में..
मंजिलें कब तक रहेंगी दूर यों?
बनेंगी साथी कभी तो राह में..
प्यार की गहराई मिलने में नहीं.
हुआ है अहसास बिछुड़न-आह में..
काट जंगल, खोद पर्वत, पूर सर.
किस तरह सुस्ता सकेंगे छाँह में?
रोज रुसवा हो रहा सच देखकर.
जल रहा टेसू सा हर दिल दाह में..
रो रही है खून के आँसू धरा.
आग बरसी अब के सावन माह में..
काश भिक्षुक मन पले पल भर 'सलिल'
देख पाये सकल दुनिया शाह में..
देख ऊँचाई न बौराओ 'सलिल'
दूब सम जम जाओ गहरी थाह में..
२२.५.२०११
***
मुक्तिका:
आए हो
*
बहुत दिनों में मुझसे मिलने आए हो.
यह जाहिर है तनिक भुला न पाये हो..
मुझे भरोसा था-है, बिछुड़ मिलेंगे हम.
नाहक ही जा दूर व्यर्थ पछताए हो..
खलिश शूल की जो हँसकर सह लेती है.
उसी शाख पर फूल देख मुस्काए हो..
अस्त हुए बिन सूरज कैसे पुनः उगे?
जब समझे तब खुद से खुद शर्माए हो..
पूरी तरह किसी को कब किसने समझा?
समझ रहे यह सोच-सोच भरमाए हो..
ढाई आखर पढ़ बाकी पोथी भूली.
जब तब ही उजली चादर तह पाए हो..
स्नेह-'सलिल' में अवगाहो तो बात बने.
नेह नर्मदा कब से नहीं नहाए हो..
***
स्वास्थ्य सलिला
*
रोज संतरा खाइए, किडनी रहे निरोग.
पथरी घुलकर निकलती, आप करें सुख-भोग..
*
सेवन से तरबूज के, मिले शक्ति-भंडार.
परा बैंगनी किरण का, करे यही प्रतिकार.
*
कब्ज़ मिटा सी विटामिन, देते हैं भरपूर.
रोज़ पपैया-गुआवा, जी भर खांय जरूर.
*
पौरुष ग्रंथिज रोग को, रखता तन से दूर.
रोज टमाटर खाइए, स्वाद रुचे भरपूर..
*
अजवाइन-जैतून का, तेल बढ़ाये आब.
बढ़ा हुआ घट जायेगा, 'सलिल' रक्त का दाब..
*
खा ब्रोकोली (गोभी) मूंगफली, बनिए सेहतमंद.
रक्त-शर्करा नियंत्रित , इंसुलीन हो बंद..
*
बड़ी आँत का कैंसर, उराघात से जूझ.
सेब किवी नित खाइए, खनिज विटामिन बूझ.
*
खा हिसाल-शहतूत फल, रोग भगाएँ आप.
प्रतिरोधक ताकत बढ़े, दूर रहेगा ताप..
*
अगर फेंफड़े में हुआ, हो कैंसर का कष्ट.
नारंगी गहरी हरी, सब्जी होती इष्ट.
*
बंधा गोभी से मिले, अल्सर में आराम.
ज़ख्म ठीक हो शीघ्र ही, यदि न विधाता वाम..
*
अगर दस्त-अतिसार से, आप हो रहे त्रस्त.
खाएं केला-सेब भी, पस्त न हों, हों मस्त..
*
नाशपातियाँ खाइए, कम हो कोलेस्ट्रोल.
धमनी में अवरोध का, है इलाज अनमोल..
(एवाकाडो = नाशपाती की तरह का ऊष्णकटिबंधीय फल)
*
अनन्नास खा-रस पियें, हड्डी हो मजबूत.
टूटी हड्डी शीघ्र जुड़, दे आराम अकूत..
*
याददाश्त गर दे दगा, बातें रहें न याद.
सेवन करिए शुक्ति का, समय न कर बर्बाद ..
(शुक्ति = सीप)
*
सर्दी-कोलेस्ट्रोल जब बढ़े, न हों हैरान.
लहसुन का सेवन करे, सस्ता-सुलभ निदान..
*
मिर्च खाइए तो रहे, बढ़ा हुआ कफ शांत.
ध्यान पेट का भी रखें, हो ना क्रुद्ध-अशांत..
*
गेहूँ चोकर खाइए, पत्ता गोभी संग.
वक्ष कैंसर में मिले, लाभ-आप हों दंग
*
करे नाक में दम दमा, 'सलिल' न हो आराम.
खा-छाती पर लगा लें, प्याज़ करें विश्राम..
*
संधिवात-गठिया करे, अगर आपको तंग.
मछली का सेवन करें, मन में जगे उमंग..
*
उदर कष्ट से मुक्ति हो, केला खाएं आप.
अदरक उबकाई मिटा, हरती है संताप..
*
मूत्राशय संक्रमण में, हों न आप हैरान.
क्रेनबैरी का रस पियें, आए जां में जान..
(क्रेनबैरी = करौंदा)
**
मछली-सेवन से 'सलिल', शीश-दर्द हो दूर.
दर्द और सूजन हरे, अदरक गुण भरपूर...
*
दही -शहद नित लीजिये, मिले ऊर्जा-शक्ति.
हर ज्वर भागे दूर हो, जीवन से अनुरक्ति..
*
हरी श्वेत काली पियें, चाय कमे हृद रोग.
धमनी से चर्बी घटे, पाचन बढ़े सुयोग..
*
नींद न आए-अनिद्रा, करे अगर हैरान.
शुद्ध शहद सेवन करें, देखें स्वप्न सुजान..
२२-५-२०१०
***
आयुर्वेद - नींबू
दोहे का रंग नीबू के संग :
*
वात-पित्त-कफ दोष का, नीबू करता अंत
शक्ति बढ़ाता बदन की, सेवन करिए कंत
*
ए बी सी त्रय विटामिन, लौह वसा कार्बोज
फॉस्फोरस पोटेशियम, सेवन से दें ओज
*
मैग्निशियम प्रोटीन सँग, सोडियम तांबा प्राप्य
साथ मिले क्लोरीन भी, दे यौवन दुष्प्राप्य
*
नेत्र ज्योति की वृद्धि कर, करे अस्थि मजबूत
कब्ज मिटा, खाया-पचा, दे सुख-ख़ुशी अकूत
*
जल-नीबू-रस नमक लें, सुबह-शाम यदि छान
राहत दे गर्मियों में, फूँक जान में जान
*
नींबू-बीज न खाइये, करे बहुत नुकसान
भोजन में मत निचोड़ें, बाद करें रस-पान
*
कब्ज अपच उल्टियों से, लेता शीघ्र उबार
नीबू-सेंधा नमक सँग, अदरक है उपचार
*
नींबू अजवाइन शहद, चूना-जल लें साथ
वमन-दस्त में लाभ हो, हँसें उठकर माथ
*
जी मिचलाये जब कभी, तनिक न हों बेहाल
नीबू रस-पानी-शहद, आप पिएँ तत्काल
*
नींबू-रस सेंधा नमक, गंधक सोंठ समान
मिली गोलियाँ चूसिये, सुबह-शाम मतिमान
*
नींबू रस-पानी गरम, अम्ल पित्त कर दूर
हरता उदर विकार हर, नियमित पिएँ हुज़ूर
*
आधा सीसी दर्द से, परेशान-बेचैन
नींबू रस जा नाक में, देता पल में चैन
*
चार माह के गर्भ पर, करें शिकंजी पान
दिल-धड़कन नियमित रहे, प्रसव बने आसान
*
कृष्णा तुलसी पात ले, पाँच- चबाएँ खूब
नींबू-रस पी भगा दें, फ्लू को सुख में डूब
*
पिएँ शिकंजी, घाव पर, मलिए नींबू रीत
लाभ एक्जिमा में मिले, चर्म नर्म हो मीत
*
कान दर्द हो कान में, नींबू-अदरक अर्क
डाल साफ़ करिए मिले, शीघ्र आपको फर्क
*
नींबू-छिलका सुखाकर, पीस फर्श पर डाल
दूर भगा दें तिलचटे, गंध करे खुशहाल
*
नीबू-छिलके जलाकर, गंधक दें यदि डाल
खटमल सेना नष्ट हो, खुद ही खुद तत्काल
*
पीत संखिया लौंग संग, बड़ी इलायची कूट
नींबू-रस मलहम लगा, करें कुष्ठ को हूट
*
नींबू-रस हल्दी मिला, उबटन मल कर स्नान
नर्म मखमली त्वचा पा, करे रूपसी मान
*
मिला नारियल-तेल में, नींबू-रस नित आध
मलें धूप में बदन पर, मिटे खाज की व्याध
*
खूनी दस्त अगर लगे, घोलें दूध-अफीम
नींबू-रस सँग मिला पी, सोएँ बिना हकीम
*
बवासीर खूनी दुखद, करें दुग्ध का पान
नींबू-रस सँग-सँग पिएँ, बूँद-बूँद मतिमान
*
नींबू-रस जल मिला-पी, करें नित्य व्यायाम
क्रमश: गठिया दूर हो, पाएँगे आराम
*
गला बैठ जाए- करें, पानी हल्का गर्म
नींबू-अर्क नमक मिला, कुल्ला करना धर्म
*
लहसुन-नींबू रस मिला, सिर पर मल कर स्नान
मुक्त जुओं से हो सकें, महिलाएँ अम्लान
*
नींबू-एरंड बीज सम, पीस चाटिए रात
अधिक गर्भ संभावना, होती मानें बात
*
प्याज काट नीबू-नमक, डाल खाइए रोज
गर्मी में हो ताजगी, बढ़े देह का ओज
*
काली मिर्च-नमक मिली, पिएँ शिकंजी आप
मिट जाएँगी घमौरियाँ, लगे न गर्मी शाप
*
चेहरे पर नींबू मलें, फिर धो रखिये शांति
दाग मिटें आभा बढ़े, अमल-विमल हो कांति
३-७-२-१५
***