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सोमवार, 19 जनवरी 2026

जनवरी १९, चित्रगुप्त, शिव, सोरठा, सॉनेट, बिरजू, कालगणना, ब्राह्मण, ओशो, विवाह दिवस, नवगीत, लघुकथा,

सलिल सृजन जनवरी १९
आज विवाह दिवस 
काशी-क्रंदन
.
काशी-क्रंदन 
रहा अनसुना
प्रभु की मरजी
.
मंदिर घायल
प्रतिमा रोई
ध्वस्त कँगूरे।
आहत जन-मन
हो हताश चुप
मरघट घूरे।
बुलडोजर की
गड़गड़ सुनकर
फेंके अरजी।
काशी-क्रंदन 
रहा अनसुना
प्रभु की मरजी
.
कंकर कंकर  
बसते शंकर 
सत्य सनातन।
मिला धूल में
भवन पुरातन
ठठा प्रशासन।
सत्य छिपाए
लोक रुदन को
कहकर फरजी।
काशी-क्रंदन 
रहा अनसुना
प्रभु की मरजी
.
तोड़ो मढ़िया
शीश झुकाकर
पड़ता जाना।
वैरागी को
महल निवासी
कर दें, ठाना।
क्रीत मीडिया
अंधभक्ति की
करतल गरजी।
काशी-क्रंदन 
रहा अनसुना
प्रभु की मरजी
१९.१.२०२६
०००
सामयिक गीत
घट-घटवासी
घट-घटवासी!
मरघट तजकर
रहो महल में
बनो विकासी।
.
गाँजा-भाँग, धतूरा छोड़ो
मिष्ठान्नों से नाता जोड़ो।
राख-भभूत न अंग सजाओ
कर श्रंगार जगत मन भाओ।
पाँच सितारा 
स्वर्णालय में
वी आई पी बन
रहो प्रवासी।
घट-घटवासी!
मरघट तजकर
रहो महल में
बनो विकासी।
.
वामन की विराट प्रतिमाएँ
दानव भी छोटे पड़ जाएँ।
त्याग-योग-वैराग न भाए
राग-भोग-संपदा सुहाएँं।
धनकुबेर ही
दर्शन पाएँ,
कंगालों प्रति
रखो उदासी
घट-घटवासी!
मरघट तजकर
रहो महल में
बनो विकासी।
.
उन्हें न देखो जो कतार में 
सुख नगदी में, नहिं उधार में।
वरण करेगी राजकुमारी 
मायापति को, तज त्रिपुरारी।
पहले डेटिंग
फिर लिव इन का
युग समझो भी
है आभासी
घट-घटवासी!
मरघट तजकर
रहो महल में
बनो विकासी।
.
पार्टी-चंदा, गोरखधंधा
मारक है चुनाव का फंदा।
अंधभक्ति जुमले अय्यारी
नफ़रत, घृणा विभाजनकारी।
नेता करता
हर दल का हर
कह अन्यों को
कुर्सीवासी।
घट-घटवासी!
मरघट तजकर
रहो महल में
बनो विकासी।
.
तनिक किसी से न्यून न कोई
किया भरोसा जनता रोई।
चट्टे-बट्टे इक थैली के
सब धारक चादर मैली के।
स्वार्थ साध्य सब
सत्ता कामी
जनहित-रवि को
गहन खग्रासी।
घट-घटवासी!
मरघट तजकर
रहो महल में
बनो विकासी।
१९.१.२०२६
०००
प्रभु श्री चित्रगुप्त जी का पवित्र ग्रंथों में महिमा वर्णन
- ०१. ऋग्वेद अध्याय ४,५,६ सूत्र ९-१-२४ अध्याय १७ सूत्र १०७ /१० - ७-२४ में। ऋग्वेद गायत्री मंत्र-
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे श्री चित्रगुप्तायधीमहि तन्नो गुप्त: प्रचोदयात् ।
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे श्री चित्रगुप्तायधीमहि तन्नो कवि लेखक: प्रचोदयात्।
ऋग्वेद नमस्कार मंत्र में - यमाय धर्मराजाय श्री चित्रगुप्ताय वै नम:।
ॐ सचित्र: चित्रं विन्तये तमस्मै चित्रक्षत्रं चित्रतम वयोधाम् चंद्ररायो पुरवौ ब्रहभूयं चंद्र चंद्रामि गृहीते यदस्व:।
२- अर्थववेद- अध्याय १३-२-३२ के आश्वलायन स्त्रोत ४-१२-३ श्री चित्रश्वि कित्वान्महिष: सुपर्ण आरोचयन रोदसी अन्तरिक्षम् आखलायन क्षति। सचित्रश्रीचित्र चिन्तयंत मस्वो अग्निरीक्षे व्रहत: क्षत्रियस्य ।
३- पद्मपुराण - सृष्टिखण्ड व पातालखण्ड के अध्याय ३१ में, भूखण्ड के अध्याय १६, ६७, ६८ व स्वर्गखण्ड - चित्रगुप्त जी के नाम- यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्त, सर्वभूतक्षय, औदम्बर, घघ्न, परमेष्ठी, बृकोदराय, श्रीचित्रगुप्त, चित्र, काल, नीलाम।
४- अग्नि पुराण - श्री चित्रगुप्त प्रणम्यादौ - वात्मानं सर्वदेहिनाम् । कायस्थअवतरण यथार्थ्यान्वेषणेेनोच्यते मया।। येनेदं स्वेच्छया सर्व मायया मोहित्जगत। राजयत्यजित: श्रीमान कायस्थ परमेश्वर:।।
५- गरुण पुराण - ब्रह्माणा निर्मित: पूर्णा विष्णुना पालितं यदा यद्र संहार मूर्तिश्व ब्रह्मण: तत: वायु सर्वगत सृष्ट: सूर्यस्तेजो विवृद्धिमान धर्मराजस्तत: सृष्टिश्चित्रगुप्तेन संयुत: ।
६- शिव पुराण में उमासंहिता अध्याय ७ में व अग्निपुराण अघ्याय २० व ३७० में - मार्कण्डेय धर्मराज श्रीचित्रगुप्तजी को 'कायस्थ' कहा गया है। शिव पुराण ज्ञान संहिता ध्याय १६- श्री चित्रगुप्त जी, भगवान शंकरजी के विवाह में शामिल हैं।
७- वशिष्ठ पुराण में - भगवान राम के विवाह में भगवान श्री राम जी के द्वारा सर्वप्रथम आहुति परमात्मा श्री चित्रगुप्त जी को दी गई।
८- लिंग पुराण में - अध्याय ९८ में शिवजी का नाम 'भक्त कायस्थ' लिखा है।
९- ब्रह्म पुराण में - अध्याय २-५-5५६ में श्री चित्रगुप्तजी परम न्यायाधीश का कार्य करते हैं।
१० - मत्स्य पुराण में -
श्री चित्रगुप्त जी को केतु, दाता, प्रदाता, सविता, प्रसविता, शासत:, आमत्य, मंत्री, प्राज्ञ, ललाट का विधाता, धर्मराज, न्यायाधीश, लेखक, सैनिक, सिपाहियों का सरदार, याम्यसुब्रत, परमेश्वर, घमिष्ठ, यम कहा गया है।
११- ब्रह्मावर्त पुराण में - श्री चित्रगुप्त जी का वर्णन है।
१२- कूर्म पुराण में - पूर्व भाग अध्याय ४० में।
१३- भविष्य पुराण में - उत्तराखण्ड अध्याय ८९ में।
१४- स्कन्द पुराण में - श्री चित्रगुप्त जी के अवतरण का वर्णन है।
१५- यम संहिता में - उदीच्य वेषधरं सौम्यंदर्शनम् द्विभुजं केतु प्रत्याउयधिदेवं श्रीचित्रगुप्तं आवाह्यमि। चितकेत दीता प्रदाता सविता प्रसादिता शासनानमन्त:।
उपनिषदों में - श्री चित्रगुप्त जी का वर्णन
१६- कठोपनिषद् में - यम के नाम से श्री चित्रगुप्त जी का वर्णन।
१७- वाल्मीकि रामायण में - आत्मज्ञानी जनक ने श्री चित्रगुप्त जी का पूजन किया।
१८- महाभारत अनुशासन पर्व में - श्रीकृष्ण चँद्र वासुदेव जी ने सर्वप्रथम श्री चित्रगुप्त जी का पूजन किया है -
मषिभाजन सुयुक्तश्चरसित्वं महीतले
लेखनी कटनी हस्ते श्री चित्रगुप्त: नमस्तुते।
•••
***
सोरठा सलिला
जो करते संदेह, शांत न हो सकते कभी।
कर विश्वास विदेह, रहे शांत ही हमेशा।।
दिखती भले विराट, निराधार गिरती लहर।
रह साहस के घाट, जीत अविचलित रह सलिल।।
मिले वहीं आनंद, भय बंधन कटते जहाँ।
गूँजा करते छंद, मन के नीलाकाश में।।
कर्म स्वास्थ्य अनुभूति, संगत मिल परिणाम दें।
शुभ की करें प्रतीति, हों असीम झट कर विलय।।
सोच सकारात्मक रखें, जीवन हो सोद्देश्य।
कार्य निरंतर कीजिए, पूरा हो उद्देश्य।।
जीवन केवल आज, नहीं विगत; आगत नहीं।
पल पल करिए काज, दें संदेश किशन यही।।
मन के अंदर झाँक, अटक-भटक मत बावरे।
खुद को कम मत आँक, साथ हमेशा साँवरे।।
हुए मूल से दूर, ज्यों त्यों ही असहाय हम।
आँखें रहते सूर, मिले दर्द-दुख अहं से।।
•••
सॉनेट
बिरजू महाराज
*
ताल-थाप घुँघरू मादल
एक साथ हो मौन गए
नृत्य कथाएँ कौन कहे?
कौन भरे रस की छागल??
रहकर भी थे रहे नहीं
अपनी दुनिया में थे लीन
रहे सुनाते नर्तन-बीन
जाकर भी हो गए नहीं
नटसम्राट अनूठे तुम
फिर आओ पथ हेरें हम
नहीं करेंगे हम मातम
आँख भले हो जाए नम
जब तक अपनी दम में दम
छवियाँ नित सुमिरेंगे हम
१८-१-२०२२
***
भारतीय कालगणना
१८ निमेष = १ काष्ठा
३० काष्ठा = १ कला
३० कला = १ क्शण
१२ क्शण = १ मुहूर्त
३० मुहूर्त = १ दिन-रात
३० दिन रात = १ माह
२ माह = १ ऋतु
३ ऋतु = १ अयन
२ अयन = १ वर्ष
१२ वर्ष = १ युग
१ माह = पितरों का दिन-रात
१ वर्ष = देवों का दिन-रात
युग। दिव्य वर्ष - सौर वर्ष
सत = ४८०० - १७२८०००
त्रेता = ३६०० - १२९६०००
द्वापर = २४०० - ८६४०००
कलि = १२०० - ४३२००००
एक महायुग = १२००० दिव्य वर्ष = ४३,२०,००० वर्ष = १ देवयुग
१००० देवयुग = १ ब्रह्म दिन या ब्रह्म रात्रि
७१ दिव्य युग = १ मन्वन्तर
१४ मन्वन्तर = १ ब्रह्म दिन
*
ब्रह्मा जागने पर सतासत रूपी मन को उत्पन्न करते हैं। मन विकारी होकर सृष्टि रचना हेतु क्रमश: आकाश (गुण शब्द), गंध वहनकर्ता वायु (गुण स्पर्श), तमनाशक प्रकाशयुक्त तेज (गुण रूप), जल (गुण रस) तथा पृथ्वी (गुण गंध) उत्पन्न होती है।
*
***
भविष्यपुराण से
*
ब्राह्मण के लक्षण -
संस्कार ही ब्रह्त्व प्राप्ति का मुख्य कारण है। जिस ब्राह्मण के वेदादि शास्त्रों में निर्दिष्ट गर्भाधान, पुंसवन आदि ४८ संस्कार विधिपूर्वक हुए हों, वही ब्राह्मण ब्रह्मलोक और ब्रह्मत्व को प्राप्त करता है।
४८ संस्कार - गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, उपनयन, ४ वेदव्रत, वेदस्नान, विवाह, पंचमहायग्य (जिनसे देवता, पितरों, मनुष्य, भूत और ब्रह्म तृप्त हों), सप्तपाक यग्य (संस्था, अष्टकाद्वय, पार्वण, श्रावणी, आग्रहायणी, चैत्री या शूलगव तथा अाश्वयुजी), सप्तविर्यग्य (संस्था, अग्न्याधान, अग्निहोत्र, दर्श पौर्णमास, चातुर्मास्य, निरूढ-पशुबंध, सौत्रामणी) और सप्तसोम (संस्था-अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ्य। षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र व आप्तोर्याम) तथा ८ आत्मगुण (अनसूया-दूसरों के गुणों में दोष-बुद्धि न रखना, दया-परदुख दूर करने की इच्छा, क्शांति-क्रोध व वैर न करना, अनायास-सामान्य बात के लिए जान की बाजी न लगाना, मंगल-मांगलिक वस्तुओं का धारण, अकार्पण्य-दीन वचन न बोलना व अति कृपण न बनना, शौच-बाह्यभ्यंतर की शुद्धि तथा अस्पृहा-परधन की इच्छा न रखना।) ।
***
ओशो विमर्श
*बुद्धपुरूषों का बुद्धत्तव के बाद दुबारा जन्म क्यों नहीं होता है?*
ओशो: जरूरत नहीं रह जाती। जन्म अकारण नहीं है, जन्म शिक्षण है। जीवन एक परीक्षा है, पाठशाला है। यहाँ तुम आते हो क्योंकि कुछ जरूरत है। बच्चे को हम स्कूल भेजते है, पढ़ने लिखने,समझने-बूझने; फिर जब वह सब परीक्षाएँ उत्तीर्ण हो जाता है, फिर तो नहीं भेजते। फिर वह अपने घर आ गया। फिर भेजने की कोई जरूरत न रही।
परमात्मा घर है, सत्य कहो, निर्वाण कहो, मोक्ष कहो संसार विद्यालय है। वहाँ हम भेजे जाते हैं, ताकि हम परख लें, निरख लें, कस लें कसौटी पर अपने को सुख-दुख की आँच में, सब तरह के कडुवे-मीठे अनुभव से गुजर लें और वीतरागता को उपलब्ध हो जाएँ। सब गँवा दें, सब तरफ से भटक जाएँ, दूर-दूर अँधेरों में, अँधेरी खाइयों-खड्डों में सरकें, सत्य से जितनी दूरी संभव हो सके निकल जाएँ और फिर बोध से वापस लौटें।
बच्चा भी शांत होता, निर्दोष होता; संत भी शांत होता, निर्दोष होता। लेकिन संत की निर्दोषता में बड़ा मूल्य है, बच्चे की निर्दोषता में कोई खास मूल्य नहीं है। यह निर्दोषता जो बच्चे की है, मुफ्त है, कमाई हुई नहीं है। यह आज है, कल चली जाएगी। जीवन इसे छीन लेगा। संत की जो निर्दोषता है, इसे अब कोई भी नहीं छीन सकता। जो-जो घटनाएँ छिन सकती थीं, उनसे तो गुजर चुका संत। इसलिए परमात्मा को खोना, परमात्मा को ठीक से जानने के लिए अनिवार्य है। इसलिए हम भेजे जाते हैं।
बुद्धपुरुष को तो भेजने की कोई जरूरत नहीं, जब फल पक जाता है तो फिर डाली से लटका नहीं रहता, फिर क्या लटकेगा! किसलिए? वृक्ष से लटका था पकने के लिए। धूप आई, सर्दी आई, वर्षा आई, फल पक गया, अब वृक्ष से क्यों लटका रहेगा! कच्चे फल लटके रहते हैं। बुद्ध यानी पका हुआ फल।
छोड़ देती है डाल
रस भरे फल का हाथ
किसी और कसैले फल को
मीठा बनाने के लिए
छोड़ ही देना पड़ेगा। वृक्ष छोड़ देगा पके फल को, अब क्या जरूरत रही? फल पक गया, पूरा हो गया, पूर्णता आ गयी। बुद्धत्व का अर्थ है, जो पूर्ण हो गया। दुबारा लौटने का कोई कारण नहीं।
हमारे मन में सवाल उठता है कभी-कभी, क्योंकि हमें लगता है, जीवन बहुत मूल्यवान है। यह तो बिल्कुल उलटी बात हुई कि बुद्धत्व को उपलब्ध व्यक्ति को फिर जीवन नहीं मिलता। हमें लगता है, जीवन बहुत मूल्यवान है। बुद्धत्व को जो उपलब्ध है, उसे तो पता चल गया और बड़े जीवन का, और विराट जीवन का।
ऐसा ही समझो कि तुम शराब-घर जाते थे रोज, फिर एक दिन भक्ति-रस लग गया, फिर मंदिर में नाचने लगे, डोलने लगे, फिर प्रभु की शराब पी ली, अब शराब-घर नहीं जाते। शराबी सोचते होंगे कि बात क्या हो गयी? ऐसी मादक शराब को छोड़कर यह आदमी कहाँ चला गया? अब आता क्यों नहीं?
इसे बड़ी शराब मिल गयी, अब यह आए क्यों? इसे असली शराब मिल गयी, अब यह नकली के पास आए क्यों? इसे ऐसी शराब मिल गई जिसको पीकर फिर होश में आना ही नहीं पड़ता। और इसे एक ऐसी शराब मिल गई जिसमें बेहोशी भी होश है। अब यह इस क्षुद्र सी शराब को पीने क्यों आए?
बुद्धत्व को पाया व्यक्ति परम सागर में डूब गया। जिसकी तुम तलाश करते थे, जिस आनंद की, वह उसे मिल गया, अब वह यहाँ क्यों आए? यह जीवन तो कच्चे फलों के लिए है, ताकि वे पक जाएं, परिपक्य हो जाएं। इस जीवन के सुख-दुख, इस जीवन की पीड़ाएँ, इस जीवन के आनंद, जो कुछ भी है, वह हमें थपेड़े मारने के लिए है, चोटें मारने के लिए है।
देखा, कुम्हार घड़ा बनाता है, घड़े को चोटें मारता है। एक हाथ भीतर रखता है, एक हाथ बाहर रखता, चाक पर घड़ा घूमता और वह चोटें मारता! फिर जब घड़ा बनकर तैयार होगा, चोटें बंद कर देता है; फिर घड़े को आग में डाल देता है। फिर जब घड़ा पक गया, तो न चोट की जरूरत है, न आग में डालने की जरूरत है। संसार में चोटें हैं और आग में डाला जाना है। जब तुम पक जाओगे, तब प्रभु का परम रस तुममें भरेगा। तुम पात्र बन जाओगे, तुम घड़े बन जाओगे, फिर कोई जरूरत न रह जाएगी।
***
विश्व विवाह दिवस पर
*
विवाह के बाद पति-पत्नि एक सिक्के के दो पहलू हो जाते हैं, वे एक दूसरे का सामना नहीं कर सकते फिर भी एक साथ रहते हैं। - अल गोर
*
जैसे भी हो शादी करो। यदि अच्छी बीबी हुई तो सुखी होगे, यदि बुरी हुई तो दार्शनिक बन जाओगे। - सुकरात
*
महिलाएँ हमें महान कार्य करने हेकु प्रेरित करती हैं और उन्हें प्राप्त करने से हमें रोकती हैं। - माइक टायसन
*
मैं ने अपनी बीबी से कुछ शब्द कहे और उसने कुछ अनुच्छेद। - बिल क्लिंटन
*
इलैक्ट्रॉनिक बैंकिंग से भी अधिक तेजी से धन निकालने का एक तरीका है। उसे शादी कहते हैं। - माइकेल जॉर्डन
*
एक अच्छी बीबी हमेशा अपने शौहर को माफ कर देती है जब वह गलत होती है। - बराक ओबामा
*
जब आप प्रेम में होते हैं तो आश्चर्य होते रहते हैं। किंतु एक बार आपकी शादी हुई तो आप आश्चर्य करते हैं क्या हुआ?
*
और अंत में सर्वोत्तम
शादी एक सुंदर वन है जिसमें बहादुर शेर सुंदर हिरणियों द्वारा मारे जाते हैं।
***
नवगीतकार संध्या सिंह को
फेसबुक द्वारा ऑथर माने जाने पर प्रतिक्रिया
संध्या को ऑथर माना मुखपोथी जी
या सिंह से डर यश गाया मुखपोथी जी
फेस न बुक हो जाए लखनऊ थाने में
गुपचुप फेस बचाया है मुखपोथी जी
लाजवाब नवगीत, ग़ज़ल उम्दा लिखतीं
ख्याल न अब तक क्यों आया मुखपोथी जी
जुड़ संध्या के साथ बढ़ाया निज गौरव
क्यों न सैल्फी खिंचवाया मुखपोथी जी
है "मुखपोथी रत्न" ठीक से पहचानो
कद्र न करना आया है मुखपोथी जी
फेस "सलिल" में देख कभी "संजीव" बनो
अब तक समय गँवाया है मुखपोथी जी
तुम से हम हैं यह मुगालता मत पालो
हम से तुम हो सच मानो मुखपोथी जी
१९-१-२०
***
नवगीत-
पड़ा मावठा
*
पड़ा मावठा
घिरा कोहरा
जला अँगीठी
आगी ताप
*
सिकुड़-घुसड़ मत बैठ बावले
थर-थर मत कँप, गरम चाय ले
सुट्टा मार चिलम का जी भर
उठा टिमकिया, दे दे थाप
पड़ा मावठा
घिरा कोहरा
जला अँगीठी
आगी ताप
*
आल्हा-ऊदल बड़े लड़ैया
टेर जोर से,भगा लड़ैया
गा रे! राई, सुना सवैया
घाघ-भड्डरी
बन जा आप
पड़ा मावठा
घिरा कोहरा
जला अँगीठी
आगी ताप
*
कुछ अपनी, कुछ जग की कह ले
ढाई आखर चादर तह ले
सुख-दुःख, हँस-मसोस जी सह ले
चिंता-फिकिर
बना दे भाप
पड़ा मावठा
घिरा कोहरा
जला अँगीठी
आगी ताप
*
बाप न भैया, भला रुपैया
मेरा-तेरा करें लगैया
सींग मारती मरखन गैया
उठ, नुक्कड़ का
रस्ता नाप
पड़ा मावठा
घिरा कोहरा
जला अँगीठी
आगी ताप
*
जाकी मोंड़ी, बाका मोंड़ा
नैन मटक्का थोड़ा-थोड़ा
हम-तुम ने नाहक सर फोड़ा
पर निंदा का
मत कर पाप
पड़ा मावठा
घिरा कोहरा
जला अँगीठी
आगी ताप
***
लघुकथा-
भारतीय
*
- तुम कौन?
_ मैं भाजपाई / कॉंग्रेसी / बसपाई / सपाई / साम्यवादी... तुम?
= मैं? भारतीय।
***
लघुकथा-
चैन की साँस
*
- हे भगवान! पानी बरसा दे, खेती सूख रही है।
= हे भगवान! पानी क्यों बरसा दिया? काम रुक गया।
- हे भगवान! रेलगाड़ी जल्दी भेज दे समय पर कार्यालय पहुँच जाऊँ।
= हे भगवान! रेलगाड़ी देर से आये, स्टेशन तो पहुँच जाऊँ।
- हे भगवान पास कर दे, लड्डू चढ़ाऊँगा।
= हे भगवान रिश्वतखोरों का नाश कर दे।
_ हे इंसान! मेरा पिंड छोड़ तो चैन की साँस ले सकूँ।
***
रोचक संवाद कथा-
ताना-बाना
*
- ताना ताना?
= ताना पर टूट गया।
- अधिक क्यों ताना?, और बाना?
= पहन लिया।
- ताना क्यों नहीं?
= ताना ताना
- बाना क्यों नहीं ताना?
= ताना ताना, बाना ताना।
- ताना, ताना है तो बाना कैसे हो सकता है?
= इसको ताना, उसको ताना, ये है ताना वो है बाना
- ताना मारा, बाना नहीं मारा क्यों?
दोनों चुप्प.
१९.१.२०१६
...
नवगीत:
.
उड़ चल हंसा
मत रुकना
यह देश पराया है
.
ऊपर-नीचे बादल आये
सूर्य तरेरे आँख, डराये
कहीं स्वर्णिमा, कहीं कालिमा
भ्रमित न होना
मत मुड़ना
यह देश सुहाया है
.
पंख तने हों ऊपर-नीचे
पलक न पल भरअँखियाँ मीचे
ऊषा फेंके जाल सुनहरा
मुग्ध न होना
मत झुकना
मत सोच बुलाया है
...
नवगीत
काम तमाम
.
काम तमाम तमाम का
करतीं निश-दिन आप
मम्मी मैया माँ महतारी
करूँ आपका जाप
.
हो मनुष्य या यंत्र बताये कौन? विधाता हारे
भ्रमित न केवल तुम, पापा-हम खड़े तुम्हारे द्वारे
कहतीं एक बात तब तक जब तक न मान ले दुनिया
बदल गया है समय तुम्हें समझा-समझा हम हारे
कैसे जिद्दी कहूँ?
न कर सकता मैं ऐसा पाप
.
'आने दो उनको' कहकर तुम नित्य फ़ोड़तीं अणुबम
झेल रहे आतंकवाद यह हम हँस पर निकले दम
मुझ सी थीं तब क्या-क्या तुमने किया न अब बतलाओ
नाना-नानी ने बतलाया मुझको सच क्या थीं तुम?
पोल खोलकर नहीं बढ़ाना
मुझको घर का ताप
.
तुमको पता हमेशा रहता हम क्या भूल करेंगे?
हो त्रिकालदर्शी न मानकर हम क्यों शूल वरेंगे?
जन्मसिद्ध अधिकार तुम्हारा करना शक-संदेह
मेरे मित्र-शौक हैं कंडम, चुप इल्जाम सहेंगे
हम भी, पापा भी मानें यह
तुम पंचायत खाप
१९.१.२०१५
...
शिव पर दोहे
*
शिव ही शिव जैसे रहें, विधि-हरि बदलें रूप।
चित्र गुप्त हो त्रयी का, उपमा नहीं अनूप।।
*
अणु विरंचि का व्यक्त हो, बनकर पवन अदृश्य।
शालिग्राम हरि, शिव गगन, कहें काल-दिक् दृश्य।।
*
सृष्टि उपजती तिमिर से,श्यामल पिण्ड प्रतीक।
रवि मण्डल निष्काम है, उजियारा ही लीक।।
*
गोबर पिण्ड गणेश है, संग सुपारी साथ।
रवि-ग्रहपथ इंगित करें, पूजे झुकाकर माथ।।
*
लिंग-पिण्ड, भग-गोमती,हर-हरि होते पूर्ण।
शक्तिवान बिन शक्ति के, रहता सुप्त अपूर्ण।।
*
दो तत्त्वों के मेल से, बनती काया मीत।
पुरुष-प्रकृति समझें इन्हें, सत्य-सनातन रीत।।
*
लिंग-योनि देहांग कह, पूजे वामाचार।
निर्गुण-सगुण न भिन्न हैं, ज्यों आचार-विचार।।
*
दो होकर भी एक हैं, एक दिखें दो भिन्न।
जैसे चाहें समझिए, चित्त न करिए खिन्न।।
*
सत्-शिव-सुंदर सृष्टि है, देख सके तो देख।
सत्-चित्-आनंद ईश को, कोई न सकता लेख।।
*
१९.१.२०११, जबलपुर।

रविवार, 18 जनवरी 2026

जनवरी १८, सॉनेट, लघुकथा, नवगीत, रूपमाला, सुजान, छंद, दोहा, सोरठा, रोला, भाषा


सलिल सृजन जनवरी १८

0

सोरठा सलिला नयन रात में ख्वाब, दिन में दुनिया देखते। रहे न बाकी ताब, नयन नहीं देखें अगर।। . मान प्रतिष्ठा मान, नय न नयन में तो घटे। भले सहे अपमान, दोस्त न तब भी दूर हो।। . ले प्रिय दर्शन आस, अपलक नयन निहारते। रहो न दोस्त उदास, नयन कहे धीरज धरो।। १८.१.२०२६ ०००
सॉनेट
कनक हिरन

कनक हिरन आज अवध भेज रे अहेरी,
कनक महल कनक शिखर कनक द्वार बस रहे,
कनककशिपु कनक अक्ष ठठा ठठा हँस रहे,
कनक की बना बिछा सेज रे अहेरी।
कनक जोड़ जोड़ बढ़ा तेज रे अहेरी,
कनक कनक से अधिक मादक ले मान,
कनक कनक से अधिक पातक ले जान,
कनक की सनक नहीं सहेज रे अहेरी।
कन न साथ जाए कभी त्याग रे अहेरी,
जोड़-होड़ द्रोह-मोह छोड़ चेत आप,
कनकासुर वधें राम मत कर अभिमान।
छन न कभी राह तके कभी न कर देरी,
राग-द्वेष, नाश करें, नफरत है शाप,
पद-मद से दूर, कह न सत्ता भगवान।
१८.१.२०२४
•••
सॉनेट
दीप प्रज्जवलन
*
दीप ज्योति सब तम हरे, दस दिश करे प्रकाश।
नव प्रयास हो वर्तिका, ज्योति तेल जल आप।
पंथ दिखाएँ लक्ष्य वर, हम छू लें आकाश।।
शिखर-गह्वर को साथ मिल, चलिए हम लें नाप।।
पवन परीक्षा ले भले, कँपे शिखा रह शांत।
जले सुस्वागत कह सतत, कर नर्तन वर दीप।
अगरु सुगंध बिखेर दे, रहता धूम्र प्रशांत।।
भवसागर निर्भीक हो, मन मोती तन सीप।।
एक नेक मिल कर सकें, शारद का आह्वान।
चित्र गुप्त साकार हो, भाव गहें आकार।
श्री गणेश विघ्नेश हर, विघ्न ग्रहणकर मान।।
शुभाशीष दें चल सके, शुभद क्रिया व्यापार।।
दीप जले जलता रहे, हर पग पाए राह।
जिसके मन में जो पली, पूरी हो वह चाह।।
छंद- दोहा
१८-१-२०२२
***

छंद शाला
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
पाठ १
कथ्य भाव लय छंद है
*
(इस लेख माला का उद्देश्य नवोदित कवियों को छंदों के तत्वों, प्रकारों, संरचना, विधानों तथा उदाहरणों से परिचित कराना है। लेखमाला के लेखक आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ख्यात छन्दशास्त्री, नवगीतकार, लघुकथाकार, संपादक व् समालोचक हैं। सलिलजी ने ५०० से अधिक नए छंदों का अन्वेषण किया है। लेखमाला के भाग १ में मूल अवधारणों को स्पष्ट करते हुए दोहा लेखन के सूत्र स्पष्ट किये गए हैं। - सं.)
*
भाषा :
अनुभूतियों से उत्पन्न भावों को अभिव्यक्त करने के लिए भंगिमाओं या ध्वनियों की आवश्यकता होती है। भंगिमाओं से नृत्य, नाट्य, चित्र आदि कलाओं का विकास हुआ। ध्वनि से भाषा, वादन एवं गायन कलाओं का जन्म हुआ।
चित्र गुप्त ज्यों चित्त का, बसा आप में आप।
भाषा सलिला अनाहद, भाव-भंगिमा जाप।।
भाषा वह साधन है जिससे हम अपने भाव एवं विचार अन्य लोगों तक पहुँचा पाते हैं अथवा अन्यों के भाव और विचार गृहण कर पाते हैं। यह आदान-प्रदान वाणी के माध्यम से (मौखिक) या लेखनी के द्वारा (लिखित) होता है।
निर्विकार अक्षर रहे मौन, शांत निः शब्द।
भाषा वाहक भाव की, माध्यम हैं लिपि-शब्द।।
व्याकरण ( ग्रामर ) -
व्याकरण ( वि + आ + करण ) का अर्थ भली-भाँति समझना है। व्याकरण भाषा के शुद्ध एवं परिष्कृत रूप सम्बन्धी नियमोपनियमों का संग्रह है। भाषा के समुचित ज्ञान हेतु वर्ण विचार (ओर्थोग्राफी) अर्थात वर्णों (अक्षरों) के आकार, उच्चारण, भेद, संधि आदि , शब्द विचार (एटीमोलोजी) याने शब्दों के भेद, उनकी व्युत्पत्ति एवं रूप परिवर्तन आदि तथा वाक्य विचार (सिंटेक्स) अर्थात वाक्यों के भेद, रचना और वाक्य विश्लेषण को जानना आवश्यक है।
वर्ण शब्द संग वाक्य का, कविगण करें विचार।
तभी पा सकें वे 'सलिल', भाषा पर अधिकार।।
वर्ण / अक्षर :
ध्वनि विशेष के लिए निर्धारित रैखिक आकार को वर्ण कहा जाता है। उस आकार से वही ध्वनि समझी जाती है। वर्ण के दो प्रकार स्वर (वोवेल्स) तथा व्यंजन (कोंसोनेंट्स) हैं।
अजर अमर अक्षर अजित, ध्वनि कहलाती वर्ण।
स्वर-व्यंजन दो रूप बिन, हो अभिव्यक्ति विवर्ण।।
स्वर ( वोवेल्स ) :
स्वर वह मूल ध्वनि है जिसे विभाजित नहीं किया जा सकता, वह अक्षर है। स्वर के उच्चारण में अन्य वर्णों की सहायता की आवश्यकता नहीं होती। यथा - अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ ए, ऐ, ओ, औ, अं, अ:। स्वर के दो प्रकार १. हृस्व (अ, इ, उ, ऋ) तथा दीर्घ (आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अ:) हैं।
अ, इ, उ, ऋ हृस्व स्वर, शेष दीर्घ पहचान।
मिलें हृस्व से हृस्व स्वर, उन्हें दीर्घ ले मान।।
व्यंजन (कांसोनेंट्स) :
व्यंजन वे वर्ण हैं जो स्वर की सहायता के बिना नहीं बोले जा सकते। व्यंजनों के चार प्रकार १. स्पर्श (क वर्ग - क, ख, ग, घ, ङ्), (च वर्ग - च, छ, ज, झ, ञ्.), (ट वर्ग - ट, ठ, ड, ढ, ण्), (त वर्ग त, थ, द, ढ, न), (प वर्ग - प,फ, ब, भ, म) २. अन्तस्थ (य वर्ग - य, र, ल, व्, श), ३. (उष्म - श, ष, स ह) तथा ४. (संयुक्त - क्ष, त्र, ज्ञ) हैं। अनुस्वार (अं) तथा विसर्ग (अ:) भी व्यंजन हैं।
भाषा में रस घोलते, व्यंजन भरते भाव।
कर अपूर्ण को पूर्ण वे मेटें सकल अभाव।।
शब्द :
अक्षर मिलकर शब्द बन, हमें बताते अर्थ।
मिलकर रहें न जो 'सलिल', उनका जीवन व्यर्थ।।
अक्षरों का ऐसा समूह जिससे किसी अर्थ की प्रतीति हो शब्द कहलाता है। यह भाषा का मूल तत्व है।
शब्द के प्रकार
१. अर्थ की दृष्टि से : सार्थक (जिनसे अर्थ ज्ञात हो यथा - कलम, कविता आदि) एवं निरर्थक (जिनसे किसी अर्थ की प्रतीति न हो यथा - अगड़म बगड़म आदि)।
२. व्युत्पत्ति (बनावट) की दृष्टि से : रूढ़ (स्वतंत्र शब्द - यथा भारत, युवा, आया आदि), यौगिक (दो या अधिक शब्दों से मिलकर बने शब्द जो पृथक किए जा सकें यथा - गणवेश, छात्रावास, घोड़ागाड़ी आदि) एवं योगरूढ़ (जो दो शब्दों के मेल से बनते हैं पर किसी अन्य अर्थ का बोध कराते हैं यथा - दश + आनन = दशानन = रावण, चार + पाई = चारपाई = खाट आदि)।
३. स्रोत या व्युत्पत्ति के आधार पर तत्सम (मूलतः संस्कृत शब्द जो हिन्दी में यथावत प्रयोग होते हैं यथा - अम्बुज, उत्कर्ष आदि), तद्भव (संस्कृत से उद्भूत शब्द जिनका परिवर्तित रूप हिन्दी में प्रयोग किया जाता है। यथा - निद्रा से नींद, छिद्र से छेद, अर्ध से आधा, अग्नि से आग आदि) अनुकरण वाचक (विविध ध्वनियों के आधार पर कल्पित शब्द यथा - घोडे की आवाज से हिनहिनाना, बिल्ली के बोलने से म्याऊँ आदि), देशज (आदिवासियों अथवा प्रांतीय भाषाओँ से लिए गए शब्द जिनकी उत्पत्ति का स्रोत अज्ञात है यथा - खिड़की, कुल्हड़ आदि), विदेशी शब्द ( संस्कृत के अलावा अन्य भाषाओँ से लिए गए शब्द जो हिन्दी में जैसे के तैसे प्रयोग होते हैं यथा - अरबी से - कानून, फकीर, औरत आदि, अंग्रेजी से - स्टेशन, स्कूल, ऑफिस आदि)।
४. प्रयोग के आधार पर विकारी (वे शब्द जिनमें संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया या विशेषण के रूप में प्रयोग किए जाने पर लिंग, वचन एवं कारक के आधार पर परिवर्तन होता है यथा - लड़का लड़के लड़कों लड़कपन, अच्छा अच्छे अच्छी अच्छाइयां आदि), अविकारी (वे शब्द जिनके रूप में कोई परिवर्तन नहीं होता. इन्हें अव्यय कहते हैं। इनके प्रकार क्रिया विशेषण, सम्बन्ध सूचक, समुच्चय बोधक तथा विस्मयादि बोधक हैं। यथा - यहाँ, कहाँ, जब, तब, अवश्य, कम, बहुत, सामने, किंतु, आहा, अरे आदि) भेद किए गए हैं।
छंद :
सामान्यतः ध्वनि से उत्पन्न लयखंड को पहचानने के लिये छन्द शब्द का प्रयोग किया जाता है। 'चद' धातु से बने 'छंद' शब्द का अर्थ आल्हादित या प्रसन्न करना है। वर्णों को क्रम विशेष में रखने पर विशेष तरह का लय खंड (रुक्न उर्दू, मीटर अंग्रेजी) उत्पन्न होता है। लय खण्डों की आवृत्ति को छंद (बह्र, फॉर्म ऑफ़ पोएट्री) कहा जाता है। 'छंद' का अर्थ है छाना, जो मन-मस्तिष्क पर छा जाए वह छंद है। छ्न्द से काव्य में लय और रंजकता आती है। छोटी-बड़ी ध्वनियों को उच्चारण के अनुसार वर्ण कहा जाता है। वर्ण के लघु-गुरु उच्चारणों को मात्रा कहते हैं। मात्राओं का विशिष्ट समायोजन लय विशेष (धुन) को जन्म देता है। मात्रा क्रम, मात्रा संख्या या विरामस्थल में परिवर्तन होने से लय और तदनुसार छंद परिवर्तित हो जाता है।
छंद के प्रकार -
१.मात्रिक छंद - मात्रा गणना के आधार पर रचे गए छंद कहे जाते हैं। जैसे दस मात्राओं से निर्मित छंद को दैशिक छंद कहा जाता है। बारह मात्राओं से निर्मित छंद आदित्य छंद हैं। मात्रिक छंद की हर पंक्ति (पद) में मात्रा संख्या समान होती है।
२. वर्णिक छंद - वर्ण (अक्षर) अथवा गण संयोजन के आधार पर रचे गए छंदों को वर्णिक छंद कहा जाता हैं। उदाहरण प्रतिष्ठा छंद ४ वर्ण से जबकि गायत्री छंद ६ वर्णों के समायोजन से बनते हैं। वर्णिक छंद की हर पंक्ति में वर्ण अथवा गण संख्या व् क्रम समान होना आवश्यक है।
गण - तीन वर्णों को मिलाकर बनी ईकाई को गण कहते हैं। हिंदी में ८ गण हैं जिनकी संयोजन से गण छंद बनते हैं।
गण सूत्र 'यमाताराजभानसलगा' के पहले ८ अक्षरों में अगले २ -२ अक्षर जोड़ कर गानों की संरचना ज्ञात की जाती है। तदनुसार यगण यमाता १२२, मगण मातारा २२२, तगण ताराज २२१, रगण राजभा २१२ , जगण जभान १२१, भगण भानस २११ तथा सगण सलगा ११२ हैं।
उदाहरण :
यगण - यमाता - १२२ - हमारा
मगण - मातारा - २२२ - दोधारा
तगण - ताराज - २२१ - शाबाश
रगण - राजभा - २१२ - आइए
जगण - जभान - १२१ - सुहास
भगण - भानस - २११ - भारत
नगण - नसल - १११ - सहज
सगण - सलगा - ११२ - सहसा
पिंगल / छंद शास्त्र - छन्दों की रचना और गुण-अवगुण के अध्ययन को छन्दशास्त्र कहते हैं। चूँछंद शास्त्र का प्रथम ग्रंथ आचार्य पिंगल ने लिखा इसलिए इसे पिंगलशास्त्र भी कहते हैं। गद्य की कसौटी ‘व्याकरण’ और कविता की कसौटी ‘छन्द’ है।
काव्य और छन्द के प्रारम्भ में ‘अगण’ अर्थात ‘अशुभ गण’ नहीं आना चाहिए।
छंद के अंग :
छंद के आठ अंग १. वर्ण या मात्रा, २. गण ३. पद या पंक्ति, ४. चरण, ५. यति या विराम स्थल, ६. तुकांत ७. पदांत तथा ८. गति हैं।
१. वर्ण या मात्रा - अनुभूति या विचार को अभिव्यक्त करने के लिए प्रयुक्त शब्दों के वर्ण या मात्राएँ।
२. गण - छंद में प्रयुक्त गण प्रकार तथा क्रम।
३. पद या पंक्ति - छंद में प्रयुक्त पंक्ति संख्या।
४. चरण - पंक्ति में आये दो विराम स्थलों या यति स्थानों के बीच का भाग अथवा ऐसे भागों की संख्या। चरणों को उनके स्थान के अनुसार आदि चरण, मध्य चरण, अंतिम चरण, सम चरण, विषम चरण आदि कहा जाता है।
५. यति या विराम स्थल - छंद की पंक्ति को पढ़ते या बोलते समय कुछ शब्दों के बाद श्वास लेने हेतु रुका जाता है। ऐसे स्थल को यति कहा जाता है।
६. तुकांत - छंद-पंक्तियों के अंत में समान उच्चार के शब्द।
७. पदांत - छंद पंक्ति का अंतिम शब्द।
८. गति - छंद विशेष को पढ़ने का प्रवाह।
मात्रा गणना -
हिंदी में वर्ण की दो मात्राएँ लघु और गुरु होती हैं जिनका पदभार क्रमश: १ और २ गिना जाता है। अ, इ, उ, ऋ तथा इनकी मात्राओं (मात्रा रहित वर्ण, ि, ु) से युक्त वर्ण लघु, ह्रस्व या छोटे कहे जाते हैं। आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अ: तथा इनकी मात्राओं (ा, ी, ू, े, ै, ो, ौ, ां, ा:) से युक्त वर्ण गुरु, दीर्घ या बड़ी कही जाती हैं।
उदाहरण -
विकास - १२१ = ४, भारती - २१२ = ५, हिंदी - २२ = ४, ह्रदय - १११ = ३, मार्मिक २११ = ४, स्थल - ११ = २, मनस्वी - १२२ = ५, त्यक्त - २१ = ३, प्रयास - १२१ = ४, विप्र - २१ = ३, अहं - १२ = ३ आदि।
रस - रस का अर्थ है आनंद। काव्य को रचने, सुनने या पढ़ने से प्राप्त आनंद ही रस है। रस को काव्य की आत्मा, व आत्मानन्द भी कहा गया है।नाट्यशास्त्र प्रवर्तक भरत मुनि के काल से ही रस को काव्य माधुर्य और अलंकार दोनों रूपों में देखा गया। अग्निपुरनकार के अनुसार " वाग्वैदग्ध्य प्रधानेsपि रस एवात्र जीवितं", विश्वनाथ के शब्दों में "रसात्मकं वाक्यं काव्यं" , राजशेखर के मतानुसार शब्दार्थौ ते शरीर रस आत्मा" ।
अलंकार - अलम् अर्थात् भूषण, जो भूषित करे वह अलंकार है। अलंकार, कविता-कामिनी के सौन्दर्य को बढ़ाने वाले तत्व होते हैं। जिस प्रकार आभूषण से नारी का लावण्य बढ़ जाता है, उसी प्रकार अलंकार से कविता की शोभा बढ़ जाती है। कहा गया है - 'अलंकरोति इति अलंकारः' (जो अलंकृत करता है, वही अलंकार है।) डंडी के अनुसार "तै शरीरं च काव्यानमलंकारश्च दर्शिता:" तथा "काव्यशोभाकरान धर्मान अलंकारान प्रचक्षते। वामन के शब्दों में -"सौन्दर्यंलंकार" । ध्वन्यालोक में "अनन्ता हि वाग्विकल्पा:" कहकर अलंकारों की अगणेयता की ओर संकेत किया गया है। दंडी ने "ते चाद्यापि विकल्प्यंते" कहकर इनकी नित्य संख्यवृद्धि का ही निर्देश किया है। विचारकों ने अलंकारों को शब्दालंकार, अर्थालंकार, रसालंकार, भावालंकार, मिश्रालंकार, उभयालंकार तथा संसृष्टि और संकर नामक भेदों में बाँटा है। इनमें प्रमुख शब्द तथा अर्थ के आश्रित अलंकार हैं।
प्रतीक - प्रतीक का संबंध मनुष्य की चिंतन प्रणाली से है । प्रतीक का शाब्दिक अर्थ अवयव या चिह्न है। कविता में प्रतीक हमारी भाव सत्ता को प्रकट अथवा गोपन करने का माध्यम है। प्रत्येक भाव व्यंजना की विशिष्ट प्रणाली है। इससे सूक्ष्म अर्थ व्यंजित होता है । डॉक्टर भगीरथ मिश्र कहते हैं कि ” सादृश्य के अभेदत्व का घनीभूत रूप ही प्रतीक है”। उनके मंतव्य में प्रतीक की सृष्टि अप्रस्तुत बिंब द्वारा ही संभव है।प्रतीक के कुछ मौलिक गुण धर्म है जैसे सांकेतिकता, संक्षिप्तता, रहस्यात्मकता, बौद्धिकता, भावप्रकाशयत्ता एवं प्रत्यक्षतः प्रतिज्ञा प्रगटीकरण से बचाव आदि। आधुनिक काव्य प्रतीक सामान्य लक्षण को अपने अंदर समाहित कर पाठक को विषय को समझने, अनुभव करने और अर्थ में संबोधन का व्यापक विकल्प प्रस्तुत करने में सहायक होते हैं।
प्रकार :
१. रूपात्मक प्रतीक - राधा चमक रही चंदा सी, कान्ह सूर्य सा दमक रहा
२. गुण-स्वभावात्मक प्रतीक - कागा हैं सत्ता के वाहक, राजहंस सड़कों पर
३. क्रियात्मक प्रतीक - यंत्रों की जयकार न हो अब, श्रम को पूजा जाए
४. मिश्र प्रतीक - झोपड़ी में श्रम करे उत्पाद, भोग महलों में करते नेता
बिम्ब - बिंब किसी पदार्थ का मानचित्र या मानसी चित्र होता है। पाश्चात्य काव्यशास्त्र में बिंब को कविता का अनिवार्य अंग माना है। बिंब शब्दों द्वारा चित्रित किए जाने वाला वह न्यूनाधिक संविदात्मक चित्र है जो अंश का रूप आत्मक होता है और अपने संदर्भ में मानवीय संवेदनाओं से संबंध रखता है। किंतु वह कविता की भावना या उसके आगे को पाठक तक पहुँचाता है। चित्रमयता वर्तमान कविता की अनिवार्यता है , क्योंकि चित्रात्मक स्थितियों का पाठक चाक्षुष अनुभव कर पाता है। कविता में बिंब के प्रयोग से पाठक या श्रोता कविता को इंद्रिय बोध और मानसिक वह दोनों ही प्रकार किसे सुगमता से आत्मसात कर लेता है। छायावादी कविता और आधुनिक कविता ने बिम्बों को स्वीकार किया। इसलिए यह कविताएँ छंद मुक्त होकर भी पाठक को सम्वेदनाओं से अधिक निकट ठहरती है। बिम्बों के दो मौलिक वर्ग हैं।
(अ) शुद्ध इंद्रियबोध गम्य बिंब- १ चाक्षुष बिंब, २ नाद बिंब, ३ गन्ध बिम्ब, ४ स्वाद बिंब, स्पर्श बिंब। पाँचों ज्ञानेइंद्रियों के विषयों से संबंधित बिंब इंद्रिय बोध गम्य बिंब कहलाते है ।
गाल गुलाबी कर-किरण, लिए हुए जयमाल
किसका स्वागत कर रही, उषा सूर्य रख भाल
(आ) मिश्रित इंद्रिय बोध के आधार पर यह संवेदात्मक बिम्ब - १ मानस बिंब , २ स्रोत वैभिन्नयगत बिंब -(अ) धार्मिक एवं पौराणिक बिंब (ब) तंत्रों से गृहीत बिंब (स) महाकाव्यों से गृहीत बिंब (द) ऐतिहासिक स्रोतों से गृहीत बिंब।
भरत पर अगर नहीं विश्वास, किया तो सहे अयोध्या त्रास
नृपति ने वचन किया है भंग, न होगा अधरों पर अब हास
मिथक - प्राचीन पुराकथाओं के वे तत्व जो नवीन स्थितियों में नये अर्थ का वहन करे मिथक कहलाते हैं। मिथकों का जन्म ही इसलिए हुआ था कि वे प्रागैतिहासिक मनुष्य के उस आघात और आतंक को कम कर सकें, जो उसे प्रकृति से सहसा अलग होने पर महसूस हुआ था-और मिथक यह काम केवल एक तरह से ही कर सकते थे-स्वयं प्रकृति और देवताओं का मानवीकरण करके। इस अर्थ में मिथक एक ही समय में मनुष्य के अलगाव को प्रतिबिम्बित करते हैं और उस अलगाव से जो पीड़ा उत्पन्न होती है, उससे मुक्ति भी दिलाते हैं। प्रकृति से अभिन्न होने का नॉस्टाल्जिया, प्राथमिक स्मृति की कौंध, शाश्वत और चिरन्तन से पुनः जुड़ने का स्वप्न ये भावनाएँ मिथक को सम्भव बनाने में सबसे सशक्त भूमिका अदा करती हैं। सच पूछें, तो मिथक और कुछ नहीं प्रागैतिहासिक मनुष्य का एक सामूहिक स्वप्न है जो व्यक्ति के स्वप्न की तरह काफी अस्पष्ट, संगतिहीन और संश्लिष्ट भी है। कालान्तर में पुरातन अतीत की ये अस्पष्ट गूँजें, ये धुँधली आकांक्षाएँ एक तर्कसंगत प्रतीकात्मक ढाँचे में ढल जाती हैं और प्राथमिक यथार्थ की पहली, क्षणभंगुर, फिसलती यादें महाकाव्यों की सुनिश्चित संरचना में गठित होती हैं। मिथक और इतिहास के बीच महाकाव्य एक सेतु है, जो पुरातन स्वप्नों को काव्यात्मक ढाँचे में अवतरित करता है। माना गया है कि जितने मिथक हैं, सब परिकल्पना पर आधारित हैं। फिर भी यह मूल्य आधारित परिकल्पना थी जिसका उद्देश्य सामाजिक व्यवस्था को मजबूत करना था। प्राचीन मिथकों की खासियत यही थी कि वह मूल्यहीन और आदर्शविहीन नहीं थे। मिथकों का जन्म समाज व्यवस्था को कायम रखने के लिए हुआ। मिथक लोक विश्वास से जन्मते हैं। पुरातनकाल में स्थापित किये गये धार्मिक मिथकों का मंतव्य स्वर्ग तथा नरक का लोभ, भय दिखाकर लोगों को विसंगतियों से दूर रखना था। मिथ और मिथक भिन्न है। मिथक असत्य नहीं है। इस शब्द का प्रयोग साहित्य से इतर झूठ या काल्पनिक कथाओं के लिए भी किया जाता है।
मिथ - मिथ अतीत में घटी प्राकृतिक घटना, सामाजिक विश्वास या धार्मिक रीति को स्पष्ट करने हेतु गढ़ी सर्वश्रुत गयी कहानी है। मिथ को पुराण कथा भी कहा जाता है।
१. दोहा
दोहा गाथा सनातन, शारद कृपा पुनीत।
साँची साक्षी समय की, जनगण-मन की मीत।।
दोहा हिंदी का सर्वाधिक लोकप्रिय, लोकोपयोगी, पुराना तथा मारक छंद है। दोहा गागर में सागर की तरह कम शब्दों में गहरी बात कहने की सामर्थ्य रखता है। दोहा को 'दोपदी' (दो पंक्ति वाला छंद) भी कहते हैं। गौ रूपी भाषा को दूह कर अर्थ रूपी दूध निकलने की असीम सामर्थ्य रखने के कारण इसे 'दूहा व् दूहड़ा भी कहा गया। दोहा छंद में ' दो' का बहुत महत्व है।
दोहा में पंक्ति संख्या २
प्रति पंक्ति चरण संख्या २
प्रति पंक्ति यति स्थान (१३-११ मात्राओं पर) २
पदांत में सुनिश्चित वर्ण २ (गुरु लघु)
पदादि में लय साधने में सहायक शब्द/शब्दांश की मात्रिक आवृत्ति २
निषेध - पंक्ति के आरम्भ में एक शब्द में जगण (जभान १२१ )
प्रथम पंक्ति - १३ मात्रा यति ११ मात्रा यति
१ विषम चरण , २ सम चरण
प्रथम पंक्ति - १३ मात्रा यति ११ मात्रा यति
३ विषम चरण , ४ सम चरण
अमरकंटकी नर्मदा , दोहा अविरल धार। - पहला पद
पहला / विषम चरण / दूसरा / सम चरण
गत-आगत से आज का, सतत ज्ञान व्यापार।। - दूसरा पद
तीसरा / विषम चरण / चौथा / सम चरण
कल का कल से आज ही, कलरव सा संवाद.
११ २ ११ २ २१ २ ११११ २ २२१
कल की कल हिन्दी करे, कलकल दोहा नाद.
११ २ ११ २२ १२ ११११ २२ २१
(कल = अतीत, भविष्य, शान्ति, यंत्र, कलरव पंछियों का स्वर, कलकल पानी बहने का स्वर)
दोहा में प्रयुक्त लघु और गुरु मात्राओं की संख्या के आधार पर दोहा के २३ प्रकार हो सकते हैं।
दोहा और शेर :
दोहा की अपने आप में पूर्ण एवं स्वतंत्र होने की प्रवृत्ति कालांतर में शे'र के रूप में फ़ारसी काव्य में भिन्न भाव-भूमि में विकसित हुई। दोहा और शे'र दोनों में दो पंक्तियाँ होती हैं, किंतु शे'र में चुलबुलापन होता है तो दोहा में अर्थ गौरव। शेर की पंक्तियाँ आसमान पदभार की हो सकती हैं जबकि दोहा की पंक्तियाँ सांभर और यति की होना आवश्यक है। शे'र में पद का चरण (पंक्ति या मिसरा का विभाजन) नहीं होता जबकि दोहा के दोनों पद दो-दो चरणों में यति (विराम) द्वारा विभक्त होते हैं।
२. सोरठा
दोहा के विषम चरण को सम और सम चरण को विषम बनाने पर सोरठा छंद बनता है। सोरठा भी दो पदीय, चार चरणीय छंद है। इसके पद २४ मात्रा के होते हैं जिनमें ११-१३ मात्रा पर यति होती है। दोहा के सम चरणों में गुरु-लघु पदांत होता है, सोरठा में यह पदांत बंधन विषम चरण में होता है। दोहा में विषम चरण के आरम्भ में 'जगण' वर्जित होता है जबकि सोरठा में सम चरणों में. इसलिए कहा जाता है-
बन जाता रच मीत, दोहा उल्टे सोरठा।
११ २२ ११ २१, २२ २२ २१२
काव्य-सृजन की रीत, दोनों मिलकर बनाते।।
दोहा और सोरठा
दोहा: काल ग्रन्थ का पृष्ठ नव, दे सुख-यश-उत्कर्ष.
करनी के हस्ताक्षर, अंकित करें सहर्ष.
सोरठा- दे सुख-यश-उत्कर्ष, काल-ग्रन्थ का पृष्ठ नव.
अंकित करे सहर्ष, करनी के हस्ताक्षर.
सोरठा- जो काबिल फनकार, जो अच्छे इन्सान.
है उनकी दरकार, ऊपरवाले तुझे क्यों?
दोहा- जो अच्छे इन्सान है, जो काबिल फनकार.
ऊपरवाले तुझे क्यों, है उनकी दरकार?
३. रोला छंद
रोला छंद के हर पद में सोरठा की ही तरह ११-१३ की यति सहित २४ मात्राएँ होती हैं। रोला के विषम चरण के अंत में गुरु लघु का बंधन नहीं होता। रोला का पदांत या सम चरणान्त गुरु होता है। दोहा तथा सोरठा में २ पद होते हैं जबकि रोला में ४ पद होते हैं।
हरे-भरे थे बाँस, वनों में अब दुर्लभ हैं
१२ १२ २ २१ , १२ २ ११ २११ २
नहीं चैन की साँस, घरों में रही सुलभ है
बाँस हमारे काम, हमेशा ही आते हैं
हम उनको दें काट, आप भी दुःख पाते हैं
४. कुण्डलिया
दोहा तथा रोला के योग से कुण्डलिनी या कुण्डली छंद बनता है। कुण्डलिया की पहली दो पंक्तियों में १३-११ की यति सहित गुरु-लघु पदांत होता है। शेष ४ पंक्तियों में ११-१३ पर यति सहित गुरु पदांत होता है। इसके अतिरिक्त कुण्डलिया में दो बंदन और हैं। दोहा का अंतिम (चौथा) चरण रोला का पहला (पाँचवे) चरण के रूप में दोहराया जाता है। दोहा के आरम्भ में प्रयुक्त शब्द या शब्द समूह रोला के अंत में प्रयोग किये जाते हैं।
नाग के बैठने की मुद्रा को कुंडली मारकर बैठना कहा जाता है। इसका भावार्थ जमकर या स्थिर होकर बैठना है। इस मुद्रा में सर्प का मुख और पूंछ आस-पास होती है। इस गुण के आधार पर कुण्डलिनी छंद बना है जिसके आदि-अंत में एक समान शब्द या शब्द समूह होता है।
दोहा
हिंदी की जय बोलिए, उर्दू से कर प्रीत
अंग्रेजी को जानिए, दिव्य संस्कृत रीत
रोला
दिव्य संस्कृत रीत, तमिल-तेलुगु अपनायें
गुजराती कश्मीरी असमी, अवधी गायें
बाङ्ग्ला सिन्धी उड़िया, 'सलिल' मराठी मधुमय
बृज मलयालम कन्नड़ बोलें हिंदी की जय
इन छंदों की रचना संबंधी कोी शंका या जिज्ञासा हो तो इस पत्रिका संपादक के माध्यम से अथवा निम्न से सम्पर्क किया जा सकता है। अगले अंक में कुछ और छंदों की जानकारी दी जाएगी।
१८.१.२०२०
***
एक रचना
पाई शाल
*
बड़े भाग से पाई शाल
हम लपेट बैठे खुशहाल
*
हुई प्रेरणा खीचें चित्र
भले आपको लगे विचित्र
*
चली कानपुर से चुपचाप
आई जबलपुर अपने आप
*
गंग-नर्मदा सेतु बनी
ह्रद-ऊष्मा से सनी-सनी
*
ठंड न लगने देगी यह
नेहिल नदी लहर सम बह
*
लड्डू, तिल-गुड़ गजक मधुर
खाकर हर्षित हम जी भर
*
सब दुनिया है दोरंगी
समझे तो मति हो चंगी
*
***
लघुकथा-
निर्दोष
*
उसने मनोरंजन के लिए अपने साथियों सहित जंगल में विचरण कर रहे पशुओं का वध कर दिया.
उसने मदहोशी में सडक के किनारे सोते हुए मनुष्यों को कार से कुचल डाला.
पुलिस-प्रशासन के कान पर जून नहीं रेंगी. जन सामान्य के आंदोलित होने और अखबारबाजी होने पर ऐसी धाराओं में वाद स्थापित किया गया कि जमानत मिल सके.
अति कर्तव्यनिष्ठ न्यायालय ने अतिरिक्त समय तक सुनवाई कर तत्क्षण फैसला दिया और जमानत के निर्णय की प्रति उपलब्ध कराकर खुद को धन्य किया.
बरसों बाद सुनवाई आरम्भ हुई तो एक-एक कर गवाह मरने या पलटने लगे.
दिवंगतों के परिवार चीख-चीख कर कहते रहे कि गवाहों को बचाया जाए पर कुछ न हुआ.
अंतत:, पुलिस द्वारा लगाये गए आरोप सिद्ध न हो पाने का कारण बताते हुए न्यायालय ने उसे घोषित कर दिया निर्दोष.
***
नवगीत
अभी नहीं
*
अभी नहीं सच हारा
प्यारे!
कभी नहीं सच हारा
*
कृष्ण मृगों को
मारा तुमने
जान बचाकर भागे.
सोतों को कुचला
चालक को
किया आप छिप आगे.
कर्म आसुरी करते हैं जो
सहज न दंडित होते.
बहुत समय तक कंस-दशानन
महिमामंडित होते.
लेकिन
अंत बुरा होता है
समय करे निबटारा.
अभी नहीं सच हारा
प्यारे!
कभी नहीं सच हारा
*
तुमने निर्दोषों को लूटा
फैलाया आतंक.
लाज लूट नारी की
निज चेहरे पर मलते पंक.
काले कोट
बचाते तुमको
अंधा करता न्याय.
मिटा साक्ष्य-साक्षी
जीते तुम-
बन राक्षस-पर्याय.
बोलो क्या आत्मा ने तुमको
कभी नहीं फटकारा?
अभी नहीं सच हारा
प्यारे!
कभी नहीं सच हारा
*
जन प्रतिनिधि बन
जनगण-मन से
कपट किया है खूब.
जन-जन को
होती है तुमसे
बेहद नफरत-ऊब.
दाँव-पेंच, छल,
उठा-पटक हर
दिखा सुनहरे ख्वाब
करे अंत में निपट अकेला
माँगे समय जवाब.
क्या जाएगा साथ
कहो,
फैलाया खूब पसारा.
१८.१.२०१७
***
रसानंद दे छंद नर्मदा १३
रूपमाला / मद / मदन / मदनावतारी छंद
लक्षण छंद:
रूपमाला रत्न चौदह, दस दिशा सम ख्यात।
कला गुरु-लघु रख चरण के, अंत उग प्रभात।।
नाग पिंगल को नमनकर, छंद रचिए आप्त।
नव रसों का पान करिए, 'सलिल' सुख मन-व्याप्त।।
*
तीन दो दो, तीन दो दो, तीन दो दो ताल
रूपमाला छंद की है यही उत्तम चाल - नारायण दास, हिंदी छ्न्दोलक्षण
छंद-लक्षण: जाति अवतारी, अर्ध सम मात्रिक छंद, प्रति पंक्ति मात्रा २४ मात्रा, यति चौदह-दस, पदांत गुरु-लघु (तगण, जगण), दो-दो पदों की तुकांतता।
मात्रा बाँट - २१२२ / २१२२ / २१२२ / २१, २१ के स्थान पर १११ भी मान्य। तीसरी, दसवीं, सत्रहवीं मात्रा यथा संभव लघु।
*
उदाहरण:
१. देश ही सर्वोच्च है- दें, देश-हित में प्राण।
जो- उन्हीं के योग से है, देश यह संप्राण।।
करें श्रद्धा-सुमन अर्पित, यादकर बलिदान।
पीढ़ियों तक वीरता का, 'सलिल' होगा गान।।
२. वीर राणा अश्व पर थे, हाथ में तलवार।
मुगल सैनिक घेर करते, अथक घातक वार।।
दिया राणा ने कई को, मौत-घाट उतार।
पा न पाये हाय! फिर भी, दुश्मनों से पार।।
ऐंड़ चेटक को लगायी, अश्व में थी आग।
प्राण-प्राण से उड़ हवा में, चला शर सम भाग।।
पैर में था घाव फिर भी, गिरा जाकर दूर।
प्राण त्यागे, प्राण-रक्षा की- रुदन भरपूर।।
किया राणा ने, कहा: 'हे अश्व! तुम हो धन्य।
अमर होगा नाम तुम हो तात! सत्य अनन्य।।
३. रत्न दिसि कल रूपमाला, साजिए सानंद।
रामही के शरण में रहि, पाइये आनंद।।
जातु हौ वन वादिही गल, बांधिके बहु तंत्र ।
धामहीं किन जपत कामद, रामनाम सुमंत्र।। - जगन्नाथ प्रसाद भानु
४. दृष्टि की धुँधली परिधि में, आ गया आकार।
बज गया आनंददायी, ह्रदयतंत्री तार।।
केश की काली घटा में, चंद्र सी मुख-छाप।
प्रीति-पथ पर फेंकती थी, ज्योति अपने आप।। - रामदेव लाल 'विभोर'
५. धडकनें मदहोश पागल, नयन छलके प्यार।
बोल कुछ बोलें नहीं लब, मौन सब व्यवहार।।
शांति, चिरस्थायित्व खुशियाँ, प्रीत के उपहार।
झूमता जब प्रेम-अँगना, बह चले रस-धार।। - डॉ. प्राची सिंह
६. गर बचाना चाहते हम आज यह संसार।
है जरूरी पेड़-पौधों से करें सब प्यार।।
पेड़ ही तो बनाते हैं मेघमय आकाश।
पेड़ वर्ष ला बुझाते इस धरा की प्यास।। - संजय मिश्र 'हबीब'
७.स्पर्श करने लगी लज्जा, ललित कर्ण कपोल।
खिला पुलक कदम्ब सा था, भरा गदगद बोल।। -जय शंकर प्रसाद, कामायनी
***
आइये कविता करें: ७
.
एक और प्रयास.......
नव गीत
आभा सक्सेना
.
सूरज ने छाया को ठगा १५
किरनों नेे दिया दग़ा १२
अब कौन है, जो है सगा १४
कांपता थर थर अंधेरा १४
कोहरे का धुन्ध पर बसेरा १७
जागता अल्हड़ सवेरा १४
रोशनी का अधेरों से १४
दीप का जली बाती से १४
रिश्तें हैं बहुत करीब से १५
कांपती झीनी सी छांव १४
पकड़ती धूप की बांह १३
ताकती एक और ठांव १४
इस नवगीत के कथ्य में नवता तथा गेयता है. यह मानव जातीय छंद में रचा गया है. शैल्पिक दृष्टि से बिना मुखड़े के ४ त्रिपंक्तीय समतुकान्ती अँतरे हैं. एक प्रयोग करते हैं. पहले अँतरे की पहली पंक्ति को मुखड़ा बना कर शेष २ पंक्तियों को पहले तीसरे अँतरे के अंत में प्रयोग किया गया है. दूसरे अँतरे के अंत में पंक्ति जोड़ी गयी है. आभा जी! क्या इस रूप में यह अपनाने योग्य है? विचार कर बतायें।
सूर्य ने ५
छाया को ठगा ९
काँपता थर-थर अँधेरा १४
कोहरे का है बसेरा १४
जागता अल्हड़ सवेरा १४
किरनों नेे ६
दिया है दग़ा ८
रोशनी का दीपकों से १४
दीपकों का बातियों से १४
बातियों का ज्योतियोँ से १४
नेह नाता ७
क्यों नहीं पगा ८
छाँव झीनी काँपती सी १४
बाँह धूपिज थामती सी १४
ठाँव कोई ताकती सी १४
अब कौन है ७
किसका सगा ७
१८.१.२०१५
***
कार्यशाला
आइये! कविता करें ६ :
.
मुक्तक
आभा सक्सेना
कल दोपहर का खाना भी बहुत लाजबाब था, = २६
अरहर की दाल साथ में भुना हुआ कबाब था। = २६
मीठे में गाजर का हलुआ, मीठा रसगुल्ला था, = २८
बनारसी पान था पर, गुलकन्द बेहिसाब था।। = २६
लाजवाब = जिसका कोई जवाब न हो, अतुलनीय, अनुपम। अधिक या कम लाजवाब नहीं होता, भी'' से ज्ञात होता है कि इसके अतिरिक्त कुछ और भी स्वादिष्ट था जिसकी चर्चा नहीं हुई. इससे अपूर्णता का आभास होता है. 'भी' अनावश्यक शब्द है.
तीसरी पंक्ति में 'मीठा' और 'मीठे' में पुनरावृत्ति दोष है. गाजर का हलुआ और रसगुल्ला मीठा ही होता है, अतः यहाँ मीठा लिखा जाना अनावश्यक है.
पूरे मुक्तक में खाद्य पदार्थों की प्रशंसा है. किसी वस्तु का बेहिसाब अर्थात अनुपात में न होना दोष है, मुक्तककार का आशय दोष दिखाना प्रतीत नहीं होता। अतः, इस 'बेहिसाब' शब्द का प्रयोग अनुपयुक्त है.
कल दुपहर का खाना सचमुच लाजवाब था = २४
अरहर की दाल बाटी औ' भुना कवाब था = २४
गाजर का हलुआ खीर रसगुल्ला न भूलिए- = २५
गुलकंदी पान बनारसी भी खुशगवार था = २५
.
छंद सलिला:
सुजान छंद
*
द्विपदीय मात्रिक सुजान छंद में चौदह तथा नौ मात्राओं पर यति तथा पदांत में गुरु-लघु का विधान होता है.
चौदह-नौ यति रख रचें, कविगण छंद सुजान
हो पदांत लघु-गुरु 'सलिल', रचना रस की खान
उदाहरण :
१. चौदह-नौ पर यति सुजान / में'सलिल'-प्रवाह
गुरु-लघु से पद-अंत करे, कवि पाये वाह
२. डर न मुझको किसी का भी / है दयालु ईश
देश-हित हँसकर 'सलिल' कर / अर्पित निज शीश
३. कोयल कूके बागों में / पनघट पर शोर
मोर नचे अमराई में / खेतों में भोर
* *

मंगलवार, 13 जनवरी 2026

जनवरी १३, पूर्णिका, पलाश, शारदा, सॉनेट, सोरठा, हाइकु, देवरहा बाबा, कृष्ण, महेश योगी, लालबहादुर, नवगीत,

सलिल सृजन जनवरी १३
पूर्णिका 
परम पिता की कृपा है संतोष
रीतता-घटता नहीं यह कोष
.
प्रार्थना प्रभु से महज इतनी
हो न मन में किसी के प्रति रोष
.
साधना हो अनवरत तब ही
सफलता का हो सके जयघोष
.
एक अँगुली उठे औरों पर
तीन कहतीं खुदी में हैं दोष
.
नर्मदा है सृजन की सलिला
भाव-रस-भाषा रहे निर्दोष
००० 
पूर्णिका
रमा चंचला, मन चंचल
रमे रमा में हो अविचल
.
नेह नर्मदा रुद्ध न हो
रहे प्रवाहित कलकल कल
.
बुद्धि रही भरमाती क्यों
भेद-बुद्धि है मिथ्या छल
.
उगना है सूरज सम तो
हँसते-हँसते संझा ढल
.
नहीं समस्या है ऐसी
जिसका कोई मिले न हल
.
परख साधु की होती तब
जब टकराता कोई खल
.
मोबाइल रख पॉकेट में
आपस में करिए मिल गौल
.
मंजिल कितनी दूर न सोच
पग चूमेगी चलता चल
.
देख अन्य की प्रगति न जल
तम हरने दीपक बन जल
.
दमयंती हो हर नारी
नर हो पाए राजा नल
.
कट जाते हैं युग पल में
युग बन कटता 'सलिल' न पल
१३.१.२०२६
०००
पलाशी शारद वंदना 
शारद! लिए पलाश आए हम, माँ सिंगार करो।
किंशुक कुसुम लगा वेणी में, भव-भय पीर हरो।।
करधन टेसू, कंगन छेवला, पायल सजे समिद्धर।
कौसुंबी कंचुकी, हरित आँचल स्वीकार करो।।
धारण कर गलहार त्रिपर्णी, बाले पहन सुपर्णी।
माते! बीजस्नेह दे संतति का उद्धार करो।।
करक ब्रह्मपादप पोरासू पलसु पिलासु पुतद्रु,
पालोशी पांगोंग लिए हम हँस उपहार वरो।।
अनुपम छवि रस रूप मनोहर स्वर व्यंजन मतिमय लख।
जीव सभी संजीव हो सकें, मातु! सलिल सह विचरो।।
१३.१.२०२५
०००
सॉनेट
सूरज छिपकर तरु पीछे से झाँक रहा है,
उषा भीत है सोचे साथ रहे या छोड़े?
लव जिहाद का नारा सुन पग पीछे मोड़े,
निकलूँ या छिप जाऊँ, गुपचुप आँक रहा है।
अरुणोदय का दृश्य मनोरम टाँक रहा है,
बाजों ने गौरैया के सब सपने तोड़े,
जवां कबूतर घायल खा श्रद्धा के कोड़े,
हृदय ऐक्य का हाय! टूट दो फाँक रहा है।
बाल राम को जिसने दूल्हा राजा देखा,
सिया सहित दरबार सजाकर हर पल पूजा,
हैं अवाक् वह अवध, देख धनुधारी आया।
कौन करे हमलों-दंगों का लेखा-जोखा?
१३.१.२०२४
•••
सोरठा सलिला
कृष्ण
*
अनुपम कौशल कृष्ण, काम करें निष्काम रह।
हुए नहीं वे तृष्ण, थे समान सुख-दुःख उन्हें।।
खींचो रेखा एक, अकरणीय-करणीय में।
जाग्रत रखो विवेक, कृष्ण न कह करते रहे।।
कृष्ण कर्म पर्याय, निष्फल कुछ करते नहीं।
सक्रियता पर्याय, निष्क्रियता वरते नहीं।।
गहो कर्म सन्यास, यही कृष्ण-संदेश है।
हो न मलिन विन्यास, जग-जीवन का तनिक भी।.
कृष्ण -राधिका एक, कृष्ण न मिलते कृष्ण भज।
भजों राधिका नेंक, आ जाएँगे कृष्ण खुद।।
तहाँ कृष्ण जहँ प्रेम, हो न तनिक भी वासना।
तभी रहेगी क्षेम, जब न वास हो मोह का।।
१३-१-२०२३
***
सॉनेट
महर्षि महेश योगी
*
गुरु-पद-रज, आशीष था।
मार्ग आप अपना गढ़ा।
ध्यान मार्ग पर पग बढ़ा।।
योग हुआ पाथेय था।।
महिमा थी ओंकार की।
ब्रह्मानंद सुयश भजा।
फहराई जग में ध्वजा।।
बना विश्व सरकार दी।।
सपने थे अनगिन बुने।
वेद-ज्ञान हर जन गुने।
जतन निरंतर अनसुने।
पश्चिम नत हो सिर धुने।।
योगमार्ग अपना चुने।।
त्याग भोग के झुनझुने।।
१३-१-२०२२
***
सॉनेट
लालबहादुर
*
छोटा कद, ऊँचा किरदार।
लालबहादुर नेता सच्चे।
सादे सरल जिस तरह बच्चे।।
भारत माँ पे हुए निसार।।
नन्हें ने दृढ़ कदम बढ़ाया।
विश्वशक्ति को धता बताया।
भूखा रहना मन को भाया।।
सीमा पर दुश्मन थर्राया।।
बापू के सच्चे अनुयायी।
दिशा देश को सही दिखायी।
जनगण से श्रद्धा नित पायी।
विजय पताका थी फहरार्ई।।
दुश्मन ने भी करी बड़ाई।।
सब दुनिया ने जय-जय गाई।।
१३-१-२०२२
***
नवगीत
दूर कर दे भ्रांति
*
दूर कर दे भ्रांति
आ संक्राति!
हम आव्हान करते।
तले दीपक के
अँधेरा हो भले
हम किरण वरते।
*
रात में तम
हो नहीं तो
किस तरह आये सवेरा?
आस पंछी ने
उषा का
थाम कर कर नित्य टेरा।
प्रयासों की
हुलासों से
कर रहां कुड़माई मौसम-
नाचता दिनकर
दुपहरी संग
थककर छिपा कोहरा।
संक्रमण से जूझ
लायें शांति
जन अनुमान करते।
*
घाट-तट पर
नाव हो या नहीं
लेकिन धार तो हो।
शीश पर हो छाँव
कंधों पर
टिका कुछ भार तो हो।
इशारों से
पुकारों से
टेर सँकुचे ऋतु विकल हो-
उमंगों की
पतंगें उड़
कर सकें आनंद दोहरा।
लोहड़ी, पोंगल, बिहू
जन-क्रांति का
जय-गान करते।
*
ओट से ही वोट
मारें चोट
बाहर खोट कर दें।
देश का खाता
न रीते
तिजोरी में नोट भर दें।
पसीने के
नगीने से
हिंद-हिंदी जगजयी हो-
विधाता भी
जन्म ले
खुशियाँ लगाती रहें फेरा।
आम जन के
काम आकर
सेठ-नेता काश तरते।
१२-१-२०१७
***
हाइकु
*
झूठ को सच
करती सियासत
सच को झूठ
*
सुबहो-शाम
आराम है हराम
राम का नाम
*
प्राची लगाती
माथे पर बिंदिया
साँझ सुहाती
*
शंख निनाद
मग्न स्वर तरंग
मिटा विषाद
*
गया बरस
तनिक न दे सका
सुख हरष
*
अस न बस
मनाना ही होगा
नया बरस
*
बिच्छू का डंक
सहे संत स्वभाव
रहे नि:शंक
१३.१.२०१६
***
नवगीत:
.
खों-खों करते
बादल बब्बा
तापें सूरज सिगड़ी
.
आसमान का आँगन चौड़ा
चंदा नापे दौड़ा-दौड़ा
ऊधम करते नटखट तारे
बदरी दादी 'रोको' पुकारें
पछुआ अम्मा
बड़बड़ करती
डाँट लगातीं तगड़ी
.
धरती बहिना राह हेरती
दिशा सहेली चाह घेरती
ऊषा-संध्या बहुएँ गुमसुम
रात और दिन बेटे अनुपम
पाला-शीत न
आये घर में
खोल न खिड़की अगड़ी
.
सूर बनाता सबको कोहरा
ओस बढ़ाती संकट दोहरा
कोस न मौसम को नाहक ही
फसल लाएगी राहत को ही
हँसकर खेलें
चुन्ना-मुन्ना
मिल चीटी-धप, लँगड़ी
....
बाल नवगीत:
*
सूरज बबुआ!
चल स्कूल
*
धरती माँ की मीठी लोरी
सुनकर मस्ती खूब करी
बहिन उषा को गिरा दिया
तो पिता गगन से डाँट पड़ी
धूप बुआ ने लपक चुपाया
पछुआ लाई
बस्ता-फूल
सूरज बबुआ!
चल स्कूल
*
जय गणेश कह पाटी पूजन
पकड़ कलम लिख ओम
पैर पटक रो मत, मुस्काकर
देख रहे भू-व्योम
कन्नागोटी, पिट्टू, कैरम
मैडम पूर्णिमा के सँग-सँग
हँसकर
झूला झूल
सूरज बबुआ!
चल स्कूल
*
चिड़िया साथ फुदकती जाती
कोयल से शिशु गीत सुनो
'इकनी एक' सिखाता तोता
'अ' अनार का याद रखो
संध्या पतंग उड़ा, तिल-लड़ुआ
खा पर सबक
न भूल
सूरज बबुआ!
चल स्कूल
मंगलवार, 6 जनवरी 2015
***
कृति चर्चा:
हौसलों के पंख : नवगीत की उड़ान
चर्चाकार: आचार्य संजीव
.
[कृति विवरण: हौसलों के पंख, नवगीत संग्रह, कल्पना रामानी, आकार डिमाई, आवरण पेपरबैक, बहुरंगी, पृष्ठ ११२, नवगीत ६५, १२०/-, अंजुमन प्रकाशन इलाहाबाद]
.
ओम निश्चल: 'गीत-नवगीत के क्षेत्र में इधर अवरोध सा आया है. कुछ वरिष्‍ठ कवि फिर भी अपनी टेक पर लिख रहे हैं... एक वक्‍त उनके गीत... एक नया रोमानी उन्माद पैदा करते थे पर धीरेधीरे ऐसे जीवंत गीत लिखने वाली पीढी खत्‍म हो गयी. कुछ कवि अन्य विधाओं में चले गए .... नये संग्रह भी विशेष चर्चा न पा सके. तो क्‍या गीतों की आभा मंद पड़ गयी है या अब वैसे सिद्ध गीतकार नहीं रहे?'
'गीत में कथ्य वर्णन के लिए प्रचुर मात्रा में बिम्बों, प्रतीकों और उपमाओं के होता है जबकि नवगीत में गागर में सागर, बिंदु में सिंधु की तरह इंगितों में बात कही जाती है। 'कम बोले से अधिक समझना' की उक्ति नवगीत पर पूरी तरह लागू होती है। नवगीत की विषय वस्तु सामायिक और प्रासंगिक होती है। तात्कालिकता नवगीत का प्रमुख लक्षण है जबकि सनातनता, निरंतरता गीत का। गीत रचना का उद्देश्य सत्य-शिव-सुंदर की प्रतीति तथा सत-चित-आनंद की प्राप्ति कही जा सकती है जबकि नवगीत रचना का उद्देश्य इसमें बाधक कारकों और स्थितियों का इंगित कर उन्हें परिवर्तित करना कहा जा सकता है। गीत महाकाल का विस्तार है तो नवगीत काल की सापेक्षता। गीत का कथ्य व्यक्ति को समष्टि से जोड़कर उदात्तता के पथ पर बढ़ाता है तो नवगीत कथ्य समष्टि की विरूपता पर व्यक्ति को केंद्रित कर परिष्कार की राह सुझाता है। भाषा के स्तर पर गीत में संकेतन का महत्वपूर्ण स्थान होता है जबकि नवगीत में स्पष्टता आवश्यक है। गीत पारम्परिकता का पोषक होता है तो नवगीत नव्यता को महत्व देता है। गीत में छंद योजना को वरीयता है तो नवगीत में गेयता को महत्व मिलता है।'
उक्त दो बयानों के परिप्रेक्ष्य में नवगीतकार कल्पना रामानी के प्रथम नवगीत संग्रह 'हौसलों के पंख' को पढ़ना और और उस पर लिखना दिलचस्प है।
कल्पना जी उस सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं जिसके लिए साहित्य रचा जाता है और जो साहित्य से जुड़कर उसे सफल बनाता है। जहाँ तक ओम जी का प्रश्न है वे जिस 'रोमानी उन्माद' का उल्लेख करते हैं वह उम्र के एक पड़ाव पर एक मानसिकता विशेष की पहचान होता है। आज के सामाजिक परिवेश और विशेषकर जीवनोद्देश्य लेकर चलनेवाले युवाओं नई ने इसे हाशिये पर रखना आरंभ कर दिया है। अब किसी का आँचल छू जाने से सिहरन नहीं होती, आँख मिल जाने से प्यार नहीं होता। तन और मन को अलग-अलग समझने के इस दौर में नवगीत निराला काल के छायावादी स्पर्शयुक्त और छंदमुक्त रोमांस तक सीमित नहीं रह सकता।
कल्पना जी के जमीन से जुड़े ये नवगीत किसी वायवी संसार में विचरण नहीं कराते अपितु जीवन जैसा ही देखते हुए बेहतर बनाने की बात करते हैं। कल्पना की कल्पना भी सम्भावना के समीप है कपोल कल्पना नहीं। जीवन के उत्तरार्ध में रोग, जीवन साथी का विछोह अर्थात नियतिजनित एकाकीपन से जूझ और मृत्यु के संस्पर्श से विजयी होकर आने के पश्चात उनकी जिजीविषाजयी कलम जीवन के प्रति अनुराग-विराग को एक साथ साधती है। ऐसा गीतकार पूर्व निर्धारित मानकों की कैद को अंतिम सत्य कैसे मान सकता है? कल्पना जी नवगीत और गीत से सुपरिचित होने पर भी वैसा ही रचती हैं जैसा उन्हें उपयुक्त लगता है लेकिन वे इसके पहले मानकों से न केवल परिचय प्राप्त करती हैं, उनको सीखती भी हैं।
प्रतिष्ठित नवगीतकार यश मालवीय ठीक ही कहते हैं कि 'रचनाधर्मिता के बीज कभी भी किसी भी उम्र में रचनाकार-मन में सुगबुगा सकते हैं और सघन छायादार दरख्त बन सकते हैं।'
डॉ. अमिताभ त्रिपाठी इन गीतों में संवेदना का उदात्त स्तर, साफ़-सुथरा छंद-विधान, सुगठित शब्द-योजना, सहजता, लय तथा प्रवाह की उपस्थिति को रेखांकित करते हैं। कल्पना जी ने भाषिक सहजता-सरलता को शुद्धता के साथ साधने में सफलता पाई है। उनके इन गीतों में संस्कृतनिष्ठ शब्द (संकल्प, विलय, व्योम, सुदर्श, विभोर, चन्द्रिका, अरुणिमा, कुसुमित, प्राण-विधु, जल निकास, नीलांबर, तरुवर, तृण पल्लव्, हिमखंड, मोक्षदायिनी, धरणी, सद्ज्ञान, परिवर्धित, वितान, निर्झरिणी आदि), उर्दू लफ़्ज़ों ( मुश्किलों, हौसलों, लहू. तल्ख, शबनम, लबों, फ़िदा, नादां, कुदरत, फ़िज़ा, रफ़्तार, गुमशुदा, कुदरत, हक़, जुबां, इंक़लाब, फ़र्ज़, क़र्ज़, जिहादियों, मज़ार, मन्नत, दस्तखत, क़ैद, सुर्ख़ियों आदि) के साथ गलबहियाँ डाले हुए देशज शब्दों ( बिजूखा, छटां, जुगाड़, फूल बगिया, तलक आदि) से गले मिलते हैं।
इन नवगीतों में शब्द युग्मों (नज़र-नज़ारे, पुष्प-पल्लव, विहग वृन्दों, मुग्ध-मौसम, जीव-जगत, अर्पण-तर्पण, विजन वन, फल-फूल, नीड़चूजे, जड़-चेतन, तन-मन, सतरंगी संसार, पापड़-बड़ी-अचार आदि) ने माधुर्य घोला है। नवगीतों में अन्त्यानुप्रास का होना स्वाभाविक है किन्तु कल्पना जी ने छेकानुप्रास तथा वृत्यनुप्रास का भी प्रयोग प्रचुरता से किया है। इन स्थलों पर नवगीतों में रसधार पुष्ट हुई है। देखें: तृषायुक्त तरुवर तृण, सारू सरिता सागर, साँझ सुरमई, सतरंगी संसार, वरद वन्दिता, कचनार काँप कर, चंचल चपल चारुवदना, सचेतना सुभावना सुकमना, मृदु महक माधुरी, सात सुरों का साजवृन्द, मृगनयनी मृदु बयनभाषिणी, कोमल कंचन काया, कवच कठोर कदाचित, कोयलिया की कूक आदि।
कल्पना जी ने नवल भाषिक प्रयोग करने में कमी नहीं की है: जोश की समिधा, वसुधा का वैभव, निकृष्ट नादां, स्वत्व स्वामिनी, खुशरंग हिना आदि ऐसे ही प्रयोग हैं। महलों का माला से स्वागत, वैतरिणी जगताप हरिणी, पीड़ाहरिणी तुम भागीरथी, विजन वनों की गोद में, साधना से सफल पल-पल, चाह चित से कीजिए, श्री गणेश हो शुभ कर्मों का जैसी अभिव्यक्तियाँ सूक्ति की तरह जिव्हाग्र पर प्रतिष्ठित होने का सामर्थ्य रखती हैं
कल्पना जी के इन नवगीतों में राष्ट्रीय गौरव (यही चित्र स्वाधीन देश का, हस्ताक्षर हिंदी के, हिंदी की मशाल, सुनो स्वदेशप्रेमियों, मिली हमें स्वतंत्रता, जयभारत माँ, पूछ रहा है आज देश), पारिवारिक जुड़ाव (बेटी तुम, अनजनमी बेटी, पापा तुम्हारे लिए, कहलाऊं तेरा सपूत, आज की नारी, जीवन संध्या, माँ के बाद के बाद आदि), सामाजिक सरोकार (मद्य निषेध सजा पन्नो पर, हमारा गाँव, है अकेला आदमी, महानगर में, गाँवों में बसा जीवन, गरम धूप में बचपन ढूँढे, आँगन की तुलसी आदि) के गीतों के साथ भारतीय संस्कृति के उत्सवधर्मिता और प्रकृति परकता के गीत भी मुखर हुए हैं। ऐसे नवगीतों में दिवाली, दशहरा, राम जन्म, सूर्य, शरद पूर्णिमा, संक्रांति, वसंत, फागुन, सावन, शरद आदि आ सके हैं।
पर्यावरण और प्रकृति के प्रति कल्पना जी सजग हैं। जंगल चीखा, कागा रे! मुंडेर छोड़ दे, आ रहा पीछे शिकारी, गोल चाँद की रात, क्यों न हम उत्सव् मनाएं?, जान-जान कर तन-मन हर्षा, फिर से खिले पलाश आदि गीतों में उनकी चिंता अन्तर्निहित है। सामान्यतः नवगीतों में न रहनेवाले साग, मुरब्बे, पापड़, बड़ी, अचार, पायल, चूड़ी आदि ने इन नवगीतों में नवता के साथ-साथ मिठास भी घोली है। बगिया, फुलबगिया, पलाश, लता, हरीतिमा, बेल, तरुवर, तृण, पल्लव, कोयल, पपीहे, मोर, भँवरे, तितलियाँ, चूजे, चिड़िया आदि के साथ रहकर पाठक रुक्षता, नीरसता, विसंगतियोंजनित पीड़ा, विषमता और टूटन को बिसर जाता है।
सारतः विवेच्य कृति का जयघोष करती जिजीविषाओं का तूर्यनाद है। इन नवगीतों में भारतीय आम जन की उत्सवधर्मिता और हर्षप्रियता मुखरित हुई है। कल्पना जी जीवन के संघर्षों पर विजय के हस्ताक्षर अंकित करते हुए इन्हें रचती हैं। इन्हें भिन्न परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकित करना इनके साथ न्याय न होगा। इन्हें गीत-नवगीत के निकष पर न कसकर इनमें निहित रस सलिला में अवगाहन कर आल्हादित अभीष्ट है। कल्पना जी को बधाई जीवट, लगन और सृजन के लिये। सुरुचिपूर्ण और शुद्ध मुद्रण के लिए अंजुमन प्रकाशन का अभिनन्दन।
१३-१-२०१५
नवगीत:
*.
काल है संक्रांति का
तुम मत थको सूरज!
.
दक्षिणायन की हवाएँ
कँपाती हैं हाड़
जड़ गँवा, जड़ युवा पीढ़ी
काटती है झाड़
प्रथा की चूनर न भाती
फेंकती है फाड़
स्वभाषा को भूल, इंग्लिश
से लड़ाती लाड़
टाल दो दिग्भ्रान्ति को
तुम मत रुको सूरज!
*
उत्तरायण की फिज़ाएँ
बनें शुभ की बाड़
दिन-ब-दिन बढ़ता रहे सुख
सत्य की हो आड़
जनविरोधी सियासत को
कब्र में दो गाड़
झाँक दो आतंक-दहशत
तुम जलाकर भाड़
ढाल हो चिर शांति का
तुम मत झुको सूरज!
***
नवगीत:
आओ भी सूरज
*
आओ भी सूरज!
छट गये हैं फूट के बादल
पतंगें एकता की मिल उड़ाओ
गाओ भी सूरज!
*
करधन दिप-दिप दमक रही है
पायल छन-छन छनक रही है
नच रहे हैं झूमकर मादल
बुराई हर अलावों में जलाओ
आओ भी सूरज!
*
खिचड़ी तिल-गुड़वाले लडुआ
पिज्जा तजकर खाओ बबुआ
छोड़ बोतल उठा लो छागल
पड़ोसी को खुशी में साथ पाओ
आओ भी सूरज!
रविवार, 4 जनवरी 2015
***
नवगीत:
संक्रांति काल है
.
संक्रांति काल है
जगो, उठो
.
प्रतिनिधि होकर जन से दूर
आँखें रहते भी हो सूर
संसद हो चौपालों पर
राजनीति तज दे तंदूर
संभ्रांति टाल दो
जगो, उठो
.
खरपतवार न शेष रहे
कचरा कहीं न लेश रहे
तज सिद्धांत, बना सरकार
कुर्सी पा लो, ऐश रहे
झुका भाल हो
जगो, उठो
.
दोनों हाथ लिये लड्डू
रेवड़ी छिपा रहे नेता
मुँह में लैया-गज़क भरे
जन-गण को ठेंगा देता
डूबा ताल दो
जगो, उठो
.
सूरज को ढाँके बादल
सीमा पर सैनिक घायल
नाग-सांप फिर साथ हुए
गुँजा रहे बंसी-मादल
छिपा माल दो
जगो, उठो
.
नवता भरकर गीतों में
जन-आक्रोश पलीतों में
हाथ सेंक ले कवि तू भी
जाए आज अतीतों में
खींच खाल दो
जगो, उठो
१३.१.२०१४
***
समयजयी सिद्धसंत देवरहा बाबा
*
देव भूमि भारत आदिकाल से संतों-महात्माओं की साधना स्थली है. हर पल समाधिस्थ रहनेवाले समयजयी सिद्ध दंत देवरहा बाबा संसार-सरोवर में कमल की तरह रहते हुए पूर्णतः निर्लिप्त थे.
आचार्य शंकर ने जीवन की इस मुक्तावस्था के सम्बन्ध में कहा है:
समाधिनानेन समस्तवासना ग्रंथेर्विनाशोsकर्मनाशः.
अंतर्वहि सर्वत्र एवं सर्वदा स्वरूपवि स्फूर्तिरयत्नतः स्यात..
अर्थात समाधि से समस्त वासना-ग्रंथियाँ नष्ट हो जाती हैं. वासनाओं के नाश से कर्मों का विनाश हो जाता है, जिससे स्वरूप-स्थिति हो जाती है. अग्नि के ताप से जिस तरह स्वर्ण शुद्ध हो जाता है, उसी प्रकार समाधि से सत्व-राज-तम रूप मल का निवारण हो जाता है. हरि ॐ तत्सत...
बाबा मेरे जन्म-जन्मान्तर के गुरु हैं, वे विदेह हैं. अनादि काल से अनवरत चली आ रही भारतीय सिद्ध साधन बाबा में मूर्त है. धूप, सीत, वर्षा आदि संसारीं चक्रों से सर्वथा अप्रभावित, अष्टसिद्ध योगी बाबा सबपर सदा समान भाव से दया-दृष्टि बरसाते रहते थे. वे सच्चे अर्थ में दिगम्बर थे अर्थात दिशाएँ ही उनका अम्बर (वस्त्र) थीं. वे वास्तव में धरती का बिछौना बिछाते थे, आकाश की चादर ओढ़ते थे. शुद्ध जीवात्मायें उनकी दृष्टि मात्र से अध्यात्म-साधन के पथ पर अग्रसर हो जाती थीं. वे सदैव परमानंद में निमग्न रहकर सर्वात्मभाव से सभी जीवों को कल्याण की राह दिखाते हैं.
जय अनादि,जय अनंत,
जय-जय-जय सिद्ध संत.
देवरहा बाबाजी,
यश प्रसरित दिग-दिगंत.........
*
धरा को बिछौनाकर, नील गगन-चादर ले.
वस्त्रकर दिशाओं को, अमृत मन्त्र बोलते..
सत-चित-आनंदलीन, समयजयी चिर नवीन.
साधक-आराधक हे!, देव-लीन, थिर-अदीन..
नश्वर-निस्सार जगत,
एकमात्र ईश कंत..
देवरहा बाबाजी,
यश प्रसरित दिग-दिगंत.........
*
''दे मत, कर दर्शन नित, प्रभु में हो लीन चित.''
देते उपदेश विमल, मौन अधिक, वाणी मित..
योगिराज त्यागी हे!, प्रभु-पद-अनुरागी हे!
सतयुग से कलियुग तक, जीवित धनभागी हे..
'सलिल' अनिल अनल धरा,
नभ तुममें मूर्तिमंत.
देवरहा बाबाजी,
यश प्रसरित दिग-दिगंत.........
*
पूज्यपाद बाबाजी द्वारा लिखाया गया और 'योगिराज देवरहा बाबा के चमत्कार' शीर्षक पुस्तक में प्रकाशित लेख का कुछ अंश बाबाश्री के आशीर्वाद-स्वरूप प्रस्तुत है:
''धारणा, ध्यान और समाधि- इन तीनों का सामूहिक नाम संयम है. संयम से अनेक प्रकार की विभूतियाँ प्राप्त होती हैं परन्तु योगी का लक्ष्य विभूति-प्राप्ति नहीं है, परवैराग्य प्राप्ति है. 'योग दर्शन' में विभूतियों का वर्णन केवल इसलिए किया गया है कि योगी इनके यथार्थ रूप को समझकर उनसे आकृष्ट न हो. योगदर्शन का विभूतिपाद साधनपाद की ही कड़ी है..... विभूतिपाद में इसी प्रकार की विभूतियों का विस्तार से वर्णन हुआ है-जैसे सब प्राणियों की वाणी का ज्ञान, परचित्त ज्ञान, मृत्यु का ज्ञान, लोक-लोकान्तरों का ज्ञान, आपने शरीर का ज्ञान, चित्त के स्वरूप का ज्ञान इत्यादि. संयम के ही द्वारा योगी अंतर्ध्यान हो सकता है, अधिक से अधिक शक्ति प्राप्त कर सकता है, परकाया में प्रवेश कर सकता है, लोक-लोकान्तरों में भ्रमण कर सकता है और अष्टसिद्धियों और नवनिधियों को प्राप्तकर सकता है.
बच्चा! योग एक बड़ी दुर्लभ और विचित्र अवस्था है. योगी की शक्ति और ज्ञान अपरिमित होते हैं. उसके लिये विश्व की कोई भी वस्तु असंभव नहीं है. ईश्वर की शक्ति माया है और योगी की शक्ति योगमाया है. 'सर्वम' के सिद्धांत को योगी कभी भी प्रत्यक्ष कर सकता है. आज विज्ञान ने जिस शक्ति का संपादन किया है, वह योगशक्ति का शतांश या सहस्त्रांश भी नहीं है. योगी के लिये बाह्य उपादानों की अपेक्षा नहीं है.
मैं तो यह कहता हूँ कि यदि योगी चाहे तो अपने सत्य-संकल्प से सृष्टि का भी निर्माण कर सकता है. वह ईश्वर के समान सर्वव्यापक है. अष्टसिद्धियाँ भी उसके लिये नगण्य हैं. वह अपनी संकल्प-शक्ति से एक ही समय में अनेक स्थानों पर अनेक रूपों में प्रकट हो सकता है. उसे शरीर से कहीं आना-जाना नहीं पड़ता.
बच्चा! योगी को न विश्वास की परवाह है, न प्रदर्शन की आवश्यकता है, जो सिद्धियों का प्रदर्शन करता है, उसे योगी कहना ही नहीं चाहिए.
एक कथा है: आपने किसी योगिराज गुरुसे योग की शिक्षा प्राप्तकर एक महात्मा योग-साधना करने लगे. कुछ समय पश्चात् महात्मा को सिद्धियाँ प्राप्त होने लगीं. महात्मा एक दिन आपने गुरुदेव के दर्शन करने के लिये चल दिए. योगिराज का आश्रम एक नदी के दूसरे किनारे पर था. नदी में बड़ी बाढ़ थी और चारों ओर तूफ़ान था. महात्मा को नदी पारकर आश्रम में पहुँचना था. अपनी सिद्धि के बलपर महात्मा योंही जलपर चल दिए और नदी को पारकर आश्रम में पहुँचे. गुरुदेव ने नदी पार करने के साधन के सम्बन्ध में पूछा तो महात्मा ने अपनी सिद्धि का फल बता दिया. योगिराज ने कहा कि तुमने दो पैसे के बदले अपनी वर्षों की तपस्या समाप्त कर ली. तुम योग-साधन के योग्य नहीं हो.
१३.१.२०१४

***

शनिवार, 10 जनवरी 2026

जनवरी १०, पूर्णिका, आजाद, सोरठा, सॉनेट, हिंदी, हिंदी आरती, छंद, गंग, गीत, लघुकथा, सोरठा, दोहा

सलिल सृजन जनवरी १०
पूर्णिका
कोई माने या न माने
हम खुदी‌ को खुदा माने
.
छंद जाने बिना कवि जी
जोड़कर तुक लिखें गाने
.
नोट ले, पी सुरा, झूमे
लतीफे कहते पुराने
.
नित नई तितली तलाशे
भ्रमर लगता गीत गाने
.
जड़ जमीं को नहीं भूले
थिर-अचल नाते पुराने
.
काम करना जब न आए
तब बनाओ सौ बहाने
.
नहीं मन की तनिक चिंता
लगे हैं तन को सजाने
.
बिना बाना बने बाना
सोच ताने लगे ताने
.
हाथ थामे अँधेरे का
चला युग सूरज उगाने
.
'सलिल' पाने सुखी जीवन
चल पड़ो सीकर बहाने
१०.१.२०२६
०००
पुण्य स्मरण- चंद्रशेखर आजाद जी
महान क्रांतिकारी चंद्र शेखर आजाद को चित्र खिंचवाना नापसंद था। काकोरी कांड के बाद अंग्रेज संबंधित क्रांतिकारियों के पीछे पड़ गए। आजाद के साथियों की गिरफ्तारी होने लगी। चारों तरफ जासूसों का जाल बिछा हुआ था। आजाद ने जासूसों से बचते-बचते किसी तरह झाँसी पहुँचकार रूद्रनारायण सिंह "मास्टर जी" के आवास में शरण ली । मास्टर जी का आवास कला-संस्कृति और व्यायाम का केंद्र था। सरकारी जासूसों और नौकरशाहों का भी आना-जाना लगा रहता था। आजाद ने अधिक समय तक वहाँ रूकना सुरक्षित नहीं समझा। वे पास के जंगल में एक छोटे से हनुमान मंदिर के पुजारी बनकर रहने लगे ।
एक दिन आजाद को मास्टर जी अपने आवास पर ले आये । कला-प्रेमी होने के साथ-साथ मास्टरजी फोटोग्राफी भी कर लिया करते थे। मास्टरजी आजाद को बिना बताए उनकी तस्वीर कैमरे में कैद करने की कोशिश बहुत देर तक करते रहे लेकिन आजाद थे कि सही पॉजिशन ले ही नहीं रहे थे। बाद में तंग होकर मास्टरजी ने आजाद से एक फोटो खिंचवाने का निवेदन ही कर दिया । पहले तो आजाद तैयार नहीं हो रहे थे लेकिन बाद में फोटो खिंचवाने के लिए खड़े हो गए।
फिर मास्टरजी ने जैसे ही अपना कैमरा संभाला और बोला- " आज तुम मुझे ऐसे ही तुम्हारा एक फोटो खींच लेने दो।
आजाद ने कहा- " अच्छा! तो ज़रा मेरी मूँछे एँठ लेने दो" और उन्होंने अपनी मूँछें घुमानी शुरू कर दी। इसी बीच मास्टर जी ने उस ऐतिहासिक तस्वीर को अपने कैमरे में कैद कर लिया जो आज राष्ट्र की महान नीधि बन गया। यह आजाद का एकमात्र प्रामाणिक चित्र है।
***
सोरठा सलिला
कालिंदी के तीर, लिखा गया इतिहास था।
मन में धरकर धीर, जन-हित साधा कृष्ण ने।।
*
प्रकृति मैया पोस, मारा शोषक कालिया।
सहा इंद्र का रोष, गोवर्धन छिप कान्ह ने।।
*
मिला पूत नहिं एक, बंजर भू सम पूतना।
खोकर चली विवेक, कृष्ण मारने खुद मरी।।
*
जोशीमठ में आज, कान्हा हो जाओ प्रगट।
जन-जीवन की लाज, मात्र तुम्हारे हाथ में।।
*
दोषी शासन-नीति, रही प्रकृति को छेड़ती।
है पाखंडी रीति, घड़ियाली आँसू बहे।।
*
जनता जागे आज, कहें कृष्ण विप्लव करो।
बदल इंद्र का राज, करो प्रकृति से मित्रता।।
१०-१-२०२३
***
सॉनेट
हिंदी
*
जगवाणी हिंदी का वंदन, इसका वैभव अनुपम अक्षय।
हिंदी है कृषकों की भाषा, श्रमिकों को हिंदी प्यारी है।
मध्यम वर्ग कॉंवेंटी है, रंग बदलता व्यापारी है।।
जनवाणी, हैं तंत्र विरोधी, न्यायपालिका अंग्रेजीमय।।
बच्चों से जब भी बतियाएँ, केवल हिंदी में बतियाएँ।
अन्य बोलिओं-भाषाओँ को, सिखा-पढ़ाएँ साथ-साथ ही।
ह्रदय-दिमाग न हिंदी भूले, हिंदी पुस्तक लिए हाथ भी।।
हिंदी में प्रार्थना कराएँ, भजन-कीर्तन नित करवाएँ।।
शिक्षा का माध्यम हिंदी हो, हिंदी में हो काम-काज भी।
क्यों अंग्रेजी के चारण हैं, तनिक न आती हया-लाज भी।
हिंदी है सहमी गौरैया, अंग्रेजी है निठुर बाज सी।
शिवा कह रहे हैं शिव जी को, कैसे आए राम राज जी?
हो जब निज भाषा में शिक्षा, तभी सधेंगे, सभी काज जी।।
देवनागरी में लिखिए हर भाषा, होगा तब सुराज जी।।
***
सॉनेट
जात को अपनी कभी मरने न दीजिए।
बात से फिरिए नहीं, तभी तो बात है।
ऐब को यह जिस्म-जां चरने न दीजिए।।
करें फरेब जीत मिले तो भी मात है।।
फायदा हो कायदे से तभी लीजिए।
छीनिए मत और से, न छीनने ही दें।
वायदा टूटे नहीं हर जतन कीजिए।।
पंछियों को अन्न कभी बीनने भी दें।।
दुर्दशा लोगों की देखकर पसीजिए।
तंत्र रौंद लोक को गर्रा रहा हुज़ूर।
आईने में देख शकल नहीं रीझिए।।
लोग मरे जा रहे हैं; देखिए जरूर।।
सचाई से आखें कभी चार कीजिए।
औरों की सुन; तनिक ख़ुशी कभी दीजिए।।
१०-१-२०२२
***
हिंदी आरती
*
भारती भाषा प्यारी की।
आरती हिन्दी न्यारी की।।
*
'लोक' की भाषा है हिंदी
'तंत्र' की आशा है हिंदी
करोड़ों जिह्वाओं आसीन
न कोई सकता इसको छीन
ब्रह्म क , विष्णु - पुरारी की
आरती हिन्दी न्यारी की।।
*
वाक्-ध्वनि हिंदी का आधार
पाँच वर्गों बाँटे उच्चार
बोलते वह जो लिखते आप
वर्तनी - स्वर - व्यंजन अनुसार
नगरी लिपि सुविचारी की
आरती हिन्दी न्यारी की।।
*
एकता पर हिंदी बलिहार,
वचन दो लिंग क्रिया व्यापार
संधियाँ काल शक्ति हैं तीन
विशेषण हैं हिंदी में चार
पांच अव्यय व्यवहारी की
आरती हिंदी न्यारी की।।
*
वर्ण हिंदी के अति सोहें,
शब्द मानव - मन को मोहें
काव्य रचना सुडौल सुंदर
वाक्य लेते सबका मन हर
छंद सुमनों की क्यारी की
आरती हिन्दी न्यारी की।।
*
समेटे ज्ञान निति विज्ञान
सीख पढ़ लिख हों हम विद्वान
विषय जो कठिन जटिल नीरस
बना देती हिंदी रसवान
विश्ववाणी गुणकारी की
आरती हिन्दी न्यारी की।।
१०.१.२०१९
***
लघुकथा-
गूँगे का गुड़
*
अपने लेखन की प्रशंसा सुन मित्र ने कहा आप सब से प्रशंसा पाकर मन प्रसन्न होता है किंतु मेरे पति प्राय: कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करते। मेरा ख़याल था कि उन्हें मेरा लिखना पसंद नहीं है परन्तु आप कहते हैं कि ऐसा नहीं है। यदि उन्हें मेरा लिखना और मेरा लिखा अच्छा लगता है तो यह जानकर मुझे ख़ुशी और गौरव ही अनुभव होगा। मुझे उनकी जो बात अच्छी लगती है, मैं कह देती हूँ, वे क्यों नहीं कहते?
मैंने कहा- 'गूँगे का गुड़' न होता तो कहावत कैसे बनती।
***
मुक्तक
मन जी भर करता रहा, था जिसकी तारीफ
उसने पल भर भी नहीं, कभी करी तारीफ
जान-बूझ जिस दिन नहीं, मन ने की तारीफ
उस दिन वह उन्मन हुई, कर बैठी तारीफ
***
सोरठा
मन बैठा था मौन, लिखवाती संगत रही।
किसका साथी कौन?, संग खाती पंगत रही।।
***
दोहा सलिला
*
मन मीरां तन राधिका,तरें जपें घनश्याम।
पूछ रहे घनश्याम मैं जपूँ कौन सा नाम?
*
जिसको प्रिय तम हो गया, उसे बचाए राम।
लक्ष्मी-वाहन से सखे!, बने न कोई काम।।
*
प्रिय तम हो तो अमावस में मत बालो दीप।
काला कम्बल ओढ़कर, काजल नैना लीप।।
*
प्रियतम बिन कैसे रहे, मन में कहें हुलास?
विवश अधर मुस्का रहे, नैना मगर उदास।।
*
चाह दे रही आह का, अनचाहा उपहार।
वाह न कहते बन रहा, दाह रहा आभार।।
*
बिछुड़े आनंदकंद तो, छंद आ रहा याद।
बेचारा कब से करे, मत भूलो फरियाद।।
*
निठुर द्रोण-मूरत बने, क्यों स्नेहिल संजीव।
सलिल सलिल सा तरल हो, मत करिए निर्जीव।।
***
आलेख-
मत करें उपयोग इनका
हम जाने-अनजाने ऐसी सामग्री का उपयोग करते रहते हैं जो हमारे स्वस्थ्य, पर्यावरण और परिवेश के लिए घातक होती है. निम्न वस्तुएँ ऐसी ही हैं, इनका प्रयोग बंद कर हम आप तथा समाज और पर्यावरण को बेहतर बना सकते हैं.
१. प्लास्टिक निर्मित सामान- मनुष्य द्वारा किसी सामान का उपयोग किये जाने के बाद बचा निरुपयोगी कचरा कूड़े के ढेर, नाली, नाला, नदी से होते हुए अंतत: समुद्र में पहुँचकर 'रत्नाकर' को 'कचराघर' बना देता है. समुद्र को प्रदूषित करते कचरे में ८०% प्लास्टिक होता है. प्लास्टिक सड़ता, गलता नहीं, इसलिए वह मिट्टी में नहीं बदलता. भूमि में दबाये जाने पर बरसों बाद भी ज्यों का त्यों रहता है. प्लास्टिक जलने पर ओषजन वजू नष्ट होती है और प्रदूषण फैलानेवाली हानिप्रद वायु निकलती है. प्लास्टिक की डब्बियाँ, चम्मचें, प्लेटें, बर्तन, थैलियाँ, कुर्सियाँ आदि का कम से कम प्रयोग कर हम प्रदूषण कम कर सकते हैं.
प्लास्टिक के सामान मरम्मत योग्य नहीं होते. इनके स्थान पर धातु या लकड़ी का सामान प्रयोग किया जाए तो उसमें टूट-फूट होने पर मरम्मत तथा रंग-रोगन करना संभव होता है. इससे स्थानीय बेरोजगारों को आजीविका मिलती है जबकि प्लास्टिक सामग्री पूंजीपतियों का धन बढ़ाती है.
२. दन्तमंजन- हमने बचपन में कंडों या लकड़ी की राख में नमक-हल्दी मिले मंजन या दातौन का प्रयोग वर्षों तक किया है जिससे दांत मुक्त रहे. आजकल रसायनों से बने टूथपेस्ट का प्रयोग कर शैशव और बचपन दंत-रोगों से ग्रस्त हो रहा है. टूथपेस्ट कंपनियाँ ऐसे तत्वों (माइक्रोबीड्स) का प्रयोग करती हैं जिन्हें सड़ाया नहीं जा सकता. कोयले को घिसकर अथवा कोयले की राख से दन्तमंजन का काम लिया का सकता है. वनस्पतियों से बनाये गए दंत मंजन का प्रयोग बेहतर विकल्प है.
स्टीरोफोम
३. स्टिरोफोम से बने समान- आजकल तश्तरी, कटोरी, गिलास और चम्मच न सड़नेवाले (नॉन बायोडिग्रेडेबल) तत्वों से बनाये जाते हैं. हल्का और सस्ता होने पर भी यह गंभीर रोगों को जन्म दे सकता है. इसके स्थान पर बाँस, पेड़ के पत्तों, लकड़ी या छाल से बने समान का प्रयोग करें तो वह सड़कर मिटटी बन जाता है तह स्थानीय रोजगार का सर्जन करता है. इनकी उपलब्धता के लिए पौधारोपण बड़ी संख्या में करना होगा जिससे वन बढ़ेंगे और वायु प्रदूषण घटेगा.
१०.१.२०१७
***
नवगीत:
क्यों?
*
इसे क्यों
हिर्स लगती है
जिठानी से?
उसे क्यों
होड़ लेना
देवरानी से?
*
अँगुलियाँ कब हुई हैं
एक सी बोलो?
किसी को बेहतर-कमतर
न तुम तोलो
बँधी रख अँगुलियाँ
बन जाओ रे! मुट्ठी
कभी मत
हारना, दुनिया
दीवानी से
*
लड़े यदि नींव तो
दीवार रोयेगी
दिखाकर आँख छत
निज नाश बोयेगी
न पूछो हाल कलशों का
कि क्या होगा?
मिटाओ
विषमता मिल
ज़िंदगानी से
*
न हीरे-मोतियों से
प्यास मिटती है
न ताकत से अधर पर
हँसी खलती है
नयन में आस ही
बन प्रीत पलती है
न छीने
स्वप्न युग
नादां जवानी से
१०-१-२०१६
***
लघुकथा
जीत का इशारा
*
पिता को अचानक लकवा क्या लगा घर की गाड़ी के चके ही थम गये। कुछ दिन की चिकित्सा पर्याप्त न हुई. आय का साधन बंद और खर्च लगातार बढ़ता हुआ रोजमर्रा के खर्च, दवाई-इलाज और पढ़ाई।
उसने माँ के चहरे की खोती हुई चमक और पिता की बेबसी का अनुमान कर अगले सवेरे औटो उठाया और चल पड़ी स्टेशन की ओर। कुछ देर बाद माँ जागी, उसे घर पर न देख अनुमान किया मंदिर गयी होगी। पिता के उठते ही उनकी परिचर्या के बाद तक वह न लौटी तो माँ को चिंता हुई, बाहर निकली तो देखा औटो भी नहीं है।
बीमार पति से क्या कहती?, नन्हें बेटे को जगाकर पड़ोसी को बुलाने का विचार किया। तभी एकदम निकट हॉर्न की आवाज़ सुनकर चौंकी। पलट कर देख तो उन्हीं का ऑटो था। ऑटो लेकर भागनेवाले को पकड़ने के लिए लपकीं तो ठिठक कर रह गयीं, चालक के स्थान पर बैठी बेटी कर रही थी जीत का इशारा।
***
लघुकथा :
सहारे की आदत
*
'तो तुम नहीं चलोगे? मैं अकेली ही जाऊँ?' पूछती हुई वह रुँआसी हो आयी किंतु उसे न उठता देख विवश होकर अकेली ही घर से बाहर आयी और चल पड़ी अनजानी राह पर।
रिक्शा, रेलगाड़ी, विमान और टैक्सी, होटल, कार्यालय, साक्षात्कार, चयन, दायित्व को समझना-निभाना, मकान की तलाश, सामान खरीदना-जमाना एक के बाद एक कदम-दर-कदम बढ़ती वह आज विश्राम के कुछ पल पा सकी थी। उसकी याद सम्बल की तरह साथ होते हुए भी उसके संग न होने का अभाव खल रहा था।
साथ न आया तो खोज-खबर ही ले लेता, मन हुआ बात करे पर स्वाभिमान आड़े आ गया, उसे जरूरत नहीं तो मैं क्यों पहल करूँ? दिन निकलते गये और बेचैनी बढ़ती गयी। अंतत: मन ने मजबूर किया तो चलभाष पर संपर्क साधा, दूसरी और से उसकी नहीं माँ की आवाज़ सुन अपनी सफलता की जानकारी देते हुए उसके असहयोग का उलाहना दिया तो रो पड़ी माँ और बोली बिटिया वह तो मौत से जूझ रहा है, कैंसर का ऑपरेशन हुआ है, तुझे नहीं बताया कि फिर तू जा नहीं पाती। तुझे इतनी रुखाई से भेजा ताकि तू छोड़ सके उसके सहारे की आदत।
स्तब्ध रह गयी वह, माँ से क्या कहती?
तुरंत बाद माँ के बताये चिकित्सालय से संपर्क कर देयक का भुगतान किया, अपने नियोक्ता से अवकाश लिया, आने-जाने का आरक्षण कराया और माँ को लेकर पहुँची चिकित्सालय, वह इसे देख चौंका तो बोली मत परेशान हो, मैं तम्हें साथ ले जा रही हूँ। अब मुझे नहीं तुम्हें डालनी है सहारे की आदत।
***
लघुकथा:
विधान
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नवोढ़ा पुत्रवधू के हर काम में दोष निकलकर उन्हें संतोष होता, सोचतीं यह किसी तरह मायके चली जाए तो पुत्र पर फिर एकाधिकार हो जाए. बेटी भी उनका साथ देती। न जाने किस मिट्टी की बनी थी पुत्रवधु कि हर बात मुस्कुरा कर टाल देती।
कुछ दिनों बाद बेटी का विवाह बहुत अरमानों से किया उन्होंने। कुछ दिनों बाद बेटी को अकेला देहरी पर खड़ा देखकर उनका माथा ठनका, पूछा तो पता चला कि वह अपनी सास से परेशान होकर लौट आयी फिर कभी न जाने के लिये। इससे पहले कि वे बेटी से कुछ कहें बहू अपनी ननद को अन्दर ले गयी और वे सोचती रह गयीं कि यह विधि का विधान है या शिक्षा-विधान?
१०.१.२०१६
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विचित्र भारत
सोनिया गांधी मंदिर महबूबनगर, आंध्र
आंध्र प्रदेश में कांग्रेस के एक कार्यकर्ता पूर्व मंत्री पी शंकर राव ने वर्ष १९१४ में सत्ताधारी दल की मुखिया सोनिया गांधी की ९ फुट ऊंची प्रतिमा स्थापित कर मंदिर तैयार करवाया है। इतालवी मूल की ७१ वर्षीय श्रीमती सोनिया गांधी देश के सबसे ताकतवर राजनीतिज्ञों में से एक हैं। वे उस नेहरू-गाँधी परिवार की सदस्य हैं जिसने देश को ३ तीन प्रधानमंत्री (जवाहर लाल जी, इंदिरा गाँधी जी और राजीव गाँधी जी) दिए हैं जिनमें से बाद के दोनों शहीद हुए। राव ने जुलाई १९९३ में आंध्र प्रदेश के विभाजन और अलग तेलंगाना राज्य बनाने के पार्टी के फैसले के बाद सोनिया गांधी को धन्यवाद देने के लिए महबूबनगर में यह मंदिर बनवाया है। ३.५ करोड़ आबादी वाले तेलंगाना इलाके में हैदराबाद समेत आंध्र प्रदेश के 23 जिलों के 10 जिले शामिल किए गए हैं। राव ने कहा, ''अलग तेलंगाना राज्य बनाने की दशकों पुरानी माँग को पूरा करने में ऐतिहासिक भूमिका अदा करने के लिए सोनिया गाँधीको धन्यवाद देने का यह हमारा तरीक़ा है।''
उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्य मंत्री रहीं बहुजन समाजवादी पार्टी की मायावती जी ने राजधानी लखनऊ में खुद अपनी प्रतिमा युक्त मंदिर का उद्घाटन किया है। दक्षिण भारत में साहित्यकारों, राजनेताओं और अभिनेताओं के मंदिर बनाने की लंबी परंपरा रही है।
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नवगीत:
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छोड़ो हाहाकार मियाँ!
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दुनिया अपनी राह चलेगी
खुदको खुद ही रोज छ्लेगी
साया बनकर साथ चलेगी
छुरा पीठ में मार हँसेगी
आँख करो दो-चार मियाँ!
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आगे आकर प्यार करेगी
फिर पीछे तकरार करेगी
कहे मिलन बिन झुलस मरेगी
जीत भरोसा हँसे-ठगेगी
करो न फिर भी रार मियाँ!
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मंदिर में मस्जिद रच देगी
गिरजे को पल में तज देगी
लज्जा हया शरम बेचेगी
इंसां को बेघर कर देगी
पोंछो आँसू-धार मियाँ!
नवगीत:
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रब की मर्ज़ी
डुबा नाखुदा
गीत गा रहा
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किया करिश्मा कोशिश ने कब?
काम न आयी किस्मत, ना रब
दुनिया रिश्ते भूल गयी सब
है खुदगर्ज़ी
बुला, ना बुला
मीत भा रहा
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तदबीरों ने पाया धोखा
तकरीरों में मिला न चोखा
तस्वीरों का खाली खोखा
नाता फ़र्ज़ी
रहा, ना रहा
जीत जा रहा
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बादल गरजा दिया न पानी
बिगड़ी लड़की राह भुलानी
बिजली तड़की गिरी हिरानी
अर्श फर्श को
मिला, ना मिला
रीत आ रहा
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नवगीत:
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उम्मीदों की फसल
ऊगना बाकी है
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अच्छे दिन नारों-वादों से कब आते हैं?
कहें बुरे दिन मुनादियों से कब जाते हैं?
मत मुगालता रखें जरूरी खाकी है
सत्ता साध्य नहीं है
केवल साकी है
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जिसको नेता चुना उसीसे आशा है
लेकिन उसकी संगत तोला-माशा है
जनप्रतिनिधि की मर्यादा नापाकी है
किससे आशा करें
मलिन हर झाँकी है?
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केंद्रीकरण न करें विकेन्द्रित हो सत्ता
सके फूल-फल धरती पर लत्ता-पत्ता
नदी-गाय-भू-भाषा माँ, आशा काकी है
आँख मिलाकर
तजना ताका-ताकी है
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नवगीत:
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लोकतंत्र का
पंछी बेबस
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नेता पहले डालें दाना
फिर लेते पर नोच
अफसर रिश्वत गोली मारें
करें न किंचित सोच
व्यापारी दे
नशा रहा डँस
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आम आदमी खुद में उलझा
दे-लेता उत्कोच
न्यायपालिका अंधी-लूली
पैरों में है मोच
ठेकेदार-
दलालों को जस
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राजनीति नफरत की मारी
लिए नींव में पोच
जनमत बहरा-गूँगा खो दी
निज निर्णय की लोच
एकलव्य का
कहीं न वारिस
१०-१-२०१५
छंद सलिला:
नौ मात्रिक छंद गंग
(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रा वज्रा, उपेन्द्र वज्रा, कीर्ति, घनाक्षरी, प्रेमा, वाणी, शक्तिपूजा, सार, माला, शाला, हंसी, दोधक, सुजान, छवि)
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९ वसुओं के आधार पर नौ मात्राओं के छंदों को वासव छंद कहा गया है. नवधा भक्ति, नौ रस, नौ अंक, अनु गृह, नौ निधियाँ भी नौ मात्राओं से जोड़ी जा सकती हैं. नौ मात्राओं के ५५ छंदों को ५ वर्गों में विभाजित किया जा सकता है.
१. ९ लघु मात्राओं के छंद १
२. ७ लघु + १ गुरु मात्राओं के छंद ७
३. ५ लघु + २ गुरु मात्राओं के छंद २१
४. ३ लघु + ३ गुरु मात्राओं के छंद २०
५. १ लघु + ४ गुरु मात्राओं के छंद ५
नौ मात्रिक छंद गंग
नौ मात्रिक गंग छंद के अंत में २ गुरु मात्राएँ होती हैं.
उदाहरण:
१. हो गंग माता / भव-मुक्ति-दाता
हर दुःख हमारे / जीवन सँवारो
संसार चाहे / खुशियाँ हजारों
उतर आसमां से / आओ सितारों
जन्नत जमीं पे, नभ से उतारो
शिव-भक्ति दो माँ / भाव-कष्ट-त्राता
२. दिन-रात जागो / सीमा बचाओ
अरि घात में है / मिलकर भगाओ
तोपें चलाओ / बम भी गिराओ
सेना लड़ेगी / सब साथ आओ
३. बचपन हमेशा / चाहे कहानी
है साथ लेकिन / दादी न नानी
हो ज़िंदगानी / कैसे सुहानी
सुने न किस्से, न / बातें बनानी
१०.१.२०१४

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