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गुरुवार, 8 जनवरी 2026

जनवरी ८, मुक्तक, सॉनेट, यमक, गीत, इतिहास, मुहावरे, धन, लघुकथा, तांका, कविता

सलिल सृजन जनवरी ८
ज्ञान दादा 
जड़ जमीं में जमी जिसकी 
वट वही थे ज्ञान दादा। 
उड़ न पाए पतंगों से 
इसलिए कट भी न पाए। 
दे सके थे छाँव सबको 
बन सके थे गाँव सबका। 
पहल करते आप ही थे 
टहल कर वे कहानी में। 
मन रमा करता हमेशा 
काव्य में या जवानी में। 
बुढ़ा पाए थे नहीं वे 
यदपि था वार्धक्य साथी। 
जन्मना परिपक्व थे वे 
सच कहूँ अंधों के हाथी। 
थाह किसने कभी पाई 
नापने जो भी चले थे। 
अंत में यह ही बताया 
सभी नापों से परे थे। 
वाग्देवी सदय थीं पर
तोलकर वे बोलते थे। 
मन न सबके सामने वे 
छले जाने खोलते थे। 
विचारों के धनी थे पर 
थोपते उनको न देखा। 
जिंदगी जी भर जी वे 
व्यर्थ करते थे न लेखा। 
क्या मिला, क्या दिया 
पाया-खो दिया से मुक्त थे वे। 
चित्रगुप्ती सभ्यता से 
बिन कहे संयुक्त थे वे।
मौज-मस्ती, नेह निर्मल  
जिया था उनमें कबीरा।   
बिन लबादा, बिना चोगा
मन मिला उनको फकीरा।
गए जाकर भी नहीं वे 
जी रहे हैं साथियों में। 
जी रहे रचनाओं में वे 
जी रहे अनुगामियों में।
मैं न मैं, मुझमें बसे थे, 
हैं, रहेंगे ज्ञान दादा। 
जड़ जमीं में जमी जिसकी 
वट वही थे ज्ञान दादा।   
*** 
पूर्णिका
.
कोहरा छटे 
उजाला डटे
.
शुभाशा बढ़े
हताशा घटे
.
भेद हो खत्म
मतांतर मिटे
.
नदी-तालाब
कहीं नहिं पटे
.
समझ ले सीख
पाठ मत रटे
.
देशहित हेतु
शीश हर कटे
.
'सलिल' कह बात
कभी मत नटे
८.१.२०२६
०००
राज कुमार महोबिया, बसे उमरिया धाम।
दोहे रचकर पा रहे, दुनिया भर में नाम।।
दुनिया भर में नाम, गीत भी सुंदर दिखते।
मौलिक बिंब प्रतीक, नए नित अपने रचते।।
रहे जीव संजीव, कभी नहीं काज बिसार।
जंगल पाए हर्ष, आया फिर राज कुमार।।
००० 
मुक्तक
हाथ पसारे कृपा माँगना ही मेरा पुरुषार्थ।
शीश हाथ धर शुभाशीष देना तेरा परमार्थ।।
जन्म जन्म का नाता अपना है अटूट भगवान।
मैं कंकर तू शंकर मिलकर हो जाते इंसान।।
(२७ मात्रिक, पदांत गुरु लघु)
जितनी कुटिल प्रवृत्ति जटिल उतना ही होता है इंसान।
जितना सरल सहज मन होता उतनी शांति गहे विद्वान।।
उलझा धागा सुलझाना हो तो धर धीरज थामो छोर-
रात अँधेरी हो कितनी ही प्रसवे दिनकर ऊषा भोर।।
(३१ मात्रिक, पदांत तगण, सात चौके एक त्रिकल)
पर-आजादी दे न सको तो नील गगन भी मत दिखलाओ।
हे परमेश्वर! हे कर्मेश्वर!!, बन मानव धरती पर आओ।।
हमने दुनिया को शस्त्रों हिंसा कचरे का ढेर बनाया-
दीनानाथ न करुणा-प्रिय हो, देकर दण्ड सबक सिखलाओ।।
(३२ मात्रिक, पदांत यगण, ८ चौकल)
८.१.२०२५
०००
*
सॉनेट
तिल का ताड़
*
तिल का ताड़ बना रहे, भाँति-भाँति से लोग।
अघटित की संभावना, क्षुद्र चुनावी लाभ।
बौना कंबलओढ़कर, कभी न हो अजिताभ।।
नफरत फैला समझते, साध रहे हो योग।।
लोकतंत्र में लोक से, दूरी, भीषण रोग।
जन नेता जन से रखें, दूरी मन भय पाल।
गन के साये सिसकता, है गणतंत्र न ढाल।।
प्रजातंत्र की प्रजा को, करते महध अगेह।।
निकल मनोबल अहं का, बाना लेता धार।
निज कमियों का कर रहा, ढोलक पीट प्रचार।
जन को लांछित कर रहे, है न कहीं आधार।
भय का भूत डरा रहा, दिखे सामने हार।।
सत्ता हित बनिए नहीं, आप शेर से स्यार।।
जन मत हेतु न कीजिए, नौटंकी बेकार।।
८-१-२०२२
*
भारत की माटी
*
जड़ को पोषण देकर
नित चैतन्य बनाती।
रचे बीज से सृष्टि
नए अंकुर उपजाति।
पाल-पोसकर, सीखा-पढ़ाती।
पुरुषार्थी को उठा धरा से
पीठ ठोंक, हौसला बढ़ाती।
नील गगन तक हँस पहुँचाती।
किन्तु स्वयं कुछ पाने-लेने
या बटोरने की इच्छा से
मुक्त वीतरागी-त्यागी है।
*
सुख-दुःख,
धूप-छाँव हँस सहती।
पीड़ा मन की
कभी न कहती।
सत्कर्मों पर हर्षित होती।
दुष्कर्मों पर धीरज खोती।
सबकी खातिर
अपनी ही छाती पर
हल बक्खर चलवाती,
फसलें बोती।
*
कभी कोइ अपनी जड़ या पग
जमा न पाए।
आसमान से गर गिर जाए।
तो उसको
दामन में अपने लपक छिपाती,
पीठ ठोंक हौसला बढ़ाती।
निज संतति की अक्षमता पर
ग़मगीं होती, राह दिखाती।
मरा-मरा से राम सिखाती।
इंसानों क्या भगवानो की भी
मैया है भारत की माटी।
***
गीत
आज नया इतिहास लिखें हम।
अब तक जो बीता सो बीता
अब न हास-घट होगा रीता
अब न साध्य हो स्वार्थ सुभीता
अब न कभी लांछित हो सीता
भोग-विलास न लक्ष्य रहे अब
हया, लाज, परिहास लिखें हम
रहें न हमको कलश साध्य अब
कर न सकेगी नियति बाध्य अब
सेह-स्वेद-श्रम हो आराध्य अब
पूँजी होगी महज माध्य अब
श्रम पूँजी का भक्ष्य न हो अब
शोषक हित खग्रास लिखें हम
मिल काटेंगे तम की कारा
उजियारे के हों पाव बारा
गिर उठ बढ़कर मैदां मारा
दस दिश में गूँजे जयकारा।
कठिनाई में संकल्पों का
कोशिश कर नव हास , लिखें हम
आज नया इतिहास लिखें हम।
८-१-२०२२
***
मनरंजन
मुहावरों ,लोकोक्तियों, गीतों में धन
*
०१. कौड़ी के मोल
०२. कौड़ी-कौड़ी को मोहताज
०३. घर में नईंयाँ दाने, अम्मा चली भुनाने
०४. जेब कटना
०५. जेब काटना
०६. जेब फटना
०७. जेब भरी होना
०८. टके के तीन
०९. दोनों हाथों लुटाना
१०. दौलत के दीवाने
११. नोट छापना
१२. नोटों की बरसात होना
१३. नौ नगद न तरह उधार
१४. पुरुष पुरातन की वधु, क्यों न चंचला होय?
१५. पैसा न कौड़ी बाजार को दौड़ी
१६. पैसा फेंकना
१७. पैसा हाथ का मैल होना
१८. पैसे की जात न होना
१९. पैसे पानी की तरह बहाना
२०. पैसे पेड़ पर नहीं उगते
२१. बाप भला न भैया, सबसे भला रुपैया
२२. सूँघ का धन शैतान खाए
२३. हिसाब चुकाना
अन्य
०१. लछमी सी बहू
०२. गृहलक्ष्मी
०३.. एक चवन्नी चाँदी की, जय बोलो महात्मा गाँधी की
गीत
०१. आमदनी अठन्नी खरचा रुपैया / तो भैया ना पूछो, ना पूछो हाल / नतीजा ठनठन गोपाल
०२. पाँच रुपैया, बारा आना, मारेगा भैया ना ना ना ना -चलती का नाम गाड़ी
०३. न बीवी न बच्चा, न बाप बड़ा न मैया, दि होल थिंग इज़ दैट कि भैया सबसे बड़ा रुपैया - सबसे बड़ा रुपैया
०४. क्या बात है क्या चीज है पैसा / पैसा पैसा करती है क्यों पैसे पे तू मरती है - दे दनादन,
०५. पैसा ये पैसा पैसा ये पैसा क्या अपना सपना मनी मनी - कर्ज, १९८०, किशोर कुमार
०६. देख छोरी को देख / पैसा फेंक -
०७. कैश मेरी आँखों में - कैश
०८. ये पैसा बोलता है - काला बाजार, नितिन मुकेश
०९. मुझे मिल जो जाए थोड़ा पैसा - आगोश
८-१-२०२१
***
लघुकथा :
खिलौने
*
दिन भर कार्यालय में व्यस्त रहने के बाद घर पहुँचते ही पत्नी ने किराना न लाने का उलाहना दिया तो वह उलटे पैर बाज़ार भागा। किराना लेकर आया तो बिटिया रानी ने शिकायत की 'माँ पिकनिक नहीं जाने दे रही।' पिकनिक के नाम से ही भड़क रही श्रीमती जी को जैसे-तैसे समझाकर अनुमति दिलवाई तो मुँह लटकाए हुए बेटा दिखा। उसे बुलाकर पूछ तो पता चला कि खेल का सामान चाहिए। 'ठीक है' पहली तारीख के बाद ले लेना' कहते हुए उसने चैन की साँस ली ही थी कि पिताजी क खाँसने और माँ के कराहने की आवाज़ सुन उनके पास पहुँच गया। माँ के पैताने बैठ हाल-चाल पूछा तो पाता चला कि न तो शाम की चाय मिली है, न दवाई है। बिटिया को आवाज़ देकर चाय लाने और बेटे को दवाई लाने भेजा और जूते उतारने लगा कि जीवन बीमा एजेंट का फोन आ गया 'क़िस्त चुकाने की आखिरी तारीख निकल रही है, समय पर क़िस्त न दी तो पालिसी लेप्स हो जाएगी। अगले दिन चेक ले जाने के लिए बुलाकर वह हाथ-मुँह धोने चला गया।
आते समय एक अलमारी के कोने में पड़े हुए उस खिलौने पर दृष्टि पड़ी जिससे वह कभी खेलता था। अनायास ही उसने हाथ से उस छोटे से बल्ले को उठा लिया। ऐसा लगा गेंद-बल्ला कह रहे हैं 'तुझे ही तो बहुत जल्दी पड़ी थी बड़ा होने की। रोज ऊँचाई नापता था न? तब हम तुम्हारे खिलौने थे, तुम जैसा चाहते वैसा ही उपयोग करते थे। अब हम रह गए हैं दर्शक और तुम हो गए हो सबके हाथ के खिलोने।
५.१.२०१८
***
लघुकथा-
गुरु
*
'मुझे आपसे बहुत कुछ सीखना है, क्या आप मुझे शिष्य बनाकार कवर रचं और छंद नहीं सिखायेंगे?'
बार-बार अनुरोध होने पर न स्वीकारने की अशिष्टता से बचने के लिए सहमति दे दी। रचनाओं की प्रशंसा, विधा के विधान आदि की जानकारी लेने तक तो सब कुछ ठीक रहा ।
एक दिन शिष्या की रचनाओं में कुछ त्रुटियाँ इंगित करने पर उत्तर मिला- 'खुद को क्या समझते हैं? हिम्मत कैसे की रचनाओं में गलतियाँ निकालने की? मुझे इतने पुरस्कार मिल चुके हैं. फेस बुक पर जो भी लिखती हूँ सैंकड़ों लाइक मिलते हैं। मेरी लिखे में गलती हो ही नहीं सकती।आइंदा ऐसा किया तो...' आगे पढ़ने में समय ख़राब करने के स्थान पर गुरु जी ने शिष्या को ब्लॉक कर चैन की साँस लेते हुए कान पकड़े कि अब नहीं बनायेंगे किसी को शिष्या और नहीं बनेंगे किसी के गुरु।
***
लघुकथा
खाँसी
*
कभी माँ खाँसती, कभी पिता. उसकी नींद टूट जाती, फिर घंटों न आती. सोचता काश, खाँसी बंद हो जाए तो चैन की नींद ले पाए.
पहले माँ, कुछ माह पश्चात पिता चल बसे. मैंने इसकी कल्पना भी न की थी.
अब करवटें बदलते हुए रात बीत जाती है, माँ-पिता के बिना सूनापन असहनीय हो जाता है. जब-तब लगता है अब माँ खाँसी, अब पिता जी खाँसे.
तब खाँसी सुनकर नींद नहीं आती थी, अब नींद नहीं आती है कि सुनाई दे खाँसी.
***
तांका सलिला
*
सियासत है
तीन-पांच का खेल
किंतु बेमेल.
जनता मजबूर
मरी जा रही झेल.
*
बाप ना बेटा
सिर्फ सत्ता है प्यारी.
टकराते हैं
अपने स्वार्थ हित
जनता से गद्दारी.
*
खाते हैं मेवा
कहते जनसेवा.
देवा रे देवा
लगा दे पटकनी
बना भी दे चटनी.
*
क्यों करेगी
किसी से छेड़छाड़
कोई लड़की?
अगर है कड़की
करेगी डेटिंग
*
कुछ गलत
बदनाम हैं सभी.
कुछ हैं सही
नेकनाम न सब.
किसका करतब?
८.१.२०१७
***
एक दोहा
लज्जा या निर्लज्जता, है मानव का बोध
समय तटस्थ सदा रहे, जैसे बाल अबोध
८.१.२०१६
***
:अलंकार चर्चा ०९ :
यमक अलंकार
भिन्न अर्थ में शब्द की, हों आवृत्ति अनेक
अलंकार है यमक यह, कहते सुधि सविवेक
पंक्तियों में एक शब्द की एकाधिक आवृत्ति अलग-अलग अर्थों में होने पर यमक अलंकार होता है. यमक अलंकार के अनेक प्रकार होते हैं.
अ. दुहराये गये शब्द के पूर्ण-आधार पर यमक अलंकार के ३ प्रकार १. अभंगपद, २. सभंगपद ३. खंडपद हैं.
आ. दुहराये गये शब्द या शब्दांश के सार्थक या निरर्थक होने के आधार पर यमक अलंकार के ४ भेद १.सार्थक-सार्थक, २. सार्थक-निरर्थक, ३.निरर्थक-सार्थक तथा ४.निरर्थक-निरर्थक होते हैं.
इ. दुहराये गये शब्दों की संख्या व् अर्थ के आधार पर भी वर्गीकरण किया जा सकता है.
उदाहरण :
१. झलके पद बनजात से, झलके पद बनजात
अहह दई जलजात से, नैननि सें जल जात -राम सहाय
प्रथम पंक्ति में 'झलके' के दो अर्थ 'दिखना' और 'छाला' तथा 'बनजात' के दो अर्थ 'पुष्प' तथा 'वन गमन' हैं. यहाँ अभंगपद, सार्थक-सार्थक यमक अलंकार है.
द्वितीय पंक्ति में 'जलजात' के दो अर्थ 'कमल-पुष्प' और 'अश्रु- पात' हैं. यहाँ सभंग पद, सार्थक-सार्थक यमक अलंकार है.
२. कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय
या खाये बौराय नर, वा पाये बौराय
कनक = धतूरा, सोना -अभंगपद, सार्थक-सार्थक यमक
३. या मुरली मुरलीधर की, अधरान धरी अधरा न धरैहौं
मुरली = बाँसुरी, मुरलीधर = कृष्ण, मुरली की आवृत्ति -खंडपद, सार्थक-सार्थक यमक
अधरान = अधरों पर, अधरा न = अधर में नहीं - सभंगपद, सार्थक-सार्थक यमक
४. मूरति मधुर मनोहर देखी
भयेउ विदेह विदेह विसेखी -अभंगपद, सार्थक-सार्थक यमक, तुलसीदास
विदेह = राजा जनक, देह की सुधि भूला हुआ.
५. कुमोदिनी मानस-मोदिनी कहीं
यहाँ 'मोदिनी' का यमक है. पहला मोदिनी 'कुमोदिनी' शब्द का अंश है, दूसरा स्वतंत्र शब्द (अर्थ प्रसन्नता देने वाली) है.
६. विदारता था तरु कोविदार को
यमक हेतु प्रयुक्त 'विदार' शब्दांश आप में अर्थहीन है किन्तु पहले 'विदारता' तथा बाद में 'कोविदार' प्रयुक्त हुआ है.
७. आयो सखी! सावन, विरह सरसावन, लग्यो है बरसावन चहुँ ओर से
पहली बार 'सावन' स्वतंत्र तथा दूसरी और तीसरी बार शब्दांश है.
८. फिर तुम तम में मैं प्रियतम में हो जावें द्रुत अंतर्ध्यान
'तम' पहली बार स्वतंत्र, दूसरी बार शब्दांश.
९. यों परदे की इज्जत परदेशी के हाथ बिकानी थी
'परदे' पहली बार स्वतंत्र, दूसरी बार शब्दांश.
१०. घटना घटना ठीक है, अघट न घटना ठीक
घट-घट चकित लख, घट-जुड़ जाना लीक
११. वाम मार्ग अपना रहे, जो उनसे विधि वाम
वाम हस्त पर वाम दल, 'सलिल' वाम परिणाम
वाम = तांत्रिक पंथ, विपरीत, बाँया हाथ, साम्यवादी, उल्टा
१२. नाग चढ़ा जब नाग पर, नाग उठा फुँफकार
नाग नाग को नागता, नाग न मारे हार
नाग = हाथी, पर्वत, सर्प, बादल, पर्वत, लाँघता, जनजाति
जबलपुर, १८-९-२०१५
***
हास्य सलिला:
उमर कैद
*
लालू पहुँचे कचहरी बैठे चुप दम साध
जज बोलीं: 'दिल चुराया, है चोरी अपराध
हाथ जोड़ उत्तर दिया: ' क्षमा करें सरकार!
दिल देकर दिल ले लिया, किया महज व्यापार'
'लाइसेंस-कर के बिना, बिजनेस करना दोष'
मौका मिले हुजूर तो भर देंगे हम कोष'
'बेजा कब्जा कर बसे दिल में छीना चैन
रात ख्वाब में आ रहे, भले बंद हों नैन'
'लाख करो इंकार पर मानेंगे इकरार
करो जुर्म स्वीकार चुप, बंद करो तकरार'
'देख अदा लत लग गयी, किया न कोई गुनाह
बैठ अदालत में भरें नित दिल थामे आह'
'नहीं जमानत मिलेगी, सात पड़ेंगे फंद'
उमर कैद की सजा सुन , हुई बोलती बंद
***
एकाक्षरी दोहा:
एकाक्षरी दोहा संस्कृत में महाकवि भारवी ने रचे हैं. संभवत: जैन वांग्मय में भी एकाक्षरी दोहा कहा गया है. निवेदन है कि जानकार उन्हें अर्थ सहित सामने लाये. ये एकाक्षरी दोहे गूढ़ और क्लिष्ट हैं. हिंदी में एकाक्षरी दोहा मेरे देखने में नहीं आया. किसी की जानकारी में हो तो स्वागत है.
मेरा प्रयास पारंपरिक गूढ़ता से हटकर सरल एकाक्षरी दोहा प्रस्तुत करने का है जिसे सामान्य पाठक बिना किसी सहायता के समझ सके. विद्वान् अपने अनुकूल न पायें तो क्षमा करें . पितर पक्ष के प्रथम दिन अपने साहित्यिक पूर्वजों का तर्पण इस दोहे से करता हूँ.
पाठक इसमें अलंकार खोजें - बताएँ.
ला, लाला! ला लाल ला, लाली-लालू-लाल.
लल्ली-लल्ला लाल लो, ले लो लल्ला! लाल.
***
एक कविता:
चीता
*
कौन कहता है
कि चीता मर गया है?
हिंस्र वृत्ति
जहाँ देखो बढ़ रही है.
धूर्तता
किस्से नए नित गढ़ रही है.
शक्ति के नाखून पैने,
चोट असहायों पर करते,
स्वाद लेकर रक्त पीते,
मारकर औरों को जीते।
और तुम?
और तुम कहते हो
चीता मर गया है.
नहीं,
वह तो आदमी की नस्ल में
घर कर गया है.
कौन कहता है कि
चीता मर गया है?
८.१.२०१४
***

मंगलवार, 6 जनवरी 2026

जनवरी ६, सॉनेट, फ़साना, कोहरा, चक्की, सरस्वती, लघुकथा, मुक्तक, दोधक छंद,

सलिल सृजन जनवरी ६
पूर्णिका
तुम्हें न रुकना
मुझे न झुकना
.
हर ज़र्रे पर
हमला लिखना
.
फैला नफ़रत
हिंसा करना
.
बाहुबली से
पल-पल डरना
.
जहाँ लाभ हो
जबरन घुसना
.
सरकारों को
कुचल पलटना
.
लोकतंत्र को
दफना हँसना
.
जहाँ तेल हो
लपक झपटना
.
स्वार्थ साधने
बोल पलटना
.
निर्बल को बल
दिखा अकड़ना
.
टैरिफ दानव
मार विहँसना
.
भारत माता
आगे बढ़ना
.
सलिल नर्मदा 
निर्मल बहना
०००
पूर्णिका
भोर भई रवि हर अँधियारा
पौ फटते लाए उजियारा
.
कलरव कर खग गाए प्रभाती
कलकल ताप मिटाए सारा
.
अग्र वाल पर छंद-गीत रच
नव रस ने जीवन सिंगारा
.
आपद-विपद न शेष कहीं हो
कोशिश रहे पर्वताकारा
.
सलिल करें हँस पद प्रक्षालन
अमरनाथ का मिले सहारा
०००
दोहा सलिला
.
कोहरा सत्ता पक्ष सम, ठंडी हवा विपक्ष।
पीत सूर्य हैं राष्ट्रपति, घास शेर का भक्ष।।
.
ब्लोअर गीजर का हुआ, हर घर-घर में राज्य।
पाला से पाला पड़ा, घर-बाहर साम्राज्य।।
.
सिगड़ी-हीटर से बढ़ा, भाईचारा खूब।
कूलर-पंखे उपेक्षित, मौन रंज में डूब।।
.
खिड़की के पट बंद हैं, पटरानी बेजार।
कैसे झाँक पड़ोस का, हाल कहें चटखार।।
.
दर-दरवाजे पर नहीं, कोई पूछनहार।
कुंडी खटकाए हवा, शीतल कर सत्कार।।
.
सिगड़ी-गुरसी-काँगड़ी, चूल्हा राहत बाँट।
हुए लोक में लोकप्रिय, जैसे सोना खाँट।।
.
चाह चाय की बढ़ हुई, द्रुपद सुता का चीर।
नाकाफी कॉफी मुई, चुस्की लो धर धीर।।
६.१.२०२६
... 
सॉनेट
फ़साना
*
नए सिरे से फ़साना कहा-सुना जाए,
बदल न खुद को सके तो बदल लिए कपड़े,
न कोई बात तो बेबात ही मिले-झगड़े,
न हकीकत सहन तो ख्वाब ही बुना जाए ।
रुई नहीं तो चलो शीश ही धुना जाए,
जो ढोल पीट रहे; वे नहीं रहे अगड़े,
लड़े तकदीर से जो बढ़ गए नहीं पिछड़े,
कमी कहाँ है हमारी चलो गुना जाए।
करें जो काम तो अकाम हो बिसार सकें,
करें गलत न कभी; जो करें वही हो सही,
मिलें खुद से जो कभी, गमगुसार हो जाए ।
मिले जो नाम तो अनाम पे निसार सकें,
कभी गुमनाम न हो याद हसीं जो है तही,
लिखे नगमे जो कभी जिसके लिए वो गाए ।
***
सोनेट
कोहरा
*
कोहरा छाया राजनीति में, नहीं सूझती राह,
राह न रुचती सद्भावों की, सत्ता-पद का मोह,
जनसेवा व्यवसाय बनाकर करें देश से द्रोह,
अपने दुश्मन आप हुए हम, लड़ा रही है डाह ।
कहे न कोई वाह, चोट दे-पा भरते हैं आह,
फूटी आँख न कोई किसी को तनिक रहा है सोह,
लें कानून हाथ में जनगण रोज करे विद्रोह,
आम आदमी को न कहीं भी मिलती आज पनाह ।
कोहरा छाया संबंधों पर हुआ लापता नेह,
देह साध्य, आत्मा को कोई नहीं रहा पहचान,
भूल गए परमार्थ, स्वार्थ ही आज हो गया साध्य।
आँगन में उठती दीवारें, बिखर रहा है गेह,
क्रंदन करते-सुनते भूले, हम कोयल का गान,
तज विराटता; हुई क्षुद्रता कहिए क्यों आराध्य ।
६.१.२०२४
***
नव प्रयोग
(छंद- सॉनेट सोरठा)
नमन शारदे मातु, मति दे आत्मा जगा दे।
खुद की कर पहचान, काम सभी निष्काम कर।
कोई रहे न गैर, जीवन सकल ललाम कर।।
सविता ऊषा प्रात, नव उजास मन समा दे।।
सोते बीता जन्म, माँ झकझोर जगा हमें।
अनुशासन का पाठ, भूल गए कर याद लें।
मातृभूमि पर प्राण, कर कुर्बां मुस्का सकें।।
करें प्रकृति से प्रेम, पौधारोपण कर हँसें।।
नाद अनाहद भूल, भवसागर में सिसकते।
निष्फल रहे प्रयास, बाधित हो पग भटकते।
माता! थामो बाँह, छंद सिखा दो अटकते।।
मैया! सुत नादान, बुद्धि-ज्ञान दे तार दे।
जग मतलब का मीत, जननी अविकल प्यार दे।
कर माया से मुक्त, जीवन जरा निखार दे।।
६-१-२०२३, १०•२५
●●●
मुक्तक
तमन्ना है तमन्ना को सकें, सुन-समझ मिलकर संग।
सुनें अशआर नज़्में चंद, बिखरे ग़ज़ल के भी रंग।।
सलिल संजीव हो पाकर सखावत, हुनर कुछ सीखे।
समझदारों की संगत के, तनिक लायक बने-दीखे।।
६-१-२०२३
***
सॉनेट
चक्की
*
चक्की चलती समय की, पीस रही बारीक।
अलग सभी से दीख, बच जा कीली से चिपक।
दूर ईश से आत्म, काल करे स्वागत लपक।।
पक्षपात करती नहीं, सत्य सनातन लीक।।
चक्की पीसा ग्रहणकर, चले सृष्टि व्यापार।
अन्य पिसे तो हँसा, आप पिसा सब हँस रहे।
मोह जाल मजबूत, माया मृग जा फँस रहे।।
परम शक्ति गृहणी कुशल, पाले कह आभार।।
निशि-दिन चक्की पाट हैं, कीली है भगवान।
नादां प्रभु को भज बचे, जाने जीव सुजान।
हथदंडा है पुरोहित, दाना तू यजमान।
परम ब्रह्म है कील, सज समझ मौन मतिमान।।
शेष कर रहे भूल, भज सक न, भूल भगवान।।
कर्म-दंड चुप झेल, संबल प्रभु का गुणगान।।
६-१-२०२२
***
मुक्तक
विधान : ३०वर्ण, भ य र त म न स न भ य।
*
अंबर निराला, नीलिमा में लालिमा घोले, मगन मन लीन चुप है, कुछ न बोले।
उषा भास्कर उजाला, कालिमा पी मस्त हो डोले, मनुज जग गीत नव गा, उठ अबोले।।
करे स्वागत उसी का, भाग्य जो नैना न हो मूँदे, डगर पर हो विचरता, हर सवेरे।
बहाए हँस पसीना, कामना ले काम ना छोड़े, फिसल कर हो सँभलता, सफल हो ले।
६-१-२०२१
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लघुकथा
समानाधिकार
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"माय लार्ड! मेरे मुवक्किल पर विवाहेतर अवैध संबंध बनाने के आरोप में कड़ी से कड़ी सजा की माँग की जा रही है। उसे धर्म, नैतिकता, समाज और कानून के लिए खतरा बताया जा रहा है। मेरा निवेदन है कि अवैध संबंध एक अकेला व्यक्ति कैसे बना सकता है? संबंध बनने के लिए दो व्यक्ति चाहिए, दोनों की सहभागिता, सहमति और सहयोग जरूरी है। यदि एक की सहमति के बिना दूसरे द्वारा जबरदस्ती कर सम्बन्ध बनाया गया होता तो प्रकरण बलात्कार का होता किंतु इस प्रकरण में दोनों अलग-अलग परिवारों में अपने-अपने जीवन साथियों और बच्चों के साथ रहते हुए भी बार-बार मिलते औए दैहिक सम्बन्ध बनाते रहे - ऐसा अभियोजन पक्ष का आरोप है।
भारत का संविधान भाषा, भूषा, क्षेत्र, धर्म, जाति, व्यवसाय या लिंग किसी भी अधर पर भेद-भाव का निषेध कर समानता का अधिकार देता है। यदि पारस्परिक सहमति से विवाहेतर दैहिक संबंध बनाना अपराध है तो दोनों बराबर के अपराधी हैं, दोनों को एक सामान सजा मिलनी चाहिए अथवा दोनों को दोष मुक्त किया जाना चाहिए।अभियोजन पक्ष ने मेरे मुवक्किल के साथ विवाहेतर संबंध बनानेवाली के विरुद्ध प्रकरण दर्ज नहीं किया है, इसलिए मेरे मुवक्किल को भी सजा नहीं दी जा सकती।
वकील की दलील पर न्यायाधीश ने कहा- "वकील साहब आपने पढ़ा ही है कि भारत का संविधान एक हाथ से जो देता है उसे दूसरे हाथ से छीन लेता है। मेरे सामने जिसे अपराधी के रूप में पेश किया गया है मुझे उसका निर्णय करना है। जो अपराधी के रूप में प्रस्तुत ही नहीं किया गया है, उसका विचारण मुझे नहीं करना है। आप अपने मुवक्किल के बचाव में तर्क दे पर संभ्रांत महिला और उसके परिवार की बदनामी न हो इसलिए उसका उल्लेख न करें।"
अपराधी को सजा सुना दी गयी और सिर धुनता रह गया समानाधिकार।
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नवगीत:
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काल है संक्रांति का
तुम मत थको सूरज!
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दक्षिणायन की हवाएँ
कँपाती हैं हाड़
जड़ गँवा, जड़ युवा पीढ़ी
काटती है झाड़
प्रथा की चूनर न भाती
फेंकती है फाड़
स्वभाषा को भूल, इंग्लिश
से लड़ाती लाड़
टाल दो दिग्भ्रान्ति को
तुम मत रुको सूरज!
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उत्तरायण की फिज़ाएँ
बनें शुभ की बाड़
दिन-ब-दिन बढ़ता रहे सुख
सत्य की हो आड़
जनविरोधी सियासत को
कब्र में दो गाड़
झाँक दो आतंक-दहशत
तुम जलाकर भाड़
ढाल हो चिर शांति का
तुम मत झुको सूरज!
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नवगीत:
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सत्याग्रह के नाम पर.
तोडा था कानून
लगा शेर की दाढ़ में
मनमानी का खून
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बीज बोकर हो गये हैं दूर
टीसता है रोज ही नासूर
तोड़ते नेता सतत कानून
सियासत है स्वार्थ से भरपूर
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भगतसिंह से किया था अन्याय
कौन जाने क्या रहा अभिप्राय?
गौर तन में श्याम मन का वास
देश भक्तों को मिला संत्रास
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कब कहाँ थे खो गये सुभाष?
बुने किसने धूर्तता के पाश??
समय कैसे कर सकेगा माफ़?
वंश का ही हो न जाए नाश.
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तीन-पाँच पढ़ते रहे
अब तक जो दो दून
समय न छोड़े सत्य की
भट्टी में दे भून
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नहीं सुधरे पटकनी खाई
दाँत पीसो व्यर्थ मत भाई
शास्त्री जी की हुई क्यों मौत?
अभी तक अज्ञात सच्चाई
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क्यों दिये कश्मीरियत को घाव?
दहशतों का बढ़ गया प्रभाव
हिन्दुओं से गैरियत पाली
डूबा ही दी एकता की नाव
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जान की बाजी लगाते वीर
जीतते हैं युद्ध सहकर पीर
वार्ता की मेज जाते हार
जमीं लौटा भोंकते हो तीर
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क्यों बिसराते सत्य यह
बिन पानी सब सून?
अब तो बख्शो देश को
'सलिल' अदा कर नून
६.१.२०१७
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लघुकथा
दस्तूर
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अच्छे अच्छों का दीवाला निकालकर निकल गई दीपावली और आ गयी दूज...
सकल सृष्टि के कर्म देवता, पाप-पुण्य नियामक निराकार परात्पर परमब्रम्ह चित्रगुप्त जी और कलम का पूजन कर ध्यान लगा तो मनस-चक्षुओं ने देखा अद्भुत दृश्य.
निराकार अनहद नाद... ध्वनि के वर्तुल... अनादि-अनंत-असंख्य. वर्तुलों का आकर्षण-विकर्षण... घोर नाद से कण का निर्माण... निराकार का क्रमशः सृष्टि के प्रागट्य, पालन और नाश हेतु अपनी शक्तियों को तीन अदृश्य कायाओं में स्थित करना...
महाकाल के कराल पाश में जाते-आते जीवों की अनंत असंख्य संख्या ने त्रिदेवों और त्रिदेवियों की नाम में दम कर दिया. सब निराकार के ध्यान में लीन हुए तो हर चित्त में गुप्त प्रभु की वाणी आकाश से गुंजित हुई:
__ "इस समस्या के कारण और निवारण तुम तीनों ही हो. अपनी पूजा, अर्चना, वंदना, प्रार्थना से रीझकर तुम ही वरदान देते हो औरउनका दुरूपयोग होने पर परेशान होते हो. करुणासागर बनने के चक्कर में तुम निष्पक्ष, निर्मम तथा तटस्थ होना बिसर गये हो."
-- तीनों ने सोच:' बुरे फँसे, क्या करें कि परमपिता से डांट पड़ना बंद हो?'.
एक ने प्रारंभ कर दिया परमपिता का पूजन, दूसरे ने उच्च स्वर में स्तुति गायन तथा तीसरे ने प्रसाद अर्पण करना.
विवश होकर परमपिता को धारण करना पड़ा मौन.
तीनों ने विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका पर कब्जा किया और भक्तों पर करुणा करने के लिए बढ़ दिया दस्तूर।
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लघुकथा
भाव ही भगवान
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एक वृद्ध के मन में अंतिम समय में नर्मदा-स्नान की चाह हुई. लोगों ने बता दिया कि नर्मदा जी अमुक दिशा में कोसों दूर बहती हैं, तुम नहीं जा पाओगी. वृद्धा न मानी... भगवान् का नाम लेकर चल पड़ी...कई दिनों के बाद दिखी उसे एक नदी... उसने 'नरमदा तो ऐसी मिलीं रे जैसे मिल गै मताई औ' बाप रे' गाते हुए परम संतोष से डुबकी लगाई. कुछ दिन बाद साधुओं का एक दल आया... शिष्यों ने वृद्धा की खिल्ली उड़ाते हुए बताया कि यह तो नाला है. नर्मदा जी तो दूर हैं हम वहाँ से नहाकर आ रहे हैं. वृद्धा बहुत उदास हुई... बात गुरु जी तक पहुँची. गुरु जी ने सब कुछ जानने के बाद, वृद्धा के चरण स्पर्श कर कहा : 'जिसने भाव के साथ इतने दिन नर्मदा जी में नहाया उसके लिए मैया यहाँ न आ सकें इतनी निर्बल नहीं हैं. 'कंकर-कंकर में शंकर', 'मन चंगा तो कठौती में गंगा' का सत्य भी ऐसा ही है. 'भाव का भूखा है भगवान' जैसी लोकोक्ति इसी सत्य की स्वीकृति है. जिसने इस सत्य को गह लिया उसके लिये 'हर दिन होली, रात दिवाली' हो जाती है. मैया तुम्हें नर्मदा-स्नान का पुण्य है लेकिन जो नर्मदा जी तक जाकर भी भाव का अभाव मिटा नहीं पाया उसे नर्मदा-स्नान का पुण्य नहीं है. मैया! तुम कहीं मत जाओ, माँ नर्मदा वहीं हैं जहाँ तुम हो. भाव ही भगवान है''
१९.११.२०१५
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नवगीत:
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उठो पाखी!
पढ़ो साखी
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हवाओं में शराफत है
फ़िज़ाओं में बगावत है
दिशाओं की इनायत है
अदाओं में शराफत है
अशुभ रोको
आओ खाखी
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अलावों में लगावट है
गलावों में थकावट है
भुलावों में बनावट है
छलावों में कसावट है
वरो शुभ नित
बाँध राखी
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खत्म करना अदावत है
बदल देना रवायत है
ज़िंदगी गर नफासत है
दीन-दुनिया सलामत है
शहद चाहे?
पाल माखी
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मुक्तिका:
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गीतों से अनुराग न होता
जीवन कजरी-फाग न होता
रास आस से कौन रचाता?
मौसम पहने पाग न होता
निशा उषा संध्या से मिलता
कैसे सूरज आग न होता?
बाट जोहता प्रिय प्रवास की
मन-मुँडेर पर काग न होता
चंदा कहलाती कैसे तुम
गर निष्ठुरता-दाग न होता?
नागिन क्वांरी रह जाती गर
बीन सपेरा नाग न होता
'सलिल' न होता तो सच मानो
बाट घाट घर बाग़ न होता
६-१-२०१५
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छंद सलिला:
दोधक छंद
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(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रा वज्रा, उपेन्द्र वज्रा, कीर्ति, घनाक्षरी, प्रेमा, वाणी, शक्तिपूजा, सार, माला, शाला, हंसी)
दोधक दो गुरु तुकान्ती पंक्तियों का मात्रिक छंद है. इस छंद में हर पंक्ति में ३ भगण तथा २ गुरु कुल १६ मात्राएँ तथा ११ वर्ण मात्राएँ होते हैं ।
उदाहरण:
१. काम न काज जिसे वह नेता।
झूठ कहे जन-रोष प्रणेता।।
तीन भगण दो गुरु मिल रचते, दोधक छंद ललाम
ग्यारह अक्षर सोलह मात्रा, तालमेल अभिराम
होश न हो पर जोश दिखाये।
लोक ठगा सुनता रह जाए।।
दे खुद ही खुद को यश सारा।
भोग रहा  को मद-मारा।।
२. कौन कहो सुख-चैन चुराते।
काम नहीं पर काम जताते।।
मोह रहे कब से मन मेरा।
रावण की भगिनी पग-फेरा।।
होकर बेसुध हाय लगाती।
निष्ठुर कौन? बनो मम साथी।।
स्त्री मुझ सी तुम सा नर पाये।
मान कहा, नहिं जीवन जाए।।
३. बंदर बालक एक सरीखे…
बात न मान करें मनमानी।
मान रहे खुद को खुद ज्ञानी।
कौन कहे कब क्या कर देंगे।
कूद गिरे उठ रो-हँस लेंगे।
ऊधम खूब करें, संग चीखें…
खा कम फेंक रहे मिल ज्यादा,
याद नहीं रहता निज वादा।
शांत रहें खाकर निज कसमें,
आज कहें बिसरें सब रस्में।
राह नहीं इनको कुछ दीखे…
६.१.२०१४
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व्यंग्य रचना:
हो गया इंसां कमीना...
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गली थी सुनसान, कुतिया एक थी जाती अकेली.
दिखे कुछ कुत्ते, सहम संकुचा उठी थी वह नवेली..
कहा कुत्तों ने: 'न डरिए, श्वान हैं इंसां नहीं हम.
आँच इज्जत पर न आएगी, भरोसा रखें मैडम..
जाइए चाहे जहाँ सर उठा, है खतरा न कोई.
आदमी से दूर रहिए, शराफत उसने है खोई..'
कहा कुतिया ने:'करें हड़ताल लेकर एक नारा.
आदमी खुद को कहे कुत्ता नहीं हमको गवारा..'
'ठीक कहती हो सखी तुम, जानवर कुछ तुरत बोले.
माँग हो अब जानवर खुद को नहीं इंसान बोले.
थे सभी सहमत, न अब इन्सान को मुँह लगायेंगे.
हो गया लुच्चा कमीना, आदमी को बताएँगे..
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लघुकथा:
एकलव्य
संजीव 'सलिल'
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- 'नानाजी! एकलव्य महान धनुर्धर था?'
- 'हाँ; इसमें कोई संदेह नहीं है.'
- उसने व्यर्थ ही भोंकते कुत्तों का मुंह तीरों से बंद कर दिया था ?'
-हाँ बेटा.'
- दूरदर्शन और सभाओं में नेताओं और संतों के वाग्विलास से ऊबे पोते ने कहा - 'काश वह आज भी होता.'
६.१.२०१३
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