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रविवार, 11 जनवरी 2026

पाइल्स, बवासीर, अर्श, स्वास्थ्य, चिकित्सा

बवासीर
बवासीर (पाइल्स) में मल त्याग के दौरान या बाद में दर्द, खुजली, जलन, सूजन, और गुदा के आसपास मस्से महसूस होते हैं।  मल के साथ लाल-कत्थई खून दिखना, मल त्यागने के बाद भी पेट साफ न होना, मल त्याग के बाद गुदा से बलगम (म्यूकस) निकलना, मस्से बाहर निकलना आदि  बवासीर के प्रमुख लक्षण हैं।  

बवासीर होने के कारण

१. कम रेशेवाला भोजन-कब्ज (लो फाइबर डाइट-कॉन्सटिपेशन)- बिना रेशेवाले खाद्य पदार्थ मैदा, बेसन, फास्ट फूड आदि पाचन के समय और बाद में आंतों की दीवारों से चिपक जाता है। फलत: मल कड़ा होता है, सरकते संयत आंतों में रगड़ के कारण सूजन और छीलने से रक्त स्राव होता है। रेशे मल को सरकने में सहायक होते हैं। भाजियाँ रेशों के कारण लाभदायक होती हैं।

२. अधिकांश समय बैठे रहना (सिडेंटरी लाइफ स्टाइल)- अधिकांश समय बैठे रहने से पेट में आँतें एक ही स्थिति में रहती हैं जिससे भोजन और मल सरकने में कठिनाई होती है, पेट में वायु भर जाती है। चलते-फिरते रहने से रक्त संचार होता है, आंतों की गतिशीलता के कारण वायु निकलती है, भोजन और मल सरकता है। बवासीर बढ़ जाता है।

३. गर्भावस्था-प्रसव पश्चात दबाव (प्रेगनेंसी / पोस्ट-डिलीवरी प्रेशर)- कमर के क्षेत्र (पेलविक फ्लोर) पर भार बढ़ने के कारण नसें कमजोर हो जाती है जिससे बवासीर में वृद्धि होती है। इस समय हल्का और पाचक भोजन करना चाहिए।

४. तनाव (स्ट्रेस)- तनाव होने पर वातदोष होता है, कब्ज बढ़ने से बवासीर के कष्ट में वृद्धि होती है। व्यर्थ का तनाव छोड़कर प्रसन्नता से रहना लाभप्रद होगा। 

उपचार (रेमेडीज)

१. रात के समय एक त्रिफला चूर्ण एवं एक चम्मच देशी घी का सेवन करने से वात दोष संतुलित होता है, बवासीर शांत होता है। 

२. 
सोते समय गुनगुने पानी में २ चम्मच इसबगोल की भूसी लें, यह मल को नरम करता है, आंतों से चिपककर मल को सरकने में सहायक होता है, साथ में  दिन में ८-१० गिलास पानी का सेवन अवश्य करें। 

३. छाछ (बटर मिल्क)- दूध से मक्खन निकालने के बाद बचा ताजा छाछ बवासीर रोगी के लिए अमृत के समान है। दोपहर भोजन के बाद एक गिलास छाछ चुटकी भार जीरा-सेंध नमक का सेवन करने से गर्मी, सूजन और कब्ज में लाभ होता है। 

४. गुनगुने पानी में कटि-स्नान (सिट्ज़ बाथ)- टब में गुनगुना पानी भरकर रोज १५ मिनिट बैठें, त्रिफला,नीम या डिटॉल पानी में घोल सकते हैं। इससे सूजन तथा दर्द में तुरंत राहत मिलती है। यह रामबाण औषधि है। 

५. पैदल चलना (वाक)- रोज सुबह, दोपहर शाम १५-२० मिनिट टहलना बवासीर की पीड़ा कम कर बार-बार होना रोकता है। 

६. प्राणायाम- सुबह-शाम १०-१० मिनिट अनुलोम-विलोम प्राणायाम करें, एलोविरा जूस व मुलेठी चूर्ण का सेवन करना लाभदायक है। 

७. मलहम (क्रीम)- बवासीर के कष्ट को हडेंसा आदि मलहम भी काम करते हैं किन्तु यह तात्कालिक और अस्थायी राहत के लिए है। 

आयुर्विज्ञान परीक्षण 
  1. शारीरिक परीक्षण- बाहरी बवासीर या गुदा के आस-पास मस्सों का डॉक्टर द्वारा देखकर इलाज किया जा सकता है। यह प्रारंभिक जांच बाहरी बवासीर और उससे जुड़ी किसी भी सूजन या घनास्त्रता की पहचानने में मदद करती है।
  2. डिजिटल रेक्टल परीक्षण- डॉक्टर असामान्यता या आंतरिक बवासीर जाँचने के लिए मलाशय में दस्ताने पहने हुए अँगुली डालकर सूजी हुई नसों और सूजन के किसी लक्षण जानते हैं।
    एनोस्कोपी या प्रॉक्टोस्कोपी- इं प्रक्रियाओं में प्रकाश के साथ एक छोटी ट्यूब (एनोस्कोप या प्रॉक्टोस्कोप) से गुदा नलिका और निचले मलाशय को देखकर आंतरिक बवासीर और उनके आकार, स्थान और प्रोलैप्स की डिग्री का आकलन करते हैं।
    कोलोनोस्कोपी- ५० वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों या कोलोरेक्टल कैंसर के पारिवारिक इतिहासवाले लोगों में यह बृहदान्त्र और मलाशय की अधिक व्यापक जाँच में सहायक होता है।

शल्य क्रिया 
 
hemorrhoidectomy- इसमें बवासीर को हटाया जाता है, आमतौर पर बड़े या लगातार बवासीर के लिए इसकी सिफारिश की जाती है।

स्टेपल्ड हेमोराइडोपेक्सीप्रोलैप्स्ड- बवासीर के लिए प्रयुक्त एक शल्य चिकित्सा विकल्प, जिसमें बवासीर को वापस उसके स्थान पर स्टेपल कर दिया जाता है तथा अतिरिक्त ऊतक को निकाल दिया जाता है।

लेजर उपचार- एक न्यूनतम आक्रामक विकल्प जो बवासीर को सिकोड़कर तेजी से रोग से मुक्त करता है।
***

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

चिकित्सा:

बवासीर की प्राकृतिक चिकित्सा

खूनी बवासीर:
१. अरबी का रस कुछ दिन पिलाना हितकर होता है.
२. करेला के रस में शक्कर मिलकर १-१ चम्मच ३-४ बार पियें.
३. घीया का छिलका धुप में सुखाकर बारीक़ कूटकर रख लें. ७ दिन ५ ग्राम चूर्ण तजा पानी के साथ लें तथा खिचडी खाइए.
४. पके हुए टमाटर के टुकड़ों पर सेंध नमक लगाकर खायें. टमाटर रस में जीरा, सौंठ, कला नमक, मिलकर सुबह-शाम लें. मूली, गाजर, बथुआ-पालक का साग प्रयोग करें.
५. तुरई के पत्ते पीसकर रोग स्थान पर लगावें.
६. नीबू का रस मलमल के कपडे से छान लें, समान मात्र में जैतून का तेल मिलाएं.स्य्रिंग से गुदा में  प्रवेश कराएँ. शौच में कष्ट मिटेगा तथा मस्से छोटे होंगे.
७. तेज दर्द तथा रक्त निकलने पर तजा पानी में नीबू रस मिलकर पियें.
८. गर्म दूध में आधे नीबू का रस मिलाकर ४-४ घंटे में लें.
९. प्याज़ के रस में देशी घी तथा खांड मिलाकर खायें.
१०. कच्ची मूली के सेवन से खून गिरना कम होता है.
११. मूली के १०० ग्राम रस में ८ ग्राम देशी घी मिलाकर सुबह-शाम पियें.
१२. मूली काटकर नमक लगाकर रात को ओस में रख दें. सुबह निराहार खाएं तथा स्गौच के बाद गुदा को मूली के पानी से धोएं.
१३. मीठे कंधारी अनार के छिलकों के पिसे चूर्ण ५ ग्राम को सवेरे तजा जल के साथ लें. गरम वास्तु न खाएं, कब्ज़ न होने दें.
१४. कच्चे गूलर फल की सब्जी खायें.
१५. बादी और मस्से हों तो बेल का रस पियें.
१६. कच्चे बेल और सौंठ के काढ़े में दूध मिलाकर गुदाद्वार पर लगायें .
१७. खट्टे सेब का रस मस्सो पर लगायें.  
होमियोपैथिक चिकित्सा:
१. एसक्युलस- कांटे चुभने जैसा दर्द, कमर में तेज दर्द.
२. नक्स वोमिका- बार-बार पाकः लगे पर साफ़ न हो.
३. हेमेमिलस- काला खून गिरना.
४. सल्फर- लाल खून गिरना, जलन होना, सुबह अधिक कष्ट, नक्स में बाद अधिक उपयोगी.
५. नाइट्रिक एसिड- पखाने के बाद जलन-चुभन.
६. केल्केरिया फ्लोर ३x, केल्केरिया फोस 3x , फ़रम फोस १२x, काली मूर 3x, काली फोस 3x, कालीसल्फ ३x, मेग्निशिया फोस 3x, नेट्रम मूर 3x,  नेट्रमफोस 3x, नेट्रमसल्फ 3x, सिलिशिया ३x घोल कर ३-३ घंटे बाद लें.