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सोमवार, 12 जनवरी 2026

जबलपुर, इतिहास, नाटक, बंगाली समाज, दिव्येन्दु गांगुली, श्याम खत्री, कचनार, मिलन,

जबलपुर में नाटक 
डार्केस्ट आवर में चर्चिल के हिन्दी संवाद को विश्वसनीय बनाने वाले
दिव्येन्दु गांगुली की उतार चढ़ाव वाली यात्रा इतनी आसान नहीं रही
नेटफ्लिक्स में इन दिनों एक फ‍िल्म डार्केस्ट आवर (Darkest Hour) देखने वालों की संख्या में अचानक इज़ाफा हो गया है। इसका कारण यह फ‍िल्म अब हिन्दी में डब हो गई। Darkest Hour में गैरी ओल्डमैन ने विंस्टन चर्चिल का किरदार निभाया है, जिसमें मई 1940 में यूके के प्रधानमंत्री के तौर पर उनके शुरुआती अहम दिनों पर फोकस किया गया है, जब उन्हें यह तय करना था कि हिटलर के साथ शांति के लिए बातचीत करें या लड़ें। और आखिर में उन्होंने प्रेरणादायक भाषणों से देश को एकजुट किया, जिसमें मशहूर "हम समुद्र तटों पर लड़ेंगे" वाली लाइन भी शामिल है, जो ब्रिटेन के "सबसे मुश्किल समय" के दौरान उनके पक्के इरादे को दिखाती है। इस रोल के लिए ओल्डमैन को बेस्ट एक्टर का एकेडमी अवॉर्ड मिला, और फिल्म में भारी दबाव के बावजूद उनके साहसी नेतृत्व को दिखाया गया है।
Darkest Hour में चर्चिल की भूमिका के मुख्य पहलू के तौर पर संकट में नेतृत्व, संसद में दिए गए भाषण और फिल्म के अंत में संसद में दिया गया साहसी भाषण महत्वपूर्ण है। गैरी ओल्डमैन ने शानदार परफॉर्मेंस, जिसमें मेकअप और प्रोस्थेटिक्स शामिल हैं, ने उन्हें काफी तारीफ और ऑस्कर दिलाया। हिन्दी में इसका डब संस्करण लोकप्रिय हो रहा है। चर्चिल के हिन्दी संवाद इतने विश्वसनीय लगते हैं जैसे वे स्वयं या गैरी ओल्डमैन बोल रहे हों। गैरी ओल्डमैन को हिन्दी में डब जबलपुर के दिव्येन्दु गांगुली (दिनपाल गांगुली) ने किया है। दिव्येन्दु गांगुली की लिप-सिंकिंग (lip-syncing) इतनी शानदार है कि महसूस व अनुभव होता है कि हम मूल भाषा में डार्केस्ट आवर को को देख रहे हैं।
दिव्येन्दु गांगुली की जबलपुर से मुंबई तक की यात्रा इतनी आसान नहीं रही। उनका जीवन औपन्यासिक है।
जबलपुर में स्वतंत्रता के बाद से आठवें दशक तक रंगकर्म की दो दुनिया थी। शहर में मुख्य धारा में मराठी व हिन्दी का रंगकर्म उफान भरता था तो शहर के पूर्वी हिस्से में घमापुर से रक्षा संस्थानों तक बंगला रंगकर्म का दबदबा था। यह भी सत्य है कि हिन्दी रंगकर्म पर बंगला रंगकर्म का ज्यादा असर था। हिन्दी नाटकों के निर्देशक श्याम खत्री मराठी व बंगला के मूल नाटकों से प्रभावित थे लेकिन उन्होंने कल्पनाशीलता दिखाते हुए हिन्दी नाटकों को स्थापित कर रहे थे। शहर के पूर्वी हिस्से में रामलीला के साथ जात्रा का मंचन समान रूप से होता था। रामलीला के कलाकार जात्रा से रंगकर्म की बारीकियां सीख रहे थे। रामलीला के कलाकार धीरे धीरे जात्रा में भी भाग लेने लगे। दरअसल उस समय बंगाल से कई परिवार जबलपुर आजीविका की तलाश में यहां आए। यहां उन्होंने सुरक्षा संस्थानों के साथ रेलवे और बर्न कंपनी में नौकरी करना शुरू कर दी। इन बंगला परिवार के साथ वहां की संस्कृति जबलपुर पहुंची। बंगाल से आए अध‍िकांश परिवार ने नौकरी करने वाले संस्थानों के निकट ही अपना बसेरा बनाया। जबलपुर में घमापुर से डिफेंस संस्थानों के बीच के क्षेत्र बाई का बगीचा, शीतलामाई, कांचघर, सतपुला, व्हीकल फेक्टरी, गन केरिज फेक्टरी, रांझी, आर्डनेंस फेक्टरी व खमरिया में बंगला के साथ पूर्वी उत्तरप्रदेश व बिहार के परिवार रहवासी बने। उत्तर प्रदेश व बिहार के परिवार पर बंगला संस्कृति का प्रभाव था।
कुछ इसी तरह व्योमकेश गांगुली ने ढाका से देशांतर गमन करते हुए जबलपुर पहुंचे। वे बी. एससी (टेक) पास थे और ढाका की ढाकेश्वरी कपड़ा मिल में काम किया करते थे। उनकी डि‍ग्री इंजीनियरिंग के समकक्ष थी। बंगला समाज में इस ड‍िग्री को बड़े सम्मान से देखा जाता था। व्योमकेश गांगुली एक अच्छे अभि‍नेता होने के साथ उत्कृष्ट गायक भी थे। ढाका में नौकरी के साथ शौकिया रूप से नाटकों में काम करने लगे। लोगों के कहने पर वे कलकत्ता की फिल्म इंडस्ट्री पहुंच कर अभ‍िनय के मौके तलाश करने लगे। उनके पिता उस समय जबलपुर की सेंट्रल जेल में ड‍िप्टी जेलर थे। अंग्रेजों के समय जेलर थे और परिवार व कुल की चिंता उनके लिए सर्वोच्च थी। जब उन्हें बेटे व्योमकेश की फिल्म लाइन में जाने की बात की जानकारी हुई तो वे खफ़ा हुए। पिता ने पुत्र को फटकार हुए कहा कि वे पिता व कुल का नाम डुबा रहे हैं। पुत्र को जबर्दस्ती जबलपुर बुलवा कर विवाह के बंधन में बांध दिया। जबलपुर आ कर व्योमकेश इंजीनियर से क्लर्क बन गए। जबलपुर की बिजली वितरण कंपनी मार्टिन एन्ड बर्न कंपनी में बाबू बन कर उनकी उनकी दिनचर्या सुबह से शाम तक ऑफ‍िस में ही सिमट गई।
जबलपुर के कांचघर क्षेत्र में रहने वाले व्योमकेश गांगुली के दिल में नाटक हिलोरे भरता रहता था। समय मिलने पर वे घर में नाटक करते थे। मोहल्ले में साथ‍ियों के साथ बंगला नाटकों को मंचित करते थे। दुर्गोत्सव में उनका नाटकों का मंचन करने का उत्साह देखते ही बनता था। उस समय तक उनके बड़े पुत्र दिव्येन्दु की प्राथमिक श‍िक्षा रेलवे सराय स्कूल में शुरू हो चुकी थी। घर में प्यार से दिव्येन्दु को टूटु पुकारा जाता था। टूटु को अपने पिता को नाटक करते देखना अच्छा लगता था। पुत्र पिता के चरणों में चलने लगा। पिता के दोस्त आईटीसी में कार्यरत रवीन्द्र भट्टाचार्य थे। लोग उन्हें प्यार से काकू कहा करते थे। पिता के साथ दिव्येन्दु को रवीन्द्र भट्टाचार्य के रूप में एक गुरू भी मिल गया। दिव्येन्दु को जब भी मौका मिलता वे अपने गुरू से अभ‍िनय से ले कर संवाद अदायगी तक सब कुछ जानने के लिए उत्कंठित रहते। मिडिल स्कूल की पढ़ाई के लिए दिव्येन्दु का दाख‍िला सेंट थामस में करा दिया गया। उस समय तक दिव्येन्दु फैंसी ड्रेस में भाग लेने लगे, लेकिन उनकी इच्छा तो नाटक में अभ‍िनय करने की थी। उसी समय दुर्गोत्सव में उनहोंने मोहल्ले में एक बाल नाटक में अभ‍िनय करने का मौका मिल ही गया। पिता ने जब उनको नाटक में अभ‍िनय करते देखा तो वे बहुत खुश हुए। छोटे बच्चों के एक समूह ने उस समय ‘स्वप्न खुड़ो’ नाम के एक नाटक को मंचित किया। दिव्येन्दु ने नाटक की रिहर्सल से ले कर मंचन तक हर क्षण का आनंद उठाया। जब उनका मेकअप किया जा रहा था तब तो वे इतने आनंदित थे और उस समय उनको देखने वाले हर व्यक्त‍ि को महसूस हो रहा था कि जैसे दिव्येन्दु को पूरी जिंदगी की खुशी ही मिल गई हो। दुर्गोत्सव में बंगला नाटक के साथ हिन्दी नाटकों के मंचन की परम्परा शुरू हुई। नवमी के दिन हिन्दी नाटकों का मंचन किया जाने लगा। ये हिन्दी नाटक मूल बंगला नाटकों के हिन्दी रूपांतरण हुआ करते थे।
दिव्येन्दु गांगुली ने हायर सेकेंडरी की पढ़ाई पूरी करने के बाद राबर्टसन कॉलेज में एडमिशन ले लिया। उसी समय उनकी मित्रता गौरीशंकर यादव से हुई। गौरीशंकर उनके मोहल्ले में ही रहा करते थे। दोनों नाटकों से जुड़ा रहना चाहते थे। उनको दुर्गोत्सव में होने वाले और साल में एक बार होने वाले नाटकों के मंचन से संतुष्ट‍ि नहीं मिलती थी। दिव्येन्दु ने दुर्गोत्सव में बंगला नाटकों को हिन्दी में अनुवाद कर उनको मंचित करना शुरू कर दिया था। वे चाहते थे कि हिन्दी में भी बंगला नाटकों की तरह नाटक मंचित होने चाहिए। उस समय हिन्दी स्क्र‍िप्ट मिलने की समस्या थी। दिव्येन्दु ने सोचा कि बेहतर है कि बंगला नाटकों का हिन्दी में अनुवाद किया जाए और उन्हें ही मंचित किया जाए। दिव्येन्दु व गौरीशंकर यादव नाटकों में ही आगे बढ़ना चाहते थे। कई बार गौरीशंकर यादव दिव्येन्दु से कहते थे कि डगर कठिन है लेकिन हम लोग हौंसला नहीं खोएंगे। दोनों को आगे की राह दिखाने वाले के रूप में धर्मराज जायसवाल मिल गए। धर्मराज जायसवाल का प्रतिभा कला मंदिर परिवार नियोजन और अन्य सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए मध्यप्रदेश के गांव गांव में घूम घूम कर नाटकों का मंचन करता था। धर्मराज जायसवाल के साथ मनोहर महाजन जैसे कई नवयुवक व कॉलेज विद्यार्थी जुड़े हुए थे। नाटकों को मंचित करते हुए घूमना और खाने पीने की चिंता से मुक्त हो जाने की मुहिम में दिव्येन्दु व गौरीशंकर यादव भी जुड़ गए। दोनों का विचार यह भी था कि इस तरह वे नाटकों की मुख्य धारा में भी जुड़ जाएंगे।
दिव्येन्दु गांगुली की इसी दौरान जबलपुर की प्लाजा टॉकीज के निकट रहने वाले सुशील बंदोपाध्याय के साथ जुड़ाव की शुरूआत हुई। सुशील बंदोपाध्याय की ख्याति एक अच्छे ज्योतिष के रूप में थी, लेकिन नाटकों का मंचन करने में वे सबसे आगे रहते थे। जबलपुर के करमचंद चौक पर स्थि‍त सिटी बंगाली क्लब में बंगला नाटकों का मंचन सक्र‍ियता से होता था। यहां दिव्येन्दु को गुरू रवीन्द्र भट्टाचार्य व सुशील बंदोपाध्याय ने पूरा सहयोग दिया। सुशील बंदोपाध्याय ने बंगला से बाहर जा कर हिन्दी में भी नाटक किए। उस समय श्याम खत्री हिन्दी रंगमंच के सबसे सक्र‍िय निर्देशक के रूप में खूब नाटकों का मंचन कर रहे थे। दिव्येन्दु गांगुली की ख्वाहिश थी कि वे भी श्याम खत्री निर्देश‍ित किसी नाटक में अभ‍िनय करें। दिव्येन्दु को श्याम खत्री के नाटकों की डिजाइनिंग, सेट, स्वाभाविक संवाद और निर्देशन आकर्ष‍ित करता था। आख‍िरकार श्याम खत्री ने दिव्येन्दु को अपने ‘विषपायी’ में एक भूमिका सौंप दी। यह नाटक उस समय जबलपुर का सबसे हिट नाटक रहा। विषपायी के कई शो हाउसफुल गए। दिव्येन्दु का तब तक एक सुदर्शन व्यक्त‍ित्व निखर चुका था। ऐसा माना जाता है कि वे जबलपुर रंगमंच के सर्वकालिक सुदर्शन अभ‍िनेता रहे। दिव्येन्दु की एक खास‍ियत उनकी गहराई ली हुई दमदार आवाज़ भी थी।
श्याम खत्री के नौकरी के सिलसिले में जबलपुर से बाहर जाने पर उनके कलाकारों ने सत्तर के दशक में कचनार संस्था गठित कर नाटकों का मंचन शुरू किया। कचनार का गठन इस वायदे के साथ किया गया था कि प्रत्येक माह एक नए नाटक का मंचन किया जाएगा। उस दौरान कचनार संस्था ने अपनी सक्र‍ियता से जबलपुर में हलचल मचा दी। यही वह समय था जब दिव्येन्दु गांगुली नाटकों के अनुवाद के प्रति आकर्ष‍ित हुए। उन्होंने बंगला के नाटकों का हिन्दी अनुवाद शुरू किया। उस समय उनकी उम्र महज 21 या 22 वर्ष थी। बंगला नाटक इराव मानुष का हिन्दी में 'ये भी इंसान है' और उत्ताल तरंग का हिन्दी में 'ज्वार भाटा' नाम से रूपांतरण किया। इन दोनों नाटकों में दिव्येन्दु गांगुली ने अभ‍िनय भी किया। नाटकों में उनके साथ उस समय के मशहूर अभ‍िनेता कुमार किशोर भी अभ‍िनय करते थे। कुमार किशोर की विशेषता यह थी कि वे किसी भी बंगला नाटक को देख कर पूरी रात भर में उसकी हिन्दी स्क्र‍िप्ट तैयार कर लेते थे। कुमार क‍िशोर ने रमेन दत्ता निर्देश‍ित बंगला नाटक रक्ते सआ धान को देख कर हिन्दी में ‘खून में बोई धान’ की स्क्र‍िप्ट एक रात भर में लिखी थी। दिव्येन्दु बंगला नाटकों के हिन्दी रूपांतरण को मिल रही सफलता से उत्साहित हुए। उन्होंने शैलेश गुहा नियोगी के शताब्दी गान का हिन्दी रूपांतरण किया। इसके बाद वे अजितेश बंदोपाध्याय के बंगला नाटकों के प्रति आकर्ष‍ित हुए। अजितेश बंदोपाध्याय ने चेखव के Swan Song का बंगला में अनुवाद किया था। इस बंगला अनुवाद को दिव्येन्दु गांगुली ने हिन्दी में 'वो दिन रंग बिरंगे' नाम से रूपांतरित किया। यह हिन्दी रूपांतरण इतना लोकप्रिय हुआ कि इसकी स्क्र‍िप्ट अभी तक नाट्य समूह के बीच मंचन के लिए घूमती रहती है। इसे रेड‍ियो नाटक के रूप में भी खूब प्रस्तुत किया गया। जबलपुर में लक्ष्मेन्द्र चोपड़ा इसको प्रोड्यूस करते थे। दिव्येन्दु गांगुली ने अजितेश बंदोपाध्याय के एक बंगला नाटक का 'तम्बाकू के दुष्परिणाम' नाम से रूपांतरण किया था, जो कि रेड‍ियो नाटक के रूप में लोकप्रिय हुआ। उन्होंने बंगला नाटक ‘तृतीय कंठ’ का हिन्दी अनुवाद किया। इस नाटक को जबलपुर के रंगमंच में सफलता के साथ प्रस्तुत किया गया। इस नाटक में मुख्य भूमिका कुमार क‍िशोर ने निभाई थी और कंठ के रूप में कामता मिश्रा व दिव्येन्दु गांगुली की आवाज़ें थीं। यह एक प्रायोगिक नाटक था।
दिव्येन्दु गांगुली का बंगला नाटकों के हिन्दी रूपांतरण के साथ मंच पर अभ‍िनय की सक्र‍ियता भी बनी रही। उन्होंने अपने नाट्य गुरू रवीन्द्र भट्टाचार्य से नाटकों को एडिट करना सीखा। डा. शंकर शेष के नाटक फंदी को दिव्येन्दु ने एडिट कर के प्रस्तुत किया। वर्ष 1974 में दिव्येन्दु गांगुली और प्रभात मित्रा ने मिलकर जबलपुर में एक नाट्य संस्था 'अनुराग' बनाई। उसी समय दिव्येन्दु गांगुली, कामता मिश्रा, गौरीशंकर यादव, कुमार किशोर, प्रभात मित्रा, आर. खान व सुरेश बाथरे के विचार में जबलपुर नाट्य संघ के गठन की बात आई। जबलपुर में नाट्य गतिव‍िध‍ि जोरों पर थीं। मिलन संस्था त्रिभाषीय लघु नाट्य प्रतियोगिता का आयोजन करता था, जिसमें हिन्दी, बंगला व मराठी भाषा के नाटकों का मंचन होता था। इस प्रतियोगिता की अवधारणा इलाहाबाद नाट्य प्रतियोगिता की ही तरह की थी। 8 व 9 फरवरी 1975 को जबलपुर जिला नाट्य संघ द्वारा प्रथम नाट्य महोत्सव का आयोजन महाराष्ट्र हाई स्कूल के मनोहर प्रेक्षागृह के हर्षें रंगमंच पर किया गया। दिव्येन्दु गांगुली ने 'अनुराग' संस्था की ओर से इस नाट्य महोत्सव में 'वो दिन रंग बिरंगे' की प्रस्तुति दी।
दिव्येन्दु गांगुली ‘वो दिन रंग बिरंगे’ की प्रस्तुति को ले कर काफ़ी उत्तेजित थे। वे स्वयं रजनी चटर्जी और प्रभात मित्रा कालीनाथ की भूमिका में थे। रवीन्द्र भट्टाचार्य ने निर्देशन में पूरी जान लगा दी थी। नाटक का पूरा ऑड‍ियो आधुनिकतम माने जाने वाले कैरव्ज स्टूडियो में तैयार किया गया। मन्नूलाल पुजारी जैसे जबलपुर के निर्देशक मेकअप करने को तैयार हो गए थे। बैक स्टेज में संगीतज्ञ बसंत त‍िमोथी, सोहन पांडे राजेश तिवारी, आकाशवाणी में उद्घोषक रहे जितेन्द्र महाजन, सुभाष पात्रो जैसे गुणी लोग थे। अलखनंदन जैसे निर्देशक बैक स्टेज में थे। ‘अनुराग’ की पूरी टीम नाटक के मंचन को ले कर उतावली थी। उसी समय जबलपुर रंगमंच के दो बड़े कलाकार राजेन्द्र दुबे व मिर्जा अजहर बेग का असामयिक निधन हो गया। जबलपुर की रंग संस्थाएं व रंगकर्मी ऐसे समय में नाट्य महोत्सव का आयोजन करने से हिचक रहे थे। आम राय बन रही थी कि नाट्य महोत्सव को स्थगित कर दिया जाए। नाट्य महोत्सव के स्थगित होने की जानकारी से दिव्येन्दु गांगुली लगभग निराश हो गए। उन्हें महसूस हुआ कि नाट्य मंचन को ले कर जो रफ़्तार बनी थी वह भविष्य में रह पाएगी कि नहीं। काफ़ी जद्दोजहद के बाद अंत में सब ने यह समाधान निकाला कि नाट्य महोत्सव को राजेन्द्र दुबे व मिर्जा अजहर बेग को समर्पित कर नाटकों का मंचन किया जाए।
वो दिन रंग बिरंगे का मंचन हुआ। दर्शकों को रजनी चटर्जी की भूमिका में दिव्येन्दु गांगुली का अभ‍िनय और नाटक का कथ्य दोनों बहुत पसंद आया। सत्तर के दशक के हिसाब से नाटक की विषयवस्तु बिल्कुल नई थी। एक कलाकार जीवन संध्या में अपने अतीत को याद करता है। नाटक के माध्यम से कलाकार ने समाज से कई सवाल उठाए थे। इस नाट्य महोत्सव में दिव्येन्दु गांगुली ने विश्वभावन देवलिया निर्देश‍ित ‘हयवदन’ में भागवत की भूमिका निभाई थी। नाटक में उस समय जबलपुर रंगमंच के बड़े कलाकार गोविंद मिश्रा, कुमार किशोर, कामता मिश्रा, गौरीशंकर यादव, प्रभात मित्रा, सिंधु गडकरी, पुष्पा श्रीवास्तव ने अभि‍नय किया था। बाल कलाकारों में मधुसूदन नागराज, अरूणा काले, न‍िध‍ि द्वि‍वेदी थीं। हयवदन की व‍िश‍िष्टता सतीश तिवारी का संगीत था। नाटक में आभा तिवारी ने सितार, तेजराज मावजी ने सेक्साफोन क्लारीनेट, रत्नाकर कुंडले ने वायलिन और अल्हाद पंड‍ित ने तबले पर ऐसा संगीत रचा था जिसकी नाट्य प्रस्तुतियों में कल्पना नहीं की जा सकती। श्याम श्रीवास्तव ने बन आई सोन चिरैया, उजले से घोड़े पे होके सवार, चंदन डुलिया बैठी रे दुल्हनियां व तन मन को बांधे क्यों सिर्फ एक देह के साथ जैसे गीत नाटक के लिख दिए। हयवदन में दिव्येन्दु गांगुली ने आंगिक, वाचिक, सात्व‍िक और आहार्य अभ‍िनय के सिद्धांतों को मंच पर प्रस्तुत किया। जबलपुर का रंगकर्म कितना आगे था यह इससे पता चलता है कि 1973 में 20 व 21 अक्टूबर को कचनार संस्था ने मध्यप्रदेश में पहली बार ‘हयवदन’ का मंचन किया था। नाटक का ब्रोशर चौबीस पृष्ठ का था।
उस समय जबलपुर में साहित्य, कला, सांस्कृतिक वातावरण जबर्दस्त था। कलाकारों में अभ‍िनय की होड़ थी तो नाटकों को अन्य भारतीय भाषाओं से हिन्दी में रूपांतरित करने की प्रतिस्पर्धा भी। ज्ञानरंजन के संपादन में पहल का प्रकाशन शुरू हो चुका था। रंगकर्मी रात में एक स्थान पर एकत्र‍ित हो कर पहल में छपी कहानियों या विचारोत्तेजक लेखों का पाठ करते थे और उसे रंगकर्मी शांति से बैठ कर सुन कर उन पर लंबी-लंबी बहसें किया करते थे। ऐसी कई बैठकों का दिव्येन्दु अभ‍िन्न हिस्सा हुआ करते थे। उस दौरान उन्होंने रेड‍ियो नाटक में काम किया। उस समय जबलपुर के सीनियर रेलवे इंस्टीट्यूट में एक रेड‍ियो नाटक को लाउड स्पीकर के जरिए लोगों को सुनाया गया। उस समय जबलपुर आकाशवाणी से रेड‍ियो नाटकों का खूब प्रसारण हुआ।
दिव्येन्दु गांगुली को कॉलेज की पढ़ाई के बाद ड‍िफेंस अकाउंट में नौकरी मिल गई। उस समय ड‍िफेंस अकाउंट में जबलपुर के रंगकर्मी मनोहर कुंभोजकर, अलखनंदन, तपन बैनर्जी, रूद्रदत्त दुबे, हिमांशु राय भी नौकरी किया करते थे। दिव्येन्दु गांगुली ने नौकरी के बाद मिले समय का उपयोग हिन्दी अनुवाद व रूपांतरण में करने लगे। उन्होंने इन कामों में शोध के जरिए विषयवस्तु तो वही रखी लेकिन भाषा को सहज बनाया। इस दौरान दिव्येन्दु ने अलखनंदन ल‍िखि‍त शीर्षकहीन नाटक में भूमिका निभाते हुए उसे निर्देश‍ित भी किया। जबलपुर में आधुनिक नाटकों के मंचन की शुरूआत हो चुकी थी ऐसे समय उन्होंने 1982 में अपना तबादला बंबई करवा लिया। वे पेशेवर तरीके से थ‍िएटर करना चाहते थे। बंबई में वे इप्टा से जुड़ गए। फ‍िल्मों में कुछ अनुभव अच्छे नहीं रहे। टीवी सीरियल राग दरबारी में उन्होंने भूमिका निभाई। बंबई में उनकी मुलाकात जबलपुर के ही मनोहर महाजन से हुई। मनोहर महाजन रेड‍ियो सिलोन से जुड़ कर लोकप्रियता हासिल कर रहे थे। दिव्येन्दु की वॉयसिंग में रूचि थी। मनोहर महाजन ने इस क्षेत्र में उनकी मदद व मार्गदर्शन किया। दिव्येन्दु फ‍िल्म डि‍वीजन में कमेन्ट्री करने लगे। बंबई में भी उन्होंने बंगला से हिन्दी व अंग्रेजी में रचनात्मक अनुवाद व रूपांतरण किया। विज्ञापन की दुनिया में वॉयसिंग में काम किया। कई फ‍िल्मों में डबिंग की। सुदर्शन व्यक्त‍ित्व के कारण उन्होंने मॉडलिंग भी की। एक डॉक्यूमेंट्री में दिव्येन्दु ने विंस्टल चर्चिल का वॉयस ओवर किया। ब्रुक बांड चाय का कुंभ मेले के दौरान बनाए गए एक विज्ञापन में दादा जी के चरित्र में उनकी आवाज़ के उतार चढ़ाव को विज्ञापन जगत के साथ उस विज्ञापन को देखने वालों ने भी बहुत सराहा।
दिव्येन्दु का अब नाम दिनपाल गांगुली हो चुका है। मुंबई की दुनिया में वे इसी नाम से विख्यात हैं। नाम बदलने की एक कहानी है। बंबई में दिव्येन्दु का नाम हर समय गलत ढंग से लिखा जाता था। नाम गलत लिखने या बोलने से वे परेशान हो गए। दिव्येन्दु का अर्थ चंद्रमा होता है। उन्होंने सोचा कि दिव्येन्दु से वे अपना नाम सूरज के पर्यायवाची दिनपाल में परिवर्तित कर लेते हैं। तब से वे दिव्येन्दु से दिनपाल गांगुली बन गए।
दिव्येन्दु गांगुली ने श्याम बेनेगल द्वारा राज्यसभा टीवी के लिए निर्देश‍ित संविधान फ‍िल्म में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कुछ साल पहले केड्बरि के बंगला संस्करण के विज्ञापन में दिव्येन्दु की आवाज़ का उपयोग एक वृद्ध चरित्र दामोदर के लिए किया गया। वे अभी भी विज्ञापनों की दुनिया, डबिंग, वॉयस ओवर, अभ‍िनय में सक्र‍िय हैं। इस दुनिया में उनकी बहुत प्रतिष्ठा है। दिव्येन्दु की बेटी सुमिता भी पिता की तरह मनोरंजन इंडस्ट्री में हैं। वे डिस्नेस्टार और कई इस तरह के प्लेटफार्म के लिए अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद व ट्रांसस्क्र‍िप्ट का काम लगातार कर रही हैं। दामाद फिल्म एडीटर हैं।
व्योमकेश गांगुली की तीसरी पीढ़ी उनके बताए रास्ते पर चल रही है। व्योमकेश गांगुली जब कलकत्ता में एक अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती थे, तब एक उनके एक दर्शक ने देख कर कहा था-‘’अरे यह तो एक्टर व्योमकेश बाबू हैं।‘’ शायद उस समय यह क्षण उनके पिता के लिए कष्ट वाला रहा होगा लेकिन उस वक्त उनके चेहरे पर यह संतुष्ट‍ि का भाव था कि मृत्यु के समय उन्हें एक अभ‍िनेता के रूप में पहचाना गया।
आज भी टूटु या दिव्येन्दु या दिनपाल के दिल में जबलपुर धड़कता है। उन्हें याद आता है कि वे कैसे झुंड में घंटों खड़े हो कर दोस्तों व रंगकर्मियों के साथ मालवीय चौक, श्याम टॉकीज, शहीद स्मारक में अपना समण् बिताते थे। वे लोग देर रात कैसे नाटकों और पात्रों को ले कर बहस किया करते थे। जबलपुर उनको अपनी ओर खींचता रहता है। वे गुरू पूर्ण‍िमा के दिन अपने गुरू रवीन्द्र भट्टाचार्य और जबलपुर को याद करते हैं। जब मौका मिलता है दिव्येन्दु मुंबई से जबलपुर दौड़ कर चले आते हैं। वे कोई मौका चूकना नहीं चाहते।

सोमवार, 19 मई 2025

मई १९, जबलपुर, नाक, भजन जिकड़ी, मुहावरेदार दोहे, आँख, मुक्तिका,

 सलिल सृजन मई १९

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चमकते पत्थरों का शहर - जबलपुर
प्रकृति की गोद में पर्यटन करना माँ की आँचल में किलकारी भरते हुए करवट बदलने की तरह है। पर्यटन आत्मिक शांति देने के साथ साथ सांस्कृतिक-सामाजिक संबंधों को सुदृढ़ करता है। अशांत मन कोशांत करने के लिए पर्यटन करना चाहिए। पर्यटन से पर्यटक का ज्ञान वर्धन होता है। पर्यटन स्थल की लोक संस्कृति और लोक जीवन के बारे में बहुत सारी गूढ़ जानकारी प्राप्त होती है। भारतवर्ष भिन्न-भिन्न विविधताओं, संस्कृतियों, संस्कारों, धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थलों से भरा हुआ देश है। हमारे देश के प्रत्येक राज्य में धार्मिक, प्राकृतिक, ऐतिहासिक महत्व के पर्यटक स्थल मिल जाएंगे जो भारत की विशालता और वैभवशाली प्राचीन विरासत को दर्शाते है। आइये, आज जबलपुर की सैर करते हैं। जबलपुर मध्यप्रदेश का प्रमुख महानगर है। यह समुद्र तट से ४१२ मी. की ऊँचाई पर स्थित है। इसका क्षेत्रफल ५२११ वर्ग किलोमीटर तथा जनसंख्या लगभग २५ लाख है। जबलपुर के निकट नर्मदा क्षेत्र साधना भूमि के रूप में प्रसिद्ध रहा है। महर्षि अगस्त्य, जाबालि, भृगु, दत्तात्रेय आदि ने यहाँ तपस्या की है। आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार त्रेता में राम सीता लक्षमण तथा द्वापर में कृष्ण व पांडवों का यहाँ आगमन हुआ था। यह गोंड़ तथा कलचुरी राजाओं के समय समृद्ध क्षेत्र रहा है। भारतीय स्वतंत्रता प्राप्ति का प्रथम प्रयास इसी अञ्चल में बुंदेला क्रांति १८४२ के रूप में सामने आया जिसने अग्रेजों का हृदय कँपा दिया था। सन १७८१ के बाद ही मराठों के मुख्यालय के रूप में चुने जाने पर इस नगर की सत्ता बढ़ी, बाद में यह सागर और नर्मदा क्षेत्रों के ब्रिटिश कमीशन का मुख्यालय बन गया। यहाँ १८६४ में नगरपालिका का गठन हुआ था।
पुरातन वैभव
जबलपुर के समीप राष्ट्रीय जीवाश्म उद्यान, घुघवा (डिंडोरी) में ७५ एकड़ में पत्तियों और पेड़ों के आकर्षक और दुर्लभ जीवाश्म हैं जो ४ करोड़ से १५ करोड़ साल पहले मौजूद थे।नर्मदाघाटी के भू स्तरों की खोजों से पता चलता है कि नर्मदाघाटी की सभ्यता सिन्धु घाटी की सभ्यता से बहुत पुरानी है। लम्हेटा घाट के चट्टानों को कार्बन डेटिंग परीक्षण में लगभग ६ करोड़ वर्ष पुराना अनुमानित किया गया है। आयुध निर्माणी खमारिया के समीप पाटबाबा की पहाड़ियों से लगभग २ करोड़ वर्ष पूर्व विचरनेवाले भीमकाय डायनासौर राजासौरस नर्मदेडेंसिस के जीवाश्म तथा अंडे शिकागो विश्वविद्यालय के पेलियनोलिस्ट्स पॉल सेरेनो, मिशिगन विश्वविद्यालय के जेफ विल्सन और सुरेश श्रीवास्तव ने खोजे। नर्मदाघाटी में प्राप्त भैंसा, घोड़े, रिनोसिरस, हिप्पोपोटेमस, हाथी और मगर की हड्डियों तथा प्रस्तर-उद्योग संपन्न यह भूभाग आदि मानव का निवास था। १८७२ ई. में मिली स्फटिक चट्टान से निर्मित एक तराशी पूर्व-चिलयन युग की प्रस्तर कुल्हाड़ी भारत में प्राप्त प्रागैतिहासिक चिन्हों में सबसे प्राचीन है। भेड़ाघाट में पुरापाषाण युग के अनेक वृहत् जीवाश्म और प्रस्तरास्त्र मिले हैं। जबलपुर से लगभग २० कि.मी. दूर भेड़ाघाट विश्व का एकमात्र स्थान है जहाँ बहुरंगी संगमरमरी पहाड़ के बीच से नर्मदा की धवल सलिल धार प्रवाहित होती है। पंचवटी घाट से बंदरकूदनी तक नौकायन करते समय आकर्षित करते रंग-बिरंगे पत्थर मानो हमसे कहते हैं, आओ मुझे छूकर तो देखो… नर्मदा अञ्चल के ग्रामों में बंबुलिया और लमटेरा लोकगीतों की मधुर ध्वनि आज भी गूँजती है -
* नरबदा तो ऐसी मिलीं रे
जैसैं मिल गए मताई उन बाप रे
इस बंबुलिया लोकगीत में नवविवाहिता अपने मायके को याद करते हुए नर्मदा को माता और पिता, दोनों के रूप में देख रही है। प्रकृति का मानव के साथ घनिष्ठ संबंध म,आँव सभ्यता की धरोहर है।
* नरबदा मैया उल्टी तो बहै रे,
उल्टी बहै रे तिरबैनी बहै सूधी धार रे।
भारत उपमहाद्वीप की शेष नदियों के सर्वथा विपरीत दिशा में नर्मदा तथा ताप्ती नदियाँ बहती हैं। यह भौगोलिक तथ्य एक लोक कथा के प्रचलित है है। तदनुसार व्यासजी से मुनियों ने प्रार्थना की, जिससे व्यासजी ने नर्मदा का स्मरण किया और नर्मदा ने अपने बहाव की दिशा बदल दी।
* नरबदा अरे माता तो लगै रे,
माता लगै रे तिरबैनी लगै मौरी बैन रे, नरबदा हो....।
कालक्रम की दृष्टि से नर्मदा बहुत ज्येष्ठ और गंगा कनिष्ठ हैं। उक्त पंक्तियों में में नर्मदा को माता कहा गया है और त्रिवेणी को बहिन कहकर इस तथ्य को इंगित किया गया है। दश के विविध अंचलों को एक सूत्र में बाँधने की यही लोक रीति सफलराष्ट्रीय एकता का मूल है।
नर्मदा विश्व की एकमात्र नदी है जिसके उद्गम स्थल अमरकंटक पर्वत से सागर में विलय स्थल भरूच गुजरात तक सैंकड़ों परकम्मावासी (पदयात्री) पैदल परिक्रमा करते हैं। वे टोलियों में नदी के एक किनारे से चलकर भरुच में सागर में दूसरे किनारे पर आकर वापिस लौटते हैं। जबलपुर में नर्मदा के कई घाट हैं। हर घाट की अपनी कहानी और मनोरम छटा मन मोह लेती है। सिद्ध घाट, गौरीघाट, दरोगाघाट, खारीघाट, लम्हेटा घाट, तिलवाराघाट भेड़ाघाट, सरस्वती घाट आदि का सौन्दर्य अद्भुत है। चौंसठ योगिनी मंदिर के केंद्र में गौरीशंकर की प्राचीन किन्तु भव्य प्रतिमा है जिसके चारों ओर वृत्ताकार में चौंसठ योगिनियों की मूर्तियाँ हैं। समीप ही धुआँधार जल प्रपात की नैसर्गिक दिव्य छवि छटा अलौकिक है। सरस्वती घाट से बंदरकूदनी तक नौकायन करते समय दोनों ओर बहुरंगी संगमरमरी पहाड़ की छटा मनमोहक है। यह विश्व का एकमात्र स्थल है जहाँ सौन्दर्यमयी नर्मदा संगमरमारी पहाड़ के बीच से बहती है। जिस देश में गंगा बहती है, प्राण जाए पाए वचन न जाए, अशोका, मोहनजोदाड़ो आदि अनेक फिल्मों में यहाँ के भव्य दृश्यों का फिल्कमांन किया जा चुका है।
गिरि दुर्ग मदन महल
जबलपुर एक पहाड़ी पर गिरि दुर्ग मदन महल स्थित है जिसे ११०० ई. में राजा मदन सिंह द्वारा बनवाया गया एक पुराना गोंड महल है। इसके ठीक पश्चिम में गढ़ा है, जो १४ वीं शताब्दी के चार स्वतंत्र गोंड राज्यों का प्रमुख नगर-किला था। मदन महल के समीप ही कौआ डोल चट्टान (संतुलित शिला) है। यहाँ एक शिला ऊपर दूसरी विशाल शिला इस तरह रखी है कि मिलन स्थल सुई की नोक की तरह है। देखने से प्रतीत होता है कि कौए के बैठते ही ऊपरवाली चट्टान लुढ़क जाएगी पर भूकंप आने पर भी यह सुरक्षित रही।
भारत का वेनिस
संग्राम सागर, बाजना मठ, अधारताल, रानी ताल, चेरी ताल आदि जबलपुर को गोंड काल की देन है। जबलपुर ५२ तालाबों से संपन्न ऐसा शहर था जिसे भारत का वेनिस कहा जा सकता था। इनका निर्माण भू वैज्ञानिक दृष्टि से इस प्रकार किया गया था कि वर्षा जल सबसे पहले ऊपरी तालाब को भरे, फिर दूसरे, तीसरे चौथे और पाँचवे तालाब को भरने के बाद नर्मदा नदी में बहे। वर्तमान में अधिकांश तालाब पूरकर बस्ती बसा ली गई है तथापि कई तालाब अब भी अवशेष रूप में हैं। रामलला मंदिर, बड़े गणेश मंदिर ग्वारीघाट, गुप्तेश्वर, चित्रगुप्त मंदिर फूटाताल, राम जानकी मंदिर लाल माटी, पुष्टिमार्ग प्रवर्तक गोस्वामी विट्ठल दास जी की बैठकी देव ताल, ओशो आश्रम, ओशो संबोधि वृक्ष भँवरताल, राजा रघुनाथ शाह बलिदान स्थल, त्रिपुर सुंदरी मंदिर, ब्योहार निवास साठिया कुआं, गोपाल लाल मंडी हनुमानताल, बड़ी खरमाई मंदिर, बूडी खरमाई मंदिर आदि महत्वपूर्ण स्थल हैं।
साहित्यिक अवदान
जबलपुर अञ्चल में आधुनिक हिन्दी अपने शुद्ध साहित्यिक रूप में आम लोगों में बोली लिखी पढ़ी जाते है। हिंदी का पहला व्याकरण जबलपुर में ही कामता प्रसाद गुरु जी द्वारा लिखा गया। पिंगल शास्त्र का प्रसिद्ध ग्रंथ छंद प्रभाकर रचनेवाले जगन्नाथ प्रसाद भानु भी जबलपुर से जुड़े हुए थे। जबलपुर की समृद्ध सारस्वत साधना के कालजयी हस्ताक्षरों में जगद्गुरु ब्रह्मानन्द सरस्वती जी, स्वरूपानन्द सरस्वती जी, क्रांतिकारी माखन लाल चतुर्वेदी, क्रांतिकारी ज्ञानचंद वर्मा, महीयसी महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, महादेव प्रसाद 'सामी', केशव प्रसाद पाठक, रामानुज लाल श्रीवास्तव 'ऊँट बिलहरीवी', पन्नालाल श्रीवास्तव 'नूर', ब्योहार राजेन्द्र सिंह, भवानी प्रसाद तिवारी, सेठ गोविन्द दास, महर्षि महेश योगी, आचार्य रजनीश (ओशो), द्वारका प्रसाद मिश्र, जवाहरलाल चौरसिया 'तरुण', हरिशंकर परसाई, प्रेमचंद श्रीवास्तव 'मज़हर', इंद्र बहादुर खरे, रामकृष्ण श्रीवास्तव, अमृत लाल वेगड़ आदि अविस्मरणीय हैं।
वर्तमान काल में हिंदी भाषा विज्ञान के विद्वान डॉक्टर सुरेश कुमार वर्मा, ५०० से अधिक नए छंदों की रचना करनेवाले तथा शिशु मंदिर विद्यालयों में गाई जाती दैनिक प्रार्थना 'हे हंसवाहिनी, ज्ञान-दायिनी,अंब- विमल मति दे' के रचनाकार आचार्य संजीव वर्मा "सलिल", राम वनवास यात्रा के अन्वेषक डॉ. गिरीश कुमार अग्निहोत्री, पाली विशेषज्ञ आचार्य कृष्णकांत चतुर्वेदी, वैदिक वांगमय विशेषज्ञ डॉ. इला घोष, ख्यात वनस्पति शास्त्री डॉ. अनामिका तिवारी, समाजसेवी साधन उपाध्याय, अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त रसायनविद डॉ. अनिल बाजपेयी आदि सारस्वत साधन की अलख आज भी जलाए हुए हैं। जबलपुर के ख्यात चित्रकारों में ब्योहार राममनोहर सिन्हा, अमृत लाल वेगड़, हरी भटनागर, हरी श्रीवास्तव, सुरेश श्रीवास्तव, राजेन्द्र कामले, अस्मिता शैली आदि उल्लेखनीय हैं।
तिलवारा एक्वाडक्ट
जबलपुर में एशिया का सबसे अधिक लंबा एक्वाडक्ट तिलवारा घाट नें है। एक्वाडक्ट एक जटिल संरचना अभियांत्रिकी संरचना होती है जिसमें नदी के ऊपर से नहर बहती है। तिलवार एक्वाडक्ट की खासियत यह है कि नर्मदा नदी के ऊपर से नर्मदा की ही नहर बहती है और उसके ऊपर से जबलपुर नागपूर राष्ट्रीय राजमार्ग का भारी सड़क यातायात भी जारी रहता है।
भारत रत्न विश्वेश्वरैया की ९ मूर्तियाँ
जबलपुर ने एक कीर्तिमान इंजीनियर्स फोरम के माध्यम से स्थापित किया है। किसी देश के निर्माण और विकास में अभियंताओं का योगदान सर्वाधिक होता है किन्तु सामन्यात: उसे पहचान नहीं जाता। आधुनिक भारतीय अभियांत्रिकी के मुकुटमणि डॉ. भारत रत्न सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया हैं जिनके जन्म दिवस को 'अभियंता दिवस' के रूप में मनाया जाता है। जबलपुर के अभियंताओं ने विश्वेश्वरैया जी को शरुद्धाञ्जली देने के लिए उनकी ९ मूर्तियाँ नगर में स्थापित की हैं। अभियंता संजीव वर्मा 'सलिल' की पहल और प्रयासों से शासकीय अभियांत्रिकी महाविद्यालय, मुख्य अभियंता लोक निर्माण विभाग कार्यालय, शासकीय कला निकेतन पॉलिटेकनिक, नर्मदा सर्किल कार्यालय, हितकारिणी अभियांत्रिकी महाविद्यालय, इन्स्टीट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स कार्यालय, अतिथि गृह बरगी हिल्स, अधीक्षण अभियंता लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी कार्यालय तथा विद्युत मण्डल रामपुर में स्थापित एम. व्ही. की प्रतिमाएँ अभियंताओं की प्रेरणा स्रोत हैं। विश्व में अन्यत्र किसी भी नगर में एक अभियंता की इतनी मूर्तियाँ नहीं हैं।
शिक्षा केंद्र
जबलपुर में ५ शासकीय विश्वविद्यालय हैं। यह महाकौशल बुंदेलखंड का सबसे बड़ा शिक्षा केंद्र है। यहाँ हर विधा और शाखा की उच्च शिक्षा प्राप्त की जा सकती है। रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, सुभाषचंद्र बोस मेडिकल यूनिवर्सिटी, पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय तथा विधि विश्वविद्यालय जबलपुर की शान हैं। जबलपुर में आई.आई.आई.टी. तथा आई.आई.एम. दोनों राष्ट्रीय संस्थान हैं। अभियांत्रिकी शिक्षा के २० संस्थान, मेडिकल शिक्षा के २८ संस्थानों सहित जबलपुर में २३० विविध शिक्षा संस्थान हैं।
भारत का रखवाला
जबलपुर अपनी भौगोलिक स्थितियों के कारण चिरकाल से सुरक्षा का केंद्र रहा है। यहाँ आयुध निरामनीनिर्माणी खमरिया, सेंट्रल ऑर्डिनेंस डिपो, भारी वाहन कारखाना, धूसर लोहा फ़ाउन्ड्री आदि कारखानों में देख की रक्ष में महती भूमिका निभानेवाले अस्त्र-शस्त्र, वाहन आदि का निर्माण होता है। जबलपुर रक्षा क्लस्टर बनना प्रस्तावित है। बांग्ला देश के स्वतंत्रता के पश्चात आत्मसर्पण करनेवाली पकिस्तानी सेना के कमांडर नियाजी तथा सनिक जबलपुर में ही बंदी रखे गए थे।
जाकी रही भावना जैसी
जबलपुर भारत का हृदय स्थल है। यह मध्यप्रदेश राज्य का सर्वाधिक प्राचीन पवित्र शहर है। सनातन सलिला नर्मदा की गोद में बसा जबलपुर श्यामल बैसाल्ट शिलाओं से संपन्न है, इसे 'पत्थरों का शहर' कहा जाता है। संत विनोबा भावे ने जबलपुर के साँस्कृतिक वैभव से प्रभावित होकर इसे 'संस्कारधानी' का विशेषण दिया तो नेहरू जी ने अपनी सभा में शोर कर रहे युवाओं पर नाराज होकर 'गुंडों का शहर' कहकर अपनी नाराजगी व्यक्त की। जबलपुर अनेकता में एकता परक समन्वय और सहिष्णुता की नगरी है। यहाँ के खान-पान में भी मिश्रित संस्कृति झलकती है। इडली-डोसा', 'वड़ा-सांभर' से लेकर 'दाल-बाफला' ठेठ मालवा फूड, खोवे (मावे) की जलेबी खाने के बाद तो बस आपको आनंद ही आने वाला है। जबलपुर के चप्पे चप्पे में इतिहास है। निस्संदेह आपने जबलपुर नहीं देखा तो आपका भारत भ्रमण पूर्ण नहीं हो सकता।
***
दोहा सलिला:
दोहा का रंग नाक के संग
*
मीन कमल मृग से नयन, शुक जैसी हो नाक
चंदन तन में आत्म हो, निष्कलंक निष्पाप
*
बैठ न पाये नाक पर, मक्खी रखिये ध्यान
बैठे तो झट दें उड़ा, बने रहें अनजान
*
नाक घुसेड़ें हर जगह, जो पाते हैं मात
नाक अड़ाते बिन वजह, हो जाते कुख्यात
*
नाक न नीची हो तनिक, करता सब जग फ़िक्र
नाक कटे तो हो 'सलिल', घर-घर हँसकर ज़िक्र
*
नाक सदा ऊँची रखें, बढ़े मान-सम्मान
नाक अदाए व्यर्थ जो, उसका हो अपमान
*
शूर्पणखा की नाक ने, बदल दिया इतिहास
ऊँची थी संत्रास दे, कटी सहा संत्रास
*
नाक छिनकना छोड़ दें, जहाँ-तहाँ हम-आप
'सलिल' स्वच्छ भारत बने, मिटे गंदगी शाप
*
नाक-नार दें हौसला, ठुमक पटकती पैर
ख्वाब दिखा पुचकार लो, 'सलिल' तभी हो खैर
*
जिसकी दस-दस नाक थीं, उठा न सका पिनाक
बीच सभा में कट गयी, नाक मिट गयी धाक
*
नाक नकेल बिना नहीं, घोड़ा सहे सवार
बीबी नाक-नकेल बिन, हो सवार कर प्यार
*
आँख कान कर पैर लब, दो-दो करते काम
नाक शीश मन प्राण को, मिलता जग में नाम
*
मुक्तक
भावना की भावना है शुद्ध शुभ सद्भाव है
भाव ना कुछ, अमोली बहुमूल्य है बेभाव है
साथ हैं अभियान संगम ज्योति हिंदी की जले
प्रकाशित सब जग करे बस यही मन में चाव है
१६-५-२०२०
मुक्तिका
कोयल कूक कह रही कल रव जैसा था, वैसा मत करना
गौरैया कहती कलरव कर, किलकिल करने से अब डरना
पवन कहे मत धूम्र-वाहनों से मुझको दूषित कर मानव
सलिल कहे निर्मल रहने दे, मलिन न पंकिल मुझको करना
कोरोना बोले मैं जाऊँ अगर रहेगा अनुशासित तू
खुली रहे मधुशाला पीने जाकर बिन मारे मत मरना
साफ-सफाई करो, रहो घर में, मत घर को होटल मानो
जो न चाहते हो तुमसे, व्यवहार न कभी किसी से करना
मेहनतकश को इज्जत दो, भूखा न रहे कोई यह देखो
लोकतंत्र में लोक जगे, जाग्रत हो, ऐसा पथ मिल वरना
***
मुक्तिका
इसने मारा उसने मारा
क्या जानूँ किस-किस ने मारा
श्रमिक-कृषक जोरू गरीब की
भौजी कहकर सबने मारा
नेता अफसर सेठ मजे में
पत्रकार-भक्तों ने मारा
चोर-गिरहकट छूटे पीछे
संतों-मुल्लों ने भी मारा
भाग्यविधाता भागा फिरता
कौन न जिसने जी भर मारा
१९-५-२०२०
***
अभिनव प्रयोग:
प्रस्तुत है पहली बार खड़ी हिंदी में बृजांचल का लोक काव्य भजन जिकड़ी
जय हिंद लगा जयकारा
(इस छंद का रचना विधान बताइए)
*
भारत माँ की ध्वजा, तिरंगी कर ले तानी।
ब्रिटिश राज झुक गया, नियति अपनी पहचानी।। ​​​​​​​​​​​​​​
​अधरों पर मुस्कान।
गाँधी बैठे दूर पोंछते, जनता के आँसू हर प्रात।
गायब वीर सुभाष हो गए, कोई न माने नहीं रहे।।
जय हिंद लगा जयकारा।।
रास बिहारी; चरण भगवती; अमर रहें दुर्गा भाभी।
बिन आजाद न पूर्ण लग रही, थी जनता को आज़ादी।।
नहरू, राजिंदर, पटेल को, जनगण हुआ सहारा
जय हिंद लगा जयकारा।।
हुआ विभाजन मातृभूमि का।
मार-काट होती थी भारी, लूट-पाट को कौन गिने।
पंजाबी, सिंधी, बंगाली, मर-मिट सपने नए बुने।।
संविधान ने नव आशा दी, सूरज नया निहारा।
जय हिंद लगा जयकारा।।
बनी योजना पाँच साल की।
हुई हिंद की भाषा हिंदी, बाँध बन रहे थे भारी।
उद्योगों की फसल उग रही, पञ्चशील की तैयारी।।
पाकी-चीनी छुरा पीठ में, भोंकें; सोचें: मारा।
जय हिंद लगा जयकारा।।
पल-पल जगती रहती सेना।
बना बांग्ला देश, कारगिल, कहता शौर्य-कहानी।
है न शेष बासठ का भारत, उलझ न कर नादानी।।
शशि-मंगल जा पहुँचा इसरो, गर्वित हिंद हमारा।।
जय हिंद लगा जयकारा।।
सर्व धर्म समभाव न भूले।
जग-कुटुंब हमने माना पर, हर आतंकी मारेंगे।
जयचंदों की खैर न होगी, गाड़-गाड़कर तारेंगे।।
आर्यावर्त बने फिर भारत, 'सलिल' मंत्र उच्चारा।।
जय हिंद लगा जयकारा।।
६.७.२०१८
***
एक शे'र
चतुर्वेदी को मिला जब राह में कोई कबीर
व्यर्थ तत्क्षण पंडितों की पंडिताई देख ली
*
सुना रहा गीता पंडित जो खुद माया में फँसा हुआ
लेकिन सारी दुनिया को नित मुक्ति-राह बतलाता है.
***
दोहा सलिला
*
देव लात के मानते, कब बातों से बात
जैसा देव उसी तरह, पूजा करिए तात
*
चरण कमल झुक लात से, मना रहे हैं खैर
आये आम चुनाव क्या?, पड़ें पैर के पैर
*
पाँव पूजने का नहीं, शेष रहा आनंद
'लिव इन' के दुष्काल में, भंग हो रहे छंद
*
पाद-प्रहार न भाई पर, कभी कीजिए भूल
घर भेदी लंका ढहे, चुभता बनकर शूल
*
'सलिल न मन में कीजिए, किंचित भी अभिमान
तीन पगों में नाप भू, हरि दें जीवन-दान
*
मुक्तिका
कल्पना की अल्पना से द्वार दिल का जब सजाओ
तब जरूरी देखना यह, द्वार अपना या पराया?
.
छाँह सर की, बाँह प्रिय की. छोड़ना नाहक कभी मत
क्या हुआ जो भाव उसका, कुछ कभी मन को न भाया
.
प्यार माता-पिता, भाई-भगिनी, बच्चों से किया जब
रागमय अनुराग में तब, दोष किंचित भी न पाया
.
कौन क्या कहता? न इससे, मन तुम्हारा हो प्रभावित
आप अपनी राह चुन, मत करो वह जो मन न भाया
.
जो गया वह बुरा तो क्यों याद कर तुम रो रहे हो?
आ रहा जो क्यों न उसके वास्ते दीपक जलाया?
.
मुक्तिका
जिनसे मिले न उनसे बिछुड़े अपने मन की बात है
लेकिन अपने हाथों में कब रह पाये हालात हैं?
.
फूल गिरे पत्थर पर चोटिल होता-करता कहे बिना
कौन जानता, कौन बताये कहाँ-कहाँ आघात है?
.
शिकवे गिले शिकायत जिससे उसको ही कुछ पता
रात विरह की भले अँधेरी उसके बाद प्रभात है
.
मिलने और बिछुड़ने का क्रम जीवन को जीवन देता
पले सखावत श्वास-आस में, यादों की बारात है
.
तन दूल्हे ने मन दुल्हन की रूप छटा जब-जब देखी
लूट न पाया, खुद ही लुटकर बोला 'दिल सौगात है'
.***
मुहावरेदार दोहे
*
पाँव जमाकर बढ़ 'सलिल', तभी रहेगी खैर
पाँव फिसलते ही हँसे, वे जो पाले बैर
*
बहुत बड़ा सौभाग्य है, होना भारी पाँव
बहुत बड़ा दुर्भाग्य है, होना भारी पाँव
*
पाँव पूजना भूलकर, फिकरे कसते लोग
पाँव तोड़ने से मिटे, मन की कालिख रोग
*
पाँव गए जब शहर में, सर पर रही न छाँव
सूनी अमराई हुई, अश्रु बहाता गाँव
*
जो पैरों पर खड़ा है, मना रहा है खैर
धरा न पैरों तले तो, अपने करते बैर
*
सम्हल न पैरों-तले से, खिसके 'सलिल' जमीन
तीसमार खाँ भी हुए, जमीं गँवाकर दीन
*
टाँग अड़ाते ये रहे, दिया सियासत नाम
टाँग मारते वे रहे, दोनों है बदनाम
*
टाँग फँसा हर काम में, पछताते हैं लोग
एक पूर्ण करते अगर, व्यर्थ न होता सोग
*
बिन कारण लातें न सह, सर चढ़ती है धूल
लात मार पाषाण पर, आप कर रहे भूल
*
चरण कमल कब रखे सके, हैं धरती पर पैर?
पैर पड़े जिसके वही, लतियाते कह गैर
*
धूल बिमाई पैर का, नाता पक्का जान
चरण कमल की कब हुई, इनसे कह पहचान?
१९-५-२०१६
***
दोहा सलिला:
दोहा के रंग आँखों के संग ४
*
आँख न रखते आँख पर, जो वे खोते दृष्टि
आँख स्वस्थ्य रखिए सदा, करें स्नेह की वृष्टि
*
मुग्ध आँख पर हो गये, दिल को लुटा महेश
एक न दो, लीं तीन तब, मिला महत्त्व अशेष
*
आँख खुली तो पड़ गये, आँखों में बल खूब
आँख डबडबा रह गयी, अश्रु-धार में डूब
*
उतरे खून न आँख में, आँख दिखाना छोड़
आँख चुराना भी गलत, फेर न, पर ले मोड़
*
धूल आँख में झोंकना, है अक्षम अपराध
आँख खोल दे समय तो, पूरी हो हर साध
*
आँख चौंधियाये नहीं, पाकर धन-संपत्ति
हो विपत्ति कोई छिपी, झेल- न कर आपत्ति
*
आँखें पीली-लाल हों, रहो आँख से दूर
आँखों का काँटा बनें, तो आँखें हैं सूर
*
शत्रु किरकिरी आँख की, छोड़ न कह: 'है दीन'
अवसर पा लेता वही, पल में आँखें छीन
*
आँख बिछा स्वागत करें,रखें आँख की ओट
आँख पुतलियाँ मानिये, बहू बेटियाँ नोट
*
आँखों का तारा 'सलिल', अपना भारत देश
आँख फाड़ देखे जगत, उन्नति करे विशेष
१९-५-२०१५
*

मंगलवार, 13 मई 2025

मई १३, सॉनेट, मधुमालती, माली, मनमोहन, मनोरम, मानव, सुखदा, दोहा, जबलपुर,

सलिल सृजन मई १३
*

सॉनेट
हरिजन

हरि! जन को हरिजन मत करना
आम आदमी कोई तो हो
जिसकी राह अलग थोड़ी हो
भाव-ताव देखो मत डरना
अंतर में अंतर रख हँसना
कथनी-करनी एक न भाए
ठकुरसुहाती खूब सुहाए
ले अवतार न नाहक फँसना
मीठा भोग मिले हँस चखना
खट्टा कड़वा तीखा तजना
अन्य न तो खुद निज जय करना
पापी तार पार भव करना
अपने मन की रास न कसना
हर सुंदर तन के मन बसना
१३-५-२०२२
•••

रसानंद दे छंद नर्मदा ८१:
दोहा, ​सोरठा, रोला, ​आल्हा, सार​,​ ताटंक (चौबोला), रूपमाला (मदन), चौपाई​, ​हरिगीतिका, उल्लाला​, गीतिका, ​घनाक्षरी, बरवै, त्रिभंगी, सरसी, छप्पय, भुजंगप्रयात, कुंडलिनी, सवैया, शोभन/सिंहिका, सुमित्र, सुगीतिका , शंकर, मनहरण (कवित्त/घनाक्षरी), उपेन्द्रव​​ज्रा, इंद्रव​​ज्रा, सखी​, विधाता/शुद्धगा, वासव​, ​अचल धृति​, अचल​​, अनुगीत, अहीर, अरुण, अवतार, ​​उपमान / दृढ़पद, एकावली, अमृतध्वनि, नित, आर्द्रा, ककुभ/कुकभ, कज्जल, कमंद, कामरूप, कामिनी मोहन (मदनावतार), काव्य, वार्णिक कीर्ति, कुंडल, गीता, गंग, चण्डिका, चंद्रायण, छवि (मधुभार), जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिग्पाल / दिक्पाल / मृदुगति, दीप, दीपकी, दोधक, निधि, निश्चल, प्लवंगम, प्रतिभा, प्रदोष, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनाग छंदों से साक्षात के पश्चात् मिलिए मधुमालती छंद से
मधुमालती छंद
*
छंद-लक्षण: जाति मानव, प्रति चरण मात्रा १४ मात्रा, यति ७-७, चरणांत गुरु लघु गुरु (रगण) होता है.
लक्षण छंद:
मधुमालती आनंद दे
ऋषि साध सुर नव छंद दे
चरणांत गुरु लघु गुरु रहे
हर छंद नवउत्कर्ष दे।
उदाहरण:
१. माँ भारती वरदान दो
सत्-शिव-सरस हर गान दो
मन में नहीं अभिमान हो
घर-अग्र 'सलिल' मधु गान हो।
२. सोते बहुत अब तो जगो
खुद को नहीं खुद ही ठगो
कानून को तोड़ो नहीं-
अधिकार भी छोडो नहीं
**************

रसानंद दे छंद नर्मदा ८२:
दोहा, ​सोरठा, रोला, ​आल्हा, सार​,​ ताटंक (चौबोला), रूपमाला (मदन), चौपाई​, ​हरिगीतिका, उल्लाला​, गीतिका, ​घनाक्षरी, बरवै, त्रिभंगी, सरसी, छप्पय, भुजंगप्रयात, कुंडलिनी, सवैया, शोभन/सिंहिका, सुमित्र, सुगीतिका , शंकर, मनहरण (कवित्त/घनाक्षरी), उपेन्द्रव​​ज्रा, इंद्रव​​ज्रा, सखी​, विधाता/शुद्धगा, वासव​, ​अचल धृति​, अचल​​, अनुगीत, अहीर, अरुण, अवतार, ​​उपमान / दृढ़पद, एकावली, अमृतध्वनि, नित, आर्द्रा, ककुभ/कुकभ, कज्जल, कमंद, कामरूप, कामिनी मोहन (मदनावतार), काव्य, वार्णिक कीर्ति, कुंडल, गीता, गंग, चण्डिका, चंद्रायण, छवि (मधुभार), जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिग्पाल / दिक्पाल / मृदुगति, दीप, दीपकी, दोधक, निधि, निश्चल, प्लवंगम, प्रतिभा, प्रदोष, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनाग, मधुमालती छंदों से साक्षात के पश्चात् मिलिए मनमोहन छंद से
मनमोहन छंद
*
छंद-लक्षण: जाति मानव, प्रति चरण मात्रा १४ मात्रा, यति ८-६, चरणांत लघु लघु लघु (नगण) होता है.
लक्षण छंद:
रासविहारी, कमलनयन
अष्ट-षष्ठ यति, छंद रतन
अंत धरे लघु तीन कदम
नतमस्तक बलि, मिटे भरम.
उदाहरण:
१. हे गोपालक!, हे गिरिधर!!
हे जसुदासुत!, हे नटवर!!
हरो मुरारी! कष्ट सकल
प्रभु! प्रयास हर करो सफल.
२. राधा-कृष्णा सखी प्रवर
पार्थ-सुदामा सखा सुघर
दो माँ-बाबा, सँग हलधर
लाड लड़ाते जी भरकर
३. कंकर-कंकर शंकर हर
पग-पग चलकर मंज़िल वर
बाधा-संकट से मर डर
नीलकंठ सम पियो ज़हर
***************************

रसानंद दे छंद नर्मदा ८३:
दोहा, ​सोरठा, रोला, ​आल्हा, सार​,​ ताटंक (चौबोला), रूपमाला (मदन), चौपाई​, ​हरिगीतिका, उल्लाला​, गीतिका, ​घनाक्षरी, बरवै, त्रिभंगी, सरसी, छप्पय, भुजंगप्रयात, कुंडलिनी, सवैया, शोभन/सिंहिका, सुमित्र, सुगीतिका , शंकर, मनहरण (कवित्त/घनाक्षरी), उपेन्द्रव​​ज्रा, इंद्रव​​ज्रा, सखी​, विधाता/शुद्धगा, वासव​, ​अचल धृति​, अचल​​, अनुगीत, अहीर, अरुण, अवतार, ​​उपमान / दृढ़पद, एकावली, अमृतध्वनि, नित, आर्द्रा, ककुभ/कुकभ, कज्जल, कमंद, कामरूप, कामिनी मोहन (मदनावतार), काव्य, वार्णिक कीर्ति, कुंडल, गीता, गंग, चण्डिका, चंद्रायण, छवि (मधुभार), जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिग्पाल / दिक्पाल / मृदुगति, दीप, दीपकी, दोधक, निधि, निश्चल, प्लवंगम, प्रतिभा, प्रदोष, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनाग, मधुमालती, मनमोहन छंदों से साक्षात के पश्चात् मिलिए मनोरम छंद से
मनोरम छंद
*
छंद-लक्षण: समपाद मात्रिक छंद, जाति मानव, प्रति चरण मात्रा १४ मात्रा, चरणारंभ गुरु, चरणांत गुरु लघु लघु या लघु गुरु गुरु होता है.
लक्षण छंद:
हैं भुवन चौदह मनोरम
आदि गुरु हो तो मिले मग
हो हमेश अंत में अंत भय
लक्ष्य वर लो बढ़ाओ पग
उदाहरण:
१. साया भी साथ न देता
जाया भी साथ न देता
माया जब मन भरमाती
काया कब साथ निभाती
२. सत्य तज मत 'सलिल' भागो
कर्म कर फल तुम न माँगो
प्राप्य तुमको खुद मिलेगा
धर्म सच्चा समझ जागो
३. लो चलो अब तो बचाओ
देश को दल बेच खाते
नीति खो नेता सभी मिल
रिश्वतें ले जोड़ते धन
४. सांसदों तज मोह-माया
संसदीय परंपरा को
आज बदलो, लोक जोड़ो-
तंत्र को जन हेतु मोड़ो
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रसानंद दे छंद नर्मदा ८४:
मानव छंद
*
छंद-लक्षण: समपाद मात्रिक छंद, जाति मानव, प्रति चरण मात्रा १४ मात्रा, चरणारंभ गुरु, चरणांत गुरु लघु लघु या लघु गुरु गुरु होता है.
लक्षण छंद:
हैं भुवन चौदह मनोरम
आदि गुरु हो तो मिले मग
हो हमेश अंत में अंत भय
लक्ष्य वर लो बढ़ाओ पग
उदाहरण:
१. साया भी साथ न देता
जाया भी साथ न देता
माया जब मन भरमाती
काया कब साथ निभाती
२. सत्य तज मत 'सलिल' भागो
कर्म कर फल तुम न माँगो
प्राप्य तुमको खुद मिलेगा
धर्म सच्चा समझ जागो
३. लो चलो अब तो बचाओ
देश को दल बेच खाते
नीति खो नेता सभी मिल
रिश्वतें ले जोड़ते धन
४. सांसदों तज मोह-माया
संसदीय परंपरा को
आज बदलो, लोक जोड़ो-
तंत्र को जन हेतु मोड़ो
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रसानंद दे छंद नर्मदा ८५:
माली (राजीवगण) छंद
*
छंद-लक्षण: जाति मानव, प्रति चरण मात्रा १८ मात्रा, यति ९ - ९
लक्षण छंद:
प्रति चरण मात्रा, अठारह रख लें
नौ-नौ पर रहे, यति यह परख लें
राजीव महके, परिंदा चहके
माली-भ्रमर सँग, तितली निरख लें
उदाहरण:
१. आ गयी होली, खेल हमजोली
भीगा दूं चोली, लजा मत भोली
भरी पिचकारी, यूँ न दे गारी,
फ़िज़ा है न्यारी, मान जा प्यारी
खा रही टोली, भांग की गोली
मार मत बोली,व्यंग्य में घोली
तू नहीं हारी, बिरज की नारी
हुलस मतवारी, डरे बनवारी
पोल क्यों खोली?, लगा ले रोली
प्रीती कब तोली, लग गले भोली
२. कर नमन हर को, वर उमा वर को
जीतकर डर को, ले उठा सर को
साध ले सुर को, छिपा ले गुर को
बचा ले घर को, दरीचे-दर को
३. सच को न तजिए, श्री राम भजिए
सदग्रन्थ पढ़िए, मत पंथ तजिए
पग को निरखिए, पथ भी परखिए
कोशिशें करिए, मंज़िलें वरिये
************************
दोहा सलिला
जबलपुर में शुभ प्रभात
*
रेवा जल में चमकतीं, रवि-किरणें हँस प्रात।
कहतीं गौरीघाट से, शुभ हो तुम्हें प्रभात।।१।।
*
सिद्धघाट पर तप करें, ध्यान लगाकर संत।
शुभप्रभात कर सूर्य ने, कहा साधना-तंत।।२।।
*
खारी घाट करा रहा, भवसागर से पार।
सुप्रभात परमात्म से, आत्मा कहे पुकार।।३।
*
साबुन बिना नहाइए, करें नर्मदा साफ़।
कचरा करना पाप है, मैया करें न माफ़।।४।।
*
मिलें लम्हेटा घाट में, अनगिन शिला-प्रकार।
देख, समझ पढ़िये विगत, आ आगत के द्वार।।५।।
*
है तिलवारा घाट पर, एक्वाडक्ट निहार।
नदी-पाट चीरे नहर, सेतु कराए पार।।६।।
*
शंकर उमा गणेश सँग, पवनपुत्र हनुमान।
देख न झुकना भूलना, हाथ जोड़ मति मान।।७।।
*
पोहा-गरम जलेबियाँ, दूध मलाईदार।
सुप्रभात कह खाइए, कवि हो साझीदार।।८।।
*
धुआँधार-सौन्दर्य को, देखें भाव-विभोर।
सावधान रहिए सतत, फिसल कटे भव-डोर।।९।।
*
गौरीशंकर पूजिए, चौंसठ योगिन सँग।
भोग-योग संयोग ने, कभी बिखेरे रंग।।१०।।
*
नौकायन कर देखिये, संगमरमरी रूप।
शिखर भुज भरे नदी को, है सौन्दर्य अनूप।११।।
*
बहुरंगी चट्टान में, हैं अगणित आकार।
भूलभुलैयाँ भुला दे, कहाँ गई जलधार?।१२।।
*
बंदरकूदनी देख हो, लघुता की अनुभूति।
जब गहराई हो अधिक, करिए शांति प्रतीति।।१३।।
*
कमल, मगर, गज, शेर भी, नहीं रहे अब शेष।
ध्वंस कर रहा है मनुज, सचमुच शोक अशेष।।१४।।
*
मदनमहल अवलोकिए, गा बम्बुलिया आप।
थके? करें विश्राम चल, सुख जाए मन-व्याप।।१५।।
१३-५-२०१७
***
मुक्तिका
*
जितने चेहरे उतने रंग
सबकी अलग-अलग है जंग
*
ह्रदय एक का है उदार पर
दिल दूजे का बेहद तंग
*
यह जिसका हो रहा सहायक
वह इससे है बेहद तंग
*
चिथड़ों में भी लाज ढकी है
आधुनिका वस्त्रों में नंग
*
जंग लगी जिसके दिमाग में
वह औरों से छेड़े जंग
*
बेढंगे में छिपा न दिखता
खोज सको तो खोजो ढंग
*
नेह नर्मदा 'सलिल' स्वच्छ है
मलिन हो गयी सुरसरि गंग
***
लघुकथा
कानून के रखवाले
*
'हमने आरोपी को जमकर सबक सिखाया, उसके कपड़े तक ख़राब हो गये, बोलती बंद हो गयी। अब किसी की हिम्मत नहीं होगी हमारा विरोध करने की। हम किसी को अपना विरोध नहीं करने देंगे।' वक्ता की बात पूर्ण होने के पूर्व हो एक जागरूक श्रोता ने पूछा- ''आपका संविधान और कानून के जानकार है और अपने मुवक्किलों को उसके न्याय दिलाने का पेशा करते हैं। कृपया, बताइये संविधान के किस अनुच्छेद या किस कानून की किस कंडिका के तहत आपको एक सामान्य नागरिक होते हुए अन्य नागरिक विचाराभिव्यक्ति से रोकने और खुद दण्डित करने का अधिकार प्राप्त है? क्या आपसे असहमत अन्य नागरिक आपके साथ ऐसा ही व्यवहार करे तो वह उचित होगा? यदि नागरिक विवेक के अनुसार एक-दूसरे को दण्ड देने के लिए स्वतंत्र हैं तो शासन, प्रशासन और न्यायालय किसलिए है? ऐसी स्थिति में आपका पेशा ही समाप्त हो जायेगा। आप क्या कहते हैं?
प्रश्नों की बौछार के बीच निरुत्तर-नतमस्तक खड़े थे कानून के तथाकथित रखवाले।
१३-५-२०१६
***
एक गीत:
करो सामना
*
जब-जब कंपित भू हुई
हिली आस्था-नीव
आर्तनाद सुनते रहे
बेबस करुणासींव
न हारो करो सामना
पूर्ण हो तभी कामना
ध्वस्त हुए वे ही भवन
जो अशक्त-कमजोर
तोड़-बनायें फिर उन्हें
करें परिश्रम घोर
सुरक्षित रहे जिंदगी
प्रेम से करो बन्दगी
संरचना भूगर्भ की
प्लेट दानवाकार
ऊपर-नीचे चढ़-उतर
पैदा करें दरार
रगड़-टक्कर होती है
धरा धीरज खोती है
वर्तुल ऊर्जा के प्रबल
करें सतत आघात
तरु झुक बचते, पर भवन
अकड़ पा रहे मात
करें गिर घायल सबको
याद कर सको न रब को
बस्ती उजड़ मसान बन
हुईं प्रेत का वास
बसती पीड़ा श्वास में
त्रास ग्रस्त है आस
न लेकिन हारेंगे हम
मिटा देंगे सारे गम
कुर्सी, सिल, दीवार पर
बैंड बनायें तीन
ईंट-जोड़ मजबूत हो
कोने रहें न क्षीण
लचीली छड़ें लगाओ
बीम-कोलम बनवाओ
दीवारों में फंसायें
चौखट काफी दूर
ईंट-जुड़ाई तब टिके
जब सींचें भरपूर
रैक-अलमारी लायें
न पल्ले बिना लगायें
शीश किनारों से लगा
नहीं सोइए आप
दीवारें गिर दबा दें
आप न पायें भाँप
न घबरा भीड़ लगायें
सजग हो जान बचायें
मेज-पलंग नीचे छिपें
प्रथम बचाएं शीश
बच्चों को लें ढांक ज्यों
हुए सहायक ईश
वृद्ध को साथ लाइए
ईश-आशीष पाइए
***
नवगीत:
.
खून-पसीने की कमाई
कर में देते जो
उससे छपते विज्ञापन में
चहरे क्यों हों?
.
जिन्हें रात-दिन
काटा करता
सत्ता और कमाई कीड़ा
आँखें रहते
जिन्हें न दिखती
आम जनों को होती पीड़ा
सेवा भाव बिना
मेवा जी भर लेते हैं
जन के मन में ऐसे
लोलुप-बहरे क्यों हों?
.
देश प्रेम का सलिल
न चुल्लू भर
जो पीते
मतदाता को
भूल स्वार्थ दुनिया
में जीते
जन-जीवन है
बहती 'सलिला'
धार रोकते बाधा-पत्थर
तोड़ी-फेंको, ठहरे क्यों हों?
१३-५-२०१५
*

छंद सलिला:
सुखदा छंद
*
छंद-लक्षण: जाति महारौद्र, प्रति चरण मात्रा २२ मात्रा, यति १२-१०, चरणांत गुरु (यगण, मगण, रगण, सगण)
लक्षण छंद:
सुखदा बारह-दस यति, मन की बात कहे
गुरु से करें पद-अंत, मंज़िल निकट रहे
उदाहरण:
१. नेता भ्रष्ट हुए जो / उनको धुनना है
जनसेवक जो सच्चे / उनको सुनना है
सोच-समझ जनप्रतिनिधि, हमको चुनना है
शुभ भविष्य के सपने, उज्ज्वल बुनना है
२. कदम-कदम बढ़ना है / मंज़िल पग चूमे
मिल सीढ़ी चढ़ना है, मन हँसकर झूमे
कभी नहीं डरना है / मिल मुश्किल जीतें
छंद-कलश छलकें / 'सलिल' नहीं रीतें
३. राजनीति सुना रही / स्वार्थ क राग है
देश को झुलसा रही, द्वेष की आग है
नेतागण मतलब की , रोटियाँ सेंकते
जनता का पीड़ा-दुःख / दल नहीं देखता
***
मुक्तक:
दिल ही दिल
*
तुम्हें देखा, तुम्हें चाहा, दिया दिल हो गया बेदिल
कहो चाहूँगा अब कैसे, न होगा पास में जब दिल??
तुम्हें दिलवर कहूँ, तुम दिलरुबा, तुम दिलनशीं भी हो
सनम इंकार मत करना, मिले परचेज का जब बिल
*
न देना दिल, न लेना दिल, न दिलकी डील ही करना
न तोड़ोगे, न टूटेगा, नहीँ कुछ फ़ील ही करना
अभी फर्स्टहैंड है प्यारे, तुम सैकेंडहैंड मत करना
न दरवाज़ा खुल रख्नना, न कोई दे सके धऱना
*
न दिल बैठा, न दिल टूटा, न दहला दिल, कहूँ सच सुन
न पूछो कैसे दिल बहला?, न बोलूँ सच , न झूठा सुन,
रहे दिलमें अगर दिलकी, तो दर्दे-दिल नहीं होगा
कहो संगदिल भले ही तुम, ये दिल कातिल नहीँ होगा
*
लगाना दिल न चाहा, दिल लगा कब? कौन बतलाये??
सुनी दिल की, कही दिल से, न दिल तक बात जा पाये।
ये दिल भाया है जिसको, उसपे क्यों ये दिल नहीं आया?
ये दिल आया है जिस पे, हाय! उसको दिल नहीं भाया।
१३-५-२०१४
***
गीत:
छोड़ दें थोड़ा...
* *
जोड़ा बहुत,
छोड़ दें थोड़ा...
*
चार कमाना, एक बाँटना.
जो बेहतर हो वही छांटना-
मंझधारों-भँवरों से बचना-
छूट न जाए घाट-बाट ना.
यही सिखाया परंपरा ने
जुत तांगें में
बनकर घोड़ा...
*
जब-जब अंतर्मुखी हुए हो.
तब एकाकी दुखी हुए हो.
मायावी दुनिया का यह सच-
आध्यात्मिक कर त्याग सुखी हो.
पाठ पढ़ाया पराsपरा ने.
कुंभकार ने
रच-घट फोड़ा...
*
१३.५.१२
***

रविवार, 19 मई 2024

मई १९, दोहा, मुहावरे, आँख, नाक, छंद जिकड़ी, मुक्तिका, जबलपुर, नर्मदा, एम वी

सलिल सृजन मई १९
*
चमकते पत्थरों का शहर - जबलपुर
प्रकृति की गोद में पर्यटन करना माँ की आँचल में किलकारी भरते हुए करवट बदलने की तरह है। पर्यटन आत्मिक शांति देने के साथ साथ सांस्कृतिक-सामाजिक संबंधों को सुदृढ़ करता है। अशांत मन कोशांत करने के लिए पर्यटन करना चाहिए। पर्यटन से पर्यटक का ज्ञान वर्धन होता है। पर्यटन स्थल की लोक संस्कृति और लोक जीवन के बारे में बहुत सारी गूढ़ जानकारी प्राप्त होती है। भारतवर्ष भिन्न-भिन्न विविधताओं, संस्कृतियों, संस्कारों, धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थलों से भरा हुआ देश है। हमारे देश के प्रत्येक राज्य में धार्मिक, प्राकृतिक, ऐतिहासिक महत्व के पर्यटक स्थल मिल जाएंगे जो भारत की विशालता और वैभवशाली प्राचीन विरासत को दर्शाते है। आइये, आज जबलपुर की सैर करते हैं। जबलपुर मध्यप्रदेश का प्रमुख महानगर है। यह समुद्र तट से ४१२ मी. की ऊँचाई पर स्थित है। इसका क्षेत्रफल ५२११ वर्ग किलोमीटर तथा जनसंख्या लगभग २५ लाख है। जबलपुर के निकट नर्मदा क्षेत्र साधना भूमि के रूप में प्रसिद्ध रहा है। महर्षि अगस्त्य, जाबालि, भृगु, दत्तात्रेय आदि ने यहाँ तपस्या की है। आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार त्रेता में राम सीता लक्षमण तथा द्वापर में कृष्ण व पांडवों का यहाँ आगमन हुआ था। यह गोंड़ तथा कलचुरी राजाओं के समय समृद्ध क्षेत्र रहा है। भारतीय स्वतंत्रता प्राप्ति का प्रथम प्रयास इसी अञ्चल में बुंदेला क्रांति १८४२ के रूप में सामने आया जिसने अग्रेजों का हृदय कँपा दिया था। सन १७८१ के बाद ही मराठों के मुख्यालय के रूप में चुने जाने पर इस नगर की सत्ता बढ़ी, बाद में यह सागर और नर्मदा क्षेत्रों के ब्रिटिश कमीशन का मुख्यालय बन गया। यहाँ १८६४ में नगरपालिका का गठन हुआ था।
पुरातन वैभव
जबलपुर के समीप राष्ट्रीय जीवाश्म उद्यान, घुघवा (डिंडोरी) में ७५ एकड़ में पत्तियों और पेड़ों के आकर्षक और दुर्लभ जीवाश्म हैं जो ४ करोड़ से १५ करोड़ साल पहले मौजूद थे।नर्मदाघाटी के भू स्तरों की खोजों से पता चलता है कि नर्मदाघाटी की सभ्यता सिन्धु घाटी की सभ्यता से बहुत पुरानी है। लम्हेटा घाट के चट्टानों को कार्बन डेटिंग परीक्षण में लगभग ६ करोड़ वर्ष पुराना अनुमानित किया गया है। आयुध निर्माणी खमारिया के समीप पाटबाबा की पहाड़ियों से लगभग २ करोड़ वर्ष पूर्व विचरनेवाले भीमकाय डायनासौर राजासौरस नर्मदेडेंसिस के जीवाश्म तथा अंडे शिकागो विश्वविद्यालय के पेलियनोलिस्ट्स पॉल सेरेनो, मिशिगन विश्वविद्यालय के जेफ विल्सन और सुरेश श्रीवास्तव ने खोजे। नर्मदाघाटी में प्राप्त भैंसा, घोड़े, रिनोसिरस, हिप्पोपोटेमस, हाथी और मगर की हड्डियों तथा प्रस्तर-उद्योग संपन्न यह भूभाग आदि मानव का निवास था। १८७२ ई. में मिली स्फटिक चट्टान से निर्मित एक तराशी पूर्व-चिलयन युग की प्रस्तर कुल्हाड़ी भारत में प्राप्त प्रागैतिहासिक चिन्हों में सबसे प्राचीन है। भेड़ाघाट में पुरापाषाण युग के अनेक वृहत् जीवाश्म और प्रस्तरास्त्र मिले हैं। जबलपुर से लगभग २० कि.मी. दूर भेड़ाघाट विश्व का एकमात्र स्थान है जहाँ बहुरंगी संगमरमरी पहाड़ के बीच से नर्मदा की धवल सलिल धार प्रवाहित होती है। पंचवटी घाट से बंदरकूदनी तक नौकायन करते समय आकर्षित करते रंग-बिरंगे पत्थर मानो हमसे कहते हैं, आओ मुझे छूकर तो देखो… नर्मदा अञ्चल के ग्रामों में बंबुलिया और लमटेरा लोकगीतों की मधुर ध्वनि आज भी गूँजती है -
* नरबदा तो ऐसी मिलीं रे
जैसैं मिल गए मताई उन बाप रे
इस बंबुलिया लोकगीत में नवविवाहिता अपने मायके को याद करते हुए नर्मदा को माता और पिता, दोनों के रूप में देख रही है। प्रकृति का मानव के साथ घनिष्ठ संबंध म,आँव सभ्यता की धरोहर है।
* नरबदा मैया उल्टी तो बहै रे,
उल्टी बहै रे तिरबैनी बहै सूधी धार रे।
भारत उपमहाद्वीप की शेष नदियों के सर्वथा विपरीत दिशा में नर्मदा तथा ताप्ती नदियाँ बहती हैं। यह भौगोलिक तथ्य एक लोक कथा के प्रचलित है है। तदनुसार व्यासजी से मुनियों ने प्रार्थना की, जिससे व्यासजी ने नर्मदा का स्मरण किया और नर्मदा ने अपने बहाव की दिशा बदल दी।
* नरबदा अरे माता तो लगै रे,
माता लगै रे तिरबैनी लगै मौरी बैन रे, नरबदा हो....।
कालक्रम की दृष्टि से नर्मदा बहुत ज्येष्ठ और गंगा कनिष्ठ हैं। उक्त पंक्तियों में में नर्मदा को माता कहा गया है और त्रिवेणी को बहिन कहकर इस तथ्य को इंगित किया गया है। दश के विविध अंचलों को एक सूत्र में बाँधने की यही लोक रीति सफलराष्ट्रीय एकता का मूल है।
नर्मदा विश्व की एकमात्र नदी है जिसके उद्गम स्थल अमरकंटक पर्वत से सागर में विलय स्थल भरूच गुजरात तक सैंकड़ों परकम्मावासी (पदयात्री) पैदल परिक्रमा करते हैं। वे टोलियों में नदी के एक किनारे से चलकर भरुच में सागर में दूसरे किनारे पर आकर वापिस लौटते हैं। जबलपुर में नर्मदा के कई घाट हैं। हर घाट की अपनी कहानी और मनोरम छटा मन मोह लेती है। सिद्ध घाट, गौरीघाट, दरोगाघाट, खारीघाट, लम्हेटा घाट, तिलवाराघाट भेड़ाघाट, सरस्वती घाट आदि का सौन्दर्य अद्भुत है। चौंसठ योगिनी मंदिर के केंद्र में गौरीशंकर की प्राचीन किन्तु भव्य प्रतिमा है जिसके चारों ओर वृत्ताकार में चौंसठ योगिनियों की मूर्तियाँ हैं। समीप ही धुआँधार जल प्रपात की नैसर्गिक दिव्य छवि छटा अलौकिक है। सरस्वती घाट से बंदरकूदनी तक नौकायन करते समय दोनों ओर बहुरंगी संगमरमरी पहाड़ की छटा मनमोहक है। यह विश्व का एकमात्र स्थल है जहाँ सौन्दर्यमयी नर्मदा संगमरमारी पहाड़ के बीच से बहती है। जिस देश में गंगा बहती है, प्राण जाए पाए वचन न जाए, अशोका, मोहनजोदाड़ो आदि अनेक फिल्मों में यहाँ के भव्य दृश्यों का फिल्कमांन किया जा चुका है।
गिरि दुर्ग मदन महल
जबलपुर एक पहाड़ी पर गिरि दुर्ग मदन महल स्थित है जिसे ११०० ई. में राजा मदन सिंह द्वारा बनवाया गया एक पुराना गोंड महल है। इसके ठीक पश्चिम में गढ़ा है, जो १४ वीं शताब्दी के चार स्वतंत्र गोंड राज्यों का प्रमुख नगर-किला था। मदन महल के समीप ही कौआ डोल चट्टान (संतुलित शिला) है। यहाँ एक शिला ऊपर दूसरी विशाल शिला इस तरह रखी है कि मिलन स्थल सुई की नोक की तरह है। देखने से प्रतीत होता है कि कौए के बैठते ही ऊपरवाली चट्टान लुढ़क जाएगी पर भूकंप आने पर भी यह सुरक्षित रही।
भारत का वेनिस
संग्राम सागर, बाजना मठ, अधारताल, रानी ताल, चेरी ताल आदि जबलपुर को गोंड काल की देन है। जबलपुर ५२ तालाबों से संपन्न ऐसा शहर था जिसे भारत का वेनिस कहा जा सकता था। इनका निर्माण भू वैज्ञानिक दृष्टि से इस प्रकार किया गया था कि वर्षा जल सबसे पहले ऊपरी तालाब को भरे, फिर दूसरे, तीसरे चौथे और पाँचवे तालाब को भरने के बाद नर्मदा नदी में बहे। वर्तमान में अधिकांश तालाब पूरकर बस्ती बसा ली गई है तथापि कई तालाब अब भी अवशेष रूप में हैं। रामलला मंदिर, बड़े गणेश मंदिर ग्वारीघाट, गुप्तेश्वर, चित्रगुप्त मंदिर फूटाताल, राम जानकी मंदिर लाल माटी, पुष्टिमार्ग प्रवर्तक गोस्वामी विट्ठल दास जी की बैठकी देव ताल, ओशो आश्रम, ओशो संबोधि वृक्ष भँवरताल, राजा रघुनाथ शाह बलिदान स्थल, त्रिपुर सुंदरी मंदिर, ब्योहार निवास साठिया कुआं, गोपाल लाल मंडी हनुमानताल, बड़ी खरमाई मंदिर, बूडी खरमाई मंदिर आदि महत्वपूर्ण स्थल हैं।
साहित्यिक अवदान
जबलपुर अञ्चल में आधुनिक हिन्दी अपने शुद्ध साहित्यिक रूप में आम लोगों में बोली लिखी पढ़ी जाते है। हिंदी का पहला व्याकरण जबलपुर में ही कामता प्रसाद गुरु जी द्वारा लिखा गया। पिंगल शास्त्र का प्रसिद्ध ग्रंथ छंद प्रभाकर रचनेवाले जगन्नाथ प्रसाद भानु भी जबलपुर से जुड़े हुए थे। जबलपुर की समृद्ध सारस्वत साधना के कालजयी हस्ताक्षरों में जगद्गुरु ब्रह्मानन्द सरस्वती जी, स्वरूपानन्द सरस्वती जी, क्रांतिकारी माखन लाल चतुर्वेदी, क्रांतिकारी ज्ञानचंद वर्मा, महीयसी महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, महादेव प्रसाद 'सामी', केशव प्रसाद पाठक, रामानुज लाल श्रीवास्तव 'ऊँट बिलहरीवी', पन्नालाल श्रीवास्तव 'नूर', ब्योहार राजेन्द्र सिंह, भवानी प्रसाद तिवारी, सेठ गोविन्द दास, महर्षि महेश योगी, आचार्य रजनीश (ओशो), द्वारका प्रसाद मिश्र, जवाहरलाल चौरसिया 'तरुण', हरिशंकर परसाई, प्रेमचंद श्रीवास्तव 'मज़हर', इंद्र बहादुर खरे, रामकृष्ण श्रीवास्तव, अमृत लाल वेगड़ आदि अविस्मरणीय हैं।
वर्तमान काल में हिंदी भाषा विज्ञान के विद्वान डॉक्टर सुरेश कुमार वर्मा, ५०० से अधिक नए छंदों की रचना करनेवाले तथा शिशु मंदिर विद्यालयों में गाई जाती दैनिक प्रार्थना 'हे हंसवाहिनी, ज्ञान-दायिनी,अंब- विमल मति दे' के रचनाकार आचार्य संजीव वर्मा "सलिल", राम वनवास यात्रा के अन्वेषक डॉ. गिरीश कुमार अग्निहोत्री, पाली विशेषज्ञ आचार्य कृष्णकांत चतुर्वेदी, वैदिक वांगमय विशेषज्ञ डॉ. इला घोष, ख्यात वनस्पति शास्त्री डॉ. अनामिका तिवारी, समाजसेवी साधन उपाध्याय, अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त रसायनविद डॉ. अनिल बाजपेयी आदि सारस्वत साधन की अलख आज भी जलाए हुए हैं। जबलपुर के ख्यात चित्रकारों में ब्योहार राममनोहर सिन्हा, अमृत लाल वेगड़, हरी भटनागर, हरी श्रीवास्तव, सुरेश श्रीवास्तव, राजेन्द्र कामले, अस्मिता शैली आदि उल्लेखनीय हैं।
तिलवारा एक्वाडक्ट
जबलपुर में एशिया का सबसे अधिक लंबा एक्वाडक्ट तिलवारा घाट नें है। एक्वाडक्ट एक जटिल संरचना अभियांत्रिकी संरचना होती है जिसमें नदी के ऊपर से नहर बहती है। तिलवार एक्वाडक्ट की खासियत यह है कि नर्मदा नदी के ऊपर से नर्मदा की ही नहर बहती है और उसके ऊपर से जबलपुर नागपूर राष्ट्रीय राजमार्ग का भारी सड़क यातायात भी जारी रहता है।
भारत रत्न विश्वेश्वरैया की ९ मूर्तियाँ
जबलपुर ने एक कीर्तिमान इंजीनियर्स फोरम के माध्यम से स्थापित किया है। किसी देश के निर्माण और विकास में अभियंताओं का योगदान सर्वाधिक होता है किन्तु सामन्यात: उसे पहचान नहीं जाता। आधुनिक भारतीय अभियांत्रिकी के मुकुटमणि डॉ. भारत रत्न सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया हैं जिनके जन्म दिवस को 'अभियंता दिवस' के रूप में मनाया जाता है। जबलपुर के अभियंताओं ने विश्वेश्वरैया जी को शरुद्धाञ्जली देने के लिए उनकी ९ मूर्तियाँ नगर में स्थापित की हैं। अभियंता संजीव वर्मा 'सलिल' की पहल और प्रयासों से शासकीय अभियांत्रिकी महाविद्यालय, मुख्य अभियंता लोक निर्माण विभाग कार्यालय, शासकीय कला निकेतन पॉलिटेकनिक, नर्मदा सर्किल कार्यालय, हितकारिणी अभियांत्रिकी महाविद्यालय, इन्स्टीट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स कार्यालय, अतिथि गृह बरगी हिल्स, अधीक्षण अभियंता लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी कार्यालय तथा विद्युत मण्डल रामपुर में स्थापित एम. व्ही. की प्रतिमाएँ अभियंताओं की प्रेरणा स्रोत हैं। विश्व में अन्यत्र किसी भी नगर में एक अभियंता की इतनी मूर्तियाँ नहीं हैं।
शिक्षा केंद्र
जबलपुर में ५ शासकीय विश्वविद्यालय हैं। यह महाकौशल बुंदेलखंड का सबसे बड़ा शिक्षा केंद्र है। यहाँ हर विधा और शाखा की उच्च शिक्षा प्राप्त की जा सकती है। रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, सुभाषचंद्र बोस मेडिकल यूनिवर्सिटी, पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय तथा विधि विश्वविद्यालय जबलपुर की शान हैं। जबलपुर में आई.आई.आई.टी. तथा आई.आई.एम. दोनों राष्ट्रीय संस्थान हैं। अभियांत्रिकी शिक्षा के २० संस्थान, मेडिकल शिक्षा के २८ संस्थानों सहित जबलपुर में २३० विविध शिक्षा संस्थान हैं।
भारत का रखवाला
जबलपुर अपनी भौगोलिक स्थितियों के कारण चिरकाल से सुरक्षा का केंद्र रहा है। यहाँ आयुध निरामनीनिर्माणी खमरिया, सेंट्रल ऑर्डिनेंस डिपो, भारी वाहन कारखाना, धूसर लोहा फ़ाउन्ड्री आदि कारखानों में देख की रक्ष में महती भूमिका निभानेवाले अस्त्र-शस्त्र, वाहन आदि का निर्माण होता है। जबलपुर रक्षा क्लस्टर बनना प्रस्तावित है। बांग्ला देश के स्वतंत्रता के पश्चात आत्मसर्पण करनेवाली पकिस्तानी सेना के कमांडर नियाजी तथा सनिक जबलपुर में ही बंदी रखे गए थे।
जाकी रही भावना जैसी
जबलपुर भारत का हृदय स्थल है। यह मध्यप्रदेश राज्य का सर्वाधिक प्राचीन पवित्र शहर है। सनातन सलिला नर्मदा की गोद में बसा जबलपुर श्यामल बैसाल्ट शिलाओं से संपन्न है, इसे 'पत्थरों का शहर' कहा जाता है। संत विनोबा भावे ने जबलपुर के साँस्कृतिक वैभव से प्रभावित होकर इसे 'संस्कारधानी' का विशेषण दिया तो नेहरू जी ने अपनी सभा में शोर कर रहे युवाओं पर नाराज होकर 'गुंडों का शहर' कहकर अपनी नाराजगी व्यक्त की। जबलपुर अनेकता में एकता परक समन्वय और सहिष्णुता की नगरी है। यहाँ के खान-पान में भी मिश्रित संस्कृति झलकती है। इडली-डोसा', 'वड़ा-सांभर' से लेकर 'दाल-बाफला' ठेठ मालवा फूड, खोवे (मावे) की जलेबी खाने के बाद तो बस आपको आनंद ही आने वाला है। जबलपुर के चप्पे चप्पे में इतिहास है। निस्संदेह आपने जबलपुर नहीं देखा तो आपका भारत भ्रमण पूर्ण नहीं हो सकता।
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दोहा सलिला:
दोहा का रंग नाक के संग
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मीन कमल मृग से नयन, शुक जैसी हो नाक
चंदन तन में आत्म हो, निष्कलंक निष्पाप
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बैठ न पाये नाक पर, मक्खी रखिये ध्यान
बैठे तो झट दें उड़ा, बने रहें अनजान
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नाक घुसेड़ें हर जगह, जो पाते हैं मात
नाक अड़ाते बिन वजह, हो जाते कुख्यात
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नाक न नीची हो तनिक, करता सब जग फ़िक्र
नाक कटे तो हो 'सलिल', घर-घर हँसकर ज़िक्र
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नाक सदा ऊँची रखें, बढ़े मान-सम्मान
नाक अदाए व्यर्थ जो, उसका हो अपमान
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शूर्पणखा की नाक ने, बदल दिया इतिहास
ऊँची थी संत्रास दे, कटी सहा संत्रास
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नाक छिनकना छोड़ दें, जहाँ-तहाँ हम-आप
'सलिल' स्वच्छ भारत बने, मिटे गंदगी शाप
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नाक-नार दें हौसला, ठुमक पटकती पैर
ख्वाब दिखा पुचकार लो, 'सलिल' तभी हो खैर
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जिसकी दस-दस नाक थीं, उठा न सका पिनाक
बीच सभा में कट गयी, नाक मिट गयी धाक
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नाक नकेल बिना नहीं, घोड़ा सहे सवार
बीबी नाक-नकेल बिन, हो सवार कर प्यार
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आँख कान कर पैर लब, दो-दो करते काम
नाक शीश मन प्राण को, मिलता जग में नाम
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मुक्तक
भावना की भावना है शुद्ध शुभ सद्भाव है
भाव ना कुछ, अमोली बहुमूल्य है बेभाव है
साथ हैं अभियान संगम ज्योति हिंदी की जले
प्रकाशित सब जग करे बस यही मन में चाव है
१६-५-२०२०
मुक्तिका
कोयल कूक कह रही कल रव जैसा था, वैसा मत करना
गौरैया कहती कलरव कर, किलकिल करने से अब डरना
पवन कहे मत धूम्र-वाहनों से मुझको दूषित कर मानव
सलिल कहे निर्मल रहने दे, मलिन न पंकिल मुझको करना
कोरोना बोले मैं जाऊँ अगर रहेगा अनुशासित तू
खुली रहे मधुशाला पीने जाकर बिन मारे मत मरना
साफ-सफाई करो, रहो घर में, मत घर को होटल मानो
जो न चाहते हो तुमसे, व्यवहार न कभी किसी से करना
मेहनतकश को इज्जत दो, भूखा न रहे कोई यह देखो
लोकतंत्र में लोक जगे, जाग्रत हो, ऐसा पथ मिल वरना
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मुक्तिका
इसने मारा उसने मारा
क्या जानूँ किस-किस ने मारा
श्रमिक-कृषक जोरू गरीब की
भौजी कहकर सबने मारा
नेता अफसर सेठ मजे में
पत्रकार-भक्तों ने मारा
चोर-गिरहकट छूटे पीछे
संतों-मुल्लों ने भी मारा
भाग्यविधाता भागा फिरता
कौन न जिसने जी भर मारा
१९-५-२०२०
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अभिनव प्रयोग:
प्रस्तुत है पहली बार खड़ी हिंदी में बृजांचल का लोक काव्य भजन जिकड़ी
जय हिंद लगा जयकारा
(इस छंद का रचना विधान बताइए)
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भारत माँ की ध्वजा, तिरंगी कर ले तानी।
ब्रिटिश राज झुक गया, नियति अपनी पहचानी।। ​​​​​​​​​​​​​​
​अधरों पर मुस्कान।
गाँधी बैठे दूर पोंछते, जनता के आँसू हर प्रात।
गायब वीर सुभाष हो गए, कोई न माने नहीं रहे।।
जय हिंद लगा जयकारा।।
रास बिहारी; चरण भगवती; अमर रहें दुर्गा भाभी।
बिन आजाद न पूर्ण लग रही, थी जनता को आज़ादी।।
नहरू, राजिंदर, पटेल को, जनगण हुआ सहारा
जय हिंद लगा जयकारा।।
हुआ विभाजन मातृभूमि का।
मार-काट होती थी भारी, लूट-पाट को कौन गिने।
पंजाबी, सिंधी, बंगाली, मर-मिट सपने नए बुने।।
संविधान ने नव आशा दी, सूरज नया निहारा।
जय हिंद लगा जयकारा।।
बनी योजना पाँच साल की।
हुई हिंद की भाषा हिंदी, बाँध बन रहे थे भारी।
उद्योगों की फसल उग रही, पञ्चशील की तैयारी।।
पाकी-चीनी छुरा पीठ में, भोंकें; सोचें: मारा।
जय हिंद लगा जयकारा।।
पल-पल जगती रहती सेना।
बना बांग्ला देश, कारगिल, कहता शौर्य-कहानी।
है न शेष बासठ का भारत, उलझ न कर नादानी।।
शशि-मंगल जा पहुँचा इसरो, गर्वित हिंद हमारा।।
जय हिंद लगा जयकारा।।
सर्व धर्म समभाव न भूले।
जग-कुटुंब हमने माना पर, हर आतंकी मारेंगे।
जयचंदों की खैर न होगी, गाड़-गाड़कर तारेंगे।।
आर्यावर्त बने फिर भारत, 'सलिल' मंत्र उच्चारा।।
जय हिंद लगा जयकारा।।
६.७.२०१८
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एक शे'र
चतुर्वेदी को मिला जब राह में कोई कबीर
व्यर्थ तत्क्षण पंडितों की पंडिताई देख ली
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सुना रहा गीता पंडित जो खुद माया में फँसा हुआ
लेकिन सारी दुनिया को नित मुक्ति-राह बतलाता है.
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दोहा सलिला
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देव लात के मानते, कब बातों से बात
जैसा देव उसी तरह, पूजा करिए तात
*
चरण कमल झुक लात से, मना रहे हैं खैर
आये आम चुनाव क्या?, पड़ें पैर के पैर
*
पाँव पूजने का नहीं, शेष रहा आनंद
'लिव इन' के दुष्काल में, भंग हो रहे छंद
*
पाद-प्रहार न भाई पर, कभी कीजिए भूल
घर भेदी लंका ढहे, चुभता बनकर शूल
*
'सलिल न मन में कीजिए, किंचित भी अभिमान
तीन पगों में नाप भू, हरि दें जीवन-दान
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मुक्तिका
कल्पना की अल्पना से द्वार दिल का जब सजाओ
तब जरूरी देखना यह, द्वार अपना या पराया?
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छाँह सर की, बाँह प्रिय की. छोड़ना नाहक कभी मत
क्या हुआ जो भाव उसका, कुछ कभी मन को न भाया
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प्यार माता-पिता, भाई-भगिनी, बच्चों से किया जब
रागमय अनुराग में तब, दोष किंचित भी न पाया
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कौन क्या कहता? न इससे, मन तुम्हारा हो प्रभावित
आप अपनी राह चुन, मत करो वह जो मन न भाया
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जो गया वह बुरा तो क्यों याद कर तुम रो रहे हो?
आ रहा जो क्यों न उसके वास्ते दीपक जलाया?
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मुक्तिका
जिनसे मिले न उनसे बिछुड़े अपने मन की बात है
लेकिन अपने हाथों में कब रह पाये हालात हैं?
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फूल गिरे पत्थर पर चोटिल होता-करता कहे बिना
कौन जानता, कौन बताये कहाँ-कहाँ आघात है?
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शिकवे गिले शिकायत जिससे उसको ही कुछ पता
रात विरह की भले अँधेरी उसके बाद प्रभात है
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मिलने और बिछुड़ने का क्रम जीवन को जीवन देता
पले सखावत श्वास-आस में, यादों की बारात है
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तन दूल्हे ने मन दुल्हन की रूप छटा जब-जब देखी
लूट न पाया, खुद ही लुटकर बोला 'दिल सौगात है'
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मुहावरेदार दोहे
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पाँव जमाकर बढ़ 'सलिल', तभी रहेगी खैर
पाँव फिसलते ही हँसे, वे जो पाले बैर
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बहुत बड़ा सौभाग्य है, होना भारी पाँव
बहुत बड़ा दुर्भाग्य है, होना भारी पाँव
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पाँव पूजना भूलकर, फिकरे कसते लोग
पाँव तोड़ने से मिटे, मन की कालिख रोग
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पाँव गए जब शहर में, सर पर रही न छाँव
सूनी अमराई हुई, अश्रु बहाता गाँव
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जो पैरों पर खड़ा है, मना रहा है खैर
धरा न पैरों तले तो, अपने करते बैर
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सम्हल न पैरों-तले से, खिसके 'सलिल' जमीन
तीसमार खाँ भी हुए, जमीं गँवाकर दीन
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टाँग अड़ाते ये रहे, दिया सियासत नाम
टाँग मारते वे रहे, दोनों है बदनाम
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टाँग फँसा हर काम में, पछताते हैं लोग
एक पूर्ण करते अगर, व्यर्थ न होता सोग
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बिन कारण लातें न सह, सर चढ़ती है धूल
लात मार पाषाण पर, आप कर रहे भूल
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चरण कमल कब रखे सके, हैं धरती पर पैर?
पैर पड़े जिसके वही, लतियाते कह गैर
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धूल बिमाई पैर का, नाता पक्का जान
चरण कमल की कब हुई, इनसे कह पहचान?
१९-५-२०१६
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दोहा सलिला:
दोहा के रंग आँखों के संग ४
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आँख न रखते आँख पर, जो वे खोते दृष्टि
आँख स्वस्थ्य रखिए सदा, करें स्नेह की वृष्टि
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मुग्ध आँख पर हो गये, दिल को लुटा महेश
एक न दो, लीं तीन तब, मिला महत्त्व अशेष
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आँख खुली तो पड़ गये, आँखों में बल खूब
आँख डबडबा रह गयी, अश्रु-धार में डूब
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उतरे खून न आँख में, आँख दिखाना छोड़
आँख चुराना भी गलत, फेर न, पर ले मोड़
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धूल आँख में झोंकना, है अक्षम अपराध
आँख खोल दे समय तो, पूरी हो हर साध
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आँख चौंधियाये नहीं, पाकर धन-संपत्ति
हो विपत्ति कोई छिपी, झेल- न कर आपत्ति
*
आँखें पीली-लाल हों, रहो आँख से दूर
आँखों का काँटा बनें, तो आँखें हैं सूर
*
शत्रु किरकिरी आँख की, छोड़ न कह: 'है दीन'
अवसर पा लेता वही, पल में आँखें छीन
*
आँख बिछा स्वागत करें,रखें आँख की ओट
आँख पुतलियाँ मानिये, बहू बेटियाँ नोट
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आँखों का तारा 'सलिल', अपना भारत देश
आँख फाड़ देखे जगतं, उन्नति करे विशेष
१९-५-२०१५

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