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सोमवार, 12 जनवरी 2026

जबलपुर, इतिहास, नाटक, बंगाली समाज, दिव्येन्दु गांगुली, श्याम खत्री, कचनार, मिलन,

जबलपुर में नाटक 
डार्केस्ट आवर में चर्चिल के हिन्दी संवाद को विश्वसनीय बनाने वाले
दिव्येन्दु गांगुली की उतार चढ़ाव वाली यात्रा इतनी आसान नहीं रही
नेटफ्लिक्स में इन दिनों एक फ‍िल्म डार्केस्ट आवर (Darkest Hour) देखने वालों की संख्या में अचानक इज़ाफा हो गया है। इसका कारण यह फ‍िल्म अब हिन्दी में डब हो गई। Darkest Hour में गैरी ओल्डमैन ने विंस्टन चर्चिल का किरदार निभाया है, जिसमें मई 1940 में यूके के प्रधानमंत्री के तौर पर उनके शुरुआती अहम दिनों पर फोकस किया गया है, जब उन्हें यह तय करना था कि हिटलर के साथ शांति के लिए बातचीत करें या लड़ें। और आखिर में उन्होंने प्रेरणादायक भाषणों से देश को एकजुट किया, जिसमें मशहूर "हम समुद्र तटों पर लड़ेंगे" वाली लाइन भी शामिल है, जो ब्रिटेन के "सबसे मुश्किल समय" के दौरान उनके पक्के इरादे को दिखाती है। इस रोल के लिए ओल्डमैन को बेस्ट एक्टर का एकेडमी अवॉर्ड मिला, और फिल्म में भारी दबाव के बावजूद उनके साहसी नेतृत्व को दिखाया गया है।
Darkest Hour में चर्चिल की भूमिका के मुख्य पहलू के तौर पर संकट में नेतृत्व, संसद में दिए गए भाषण और फिल्म के अंत में संसद में दिया गया साहसी भाषण महत्वपूर्ण है। गैरी ओल्डमैन ने शानदार परफॉर्मेंस, जिसमें मेकअप और प्रोस्थेटिक्स शामिल हैं, ने उन्हें काफी तारीफ और ऑस्कर दिलाया। हिन्दी में इसका डब संस्करण लोकप्रिय हो रहा है। चर्चिल के हिन्दी संवाद इतने विश्वसनीय लगते हैं जैसे वे स्वयं या गैरी ओल्डमैन बोल रहे हों। गैरी ओल्डमैन को हिन्दी में डब जबलपुर के दिव्येन्दु गांगुली (दिनपाल गांगुली) ने किया है। दिव्येन्दु गांगुली की लिप-सिंकिंग (lip-syncing) इतनी शानदार है कि महसूस व अनुभव होता है कि हम मूल भाषा में डार्केस्ट आवर को को देख रहे हैं।
दिव्येन्दु गांगुली की जबलपुर से मुंबई तक की यात्रा इतनी आसान नहीं रही। उनका जीवन औपन्यासिक है।
जबलपुर में स्वतंत्रता के बाद से आठवें दशक तक रंगकर्म की दो दुनिया थी। शहर में मुख्य धारा में मराठी व हिन्दी का रंगकर्म उफान भरता था तो शहर के पूर्वी हिस्से में घमापुर से रक्षा संस्थानों तक बंगला रंगकर्म का दबदबा था। यह भी सत्य है कि हिन्दी रंगकर्म पर बंगला रंगकर्म का ज्यादा असर था। हिन्दी नाटकों के निर्देशक श्याम खत्री मराठी व बंगला के मूल नाटकों से प्रभावित थे लेकिन उन्होंने कल्पनाशीलता दिखाते हुए हिन्दी नाटकों को स्थापित कर रहे थे। शहर के पूर्वी हिस्से में रामलीला के साथ जात्रा का मंचन समान रूप से होता था। रामलीला के कलाकार जात्रा से रंगकर्म की बारीकियां सीख रहे थे। रामलीला के कलाकार धीरे धीरे जात्रा में भी भाग लेने लगे। दरअसल उस समय बंगाल से कई परिवार जबलपुर आजीविका की तलाश में यहां आए। यहां उन्होंने सुरक्षा संस्थानों के साथ रेलवे और बर्न कंपनी में नौकरी करना शुरू कर दी। इन बंगला परिवार के साथ वहां की संस्कृति जबलपुर पहुंची। बंगाल से आए अध‍िकांश परिवार ने नौकरी करने वाले संस्थानों के निकट ही अपना बसेरा बनाया। जबलपुर में घमापुर से डिफेंस संस्थानों के बीच के क्षेत्र बाई का बगीचा, शीतलामाई, कांचघर, सतपुला, व्हीकल फेक्टरी, गन केरिज फेक्टरी, रांझी, आर्डनेंस फेक्टरी व खमरिया में बंगला के साथ पूर्वी उत्तरप्रदेश व बिहार के परिवार रहवासी बने। उत्तर प्रदेश व बिहार के परिवार पर बंगला संस्कृति का प्रभाव था।
कुछ इसी तरह व्योमकेश गांगुली ने ढाका से देशांतर गमन करते हुए जबलपुर पहुंचे। वे बी. एससी (टेक) पास थे और ढाका की ढाकेश्वरी कपड़ा मिल में काम किया करते थे। उनकी डि‍ग्री इंजीनियरिंग के समकक्ष थी। बंगला समाज में इस ड‍िग्री को बड़े सम्मान से देखा जाता था। व्योमकेश गांगुली एक अच्छे अभि‍नेता होने के साथ उत्कृष्ट गायक भी थे। ढाका में नौकरी के साथ शौकिया रूप से नाटकों में काम करने लगे। लोगों के कहने पर वे कलकत्ता की फिल्म इंडस्ट्री पहुंच कर अभ‍िनय के मौके तलाश करने लगे। उनके पिता उस समय जबलपुर की सेंट्रल जेल में ड‍िप्टी जेलर थे। अंग्रेजों के समय जेलर थे और परिवार व कुल की चिंता उनके लिए सर्वोच्च थी। जब उन्हें बेटे व्योमकेश की फिल्म लाइन में जाने की बात की जानकारी हुई तो वे खफ़ा हुए। पिता ने पुत्र को फटकार हुए कहा कि वे पिता व कुल का नाम डुबा रहे हैं। पुत्र को जबर्दस्ती जबलपुर बुलवा कर विवाह के बंधन में बांध दिया। जबलपुर आ कर व्योमकेश इंजीनियर से क्लर्क बन गए। जबलपुर की बिजली वितरण कंपनी मार्टिन एन्ड बर्न कंपनी में बाबू बन कर उनकी उनकी दिनचर्या सुबह से शाम तक ऑफ‍िस में ही सिमट गई।
जबलपुर के कांचघर क्षेत्र में रहने वाले व्योमकेश गांगुली के दिल में नाटक हिलोरे भरता रहता था। समय मिलने पर वे घर में नाटक करते थे। मोहल्ले में साथ‍ियों के साथ बंगला नाटकों को मंचित करते थे। दुर्गोत्सव में उनका नाटकों का मंचन करने का उत्साह देखते ही बनता था। उस समय तक उनके बड़े पुत्र दिव्येन्दु की प्राथमिक श‍िक्षा रेलवे सराय स्कूल में शुरू हो चुकी थी। घर में प्यार से दिव्येन्दु को टूटु पुकारा जाता था। टूटु को अपने पिता को नाटक करते देखना अच्छा लगता था। पुत्र पिता के चरणों में चलने लगा। पिता के दोस्त आईटीसी में कार्यरत रवीन्द्र भट्टाचार्य थे। लोग उन्हें प्यार से काकू कहा करते थे। पिता के साथ दिव्येन्दु को रवीन्द्र भट्टाचार्य के रूप में एक गुरू भी मिल गया। दिव्येन्दु को जब भी मौका मिलता वे अपने गुरू से अभ‍िनय से ले कर संवाद अदायगी तक सब कुछ जानने के लिए उत्कंठित रहते। मिडिल स्कूल की पढ़ाई के लिए दिव्येन्दु का दाख‍िला सेंट थामस में करा दिया गया। उस समय तक दिव्येन्दु फैंसी ड्रेस में भाग लेने लगे, लेकिन उनकी इच्छा तो नाटक में अभ‍िनय करने की थी। उसी समय दुर्गोत्सव में उनहोंने मोहल्ले में एक बाल नाटक में अभ‍िनय करने का मौका मिल ही गया। पिता ने जब उनको नाटक में अभ‍िनय करते देखा तो वे बहुत खुश हुए। छोटे बच्चों के एक समूह ने उस समय ‘स्वप्न खुड़ो’ नाम के एक नाटक को मंचित किया। दिव्येन्दु ने नाटक की रिहर्सल से ले कर मंचन तक हर क्षण का आनंद उठाया। जब उनका मेकअप किया जा रहा था तब तो वे इतने आनंदित थे और उस समय उनको देखने वाले हर व्यक्त‍ि को महसूस हो रहा था कि जैसे दिव्येन्दु को पूरी जिंदगी की खुशी ही मिल गई हो। दुर्गोत्सव में बंगला नाटक के साथ हिन्दी नाटकों के मंचन की परम्परा शुरू हुई। नवमी के दिन हिन्दी नाटकों का मंचन किया जाने लगा। ये हिन्दी नाटक मूल बंगला नाटकों के हिन्दी रूपांतरण हुआ करते थे।
दिव्येन्दु गांगुली ने हायर सेकेंडरी की पढ़ाई पूरी करने के बाद राबर्टसन कॉलेज में एडमिशन ले लिया। उसी समय उनकी मित्रता गौरीशंकर यादव से हुई। गौरीशंकर उनके मोहल्ले में ही रहा करते थे। दोनों नाटकों से जुड़ा रहना चाहते थे। उनको दुर्गोत्सव में होने वाले और साल में एक बार होने वाले नाटकों के मंचन से संतुष्ट‍ि नहीं मिलती थी। दिव्येन्दु ने दुर्गोत्सव में बंगला नाटकों को हिन्दी में अनुवाद कर उनको मंचित करना शुरू कर दिया था। वे चाहते थे कि हिन्दी में भी बंगला नाटकों की तरह नाटक मंचित होने चाहिए। उस समय हिन्दी स्क्र‍िप्ट मिलने की समस्या थी। दिव्येन्दु ने सोचा कि बेहतर है कि बंगला नाटकों का हिन्दी में अनुवाद किया जाए और उन्हें ही मंचित किया जाए। दिव्येन्दु व गौरीशंकर यादव नाटकों में ही आगे बढ़ना चाहते थे। कई बार गौरीशंकर यादव दिव्येन्दु से कहते थे कि डगर कठिन है लेकिन हम लोग हौंसला नहीं खोएंगे। दोनों को आगे की राह दिखाने वाले के रूप में धर्मराज जायसवाल मिल गए। धर्मराज जायसवाल का प्रतिभा कला मंदिर परिवार नियोजन और अन्य सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए मध्यप्रदेश के गांव गांव में घूम घूम कर नाटकों का मंचन करता था। धर्मराज जायसवाल के साथ मनोहर महाजन जैसे कई नवयुवक व कॉलेज विद्यार्थी जुड़े हुए थे। नाटकों को मंचित करते हुए घूमना और खाने पीने की चिंता से मुक्त हो जाने की मुहिम में दिव्येन्दु व गौरीशंकर यादव भी जुड़ गए। दोनों का विचार यह भी था कि इस तरह वे नाटकों की मुख्य धारा में भी जुड़ जाएंगे।
दिव्येन्दु गांगुली की इसी दौरान जबलपुर की प्लाजा टॉकीज के निकट रहने वाले सुशील बंदोपाध्याय के साथ जुड़ाव की शुरूआत हुई। सुशील बंदोपाध्याय की ख्याति एक अच्छे ज्योतिष के रूप में थी, लेकिन नाटकों का मंचन करने में वे सबसे आगे रहते थे। जबलपुर के करमचंद चौक पर स्थि‍त सिटी बंगाली क्लब में बंगला नाटकों का मंचन सक्र‍ियता से होता था। यहां दिव्येन्दु को गुरू रवीन्द्र भट्टाचार्य व सुशील बंदोपाध्याय ने पूरा सहयोग दिया। सुशील बंदोपाध्याय ने बंगला से बाहर जा कर हिन्दी में भी नाटक किए। उस समय श्याम खत्री हिन्दी रंगमंच के सबसे सक्र‍िय निर्देशक के रूप में खूब नाटकों का मंचन कर रहे थे। दिव्येन्दु गांगुली की ख्वाहिश थी कि वे भी श्याम खत्री निर्देश‍ित किसी नाटक में अभ‍िनय करें। दिव्येन्दु को श्याम खत्री के नाटकों की डिजाइनिंग, सेट, स्वाभाविक संवाद और निर्देशन आकर्ष‍ित करता था। आख‍िरकार श्याम खत्री ने दिव्येन्दु को अपने ‘विषपायी’ में एक भूमिका सौंप दी। यह नाटक उस समय जबलपुर का सबसे हिट नाटक रहा। विषपायी के कई शो हाउसफुल गए। दिव्येन्दु का तब तक एक सुदर्शन व्यक्त‍ित्व निखर चुका था। ऐसा माना जाता है कि वे जबलपुर रंगमंच के सर्वकालिक सुदर्शन अभ‍िनेता रहे। दिव्येन्दु की एक खास‍ियत उनकी गहराई ली हुई दमदार आवाज़ भी थी।
श्याम खत्री के नौकरी के सिलसिले में जबलपुर से बाहर जाने पर उनके कलाकारों ने सत्तर के दशक में कचनार संस्था गठित कर नाटकों का मंचन शुरू किया। कचनार का गठन इस वायदे के साथ किया गया था कि प्रत्येक माह एक नए नाटक का मंचन किया जाएगा। उस दौरान कचनार संस्था ने अपनी सक्र‍ियता से जबलपुर में हलचल मचा दी। यही वह समय था जब दिव्येन्दु गांगुली नाटकों के अनुवाद के प्रति आकर्ष‍ित हुए। उन्होंने बंगला के नाटकों का हिन्दी अनुवाद शुरू किया। उस समय उनकी उम्र महज 21 या 22 वर्ष थी। बंगला नाटक इराव मानुष का हिन्दी में 'ये भी इंसान है' और उत्ताल तरंग का हिन्दी में 'ज्वार भाटा' नाम से रूपांतरण किया। इन दोनों नाटकों में दिव्येन्दु गांगुली ने अभ‍िनय भी किया। नाटकों में उनके साथ उस समय के मशहूर अभ‍िनेता कुमार किशोर भी अभ‍िनय करते थे। कुमार किशोर की विशेषता यह थी कि वे किसी भी बंगला नाटक को देख कर पूरी रात भर में उसकी हिन्दी स्क्र‍िप्ट तैयार कर लेते थे। कुमार क‍िशोर ने रमेन दत्ता निर्देश‍ित बंगला नाटक रक्ते सआ धान को देख कर हिन्दी में ‘खून में बोई धान’ की स्क्र‍िप्ट एक रात भर में लिखी थी। दिव्येन्दु बंगला नाटकों के हिन्दी रूपांतरण को मिल रही सफलता से उत्साहित हुए। उन्होंने शैलेश गुहा नियोगी के शताब्दी गान का हिन्दी रूपांतरण किया। इसके बाद वे अजितेश बंदोपाध्याय के बंगला नाटकों के प्रति आकर्ष‍ित हुए। अजितेश बंदोपाध्याय ने चेखव के Swan Song का बंगला में अनुवाद किया था। इस बंगला अनुवाद को दिव्येन्दु गांगुली ने हिन्दी में 'वो दिन रंग बिरंगे' नाम से रूपांतरित किया। यह हिन्दी रूपांतरण इतना लोकप्रिय हुआ कि इसकी स्क्र‍िप्ट अभी तक नाट्य समूह के बीच मंचन के लिए घूमती रहती है। इसे रेड‍ियो नाटक के रूप में भी खूब प्रस्तुत किया गया। जबलपुर में लक्ष्मेन्द्र चोपड़ा इसको प्रोड्यूस करते थे। दिव्येन्दु गांगुली ने अजितेश बंदोपाध्याय के एक बंगला नाटक का 'तम्बाकू के दुष्परिणाम' नाम से रूपांतरण किया था, जो कि रेड‍ियो नाटक के रूप में लोकप्रिय हुआ। उन्होंने बंगला नाटक ‘तृतीय कंठ’ का हिन्दी अनुवाद किया। इस नाटक को जबलपुर के रंगमंच में सफलता के साथ प्रस्तुत किया गया। इस नाटक में मुख्य भूमिका कुमार क‍िशोर ने निभाई थी और कंठ के रूप में कामता मिश्रा व दिव्येन्दु गांगुली की आवाज़ें थीं। यह एक प्रायोगिक नाटक था।
दिव्येन्दु गांगुली का बंगला नाटकों के हिन्दी रूपांतरण के साथ मंच पर अभ‍िनय की सक्र‍ियता भी बनी रही। उन्होंने अपने नाट्य गुरू रवीन्द्र भट्टाचार्य से नाटकों को एडिट करना सीखा। डा. शंकर शेष के नाटक फंदी को दिव्येन्दु ने एडिट कर के प्रस्तुत किया। वर्ष 1974 में दिव्येन्दु गांगुली और प्रभात मित्रा ने मिलकर जबलपुर में एक नाट्य संस्था 'अनुराग' बनाई। उसी समय दिव्येन्दु गांगुली, कामता मिश्रा, गौरीशंकर यादव, कुमार किशोर, प्रभात मित्रा, आर. खान व सुरेश बाथरे के विचार में जबलपुर नाट्य संघ के गठन की बात आई। जबलपुर में नाट्य गतिव‍िध‍ि जोरों पर थीं। मिलन संस्था त्रिभाषीय लघु नाट्य प्रतियोगिता का आयोजन करता था, जिसमें हिन्दी, बंगला व मराठी भाषा के नाटकों का मंचन होता था। इस प्रतियोगिता की अवधारणा इलाहाबाद नाट्य प्रतियोगिता की ही तरह की थी। 8 व 9 फरवरी 1975 को जबलपुर जिला नाट्य संघ द्वारा प्रथम नाट्य महोत्सव का आयोजन महाराष्ट्र हाई स्कूल के मनोहर प्रेक्षागृह के हर्षें रंगमंच पर किया गया। दिव्येन्दु गांगुली ने 'अनुराग' संस्था की ओर से इस नाट्य महोत्सव में 'वो दिन रंग बिरंगे' की प्रस्तुति दी।
दिव्येन्दु गांगुली ‘वो दिन रंग बिरंगे’ की प्रस्तुति को ले कर काफ़ी उत्तेजित थे। वे स्वयं रजनी चटर्जी और प्रभात मित्रा कालीनाथ की भूमिका में थे। रवीन्द्र भट्टाचार्य ने निर्देशन में पूरी जान लगा दी थी। नाटक का पूरा ऑड‍ियो आधुनिकतम माने जाने वाले कैरव्ज स्टूडियो में तैयार किया गया। मन्नूलाल पुजारी जैसे जबलपुर के निर्देशक मेकअप करने को तैयार हो गए थे। बैक स्टेज में संगीतज्ञ बसंत त‍िमोथी, सोहन पांडे राजेश तिवारी, आकाशवाणी में उद्घोषक रहे जितेन्द्र महाजन, सुभाष पात्रो जैसे गुणी लोग थे। अलखनंदन जैसे निर्देशक बैक स्टेज में थे। ‘अनुराग’ की पूरी टीम नाटक के मंचन को ले कर उतावली थी। उसी समय जबलपुर रंगमंच के दो बड़े कलाकार राजेन्द्र दुबे व मिर्जा अजहर बेग का असामयिक निधन हो गया। जबलपुर की रंग संस्थाएं व रंगकर्मी ऐसे समय में नाट्य महोत्सव का आयोजन करने से हिचक रहे थे। आम राय बन रही थी कि नाट्य महोत्सव को स्थगित कर दिया जाए। नाट्य महोत्सव के स्थगित होने की जानकारी से दिव्येन्दु गांगुली लगभग निराश हो गए। उन्हें महसूस हुआ कि नाट्य मंचन को ले कर जो रफ़्तार बनी थी वह भविष्य में रह पाएगी कि नहीं। काफ़ी जद्दोजहद के बाद अंत में सब ने यह समाधान निकाला कि नाट्य महोत्सव को राजेन्द्र दुबे व मिर्जा अजहर बेग को समर्पित कर नाटकों का मंचन किया जाए।
वो दिन रंग बिरंगे का मंचन हुआ। दर्शकों को रजनी चटर्जी की भूमिका में दिव्येन्दु गांगुली का अभ‍िनय और नाटक का कथ्य दोनों बहुत पसंद आया। सत्तर के दशक के हिसाब से नाटक की विषयवस्तु बिल्कुल नई थी। एक कलाकार जीवन संध्या में अपने अतीत को याद करता है। नाटक के माध्यम से कलाकार ने समाज से कई सवाल उठाए थे। इस नाट्य महोत्सव में दिव्येन्दु गांगुली ने विश्वभावन देवलिया निर्देश‍ित ‘हयवदन’ में भागवत की भूमिका निभाई थी। नाटक में उस समय जबलपुर रंगमंच के बड़े कलाकार गोविंद मिश्रा, कुमार किशोर, कामता मिश्रा, गौरीशंकर यादव, प्रभात मित्रा, सिंधु गडकरी, पुष्पा श्रीवास्तव ने अभि‍नय किया था। बाल कलाकारों में मधुसूदन नागराज, अरूणा काले, न‍िध‍ि द्वि‍वेदी थीं। हयवदन की व‍िश‍िष्टता सतीश तिवारी का संगीत था। नाटक में आभा तिवारी ने सितार, तेजराज मावजी ने सेक्साफोन क्लारीनेट, रत्नाकर कुंडले ने वायलिन और अल्हाद पंड‍ित ने तबले पर ऐसा संगीत रचा था जिसकी नाट्य प्रस्तुतियों में कल्पना नहीं की जा सकती। श्याम श्रीवास्तव ने बन आई सोन चिरैया, उजले से घोड़े पे होके सवार, चंदन डुलिया बैठी रे दुल्हनियां व तन मन को बांधे क्यों सिर्फ एक देह के साथ जैसे गीत नाटक के लिख दिए। हयवदन में दिव्येन्दु गांगुली ने आंगिक, वाचिक, सात्व‍िक और आहार्य अभ‍िनय के सिद्धांतों को मंच पर प्रस्तुत किया। जबलपुर का रंगकर्म कितना आगे था यह इससे पता चलता है कि 1973 में 20 व 21 अक्टूबर को कचनार संस्था ने मध्यप्रदेश में पहली बार ‘हयवदन’ का मंचन किया था। नाटक का ब्रोशर चौबीस पृष्ठ का था।
उस समय जबलपुर में साहित्य, कला, सांस्कृतिक वातावरण जबर्दस्त था। कलाकारों में अभ‍िनय की होड़ थी तो नाटकों को अन्य भारतीय भाषाओं से हिन्दी में रूपांतरित करने की प्रतिस्पर्धा भी। ज्ञानरंजन के संपादन में पहल का प्रकाशन शुरू हो चुका था। रंगकर्मी रात में एक स्थान पर एकत्र‍ित हो कर पहल में छपी कहानियों या विचारोत्तेजक लेखों का पाठ करते थे और उसे रंगकर्मी शांति से बैठ कर सुन कर उन पर लंबी-लंबी बहसें किया करते थे। ऐसी कई बैठकों का दिव्येन्दु अभ‍िन्न हिस्सा हुआ करते थे। उस दौरान उन्होंने रेड‍ियो नाटक में काम किया। उस समय जबलपुर के सीनियर रेलवे इंस्टीट्यूट में एक रेड‍ियो नाटक को लाउड स्पीकर के जरिए लोगों को सुनाया गया। उस समय जबलपुर आकाशवाणी से रेड‍ियो नाटकों का खूब प्रसारण हुआ।
दिव्येन्दु गांगुली को कॉलेज की पढ़ाई के बाद ड‍िफेंस अकाउंट में नौकरी मिल गई। उस समय ड‍िफेंस अकाउंट में जबलपुर के रंगकर्मी मनोहर कुंभोजकर, अलखनंदन, तपन बैनर्जी, रूद्रदत्त दुबे, हिमांशु राय भी नौकरी किया करते थे। दिव्येन्दु गांगुली ने नौकरी के बाद मिले समय का उपयोग हिन्दी अनुवाद व रूपांतरण में करने लगे। उन्होंने इन कामों में शोध के जरिए विषयवस्तु तो वही रखी लेकिन भाषा को सहज बनाया। इस दौरान दिव्येन्दु ने अलखनंदन ल‍िखि‍त शीर्षकहीन नाटक में भूमिका निभाते हुए उसे निर्देश‍ित भी किया। जबलपुर में आधुनिक नाटकों के मंचन की शुरूआत हो चुकी थी ऐसे समय उन्होंने 1982 में अपना तबादला बंबई करवा लिया। वे पेशेवर तरीके से थ‍िएटर करना चाहते थे। बंबई में वे इप्टा से जुड़ गए। फ‍िल्मों में कुछ अनुभव अच्छे नहीं रहे। टीवी सीरियल राग दरबारी में उन्होंने भूमिका निभाई। बंबई में उनकी मुलाकात जबलपुर के ही मनोहर महाजन से हुई। मनोहर महाजन रेड‍ियो सिलोन से जुड़ कर लोकप्रियता हासिल कर रहे थे। दिव्येन्दु की वॉयसिंग में रूचि थी। मनोहर महाजन ने इस क्षेत्र में उनकी मदद व मार्गदर्शन किया। दिव्येन्दु फ‍िल्म डि‍वीजन में कमेन्ट्री करने लगे। बंबई में भी उन्होंने बंगला से हिन्दी व अंग्रेजी में रचनात्मक अनुवाद व रूपांतरण किया। विज्ञापन की दुनिया में वॉयसिंग में काम किया। कई फ‍िल्मों में डबिंग की। सुदर्शन व्यक्त‍ित्व के कारण उन्होंने मॉडलिंग भी की। एक डॉक्यूमेंट्री में दिव्येन्दु ने विंस्टल चर्चिल का वॉयस ओवर किया। ब्रुक बांड चाय का कुंभ मेले के दौरान बनाए गए एक विज्ञापन में दादा जी के चरित्र में उनकी आवाज़ के उतार चढ़ाव को विज्ञापन जगत के साथ उस विज्ञापन को देखने वालों ने भी बहुत सराहा।
दिव्येन्दु का अब नाम दिनपाल गांगुली हो चुका है। मुंबई की दुनिया में वे इसी नाम से विख्यात हैं। नाम बदलने की एक कहानी है। बंबई में दिव्येन्दु का नाम हर समय गलत ढंग से लिखा जाता था। नाम गलत लिखने या बोलने से वे परेशान हो गए। दिव्येन्दु का अर्थ चंद्रमा होता है। उन्होंने सोचा कि दिव्येन्दु से वे अपना नाम सूरज के पर्यायवाची दिनपाल में परिवर्तित कर लेते हैं। तब से वे दिव्येन्दु से दिनपाल गांगुली बन गए।
दिव्येन्दु गांगुली ने श्याम बेनेगल द्वारा राज्यसभा टीवी के लिए निर्देश‍ित संविधान फ‍िल्म में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कुछ साल पहले केड्बरि के बंगला संस्करण के विज्ञापन में दिव्येन्दु की आवाज़ का उपयोग एक वृद्ध चरित्र दामोदर के लिए किया गया। वे अभी भी विज्ञापनों की दुनिया, डबिंग, वॉयस ओवर, अभ‍िनय में सक्र‍िय हैं। इस दुनिया में उनकी बहुत प्रतिष्ठा है। दिव्येन्दु की बेटी सुमिता भी पिता की तरह मनोरंजन इंडस्ट्री में हैं। वे डिस्नेस्टार और कई इस तरह के प्लेटफार्म के लिए अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद व ट्रांसस्क्र‍िप्ट का काम लगातार कर रही हैं। दामाद फिल्म एडीटर हैं।
व्योमकेश गांगुली की तीसरी पीढ़ी उनके बताए रास्ते पर चल रही है। व्योमकेश गांगुली जब कलकत्ता में एक अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती थे, तब एक उनके एक दर्शक ने देख कर कहा था-‘’अरे यह तो एक्टर व्योमकेश बाबू हैं।‘’ शायद उस समय यह क्षण उनके पिता के लिए कष्ट वाला रहा होगा लेकिन उस वक्त उनके चेहरे पर यह संतुष्ट‍ि का भाव था कि मृत्यु के समय उन्हें एक अभ‍िनेता के रूप में पहचाना गया।
आज भी टूटु या दिव्येन्दु या दिनपाल के दिल में जबलपुर धड़कता है। उन्हें याद आता है कि वे कैसे झुंड में घंटों खड़े हो कर दोस्तों व रंगकर्मियों के साथ मालवीय चौक, श्याम टॉकीज, शहीद स्मारक में अपना समण् बिताते थे। वे लोग देर रात कैसे नाटकों और पात्रों को ले कर बहस किया करते थे। जबलपुर उनको अपनी ओर खींचता रहता है। वे गुरू पूर्ण‍िमा के दिन अपने गुरू रवीन्द्र भट्टाचार्य और जबलपुर को याद करते हैं। जब मौका मिलता है दिव्येन्दु मुंबई से जबलपुर दौड़ कर चले आते हैं। वे कोई मौका चूकना नहीं चाहते।

शुक्रवार, 5 दिसंबर 2025

दिसंबर ५, सॉनेट, कबीर, जयललिता, हुर्रेमारा, अलंकार, अतिशयोक्ति, नवगीत, कचनार

 सलिल सृजन दिसंबर ५

*
सॉनेट
कबीर
*
ज्यों की त्यों चादर धर भाई
जिसने दी वह आएगा।
क्यों तैंने मैली कर दी है?
पूछे; क्या बतलायेगा?
काँकर-पाथर जोड़ बनाई
मस्जिद चढ़कर बांग दे।
पाथर पूज ईश कब मिलता?
नाहक रचता स्वांग रे!
दो पाटन के बीच न बचता
कोई सोच मत हो दुखी।
कीली लगा न किंचित पिसता
सत्य सीखकर हो सुखी।
फेंक, जोड़ मत; तभी अमीर
सत्य बोलता सदा कबीर।।
५-१२-२०२१
***
सॉनेट
भोर
*
भोर भई जागो रे भाई!
उठो न आलस करना।
कलरव करती चिड़िया आई।।
ईश-नमन कर हँसना।
खिड़की खोल, हवा का झोंका।
कमरे में आकर यह बोले।
चल बाहर हम घूमें थोड़ा।।
दाँत साफकर हल्का हो ले।।
लौट नहा कर, गोरस पी ले।
फिर कर ले कुछ देर पढ़ाई।
जी भर नए दिवस को जी ले।।
बाँटे अरुण विहँस अरुणाई।।
कोरोना से बचकर रहना।
पहन मुखौटा जैसे गहना।।
५-१२-२०२१
***
कचनार
हाँगकाँग का राष्ट्रीय, फूल बना कचनार।
बवासीर खाँसी दमा, हरकर दे उपहार।।
कचनार (काँचनार, कराली, बौहिनिया वेरिएगाटा) एक पर्णपाती वृक्ष है जिसमें विशिष्ट तितली के आकार के पत्ते और दिखावटी आर्किड जैसे फूल होते हैं। दक्षिण एशिया का मूल निवासी, यह वृक्ष १२ मीटर की ऊँचाई तक बढ़ता है, जिसमें फैला हुआ मुकुट और हरी-भूरी छाल होती है। इसके सफेद फ़ेद, पीले, लाल रंग के फूल, गुलाबी रंग की धारियों के साथ बेहद खूबसूरत दिखाई देते हैं। संस्कृत में कचनार शब्द का अर्थ है 'एक सुंदर चमकती हुई महिला', जो इस तरह के सुंदर वृक्ष के लिए एक उपयुक्त नाम है। इसे बगीचों और पार्कों में लगाया जाता है। फूलने पर इसका सौंदर्य देखने लायक होता है। दो-लोब वाली पत्तियों की विशेषता के कारण इस वृक्ष को इसका लैटिन नाम बौहिनिया मिला। इसकी पत्तियों के आकार के कारण इसे 'ऊँट के पैर का पेड़' भी कहा जाता है। कचनार मार्च-अप्रैल महीनों में फूलता है। मई-जून में इसकी फलियों में बीज पकते हैं जिन्हें इकट्ठा कर नए पौधे पाए जा सकते हैं। कचनार के पौधे में हेनट्रीकॉन्टेन, ऑक्टाकोसानॉल, साइटोस्टेरॉल और स्टिगमास्टरोल जैसे फाइटोकोन्स्टिट्यूएंट्स होते हैं जो पौधे की एंटीएलर्जिक गुणों में सहायक होते हैं। कचनार की दो प्रजातियाँ होती हैं। एक में सफेद कलर की पुष्प कालिकाएँ आती हैं जबकि दूसरी पर लाल रंग के फूल खिलते हैं। सर्दियों में यह पेड़ गुलाबी रंग के बहुत प्यारे प्यारे फूलों से लद जाता है। कचनार का पेड़ भारत, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड, चीन, वियतनाम, कंबोडिया, लाओस, और इंडोनेशिया आदि देशों में पाया जाता है। भारत में विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, और ओडिशा राज्यों में अधिक पाया जाता है।
कचनार एंटीऑक्सीडेंट, एंटी-हेल्मिंटिक, एस्ट्रिंजेंट, एंटी-लेप्रोटिक, एंटी-डायबिटिक, एंटी-हाइपरग्लाइसेमिक और एंटी-माइक्रोबियल है। यह रक्त शर्करा स्तर को नियंत्रित करने में मदद कर मधुमेह (डायबिटीज) को प्रभावी रूप से प्रबंधित करने में मदद करते हैं। यह क्षय रोग, खाँसी, कफ में रामबाण औषधि का काम करता है। कचनार (बौहिनिया वेरिएगाटा) चयापचय में सुधार करस्टेम वजन घटाने में सहायक होता है। 'ग्रोथ हर्ब' के नाम से प्रसिद्ध कचनार घावों को ठीक कर नई कोशिकाओं के निर्माण को तेज करता है। आयुर्वेद के अनुसार कचनार-चूर्ण का गुनगुने पानी और शहद के साथ सेवन करें तो यह हाइपोथायरॉइड-प्रबंधन में मदद करता है। इस में त्रिदोष संतुलन और दीपन (क्षुधावर्धक) गुण होते हैं। अपने शीत और कसैले गुणों के कारण कचनार त्वचा की समस्याओं जैसे कि कील, मुँहासे आदि के इलाज में बहुत उपयोगी है। कचनार पौधे के यौगिक शरीर में इंसुलिन तंत्र को नियंत्रित कर बढ़ते रक्त शर्करा का स्तर कम करते हैं। मुँह में छाले, मसूड़े में कीड़े सहित जख्म या दुर्गंध हो तो दिन में तीन बार कचनार के पेड़ की छाल का काढ़ा बनाकर, छान कर गरारे करने से राहत मिलती है। कचनार की छाल को अच्छे से पीसकर बना चूर्ण रोज सुबह २ ग्राम पानी के साथ सेवन करने से पेट से संबंधित बीमारियों से भी राहत मिलती है। कचनार की पत्तियों का काढ़ा बनाकर पिएँ तो लिवर से संबंधित समस्याएँ, मधुमेह, रक्तचाप आदि नियंत्रित रहेगा। कचनार-चूर्ण शहद यागुनगुने पानी के साथ सेवन करें, तो उससे थायरायड का समाधान होता है।
कचनार का उपयोग हाइपोथायरायडिज्म के उपचार में किया जाता है। एक क्लासिकल आयुर्वेदिक पॉलीहर्बल औषधि 'कचनार गुग्गुल' हैत्वचा रोग, घाव, सूजन, पेचिश और अल्सर जैसी विभिन्न बीमारियों के इलाज में मदद करता है। यह फ्री रेडिकल्स से लड़ने में मदद करता है, इम्यूनिटी को बढ़ाता है, एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों के कारण सूजन कम करता है। आयुर्वेद के अनुसार, जब शहद के साथ मिलाया जाता है तो यह त्वचा के लिए एक क्लींजिंग एजेंट के रूप में काम कर खुजली, मुँहासे (पिंपल्स) आदि समस्याओं से राहत देता है। इसके कसैले गुणों के कारण त्वचा पर इसका कूलिंग प्रभाव पड़ता है। कचनार गुग्गुल गोली (टैबलेट) का उपयोग थायरॉयड डिसऑर्डर, पीसीओएस, सिस्ट, कैंसर, लिपोमा, फाइब्रॉएड, बाहरी और आंतरिक वृद्धि, त्वचा रोग आदि के लिए किया जाता है। कचनार अपने कषाय (कसैला) और सीत (ठंडा) स्वभाव के कारण प्रभावित क्षेत्र पर लगाने से दाँत दर्द कम करने में मदद करता है। यह बैक्टीरिया के विकास को भी रोकता है जो दाँत दर्द और मुँह से दुर्गंध का कारण बनते हैं। कचनार की पत्तियों में अल्सर रोधी गुण होते हैं और ये लीवर, किडनी की रक्षा करने के साथ ही जीवाणुरोधी गुण भी रखती हैं। मलेरिया बुखार में सिरदर्द से राहत पाने के लिए भारतीय लोग कचनार-पत्तियों के काढ़े का इस्तेमाल करते हैं।
दक्षिण भारत, सिक्किम, बंगाल, बिहार और ओडिशा में इसकी पत्तियों का उपयोग पीलिया के इलाज तथा पेट में घाव और ट्यूमर को ठीक करने के लिए किया जाता है।
संस्कृति और परंपरा: कचनार प्रेम और पर्वोल्लास का पर्याय है। इसके फूलों का उपयोग पारंपरिक समारोहों और सजावट में किया जाता है। कला, साहित्य और धार्मिक प्रतीकवाद में इस पेड़ का सांस्कृतिक महत्व है। बच्चों को इसकी दो खंडीय पत्तियाँ बहुत रोचक लगती हैं और वे इसे अपने खेलों में पुस्तक के रूप में प्रयोग करते हैं। यह पौधा हिंदुओं के लिए पवित्र है, दशहरा पर इसकी पूजा की जाती है। कचनार के सफेद फूलों का उपयोग धन की देवी लक्ष्मी और ज्ञान की देवी सरस्वती की पूजा के लिए किया जाता है। इसकी पत्तियों में १०-१६ प्रतिशत प्रोटीन होने के कारण टहनियों और फलियों का उपयोग पशुओं के चारे के रूप में किया जाता है। हिमाचल प्रदेश के लोकगीतों में कचनार का स्थान महत्वपूर्ण और कालजयी है।
कचनार के फूल को हांगकांग के झंडे और सिक्कों पर दर्शाया गया है।
पर्यावरणीय प्रभाव: यह पेड़ फलीदार परिवार से संबंधित है और राइजोबियम बैक्टीरिया के साथ सहजीवी संबंध में रहता है, जो वायुमंडलीय नाइट्रोजन को ठीक करने और मिट्टी की उर्वरता में सुधार करने में मदद करता है। आर्किड के पेड़ परागणकों के लिए उच्च मूल्य प्रदान करते हैं। लंबी पूँछ वाली स्किपर तितली के लिए मेजबान कचनार के फूल का रस अन्य तितलियों, मधुमक्खियों और पक्षियों सहित कई अन्य परागणकों को आकर्षित करता है। यह चिलाडेस पांडवा - प्लेन्स क्यूपिड के लिए लार्वा मेजबान पौधा है।
भोजन और पाककला में उपयोग : हल्के तीखे स्वाद के कचनार के फूल पारंपरिक व्यंजनों तथा सलाद, स्टर-फ्राई या अचार जैसे व्यंजनों में शामिल किए जाते हैं। झारखंड के आदिवासी समुदाय इस बहुउद्देशीय पेड़ के हर हिस्से का सेवन करते हैं। कचनार के फूल, फल और पत्ते खाने योग्य और पोषण का एक महत्वपूर्ण स्रोत होते हैं। भोजन के बारहमासी स्रोत पत्तियों को करी के रूप में, तलकर या उन्हें थोड़े से नमक के साथ उबालकर चावल के साथ खाया जा सकता है।
मुंडा जनजातीय समुदाय सूखी पत्तियों को कई तरीकों से पकाते हैं। वे इसे गर्म पानी में भिगोकर मिर्च, लहसुन या सूखी मछली या सूखे झींगे या बाँस के अंकुर के साथ चटनी बनाकर या पके हुए चावल के पानी में मसालों के साथ पकाकर भूनते हैं। पत्तियों के चूर्ण (पाउडर) को इडली और कचौरी में भी मिलाया जा सकता है। सूप, चीला और उत्तपम में भी ताज़ी पत्तियों को मिलाया है। इससे व्यंजनों का पोषण मूल्य बढ़ जाता है। उत्तर भारत और नेपाल में "कचनार की काली की सब्जी" बनाने के लिए नई कचनार कलियों का उपयोग किया जाता है। कचनार के फूल और कलियाँ कच्चे होने पर कड़वे लगते हैं। इसका उपयोग अचार में किया जाता है।
गुण - लघु (पचाने में हल्का), रूक्ष (सूखापन), रस (स्वाद) - कषाय (कसैला), विपाक (पाचन के बाद का प्रभाव) - कटु (तीखा), वीर्य - शीतल (शीत), प्रभाव (विशेष प्रभाव) - गंडमाला नशा - सर्वाइकल लिम्फैडेनाइटिस और सभी प्रकार की थायरॉयड जटिलताओं में उपयोगी। त्रिदोष पर प्रभाव - कफ और पित्त से राहत दिलाता है।सोफहारा - सूजन से राहत दिलाता है। स्वराहार - अस्थमा से राहत दिलाता है। रसायन - कायाकल्प। कृमिघ्न - कीड़ों के संक्रमण में उपयोगी। कंदुघ्न- खुजली से राहत दिलाता है।। विशघ्न - विषहरण में उपयोगी। वृनहारा - घावों में उपयोगी। कसहारा-खांसी से राहत दिलाता है। कचनार के एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण बवासीर के कारण होने वाली सूजन और दर्द को कम करने में मदद करते हैं। इससे मल का मार्ग आसान हो जाता है। कचनार की छाल शरीर में कफ दोष की समस्या को ठीक करने में मदद करती है। यह थायरॉयड से हार्मोन के स्तर के संतुलन में असंतुलन को ठीक करने में मदद करता है। ऐसा इसलिए क्योंकि कचनार शरीर से कफ को बाहर निकालने में मदद करती है। कचनार की छाल डाइजेस्टिव सिस्टम को बेहतर बनाने में मदद करती है, यह पेट की समस्याओं को दूर करती है। कचनार के कसैले गुणों का पाचन तंत्र पर ठंडा प्रभाव पड़ता है। कचनार कैंसर कोशिकाओं के विकास को धीमा कर देता है और इस प्रकार कैंसर को रोकता है। कचनार के अर्क में इंसुलिन जैसे केमिकल्स होते हैं जो शुगर लेवल को कम करने और कंट्रोल में लाने में मदद करते हैं। कचनार के फूल शरीर के अंदरुनी घाव को भरने में काफी कारगर होते हैं। कचनार के पेड़ की छाल का पाउडर मुंह में बैक्टीरिया और कीटाणुओं से लड़ने में मदद करता है। यह बैक्टीरिया को मारने और मुँह में पीएच संतुलन बहाल करने में बहुत प्रभावी है। यह मुँह को सांसों की दुर्गंध से प्राकृतिक रूप से मुक्त रखता है। कचनार के कड़वे फूल रक्त शोधक का काम करते हैं। यह महिलाओं के लिए बेहद फायदेमंद है क्योंकि यह पीरियड्स को कंट्रोल करने में मदद करता है। यह ब्लड को साफ करता है और इसलिए शरीर के अन्य आवश्यक अंग, जैसे लिवर को भी साफ करता है। कचनार के फूल खाँसी को ठीक करते हैं और अपने एंटी-बैक्टीरियल गुणों से श्वसन पथ को साफ करते हैं। इसकी कलियाँ व फूल सब्जी, पत्तियाँ पशुओं के चारे के और लकड़ी ईंधन (जलावन) के रूप में प्रयोग होती है। तासीर ठंडी होने के कारण इसे सुखाकर गर्मी में सब्जी, अचार, पकौड़े बनाते हैं। कचनार की कली और फूल वात,रक्त पित, फोड़े, फुंसियों से निजात दिलाती हैं। पहाड़ी गीतों में भी है कराली (कचनार) को पिरोया गया है। १९९३ में बने हिंदी चलचित्र 'वक्त हमारा है' में अक्षय कुमार व आयशा जुल्का पर गीत 'कच्ची कली कचनार की तोड़ी नहीं जाती' का फिल्मांकन है।
इस्तेमाल का तरीका
कचनार की छाल का चूर्ण ३-६ ग्राम,फूलों का रस १०-२० मिलीलीटर और छाल का काढ़ा ४०-८० मिलीलीटर की मात्रा में प्रयोग किया जाता है। इसकी छाल का महीन पिसा-छना चूर्ण ३-६ ग्राम (आधा से एक चम्मच) ठंडे पानी के साथ सुबह-शाम लेना लाभकारी होता है। इसका काढ़ा बनाकर भी सुबह-शाम ४-४ चम्मच मात्रा में (ठंडा करके) एक चम्मच शहद मिलाकर लेना फायदेमंद होता है।
- सूजन: कचनार की जड़ को पानी में घिसकर बनाया लेप गर्म कर सूजन वाली जगह पर लगाए, जल्दी ही आराम मिलेगा।
- मुँह के छाले: कचनार की छाल के काढ़े में थोड़ा-सा कत्था मिलाकार लगाएँ तुरंत आराम मिलता है और छाले जल्दी ठीक हो जाते हैं।
- बवासीर: कचनार की एक चम्मच छाल को एक कप मट्ठा (छाछ) के साथ दिन में ३ बार सेवन करने से बवासीर में खून गिरना बंद हो जाएगा। कचनार की कलियों के पाउडर को मक्खन और शक्कर मिलाकर ११ दिन खाने से पेट के कीड़े साफ हो जाते हैं।
- भूख न लगना: कचनार की फूल की कलियाँ घी में भूनकर सुबह-शाम खाएँ, भूख बढ़ जाएगी।
- वायु( गैस) विकार: कचनार की छाल का काढ़ा बनाकर, इसके २० मिलीलीटर काढ़े में आधा चम्मच पिसी अजवायन मिलाकर नियमित रूप से सुबह-शाम भोजन करने बाद पिएं, पेट फूलने की समस्या और गैस की तकलीफ दूर होती है।
-खांसी-दमा : शहद के साथ कचनार की छाल का काढ़ा २ चम्मच, दिन में ३ बार सेवन करने से खाँसी और दमा में आराम मिलता है।
- दांतों का दर्द: कचनार के पेड़ की छाल जलाकर उसकी राख से सुबह एवं रात को खाना खाने के बाद मंजन करने से दाँत-दर्द तथा मसूढ़ों से खून निकलना बंद होता है। इसकी छाल को उबालने के बाद ५०-५० मिलीलीटर गर्म पसनी से रोजाना ३-४ बार कुल्ला करें, दांतों का हिलना, दर्द, खून निकलना, मसूढों की सूजन और पायरिया खत्म हो जाता है।
- कब्ज: कचनार के फूलों को चीनी के साथ घोटकर शर्बत की तरह बनाकर सुबह-शाम पीने से कब्ज दूर होती है और पेट साफ रहता है। कचनार के फूलों का गुलकन्द रात में सोने से पहले २ चम्मच की मात्रा में कुछ दिनों तक सेवन करने से कब्ज दूर होती है।
- कैंसर: कचनार की छाल का काढ़ा बनाकर पीने से पेट का कैंसर ठीक होता है।
- दस्त: कचनार की छाल का काढ़ा दिन में २ बार पीने से दस्त रोग में ठीक होता है।
- पेशाब के साथ खून आना: कचनार के फूलों का काढ़ा बनाकर सुबह-शाम पीने से पेशाब में खून का आना बंद होता है। इसके सेवन से रक्त प्रदर एवं रक्तस्राव आदि भी ठीक होता है।
- बवासीर: कचनार की छाल का ३ ग्राम चूर्णएक गिलास छाछ के साथ प्रति दिन सुबह-शाम पीने से बवासीर एवं खूनी बवासीर में लाभ मिलता है। कचनार का ५ ग्राम चूर्ण प्रतिदिन सुबह पानी के साथ खाने से बवासीर ठीक होता है।
- खूनी दस्त: कचनार के फूल का काढ़ा सुबह-शाम पीने से खूनी दस्त (रक्तातिसार) में जल्दी लाभ मिलता है।
- कुबड़ापन: पीठ के नीचे कचनार का फूल बिछाकर सुलाने से, लगभग १ ग्राम का चौथाई भाग कचनार और गुग्गुल को शहद के साथ मिलाकर सेवन करने व कचनार का काढ़ा पीने से कुबड़ापन दूर होता है।
- घाव: कचनार की छाल का काढ़ा बनाकर सुबह-शाम पीने से घाव ठीक होता है। इसके काढ़े से घाव को धोना भी चाहिए।
- स्तन-गाँठ: कचनार की छाल पीसकर बना चूर्ण आधे ग्राम की मात्रा में सौंठ और चावल के पानी (धोवन) के साथ मिलाकर पीने और स्तनों पर लेप करने से गाँठ ठीक होती है।
- थायराइड: कचनार के फूल थायराइड की सबसे अच्छी दवा हैं। लिवर में किसी भी तरह की तकलीफ हो तो कचनार की जड़ का काढ़ा पीना बेहद लाभकारी होता है।
ध्यान रखें-
कचनार देर से हजम होती है और इसका सेवन करने से कब्ज हो सकता है। इसलिए जब तक कचनार का सेवन करें, तब तक पपीता खाएँ।
***
दोहांजलि
*
जयललिता-लालित्य को
भूल सकेगा कौन?
शून्य एक उपजा,
भरे कौन?
छा गया मौन.
*
जननेत्री थीं लोकप्रिय,
अभिनेत्री संपूर्ण.
जयललिता
सौन्दर्य की
मूर्ति, शिष्ट-शालीन.
*
दीन जनों को राहतें,
दीं
जन-धन से खूब
समर्थकी जयकार में
हँसीं हमेशा डूब
*
भारी रहीं विपक्ष पर,
समर्थकों की इष्ट
स्वामिभक्ति
पाली प्रबल
भोगें शेष अनिष्ट
*
कर विपदा का सामना
पाई विजय विशेष
अंकित हैं
इतिहास में
'सलिल' न संशय लेश
***
दो द्विपदियाँ - दो स्थितियाँ
*
साथ थे तन न मन 'सलिल' पल भर
शेष शैया पे करवटें कितनी
*
संग थे तुम नहीं रहे पल भर
हैं मगर मन में चाहतें कितनी
***
दोहा सलिला-
कवि-कविता
*
जन कवि जन की बात को, करता है अभिव्यक्त
सुख-दुःख से जुड़ता रहे, शुभ में हो अनुरक्त
*
हो न लोक को पीर यह, जिस कवि का हो साध्य
घाघ-वृंद सम लोक कवि, रीति-नीति आराध्य
*
राग तजे वैराग को, भक्ति-भाव से जोड़
सूर-कबीरा भक्त कवि, दें समाज को मोड़
*
आल्हा-रासो रच किया, कलम-पराक्रम खूब
कविपुंगव बलिदान के, रंग गए थे डूब
*
जिसके मन को मोहती, थी पायल-झंकार
श्रंगारी कवि पर गया, देश-काल बलिहार
*
हँसा-हँसाकर भुलाई, जिसने युग की पीर
मंचों पर ताली मिली, वह हो गया अमीर
*
पीर-दर्द को शब्द दे, भर नयनों में नीर
जो कवि वह होता अमर, कविता बने नज़ीर
*
बच्चन, सुमन, नवीन से, कवि लूटें हर मंच
कविता-प्रस्तुति सौ टका, रही हमेशा टंच
*
महीयसी की श्रेष्ठता, निर्विवाद लें मान
प्रस्तुति गहन गंभीर थी, थीं न मंच की जान
*
काका की कविता सकी, हँसा हमें तत्काल
कथ्य-छंद की भूल पर, हुआ न किन्तु बवाल
*
समय-समय की बात है, समय-समय के लोग
सतहीपन का लग गया, मित्र आजकल रोग
५.१२.२०१६
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देवी दंतेश्वरी के दामाद - हुर्रेमारा
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            दंतेश्वरी देवी और आदिवासी संयोजन की अनेक कहानियों में से एक है उनके दामाद हुर्रेमारा की। आदिवासी मान्यतायें न केवल उन्हें अपने परिवार के स्तर तक जोड़ती हैं अपितु वे देवी के भी बेटे-बेटियों, नाती-पोतों की पूरी दुनिया स्थापित कर देते हैं। देवी के ये परिजन आपस में लड़ते-झगड़ते भी हैं तथा प्रेम-मनुहार भी करते हैं।
            कहते हैं देवी दंतेश्वरी की पुत्री मावोलिंगो को देख कर जनजातीय देव हुर्रेमारा आसक्त हो गए। उन्होंने मावोलिंगो से अपना प्रेम व्यक्त किया। यह प्यार अपनी परिणति तक पहुँचता इससे पहले ही लड़की की माँ अर्थात देवी दंतेश्वरी को इसकी जानकारी मिल गई और उन्होंने अपनी असहमति व्यक्त कर दी। हुर्रेमारा भी कोई साधारण देव तो थे नहीं, उन्होंने कुछ समय तक प्रयास किया कि दंतेश्वरी मान जाएँ और अपनी पुत्री से उनके विवाह को स्वीकारोक्ति प्रदान कर दें। बात न बनते देख वे क्रोधित हो गए। उन्होंने अपनी बात मनवाने की जिद में शंखिनी-डंकिनी नदियों के पानी को ही संगम के निकट रोक दिया। अब जलस्तर बढ़ने लगा और धीरे धीरे देवी दंतेश्वरी का मंदिर डूब जाने की स्थिति निर्मित हो गई। दंतेश्वरी को हार कर हुर्रेमारा की जिद माननी पड़ी। उनकी पुत्री मावोलिंगो से हुर्रेमारा का विवाह सम्पन्न हो गया।
            दामाद हुर्रेमारा जब ससुराल पहुँचे तो उनके अपने ही नखरे थे, तुनक मुजाज हुर्रेमारा हर रोज नई माँग रखते, अपने स्वागत की नई-नई अपेक्षाएँ प्रदर्शित करते और किसी न किसी बात पर झगड़ लेते। एक दिन सास-दामाद अर्थात दंतेश्वरी और हुर्रेमारा में ऐसी बिगड़ी कि दोनों ने एक दूसरे से मिलना बंद कर दिया। यद्यपि देवी के स्थान में हुर्रेमारा की और हुर्रेमारा के स्थान में देवी दंतेश्वरी की विशेष व्यवस्था की जाती है। दंतेवाड़ा से कुछ ही दूर भांसी गाँव के पास एक पहाड़ी तलहटी में हुर्रेमारा का स्थान है जहाँ वे अपनी पत्नी मावोलिंगो व अपने एक पुत्र के साथ रह रहे हैं। इस देव परिवार की अनेक संततियाँ हैं जो निकटस्थ अनेक गाँवों में निवासरत हैं और वहाँ के निवासियों द्वारा सम्मान पाती हैं।
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अलंकार सलिला ३९
अतिशयोक्ति सीमा हनें
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जब सीमा को तोड़कर, होते सीमाहीन
अतिशयोक्ति तब जनमती, सुनिए दीन-अदीन..
बढा-चढ़ाकर जब कहें, बातें सीमा तोड़.
अतिशयोक्ति तब जानिए, सारी शंका छोड़..
जहाँ लोक-सीमा का अतिक्रमण करते हुए किसी बात को अत्यधिक बढा-चढाकर कहा गया हो, वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है।
जहाँ पर प्रस्तुत या उपमेय को बढा-चढाकर शब्दांकित किया जाये वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है।
उदाहरण:
१. परवल पाक, फाट हिय गोहूँ।
यहाँ प्रसिद्ध कवि मालिक मोहम्मद जायसी ने नायिका नागमती के विरह का वर्णन करते हुए कहा है कि उसके विरह के ताप के कारण परवल पक गये तथा गेहूँ का ह्रदय फट गया।
२. मैं तो राम विरह की मारी, मोरी मुंदरी हो गयी कँगना।
इन पंक्तियों में श्री राम के विरह में दुर्बल सीताजी की अँगूठी कंगन हो जाने का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन है।
३. ऐसे बेहाल बेबाइन सों, पग कंटक-जल लगे पुनि जोये।
हाय! महादुख पायो सखा, तुम आये न इतै कितै दिन खोये।।
देखि सुदामा की दीन दसा, करुना करि के करुनानिधि रोये।
पानी परात को हाथ छुओ नहिं, नैनन के जल सौं पग धोये।।
४. बूँद-बूँद मँह जानहू।
५. कहुकी-कहुकी जस कोइलि रोई।
६. रकत आँसु घुंघुची बन बोई।
७. कुंजा गुन्जि करहिं पिऊ पीऊ।
८. तेहि दुःख भये परास निपाते।
९. हनुमान की पूँछ में, लगन न पाई आग।
लंका सारी जल गयी, गए निसाचर भाग।। -तुलसी
१०. देख लो साकेत नगरी है यही।
स्वर्ग से मिलने गगन को जा रही।। -मैथिलीशरण गुप्त
११. प्रिय-प्रवास की बात चलत ही, सूखी गया तिय कोमल गात।
१२. दसन जोति बरनी नहिं जाई. चौंधे दिष्टि देखि चमकाई.
१३. आगे नदिया पडी अपार, घोड़ा कैसे उतरे पार।
राणा ने सोचा इस पार, तब तक था चेतक उस पार।।
१४. भूषण भनत नाद विहद नगारन के, नदी नाद मद गैबरन के रलत है।
१५. ये दुनिया भर के झगडे, घर के किस्से, काम की बातें।
बला हर एक टल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ।। -जावेद अख्तर
१६. मैं रोया परदेस में, भीगा माँ का प्यार।
दुःख ने दुःख से बात की, बिन चिट्ठी बिन तार।। -निदा फाज़ली
अतिशयोक्ति अलंकार के निम्न ८ प्रकार (भेद) हैं।
१. संबंधातिशयोक्ति-
जब दो वस्तुओं में संबंध न होने पर भी संबंध दिखाया जाए अथवा जब अयोग्यता में योग्यता प्रदर्शित की जाए तब संबंधातिशयोक्ति अलंकार होता है।
उदाहरण-
१. फबि फहरहिं अति उच्च निसाना।
जिन्ह मँह अटकहिं बिबुध बिमाना।।
फबि = शोभा देना, निसाना = ध्वज, बिबुध = देवता।
यहाँ झंडे और विमानों में अटकने का संबंध न होने पर भी बताया गया है।
२. पँखुरी लगे गुलाब की, परिहै गात खरोंच
गुलाब की पँखुरी और गात में खरोंच का संबंध न होने पर भी बता दिया गया है।
३. भूलि गयो भोज, बलि विक्रम बिसर गए, जाके आगे और तन दौरत न दीदे हैं।
राजा-राइ राने, उमराइ उनमाने उन, माने निज गुन के गरब गिरबी दे हैं।।
सुजस बजाज जाके सौदागर सुकबि, चलेई आवै दसहूँ दिशान ते उनींदे हैं।
भोगी लाल भूप लाख पाखर ले बलैया जिन, लाखन खरचि रूचि आखर ख़रीदे हैं।।
यहाँ भुला देने अयोग्य भोग आदि भोगीलाल के आगे भुला देने योग्य ठहराये गये हैं।
४. जटित जवाहर सौ दोहरे देवानखाने, दूज्जा छति आँगन हौज सर फेरे के।
करी औ किवार देवदारु के लगाए लखो, लह्यो है सुदामा फल हरि फल हेरे के।।
पल में महल बिस्व करमै तयार कीन्हों, कहै रघुनाथ कइयो योजन के घेरे में।
अति ही बुलंद जहाँ चंद मे ते अमी चारु चूसत चकोर बैठे ऊपर मुंडेरे के।।
५. आपुन के बिछुरे मनमोहन बीती अबै घरी एक कि द्वै है।
ऐसी दसा इतने भई रघुनाथ सुने भय ते मन भ्वै है।।
गोपिन के अँसुवान को सागर बाढ़त जात मनो नभ छ्वै है।
बात कहा कहिए ब्रज की अब बूड़ोई व्है है कि बूडत व्है हैं।।
२. असम्बन्धातिशयोक्ति-
जब दो वस्तुओं में संबंध होने पर भी संबंध न दिखाया जाए अथवा जब योग्यता में अयोग्यता प्रदर्शित की जाए तब असंबंधातिशयोक्ति अलंकार होता है।
उदाहरण-
१. जेहि वर वाजि राम असवारा। तेहि सारदा न बरनै पारा।।
वाजि = घोडा, न बरनै पारा = वर्णन नहीं कर सकीं।
२. अति सुन्दर लखि सिय! मुख तेरो। आदर हम न करहिं ससि केरो।।
करो = का। चन्द्रमा में मुख- सौदर्य की समानता के योग्यता होने पर भी अस्वीकार गया है।
३. देखि गति भासन ते शासन न मानै सखी
कहिबै को चहत गहत गरो परि जाय
कौन भाँति उनको संदेशो आवै रघुनाथ
आइबे को न यो न उपाय कछू करि जाय
विरह विथा की बात लिख्यो जब चाहे तब
ऐसे दशा होति आँच आखर में भरि जाय
हरि जाय चेत चित्त सूखि स्याही छरि जाय
३. चपलातिशयोक्ति-
जब कारण के होते ही तुरंत कार्य हो जाए।
उदाहरण-
१. तव सिव तीसर नैन उघारा। चितवत काम भयऊ जरि छारा।।
शिव के नेत्र खुलते ही कामदेव जलकर राख हो गया।
२. आयो-आयो सुनत ही सिव सरजा तव नाँव।
बैरि नारि दृग जलन सौं बूडिजात अरिगाँव।।
४. अक्रमातिशयोक्ति-
जब कारण और कार्य एक साथ हों।
उदाहरण-
१. बाणन के साथ छूटे प्राण दनुजन के।
सामान्यत: बाण छूटने और लगने के बाद प्राण निकालेंगे पर यहाँ दोनों क्रियाएं एक साथ होना बताया गया है।
२. पाँव के धरत, अति भार के परत, भयो एक ही परत, मिली सपत पताल को।
३. सन्ध्यानों प्रभु विशिख कराला, उठी उदधि उर अंतर ज्वाला।
४. क्षण भर उसे संधानने में वे यथा शोभित हुए।
है भाल नेत्र जवाल हर, ज्यों छोड़ते शोभित हुए।।
वह शर इधर गांडीव गुण से भिन्न जैसे ही हुआ।
धड से जयद्रथ का उधर सिर छिन्न वैसे ही हुआ।।
५. अत्यंतातिशयोक्ति-
जब कारण के पहले ही कार्य संपन्न हो जाए।
उदाहरण:
१. हनूमान की पूँछ में, लगन न पाई आग।
लंका सगरी जर गयी, गये निसाचर भाग।।
२. धूमधाम ऐसी रामचद्र-वीरता की मची, लछि राम रावन सरोश सरकस तें।
बैरी मिले गरद मरोरत कमान गोसे, पीछे काढ़े बाण तेजमान तरकस तें।।
६. भेदकातिशयोक्ति-
जहाँ उपमेय या प्रस्तुत का अन्यत्व वर्णन किया जाए, अभेद में भी भेद दिखाया जाए अथवा जब और ही, निराला, न्यारा, अनोखा आदि शब्दों का प्रयोग कर किसी की अत्यधिक या अतिरेकी प्रशंसा की जाए।
उदाहरण-
१. न्यारी रीति भूतल, निहारी सिवराज की।
२. औरे कछु चितवनि चलनि, औरे मृदु मुसकान।
औरे कछु सुख देत हैं, सकें न नैन बखान।।
अनियारे दीरघ दृगनि, किती न तरुनि समान।
वह चितवन औरे कछू, जेहि बस होत सुजान।।
७. रूपकातिशयोक्ति-
उदाहरण-
१. जब केवल उपमान या अप्रस्तुत का कथन कर उसी से उपमेय या प्रस्तुत का बोध कराया जाए अथवा उपमेय का लोप कर उपमान मात्र का कथा किया जाए अर्थात उपमान से ही अपमान का भी अर्थ अभीष्ट हो तब रूपकातिशयोक्ति होता है। रूपकातिशयोक्ति का अधिक विक्सित और रूढ़ रूप प्रतिक योजना है।
उदाहरण-
१. कनकलता पर चंद्रमा, धरे धनुष दो बान।
कनकलता = स्वर्ण जैसी आभामय शरीर, चंद्रमा = मुख, धनुष = भ्रकुटी, बाण = नेत्र, कटाक्षकनकलता यहाँ नायिका के सौन्दर्य का वर्णन है। शरीर, मुख, भ्रकुटी, कटाक्ष आदि उप्मेयों का लोप कर केवल लता, चन्द्र, धनुष, बाण आदि का कथन किया गया है किन्तु प्रसंग से अर्थ ज्ञात हो जाता है।
२. गुरुदेव! देखो तो नया यह सिंह सोते से जगा।
यहाँ उपमेय अभिमानु का उल्लेख न कर उपमान सिंह मात्र का उल्लेख है जिससे अर्थ ग्रहण किया जा सकता है।
३.विद्रुम सीपी संपुट में, मोती के दाने कैसे।
है हंस न शुक यह फिर क्यों, चुगने को मुक्त ऐसे।।
४. पन्नग पंकज मुख गाहे, खंजन तहाँ बईठ।
छत्र सिंहासन राजधन, ताकहँ होइ जू दीठ।।
८. सापन्हवातिशयोक्ति-
यह अपन्हुति और रूपकातिशयोक्ति का सम्मिलित रूप है। जहाँ रूपकातिशयोक्ति प्रतिषेधगर्भित रूप में आती है वहाँ सापन्हवातिशयोक्ति होता है।
उदाहरण-
१. अली कमल तेरे तनहिं, सर में कहत अयान।
यहाँ सर में कमल का निषेध कर उन्हें मुख और नेत्र के रूप में केवल उपमान द्वारा शरीर में वर्णित किया गया है।
टिप्पणी: उक्त ३, ४, ५ अर्थात चपलातिशयोक्ति, अक्रमातिशयोक्ति तथा अत्यंतातिशयोक्ति का भेद कारण के आधार पर होने के कारण कुछ विद्वान् इन्हें कारणातिशयोक्ति के भेद-रूप में वर्णित करते हैं।
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गीत -
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महाकाल के पूजक हैं हम
पाश काल के नहीं सुहाते
नहीं समय-असमय की चिंता
कब विलंब से हम घबराते?
*
खुद की ओर उठीं त्रै ऊँगली
अनदेखी ही रहीं हमेशा
एक उठी जो औरों पर ही
देख उसी को ख़ुशी मनाते
*
कथनी-करनी एक न करते
द्वैत हमारी श्वासों में है
प्यासों की कतार में आगे
आसों पर कब रोक लगाते?
*
अपनी दोनों आँख फोड़ लें
अगर तुम्हें काना कर पायें
संसद में आचरण दुरंगा
हो निलज्ज हम रहे दिखाते
*
आम आदमी की ताकत ही
रखे देश को ज़िंदा अब तक
नेता अफसर सेठ बेचकर
वरना भारत भी खा जाते
५.१२.२०१५
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नवगीत :
*
या तो वो देता नहीं
या देता छप्पर फाड़ के
*
मर्जी हो तो पंगु को
गिरि पर देता है चढ़ा
अंधे को देता दिखा
निर्धन को कर दे धनी
भक्तों को लेता बचा
वो खुले-आम, बिन आड़ के
या तो वो देता नहीं
या देता छप्पर फाड़ के
*
पानी बिन सूखा कहीं
पानी-पानी है कहीं
उसका कुछ सानी नहीं
रहे न कुछ उससे छिपा
मनमानी करता सदा
फिर पत्ते चलता ताड़ के
या तो वो देता नहीं
या देता छप्पर फाड़ के
*
अपनी बीबी छुड़ाने
औरों को देता लड़ा
और कभी बंसी बजा
करता डेटिंग रास कह
चने फोड़ता हो सलिल
ज्यों भड़भूंजा भाड़ बिन
या तो वो देता नहीं
या देता छप्पर फाड़ के
३-१२-२०१५
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