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शनिवार, 17 जनवरी 2026

जनवरी १७, दोहा, दोस्त, नयन, हास्य, सॉनेट, स्वास्थ्य मानक, बुंदेली, हाड़ौती, सरस्वती, हिंदी ग़ज़ल

सलिल सृजन जनवरी १७
दोहा सलिला
दोस्त-नयन
.
दरवाजा-खिड़की हुए, नयन हमेशा बंद? 
दस्तक दे लौटे विवश, दोस्त हवा आनंद।।
.

नयन दोस्त मिलते हुलस,भुज भर दे मुस्कान।
देख नयन में झाँककर, भरें जान में जान।।
.
नयन खींच रेखा कहें, मर्यादा मत तोड़। 
तुझे दोस्त से स्नेह है, 'सलिल' न लेना होड़।।
१७-१-२०२६ 
... 
हास्य सॉनेट
दावत
*
दावत कुबूल कीजिए कविराज! आइए।
नेवता पठा रहीं हैं कवयित्रि जी हुलस।
क्या खूब खयाली पुलाव बना, खाइए।।
खट्टे करेंगीं दाँत एक साथ मिल पुलक।।
लोहे के चने चाब धन्यवाद दीजिए।
दिमाग का दही न सिर्फ दाल में काला।
मौन रह छठी का दूध याद कीजिए।।
किस खेत की मूली से पड़ गया पाला।।
घी में हुईं न अँगुलियाँ, टेढ़ी खीर है।
खट्टे हुए अंगूर पानी घड़ों पड़ गया।
हाय! गुड़ गोबर हुआ, नकली पनीर है।।
जले पे नमक व्यंग्य बाण कह छिड़क दिया।।
बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद देख लो।
दाल न गली तो तिल का ताड़ मत करो।।
०००
दंत निपोरी
सामान्यत: 'हाँ' और 'ना' एक दूसरे के विरुद्धार्थी  होते हैं। निम्न रिक्त स्थानों में 'हाँ' रखें या 'ना' अर्थ समान रहता है। है न हिन्दी का चमत्कार?  
रिक्त स्थान में 'हाँ' या 'नहीं' लिखकर जानें अपना-अपना  सच

............ मैं इंसान नहीं, बंदर हूँ।
............ मैं ही पागल हूँ।
............ मेरे दिमाग का कोई इलाज नहीं।
............ मुझे पागलखाना जाना है।
०००
मुक्तक
मत हों अशांत, शांत रहें, शांति पाइए।
भज राधिका के कांत को कुछ कांति पाइए।।
कह देवकीनंदन यशोदा लाल यह रहा-
वसुदेव-नंद की तरह सब साथ आइए।।
१७.१.२०२५
०००
छंद शाला
दोहा २
दोहा में दो की प्रमुखता है।
दोहा ने दोहा सदा, शब्द गाय से अर्थ।
चुनता शब्द सटीक ही, तज अनर्थ या व्यर्थ।।
दोहा में दो पंक्तियाँ, कल-कल भाव प्रवाह।
अलंकार रस मिल करें, चमत्कार पा वाह।।
दो पद दोनों पंक्ति में, जैसे हों दिन-रात।
दो सम दो ही विषम हैं, रवि-शशि जैसे तात।।
विषम चरण आरंभ में, यदि मात्रिक दोहराव।
गति-यति लय की सहजता, सुगठित करें रचाव।।
सम चरणों के अंत में, गुरु-लघु है अनिवार्य।
तीनों लघु से अंत भी, हो सकता स्वीकार्य।।
कारक का उपयोग कम, करिए रहे कसाव।
संयोजक शब्दों बिना, बेहतर करें निभाव।।
सुमिर गुनगुना साधिए, दोहे की लय मीत।
अलंकार लालित्यमय, मोहें करिए प्रीत।।
१७.१.२०२४
•••
विश्व स्वास्थ्य दिवस
: महत्वपूर्ण मानक :
०१.रक्त चाप : १२०/८०
०२. नाड़ी : ७०-१००
०३. तापमान: ३६.८-३७
०४. श्वास: १२-१६
०५. हीमोग्लोबिन: पुरुष - १३.५-२८, स्त्री - ११.५-१६
०६.कोलेस्ट्रॉल: १३०-२००
०७.पोटेशियम: ३.५-५
०८. सोडियम: १३५-१४५
०९. ट्राइग्लिसराइड्स: २२०
१०. शरीर में खून की मात्रा: पीसीवी ३०%-४०%
११. शुगर लेवल: बच्चे ७०-१३०, वयस्क: ७०-११५
१२. आयरन :८-१५ मिलीग्राम
१३. श्वेत रक्त कोशिकाएँ WBC: ४,०००-११,०००
१४. प्लेटलेट्स: १,५०,०००-४,००,०००
१५. लाल रक्त कोशिकाएँ आरबीसी: ४.५-६.० मिलियन।
१६. कैल्शियम: .६-१०.३ mg/dL
१७. विटामिन डी३: २०-५० एनजी/एमएल।
१८. विटामिन B१२: २००-९०० पीजी/एमएल।
स्वास्थ्य सूत्र :
१: पानी पिएँ, किसी को पानी पिलाने का विचार छोड़ दें। अधिकांश स्वास्थ्य समस्याएँ शरीर में पानी की कमी से होती हैं।
२: शरीर से जितना हो सके उतना काम करें, शरीर को चल, तैर या खेल कर गतिशील रखें।
३: भूख से कम खाएँ। ज्यादा खाने की लालसा छोड़ें। प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, जीवन सत्व (विटामिन) युक्त खाद्य पदार्थों का अधिक प्रयोग करें।
४: वाहन का प्रयोग अत्यंत आवश्यक होने पर ही करें। अधिक से अधिक चलने की कोशिश करें। लिफ्ट, एस्केलेटर पर सीढ़ी को वरीयता दें। ५; गुस्सा-चिंता करना छोड़ दें। अप्रियबातों को अनदेखा करें। सकारात्मक लोगों से बात करें और उनकी बात सुनें।
६: छठा निर्देश सबसे पहले धन, स्वाद और ईर्ष्या का मोह त्याग दें।
७: जो न पा सकें उसे भूल जाइए। दूसरों को क्षमा करें।
८: धन, पद, प्रतिष्ठा, शक्ति, सौंदर्य, मोह और अहंकार तजें । विनम्र बनें।
९: सच को स्वीकारें। बुढ़ापा जीवन का अंत नहीं है। पूर्णता की शुरुआत है। आशावादी रहें, परिस्थितियों का आनंद लें।
***
बुंदेली वंदना
सारद माँ
सारद माँ! परनाम हमाओ।
नैया पार लगा दे रे!।।
मूढ़ मगज कछु सीख नें पाओ।
तन्नक सीख सिखा दे रे!।।
माई! बिराजीं जा परबत पै।
मैं कैसउं चढ़ पाऊँ ना।।
माई! बिराजीं स्याम सिला मा।
मैं मूरत गढ़ पाऊँ ना।।
ध्यान धरूँ आ दरसन देओ।
सुन्दर छबि दिखला दे रे!।।
सारद माँ! परनाम हमाओ।
नैया पार लगा दे रे!।।
मैया आखर मा पधराई।
मैं पोथी पढ़ पाऊँ ना।
मन मंदिर मा माँ पधराओ
तबआगे बढ़ पाऊँ ना।।
थाम अँगुरिया राह दिखाखें।
मंज़िल तक पहुँचा दे रे!।।
सारद माँ! परनाम हमाओ।
नैया पार लगा दे रे!।।
***
सॉनेट
कण-कण में जो बस रहा
सकल सृष्टि जो रच रहा
कहिए किसके बस रहा?
बाँच रहा, खुद बँच रहा।
हँसा रहा चुप हँस रहा
लगे झूठ पर सच कहा
जीव पंक में फँस रहा
क्यों न मोह से बच रहा।
काल निरंतर डँस रहा
महाकाल जो नच रहा
बाहुबली में कस रहा
जो वह प्रेमिल टच रहा।
सबको प्रिय निज जस रहा।
कौन कहे टू मच रहा।।
१७-१-२०२२
***
दोहागीत
संकट में हैं प्राण
*
लोकतंत्र तरु बचाओ
संकट में हैं प्राण
*
अफसरशाही मत्त गज
चाहे सके उखाड़
तना लोकमत तोड़ता
जब-तब मौका ताड़
दलबंदी विषकूप है
विषधर नेता लोग
डँसकर आँसू बहाते
घड़ियाली है सोग
ईश्वर देख; न देखता
कैसे होगा त्राण?
लोकतंत्र तरु बचाओ
संकट में हैं प्राण
*
धनपति चूहे कुतरते
स्वार्थ साधने डाल
शोषण करते श्रमिक का
रहा पेट जो पाल
न्यायतंत्र मधु-मक्षिका
तौला करता न्याय
सुविधा मधु का भोगकर
सूर करे अन्याय
मुर्दों का सा आचरण
चाहें हों संप्राण
लोकतंत्र तरु बचाओ
संकट में हैं प्राण
*
आवश्यकता-डाल पर
आम आदमी झूल
चीख रहा है 'बचाओ
श्वास-श्वास है शूल
पत्रकार पत्ते झरें
करें शहद की आस
आम आदमी मर रहा
ले अधरों पर प्यास
वादों को जुमला कहे
सत्ता डँस; ले प्राण
लोकतंत्र तरु बचाओ
संकट में हैं प्राण
*
१४-१-२०२१
हाड़ौती
सरस्वती वंदना
*
जागण दै मत सुला सरसती
अक्कल दै मत रुला सरसती
बावन आखर घणां काम का
पढ़बो-बढ़बो सिखा सरसती
ज्यूँ दीपक; त्यूँ लड़ूँ तिमिर सूं
हिम्मत बाती जला सरसती
लीक पुराणी डूँगर चढ़बो
कलम-हथौड़ी दिला सरसती
आयो हूँ मैं मनख जूण में
लख चौरासी भुला सरसती
नांव सुमरबो घणूं कठण छै
चित्त न भटका, लगा सरसती
जीवण-सलिला लांबी-चौड़ी
धीरां-धीरां तिरा सरसती
१८-११-२०१९
***
मुक्तिका
*
बाग़ क्यारी फूल है हिंदी ग़ज़ल
या कहें जड़-मूल है हिंदी ग़ज़ल
.
बात कहती है सलीके से सदा-
नहीं देती तूल है हिंदी ग़ज़ल
.
आँख में सुरमे सरीखी यह सजी
दुश्मनों को शूल है हिंदी ग़ज़ल
.
'सुधर जा' संदेश देती है सदा
न हो फिर जो भूल है हिंदी ग़ज़ल
.
दबाता जब जमाना तो उड़ जमे
कलश पर वह धूल है हिंदी ग़ज़ल
.
है गरम तासीर पर गरमी नहीं
मिलो-देखो कूल है हिंदी ग़ज़ल
.
मुक्तिका या गीतिका या पूर्णिका
तेवरी का तूल है हिंदी गजल
.
सजल अरु अनुगीत में भी समाहित
कायदा है, रूल है हिंदी ग़ज़ल
.
१७.९.२०१८
***
सामयिक लेख
हिंदी के समक्ष समस्याएं और समाधान
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
सकल सृष्टि में भाषा का विकास दैनंदिन जीवन में और दैनन्दिन जीवन से होता है। भाषा के विकास में आम जन की भूमिका सर्वाधिक होती है। शासन और प्रशासन की भूमिका अत्यल्प और अपने हित तक सीमित होती है। भारत में तथाकथित लोकतंत्र की आड़ में अति हस्तक्षेपकारी प्रशासन तंत्र दिन-ब-दिन मजबूत हो रहा है जिसका कारण संकुचित-संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ तथा बढ़ती असहिष्णुता है। राजनीति जब समाज पर हावी हो जाती है तो सहयोग, सद्भाव, सहकार और सर्व स्वीकार्यता ​के लिए स्थान नहीं रह जाता। दुर्भाग्य से भाषिक परिवेश में यही वातावरण है। हर भाषा-भाषी अपनी सुविधा के अनुसार देश की भाषा नीति चाहता है। यहाँ तक कि परंपरा, प्रासंगिकता, भावी आवश्यकता या भाषा विकास की संभावना के निष्पक्ष आकलन को भी स्वीकार्यता नहीं है।
निरर्थक प्रतिद्वंद्विता
संविधान की ८वीं अनुसूची में सम्मिलित होने की दिशाहीन होड़ जब-तब जहाँ-तहाँ आंदोलन का रूप लेकर लाखों लोगों के बहुमूल्य समय, ऊर्जा तथा राष्ट्रीय संपत्ति के विनाश का कारण बनता है। ८वीं अनुसूची में जो भाषाएँ सम्मिलित हैं उनका कितना विकास हुआ या जो भाषाएँ सूची में नहीं हैं उनका कितना विकास अवरुद्ध हुआ इस का आकलन किये बिना यह होड़ स्थानीय नेताओं तथा साहित्यकारों द्वारा निरंतर विस्तारित की जाती है। विडंबना यह है कि 'राजस्थानी' नाम की किसी भाषा का अस्तित्व न होते हुए भी उसे राज्य की अधिकृत भाषा घोषित कर दिया जाता है और उसी राज्य में प्रचलित ५० से अधिक भाषाओँ के समर्थक पारस्परिक प्रतिद्वंदिता के कारण यह होता देखते रहते हैं।
राष्ट्र भाषा और राज भाषा
राज-काज चलाने के लिए जिस भाषा को अधिसंख्यक लोग समझते हैं उसे राज भाषा होना चाहिए किंतु विदेशी शासकों ने खुद कि भाषा को गुलाम देश की जनता पर थोप दिया। उर्दू और अंग्रेजी इसी तरह थोपी और बाद में प्रचलित रह गयीं भाषाएँ हैं. शासकों की भाषा से जुड़ने की मानसिकता और इनका उपयोग कर खुद को शासक समझने की भ्रामक धारणा ने इनके प्रति आकर्षण को बनाये रखा है। देश का दुर्भाग्य कि अंग्रेजों के जाने के बाद भी अंग्रेजीप्रेमी प्रशासक और भारतीय अंग्रेज प्रधान मंत्री के कारण अंग्रेजी का महत्व बना रहा तथा राजनैतिक टकराव में भाषा को घसीट कर हिंदी को विवादस्पद बना दिया गया।
किसी देश में जितनी भी भाषाएँ जन सामान्य द्वारा उपयोग की जाती हैं, उनमें से कोई भी अराष्ट्र भाषा नहीं है अर्थात वे सभी राष्ट्र भाषा हैं और अपने-अपने अंचल में बोली जा रही हैं, बोली जाती रहेंगी। निरर्थक विवाद की जड़ मिटाने के लिए सभी भाषाओँ / बोलियों को राष्ट्र भाषा घोषित कर अवांछित होड़ को समाप्त किया जा सकता है। इससे अनचाहे हो रहा हिंदी-विरोध अपने आप समाप्त हो जाएगा। ७०० से अधिक भाषाएँ राष्ट्र भाषा हो जाने से सब एक साथ एक स्तर पर आ जाएँगी। हिंदी को इस अनुसूची में रखा जाए या निकाल दिया जाए कोई अंतर नहीं पड़ना है। हिंदी विश्व वाणी हो चुकी है। जिस तरह किसी भी देश का धर्म न होने के बावजूद सनातन धर्म और किसी भी देश की भाषा न होने के बावजूद संस्कृत का अस्तित्व था, है और रहेगा वैसे ही हिंदी भी बिना किसी के समर्थन और विरोध के फलती-फूलती रहेगी।
शासन-प्रशासन के हस्तक्षेप से मुक्ति
७०० से अधिक भाषाएँ/बोलियां राष्ट्र भाषा हो जाने पाए पारस्परिक विवाद मिटेगा, कोई सरकार इन सबको नोट आदि पर नहीं छाप सकेगी। इनके विकास पर न कोई खर्च होगा, न किसी अकादमी की जरूरत होगी। जिसे जान सामान्य उपयोग करेगा वही विकसित होगी किंतु राजनीति और प्रशासन की भूमिका नगण्य होगी।
हिंदी को प्रचार नहीं चाहिए
विडम्बना है कि हिंदी को सर्वाधिक क्षति तथाकथित हिंदी समर्थकों से ही हुई और हो रही है। हिंदी की आड़ में खुद के हिंदी-प्रेमी होने का ढिंढोरा पीटनेवाले व्यक्तियों और संस्थाओं ने हिंदी का कोई भला नहीं किया, खुद का प्रचार कर नाम और नामा बटोर तथा हिंदी-विरोध के आंदोलन को पनपने का अवसर दिया। हिंदी को ऐसी नारेबाजी और भाषणबाजी ने बहुत हानि पहुँचाई है। गत जनवरी में ऐसे ही हिंदी प्रेमी भोपाल में मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री और सरकार की प्रशंसा में कसीदे पढ़कर साहित्य और भाषा में फूट डालने का काम कर रहे थे। उसी सरकार की हिंदी विरोधी नीतियों के विरोध में ये बगुला भगत चुप्पी साधे बैठे हैं।
हिंदी समर्थक मठाधीशों से हिंदी की रक्षा करें
हिंदी के नाम पर आत्म प्रचार करनेवाले आयोजन न हों तो हिंदी विरोध भी न होगा। जब किसी भाषा / बोली के क्षेत्र में उसको छोड़कर हिंदी की बात की जाएगी तो स्वाभाविक है कि उस भाषा को बोलनेवाले हिंदी का विरोध करेंगे। बेहतर है कि हिंदी के पक्षधर उस भाषा को हिंदी का ही स्थानीय रूप मानकर उसकी वकालत करें ताकि हिंदी के प्रति विरोध-भाव समाप्त हो।
हिंदी सम्पर्क भाषा
किसी भाषा/बोली को उस अंचल के बाहर स्वीकृति न होने से दो विविध भाषाओँ/बोलियों के लोग पारस्परिक वार्ता में हिंदी का प्रयोग करेंगे ही। तब हिंदी की संपर्क भाषा की भूमिका अपने आप बन जाएगी। आज सभी स्थानीय भाषाएँ हिंदी को प्रतिस्पर्धी मानकर उसका विरोध कर रही हैं, तब सभी स्थानीय भाषाएँ हिंदी को अपना पूरक मानकर समर्थन करेंगी। उन भाषाओँ/बोलियों में जो शब्द नहीं हैं, वे हिंदी से लिए जाएंगे, हिंदी में भी उनके कुछ शब्द जुड़ेंगे। इससे सभी भाषाएँ समृद्ध होंगी।
हिंदी की सामर्थ्य और रोजगार क्षमता
हिंदी के हितैषियों को यदि हिंदी का भला करना है तो नारेबाजी और सम्मेलन बन्द कर हिंदी के शब्द सामर्थ्य और अभिव्यक्ति सामर्थ्य बढ़ाएं। इसके लिए हर विषय हिंदी में लिखा जाए। ज्ञान - विज्ञान के हर क्षेत्र में हिंदी का प्रयोग किया जाए। हिंदी के माध्यम से वार्तालाप, पत्राचार, शिक्षण आदि के लिए शासन नहीं नागरिकों को आगे आना होगा। अपने बच्चों को अंग्रेजी से पढ़ाने और दूसरों को हिंदी उपदेश देने का पाखण्ड बन्द करना होगा।
हिंदी की रोजगार क्षमता बढ़ेगी तो युवा अपने आप उस ओर जायेंगे। भारत दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है और इस बाजार में आम ग्राहक सबसे ज्यादा हिंदी ही समझता है। ७०० राष्ट्र भाषाएँ तो दुनिया का कोई देश या व्यापारी नहीं सीख-सिखा सकता इसलिए विदेशियों के लिए हिंदी ही भारत की संपर्क भाषा होगी. स्थिति का लाभ लेने के लिए देश में द्विभाषी रोजगार पार्क पाठ्यक्रम हों। हिंदी के साथ कोई एक विदेशी भाषा सीखकर युवजन उस देश में जाकर हिंदी सिखाने का काम कर सकेंगे। ऐसे पाठ्यक्रम हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ाने के साथ बेरोजगारी कम करेंगे। कोई दूसरी भारतीय भाषा इस स्थिति में नहीं है कि यह लाभ ले और दे सके।
हिंदी में हर विषय की किताबें लिखी जाने की सर्वाधिक जरूरत है। यह कार्य सरकार नहीं हिंदी के जानकारों को करना है। किताबें अंतरजाल पर हों तो इन्हें पढ़ा-समझ जाना सरल होगा। हिंदी में मूल शोध कार्य हों, केवल नकल करना निरर्थक है। तकनीकी, यांत्रिकी, विज्ञान और अनुसंधान क्षेत्र में हिंदी में पर्याप्त साहित्य की कमी तत्काल दूर की जाना जरूरी है। हिंदी की सरलता या कठिनता के निरर्थक व्यायाम को बन्द कर हिंदी की उपयुक्तता पर ध्यान देना होगा। हिंदी अन्य भारतीय भाषाओँ को गले लगाकर ही आगे बढ़ सकती है, उनका गला दबाकर या गला काटकर हिंदी भी आपने आप समाप्त हो जाएगी।
***
मुक्तिका
*
नाव ले गया माँग, बोल 'पतवार तुम्हें दे जाऊँगा'
यह न बताया सलिल बिना नौका कैसे खे पाऊँगा?
.
कहा 'अनुज' हूँ, 'अग्रज' जैसे आँख दिखाकर चला गया
कोई बताये क्या उस पर आशीष लुटाने आऊँगा?
.
दर्पण दरकाया संबंधों का, अनुबंधों ने बरबस
प्रतिबंधों के तटबंधों को साथ नहीं ले पाऊँगा
.
आ 'समीप' झट 'दूर' हुआ क्यों? बेदर्दी बतलाए तो
यादों के डैनों-नीचे पीड़ा चूजे जन्माऊँगा
.
अंबर का विस्तार न मेरी लघुता को सकता है नाप
बिंदु सिंधु में समा, गीत पल-पल लहरों के गाऊँगा
.
बुद्धि विनीतामय विवेक ने गर्व त्याग हो मौन कहा
बिन अवधेश न मैं मिथलेश सिया को अवध पठाऊँगा
.
कहो मुक्तिका सजल तेवरी ग़ज़ल गीतिका या अनुगीत
शब्द-शब्द रस भाव बिंब लय सलिला में नहलाऊँगा
१७-१-२०१७
***
समीक्षा:
आश्वस्त करता नवगीत संग्रह 'सड़क पर'
देवकीनंदन 'शांत'
*
[कृति विववरण: सड़क पर, गीत-नवगीत संग्रह, आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', प्रथम संस्करण २०१८, आकार २१ x १४ से.मी., आवरण पेपरबैक बहुरंगी, कलाकार मयंक वर्मा, पृष्ठ ९६, मूल्य २५०/-, समन्वय प्रकाशन अभियान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१, चलभाष ७९९९५५९६१८, ९४२५१८३२४४, ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com]
*
मुझे नवगीत के नाम से भय लगने लगा है। एक वर्ष पूर्व ५० नवगीत लिखे। नवगीतकार श्री मधुकर अष्ठाना जो हमें वर्षों से जानते हैं, ने कई महीनों तक रखने के पश्चात् ज्यों का त्यों हमें मूल रूप में लौटते हुए कहा कि गीत के हिसाब से सभी रचनाएँ ठीक हैं किंतु 'नवगीत' में तो कुछ न कुछ नया होना ही चाहिए। हमने उनके डॉ. सुरेश और राजेंद्र वर्मा के नवगीत सुने हैं। अपने नवगीतों में जहाँ नवीनता का भाव आया, हमने प्रयोग भी किया जो अन्य सब के नवगीतों जैसा ही लगा लेकिन आज तक वह 'आँव शब्द समझ न आया जो मधुकर जी चाहते थे। थकहार कर हमने साफ़-साफ़ मधुकर जी की बात कह दी डॉ. सुरेश गीतकार से जिन्होंने कहा कि सजन्त जी! आप चिंता न करें हमने नवगीत देखे हैं, बहुत सुंदर हैं लेकिन हम इधर कुछ अस्त-व्यस्त हैं, फिर भी शीघ्र ही आपको बुलाकर नवगीत संग्रह दे देंगे। आज ४ माह हो चुके हैं, अब थक हार कर हम बगैर उनकी प्रतिक्रिया लिए वापस ले लेंगे।
यह सब सोचकर 'सड़क पर' अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने में हाथ काँप रहा है। तारीफ में कुछ लिखा तो लोग कहेंगे ये ग़ज़ल, दोहे, मुक्तक, छंद और लोकगीत का कवि नवगीत के विषय में क्या जाने? तारीफ पर तारीफ जबरदस्ती किये जा रहा है। यदि कहीं टिप्पणी या आलोचनात्मक बात कह दी तो यही नवगीत के बने हुए आचार्य हमें यह कहकर चुप करा देंगे कि जो नवगीत प्रशंसा के सर्वतः तयोग्य था, उसी की यह आलोचना? आखिर है तो ग़ज़ल और लोक गीतवाला, नवगीत क्या समझेगा? हमें सिर्फ यह सोचकर बताया जाए कि कि नवगीत लिखनेवाले कवि क्या यह सोचकर नवगीत लिखते हैं कि इन्हें सिर्फ वही समझ सकता है जो 'नवगीत' का अर्थ समझता हो?
हम एक पाठक के नाते अपनी बात कहेंगे जरूर....
सर्वप्रथम सलिल जी प्रथम नवगीत संग्रह "काल है संक्रांति का" पर निकष के रूप में निम्न साहित्यकारों की निष्पक्ष टिप्पणी हेतु अभिवादन।
* श्री डॉ. सुरेश कुमार वर्मा का यह कथन वस्तुत: सत्य प्रतीत होता है -
१. कि मुचुकुन्द की तरह शताब्दियों से सोये हुए लोगों को जगाने के लिए शंखनाद की आवश्यकता होती है और
२. 'सलिल' की कविता इसी शंखनाद की प्रतिध्वनि है।
बीएस एक ही कशिश डॉ. सुरेश कुमार वर्मा ने जो जबलपुर के एक भाषा शास्त्री, व्याख्याता हैं ने अपनी प्रतिक्रिया में "काल है संक्रांति का" सभी गीतों को सहज गीत के रूप में हे ेदेखा है। 'नवगीत' का नाम लेना उनहोंने मुनासिब नहीं समझा।
* श्री (अब स्व.) चन्द्रसेन विराट जो विख्यात कवि एवं गज़लकार के रूप में साहित्य जगत में अच्छे-खासे चर्चित रहे हैं। इंदौर से सटीक टिप्पणी करते दिखाई देते हैं- " श्री सलिल जी की यह पाँचवी कृति विशुद्ध 'नवगीत' संग्रह है। आचार्य संजीव सलिल जी ने गीत रचना को हर बार नएपन से मंडित करने की कोशिश की है। श्री विराट जी अपने कथन की पुष्टि आगे इस वाक्य के साथ पूरी करते हैं- 'छंद व कहन' का नयापन उन्हें सलिल जी के नवगीत संग्रह में स्पष्ट दिखाई देना बताता है कि यह टिप्पणी नवगीतकार की न होकर किसी मंजे हुए कवी एवं शायर की है - जो सलिल के कर्तृत्व से अधिक विराट के व्यक्तित्व को मुखर करता है।
* श्री रामदेवलाल 'विभोर' न केवल ग़ज़ल और घनाक्षरी के आचार्य हैं बल्कि संपूर्ण हिंदुस्तान में उन्हें समीक्षक के रूप में जाना जाता है- " कृति के गीतों में नव्यता का जामा पहनाते समय भारतीय वांग्मय व् परंपरा की दृष्टी से लक्षण-व्यंजना शब्द शक्तियों का वैभव भरा है। वे आगे स्पष्ट करते हैं कि बहुत से गीत नए लहजे में नव्य-दृष्टी के पोषक हैं। यही उपलब्धि उपलब्धि आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' को नवगीतकारों की श्रेणी में खड़ा करने हेतु पर्याप्त है।
* डॉ. रोहिताश्व अस्थाना, हरदोई बड़ी साफगोई के साथ रेखांकित कर देते हैं कि भाई 'सलिल' के गीतों और नवगीतों की उल्लेखनीय प्रस्तुति है "काल है संक्रांति का" कृति। नवीन मूल्यों की प्रतिस्थापना 'सलिल' जी को नवगीतकार मानने हेतु विवश करती है। कृति के सभी नवगीत एक से एक बढ़कर सुंदर, सरस, भाव-प्रवण एवं नवीनता से परिपूर्ण हैं। वे एक सुधी समीक्षक, श्रेष्ठ एवं ज्येष्ठ साहित्यकार हैं लेकिन गीत और नवगीतों दोनों का जिक्र वे करते हैं- पाठकों को सोचने पर विवश करता है।
* शेष समीक्षाकारों में लखनऊ के इंजी. संतोष कुमार माथुर, राजेंद्र वर्मा, डॉ. श्याम गुप्ता तथा इंजी. अमरनाथ जी ने 'गीत-नवग़ीत, तथा गीत-अगीत-नवजीत संग्रह कहकर समस्त भ्रम तोड़ दिए।
* इंजी. सुरेंद्र सिंह पवार समीक्षक जबलपुर ने अपनी कलम तोड़कर रख दी यह कहकर कि "सलिल जैसे नवगीतकार ही हैं जो लीक से हटने का साहस जुटा पा रहे हैं, जो छंद को साध रहे हैं और बोध को भी। सलिल जी के गीतों/नवगीतों को लय-ताल में गाया जा सकता है।
अंत में "सड़क पर", आचार्य संजीव 'सलिल' की नवीनतम पुस्तक की समीक्षा उस साहित्यकार-समीक्षक के माध्यम से जिसने विगत दो दशकों तक नवगीत और तीन दशकों से मधुर लयबढ़ गीत सुने तथा विगत दस माह से नवगीत कहे जिन्हें लखनऊ के नवगीतकार नवगीत इसलिए नहीं मानते क्योंकि यह पारम्परिक मधुरता, सहजता एवं सुरीले लय-ताल में निबद्ध हैं।
१. हम क्यों निज भाषा बोलें? / निज भाषा पशु को भाती / प्रकृति न भूले परिपाटी / संचय-सेक्स करे सीमित / खुद को करे नहीं बीमित / बदले नहीं कभी चोलें / हम क्यों निज भाषा बोलें?
आचार्य संजीव 'सलिल' ने स्पष्ट तौर पर स्वीकार कर लिया है कि 'नव' संज्ञा नहीं, विशेषण के रूप में ग्राह्य है। गीत का उद्गम कलकल-कलरव की लय (ध्वन्यात्मक उतार-चढ़ाव) है। तदनुसार 'गीत' का नामकरण लोक गीत, ऋतु गीत, पर्व गीत, भक्ति गीत, जनगीत, आव्हान गीत, जागरण गीत, नव गीत, बाल गीत, युवा गीत, श्रृंगार गीत, प्रेम गीत, विरह गीत, सावन गीत आदि हुआ।
परिवर्तन की 'सड़क पर' कदम बढ़ाता गीत-नवगीत, समय की चुनौतियों से आँख मिलता हुआ लोकाभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बना है। नव भाव-भंगिमा में प्रस्तुत होनेवाला प्रत्येक गीत नवगीत है जो हमारे जीवन की उत्सानधर्मिता, उमंग, उत्साह, उल्लास, समन्वय तथा साहचर्य के तत्वों को अंगीकार कर एकात्म करता है। पृष्ठ ८६ से ९६ तक के गीतों की बोलिया बताएंगी कि उन्हें "सड़क पर" कदम बढ़ाते नवगीत क्यों न कहा जाए?
सड़क पर सतत ज़िंदगी चल रही है / जमूरे-मदारी रुँआसे सड़क पर / बसर ज़िंदगी हो रहे है सड़क पर / सड़क को बेजान मत समझो / रही सड़क पर अब तक चुप्पी, पर अब सच कहना ही होगा / सड़क पर जनम है, सड़क पर मरण है, सड़क खुद निराश्रित, सड़क ही शरण है / सड़क पर आ बस गयी है जिंदगी / सड़क पर, फिर भीड़ ने दंगे किये / दिन-दहाड़े, लुट रही इज्जत सड़क पर / जन्म पाया था, दिखा दे राह सबको, लक्ष्य तक पहुँचाए पर पहुंचा न पाई, देख कमसिन छवि, भटकते ट्रक न चूके छेड़ने से, हॉर्न सुनकर थरथराई पा अकेला, ट्रॉलियों ने चींथ डाला, बमुश्किल, चल रही हैं साँसें सड़क पर।
'सड़क पर' ऐसा नवगीत संग्रह है जिसे हर उस व्यक्ति को पढ़ना चाहिए जो कवि हो, अकवि हो पर सहृदय हो।
६.१.२०१९
संपर्क: १०/३०/२ इंदिरा नगर, लखनऊ २२६०१६, चलभाष ९९३५२१७८४१
***
समय
*
है सभी कुछ
समय के आधीन लेकिन
समय डिक्टेटर नहीं है।
*
समय रहता मौन
गुपचुप देखता सब।
आप माने या न माने
देखता कब?
चाल चलता
बिना पूछे या बताये
हेरते हैं आप
उसकी चाल जब-तब।
वृत्त का आरंभ या
आखिर न देखा
तो कहें क्या
वृत्त ही भास्वर नहीं है?
है सभी कुछ
समय के आधीन लेकिन
समय डिक्टेटर नहीं है.
*
समय को असमय
करें मत काल-कवलित
समय असमय में
नहीं क्या रहा करता?
सदा सुसमय बन
रहे वह साथ बेहतर
देव कुसमय से
सदा ही मनुज डरता।
समय ने सामर्थ्य दी
तुझको मनुज, ले मान
वह वेटर नहीं है।
है सभी कुछ
समय के आधीन लेकिन
समय डिक्टेटर नहीं है।
१७.१.२०१६
***
नवगीत:
.
कल का अपना
आज गैर है
.
मंज़िल पाने साथ चले थे
लिये हाथ में हाथ चले थे
दो मन थे, मत तीन हुए फिर
ऊग न पाये सूर्य ढले थे
जनगण पूछे
कहें: 'खैर है'
.
सही गलत हो गया अचंभा
कल की देवी, अब है रंभा
शीर्षासन कर रही सियासत
खड़ा करे पानी पर खंभा
आवारापन
हुआ सैर है
.
वही सत्य है जो हित साधे
जन को भुला, तंत्र आराधे
गैर शत्रु से अधिक विपक्षी
चैन न लेने दे, नित व्याधे
जन्म-जन्म का
पला बैर है
===
नवगीत:
.
कल के गैर
आज है अपने
.
केर-बेर सा संग है
जिसने देखा दंग है
गिरगिट भी शरमा रहे
बदला ऐसा रंग है
चाह पूर्ण हों
अपने सपने
.
जो सत्ता के साथ है
उसका ऊँचा माथ है
सिर्फ एक है वही सही
सच नाथों का नाथ है
पल में बदल
गए हैं नपने
.
जैसे भी हो जीत हो
कैसे भी रिपु मीत हो
नीति-नियम बस्ते में रख
मनमाफिक हर रीत हो
रोज मुखौटे
चहिए छपने
.
१६.१. २०१५
***
आइये कविता करें: ५
आज हमारे सम्मुख आभा सक्सेना जी के ३ दोहे हैं।
दोहा द्विपदिक (दो पंक्तियों का), चतुश्चरणिक (चार चरणों का), अर्द्धसम मात्रिक छंद है।
दोहा की दोनों पंक्तियों में १३-११, १३-११ मात्राएँ होती हैं। छंद प्रभाकर के अनुसार तेरह मात्रीय विषम चरणारंभ में एक शब्द में जगण (१२१) वर्जित कहा जाता है। दो शब्दों में जगण हो तो वर्जित नहीं होता। विषम चरणांत में सगण (लघु लघु गुरु), रगण (गुरु लागु गुरु) या नगण (लघु लघु लघु) का विधान है। ग्यारह मात्रीय सम (२,४) चरणों में चरणांत में जगण (लघु गुरु लघु) या तगण (गुरु गुरु लघु) सारतः गुरु लघु आवश्यक है।
लघु-गुरु मात्रा के विविध संयोजनों के आधार पर दोहा के २३ प्रकार हैं। दोहा नाम-गुरु मात्रा-लघु मात्रा-कुल वर्ण क्रमशः इस प्रकार हैं: भ्रमर २२-४-२६, भ्रामर २१-६-२७, शरभ २०-८-२८, श्येन १९-१०-२९, मंडूक १८-१२-३०, मर्कट १७-१४-३१ , करभ १६-१६-३२, नर १५-१८-३३, हंस १४- २०-३४, गयंद १३-२२-३५, पयोधर १२-२४-३६, बल ११-२६-३७, पान १०-२८-३८, त्रिकल ९-३०-३९, कच्छप ८-३२-४०, मच्छ ७-३४-४१, शार्दूल ६-३६-४२, अहिवर ५-३८-४३, व्याल ४-४०-४४, विडाल ३-४२-४५, श्वान २-४४-४६, उदर १-४६-४७, सर्प ०-४८-४८।
दोहा की विशेषता १. संक्षिप्तता (कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक कहना), २. लाक्षणिकता (संकेत या इंगित से कहना, विस्तार की कल्पना पाठक के लिये छोड़ना), ३. मार्मिकता या बेधकता (मन को छूना या भेदना), ४. स्पष्टता (साफ़-साफ़ कहना), ५. सरलता (अनावश्यक क्लिष्टता नहीं), ६. सम-सामयिकता तथा ७. युगबोध है। बड़े ग्रंथों में मंगलाचरण अथवा आरम्भ दोहों से करने की परंपरा रही है। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में दोहा का उपयोग चौपाई समूह के अंत में कड़ी के रूप में किया है।
दोहा कालजयी और सर्वाधिक लोकप्रिय छंद है। दोहा रचना के उक्त तथा नया नियमों का सार यह है की लय भंग नहीं होना चाहिए। लय ही छंद का प्राण है। दोहे में अन्त्यानुप्रास (पंक्त्यांत में समान वर्ण) उसकी लालित्य वृद्धि करता है।
.
१. क्यारी क्यारी खिल रहे, हरे हरे से पात
पूछ रहे हर फूल से, उनसे उनकी जात।।
यह दोहा मात्रिक संतुलन के साथ रचा गया है। द्वितीय पंक्ति में कथ्य में दोष है। 'फूल से' और 'उनसे' दोनों शब्दों का प्रयोग फूल के लिए ही हुआ है, दूसरी ओर कौन पूछ रहा है? यह अस्पष्ट है। केवल एक शब्द बदल देने से यह त्रुटि निराकृत हो सकती है:
क्यारी-क्यारी खिल रहे, हरे-हरे से पात
पूछ रहे हर फूल से, भँवरे उनकी जात
कुछ और बदलाव से इस दोहे को एक विशेष आयाम मिलता है और यह राजनैतिक चुनावों के परिप्रेक्ष्य में विशिष्ट हो जाता है:
क्यारी-क्यारी खिल रहे, हरे-हरे से पात
पूछ रहे जन फूल को, भँवरे नेता जात
.
२. कठिनाई कितनी पड़ें, ना घबराना यार
सुख के दिन भी आयेंगे, दुख आयें जित बार।।
इस दोहे के तीसरे चरण में १४ मात्रा होने से मात्राधिक्य दोष है। खड़ी (टकसाली) हिंदी में 'न' शुद्ध तथा 'ना' अशुद्ध कहा गया है। इस दृष्टि से 'जित' अशुद्ध क्रिया रूप है, शुद्ध रूप 'जितनी' है। कठिनाई 'पड़ती' नहीं 'होती' है। इस दोहे को निम्न रूप देना ठीक होगा क्या? विचार करें:
कितनी हों कठिनाइयाँ, मत घबराना यार
सुख के दिन भी आएँगे, दुःख हो जितनी बार
३. रूखा सूखा खाइके, ठंडा पानी पीव
क्या करें बताइये जब, चाट मांगे जीभ।।
इस दोहे के सम चरणान्त में अन्त्यानुप्रास न मिलने से तुकांत दोष है। 'खाइके' तथा 'पीव' अशुद्ध शब्द रूप हैं। द्वितीय पंक्ति में लय भंग है, चतुर्थ चरण में १० मात्राएँ होने से मात्राच्युति दोष है। कथ्य में हास्य का पुट है किंतु दोहे के पूर्वार्ध और उत्तरार्ध के कथ्य में अंतर्संबंध नहीं है।
रूखा-सूखा जो मिले, खा कर ले जल-पान।
जीभ माँगती चाट दें, प्रगटें दयानिधान।।
यहाँ इंगित सुधार अन्य काव्य विधाओं के लिए भी उपयोगी हैं, इन्हें दोहा तक सीमित मत मानिये।
***
हास्य सलिला:
चाय-कॉफी
*
लाली का आदेश था: 'जल्दी लाओ कॉफ़ी
देर हुई तो नहीं मिलेगी ए लालू जी! माफ़ी'
लालू बोले: 'मैडम! हमको है तुमरी परवाह
का बतलायें अधिक सोनिया जी से तुमरी चाह
चाय बनायी गरम-गरम पी लें, होगा आभार'
लाली डपटे: 'तनिक नहीं है तुममें अक्कल यार
चाय पिला मोड़ों-मोड़िन को, कॉफी तुरत बनाओ
कहे दुर्गत करवाते हो? अपनी जान बचाओ
लोटा भर भी पियो मगर चैया होती नाकाफ़ी
चम्मच भर भी मिले मगर कॉफ़ी होती है काफ़ी'
१७.१.२०१४
***
नवगीत:
सड़क पर....
*
सड़क पर
मछलियों ने नारा लगाया:
'अबला नहीं, हम हैं
सबला दुधारी'.
मगर काँप-भागा,
तो घड़ियाल रोया.
कहा केंकड़े ने-
मेरा भाग्य सोया.
बगुले ने आँखों से
झरना बहाया...
*
सड़क पर
तितलियों ने डेरा जमाया.
ज़माने समझना
न हमको बिचारी.
भ्रमर रास भूला
क्षमा माँगता है.
कलियों से काँटा
डरा-काँपता है.
तूफां ने डरकर
है मस्तक नवाया...
*
सड़क पर
बिजलियों ने गुस्सा दिखाया.
'उतारो, बढ़ी कीमतें
आज भारी.
ममता न माया,
समता न साया.
हुआ अपना सपना
अधूरा-पराया.
अरे! चाँदनी में है
सूरज नहाया...
*
सड़क पर
बदलियों ने घेरा बनाया.
न आँसू बहा चीर
अपना भीगा री!
न रहते हमेशा,
सुखों को न वरना.
बिना मोल मिलती
सलाहें न धरना.
'सलिल' मिट गया दुःख
जिसे सह भुलाया...
१७-१-२०११

***

सोमवार, 12 जनवरी 2026

जनवरी १२, पूर्णिका, सॉनेट, चिड़िया, विवेकानंद, सरस्वती, अनाहिता, बेनज़ाइटन, नवगीत, सूरज

सलिल सृजन जनवरी १२
पूर्णिका
सुखद मिलन, मिलते रहें
सतत सृजन करते रहें
.
आत्म शुद्धि का हवन कर
प्रगति पंथ चलते रहें
.
मतभेदों की खाइयाँ
पाट हृदय हरते रहें
.
सद्भावी रचना सुमन
मकरंदी खिलते रहें
.
चटखारे अरु चुस्कियाँ
गप्पों सँग पलते रहें
.
शब्द सेतु रस-भाव के
कूल जोड़ हँसते रहें
.
हिंदी में हस्ताक्षर
कार्य नित्य करते रहें
.
सत्-शिव-सुंदर सृष्टि में
सुंदरता भरते रहें
.
नेह नर्मदा नहाकर
'सलिल' तार-तरते रहें
१२.१.२०२६
०००
पूर्णिका
.
मैं जिजीविषा जयी पलाश।
धरा बिछौना, छत आकाश।।
.
तीनों देव विराजे मुझमें
विपदाओं का करता नाश।।
.
क्रांति-दूत जलता अंगारा
नव युग को नित रहा तराश।।
.
जंगल में मंगल करता हूँ।
बाधाओं के तोड़ूँ पाश।।
.
फगुनौटी को रंग कुसुंबी
दे खुशियों की करूँ तलाश।।
.
रास रचाएँ कान्ह-राधिका
गोप-गोपियाँ आकर काश।।
१२.१.२०२५
०००
दोहा सलिला
सूरज मजदूरी करे, लगातार दिन-रात।
मिले मजूरी कुछ नहीं, तपे आप बेबात।।
हिंदी-संतति कर रही, अंग्रेजी में बात।
परदेसन के पग कमल, घरवाली की लात।।
करें अंजना को नमन, नित्य सुमिर हनुमान।
दें आशीष करें कृपा, पल पल सिय-भगवान।।
१२.१.२०२४
•••
मुक्तिका
*
इस-उस में उलझा रही
आस व्यर्थ भटका रही
मस्ती में हैं लीन मन
मौन जिह्वा बतला रही
कलकल-कलरव सुन विहँस
किलकिल चुप बिसरा रही
शब्द संपदा बचा रख
सबक सीख; सिखला रही
नयन मूँद कर देख हरि
नियति तुझे मिलवा रही
१२-१-२०२३
***
बाल सॉनेट
चिड़िया
*
चूँ चूँ चिड़िया फुर्र उड़े।
चुग्गा चुग चुपचाप।
चूजे चें-चें कर थके।।
लपक चुगाती आप।।
पंखों में लेती लुका।
कोई करे न तंग।
प्रभु का करती शुक्रिया।।
विपदा से कर जंग।।
पंख उगें तब नीड़ से
देखी आप निकाल।
उड़ गिर उठ नभ नाप ले
व्यर्थ बजा मत गाल।।
खोज संगिनी घर बसा।
लूट जिंदगी का मजा।।
***
सॉनेट
विवेकानंद
*
मिल विवेक आनंद जब दिखलाते हैं राह।
रामकृष्ण सह सारदा मिल करते उद्धार।
नर नरेंद्र-गुरु भक्ति जब होती समुद अथाह।।
बनें विवेकानंद तब कर शत बाधा पार।।
गुरु-प्रति निष्ठा-समर्पण बन जीवन-पाथेय।
संकट में संबल बने, करता आत्म प्रकाश।
विधि-हरि-हर हों सहायक, भाव-समाधि विधेय।।
धरती को कर बिछौने, ओढ़े हँस आकाश।।
लगन-परिश्रम-त्याग-तप, दीन-हीन सेवार्थ।
रहा समर्पित अहर्निश मानव-मानस श्रेष्ठ।
सर्व धर्म समभाव को जिया सदा सर्वार्थ।।
कभी न छू पाया तुम्हें, काम-क्रोध-मद नेष्ठ।।
जाकर भी जाते नहीं, करते जग-कल्याण।
स्वामि विवेकानंद पथ, अपना तब हो त्राण।।
१२-१-२०२२
***
विमर्श
क्या सरस्वती वास्तव में एक फारसी देवी अनाहिता हैं ?
*
या कुन्देंदु तुषार हार धवला, या शुभ्र वस्त्रावृता
या वीणा वर दण्ड मंडित करा, या श्वेत पद्मासना
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभितभिर्सदा वंदिता
सा माम् पातु सरस्वती भगवती निश्शेष जाड्यापहा।
“देवी सरस्वती चमेली के रंग के चंद्रमा की तरह श्वेत हैं, जिनकी शुद्ध सफेद ठंडी ओस की बूंदों की माला की तरह है, जो दीप्तिमान सफेद पोशाक में सुशोभित हैं, जिनकी सुंदर भुजा वीणा पर टिकी हुई है, और जिसका सिंहासन एक सफेद कमल है। जो ब्रह्मा को अच्युत रखतीं और शिवादि देवों द्वारा वन्दित हैं, मेरी रक्षा करें । आप मेरी सुस्ती, और अज्ञानता को दूर करिये। "
ऋग्वेद में सरस्वती को "सरम वरति इति सरस्वती" के रूप में समझाया गया है - "वह जो पूर्ण की ओर बहती है वह सरस्वती है" - ३ री - ४ थी
सहस्राब्दी, ई.पू. में नदी स्वरास्वती एक प्रमुख जलधारा थी। यह खुरबत की खाड़ी से सुरकोटदा और कोटड़ा तक और नारा-हकरा-घग्गर-सरस्वती चैनलों के माध्यम से, मथुरा के माध्यम से ऊपर की ओर फैल गयी। यह दुनिया के सबसे बड़े रेगिस्तानों में से एक, मरुस्थली रेगिस्तान से सीधे बहती थी। इस नदी को वेदों में "सभी नदियों की माँ" के रूप में वर्णित किया गया है, जिसे सबसे शुद्ध और शुभ माना जाता है। प्रचलित मानसूनी हवाओं के कारण जब यह नदी सूख गई, तो इसके किनारे रहने वाली सभ्यता कुभा नदी में चली गई, और उस नदी का नाम बदलकर अवेस्तां सरस्वती (हराहवती) कर दिया। उपनिषदों में यह माना जाता है कि जब देवताओं को अग्नि / अग्नि को समुद्र में ले जाने की आवश्यकता थी, तो इसके जल की शुद्धता के लिए सरस्वती को जिम्मेदारी दी गई थी। हालांकि यह कार्य पूरा हुआ, लेकिन कुछ का मानना ​​है कि इस प्रक्रिया में नदी सूख गई।
फारसी कनेक्शन
अरदेवी सुरा अनाहिता ( Arədvī Sārā Anāhitā)); एक इंडो-ईरानी कॉस्मोलॉजिकल फिगर की एवेस्टन भाषा का नाम 'वाटर्स' (अबान) की दिव्यता के रूप में माना जाता है और इसलिए प्रजनन क्षमता, चिकित्सा और ज्ञान से जुड़ा है। अर्देवी सुरा अनाहिता मध्य में अर्दवीसुर अनाहिद या नाहिद है और आधुनिक फारसी, अर्मेनियाई में अनाहित। सरस्वती की तरह, अनाहिता को उसके पिता अहुरा मज़्दा (ब्रह्मा) से शादी करने के लिए जाना जाता है। दोनों तीन कार्यों के तत्वों के अनुरूप हैं। जॉर्ज डूमज़िल ने प्रोटो-इंडो-यूरोपीय धर्म में शक्ति संरचना पर काम करने वाले एक दार्शनिक ने कहा कि अनाहिता वी 85-87 में योद्धाओं द्वारा 'आर्द्र, मजबूत और बेदाग' के रूप में विकसित किया गया है, तत्वों को तीसरे, दूसरे और दूसरे को प्रभावित करता है। पहला समारोह। और उन्होंने वैदिक देवी वाक्, परिभाषित भाषण के मामले में एक समान संरचना पर ध्यान दिया, जो पुरुष देवता मित्रा-वरुण (पहला कार्य), इंद्र-अग्नि (दूसरा कार्य) और दो अश्व (तीसरा कार्य) को बनाए रखने के रूप में प्रतिनिधित्व करता है। सरस्वती के बारे में कहा जाता है कि वह मां के गर्भ में भ्रूण का रोपण करती है।
आर्टेमिस, कुंवारी शिकारी
मिथरिक पंथ में, अनहिता को मिथरा की कुंवारी माँ माना जाता था। क्या यह सही है? यह देखना दिलचस्प है कि २५ दिसंबर को एक प्रसिद्ध फ़ारसी शीतकालीन त्योहार मैथैरिक परंपराओं से ईसाई धर्म में आया और क्रिसमस मनाया। रोमन साम्राज्य में मिथ्रावाद इतना लोकप्रिय था और ईसाई धर्म के महत्वपूर्ण पहलुओं के समान था कि कई चर्च पिता निश्चित रूप से, इसे संबोधित करने के लिए मजबूर थे। इन पिताओं में जस्टिन मार्टियर, टर्टुलियन, जूलियस फर्मिकस मेटरनस और ऑगस्टाइन शामिल थे, जिनमें से सभी ने इन हड़ताली पत्राचारों को प्रस्तोता शैतान के लिए जिम्मेदार ठहराया। दूसरे शब्दों में, मसीह की आशा करते हुए, शैतान ने आने वाले मसीहा की नकल करके पैगनों को मूर्ख बनाने के बारे में निर्धारित किया। हकीकत में, इन चर्च पिताओं की गवाही इस बात की पुष्टि करती है कि ये विभिन्न रूपांकनों, विशेषताओं, परंपराओं और मिथकों को ईसाई धर्म से प्रभावित करते हैं।
जापान में सरस्वती
बेनज़ाइटन हिंदू देवी सरस्वती का जापानी नाम है। बेन्ज़िटेन की पूजा 8 वीं शताब्दी के माध्यम से 6 वीं शताब्दी के दौरान जापान में पहुंची, मुख्य रूप से गोल्डन लाइट के सूत्र के चीनी अनुवादों के माध्यम से , जो उसके लिए समर्पित एक खंड है। लोटस सूत्र में उसका उल्लेख भी किया गया है और अक्सर एक पूर्वाग्रह , सरस्वती के विपरीत एक पारंपरिक जापानी लुटे का चित्रण किया जाता है , जो एक कड़े वाद्य यंत्र के रूप में जाना जाता है, जिसे वीणा कहा जाता है।
हड़प्पा की मुहरों में सरस्वती और उषा
One of the frequently occurring signs in the seal is the compound symbol which occurs on 236 seals. Many scholars have held that the Indus symbols are often conjugated. Thus the symbol can be seen as a compound between and the symbol which may represent the sceptre which designated royal authority and may thus be read as ‘Ras’. The symbol-pair occurs in 131 texts and in many copper plate inscriptions which shows its great religious significance. The ending ‘Tri’ or ’Ti’ is significant and cannot but remind one of the great Tri-names like Saraswati and Gayatri. As Uksha was often shortened to ‘Sa’ the sign-pair becomes Sarasa-tri or Sarasvati.
१२-१-२०२०
***
नवगीत
कौन नहीं?
*
कौन नहीं
दिव्यांग यहाँ है?
कौन नहीं विकलांग??
*
इसके पग में
जात-पाँत की
बेड़ी पड़ी हुई।
कर को कसकर
ऊँच-नीच जकड़े
हथकड़ी मुई।
छूत-अछूत
न मन से बिसरा
रहा अड़ाता टाँग
कौन नहीं
दिव्यांग यहाँ है?
कौन नहीं विकलांग??
*
तिलक-तराजू
की माया ने
बाँध दई ठठरी।
लोकतंत्र के
काँध लदी
परिवारवाद गठरी।
मित्रो! कह छलते
जनगण को जब-तब
रचकर स्वांग
कौन नहीं
दिव्यांग यहाँ है?
कौन नहीं विकलांग??
*
वैताली ममता
काँधे पर लदा
स्वार्थ वैताल।
चचा-भतीजा
आप ठोंकते
खोद अखाड़ा ताल।
सैनिक भूखा
करे सियासत
आरक्षण की माँग
कौन नहीं
दिव्यांग यहाँ है?
कौन नहीं विकलांग??
१२.१.२०१७
***
नवगीत:
.
दर्पण का दिल देखता
कहिए, जग में कौन?
.
आप न कहता हाल
भले रहे दिल सिसकता
करता नहीं खयाल
नयन कौन सा फड़कता?
सबकी नज़र उतारता
लेकर राई-नौन
.
पूछे नहीं सवाल
नहीं किसी से हिचकता
कभी न देता टाल
और न किंचित ललकता
रूप-अरूप निहारता
लेकिन रहता मौन
.
रहता है निष्पक्ष
विश्व हँसे या सिसकता
सब इसके समकक्ष
जड़ चलता या फिसलता
माने सबको एक सा
हो आधा या पौन
(मुखड़ा दोहा, अन्तरा सोरठा)
***
बाल नवगीत:
*
सूरज बबुआ!
चल स्कूल
.
धरती माँ की मीठी लोरी
सुनकर मस्ती खूब करी
बहिन उषा को गिरा दिया
तो पिता गगन से डाँट पड़ी
धूप बुआ ने लपक चुपाया
पछुआ लाई
बस्ता-फूल
सूरज बबुआ!
चल स्कूल
.
जय गणेश कह पाटी पूजन
पकड़ कलम लिख ओम
पैर पटक रो मत, मुस्काकर
देख रहे भू-व्योम
कन्नागोटी, पिट्टू, कैरम
मैडम पूर्णिमा के सँग-सँग
हँसकर
झूला झूल
सूरज बबुआ!
चल स्कूल
.
चिड़िया साथ फुदकती जाती
कोयल से शिशु गीत सुनो
'इकनी एक' सिखाता तोता
'अ' अनार का याद रखो
संध्या पतंग उड़ा, तिल-लड़ुआ
खा पर सबक
न भूल
सूरज बबुआ!
चल स्कूल
१२-१-२०१५
***
मुक्तिका:
है यही वाजिब...
*
है यही वाज़िब ज़माने में बशर ऐसे जिए।
जिस तरह जीते दिवाली रात में नन्हे दिए।।
रुख्सती में हाथ रीते ही रहेंगे जानते
फिर भी सब घपले-घुटाले कर रहे हैं किसलिए?
घर में भी बेघर रहोगे, चैन पाओगे नहीं,
आज यह, कल और कोई बाँह में गर चाहिए।।
चाक हो दिल या गरेबां, मौन ही रहना 'सलिल'
मेहरबां से हो गुजारिश- 'और कुछ फरमाइए'।।
आबे-जमजम की सभी ने चाह की लेकिन 'सलिल'
कोई तो हो जो ज़हर के घूँट कुछ हँसकर पिए।।
१२.१.२०१३
***

मंगलवार, 6 जनवरी 2026

जनवरी ६, सॉनेट, फ़साना, कोहरा, चक्की, सरस्वती, लघुकथा, मुक्तक, दोधक छंद,

सलिल सृजन जनवरी ६
पूर्णिका
तुम्हें न रुकना
मुझे न झुकना
.
हर ज़र्रे पर
हमला लिखना
.
फैला नफ़रत
हिंसा करना
.
बाहुबली से
पल-पल डरना
.
जहाँ लाभ हो
जबरन घुसना
.
सरकारों को
कुचल पलटना
.
लोकतंत्र को
दफना हँसना
.
जहाँ तेल हो
लपक झपटना
.
स्वार्थ साधने
बोल पलटना
.
निर्बल को बल
दिखा अकड़ना
.
टैरिफ दानव
मार विहँसना
.
भारत माता
आगे बढ़ना
.
सलिल नर्मदा 
निर्मल बहना
०००
पूर्णिका
भोर भई रवि हर अँधियारा
पौ फटते लाए उजियारा
.
कलरव कर खग गाए प्रभाती
कलकल ताप मिटाए सारा
.
अग्र वाल पर छंद-गीत रच
नव रस ने जीवन सिंगारा
.
आपद-विपद न शेष कहीं हो
कोशिश रहे पर्वताकारा
.
सलिल करें हँस पद प्रक्षालन
अमरनाथ का मिले सहारा
०००
दोहा सलिला
.
कोहरा सत्ता पक्ष सम, ठंडी हवा विपक्ष।
पीत सूर्य हैं राष्ट्रपति, घास शेर का भक्ष।।
.
ब्लोअर गीजर का हुआ, हर घर-घर में राज्य।
पाला से पाला पड़ा, घर-बाहर साम्राज्य।।
.
सिगड़ी-हीटर से बढ़ा, भाईचारा खूब।
कूलर-पंखे उपेक्षित, मौन रंज में डूब।।
.
खिड़की के पट बंद हैं, पटरानी बेजार।
कैसे झाँक पड़ोस का, हाल कहें चटखार।।
.
दर-दरवाजे पर नहीं, कोई पूछनहार।
कुंडी खटकाए हवा, शीतल कर सत्कार।।
.
सिगड़ी-गुरसी-काँगड़ी, चूल्हा राहत बाँट।
हुए लोक में लोकप्रिय, जैसे सोना खाँट।।
.
चाह चाय की बढ़ हुई, द्रुपद सुता का चीर।
नाकाफी कॉफी मुई, चुस्की लो धर धीर।।
६.१.२०२६
... 
सॉनेट
फ़साना
*
नए सिरे से फ़साना कहा-सुना जाए,
बदल न खुद को सके तो बदल लिए कपड़े,
न कोई बात तो बेबात ही मिले-झगड़े,
न हकीकत सहन तो ख्वाब ही बुना जाए ।
रुई नहीं तो चलो शीश ही धुना जाए,
जो ढोल पीट रहे; वे नहीं रहे अगड़े,
लड़े तकदीर से जो बढ़ गए नहीं पिछड़े,
कमी कहाँ है हमारी चलो गुना जाए।
करें जो काम तो अकाम हो बिसार सकें,
करें गलत न कभी; जो करें वही हो सही,
मिलें खुद से जो कभी, गमगुसार हो जाए ।
मिले जो नाम तो अनाम पे निसार सकें,
कभी गुमनाम न हो याद हसीं जो है तही,
लिखे नगमे जो कभी जिसके लिए वो गाए ।
***
सोनेट
कोहरा
*
कोहरा छाया राजनीति में, नहीं सूझती राह,
राह न रुचती सद्भावों की, सत्ता-पद का मोह,
जनसेवा व्यवसाय बनाकर करें देश से द्रोह,
अपने दुश्मन आप हुए हम, लड़ा रही है डाह ।
कहे न कोई वाह, चोट दे-पा भरते हैं आह,
फूटी आँख न कोई किसी को तनिक रहा है सोह,
लें कानून हाथ में जनगण रोज करे विद्रोह,
आम आदमी को न कहीं भी मिलती आज पनाह ।
कोहरा छाया संबंधों पर हुआ लापता नेह,
देह साध्य, आत्मा को कोई नहीं रहा पहचान,
भूल गए परमार्थ, स्वार्थ ही आज हो गया साध्य।
आँगन में उठती दीवारें, बिखर रहा है गेह,
क्रंदन करते-सुनते भूले, हम कोयल का गान,
तज विराटता; हुई क्षुद्रता कहिए क्यों आराध्य ।
६.१.२०२४
***
नव प्रयोग
(छंद- सॉनेट सोरठा)
नमन शारदे मातु, मति दे आत्मा जगा दे।
खुद की कर पहचान, काम सभी निष्काम कर।
कोई रहे न गैर, जीवन सकल ललाम कर।।
सविता ऊषा प्रात, नव उजास मन समा दे।।
सोते बीता जन्म, माँ झकझोर जगा हमें।
अनुशासन का पाठ, भूल गए कर याद लें।
मातृभूमि पर प्राण, कर कुर्बां मुस्का सकें।।
करें प्रकृति से प्रेम, पौधारोपण कर हँसें।।
नाद अनाहद भूल, भवसागर में सिसकते।
निष्फल रहे प्रयास, बाधित हो पग भटकते।
माता! थामो बाँह, छंद सिखा दो अटकते।।
मैया! सुत नादान, बुद्धि-ज्ञान दे तार दे।
जग मतलब का मीत, जननी अविकल प्यार दे।
कर माया से मुक्त, जीवन जरा निखार दे।।
६-१-२०२३, १०•२५
●●●
मुक्तक
तमन्ना है तमन्ना को सकें, सुन-समझ मिलकर संग।
सुनें अशआर नज़्में चंद, बिखरे ग़ज़ल के भी रंग।।
सलिल संजीव हो पाकर सखावत, हुनर कुछ सीखे।
समझदारों की संगत के, तनिक लायक बने-दीखे।।
६-१-२०२३
***
सॉनेट
चक्की
*
चक्की चलती समय की, पीस रही बारीक।
अलग सभी से दीख, बच जा कीली से चिपक।
दूर ईश से आत्म, काल करे स्वागत लपक।।
पक्षपात करती नहीं, सत्य सनातन लीक।।
चक्की पीसा ग्रहणकर, चले सृष्टि व्यापार।
अन्य पिसे तो हँसा, आप पिसा सब हँस रहे।
मोह जाल मजबूत, माया मृग जा फँस रहे।।
परम शक्ति गृहणी कुशल, पाले कह आभार।।
निशि-दिन चक्की पाट हैं, कीली है भगवान।
नादां प्रभु को भज बचे, जाने जीव सुजान।
हथदंडा है पुरोहित, दाना तू यजमान।
परम ब्रह्म है कील, सज समझ मौन मतिमान।।
शेष कर रहे भूल, भज सक न, भूल भगवान।।
कर्म-दंड चुप झेल, संबल प्रभु का गुणगान।।
६-१-२०२२
***
मुक्तक
विधान : ३०वर्ण, भ य र त म न स न भ य।
*
अंबर निराला, नीलिमा में लालिमा घोले, मगन मन लीन चुप है, कुछ न बोले।
उषा भास्कर उजाला, कालिमा पी मस्त हो डोले, मनुज जग गीत नव गा, उठ अबोले।।
करे स्वागत उसी का, भाग्य जो नैना न हो मूँदे, डगर पर हो विचरता, हर सवेरे।
बहाए हँस पसीना, कामना ले काम ना छोड़े, फिसल कर हो सँभलता, सफल हो ले।
६-१-२०२१
***
लघुकथा
समानाधिकार
*
"माय लार्ड! मेरे मुवक्किल पर विवाहेतर अवैध संबंध बनाने के आरोप में कड़ी से कड़ी सजा की माँग की जा रही है। उसे धर्म, नैतिकता, समाज और कानून के लिए खतरा बताया जा रहा है। मेरा निवेदन है कि अवैध संबंध एक अकेला व्यक्ति कैसे बना सकता है? संबंध बनने के लिए दो व्यक्ति चाहिए, दोनों की सहभागिता, सहमति और सहयोग जरूरी है। यदि एक की सहमति के बिना दूसरे द्वारा जबरदस्ती कर सम्बन्ध बनाया गया होता तो प्रकरण बलात्कार का होता किंतु इस प्रकरण में दोनों अलग-अलग परिवारों में अपने-अपने जीवन साथियों और बच्चों के साथ रहते हुए भी बार-बार मिलते औए दैहिक सम्बन्ध बनाते रहे - ऐसा अभियोजन पक्ष का आरोप है।
भारत का संविधान भाषा, भूषा, क्षेत्र, धर्म, जाति, व्यवसाय या लिंग किसी भी अधर पर भेद-भाव का निषेध कर समानता का अधिकार देता है। यदि पारस्परिक सहमति से विवाहेतर दैहिक संबंध बनाना अपराध है तो दोनों बराबर के अपराधी हैं, दोनों को एक सामान सजा मिलनी चाहिए अथवा दोनों को दोष मुक्त किया जाना चाहिए।अभियोजन पक्ष ने मेरे मुवक्किल के साथ विवाहेतर संबंध बनानेवाली के विरुद्ध प्रकरण दर्ज नहीं किया है, इसलिए मेरे मुवक्किल को भी सजा नहीं दी जा सकती।
वकील की दलील पर न्यायाधीश ने कहा- "वकील साहब आपने पढ़ा ही है कि भारत का संविधान एक हाथ से जो देता है उसे दूसरे हाथ से छीन लेता है। मेरे सामने जिसे अपराधी के रूप में पेश किया गया है मुझे उसका निर्णय करना है। जो अपराधी के रूप में प्रस्तुत ही नहीं किया गया है, उसका विचारण मुझे नहीं करना है। आप अपने मुवक्किल के बचाव में तर्क दे पर संभ्रांत महिला और उसके परिवार की बदनामी न हो इसलिए उसका उल्लेख न करें।"
अपराधी को सजा सुना दी गयी और सिर धुनता रह गया समानाधिकार।
****
नवगीत:
.
काल है संक्रांति का
तुम मत थको सूरज!
.
दक्षिणायन की हवाएँ
कँपाती हैं हाड़
जड़ गँवा, जड़ युवा पीढ़ी
काटती है झाड़
प्रथा की चूनर न भाती
फेंकती है फाड़
स्वभाषा को भूल, इंग्लिश
से लड़ाती लाड़
टाल दो दिग्भ्रान्ति को
तुम मत रुको सूरज!
*
उत्तरायण की फिज़ाएँ
बनें शुभ की बाड़
दिन-ब-दिन बढ़ता रहे सुख
सत्य की हो आड़
जनविरोधी सियासत को
कब्र में दो गाड़
झाँक दो आतंक-दहशत
तुम जलाकर भाड़
ढाल हो चिर शांति का
तुम मत झुको सूरज!
***
नवगीत:
*
सत्याग्रह के नाम पर.
तोडा था कानून
लगा शेर की दाढ़ में
मनमानी का खून
*
बीज बोकर हो गये हैं दूर
टीसता है रोज ही नासूर
तोड़ते नेता सतत कानून
सियासत है स्वार्थ से भरपूर
.
भगतसिंह से किया था अन्याय
कौन जाने क्या रहा अभिप्राय?
गौर तन में श्याम मन का वास
देश भक्तों को मिला संत्रास
.
कब कहाँ थे खो गये सुभाष?
बुने किसने धूर्तता के पाश??
समय कैसे कर सकेगा माफ़?
वंश का ही हो न जाए नाश.
.
तीन-पाँच पढ़ते रहे
अब तक जो दो दून
समय न छोड़े सत्य की
भट्टी में दे भून
*
नहीं सुधरे पटकनी खाई
दाँत पीसो व्यर्थ मत भाई
शास्त्री जी की हुई क्यों मौत?
अभी तक अज्ञात सच्चाई
.
क्यों दिये कश्मीरियत को घाव?
दहशतों का बढ़ गया प्रभाव
हिन्दुओं से गैरियत पाली
डूबा ही दी एकता की नाव
.
जान की बाजी लगाते वीर
जीतते हैं युद्ध सहकर पीर
वार्ता की मेज जाते हार
जमीं लौटा भोंकते हो तीर
.
क्यों बिसराते सत्य यह
बिन पानी सब सून?
अब तो बख्शो देश को
'सलिल' अदा कर नून
६.१.२०१७
***
लघुकथा
दस्तूर
*
अच्छे अच्छों का दीवाला निकालकर निकल गई दीपावली और आ गयी दूज...
सकल सृष्टि के कर्म देवता, पाप-पुण्य नियामक निराकार परात्पर परमब्रम्ह चित्रगुप्त जी और कलम का पूजन कर ध्यान लगा तो मनस-चक्षुओं ने देखा अद्भुत दृश्य.
निराकार अनहद नाद... ध्वनि के वर्तुल... अनादि-अनंत-असंख्य. वर्तुलों का आकर्षण-विकर्षण... घोर नाद से कण का निर्माण... निराकार का क्रमशः सृष्टि के प्रागट्य, पालन और नाश हेतु अपनी शक्तियों को तीन अदृश्य कायाओं में स्थित करना...
महाकाल के कराल पाश में जाते-आते जीवों की अनंत असंख्य संख्या ने त्रिदेवों और त्रिदेवियों की नाम में दम कर दिया. सब निराकार के ध्यान में लीन हुए तो हर चित्त में गुप्त प्रभु की वाणी आकाश से गुंजित हुई:
__ "इस समस्या के कारण और निवारण तुम तीनों ही हो. अपनी पूजा, अर्चना, वंदना, प्रार्थना से रीझकर तुम ही वरदान देते हो औरउनका दुरूपयोग होने पर परेशान होते हो. करुणासागर बनने के चक्कर में तुम निष्पक्ष, निर्मम तथा तटस्थ होना बिसर गये हो."
-- तीनों ने सोच:' बुरे फँसे, क्या करें कि परमपिता से डांट पड़ना बंद हो?'.
एक ने प्रारंभ कर दिया परमपिता का पूजन, दूसरे ने उच्च स्वर में स्तुति गायन तथा तीसरे ने प्रसाद अर्पण करना.
विवश होकर परमपिता को धारण करना पड़ा मौन.
तीनों ने विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका पर कब्जा किया और भक्तों पर करुणा करने के लिए बढ़ दिया दस्तूर।
***
लघुकथा
भाव ही भगवान
*
एक वृद्ध के मन में अंतिम समय में नर्मदा-स्नान की चाह हुई. लोगों ने बता दिया कि नर्मदा जी अमुक दिशा में कोसों दूर बहती हैं, तुम नहीं जा पाओगी. वृद्धा न मानी... भगवान् का नाम लेकर चल पड़ी...कई दिनों के बाद दिखी उसे एक नदी... उसने 'नरमदा तो ऐसी मिलीं रे जैसे मिल गै मताई औ' बाप रे' गाते हुए परम संतोष से डुबकी लगाई. कुछ दिन बाद साधुओं का एक दल आया... शिष्यों ने वृद्धा की खिल्ली उड़ाते हुए बताया कि यह तो नाला है. नर्मदा जी तो दूर हैं हम वहाँ से नहाकर आ रहे हैं. वृद्धा बहुत उदास हुई... बात गुरु जी तक पहुँची. गुरु जी ने सब कुछ जानने के बाद, वृद्धा के चरण स्पर्श कर कहा : 'जिसने भाव के साथ इतने दिन नर्मदा जी में नहाया उसके लिए मैया यहाँ न आ सकें इतनी निर्बल नहीं हैं. 'कंकर-कंकर में शंकर', 'मन चंगा तो कठौती में गंगा' का सत्य भी ऐसा ही है. 'भाव का भूखा है भगवान' जैसी लोकोक्ति इसी सत्य की स्वीकृति है. जिसने इस सत्य को गह लिया उसके लिये 'हर दिन होली, रात दिवाली' हो जाती है. मैया तुम्हें नर्मदा-स्नान का पुण्य है लेकिन जो नर्मदा जी तक जाकर भी भाव का अभाव मिटा नहीं पाया उसे नर्मदा-स्नान का पुण्य नहीं है. मैया! तुम कहीं मत जाओ, माँ नर्मदा वहीं हैं जहाँ तुम हो. भाव ही भगवान है''
१९.११.२०१५
***
नवगीत:
.
उठो पाखी!
पढ़ो साखी
.
हवाओं में शराफत है
फ़िज़ाओं में बगावत है
दिशाओं की इनायत है
अदाओं में शराफत है
अशुभ रोको
आओ खाखी
.
अलावों में लगावट है
गलावों में थकावट है
भुलावों में बनावट है
छलावों में कसावट है
वरो शुभ नित
बाँध राखी
.
खत्म करना अदावत है
बदल देना रवायत है
ज़िंदगी गर नफासत है
दीन-दुनिया सलामत है
शहद चाहे?
पाल माखी
***
मुक्तिका:
.
गीतों से अनुराग न होता
जीवन कजरी-फाग न होता
रास आस से कौन रचाता?
मौसम पहने पाग न होता
निशा उषा संध्या से मिलता
कैसे सूरज आग न होता?
बाट जोहता प्रिय प्रवास की
मन-मुँडेर पर काग न होता
चंदा कहलाती कैसे तुम
गर निष्ठुरता-दाग न होता?
नागिन क्वांरी रह जाती गर
बीन सपेरा नाग न होता
'सलिल' न होता तो सच मानो
बाट घाट घर बाग़ न होता
६-१-२०१५
***
छंद सलिला:
दोधक छंद
*
(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रा वज्रा, उपेन्द्र वज्रा, कीर्ति, घनाक्षरी, प्रेमा, वाणी, शक्तिपूजा, सार, माला, शाला, हंसी)
दोधक दो गुरु तुकान्ती पंक्तियों का मात्रिक छंद है. इस छंद में हर पंक्ति में ३ भगण तथा २ गुरु कुल १६ मात्राएँ तथा ११ वर्ण मात्राएँ होते हैं ।
उदाहरण:
१. काम न काज जिसे वह नेता।
झूठ कहे जन-रोष प्रणेता।।
तीन भगण दो गुरु मिल रचते, दोधक छंद ललाम
ग्यारह अक्षर सोलह मात्रा, तालमेल अभिराम
होश न हो पर जोश दिखाये।
लोक ठगा सुनता रह जाए।।
दे खुद ही खुद को यश सारा।
भोग रहा  को मद-मारा।।
२. कौन कहो सुख-चैन चुराते।
काम नहीं पर काम जताते।।
मोह रहे कब से मन मेरा।
रावण की भगिनी पग-फेरा।।
होकर बेसुध हाय लगाती।
निष्ठुर कौन? बनो मम साथी।।
स्त्री मुझ सी तुम सा नर पाये।
मान कहा, नहिं जीवन जाए।।
३. बंदर बालक एक सरीखे…
बात न मान करें मनमानी।
मान रहे खुद को खुद ज्ञानी।
कौन कहे कब क्या कर देंगे।
कूद गिरे उठ रो-हँस लेंगे।
ऊधम खूब करें, संग चीखें…
खा कम फेंक रहे मिल ज्यादा,
याद नहीं रहता निज वादा।
शांत रहें खाकर निज कसमें,
आज कहें बिसरें सब रस्में।
राह नहीं इनको कुछ दीखे…
६.१.२०१४
***
व्यंग्य रचना:
हो गया इंसां कमीना...
*
गली थी सुनसान, कुतिया एक थी जाती अकेली.
दिखे कुछ कुत्ते, सहम संकुचा उठी थी वह नवेली..
कहा कुत्तों ने: 'न डरिए, श्वान हैं इंसां नहीं हम.
आँच इज्जत पर न आएगी, भरोसा रखें मैडम..
जाइए चाहे जहाँ सर उठा, है खतरा न कोई.
आदमी से दूर रहिए, शराफत उसने है खोई..'
कहा कुतिया ने:'करें हड़ताल लेकर एक नारा.
आदमी खुद को कहे कुत्ता नहीं हमको गवारा..'
'ठीक कहती हो सखी तुम, जानवर कुछ तुरत बोले.
माँग हो अब जानवर खुद को नहीं इंसान बोले.
थे सभी सहमत, न अब इन्सान को मुँह लगायेंगे.
हो गया लुच्चा कमीना, आदमी को बताएँगे..
***
लघुकथा:
एकलव्य
संजीव 'सलिल'
*
- 'नानाजी! एकलव्य महान धनुर्धर था?'
- 'हाँ; इसमें कोई संदेह नहीं है.'
- उसने व्यर्थ ही भोंकते कुत्तों का मुंह तीरों से बंद कर दिया था ?'
-हाँ बेटा.'
- दूरदर्शन और सभाओं में नेताओं और संतों के वाग्विलास से ऊबे पोते ने कहा - 'काश वह आज भी होता.'
६.१.२०१३
***

गुरुवार, 4 दिसंबर 2025

दिसंबर ४, कहमुकरी, वास्तु, गृह प्रवेश, सरस्वती, मुक्तक, आव्हान गीत, स्वागत गीत, नवगीत

सलिल सृजन दिसंबर ४  

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कहमुकरी

वस्त्र सफेद पहनतीं हरदम
नयनों में ममता होती नम
अधरों पर मुस्कान सजाएँ
माँ? नहिं शारद;
आ! गुण गाएँ
रहे प्रतीक्षा इसकी सबको
कौन न चाहे कहिए इसको?
इस पर आए सबको प्यार
सखि! दिलदार?,
नहिं रविवार
काया छोटी; अर्थ बड़े
लगता रच दें खड़े-खड़े
मोह न छूटे जैसे नग का
वैसे नथ का?;
ना सखि! क्षणिका
बिंदु बिंदु संसार बना दे
रेखा खींचे भाव नया दे
हो अंदाज न उसकी मति का
सखी! शिक्षिका?,
नहीं अस्मिता
साथ बहारें उसके आएँ
मन करता है गीत सुनाएँ
साथ उसी के समय बिताएँ
प्यारी! कंत?,
नहीं बसंत
कभी न रीते उसका कोष
कोई न देता उसको दोष
रहता दूर हमेशा रोष
भैया! होश?,
ना संतोष
समझ न आए उसकी माया
पीछा कोई छुड़ा न पाया
संग-साथ उसका मन भाया
मीता! काया?,
ना रे! छाया
कभी न करती मिली रंज री!
रहती मौन न करे तंज री!
एक बचाकर कई बनाए
सखी! अंजुरी?,
नहीं मंजुरी
४-१२-२०२२
***
वास्तु विमर्श
गृह प्रवेश
मनुष्य के लिये अपना घर होना किसी सपने से कम नहीं होता। अपना घर यानि की उसकी अपनी एक छोटी सी दुनिया, जिसमें वह तरह-तरह के सपने सजाता है। पहली बार अपने घर में प्रवेश करने की खुशी कितनी होती है इसे सब समझ सकते हैं; अनुभव कर सकते हैं लेकिन बता नहीं सकते। यदि आप धार्मिक हैं, शुभ-अशुभ में विश्वास रखते हैं तो गृह प्रवेश से पहले पूजा अवश्य करवायें।
गृह प्रवेश के प्रकार
१. अपूर्व गृह प्रवेश – नवनिर्मित घर में पहली बार प्रवेश।
२. सपूर्व गृह प्रवेश – जब किसी कारण से व्यक्ति अपने परिवार सहित प्रवास पर हो, अपने घर को कुछ समय के लिये खाली छोड़ देते तथा दुबारा रहने के लिये आए।
३. द्वान्धव गृह प्रवेश – जब किसी परेशानी या किसी आपदा के चलते घर को छोड़ना पड़े और कुछ समय पश्चात दोबारा उस घर में प्रवेश करें तो वह द्वान्धव गृह प्रवेश कहलाता है।
४. अस्थाई गृह प्रवेश - किराए के माकन आदि में प्रवेश।
इन सभी स्थितियों में गृह प्रवेश पूजा का विधान आवश्यक है ताकि कि इससे घर में सुख-शांति बनी रहती है।
गृह प्रवेश की पूजा विधि
गृह प्रवेश के लिये शुभ दिन-तिथि-वार-नक्षत्र देख लें। किसी जानकार की सहायता लें, जो विधिपूर्वक पूजा करा सके अथवा स्वयं जानकारी लेकर यथोचित सामग्री एकत्रित कर पूजन करें। आपातस्थिति में कुछ भी न जुटा सकें तो विघ्न विनाशक श्री गणेश जी, जगत्पिता शिव जी, जगज्जननि दुर्गा जी, वास्तु देव तथा कुलदेव को दीप जलाकर श्रद्धा सहित प्रणाम कर ग्रह प्रवेश करें। पितृपक्ष तथा सावन माह में गृह प्रवेश न करें।
समय
माघ, फाल्गुन, वैशाख, ज्येष्ठ माह गृह प्रवेश हेतु शुभ हैं। आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, पौष ग्रह प्रवेश हेतु शुभ नहीं हैं। सामान्यत: मंगलवार शनिवार व रविवार के दिन गृह प्रवेश वर्जित है। सोमवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार तथा शुक्लपक्ष की द्वितीय, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी व त्रयोदशी गृहप्रवेश के लिये बहुत शुभ मानी जाती हैं।
गृह प्रवेश विधि
पूजन सामग्री- कलश, नारियल, शुद्ध जल, कुमकुम, चावल, अबीर, गुलाल, धूपबत्ती, पांच शुभ मांगलिक वस्तुएं, आम या अशोक के पत्ते, पीली हल्दी, गुड़, चावल, दूध आदि।
गृह के मुख्य द्वार पर आम्र पर्ण का बंदनवार बाँधकर रांगोली, अल्पना या चौक से सजाएँ। पूजा विधि संपन्न होने के बाद मंगल कलश के साथ सूर्य की रोशनी में नए घर में प्रवेश करना चाहिए।
घर को बंदनवार, रंगोली, फूलों से सजाकर; कलश में शुद्ध जल भरकर उसमें आम या अशोक के आठ पत्तों के बीच श्रीफल (नारियल) रखें। कलश व नारियल पर कुमकुम से स्वस्तिक का चिन्ह बनाएँ। गृह स्वामी और गृह स्वामिनी पाँच मांगलिक वस्तुएँ श्रीफल, पीली हल्दी, गुड़, अक्षत (चावल) व पय (दूध), विघ्नेश गणेश की मूर्ति, दक्षिणावर्ती शंख तथा श्री यंत्र लेकर मंगलकारी गीत गायन, शंख वादन आदि के साथ पुरुष पहले दाहिना पैर तथा स्त्री बाँया पैर रखकर नए घर में प्रवेश करें। इसके पूर्व पीतल या मिट्टी के कलश में जल भरकर द्वार पर कर आम के पाँच पत्ते लगाएँ, सिंदूर से स्वास्तिक बनाएँ। गृह स्वामिनी गणेश जी का स्मरण करते हुए ईशान कोण में जल से भरा कलश रखे। गृह स्वामी नारियल, पीली हल्दी, गुड़, चावल हाथ में ले, ग्रह स्वामिनी इन्हें साड़ी के पल्ले में रखें।
श्री गणेश का ध्यान करते हुए गणेश जी के मंत्र वाचन कर घर के ईशान कोण या पूजा घर में कलश की स्थापना करें। ततपश्चात भोजनालय में भी पूजा करें। चूल्हे, पानी रखने का स्थान, भंडार, आदि में स्वस्तिक बनाकर धूप, दीपक के साथ कुमकुम, हल्दी, चावल आदि से पूजन करें। भोजनालय में पहले दिन गुड़ व हरी सब्जियाँ रखना शुभ है। चूल्हे को जलाकर सबसे पहले उस पर दूध उफानना चाहिये, मिष्ठान बनाकर उसका भोग लगाना चाहिये। घर में बने भोजन से सबसे पहले भगवान को भोग लगायें। गौ माता, कौआ, कुत्ता, चींटी आदि के निमित्त भोजन निकाल कर रखें। इसके बाद सदाचारी विद्वानों व गरीब भूखे को भोजन कराएँ। ऐसा करने से घर में सुख, शांति व समृद्धि आती है व हर प्रकार के दोष दूर हो जाते हैं।
पूजन
षट्कर्म, तिलक, रक्षासूत्रबन्धन, भूमि पूजन, कलश पूजन, दीप पूजन, देव आह्वान, सर्व देव प्रणाम,. स्वस्तिवाचन, रक्षाविधान पश्चात् पूजा देवी पर वास्तु पुरुष का आह्वान-पूजन करें।
ॐ वास्तोष्पत्ते प्रतिजानीहि अस्मान् स्ववेशो अनमीवो भवा न:।
यत्त्वेमहे प्रतितन्नो जुषस्व, शन्नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे।। (ऋग्वेद ७.५.४.१)
ॐ भूर्भुव: स्व: वास्तुपुरुषाय नम:। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि।
गन्धाक्षतं पुष्पाणि, धूपं, दीपं, नैवेद्यं समर्पयामि। ततो नमस्कारं करोमि।
ॐ विशंतु भूतले नागा: लोकपालश्च सर्वत:।
मंडलेs त्रावतिष्ठंतु ह्यायुर्बलकरा: सदा।।
वास्तुपुरुष देवेश! सर्वविघ्न विदारण।
शन्ति कुरुं; सुखं देहि, यज्ञेsस्मिन्मम सर्वदा।।
यज्ञ : अग्निस्थापन, प्रदीपन, अग्निपूजन आदि कर २४ बार गायत्री मंत्र की आहुति दें। खीर, मिष्ठान्न, गौ-घृत से ५ आहुति स्थान देवता, वास्तुदेवता, कुलदेवता, राष्ट्र देवता तथा सर्व देवताओं को दें।
पूर्णाहुति, वसोर्धारा, आरती, प्रसाद वितरण आदि कर अनुष्ठान पूर्ण करें।
४.१२.२०२१
***
सरस्वती वंदना
*
तेरी वीणा का बन जाऊँ तार, ऐसा दे मुझको माँ वरदान।
जय माँ सरस्वती
विद्या-बुद्धि की तुम ही हो दाता, तुम्हीं सुर की देवी हो माता।
मैं भी जानूँ सुरों का सार, ऐसा दे मुझको माँ वरदान
आए चरणों में जो भी तुम्हारे, दूर अग्यान हों उसके सारे।
मन का मिट जाए सब अंधकार, ऐसा दे मुझको माँ वरदान
तब बहा ग्यान की ऐसी धारा, भेद मिट जाए मन का सारा।
प्रेम ज्योति जले द्वार-द्वार, ऐसा दे मुझको माँ वरदान
***
पल-पल प्रीत पली - महकी काव्य कली
चर्चाकार - आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
*
[पुस्तक विवरण - पल-पल प्रीत पली, काव्य संकलन, मधु प्रमोद, प्रथम संस्करण, २०१८, आईएसबीएन ९७८-८१-९३५५०१-३-७, आकार डिमाई, आवरण सजिल्द बहुरंगी, जैकेट सहित, पृष्ठ ११२, मूल्य २००रु., प्रकाशक उषा पब्लिकेशंस, मीणा की गली अलवर ३०१००१, दूरभाष ०१४४ २३३७३२८, चलभाष ९४१४८९३१२०, ईमेल mpalawat24@gmail.com ]
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मानव और अन्य प्राणियों में मुख्य अंतर सूक्षम अनुभूतियों को ग्रहण करना, अनुभूत की अनुभूति कर इस तरह अभिव्यक्त कर सकना कि अन्य जान सम-वेदना अनुभव करें, का ही है। सकल मानवीय विकास इसी धुरी पर केंद्रित रहा है। विविध भूभागों की प्रकृति और अपरिवेश के अनुकूल मानव ने प्रकृति से ध्वनि ग्रहण कर अपने कंठ से उच्चारने की कला विकसित की। फलत: वह अनुभूत को अभिव्यक्त और अभिव्यक्त को ग्रहण कर सका। इसका माध्यम बनी विविध बोलिया जो परिष्कृत होकर भाषाएँ बनीं। अभिव्यक्ति के अन्य माध्यम अंग चेष्टाएँ, भाव मुद्राएँ आदि से नाट्य व नृत्य का विकास हुआ जबकि बिंदु और रेखा से चित्रकला विकसित हुई। वाचिक अभिव्यक्ति गद्य व पद्य के रूप में सामने आई। विवेच्य कृति पद्य विधा में रची गयी है।
मरुभूमि की शान गुलाबी नगरी जयपुर निवासी कवयित्री मधु प्रमोद रचित १० काव्य कृतियाँ इसके पूर्व प्रकाशित हो चुकी हैं। आकाश कुसुम, दूर तुमसे रहकर, मन का आनंद, अकुल-व्याकुल मन, रू-ब-रू जो कह न पाए, भजन सरिता, भक्ति सरोवर पुजारन प्रभु के दर की, पट खोल जरा घट के के बाद पल-पल प्रीत पली की ९५ काव्य रचनाओं में गीत व हिंदी ग़ज़ल शिल्प की काव्य रचनाएँ हैं। मधु जी के काव्य में शिल्प पर कथ्य को वरीयता मिली है। यह सही है कि कथ्य को कहने के लिए लिए ही रचना की जाती है किन्तु यह भी उतना ही सही है कि शिल्पगत बारीकियाँ कथ्य को प्रभावी बनाती हैं।
ग़ज़ल मूलत: अरबी-फारसी भाषाओँ से आई काव्य विधा है। संस्कृत साहित्य के द्विपदिक श्लोकों में उच्चार आधारित लचीली साम्यता को ग़ज़ल में तुकांत-पदांत (काफिया-रदीफ़) के रूप में रूढ़ कर दिया गया है। उर्दू ग़ज़ल वाचिक काव्य परंपरा से उद्भूत है इसलिए भारतीय लोककाव्य की तरह गायन में लय बनाये रखने के लिए गुरु को लघु और लघु उच्चारित करने की छूट ली गयी है। हिंदी ग़ज़ल वैशिष्ट्य उसे हिंदी व्याकरण पिंगल के अनुसार लिखा जाना है। हिंदी छंद शास्त्र में छंद के मुख्य दो प्रकर मातृ और वार्णिक हैं। अत, हिंदी ग़ज़ल इन्हीं में से किसी एक पर लिखी जाती है जबकि फ़ारसी ग़ज़ल के आधार पर भारतीय भाषाओँ के शब्द भंडार को लेकर उर्दू ग़ज़ल निर्धारित लयखण्डों (बह्रों) पर आधारित होती हैं। मधु जी की ग़ज़लनुमा रचनाएँ हिंदी ग़ज़ल या उर्दू ग़ज़ल की रीती-निति से सर्वथा अलग अपनी राह आप बनाती हैं। इनमें पंक्तियों का पदभार समान नहीं है, यति भी भिन्न-भिन्न हैं, केवक तुकांतता को साधा गया है।
इन रचनाओं की भाषा आम लोगों द्वारा दैनंदिन जीवन में बोली जानेवाली भाषा है। यह मधु जी की ताकत और कमजोरी दोनों है। ताकत इसलिए कि इसे आम पाठक को समझने में आसानी होती है, कमजोरी इसलिए कि इससे रचनाकार की स्वतंत्र शैली या पहचान नहीं बनती। मधु जी बहुधा प्रसाद गुण संपन्न भाषा और अमिधा में अपनी बात कहती है। लक्षणा या व्यजना का प्रयोग अपेक्षाकृत कम है। उनकी ग़ज़लें जहाँ गीत के निकट होती हैं, अधिक प्रभाव छोड़ती हैं -
मन मुझसे बातें करता है, मैं मन से बतियाती हूँ।
रो-रोकर, हँस-हँसकर जीवन मैं सहज कर पाती हूँ।
पीले पत्ते टूटे सारे, देखो हर एक डाल के
वृद्ध हैं सारे बैठे हुए नीचे उस तिरपाल के
मधु जी के गीत अपेक्षाकृत अधिक भाव प्रवण हैं-
मैंने हँसना सीख लिया है, जग की झूठी बातों पर
सहलाये भूड़ घाव ह्रदय के रातों के सन्नाटों पर
विश्वासों से झोली भरकर आस का दीप जलाने दो
मुझको दो आवाज़ जरा तुम, पास तो मुझको आने दो
किसी रचनाकार की दसवीं कृति में उससे परिपक्वता की आशा करना बेमानी नाहने है किन्तु इस कृति की रचनाओं को तराशे जाने की आवश्यकता प्रतीत होती है। गीति रचनाओं में लयबद्धता, मधुरता, सरसता, लाक्षणिकता, संक्षिप्तता आदि होना उन्हें स्मरणीय बनाता है। इस संकलन की रचनाएँ या आभास देती हैं कि रचनाकार को उचित मार्गदर्शन मिले तो वे सफल और सशक्त गीतकार बन सकती हैं।
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संपर्क - आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’, विश्व वाणी हिन्दी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१ मध्य प्रदेश, चलभाष ७९९९५५९६१८, ईमेल salil.sanjiv@gmail.com
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कृति चर्चा :
गीत स्पर्श : दर्द के दरिया में नहाये गीत
चर्चाकार - आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
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[कृति विवरण: गीत स्पर्श, गीत संकलन, डॉ. पूर्णिमा निगम ‘पूनम’, प्रथम संस्करण २००७, आकार २१.से.मी. x १३.से.मी., आवरण बहुरंगी पेपरबैक, पृष्ठ १२२, मूल्य १५० रु., निगम प्रकाशन २१० मढ़ाताल जबलपुर। ]
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साहित्य संवेदनाओं की सदानीरा सलिला है। संवेदनाविहीन लेखन गणित की तरह शुष्क और नीरस विज्ञा तो हो सकता है, सरस साहित्य नहीं। साहित्य का एक निकष ‘सर्व हिताय’ होना है। ‘सर्व’ और ‘स्व’ का संबंध सनातन है। ‘स्व’ के बिना ‘सर्व’ या ‘सर्व’ के बिना ‘स्व’ की कल्पना भी संभव नहीं। सामान्यत: मानव सुख का एकांतिक भोग करना चाहता है जबकि दुःख में सहभागिता चाहता है।इसका अपवाद साहित्यिक मनीषी होते हैं जो दुःख की पीड़ा को सहेज कर शब्दों में ढाल कर भविष्य के लिए रचनाओं की थाती छोड़ जाते हैं। गीत सपर्श एक ऐसी ही थाती है कोकिलकंठी शायरा पूर्णिमा निगम ‘पूनम’ की जिसे पूनम-पुत्र शायर संजय बादल ने अपनी माता के प्रति श्रद्धांजलि के रूप में प्रकाशित किया है। आज के भौतिकवादी भोगप्रधान कला में दिवंगता जननी के भाव सुमनों को सरस्वती के श्री चरणों में चढ़ाने का यह उद्यम श्लाघ्य है।
गीत स्पर्श की सृजनहार मूलत: शायरा रही है। वह कैशोर्य से विद्रोहणी, आत्मविश्वासी और चुनौतियों से जूझनेवाली रही है। ज़िंदगी ने उसकी कड़ी से कड़ी परीक्षा ली किन्तु उसने हार नहीं मानी और प्राण-प्राण से जूझती रही। उसने जीवन साथी के साथ मधुर सपने देखते समय, जीवन साथी की ज़िंदगी के लिए जूझते समय, जीवनसाथी के बिछुड़ने के बाद, बच्चों को सहेजते समय और बच्चों के पैरों पर खड़ा होते ही असमय विदा होने तक कभी सहस और कलम का साथ नहीं छोड़ा। कुसुम कली सी कोमल काया में वज्र सा कठोर संकल्प लिए उसने अपनों की उपेक्षा, स्वजनों की गृद्ध दृष्टि, समय के कशाघात को दिवंगत जीवनसाथी की स्मृतियों और नौनिहालों के प्रति ममता के सहारे न केवल झेला अपितु अपने पौरुष और सामर्थ्य का लोहा मनवाया।
गीत स्पर्श के कुछ गीत मुझे पूर्णिमा जी से सुनने का सुअवसर मिला है। वह गीतों को न पढ़ती थीं, न गाती थीं, वे गीतों को जीती थीं, उन पलों में डूब जाती थीं जो फिर नहीं मिलनेवाले थे पर गीतों के शब्दों में वे उन पलों को बार-बार जी पाती थी। उनमें कातरता नहीं किन्तु तरलता पर्याप्त थी। इन गीतों की समीक्षा केवल पिंगलीय मानकों के निकष पर करना उचित नहीं है। इनमें भावनाओं की, कामनाओं की, पीरा की, एकाकीपन की असंख्य अश्रुधाराएँ समाहित हैं। इनमें अदम्य जिजीविषा छिपी है। इनमें अगणित सपने हैं। इनमें शब्द नहीं भाव हैं, रस है, लय है। रचनाकार प्राय: पुस्तकाकार देते समय रचनाओं में अंतिम रूप से नोक-फलक दुरुस्त करते हैं। क्रूर नियति ने पूनम को वह समय ही नहीं दिया। ये गीत दैनन्दिनी में प्रथमत: जैसे लिखे गए, संभवत: उसी रूप में प्रकाशित हैं क्योंकि पूनम के महाप्रस्थान के बाद उसकी विरासत बच्चों के लिए श्रद्धा की नर्मदा हो गई हिअ जिसमें अवगण किया जा सकता किन्तु जल को बदला नहीं जा सकता। इस कारण कहीं-कहीं यत्किंचित शिल्पगत कमी की प्रतीति के साथ मूल भाव के रसानंद की अनुभूति पाठक को मुग्ध कर पाती है। इन गीतों में किसी प्रकार की बनावट नहीं है।
पर्सी बायसी शैली के शब्दों में ‘ओवर स्वीटेस्ट सांग्स आर दोस विच टेल ऑफ़ सेडेस्ट थॉट’। शैलेन्द्र के शब्दों में- ‘हैं सबसे मधुर वो गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं’। पूनम का दर्द के साथ ताज़िंदगी बहुत गहरा नाता रहा -
भीतर-भीतर रट रहना, बहार हंसकर गीत सुनाना
ऐसा दोहरा जीवन जीना कितना बेमानी लगता है?
लेकिन इसी बेमानीपन में ज़िंदगी के मायने तलाशे उसने -
अब यादों के आसमान में, बना रही अपना मकान मैं
न कहते-कहते भी दिल पर लगी चोट की तीस आह बनकर सामने आ गयी -
जान किसने मुझे पुकारा, लेकर पूनम नाम
दिन काटे हैं मावस जैसे, दुःख झेले अविराम
जीवन का अधूरापन पूनम को तोड़ नहीं पाया, उसने बच्चों को जुड़ने और जोड़ने की विरासत सौंप ही दी -
जैसी भी है आज सामने, यही एक सच्चाई
पूरी होने के पहले ही टूट गयी चौपाई
अब दीप जले या परवाना वो पहले से हालात नहीं
पूनम को भली-भाँति मालूम था कि सिद्धि के लिए तपना भी पड़ता है -
तप के दरवाज़े पर आकर, सिद्धि शीश झुकाती है
इसीलिए तो मूर्ति जगत में, प्राण प्रतिष्ठा पाती है
दुनिया के छल-छलावों से पूनम आहात तो हुई पर टूटी नहीं। उसने छलियों से भी सवाल किये-
मैंने जीवन होम कर दिया / प्रेम की खातिर तब कहते हो
बदनामी है प्रेम का बंधन / कुछ तो सोची अब कहते हो।
लेकिन कहनेवाले अपनी मान-मर्यादा का ध्यान नहीं रख सके -
रिश्ते के कच्चे धागों की / सब मर्यादाएँ टूट गयीं
फलत:,
नींद हमें आती नहीं है / काँटे सा लगता बिस्तर
जीवन एक जाल रेशमी / हम हैं उसमें फँसे हुए
नेक राह पकड़ी थी मैंने / किन्तु जमाना नेक नहीं
'बदनाम गली' इस संग्रह की अनूठी रचना है। इसे पढ़ते समय गुरु दत्त की प्यासा और 'जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ है' याद आती है। कुछ पंक्तियाँ देखें-
रिश्ता है इस गली से भाई तख्तो-ताज का / वैसे ही जैसे रिश्ता हो चिड़ियों से बाज का
जिनकी हो जेब गर्म वो सरकार हैं यहाँ / सज्जन चरित्रवान नोचते हैं बोटियाँ
वो हाथ में गजरा लपेटे आ रहे हैं जो / कपड़े की तीन मिलों को चला रहे हैं वो
रेखा उलाँघती यहाँ सीता की बेटियाँ / सलमा खड़ी यहाँ पे कमाती है रोटियाँ
इनको भी माता-बहनों सा सत्कार चाहिए / इनको भी प्रजातन्त्र के अधिकार चाहिए
अपने दर्द में भी औरों की फ़िक्र करने का माद्दा कितनों में होता है। पूनम शेरदिल थी, उसमें था यह माद्दा। मिलन और विरह दोनों स्मृतियाँ उसको ताकत देती थीं -
तेरी यादे तड़पाती हैं, और हमें हैं तरसातीं
हुई है हालत मेरी ऐसी जैसे मेंढक बरसाती
आदर्श को जलते देख रही / बच्चों को छलते देख रही
मधुर मिलान के स्वप्न सुनहरे / टूट गए मोती मानिंद
अब उनकी बोझिल यादें हैं / हल्के-फुल्के लम्हात नहीं
ये यादें हमेशा बोझिल नहीं कभी-कभी खुशनुमा भी होती हैं -
एक तहजीब बदन की होती है सुनो / उसको पावन ऋचाओं सा पढ़कर गुनो
तन की पुस्तक के पृष्ठ भी खोले नहीं / रात भर एक-दूसरे से बोले नहीं
याद करें राजेंद्र यादव का उपन्यास 'सारा आकाश'।
एक दूजे में मन यूँ समाहित हुआ / झूठे अर्पण की हमको जरूरत नहीं
जीवन के विविध प्रसगों को कम से कम शब्दों में बयां करने की कला कोई पूनम से सीखे।
उठो! साथ दो, हाथ में हाथ दो, चाँदनी की तरह जगमगाऊँगी मैं
बिन ही भाँवर कुँवारी सुहागन हुई, गीत को अपनी चूनर बनाऊँगी मैं
देह की देहरी धन्य हो जाएगी / तुम अधर से अधर भर मिलाते रहो
लाल हरे नीले पिले सब रंग प्यार में घोलकर / मन के द्वारे बन्दनवारे बाँधे मैंने हँस-हँसकर
आँख की रूप पर मेहरबानी हुई / प्यार की आज मैं राजधानी हुई
राग सीने में है, राग होंठों पे है / ये बदन ही मेरा बाँसुरी हो गया
साँस-साँस होगी चंदन वन / बाँहों में जब होंगे साजन
गीत-यात्री पूनम, जीवन भर अपने प्रिय को जीती रही और पलक झपकते ही महामिलन के लिए प्रस्थान कर गयी -
पल भर की पहचान / उम्र भर की पीड़ा का दान बन गई
सुख से अधिक यंत्रणा / मिलती है अंतर के महामिलन में
अनूठी कहन, मौलिक चिंतन, लयबद्ध गीत-ग़ज़ल, गुनगुनाते-गुनगुनाते बाँसुरी सामर्थ्य रखनेवाली पूनम जैसी शख्सियत जाकर भी नहीं जाती। वह जिन्दा रहती है क़यामत मुरीदों, चाहनेवालों, कद्रदानों के दिल में। पूनम का गीत स्पर्श जब-जब हाथों में आएगा तब- तब पूनम के कलाम के साथ-साथ पूनम की यादों को ताज़ा कर जाएगा। गीतों में अपने मखमली स्पर्श से नए- नए भरने में समर्थ पूनम फिर-फिर आएगी हिंदी के माथे पर नयी बिंदी लिए।हम पहचान तो नहीं सकते पर वह है यहीं कहीं, हमारे बिलकुल निकट नयी काया में। उसके जीवट के आगे समय को भी नतमस्तक होना ही होगा।
३-१२-२०१९
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मुक्तक सलिला
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प्रात मात शारदा सुरों से मुझे धन्य कर।
शीश पर विलंब बिन धरो अनन्य दिव्य कर।।
विरंचि से कहें न चित्रगुप्त गुप्त चित्र हो।
नर्मदा का दर्श हो, विमल सलिल सबल मकर।।
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मलिन बुद्धि अब अमल विमल हो श्री राधे।
नर-नारी सद्भाव प्रबल हो श्री राधे।।
अपराधी मन शांत निबल हो श्री राधे।
सज्जन उन्नत शांत अचल हो श्री राधे।।
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जागिए मत हे प्रदूषण, शुद्ध रहने दें हवा।
शांत रहिए शोरगुल, हो मौन बहने दें हवा।।
मत जगें अपराधकर्ता, कुंभकर्णी नींद लें-
जी सके सज्जन चिकित्सक या वकीलों के बिना।।
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विश्व में दिव्यांग जो उनके सहायक हों सदा।
एक दिन देकर नहीं बनिए विधायक, तज अदा।
सहज बढ़ने दें हमें, चढ़ सकेंगे हम सीढ़ियाँ-
पा सकेंगे लक्ष्य चाहे भाग्य में हो ना बदा।।
२-१२-२०१९
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मुक्तक
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संवेदना की सघनता वरदान है, अभिशाप भी.
अनुभूति की अभिव्यक्ति है, चीत्कार भी, आलाप भी.
निष्काम हो या काम, कारित कर्म केवल कर्म है-
पुण्य होता आज जो, होता वही कल पाप है.
छंद- हरिगीतिका
४-१२-२०१७
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आव्हान गीत
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जीवन-पुस्तक बाँचकर,
चल कविता के गाँव.
गौरैया स्वागत करे,
बरगद देगा छाँव.
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कोयल दे माधुर्य-लय,
देगी पीर जमीन.
काग घटाता मलिनता,
श्रमिक-कृषक क्यों दीन?
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सोच बदल दे हवा, दे
अरुणचूर सी बाँग.
बीना बात मत तोड़ना,
रे! कूकुर ली टाँग.
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सभ्य जानवर को करें,
मनुज जंगली तंग.
खून निबल का चूसते,
सबल महा मति मंद.
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देख-परख कवि सत्य कह,
बन कबीर-रैदास.
मिटा न पाए, न्यून कर
पीडित का संत्रास.
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श्वान भौंकता, जगाता,
बिना स्वार्थ लख चोर.
तू तो कवि है, मौन क्यों?
लिख-गा उषा अँजोर.
३-१२-२०१७
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गीत
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आकर भी तुम आ न सके हो
पाकर भी हम पा न सके हैं
जाकर भी तुम जा न सके हो
करें न शिकवा, हो न शिकायत
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यही समय की बलिहारी है
घटनाओं की अय्यारी है
हिल-मिलकर हिल-मिल न सके तो
किसे दोष दे, करें बगावत
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अपने-सपने आते-जाते
नपने खपने साथ निभाते
तपने की बारी आई तो
साये भी कर रहे अदावत
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जो जैसा है स्वीकारो मन
गीत-छंद नव आकारो मन
लेना-देना रहे बराबर
इतनी ही है मात्र सलाहत
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हर पल, हर विचार का स्वागत
भुज भेंटो जो दर पर आगत
जो न मिला उसका रोना क्यों?
कुछ पाया है यही गनीमत
३-१२-२०१६
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स्वागत गीत:
नवगीत महोत्सव २०१४
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शुभ नवगीत महोत्सव, आओ!
शब्दब्रम्ह-हरि आराधन हो
सत-शिव-सुंदर का वाचन हो
कालिंदी-गोमती मिलाओ
नेह नर्मदा नवल बहाओ
'मावस को पूर्णिमा बनाओ
शब्दचित्र-अंकन-गायन हो
सत-चित-आनंद पारायण हो
निर्मल व्योम ओम मुस्काओ
पंकज रमण विवेक जगाओ
संजीवित अवनीश सजाओ
रस, लय, भाव, कथ्य शुचि स्वागत
पवन रवीन्द्र आस्तिक आगत
श्रुति सौरभ पंकज बिखराओ
हो श्रीकांत निनाद गुँजाओ
रोहित ब्रज- ब्रजेश दिखलाओ
भाषा में कुछ टटकापन हो
रंगों में कुछ चटकापन हो
सीमा अमित सुवर्णा शोभित
सिंह धनंजय वीनस रोहित
हो प्रवीण मन-राम रमाओ
लख नऊ दृष्टि हुई पौबारा
लखनऊ में गूँजे जयकारा
वाग्नेर-संध्या हर्षाओ
हँस वृजेन्द्र सौम्या नभ-छाओ
रसादित्य जगदीश बसाओ
नऊ = नौ = नव
१०-११-२०१४
- १२६/७ आयकर कॉलोनी
विनायकपुर, कानपुर
समयाभाव के कारण पढ़ा नहीं गया
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मुक्तक:
दे रहे हो तो सारे गम दे दो
चाह इतनी है आँखें नम दे दो
होंठ हँसते रहें हमेशा ही
लो उजाले, दो मुझे तम दे दो
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(पूज्य मौसाजी श्री प्रमोद सक्सेना तथा मौसीजी श्रीमती कमलेश सक्सेना के प्रति)
शीश धर पैर में मैं नमन कर सकूँ
पीर मुझको मिले, शूल मुझको मिलें
धूल चरणों की मैं माथ पर धर सकूँ
ऐसी किस्मत नहीं, भाग्य ऐसा नहीं
रह सकूँ साथ में आपके मैं सदा-
दूर हूँ पर न दिल से कभी दूर हूँ
प्रार्थना देव से पीर कुछ हर सकूँ
३-१२-२०१५
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गीत:
चलो चलें
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चलो चलें अब और कहीं
हम चलो चलें.....
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शहरी कोलाहल में दम घुटता हरदम.
जंगल कांक्रीट का लहराता परचम..
अगल-बगलवाले भी यहाँ अजनबी हैं-
घुटती रहती साँस न आता दम में दम..
ढाई इंच मुस्कान तजें,
क्यों और छलें?....
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रहें, बाँहें, चाहें दूर न रह पायें.
मिटा दूरियाँ अधर-अधर से मिल गायें..
गाल गुलाबी, नयन शराबी मन मोहें-
मन कान्हा, तन गोपी रास रचा पायें..
आँखों में सतरंगी सपने,
पल न ढलें.....
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चल मेले में चाट खाएँ, चटखारे लें,
पेंग भरें झूला चढ़ आसमान छू लें..
पनघट की पगडंडी पर खलिहान चले-
अमराई में शुक-मैना सब जग भूलें..
मिलन न आये रास जिन्हें
वे 'सलिल' जलें.....
४-१२-२०१०
***