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शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

जनवरी १६, रातरानी, सॉनेट, कुंडलिया, भाषा विज्ञान, गीता, शिव, गीत, नाग, चीता, सूर्य

सलिल सृजन जनवरी १६
पौधारोपण ही मानव स्वास्थ्य हेतु अपरिहार्य- संजीव वर्मा सलिल'

            जबलपुर। ''पौधारोपण मानव स्वास्थ्य हेतु अपरिहार्य है। कोरोना काल और दिल्ली की आबोहवा खतरे की घंटी बज चुकी हैं। मनुष्य ने हरियाली नष्ट करना न छोड़ा तो वह खुद नष्ट हो जाएगा। हमें धरती के चप्पे-चप्पे पर पौधे लगाकर उन्हें पेड़ बनाना होगा। पेड़ मनुष्य के पूर्वज और वंशज दोनों हैं। जन मानव नहीं था तब भी पेड़-पौधे थे और जब मानव नहीं रहेगा तब भी पेड़-पौधे रहेंगे।'' यह विचार इंडियन जिओटेक्नीकल सोसायटी जबलपुर चैप्टर के अध्यक्ष, विश्ववाणी हिन्दी संस्थान अभियान जबलपुर के सभापति इंजी. संजीव वर्मा 'सलिल' ने स्थानीय गुरु रामदास खालसा इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के परिसर में पौधारोपण करते हुए व्यक्त किए। पानी की कमी को देखते हुए परिसर में विद्यार्थियों द्वारा फेंकी गई प्लास्टिक बोतलों का प्रयोग कर बूँद-बूँद सिंचाई का तरीका भी सिखाया।


            प्राचार्य डॉ. राज मेहता ने ३२५ पौधे और कलमें आरोपित किए जाने पर हर्ष व्यक्त करते हुए पानी और हरियाली संरक्षण के प्रति विद्यार्थियों को जागृत करते हुए दोनों संस्थाओं का पौधे उपलब्ध कराने के लिए आभार व्यक्त किया। डॉ. विक्टोरिया प्रधायपक कृषि अभियांत्रिकी तथा छात्रों-छात्राओं ने पौधारोपण करते हुए उनके संरक्षण का संकल्प लिया। इंजी. व्ही.पी. विश्वकर्मा ने बताया कि विदेशों में निर्माण कार्यों हेतु वृक्षों को काटा नहीं जाता, जड़ों सहित स्थानांतरित कर दिया जाता है। पौधरोपण में संजय मिश्र, सौरभ विश्वकर्मा, अनामिका सेन, विवेक चतुर्वेदी, रश्मि मिश्रा आदि का उल्लेखनीय सहयोग रहा।
०००
पूर्णिका
.
चोर, पढ़ाकू, पहरेदार
सारी रात जगे सरकार! 
नेता रचते जाग कुचक्र
जगे विरहिणी तज सिंगार।
चमगादड़ उलूक बिन नींद
करें अँधेरे से ही प्यार।
पर्वत सागर नभ धरती
सोने से करते इंकार।
मछली नहीं मूँदती नैन
कभी न सोता तारणहार।
१६.१.२०२६
०००
रातरानी
रातरानी
खींचती है गंध-रेखा
कर रहा है समय क्यों
यह सच अदेखा?
जिंदगी निर्गंध
क्या अच्छी लगेगी?
फैलती दुर्गंध
क्या मन को रुचेगी?
गर नहीं तो
रातरानी बनें हम सब।
स्नेह का परिमल बिखेरें
भुला जब-तब।
महमहाए श्वास
पूरी आस हो हर।
नर्मदा में नहा गाएँ
गीत मनहर।।
१६.१.२०२५
०००
सॉनेट
सूफियाना सोनेट :
-------------------
साकी! जब हो स्याह जमाना
रौशन कर दूँ मैं चराग बन,
दिल में जलता सिर्फ आग बन,
अंधकार में मुझे जलाना।
नहीं भुलाकर मुझे सताना,
साथ रहूँगा मैं सुहाग बन,
बसूँ साँस में अमिट राग बन,
कर आलिंगन हृदय बसाना।
रौशन करूँ अंजुमन सारी,
करो निगाहे-करम अगर तुम,
हो निसार तुम पर जाऊँ मैं।
मैं राधा तुम हो बनवारी,
मिलकर अब न अलग होंगे हम,
तुममें ही गम हो जाऊँ मैं।
***
कुंडलिया
अंग अंग जेवर सजा, बनीं लक्ष्मी आप।
नर को मिला न एक भी, ज्यों पाया हो शाप।।
ज्यों पाया हो शाप, मजूरी करता सूरज।
उषा दुपहरी शाम, रात अलबेली सज-धज।।
माता भाभी बहिन, बीबी मिल करतीं तंग।
नर की किस्मत वाम, हारता घर में ही जंग।।
***
समस्यापूर्ति
विधा :- पद्य (सोनेट, इतालवी शैली)
विषय : झरोखे से झाँकते नयन करे इंतज़ार
*
झरोखे से झाँकते नयन करें इंतज़ार
सूर्य साथ उषा देख नींद छोड़ हाथ जोड़,
आलस तज उठ भू को कर प्रणाम मुँह न मोड़,
अपनों के सपनों को करना साकार यार।
लेना कम देना है ज्यादा ही बार बार,
ईश सुमिर ले-दे आशीष तू प्रथा न तोड़,
बैर भाव पाल नहीं, द्वेष जलन तुरत छोड़,
गैर कौन? सब अपने बाँट सदा सहज प्यार।
सोने के हिरना को मन खोजे छाँट-छाँट,
लछमन रेखा न लाँघ, पैर नहीं मोड़ा था,
तापस में निशिचर था पर मन को कब दीखा?
गगरी का काव्यामृत छलक रहा बाँट बाँट
गोकुल के कान्हा ने माखन कब जोड़ा था?
लूटा झट लुटा दिया, मन तूने क्या सीखा?
***
लेख-
भारतीय भाषा विज्ञान की समृद्ध परंपरा
*
संस्कृत और आधुनिक भारतीय भाषाएँ भिन्न कालों की भाषाएँ हैं। एक काल की भाषा पर दूसरे काल की भाषा के नियमों को नहीं थोपा जा सकता। संस्कृत और आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं की व्यवस्थाओं एवं संरचनाओं के अन्तर नकारा नहीं जा सकता। किसी भाषा के व्याकरण के नियमों को दूसरी किसी अन्य भाषा पर थोपना गलत है। भाषाविज्ञान का यह सार्वदेशिक एवं सार्वकालिक नियम है। भाषा नदी की धारा की तरह होती है। नदी की धारा को अनियंत्रित, अमर्यादित एवं बेलगाम नहीं होने दिया ज सकता। नदी की धारा खुद अपने तटों के द्वारा मर्यादित रहती है। भाषा अपने व्याकरण की व्यवस्था एवं संरचना के तटों के द्वारा मर्यादित रहती है। भाषा में बदलाव एवं ठहराव दोनों साथ-साथ रहते हैं।
‘शब्दावली’ गतिशील एवं परिवर्तनशील है। व्याकरण भाषा को ठहराव प्रदान करता है। ऐसा नहीं है कि ‘व्याकरण’ कभी बदलता नहीं है। व्याकरण भी बदलता है मगर बदलाव की रफ़तार बहुत धीमी होती है। ‘शब्द’ आते-जाते रहते हैं। हम विदेशी अथवा अन्य भाषा से शब्द तो आसानी से ले लेते हैं मगर उनको अपनी भाषा की प्रकृति के अनुरूप ढाल लेते हैं। ‘शब्द’ को अपनी भाषा के व्याकरण की पद रचना के अनुरूप विभक्ति एवं परसर्ग लगाकर अपना बना लेते हैं। हम यह नहीं कहते कि मैंने चार ‘फिल्म्स' देखीं; हम कहते हैं कि मैंने चार फिल्में देखीं।
संस्कृत के महान वैयाकरणों एवं निरुक्तकारों का योगदान ही नहीं, प्रातिशाख्यों तथा शिक्षा-ग्रंथों में भाषाविज्ञान और विशेष रूप से ध्वनि विज्ञान से सम्बंधित सूक्ष्मदर्शी और गहन विचार हमारी कालजयी विरासत है। भारतीय भाषाविज्ञान की परम्परा बहुत समृद्ध है और उसमें न केवल वैदिक संस्कृत और लौकिक संस्कृत के भाषाविद् समाहित हैं अपितु प्राकृतों एवं अपभ्रंशों के भाषाविद् भी समाहित हैं।
पाणिनी ने अपने काल के पूर्व के १० आचार्यों का उल्लेख किया है। उन आचार्यों ने वेदों के काल की छान्दस् भाषा पर कार्य किया था। पाणिनी ने वैदिक काल की छान्दस भाषा को आधार बनाकर अष्टाध्यायी की रचना नहीं की। उन्होंने अपने काल की जन-सामान्य भाषा संस्कृत को आधार बनाकर व्याकरण के नियमों का निर्धारण किया। वाल्मीकीय रामायण में इस भाषा के लिए ‘मानुषी´ विशेषण का प्रयोग हुआ है। पाणिनी के समय संस्कृत का व्यवहार एवं प्रयोग बहुत बड़े भूभाग में होता था। उसके अनेक क्षेत्रीय भेद-प्रभेद रहे होंगे। पाणिनी ने भारत के उदीच्य भाग के गुरुकुलों में बोली जानेवाली भाषा को आधार बनाया। पाणिनी के व्याकरण का महत्व सर्वविदित है। अमेरिका के प्रसिद्ध भाषावैज्ञानिक बेंजामिन ली व्होर्फ के मत में- ‘यद्यपि भाषाविज्ञान बहुत प्राचीन है तथापि इसका आधुनिक प्रयोगात्मक रूप, जो अलिखित बोलचाल की भाषा के विश्लेषण पर जोर देता है, सर्वथा आधुनिक है। जहाँ तक हमें ज्ञात है, ईसा से कई शताब्दी पूर्व, पाणिनी ने इस विज्ञान का शिलान्यास किया था। पाणिनी ने उस युग में, वह ज्ञान प्राप्त कर लिया था, जो हमें आज उपलब्ध है। संस्कृत भाषा को नियमबद्ध करने के लिए पाणिनी के सूत्र बीजगणित के जटिल सूत्रों की भाँति हैं´।
प्रत्याहार, गणपाठ, विकरण, अनुबंध आदि की विपुल तकनीक से अलंकृत पाणिनीय सूत्र उनकी अद्वितीय प्रतिभा को प्रमाणित करते हैं। उत्तर-वैदिक काल में संस्कृत भारत की सभी दिशाओं में चारों ओर फैलती गई। संस्कृत का यह प्रसार केवल भौगोलिक दिशाओं में ही नहीं हो रहा था; सामाजिक स्तर पर मानक संस्कृत से भिन्न अनेक आर्य एवं अनार्य भाषाओं के बोलने वाले समुदायों में भी हो रहा था। (Burrow. T.: The Sanskrit Language, P. 63, Faber & Faber, London).।
संस्कृत भाषा के भारत के विभिन्न भागों एवं विभिन्न सामाजिक समुदायों में व्यवहार एवं प्रसार के कारण -
१. संस्कृत ने अपने प्रसार के कारण भारत के प्रत्येक क्षेत्र की भाषा को प्रभावित किया।
२. संस्कृत भाषा स्वयं भी भारत में अन्य भाषा-परिवारों की भाषाओं से तथा संस्कृत युग में भारतीय आर्य परिवार की संस्कृतेतर अन्य लोक भाषाओं / जनभाषाओं से प्रभावित हुई। निर्विवाद है कि संस्कृत काल में अन्य लोक भाषाओं / जनभाषाओं का भी व्यवहार होता था। संस्कृत के प्रभाव से संस्कृत-विद्वान परिचित हैं मगर संस्कृत पर संस्कृतेतर अन्य लोक भाषाओं / जनभाषाओं के प्रभाव से वे शायद परिचित नहीं हैं अथवा इस पक्ष को अनदेखा कर जाते हैं। पाणिनी के बाद के संस्कृत साहित्य में प्रयुक्त किन धातुओं का (शब्दों का नहीं) प्रयोग हुआ है जिनका उल्लेख पाणिनी की अष्टाध्यायी में नहीं हुआ है। यह जानकारी ‘भारत की भाषाएँ एवं भाषिक एकता तथा हिन्दी´ ग्रंथ में है।
शब्दावली के स्तर पर संस्कृत की शब्दावली ने सभी भारतीय भाषाओं को प्रभावित किया है जिसे तत्सम शब्दावली के नाम के पुकारा जाता है। मध्यकालीन साहित्यिक तमिल की ‘मणिप्रवालम शैली’ से भारतीय भाषाओं पर संस्कृत के व्यापक प्रभाव की बात सिद्ध होती है। जो शब्द लोक में प्रचलित हो गए हैं, उनके लिए संस्कृत की शब्द रचना का सहारा लेकर नए शब्द गढ़ना उचित नहीं है। हिंदी भाषाविज्ञान का ज्ञान तथा लोक-व्यवहार का विवेक इसे उचित नहीं समझता। किसी भाषा के व्याकरण के नियमों को दूसरी किसी अन्य भाषा पर थोपना गलत है। भाषाविज्ञान का यह सार्वदेशिक एवं सार्वकालिक नियम है।
१६.१.२०२४
***
सॉनेट
मानस
*
भक्ति करो निष्काम रह
प्रभु चरणों में समर्पित
हर पल मन जय राम कह
लोभ मोह मद कर विजित।
सत्ता जन सेवा करे
रहे वीतरागी सदा
जुमलाबाजी मत करे
रहे न नृप खुद पर फिदा।
वरण धर्म पथ का करो
जनगण की बाधा हरो।
१६-१-२०२२
***
सॉनेट
गीता
*
जो बीता वह भुलाकर
जो आगत वह सोच रे,
रख मत किंचित लोच रे!
कर्म करो फल भुलाकर।
क्या लाए जो खो सके?
क्या जाएगा साथ रे?
डर मत, झुका न माथ रे!
काल न रोके से रुके।
कौन यहाँ किसका सगा?
कर विश्वास मिले दगा
जीव मोह में है पगा।
त्याग न लज्जा, शर्म कर,
निर्भय रहकर कर्म कर
चलो हमेशा धर्म पर।
१६-१-२०२२
***
अभिनव प्रयोग:
गीत
वात्सल्य का कंबल
*
गॉड मेरे! सुनो प्रेयर है बहुत हंबल
कोई तो दे दे हमें वात्सल्य का कंबल....
*
अब मिले सरदार सा सरदार भारत को
अ-सरदारों से नहीं अब देश गारत हो
असरदारों की जरूरत आज ज़्यादा है
करे फुलफिल किया वोटर से जो वादा है
एनिमी को पटकनी दे, फ्रेंड को फ्लॉवर
समर में भी यूँ लगे, चल रहा है शॉवर
हग करें क़ृष्णा से गंगा नर्मदा चंबल
गॉड मेरे! सुनो प्रेयर है बहुत हंबल
कोई तो दे दे हमें वात्सल्य का कंबल....
*
मनी फॉरेन में जमा यू टर्न ले आये
लाहौर से ढाका ये कंट्री एक हो जाए
दहशतों को जीत ले इस्लाम, हो इस्लाह
हेट के मन में भरो लव, ​शाह के भी शाह
कमाई से खर्च कम हो, हो न सिर पर कर्ज
यूथ-प्रायरटी न हो मस्ती, मिटे यह मर्ज
एबिलिटी ही हो हमारा, ओनली संबल
गॉड मेरे! सुनो प्रेयर है बहुत हंबल
कोई तो दे दे हमें वात्सल्य का कंबल....
*
कलरफुल लाइफ हो, वाइफ पीसफुल हे नाथ!
राजमार्गों से मिलाये हाथ हँस फुटपाथ
रिच-पुअर को क्लोद्स पूरे गॉड! पहनाना
चर्च-मस्जिद को गले, मंदिर के लगवाना
फ़िक्र नेचर की बने नेचर , न भूलें अर्थ
भूल मंगल अर्थ का जाएँ न मंगल व्यर्थ
करें लेबर पर भरोसा, छोड़ दें गैंबल
गॉड मेरे! सुनो प्रेयर है बहुत हंबल
कोई तो दे दे हमें वात्सल्य का कंबल....
(इस्लाम = शांति की चाह, इस्लाह = सुधार)
१६.१.२०१९
***
शिव दोहावली
शिव शंकर ओंकार हैं, नाद ताल सुर थाप।
शिव सुमरनी सुमेरु भी, शिव ही जापक-जाप।।
*
पूजा पूजक पूज्य शिव, श्लोक मंत्र श्रुति गीत।
अक्षर मुखड़ा अंतरा, लय रस छंद सुरीत।।
*
आत्म-अर्थ परमार्थ भी, शब्द-कोष शब्दार्थ।
शिव ही वेद-पुराण हैं, प्रगट-अर्थ निहितार्थ।।
*
तन शिव को ही पूजना, मन शिव का कर ध्यान।
भिन्न न शिव से जो रहे, हो जाता भगवान।।
*
इस असार संसार में, सार शिवा-शिव जान।
शिव में हो रसलीन तू, शिव रसनिधि रसखान।।
*
१६-१-२०१८ , जबलपुर
***
शिव को पा सकते नहीं, शिव से सकें न भाग।
शिव अंतर्मन में बसे, मिलें अगर अनुराग।।
*
शिव को भज निष्काम हो, शिव बिन चले न काम।
शिव-अनुकंपा नाम दे, शिव हैं आप अनाम।।
*‍
वृषभ-देव शिव दिगंबर, ढंकते सबकी लाज।
निर्बल के बल शिव बनें, पूर्ण करें हर काज।।
*
शिव से छल करना नहीं, बल भी रखना दूर।
भक्ति करो मन-प्राण से, बजा श्वास संतूर।।
*
शिव त्रिनेत्र से देखते, तीन लोक के भेद।
असत मिटा, सत बचाते, करते कभी न भेद।।
१५.१.२०१८
एफ १०८ सरिता विहार, दिल्ली
***
नागों का रहस्य :
*
भारत के शासन-प्रशासन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभानेवाले, निर्गुण ब्रम्ह चित्रगुप्त के उपासक कायस्थ अपने आदि पुरुष कि अवधारणा-कथा में उनके दो विवाह नाग कन्या तथा देव कन्या से तथा उनके १२ पुत्रों के विवाह बारह नाग कन्याओं से होना मानते हैं. कौन थे ये नाग? सर्प या मनुष्य? आर्य, द्रविड़ या गोंड़?
श्रेष्ठ-ज्येष्ठ पुरातत्वविद डॉ. आर. के. शर्मा लिखित पुस्तक से नागों संबंधी जानकारी दे रही हैं माँ जीवन शैफाली.
*
नागों की उत्पत्ति का रहस्य अंधकार में डूबा है, इसलिए प्राचीन भारत के इतिहास की जटिल समस्याओं में से एक ये भी समस्या है. कुछ विद्वानों के अनुसार नाग मूलरूप से नाग की पूजा करनेवाले थे, इस कारण उनका संप्रदाय बाद में नाग के नाम से ही जाना जाने लगा. इसके समर्थन में जेम्स फर्ग्यूसन ने अपनी पुस्तक (Tree and Serpent Worship) में अक्सर उद्धृत करते हुए विचार व्यक्त किए हैं, और निःसंदेह काफी प्रभावित भी किया है, लेकिन आज के विद्वानों में उनका समर्थक मिलना मुश्किल होगा.
उनके अनुसार नाग, साँप की पूजा करनेवाली उत्तर अमेरिका में बसे तुरेनियन वंश की एक आदिवासी जाति थी जो युद्ध में आर्यों के अधीन हो गई. फर्ग्यूसन सकारात्मक रुप से ये घोषणा करते हैं कि ना आर्य साँप की पूजा करनेवाले थे, ना द्रविड़, और अपने इस सिद्धांत पर बने रहने के लिए वे ये भी दावा करते हैं कि नाग की पूजा का यदि कोई अंश वेद या आर्यों के प्रारंभिक लेखन में पाया भी गया है तो या तो वह बाद की तारीख का अंतर्वेशन होना चाहिए या आश्रित जातियों के अंधविश्वासों को मिली छूट. सर्प पूजा के स्थान पर जब बौद्ध धर्म आया, तो उसने उसे “आदिवासी जाति के छोटे मोटे अंधविश्वासों के थोड़े से पुनरुत्थारित रुप” से अधिक योग्य नहीं माना. वॉगेल ठीक ही कह गया है कि ‘ये सब अजीब और निराधार सिद्धांत हैं’.
कुछ विद्वानों का यह भी दावा है कि सर्प पूजा करने वालों की एक संगठित संप्रदाय के रुप में उत्पत्ति मध्य एशिया के सायथीयन के बीच से हुई है, जिन्होने इसे दुनियाभर में फैलाया. वे सर्प को राष्ट्रीय प्रतीक के रुप में उपयोग करने के आदि थे. इस संबंध में यह भी सुझाव दिया गया है कि भारत में आए प्रोटो-द्रविड़ियन (आद्य-द्रविड़), सायथियन जैसी ही भाषा बोलते थे जिसका आधुनिक शब्दावली में अर्थ होता था फ़िनलैंड मे बसने वाले कबीलों के परिवार की भाषा. (फिनो-अग्रिअन भाषाओं का परिवार).
यह अवलोकन 19वीं शताब्दी के द्रविड़ भाषओं के अधिकारी कॅल्डवेल के साथ शुरू हुआ और जिसे ऑक्सफ़ोर्ड के प्रोफेसर टी. बरौ का समर्थन मिला. वहीं दूसरी ओर एस. सी. रॉय एवं अन्य ने सुझाव दिया कि प्रोटो-द्रविड़ियन (आद्य-द्रविड़) भूमध्यसागर की जाति के आदिम प्रवासी थे जिनका भारत के सर्प संप्रदाय में योगदान रहा. इसलिए इस संप्रदाय की उत्पत्ति और प्रसार के सिद्धांतो में बहुत मतभेद मिलता है, जिनमें से कोई भी पूर्णरूपेण स्वीकार्य नहीं है, इसके अलावा नाग की पूजा मानव जगत में व्यापक रूप से प्रचलित थी.
सायथीयन का दावा दो कारणों से ठहर नहीं सकता, पहला नाग पूजा का जो सिद्धांत भारत लाया गया वह मात्र द्रविड़ और फिनो-अग्रिअन भाषाओं की सतही समानता पर आधारित है और मध्य एशिया के आक्रमण का कोई ऐतिहासिक उदाहरण नहीं मिलता. नवीनतम पुरातात्विक और आनुवंशिक निष्कर्ष ने यह सिद्ध कर दिया है कि दूसरी सहस्राब्दी ई.पू. का आर्य आक्रमण/प्रवास सिद्धांत एक मिथक है. दूसरा, मध्य एशिया में सामान्य सर्प संप्रदाय का इस बात के अलावा कोई अंश नहीं मिलता कि वे साँपों का गहने या प्रतीक के रुप में उपयोग करते थे.
नाग सामान्य महत्व से अधिक शक्तिशाली और व्यापक लोग थे, जो आदिम समय से भारत के विभिन्न भागों में आजीविका चलाते दिखाई देते थे. संस्कृत में नाग नाम से बुलाये जाने से पहले वे किस नाम से जाने जाते थे ये ज्ञात नहीं है. द्रविड़ भाषा में नाग का अर्थ ‘पंबु’ या ‘पावु’ होता है. कदाचित ‘पावा’ नाम उत्तरी भारत के शहरों में से किसी एक से लिया गया था जो मल्ल की राजधानी हुआ करती थी और बुद्ध के समय में यहाँ निवास करनेवालों ने कबीले के पुराने नाम ‘नाग’ को बनाए रखा था. यह भी संभव है कि जैसे ‘मीना’ का नाम ‘मत्स्य’ में परिवर्तित हुआ, ‘कुदगा’ का ‘वानर’ में उसी तरह बाद में आर्यों द्वारा,’पावा’ (जिसका अर्थ है नाग) का नाम ‘नाग’ में परिवर्तित किया गया और संस्कृतज्ञ द्वारा समय के साथ साँप पालने वाले को नाग कहा जाने लगा.
हड़प्पा में खुदाई से मिले कुछ अवशेष अधिक रुचिकर है क्योंकि यह समकालीन लोगों के धार्मिक जीवन में सर्प के महत्व को अधिक से अधिक उजागर करते हैं. उनमें से एक छोटी सुसज्जित मेज है (faience tablet) है जिस पर एक देव प्रतिमा के दोनों ओर घुटने टेककर आदमी द्वारा पूजा की जा रही है. प्रत्येक उपासक के पीछॆ एक कोबरा अपना सिर उठाए और फन फैले दिखाई देता है जो प्रत्यक्ष रुप से यह दर्शाता है कि वह भी प्रभु की आराधना में साथ दे रहा है. इसके अलावा चित्रित मिट्टी के बर्तन भी पाए गए जिनमें से कुछ पर सरीसृप चित्रित थे, नक्काशी किया हुआ साँप का चित्र, मिट्टी का ताबीज जिस पर एक सरीसृप के सामने एक छोटी मेज पर दूध जैसी कोई भेंट दिखाई देती है.
हड़प्पा में भी एक ताबीज पाया गया जिस पर एक गरुड़ के दोनों ओर दो नागों को रक्षा में खड़े हुए चित्रित किया गया है. ऊपर दी गई खोज सिंधु घाटी के लोगों की पूजा में साँप के होने के तथ्य को इंगित करती है, केनी के अनुसार आवश्यक रुप से ख़ुद पूजा की वस्तु के रुप में ना सही, और उस क्षेत्र में नाग टोटेम वाले लोग होना चाहिए.
महाभारत में दिए वर्णन के अनुसार नाग जो कि कश्यप और कद्रु की संतान है, रमणियका की भूमि जो समुद्र के पार थी, पर बहुत गर्मी, तूफान और बारिश का सामना करने के बाद पहुँचे थे, ऐसा माना जाता है कि नाग मिस्र द्वारा खोजे गए देश की ओर चले गए थे. ये कहा जाता है कि वे गरुड़ प्रमुख के नेतृत्व में आगे बढ़े थे. चाहे यह सिद्धांत स्वीकार्य हो या ना हो यह जानना रुचिकर है कि मिस्र के फरौह (pharaohs of egypt -प्राचीन मिस्त्र के राजाओं की जाति या धर्म या वर्ग संबंधी नाम) कुछ हद तक बाज़ या गरुड़ और सर्प से संबंधित थे.
नाग आर्य थे या गैर-आर्य, इस प्रश्न के उत्तर में बहुत कुछ लिखा गया और अधिकतर विद्वानों का यही मानना है कि आर्यों के भारत में आने से पहले नाग द्रविड़ थे जो भारत के उत्तरी क्षेत्र में रहते थे. आर्यन आव्रजन सिद्धांत के विवाद में प्रवेश के बिना, जो नवीनतम शोधकर्ता द्वारा मिथक साबित हुई है यह इंगित किया जा सकता है कि नाग सिर्फ साँप जो कि उनका टोटेम था ना कि पूजा के लिए आवश्यक वस्तु, की पूजा की वजह से गैर-आर्य लोग नहीं थे. वे गैर-आर्य कबीले के थे चाहे वे साँप की पूजा करते थे या नहीं. कबीले के टोटेम के रुप में सर्प और पूजा की एक वस्तु के रुप में सर्प, ये दो अलग कारक है. पहले कारक को स्वीकार करने के लिए दूसरे को स्वीकार करना आवश्यक नहीं है. प्राचीन भारत के संपूर्ण इतिहास में यह पर्याप्त रुप से सिद्ध कर दिया गया है कि नाग के टोटेम को अपनाने वाले सत्तारूढ़ कबीले/राजवंश नाग की पूजा करनेवाले और गैर-आर्य हो ये आवश्यक नहीं है.
प्राचीन भारत के दौरान, उत्तरी भारत का सबसे अधिक भाग नागों द्वारा बसा हुआ था. ऋग्वेद में व्रित्र और तुग्र के लिए स्थान है. महाभारत कई नाग राजाओं के शोषण के विवरण से भरा है . महान महाकाव्य इन्द्रप्रस्थ या पुरानी दिल्ली के पास जमुना की घाटी में महान खांडव जंगल में रहने वाले राजा तक्षक के तहत नाग के ऐतिहासिक उत्पीड़न के साथ खुलता है.
वास्तव में नाग कबीले या जनजाति के कई बहुत शक्तिशाली राजा थे जिनमें सबसे अधिक ज्ञात थे शेषनाग या अनंत, वासुकि, तक्षक, कर्कोतक, कश्यप, ऐरावत, कोरावा और धृतराष्ट्र, जो सब कद्रु में पैदा हुए थे. धृतराष्ट्र जो सभी नागों के अग्रणी थे उनके अकेले के अपने अनुयायियों के रूप में अट्ठाईस नाग थे. उत्तर भारत में नाग के अस्तित्व को साबित करने के लिए जातक (jatakas) में भी उल्लेखों की कमी नहीं है.
इक्ष्वाकु (iksvauku) वंश के महान राजा पाटलिपुत्र के प्राचीन नाग थे. भारत राजाओं को भी सर्प जाति में सम्मिलित किया गया था. महान राजा ययति, समान रुप से महान राजा पुरु के पिता, नहुसा नाग के पुत्र और अस्तक के नाना थे. पाँच पाँडव भाई भी नाग आर्यक या अर्क के पोते के पोते थे. फिर इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि अर्जुन ने नाग राजकुमारी युलूपि से विवाह किया.
यादव भी नाग थे. ना केवल कुंती बल्कि पाँच वीर पाँडव की माता और कृष्ण की चाची, कृष्ण तो नाग प्रमुख आर्यक जो कि वासुदेव के महान दादा और यादव राजा के पितृ थे, के सीधे वंशज थे. बल्कि उनके बड़े भाई बलदेव के सिर को विशाल साँपों से ढँका हुआ प्रस्तुत किया गया है, जिसे वास्तव में छत्र कहा जाता था, जो महान राजाओं की पहचान में भेद के लिए होता था. बलदेव को शेषनाग का अंश कहा जाता है, जिसका अर्थ है या तो वह महान शेषनाग का कोई संबंधी है या उनके जितना शक्तिशाली. चूंकि यादव कुल के इन दो सूरमाओं के मामा कंस, मगध के जरसंधा राजा बर्हद्रथ के दामाद थे, हम देखते हैं कि मगध के प्राचीन राज्यवंश में भी नाग शासक के रुप में थे, जिन्हें बर्हद्रथ कहा गया.
पुराण के अनुसार मगध के बर्हद्रथ प्रद्योत द्वारा जीत लिए गए, जो बदले में शिशुनाग के अनुयायी हुए. कई लेखकों ने ठीक ही कहा है, कि शिशुनाग में मगध के पास एक नाग राजवंश उस पर शासन करने के लिए था. शिशुनाग शब्द अपने आप में ही बहुत महत्वपूर्ण है. बर्हद्रथ राजवंश जो कि एक नाग राजवंश था, के पतन के बाद एक अन्य राजवंश सत्तारूढ़ हुआ, जिसे प्रद्योत राजवंश कहा गया. परंतु यह राजवंश जो कि अपने पूर्ववर्ति नाग राजवंश से बिल्कुल भिन्न था, शिशुनाग राजवंश जैसे कि उसके नाम से ही पता चलता है कि एक नाग राजवंश है, द्वारा फिर से पराजित हुई. अर्थात प्रद्योत के एक छोटे से अंतराल के बाद नाग एक बार फिर सत्ता में आया. यह शिशुनाग बर्हद्रथ राजवंश के प्राचीन नागों के ही अनुयायी थे. प्राचीन सीनियर नाग बर्हद्रथ के अनुयायी होने के कारण सत्ता में आने के बाद एक बार फिर वे शिशुनाग या जूनियर नाग के रूप में पहचाने जाने लगे. नागओ द्वारा रक्षित बौद्ध परंपरा जो कि शिशुनाग की संस्थापक बल्कि पुंर्स्थापक थी, ने शिशुनाग की उत्पत्ति के बारे में यही सिद्ध किया है कि वह नाग थे.
यहाँ तक कि चंद्रगुप्त मौर्य भी नाग वंश के अंतर्गत माने जाते हैं. सिंधु घाटी को पार करने के बाद सिकंदर (Alexander I) जिन लोगों के संपर्क में आया वे भी नाग थे.
१६.१.२०१७
***
कलह कथा
*
कुर्सी की जयकार हो गयी, सपा भाड़ में भेजें आज
बेटे के अनुयायी फाड़ें चित्र बाप के, आये न लाज
स्वार्थ प्रमुख, निष्ठा न जानते, नारेबाजी शस्त्र हुआ
भीड़तंत्र ही खोद रहा है, लोकतंत्र के लिए कुआं
रंग बदलता है गिरगिट सम, हुआ सफेद पूत का खून
झुका टूटने के पहले ही बाप, देख निज ताकत न्यून
पोल खुली नूरा कुश्ती की, बेटे-बाप हो गए एक
चित्त हुए बेचारे चाचा, दिए गए कूड़े में फेंक
'आजम' की जाजम पर बैठे, दाँव आजमाते जो लोग
नींव बनाई जिनने उनको ठुकराने का पाले रोग
'अमर' समर में हों शहीद पछताएँ, शत्रु हुए वे ही
गोद खिलाया जिनको, भोंका छुरा पीठ में उनने ही
जे.पी., लोहिया, नरेन्द्रदेव की, आत्माएँ करतीं चीत्कार
लालू, शरद, मुलायम ने ही सोशलिज्म पर किया प्रहार
घर न घाट की कोंग्रेस के पप्पू भाग चले अवकाश
कहते थे भूकम्प आएगा, हुआ झूठ का पर्दाफाश
अम्मा की पादुका उठाये हुईं शशिकला फिर आगे
आर्तनाद ममता का मिथ्या, समझ गए जो हैं जागे
अब्दुल्ला कर-कर प्रलाप थक-चुप हो गए, बोलती बन्द
कमल कर रहा आत्मप्रशंसा, चमचे सुना रहे हैं छंद
सेनापति आ गए नए हैं, नया साल भी आया है
समय बताएगा दुश्मन कुछ काँपा या थर्राया है?
इनकी गाथा छोड़ चलें हम,घटीं न लेकिन मिटीं कतार
बैंकों में कुछ बेईमान तो मिले मेहनती कई हजार
श्री प्रकाश से नया साल हो जगमग करिये कृपा महेश
क्यारी-क्यारी कुसुम खिलें नव, काले धन का रहे न लेश
गुप्त न रखिये कोई खाता, खुला खेल खेलें निर्भीक
आजीवन अध्यक्ष न होगा, स्वस्थ्य बने खेलों में लीक
१.१.२०१७
***
नवगीत
समय की कीमत
*
समय की
कीमत न करते
*
दूध पीते अब न तुम
बच्चे रहे हो
तन युवा पर अकल के
कच्चे रहे हो
हो नहीं गंभीर यदि
तो सत्य मानो
आप अपने शत्रु तुम
सच्चे रहे हो
नाश अपना
आप वरते
समय की
कीमत न करते
*
पढ़ रहे तो तुम नहीं
अहसान करते
अवसरों को क्यों नहीं
वरदान करते?
तोड़ अनुशासन-नियम
खुश हो रहे पर
सफलता हित पगों को
अनजान करते
दोष निज
औरों पे धरते
समय की
कीमत न करते
***
काव्य वार्ता
अचल वर्मा
समय की कीमत भला कैसे मनुज ये कर सकेगा ।
आज है पर क्या पता कब तक यहां वो रह सकेगा ॥
संजीव वर्मा 'सलिल'
काल से होता प्रगट मनु
काल में होता विलय है
तभी तो है सलिल नभ भू
अग्नि भी सँग-सँग मलय है
अचल वर्मा
है सभी कुछ समय के आधीन ही , सबने ये माना।
पर समय कबसे शुरू किसने ये जाना।
जब नहीं आरम्भ जाना कैसे उसका मोल जाने।
है कहीं पर अंत भी इसका नहीं मन इसको माने॥
संजीव वर्मा 'सलिल'
है सभी कुछ समय के आधीन लेकिन / समय डिक्टेटर नहीं है
वृत्त का आरंभ या आखिर न देखा / तो कहें क्या वृत्त ही भास्वर नहीं है?
समय को असमय करें मर काल-कवलित
समय असमय में नहीं क्या रहा करता?
बन सुसमय ही रहे वह साथ बेहतर
देव कुसमय से सदा मैं मनुज डरता
***
नवगीत
गीत सूर्य
*
गीत-सूर्य की
नवल किरण नवगीत है
*
नवल किरण मृदु-शुचि होती है
जन-मन में आशा बोती है
जुड़ जमीन से पनपा करती
अंकुर से पल्लव होती है
गीत-पौध की
कुसुम कली नवगीत है
*
परिवर्तन की नव चाहों में
जिजीविषा पाले बाँहों में
लड़ विडंबना को मेटे जो
कोशिश, कदम, दृष्टि राहों में
गीत-स्वेद की
एक बूँद नवगीत है
*
जीवन का हर रंग समेटे
जीने का हर ढंग समेटे
सिर्फ रुदन-संत्रास नहीं, यह
सत्य-न्याय की जंग समेटे
गीत इन्द्रधनु
एक छटा नवगीत है
*
यह संक्रांक्ति काल की गणना
पाँव-बिमाई-पीड़ा हरना
अब मरते-मरते जीना है
तब जीते-जीते था मरना
गीत आँख का
एक स्वप्न नवनीत है
*
व्याप्ति धरा से नभ तक इसकी
कथा न कहता कहिए किसकी?
अलंकार-रस-छंद बदन है
आत्मकथा जो निरखे उसकी
गीत काल का
एक चरण नवगीत है
१६.१.२०१६
***
मुक्तिका:
.
अपने क़द से बड़ा हमारा साया है
छिपा बीज में वृक्ष समझ अब आया है
खड़ा जमीं पर नन्हे पैर जमाये मैं
मत रुक, चलता रह रवि ने समझाया है
साया-साथी साथ उजाले में रहते
आँख मुँदे पर किसने साथ निभाया है?
'मैं' को 'मैं' से जुदा कर सका कब कोई
सब में रब को देखा गले लगाया है?
है अजीब संजीव मनुज जड़ पत्थर सा
अश्रु बहाता लेकिन पोंछ न पाया है
===
नवगीत:
.
वह खासों में खास है
रुपया जिसके पास है
.
सब दुनिया में कर अँधियारा
वह खरीद लेता उजियारा
मेरी-तेरी खाट खड़ी हो
पर उसकी होती पौ बारा
असहनीय संत्रास है
वह मालिक जग दास है
.
था तो वह सच का हत्यारा
लेकिन गया नहीं दुतकारा
न्याय वही, जो राजा करता
सौ ले दस देकर उपकारा
सीता का वनवास है
लव-कुश का उपहास है
.
अँगना गली मकां चौबारा
हर सूं उसने पैर पसारा
कोई फर्क न पड़ता उसको
हाय-हाय या जय-जयकारा
उद्धव का सन्यास है
सूर्यग्रहण खग्रास है
.
१६-१-२०१५
कविता:
चीता
*
कौन कहता है कि
चीता मर गया है?
हिंस्र वृत्ति
जहाँ देखो बढ़ रही है.
धूर्तता
किस्से नये
नित गढ़ रही है.
शक्ति के नाखून पैने
चोट असहायों पर करते
स्वाद लेकर रक्त पीते
मारकर औरों को जीते
और तुम?
और तुम कहते हो
चीता मर गया है.
नहीं,
वह तो
आदमी की
नस्ल में घर कर गया है.
झूठ कहते हो कि
चीता मर गया है.
१६.१.२०१४

===

रविवार, 17 अगस्त 2025

अगस्त १७, कुंडलिया, षडपदिक सवैया, सरसी छंद, लघुकथा, राखी गीत, गीता, पूर्णिका

 सलिल सृजन अगस्त १७  

पूर्णिका . भोग लगा भगवान को पाते भक्त प्रसाद छप्पन व्यंजन में मिले अमृत जैसा स्वाद . भक्ति-भाव से कीजिए भजन भुलाकर स्वार्थ परेशान मत कीजिए, प्रभु को कर फरियाद . काम करें निष्काम हर, प्रभु अर्पण कर आप जो करते निस्वार्थ श्रम, वे होते आबाद . राधा धारा प्रेम की, मीरा भक्ति प्रवाह पार्थ समर्पण, द्रौपदी रिश्तों की मर्याद . जीवन के कुरुक्षेत्र में, धैर्य रखें बन पार्थ सुख-दुख दोनों प्रभु-कृपा, मान करें प्रभु-याद १७.८.२०२५ ०००

कुंडलिया छंद :

रावण लीला देख
*
लीला कहीं न राम की, रावण लीला देख.
नेता गण हैं कुकर्मी, यह सच करना लेख..
यह सच करना लेख कटेगा इनका पत्ता.
सरक रही है इनके हाथों से अब सत्ता..
कहे 'सलिल' कविराय कफन में ठोंको कीला.
कभी न कोई फिर कर पाये रावण लीला..
*
खरी-खरी बातें करें, करें खरे व्यवहार.
जो कपटी कोंगरेस है,उसको दीजे हार..
उसको दीजै हार सबक बाकी दल लें लें.
सत्ता पाकर जन अधिकारों से मत खेलें..
कुचले जो जनता को वह सरकार है मरी.
'सलिल' नहीं लाचार बात करता है खरी.
*
फिर जन्मा मारीच कुटिल सिब्बल पर थू है.
शूर्पणखा की करनी से फिर आहत भू है..
हाय कंस ने मनमोहन का रूप धरा है.
जनमत का अभिमन्यु व्यूह में फँसा-घिरा है..
कहे 'सलिल' आचार्य ध्वंस कर दे मत रह घिर.
नव स्वतंत्रता की नव कथा आज लिख दे फिर..
१७-८-२०२१
***
दोहा सलिला
श्री-प्रकाश पाकर बने, तमस चन्द्र सा दिव्य.
नहीं खासियत तिमिर की, श्री-प्रकाश ही भव्य ..
*
आशा-आकांक्षा लिये, सबकी जीवन-डोर.
'सलिल' न अब तक पा सका, कहाँ ओर या छोर.
*
मुक्तक :
अधरों पर सोहे मुस्कान
नित गाओ कोयल सम गान
हर बाधा पर विजयी हो -
शीश उठा रह सीना तान
*
मन की पीड़ा को शब्दों ने जब-जब भी गाया है
नूर खुदाई उनमें बरबस उतर-उतर आया है
करा कीर्तन सलिल रूप का, लीन हुआ सुध खोकर
संगत-रंगत में सपना साकार हुआ पाया है
*
कुसुम वीर हो, भ्रमर बहादुर, कली पराक्रमशाली
सोशल डिस्टेंसिंग पौधों में रखता है हर माली
गमछे-चुनरी से मुँह ढँककर, होंगी अजय बहारें-
हाथ थाम दिनकर का ऊषा, तम हर दे खुशहाली
१७-८-२०२०
***
नवप्रयोग
षडपदिक सवैया
*
पौ फटी नीलांबरी नभ, मेघ मल्लों को बुलाता, दामिनी की छवि दिखा, दंगल कराता।
होश खोते जोश से भर, टूट पड़ते, दाँव चलते, पटक उठते मल्ल कोई जय न पाता।
स्वेद धारा प्रवह धरती को भिगोती, ऊगते अंकुर नए शत, नर सृजन दुंदुभि बजाता।
दामिनी जल पतित होती, मेघ रो आँसू बहाता, कुछ न पाता।
पवन सनन सनन बहता, सत्य कहता मत लड़ो, मिलकर रचे कुछ नित नया जो कीर्ति पाता।
गरजकर आतंक की जो राह चलता, कुछ न पाता, सब गँवाता, हार कहता बहुत निष्ठुर है विधाता।
*
संजीव
१७-८-२०१९, मथुरा
बी ३-५२ संपर्क क्रांति एक्सप्रेस
***
छंद सलिला: पहले एक पसेरी पढ़ / फिर तोला लिख...
छंद सलिला सतत प्रवाहित, मीत अवगाहन करें
शारदा का भारती सँग, विहँस आराधन करें
*
जन्म ब्याह राखी तिलक, गृह-प्रवेश त्यौहार
सलिल बचा पौधे लगा, दें पुस्तक उपहार
*
पाठ १०१
सरसी छंद
*
लक्षण:
१. ४ पंक्ति.
२. प्रति पंक्ति २७ मात्रा.
३. १६-११ मात्राओं पर यति.
४. पंक्ति के अंत में गुरु-लघु मात्रा.
५. दो-दो पंक्ति में सम तुकांत.
लक्षण छंद:
सरसी सोलह-ग्यारह रखिए मात्रा, गुरु-लघु अंत.
नित्य करें अभ्यास सधे तब, कहते कविजन-संत.
कथ्य भाव रस अलंकार छवि, बिंब-प्रतीक मनोहर.
काव्य-कामिनी जन-मन मोहे, रचना बने धरोहर.
*
उदाहरण:
पशु-पक्षी,कृमि-कीट करें सुन, निज भाषा में बात.
हैं गुलाम मानव-मन जो पर-भाषा बोलें तात.
माँ से ज्यादा चाची-मामी,'सलिल' न करतीं प्यार.
माँ-चरणों में स्वर्ग, करो सेवा तो हो उद्धार.
***
हिंदी आटा माढ़िये, देशज मोयन डाल
सलिल संस्कृत सान दे, पूड़ी बने कमाल
१७-८-२०१७
***
लघुकथा-
टूटती शाखें
*
नुक्कड़ पर खड़े बरगद की तरह बब्बा भी साल-दर-साल होते बदलावों को देखकर मौन रह जाते थे। परिवार में खटकते चार बर्तन अब पहले की तरह एक नहीं रह पा रहे थे। कटोरियों को थाली से आज़ादी चाहिए थी तो लोटे को बाल्टी की बन्दिशें अस्वीकार्य थीं। फिर भी बरसों से होली-दिवाली मिल-जुलकर मनाई जा रही थी।
राजनीति के राजमार्ग के रास्ते गाँव में घुसपैठ कर चुके शहर ने टाट पट्टियों पर बैठकर पढ़ते बच्चे-बच्चियों को ऐसा लुभाया कि सुनहरे कल के सपनों को साकार करने के लिए अपनों को छोड़कर, शहर पहुँच कर छात्रावासों के पिंजरों में कैद हो गए।
कुछ साल बाद कुछ सफलता के मद में और शेष असफलता की शर्म से गाँव से मुँह छिपाकर जीने लगे। कभी कोई आता-जाता गाँववाला किसी से टकरा जाता तो 'राम राम दुआ सलाम' करते हुए समाचार देता तो समाचार न मिलने को कुशल मानने के आदी हो चुके बब्बा घबरा जाते। ये समाचार नए फूल खिलने के कम ही होते थे जबकि चाहे जब खबरें बनती रहती थीं गुल खिलानेवाली हरकतें और टूटती शाखें।
***
मुक्तक
अधरों पर सोहे मुस्कान
नित गाओ कोयल सम गान
हर बाधा पर विजयी हो -
शीश उठा रह सीना तान
१७-८-२०१६
***
राखी गीत
*
बंधनों से मुक्त हो जा
*
बंधनों से मुक्त हो जा
कह रही राखी मुखर हो
कभी अबला रही बहिना
बने सबला अब प्रखर हो
तोड़ देना वह कलाई
जो अचाहे राह रोके
काट लेना जुबां जो
फिकरे कसे या तुझे टोंके
सासरे जा, मायके से
टूट मत, संयुक्त हो जा
कह रही राखी मुखर हो
बंधनों से मुक्त हो जा
बलि न तेरे हौसलों को
रीति वामन कर सके अब
इरादों को बाँध राखी
तू सफलता वर सके अब
बाँध रक्षा सूत्र तू ही
ज़िंदगी को ज़िंदगी दे
हो समर्थ-सुयोग्य तब ही
समय तुझको बन्दगी दे
स्वप्न हर साकार करने
कोशिशों के बीज बो जा
नयी फसलें उगाना है
बंधनों से मुक्त हो जा
पूज्य बन जा राम राखी
तुझे बाँधेगा जमाना
सहायक हो बँधा लांबा
घरों में रिश्ते जिलाना
वस्त्र-श्रीफल कर समर्पित
उसे जो सब योग्य दिखता
अवनि की हर विपद हर ले
शक्ति-वंदन विश्व करता
कसर कोई हो न बाकी
दाग-धब्बे दिखे धो जा
शिथिल कर दे नेह-नाते
बंधनों से मुक्त हो जा
१५ अगस्त २०१६
***
गीता गायन
अध्याय १
पूर्वाभास
कड़ी ३.
*
अभ्यास सद्गुणों का नित कर
जीवन मणि-मुक्ता सम शुचि हो
विश्वासमयी साधना सतत
कर तप: क्षेत्र जगती-तल हो
*
हर मन सौंदर्य-उपासक है
हैं सत्य-प्रेम के सब भिक्षुक
सबमें शिवत्व जगता रहता
सब स्वर्ग-सुखों के हैं इच्छुक
*
वे माता वहाँ धन्य होतीं
होती पृथ्वी वह पुण्यमयी
होता पवित्र परिवार व्ही
होती कृतार्थ है वही मही
*
गोदी में किलक-किलक
चेतना विहँसती है रहती
खो स्वयं परम परमात्मा में
आनंद जलधि में जो बहती
*
हो भले भिन्न व्याख्या इसकी
हर युग के नयन उसी पर थे
जो शक्ति सृष्टि के पूर्व व्याप्त
उससे मिलने सब आतुर थे
*
हम नेत्र-रोग से पीड़ित हो
कब तप:क्षेत्र यह देख सके?
जब तक जीवित वे दोष सभी
तब तक कैसा कब लेख सके?
*
संसार नया तब लगता है
संपूर्ण प्रकृति बनती नवीन
हम आप बदलते जाते हैं
हो जाते उसमें आप लीन
*
परमात्मा की इच्छानुसार
जीवन-नौका जब चलती है
तब नये कलेवर के मानव
में, केवल शुचिता पलती है
*
फिर शोक-मुक्त जग होता है
मिलता है उसको नया रूप
बनकर पृथ्वी तब तप:क्षेत्र
परिवर्तित करती निज स्वरूप
*
जीवन प्रफुल्ल बन जाता है
भौतिक समृद्धि जुड़ जाती है
आत्मिक उत्थान लक्ष्य लेकर
जब धर्म-शक्ति मुड़ जाती है
*
है युद्ध मात्र प्रतिशोध बुद्धि
जिसमें हर क्षण बढ़ता
दो तत्वों के संघर्षण में
अविचल विकास क्रम वह गढ़ता
*
कुत्सित कर्मों का जनक यहाँ
अविवेक भयानकतम दुर्मुख
जिससे करना संघर्ष, व्यक्ति का
बन जाता है कर्म प्रमुख
*
कर्मों का गुप्त चित्र अंकित
हो पल-पल मिटता कभी नहीं
कर्मों का फल दें चित्रगुप्त
सब ज्ञात कभी कुछ छिपे नहीं
*
यह तप:क्षेत्र है कुरुक्षेत्र
जिसमें अनुशासन व्याप्त सकल
जिसका निर्णायक परमात्मा
जिसमें है दण्ड-विधान प्रबल
*
बन विष्णु सृष्टि का करता है
निर्माण अनवरत वह पल-पल
शंकर स्वरूप में वह सत्ता
संहार-वृष्टि करता छल-छल
*
'मैं हूँ, मेरा है, हमीं रहें,
ये अहंकार के पुत्र व्यक्त
कल्मष जिसका आधार बना
है लोभ-स्वार्थ भी पूर्व अव्यक्त
*
कुत्सित तत्वों से रिक्त-मुक्त
जस को करना ही अनुशासन
संपूर्ण विश्व निर्मल करने
जुट जाएँ प्रगति के सब साधन
*
कौरव-पांडव दो मूर्तिमंत
हैं रूप विरोधी गतियों के
ले प्रथम रसातल जाती है
दूसरी स्वर्ग को सदियों से
*
आत्मिक विकास में साधक जो
पांडव सत्ता वह ऊर्ध्वमुखी
माया में लिपट विकट उलझी
कौरव सत्ता है अधोमुखी
*
जो दनुज भरोसा वे करते
रथ, अश्वों, शासन, बल, धन का
पर मानव को विश्वास अटल
परमेश्वर के अनुशासन का
*
संघर्ष करें अभिलाषा यह
मानव को करती है प्रेरित
दुर्बुद्धि प्रबल लालसा बने
हो स्वार्थवृत्ति हावी उन्मत
*
हम नहीं जानते 'हम क्या हैं?
क्या हैं अपने ये स्वजन-मित्र?
क्या रूप वास्तविक है जग का
क्या मर्म लिये ये प्रकृति-चित्र?
*
अपनी आँखों में मोह लिये
हम आजीवन चलते रहते
भौतिक सुख की मृगतृष्णा में
पल-पल खुद को छलते रहते
*
जग उठते हममें लोभ-मोह
हबर जाता मन में स्वार्थ हीन
संघर्ष भाव अपने मन का
दुविधा-विषाद बन करे दीन
*
भौतिक सुख की दुर्दशा देख
होता विस्मृत उदात्त जीवन
हो ध्वस्त न जाए वह क्षण में
हम त्वरित त्यागते संघर्षण
*
अर्जुन का विषाद
सुन शंख, तुमुल ध्वनि, चीत्कार
मनमें विषाद भर जाता है
हो जाते खड़े रोंगटे तब
मन विभ्रम में चकराता है
*
हो जाता शिथिल समूचा तन
फिर रोम-रोम जलने लगता
बल-अस्त्र पराये गैर बनकर डँसते
मन युद्ध-भूमि तजने लगता
*
जिनका कल्याण साधना ही
अब तक है रहा ध्येय मेरा
संहार उन्हीं का कैसे-कब
दे सके श्रेय मुझको मेरा?
*
यह परंपरागत नैतिकता
यह समाजगत रीति-नीति
ये स्वजन, मित्र, परिजन सारे
मिट जाएँगे प्रतीक
*
हैं शत्रु हमारे मानव ही
जो पिता-पितामह के स्वरूप
उनका अपना है ध्येय अलग
उनकी आशा के विविध रूप
*
उनके पापों के प्रतिफल में
हम पाप स्वयं यदि करते हैं
तो स्वयं लोभ से हो अंधे
हम मात्र स्वार्थ ही वरते हैं
*
हम नहीं चाहते मिट जाएँ
जग के संकल्प और अनुभव
संतुलन बिगड़ जाने से ही
मिटते कुलधर्म और वैभव
*
फिर करुणा, दया, पुण्य जग में
हो जाएँगे जब अर्थहीन
जिनका अनुगमन विजय करती
होकर प्रशस्ति में धर्मलीन
*
मैं नहीं चाहता युद्ध करूँ
हो भले राज्य सब लोकों का
अपशकुन अनेक हुए देखो
है खान युद्ध दुःख-शोकों का
*
चिंतना हमारी ऐसी ही
ले डूब शोक में जाती है
किस हेतु मिला है जन्म हमें
किस ओर हमें ले जाती है?
*
जीवन पाया है लघु हमने
लघुतम सुख-दुःख का समय रहा
है माँग धरा की अति विस्तृत
सुरसा आकांक्षा रही महा
*
कितना भी श्रम हम करें यहाँ
अभिलाषाएँ अनेक लेकर
शत रूप हमें धरना होंगे
नैया विवेचना की खेकर
*
सीधा-सदा है सरल मार्ग
सामान्य बुद्धि यह कहती है
कर लें व्यवहार नियंत्रित हम
सर्वत्र शांति ही फलती है
*
ज्यों-ज्यों धोया कल्मष हमने
त्यों-त्यों विकीर्ण वह हुआ यहाँ
हम एक पाप धोने आते
कर पाप अनेकों चले यहाँ
*
प्राकृतिक कार्य-कारण का जग
इससे अनभिज्ञ यहाँ जो भी
मानव-मन उसको भँवर जाल
कब समझ सका उसको वह भी
*
है जनक समस्याओं का वह
उससे ही जटिलतायें प्रसूत
जानना उसे है अति दुष्कर
जो जान सका वह है सपूत
*
अधिकांश हमारा विश्लेषण
होता है अतिशय तर्कहीन
अधिकांश हमारी आशाएँ
हैं स्वार्थपूर्ण पर धर्महीन
*
जो मुक्ति नहीं दे सकती हैं
जीवन की किन्हीं दशाओं में
जब तक जकड़े हम रहे फँसे
है सुख मरीचिका जीवन में
*
लगता जैसे है नहीं कोई
मेरा अपना इस दुनिया में
न पिता-पुत्र मेरे अपने
न भाई-बहिन हैं दुनिया में
*
उत्पीड़न की कैसी झाँकी
घन अंधकार उसका नायक
चिंता-संदेह व्याप्त सबमें
एकाकीपन जिसका गायक
*
जब भी होता संघर्ष यहाँ
हम पहुँच किनारे रुक जाते
साहस का संबल छोड़, थकित
भ्रम-संशय में हम फँस जाते
१७-८-२०१५
***

शुक्रवार, 4 जुलाई 2025

जुलाई ४, दोहा गीत, बाल कविता, वाक्, गीता, सॉनेट, बरखा गीत, सरस्वती

सलिल सृजन जुलाई ४
*
बरखा गीत 
० 
रिमझिम रिमझिम बरसे बरखा, झूलें सारद मैया 
रमा-उमा तालियाँ बजाएँ, पेंग देख खें दैया 
० 
टेसू की ऊँची डारी सें, लिपट रातरानी ने 
बेल चमेली की महकाई, पिक कूकी बानी ने 
छप छपाक् छप करतीं सखियाँ, खेलें ता ता थैया 
रिमझिम रिमझिम बरसे बरखा, झूलें सारद मैया 
० 
अमुआ ब्रह्मा, बेल बैठ शिव, हरसिँगार हरि टेरें 
हनुमत लला विराजे पीपल, नचे मयूरा हेरें 
मुदित 'सलिल' माँ के जस गाए, बैठ नीम की छैंया 
रिमझिम रिमझिम बरसे बरखा, झूलें सारद मैया 
० 
रीझ बरसता काला बादल, बिजली जलती खोट 
संध्या-उषा-निशा सँग सँकुचे, सूरज झाँके ओट
चाँद-चाँदनी ढाबा खोजें, चाहें भजिया-चैया    
रिमझिम रिमझिम बरसे बरखा, झूलें सारद मैया
४.७.२०२५
०0०
सॉनेट 
नित करती सवाल फुलबगिया
 पौधे-तरु जड़ कहाँ जमाएँ? 
नर-पिशाच धरती कब्जाएँ है 
मतलबपरस्त सब दुनिया। 
सिसक रही बेबस फुलवरिया 
सूर्य तपे, पौधे कुम्हलाएँ। 
पवन-सलिल बिन पनप न पाएँ? 
क्षुधित-तृषित भटके गौरैया। 

फुलबगिया में हृदय रहे मिल 
द्वैत मिटा अद्वैत वर रहे 
भ्रमर-तितलियाँ करते गुंजन। 
मन सचेत हो रहो न ग़ाफ़िल 
भोग भोगकर व्यर्थ मत दहे 
खिल महके कर भव-भय-भंजन। 
३.७.२०२५ 
०0०
 आमंत्रण 
विश्व वाणी हिंदी संस्थान अभियान जबलपुर (भारत)
अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरणीय काव्य संकलन 'फुलबगिया'
संपर्क- ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१
*
विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान जबलपुर (भारत) द्वारा विश्व कीर्तिमान स्थापित करते काव्य संकलनों दोहा दोहा नर्मदा, दोहा सलिला निर्मला, दोहा दिव्य दिनेश, 'हिंदी सॉनेट सलिला' (३२ सॉनेटकार, ३२१ सॉनेट) तथा 'चंद्र विजय अभियान' (५ देश, ५१ भाषा-बोलियाँ, २१३ रचनाकार) की शृंखला में अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरणीय काव्य संकलन 'फुलबगिया' प्रकाशनधीन है। आप अपनी पसंद के लुप्त हो रहे फूल/फूलों को केंद्र में रखकर पद्य रचना भेजें। पुष्प के रूप-रंग, उपादेयता, वानस्पतिक महत्व, आयुर्वेदिक उपयोग अथवा उसे रूपक या उपमा के रूप में प्रयोग कर अथवा शिव-काम प्रसंग, पार्वती अपर्णा प्रसंग, कैकेयी-दशरथ प्रसंग, राम-सीता फुलवारी प्रसंग, कृष्ण-राधा कुंज वन प्रसंग, मेघदूत प्रसंग, दुष्यंत-शकुंतला प्रसंग, रानी दुर्गावती-दलपतिशाह प्रसंग, विवाह संस्कार में जयमाल आदि में बाग-पुष्प, मिलन- विरह शृंगार आदि को लेकर भी काव्य रचना की जा सकती है।

'फुलबगिया' संग्रह में रचनाकार व फूल का चित्र, संक्षिप्त परिचय, आपकी सामग्री पर संपादकीय टिप्पणी तथा गीतलेख आदि होंगे। हर सहभागी को ३००/- प्रति पृष्ठ सहभागिता निधि  १००/- पैकिंग व डाक व्यय अग्रिम ९४२५१८३२४४ पर जमा करना होगा। न्यूनतम ४ पृष्ठ लेना अनिवार्य है।४ से अधिक पृष्ठ लिए जा सकते हैं। हर सहभागी को २ प्रति निशुल्क तथा अतिरिक्त प्रतियाँ ४०% रियायती दर पर मिलेंगी। सहभागियों को विश्ववाणी हिंदी संस्थान की ईकाई स्थापित करने में प्राथमिकता दी जाएगी। 

निम्न बिंदुओं पर लेखन कर जुड़िए फुलबगिया में-   
० फूलों पर केंद्रित फिल्मी गीत
० लोकगीतों में फुलबगिया- ऐसे लोकगीत भेजिए जो फूलों पर केंद्रित हों।
० लोक कलाओं में फुलबगिया- विविध शैलियों में फूलों के चित्रांकन संबंधी वैशिष्ट्य पर जानकारी आमंत्रित है। 
० नवग्रह और फूलबगिया- ज्योतिष शास्त्र में फूलों के महत्व संबंधी जानकारी भेजिए। 
० वास्तु और फुलबगिया- वास्तुशास्त्र में फूलों के महत्व, स्थान आदि संबंधी जानकारी। 
० पर्व कथाओं में फुलबगिया- धार्मिक पर्वों, प्रसंगों में फूलों से संबंधित जानकारी। 
० पूजा और फूलबगिया- देवी-देवताओं के पूजन में फूल, त्तसंबंधी पौराणिक कथाओं आदि संबंधी जानकारी। 
० पर्यावरण/मौसम और फुलबगिया- ऋतु परिवर्तन के सूचक फूल। 
० दाम्पत्य जीवन और फुलबगिया। 
० ................ भाषा/बोली  के साहित्य में फुलबगिया। 
००० 

गीता ज्ञान
*
'मैं' से हो मन मुक्त यदि, 'तुम' को जाए भूल
कर कर 'हम' की साधना, हो बगिया का फूल
हो बगिया का फूल, फूलकर कुप्पा मत हो
तितली भ्रमर पराग पा सकें, देने रत हो
संचय मोह व क्रोध, अहं पालक पातक हैं
इनसे हो जो मुक्त, न उसको व्याप सके मैं
४-७-२०२१
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शब्द, पर्याय और अर्थ
साभार सामग्री स्रोत : अर्थान्तर न्यास - डॉ. सुरेश कुमार वर्मा
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वाक् (भाषा) :
भाषा मनुष्य की शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक शक्तियों का संघात है। मनुष्य जन्म से परिवार की शाला में भाषा के पाठ सीखता है।सीखने की भावना मनुष्य ( वअन्य जीव-जंतुओं) के रक्त में जन्मजात वृत्ति के रूप में रहती है। वह वस्तु जगत के विविध पदार्थों का ज्ञान प्राप्त और व्यक्त करता है। भाषा ज्ञेय भी है और ज्ञान भी। शैशवावस्था में भाषा ज्ञातव्य वस्तु है और जबकि विकास की परिणत अवस्थाओं में दृश्य एवं सूक्ष्म जगत के नाना स्तरों का ग्राहक ज्ञान। वस्तु जगत की क्रमशः: वर्धित जानकारी मनुष्य के मानसिक क्षेत्र में जटिल आवर्त उत्पन्न करती है जो क्रमश: भाषा के अरण्य में जटिलता उत्पन्न करते हैं। अरण्य के विरल, सघन एवं सघनतम क्षेत्रों के समान्तर भाषा के अंतर्गत अर्थों के सरल, गूढ़ एवं रहस्यात्मक स्तर निविष्ट रहते हैं। शब्दों के सजग-सतर्क नियोजन से भाषा शुद्ध, सुचारु और सहज बनती है। सतत प्रयोग से भाषा जीवन का अविभाज्य अंग बनकर लोक जीवन, दैनंदिन व्यवहार एवं आत्म-चिंतन का आधार और अंग बन जाती है। भाषा और शब्द विशेष परिस्थिति की उपज है। वह विज्ञान विशेष परिस्थिति में ही अपनी मूल भावना को व्यक्त करता है। पर्यायवाचिता उसे किसी दूसरी परिस्थिति और प्रयोग के निकट लाकर उसकी मूल भावना को आहत कर देती है। एक पर्याय सभी परिस्थितियों में प्रयुक्त नहीं किया जा सकता। पर्यायवाचिता एक सीमा तक ही क्रियाशील रह सकती है। हिंदी पर्यायवाचिता को विकास के कारण हैं - विविध भाषाओं-बोलिओं की एक क्षेत्र में एक ही समय में प्रचलित होना, आरोपित अर्थ, सांस्कृतिक प्रभाव, अपस्तरीय वाक् आदि। विशेषणों की पर्यायभावना, व पर्यायपद भी अर्थपरक दृष्टि से विचारणीय है। अर्थ की विलोमस्थिति सैद्धांतिक कम व्यावहारिक अधिक है। अर्थांतर की दृष्टि से विदेशी शब्दों (जिनसे हिंदी पर्याय युग्मों की रचना हुई) का अनुशीलन महत्वपूर्ण है। भाषा और संस्कृति में अनिवार्य समाश्रयता है। भाषा संस्कृति की पोषिका और उसके विकास की संवाहिनी है। यह संवहन अर्थ के माध्यम से होता है।
अर्थ
ध्वनि के सामान की भी परिवर्तन शील सत्ता है। ध्वनिशास्त्र के कठोर परीक्षण में किसी ध्वनि का यथावत (हू-ब-हू ) उच्चारण कठिन माना गया है। अभिव्यक्ति की भी यही स्थिति है। प्रत्येक प्रेषण में वक्त अर्थ को उसी आयाम और इयत्ता से व्यक्त कर रहा है, कहना कठिन है। अर्थ मन और बुद्धि की जटिल सारणियों से प्रवाहित होता है, उसे प्रवाहित करनेवाली बाह्य एवं आंतरिक शक्तियाँ असंख्य हैं। व्यक्ति के आशय को नाना प्रकार के ध्वनि संयोजनों में रूपायित होना पड़ता है। इससे अर्थ के विचलन की संभावना बढ़ जाती है। यह विचलित अर्थ फिर-फिर प्रयोगों से नवीन अर्थ के रूप में प्रतिष्ठित और लोकमान्य हो जाता है। अर्थ का इतिहास अर्थ परिवर्तन का इतिहास है। अर्थान्तर वाक् की मूलभूत संवेदनाओं में से एक है।
अर्थ वाक् का आरंभ भी है और अंत भी। वक्ता अपने आशय को व्यक्त करने के लिए धवनियों का संयोजन करता है और उसकी प्राप्ति के पश्चात् उसका लोप। अर्थ पद और वाक्य की केंद्रीय सत्ता है। अर्थ एक अभौतिक स्थिति है। उसकी प्रक्रिया जटिल और सूक्ष्म है। उसकी प्रवृत्तियों और परिस्थितियों के अध्ययन और मानकीकरण का प्रयास ध्वनिशास्त्र, ध्वनिग्रामशास्त्र, रूपग्रामशास्त्र आदि की तरह प्रचलित और प्रसिद्ध नहीं हो सका। हिंदी अर्थ विज्ञा पर केवल डॉ. सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या, डॉ. बाबूराम सक्सेना, डॉ. हरदेव बाहरी, डॉ. धीरेन्द्र वर्मा, डॉ, उदय नारायण तिवारी, डॉ. सुरेश कुमार वर्मा आदि ने ही कार्य किया है। डॉ. बाहरी ने ने अंग्रेजी में लिखित शोध प्रबंध 'हिंदी सेमेंटिक्स' हिंदी भाषा को अर्थविज्ञान के विविध कोणों से स्पर्श किया गया है। डॉ. केशवराम पाल का हिंदी अर्थ से सम्बद्ध शोध प्रबंध 'हिंदी में प्रयुक्त संस्कृत शब्दों के अर्थ परिवर्तन' की परिधि सीमित है। अर्थान्तर की नींव वस्तु - नामांकन के समय ही पड़ जाती है। एक नामांकन दूसरे नामांकन को जन्म देता है। इससे प्रथम में अर्थान्तर की छाया उत्पन्न हो जाती है।
वाक्य और अर्थ में अर्थवैज्ञानिक एवं व्याकरणिक संबंध है। वाक्य के भेद-प्रभेद अर्थ को भिन्न-भिन्न स्तर प्रदान करते हैं। शब्द शक्तियों काव्य वैभव में वृद्धि करती हैं। हिंदी अर्थ परिवर्तन में लक्षणा और व्यंजना का अभूतपूर्व योगदान है।
हिंदी क्रियाओं के अंतर्गत अर्थ के लक्षणात्मक परिवर्तन, विशेषार्थक व्यंजनाओं, तथा संध्वनीय भिन्नार्थी रूपों का ज्ञान रचनाकार को होना आवश्यक है।
अर्थ की दृष्टि से विशेषणों की अस्पष्टता व विसंगति, उनके प्रयोग भेद, विरुद्धार्थी विशेषणों की सापेक्ष स्थिति का परिचय स्थिर अर्थ को गतिमान कर सकता है। विशेषणों के अर्थों को प्रत्यय योजना भी प्रभावित करती है। संज्ञा और विशेषण की भिन्नार्थक समध्वनीयता रचनाओं में रोचकता और लालित्य की वृद्धि करती हैं।
क्रमश:
४-७-२०२०
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मुक्तक - कसूर
*
ओ कसूरी लाल! तुझको कया कहूँ?
चुप कसूरों को क्षमाकर क्यों दहूँ?
नटखटी नटवर न छोडूँ साँवरे!
रास-रस में साथ तेरे हँस बहूँ.
*
तू कहेगा झूठ तो भी सत्य हो.
तू करे हुडदंग तो भी नृत्य है.
साँवरे ओ बाँवरे तेरा कसूर
जगत कहता ईश्वर का कृत्य है.
*
कौन तेरे कसूरों से रुष्ट है?
छेड़ता जिसको वही संतुष्ट है.
राधिका, बाबा या मैया जशोदा-
सभी का ऐ कसूरी तू इष्ट है.
***
: बाल कविता :
*
आन्या गुडिया प्यारी,
सब बच्चों से न्यारी।
.
गुड्डा जो मन भाया,
उससे हाथ मिलाया।
.
हटा दिया मम्मी ने,
तब दिल था भर आया।
.
आन्या रोई-मचली,
मम्मी थी कुछ पिघली।
.
''नया खिलौना ले लो'',
आन्या को समझाया।
.
शाम को पापा आए
मम्मी पर झल्लाए।
*
हुई रुआँसी मम्मी
आन्या ने ली चुम्मी।
*
बोली: ''इनको बदलो
साथ नये के हँस लो''।
***
आभार
*
आभार ही
आ भार.
वही कहे
जो सके
भार स्वीकार.
४-७-२०१७
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दोहा गीत
*
जो अव्यक्त हो,
व्यक्त है
कण-कण में साकार
काश!
कभी हम पा सकें,
उसके भी दीदार
*
कंकर-कंकर में वही
शंकर कहते लोग
संग हुआ है किस तरह
मक्का में? संजोग
जगत्पिता जो दयामय
महाकाल शशिनाथ
भूतनाथ कामारि वह
भस्म लगाए माथ
भोगी-योगी
सनातन
नाद वही ओंकार
काश!
कभी हम पा सकें,
उसके भी दीदार
*
है अगम्य वह सुगम भी
अवढरदानी ईश
गरल गहे, अमृत लुटा
भोला है जगदीश
पुत्र न जो, उनका पिता
उमानाथ गिरिजेश
नगर न उसको सोहते
रुचे वन्य परिवेश
नीलकंठ
नागेश हे!
बसो ह्रदय-आगार
काश!
कभी हम पा सकें,
उसके भी दीदार
४-७-२०१६
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कृति चर्चा:
अँधा हुआ समय का दर्पन : बोल रहा है सच कवि का मन
चर्चाकार: आचार्य संजीव
*
[कृति विवरण: अँधा हुआ समय का दर्पन, डॉ. रामसनेही लाल शर्मा 'यायावर', नवगीत संग्रह, १९०९, आकार डिमाई, पृष्ठ १२७, १५०/-, आवरण बहुरंगी सजिल्द जैकेट सहित, अयन प्रकाशन दिल्ली, संपर्क: ८६ तिलक नगर, फीरोजाबाद १८३२०३, चलभाष: ९४१२३६७७९,dr.yayavar@yahoo.co.in]
*
श्रेष्ठ-ज्येष्ठ साहित्यकार डॉ. रामसनेहीलाल शर्मा 'यायावर' के आठवें काव्य संकलन और तीसरी नवगीत संग्रह 'अँधा हुआ समय का दर्पण' पढ़ना युगीन विसंगतियों और सामाजिक विडम्बनाओं से आहत कवि-मन की सनातनता से साक्षात करने की तरह है. आदिकाल से अब तक न विसंगतियाँ कम होती हैं न व्यंग्य बाणों के वार, न सुधार की चाह. यह त्रिवेणी नवगीत की धार को अधिकाधिक पैनी करती जाती है. यायावर जी के नवगीत अकविता अथवा प्रगतिवादी साहित्य की की तरह वैषम्य की प्रदर्शनी लगाकर पीड़ा का व्यापार नहीं करते अपितु पूर्ण सहानुभूति और सहृदयता के साथ समाज के पद-पंकज में चुभे विसंगति-शूल को निकालकर मलहम लेपन के साथ यात्रा करते रहने का संदेश और सफल होने का विश्वास देते हैं.
इन नवगीतों का मिजाज औरों से अलग है. इनकी भाव भंगिमा, अभिव्यक्ति सामर्थ्य, शैल्पिक अनुशासन, मौलिक कथ्य और छान्दस सरसता इन्हें पठनीयता ही नहीं मननीयता से भी संपन्न करती है. गीत, नवगीत, दोहा, ग़ज़ल, हाइकु, ललित निबंध, समीक्षा, लघुकथा और अन्य विविध विधाओं पर सामान दक्षता से कलम चलाते यायावर जी अपनी सनातन मूल्यपरक शोधदृष्टि के लिये चर्चित रहे हैं. विवेच्य कृति के नवगीतों में देश और समाज के सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक परिदृश्य का नवगीतीय क्ष किरणीय परीक्षण नितांत मलिन तथा तत्काल उपचार किये जाने योग्य छवि प्रस्तुत करता है.
पीर का सागर / घटज ऋषि की / प्रतीक्षा कर रहा है / धर्म के माथे अजाने / यक्ष-प्रश्नों की व्यथा है -२५,
भूनकर हम / तितलियों को / जा रहे जलपान करने / मंत्र को मुजरे में / भेजा है / किसी ने तान भरने -२६,
हर मेले में / चंडी के तारोंवाली झूलें / डाल पीठ पर / राजाजी के सब गुलाम फूलें / राजा-रानी बैठ पीठ पर / जय-जयकार सुनें / मेले बाद मिलें / खाने को / बस सूखे पौधे - ३८
दूधिया हैं दाँत लेकिन / हौसला परमाणु बम है / खो गया मन / मीडिया में / आजकल चरचा गरम है / आँख में जग रहा संत्रास हम जलते रहे हैं - ३९
सूखी तुलसी / आँगन के गमले में / गयी जड़ी / अपने को खाने / टेबिल पर / अपनी भूख खड़ी / पाणिग्रहण / खरीद लिया है / इस मायावी जाल ने - ४४
चुप्पी ओढ़े / भीड़ खड़ी है / बोल रहे हैं सन्नाटे / हवा मारती है चाँटे / नाच रहीं बूढ़ी इच्छाएँ / युवा उमंग / हुई सन्यासिन / जाग रहे / विकृति के वंशज / संस्कृति लेती खर्राटे -५२
भूमिका पर थी बहस / कुछ गर्म इतनी / कथ्य पूरा रह गया है अनछुआ / क्या हुआ? / यह क्या हुआ? - ५७
यहाँ शिखंडी के कंधे पर / भरे हुए तूणीर / बेध रहे अर्जुन की छाती / वृद्ध भीष्म के तीर / किसे समर्पण करे कहानी / इतनी कटी-फ़टी -६०-६१
सम्मानित बर्बरता / अभिनन्दित निर्ममता / लांछित मर्यादा को दें सहानुभूति / चलो / हत्यारे मौसम के कंठ को प्रहारें -७१
पीड़ा के खेत / खड़े / शब्द के बिजूके / मेड़ों पर आतंकित / जनतंत्री इच्छाएँ / वन्य जंतु / पाँच जोड़ बांसुरी बजाएँ / पीनस के रोगी / दुर्गन्ध के भभूके / गाँधी की लाठी / पर / अकड़ी बंदूकें -७३
हर क्षण वही महाभारत / लिप्साएँ वे गर्हित घटनाएँ / कर्ण, शकुनि, दुर्योधन की / दूषित प्रज्ञायें / धर्म-मूढ़ कुछ धर्म-भीरु / कुछ धर्म विरोधी / हमीं दर्द के जाये / भाग्य हमारे फूटे-७६
मुखिया जी के / कुत्ते जैसा दुःख है / मुस्टंडा / टेढ़ी कमर हो गयी / खा / मंहगाई का डंडा / ब्याज चक्रवर्ती सा बढ़कर / छाती पर बैठा / बिन ब्याही बेटी का / भारी हुआ / कुँआरापन -८७
पीना धुआँ, निगलने आँसू / मिलता ज़हर पचने को / यहाँ बहुत मिलता है धोखा / खाने और खिलाने को / अपना रोना, अपना हँसना / अपना जीना-मरना जी / थोड़ा ही लिखता हूँ / बापू! / इसको बहुत समझना जी- पृष्ठ ९९
इन विसंगतियों से नवगीतकार निराश या स्तब्ध नहीं होता। वह पूरी ईमानदारी से आकलन कर कहता है:
'उबल रहे हैं / समय-पतीले में / युग संवेदन' पृष्ठ ११०
यह उबाल बबाल न बन पाये इसीलिये नवगीत रचना है. यायावर निराश नहीं हैं, वे युग काआव्हान करते हैं: 'किरणों के व्याल बने / व्याधों के जाल तने / हारो मत सोनहिरन' -पृष्ठ ११३
परिवर्तन जरूरी है, यह जानते हुए भी किया कैसे जाए? यह प्रश्न हर संवेदनशील मनुष्य की तरह यायावर-मन को भी उद्वेलित करता है:
' झाड़कर फेंके पुराने दिन / जरूरत है / मगर कैसे करें?' -पृष्ठ ११७
सबसे बड़ी बाधा जन-मन की किंकर्तव्यविमूढ़ता है:
देहरी पर / आँगन में / प्राण-प्रण / तन-मन में / बैठा बाजार / क्या करें? / सपने नित्य / खरीदे-बेचे / जाते हैं / हम आँखें मींचे / बने हुए इश्तहार / क्या करें? -पृष्ठ १२४
पाले में झुलसा अपनापन / सहम गया संयम / रिश्तों की ठिठुरन को कैसे / दूर करें अब हम? - पृष्ठ ५६
यायावर शिक्षक रहे हैं. इसलिए वे बुराई के ध्वंस की बात नहीं कहते। उनका मत है कि सबसे पहले हर आदमी जो गलत हो रहा है उसमें अपना योगदान न करे:
इस नदी का जल प्रदूषित / जाल मत डालो मछेरे - पृष्ठ १०७
कवि परिवर्तन के प्रति सिर्फ आश्वस्त नहीं हैं उन्हें परिवर्तन का पूरा विश्वास है:
गंगावतरण होना ही है / सगरसुतों की मौन याचना / कैसे जाने? / कैसे मानें? -पृष्ठ ८४
यह कैसे का यक्ष प्रश्न सबको बेचैन करता है, युवाओं को सबसे अधिक:
तेरे-मेरे, इसके-उसके / सबके ही घर में रहती है / एक युवा बेचैनी मितवा -पृष्ठ ७९
आम आदमी कितना ही पीड़ित क्यों न हो, सुधार के लिए अपना योगदान और बलिदान करने से पीछे नहीं हटता:
एकलव्य हम / हमें दान करने हैं / अपने कटे अँगूठे -पृष्ठ ७५
यायावर जी शांति के साथ-साथ जरूरी होने पर क्रांतिपूर्ण प्रहार की उपादेयता स्वीकारते हैं:
सम्मानित बर्बरता / अभिनन्दित निर्ममता / लांछित मर्यादा को दे सहानुभूति / चलो / हत्यारे मौसम के कंठ को प्रहारें - पृष्ठ ७१
भटक रहे तरुणों को सही राह पर लाने के लिये दण्ड के पहले शांतिपूर्ण प्रयास जरूरी है. एक शिक्षक सुधार की सम्भावना को कैसे छोड़ सकता है?:
आज बहके हैं / किरन के पाँव / फिर वापस बुलाओ / क्षिप्र आओ -पृष्ठ ६९
प्रयास होगा तो भूल-चूक भी होगी:
फिर लक्ष्य भेद में चूक हुई / भटका है / मन का अग्निबाण - पृष्ठ ६२
भूल-चूल को सुधारने पर चर्चा तो हो पर वह चर्चा रोज परोसी जा रही राजनैतिक-दूरदर्शनी लफ्फ़ाजियों सी बेमानी न हो:
भूमिका पर थी बहस / कुछ गर्म इतनी / कथ्य पूरा रह गया है अनछुआ / यह क्या हुआ? / यह क्या हुआ? -पृष्ठ ५७
भटकन तभी समाप्त की जा सकती है जब सही राह पर चलने का संकल्प दृढ़ हो:
फास्टफूडी सभ्यता की कोख में / पलते बवंडर / तुम धुएँ को ओढ़कर नाचो-नचाओ / हम, अभी कजरी सुनेंगे- पृष्ठ ५४
कवि के संकल्पों का मूल कहाँ है यह 'मुक्तकेशिनी उज्जवलवसना' शीर्षक नवगीत में इंगित किया गया है:
आँगन की तुलसी के बिरवे पर / मेरी अर्चना खड़ी है -पृष्ठ ३१
यायावर जी नवगीत को साहित्य की विधा मात्र नहीं परिवर्तन का उपकरण मानते हैं. नवगीत को युग परिवर्तन के कारक की भूमिका में स्वीकार कर वे अन्य नवगीतिकारों का पथप्रदर्शन करते हैं:
यहाँ दर्द, यहाँ प्यार, यहाँ अश्रु मौन / खोजे अस्तित्व आज गीतों में कौन? / शायद नवगीतकार / सांस-साँस पर प्रहार / बिम्बों में बाँध लिया गात -पृष्ठ ३०
यायावर के नवगीतों की भाषा कथ्यानुरूप है. हिंदी के दिग्गज प्राध्यापक होने के नाते उनका शब्द भण्डार समृद्ध और संपन्न होना स्वाभाविक है. अनुप्रास, उपमा, रूपक अलंकारों की छटा मोहक है. श्लेष, यमक आदि का प्रयोग कम है. बिम्ब, प्रतीक और उपमान की प्रचुरता और मौलिकता इन नवगीतों के लालित्य में वृद्धि करती है. आशीष देता सूखा कुआँ, जूते से सरपंची कानून लाती लाठियाँ, कजरी गाता हुआ कलह, कचरे में मोती की तलाश, लहरों पर तैरता सन्नाटा, रोटी हुई बनारसी सुबहें आदि बिम्ब पाठक को बाँधते हैं.
इन नवगीतों का वैशिष्ट्य छान्दसिकता के निकष पर खरा उतरना है. मानवीय जिजीविषा, अपराजेय संघर्ष तथा नवनिर्माण के सात्विक संकल्प से अनुप्राणित नवगीतों का यह संकलन नव नवगीतकारों के लिये विशेष उपयोगी है. यायावर जी के अपने शब्दों में : 'गीत में लय का नियंत्रण शब्द करता है. इसलिए जिस तरह पारम्परिक गीतकार के लिये छंद को अपनाना अनिवार्य था वैसे हही नवगीतकार के लिए छंद की स्वीकृति अनिवार्य है.… नवता लेन के लिए नवगीतकार ने छंद के क्षेत्र में अनेक प्रयोग किये हैं. 'लयखंड' के स्थान पर 'अर्थखण्ड' में गीत का लेखन टी नवगीत में प्रारंभ हुआ ही इसके अतिरिक्त २ लग-अलग छंदों को मिलकर नया छंद बनाना, चरण संख्या घटाकर या बढ़ाकर नया छंद बनाना, चरणों में विसंगति और वृहदखण्ड योजना से लय को नियंत्रित करना जैसे प्रयोग पर्याप्त हुए हैं. इस संकलन में भी ऐसे प्रयोग सुधीपाठकों को मिलेंगे।'
निष्कर्षत: यह कृति सामने नवगीत संकलन न होकर नवगीत की पाठ्य पुस्तक की तरह है जिसमें से तत्सम-तद्भव शब्दों के साथ परिनिष्ठित भाषा और सहज प्रवाह का संगम सहज सुलभ है. इन नवगीतों में ग्रामबोध, नगरीय संत्रास, जाना समान्य की पीड़ाएँ, शासन-प्रशासन का पाखंड, मठाधीशों की स्वेच्छाचारिता, भक्तों का अंधानुकरण, व्यवस्थ का अंकुश और युवाओं की शंकाएं एक साथ अठखेला करती हैं.
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कुण्डलिनी :
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हे माँ! हेमा है खबर, खाकर थोड़ी चोट
बची; हुई जो दिवंगता, थी इलाज में खोट
थी इलाज में खोट, यही अच्छे दिन आए
व्ही आई पी है खास, आम जन हुए पराए
कब तक नेताओं को, जनता करे क्यों क्षमा?
काश समझ लें दर्द, आम जन का कुछ हेमा
४-७-२०१५
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