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सोमवार, 12 जनवरी 2026

जबलपुर, इतिहास, नाटक, बंगाली समाज, दिव्येन्दु गांगुली, श्याम खत्री, कचनार, मिलन,

जबलपुर में नाटक 
डार्केस्ट आवर में चर्चिल के हिन्दी संवाद को विश्वसनीय बनाने वाले
दिव्येन्दु गांगुली की उतार चढ़ाव वाली यात्रा इतनी आसान नहीं रही
नेटफ्लिक्स में इन दिनों एक फ‍िल्म डार्केस्ट आवर (Darkest Hour) देखने वालों की संख्या में अचानक इज़ाफा हो गया है। इसका कारण यह फ‍िल्म अब हिन्दी में डब हो गई। Darkest Hour में गैरी ओल्डमैन ने विंस्टन चर्चिल का किरदार निभाया है, जिसमें मई 1940 में यूके के प्रधानमंत्री के तौर पर उनके शुरुआती अहम दिनों पर फोकस किया गया है, जब उन्हें यह तय करना था कि हिटलर के साथ शांति के लिए बातचीत करें या लड़ें। और आखिर में उन्होंने प्रेरणादायक भाषणों से देश को एकजुट किया, जिसमें मशहूर "हम समुद्र तटों पर लड़ेंगे" वाली लाइन भी शामिल है, जो ब्रिटेन के "सबसे मुश्किल समय" के दौरान उनके पक्के इरादे को दिखाती है। इस रोल के लिए ओल्डमैन को बेस्ट एक्टर का एकेडमी अवॉर्ड मिला, और फिल्म में भारी दबाव के बावजूद उनके साहसी नेतृत्व को दिखाया गया है।
Darkest Hour में चर्चिल की भूमिका के मुख्य पहलू के तौर पर संकट में नेतृत्व, संसद में दिए गए भाषण और फिल्म के अंत में संसद में दिया गया साहसी भाषण महत्वपूर्ण है। गैरी ओल्डमैन ने शानदार परफॉर्मेंस, जिसमें मेकअप और प्रोस्थेटिक्स शामिल हैं, ने उन्हें काफी तारीफ और ऑस्कर दिलाया। हिन्दी में इसका डब संस्करण लोकप्रिय हो रहा है। चर्चिल के हिन्दी संवाद इतने विश्वसनीय लगते हैं जैसे वे स्वयं या गैरी ओल्डमैन बोल रहे हों। गैरी ओल्डमैन को हिन्दी में डब जबलपुर के दिव्येन्दु गांगुली (दिनपाल गांगुली) ने किया है। दिव्येन्दु गांगुली की लिप-सिंकिंग (lip-syncing) इतनी शानदार है कि महसूस व अनुभव होता है कि हम मूल भाषा में डार्केस्ट आवर को को देख रहे हैं।
दिव्येन्दु गांगुली की जबलपुर से मुंबई तक की यात्रा इतनी आसान नहीं रही। उनका जीवन औपन्यासिक है।
जबलपुर में स्वतंत्रता के बाद से आठवें दशक तक रंगकर्म की दो दुनिया थी। शहर में मुख्य धारा में मराठी व हिन्दी का रंगकर्म उफान भरता था तो शहर के पूर्वी हिस्से में घमापुर से रक्षा संस्थानों तक बंगला रंगकर्म का दबदबा था। यह भी सत्य है कि हिन्दी रंगकर्म पर बंगला रंगकर्म का ज्यादा असर था। हिन्दी नाटकों के निर्देशक श्याम खत्री मराठी व बंगला के मूल नाटकों से प्रभावित थे लेकिन उन्होंने कल्पनाशीलता दिखाते हुए हिन्दी नाटकों को स्थापित कर रहे थे। शहर के पूर्वी हिस्से में रामलीला के साथ जात्रा का मंचन समान रूप से होता था। रामलीला के कलाकार जात्रा से रंगकर्म की बारीकियां सीख रहे थे। रामलीला के कलाकार धीरे धीरे जात्रा में भी भाग लेने लगे। दरअसल उस समय बंगाल से कई परिवार जबलपुर आजीविका की तलाश में यहां आए। यहां उन्होंने सुरक्षा संस्थानों के साथ रेलवे और बर्न कंपनी में नौकरी करना शुरू कर दी। इन बंगला परिवार के साथ वहां की संस्कृति जबलपुर पहुंची। बंगाल से आए अध‍िकांश परिवार ने नौकरी करने वाले संस्थानों के निकट ही अपना बसेरा बनाया। जबलपुर में घमापुर से डिफेंस संस्थानों के बीच के क्षेत्र बाई का बगीचा, शीतलामाई, कांचघर, सतपुला, व्हीकल फेक्टरी, गन केरिज फेक्टरी, रांझी, आर्डनेंस फेक्टरी व खमरिया में बंगला के साथ पूर्वी उत्तरप्रदेश व बिहार के परिवार रहवासी बने। उत्तर प्रदेश व बिहार के परिवार पर बंगला संस्कृति का प्रभाव था।
कुछ इसी तरह व्योमकेश गांगुली ने ढाका से देशांतर गमन करते हुए जबलपुर पहुंचे। वे बी. एससी (टेक) पास थे और ढाका की ढाकेश्वरी कपड़ा मिल में काम किया करते थे। उनकी डि‍ग्री इंजीनियरिंग के समकक्ष थी। बंगला समाज में इस ड‍िग्री को बड़े सम्मान से देखा जाता था। व्योमकेश गांगुली एक अच्छे अभि‍नेता होने के साथ उत्कृष्ट गायक भी थे। ढाका में नौकरी के साथ शौकिया रूप से नाटकों में काम करने लगे। लोगों के कहने पर वे कलकत्ता की फिल्म इंडस्ट्री पहुंच कर अभ‍िनय के मौके तलाश करने लगे। उनके पिता उस समय जबलपुर की सेंट्रल जेल में ड‍िप्टी जेलर थे। अंग्रेजों के समय जेलर थे और परिवार व कुल की चिंता उनके लिए सर्वोच्च थी। जब उन्हें बेटे व्योमकेश की फिल्म लाइन में जाने की बात की जानकारी हुई तो वे खफ़ा हुए। पिता ने पुत्र को फटकार हुए कहा कि वे पिता व कुल का नाम डुबा रहे हैं। पुत्र को जबर्दस्ती जबलपुर बुलवा कर विवाह के बंधन में बांध दिया। जबलपुर आ कर व्योमकेश इंजीनियर से क्लर्क बन गए। जबलपुर की बिजली वितरण कंपनी मार्टिन एन्ड बर्न कंपनी में बाबू बन कर उनकी उनकी दिनचर्या सुबह से शाम तक ऑफ‍िस में ही सिमट गई।
जबलपुर के कांचघर क्षेत्र में रहने वाले व्योमकेश गांगुली के दिल में नाटक हिलोरे भरता रहता था। समय मिलने पर वे घर में नाटक करते थे। मोहल्ले में साथ‍ियों के साथ बंगला नाटकों को मंचित करते थे। दुर्गोत्सव में उनका नाटकों का मंचन करने का उत्साह देखते ही बनता था। उस समय तक उनके बड़े पुत्र दिव्येन्दु की प्राथमिक श‍िक्षा रेलवे सराय स्कूल में शुरू हो चुकी थी। घर में प्यार से दिव्येन्दु को टूटु पुकारा जाता था। टूटु को अपने पिता को नाटक करते देखना अच्छा लगता था। पुत्र पिता के चरणों में चलने लगा। पिता के दोस्त आईटीसी में कार्यरत रवीन्द्र भट्टाचार्य थे। लोग उन्हें प्यार से काकू कहा करते थे। पिता के साथ दिव्येन्दु को रवीन्द्र भट्टाचार्य के रूप में एक गुरू भी मिल गया। दिव्येन्दु को जब भी मौका मिलता वे अपने गुरू से अभ‍िनय से ले कर संवाद अदायगी तक सब कुछ जानने के लिए उत्कंठित रहते। मिडिल स्कूल की पढ़ाई के लिए दिव्येन्दु का दाख‍िला सेंट थामस में करा दिया गया। उस समय तक दिव्येन्दु फैंसी ड्रेस में भाग लेने लगे, लेकिन उनकी इच्छा तो नाटक में अभ‍िनय करने की थी। उसी समय दुर्गोत्सव में उनहोंने मोहल्ले में एक बाल नाटक में अभ‍िनय करने का मौका मिल ही गया। पिता ने जब उनको नाटक में अभ‍िनय करते देखा तो वे बहुत खुश हुए। छोटे बच्चों के एक समूह ने उस समय ‘स्वप्न खुड़ो’ नाम के एक नाटक को मंचित किया। दिव्येन्दु ने नाटक की रिहर्सल से ले कर मंचन तक हर क्षण का आनंद उठाया। जब उनका मेकअप किया जा रहा था तब तो वे इतने आनंदित थे और उस समय उनको देखने वाले हर व्यक्त‍ि को महसूस हो रहा था कि जैसे दिव्येन्दु को पूरी जिंदगी की खुशी ही मिल गई हो। दुर्गोत्सव में बंगला नाटक के साथ हिन्दी नाटकों के मंचन की परम्परा शुरू हुई। नवमी के दिन हिन्दी नाटकों का मंचन किया जाने लगा। ये हिन्दी नाटक मूल बंगला नाटकों के हिन्दी रूपांतरण हुआ करते थे।
दिव्येन्दु गांगुली ने हायर सेकेंडरी की पढ़ाई पूरी करने के बाद राबर्टसन कॉलेज में एडमिशन ले लिया। उसी समय उनकी मित्रता गौरीशंकर यादव से हुई। गौरीशंकर उनके मोहल्ले में ही रहा करते थे। दोनों नाटकों से जुड़ा रहना चाहते थे। उनको दुर्गोत्सव में होने वाले और साल में एक बार होने वाले नाटकों के मंचन से संतुष्ट‍ि नहीं मिलती थी। दिव्येन्दु ने दुर्गोत्सव में बंगला नाटकों को हिन्दी में अनुवाद कर उनको मंचित करना शुरू कर दिया था। वे चाहते थे कि हिन्दी में भी बंगला नाटकों की तरह नाटक मंचित होने चाहिए। उस समय हिन्दी स्क्र‍िप्ट मिलने की समस्या थी। दिव्येन्दु ने सोचा कि बेहतर है कि बंगला नाटकों का हिन्दी में अनुवाद किया जाए और उन्हें ही मंचित किया जाए। दिव्येन्दु व गौरीशंकर यादव नाटकों में ही आगे बढ़ना चाहते थे। कई बार गौरीशंकर यादव दिव्येन्दु से कहते थे कि डगर कठिन है लेकिन हम लोग हौंसला नहीं खोएंगे। दोनों को आगे की राह दिखाने वाले के रूप में धर्मराज जायसवाल मिल गए। धर्मराज जायसवाल का प्रतिभा कला मंदिर परिवार नियोजन और अन्य सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए मध्यप्रदेश के गांव गांव में घूम घूम कर नाटकों का मंचन करता था। धर्मराज जायसवाल के साथ मनोहर महाजन जैसे कई नवयुवक व कॉलेज विद्यार्थी जुड़े हुए थे। नाटकों को मंचित करते हुए घूमना और खाने पीने की चिंता से मुक्त हो जाने की मुहिम में दिव्येन्दु व गौरीशंकर यादव भी जुड़ गए। दोनों का विचार यह भी था कि इस तरह वे नाटकों की मुख्य धारा में भी जुड़ जाएंगे।
दिव्येन्दु गांगुली की इसी दौरान जबलपुर की प्लाजा टॉकीज के निकट रहने वाले सुशील बंदोपाध्याय के साथ जुड़ाव की शुरूआत हुई। सुशील बंदोपाध्याय की ख्याति एक अच्छे ज्योतिष के रूप में थी, लेकिन नाटकों का मंचन करने में वे सबसे आगे रहते थे। जबलपुर के करमचंद चौक पर स्थि‍त सिटी बंगाली क्लब में बंगला नाटकों का मंचन सक्र‍ियता से होता था। यहां दिव्येन्दु को गुरू रवीन्द्र भट्टाचार्य व सुशील बंदोपाध्याय ने पूरा सहयोग दिया। सुशील बंदोपाध्याय ने बंगला से बाहर जा कर हिन्दी में भी नाटक किए। उस समय श्याम खत्री हिन्दी रंगमंच के सबसे सक्र‍िय निर्देशक के रूप में खूब नाटकों का मंचन कर रहे थे। दिव्येन्दु गांगुली की ख्वाहिश थी कि वे भी श्याम खत्री निर्देश‍ित किसी नाटक में अभ‍िनय करें। दिव्येन्दु को श्याम खत्री के नाटकों की डिजाइनिंग, सेट, स्वाभाविक संवाद और निर्देशन आकर्ष‍ित करता था। आख‍िरकार श्याम खत्री ने दिव्येन्दु को अपने ‘विषपायी’ में एक भूमिका सौंप दी। यह नाटक उस समय जबलपुर का सबसे हिट नाटक रहा। विषपायी के कई शो हाउसफुल गए। दिव्येन्दु का तब तक एक सुदर्शन व्यक्त‍ित्व निखर चुका था। ऐसा माना जाता है कि वे जबलपुर रंगमंच के सर्वकालिक सुदर्शन अभ‍िनेता रहे। दिव्येन्दु की एक खास‍ियत उनकी गहराई ली हुई दमदार आवाज़ भी थी।
श्याम खत्री के नौकरी के सिलसिले में जबलपुर से बाहर जाने पर उनके कलाकारों ने सत्तर के दशक में कचनार संस्था गठित कर नाटकों का मंचन शुरू किया। कचनार का गठन इस वायदे के साथ किया गया था कि प्रत्येक माह एक नए नाटक का मंचन किया जाएगा। उस दौरान कचनार संस्था ने अपनी सक्र‍ियता से जबलपुर में हलचल मचा दी। यही वह समय था जब दिव्येन्दु गांगुली नाटकों के अनुवाद के प्रति आकर्ष‍ित हुए। उन्होंने बंगला के नाटकों का हिन्दी अनुवाद शुरू किया। उस समय उनकी उम्र महज 21 या 22 वर्ष थी। बंगला नाटक इराव मानुष का हिन्दी में 'ये भी इंसान है' और उत्ताल तरंग का हिन्दी में 'ज्वार भाटा' नाम से रूपांतरण किया। इन दोनों नाटकों में दिव्येन्दु गांगुली ने अभ‍िनय भी किया। नाटकों में उनके साथ उस समय के मशहूर अभ‍िनेता कुमार किशोर भी अभ‍िनय करते थे। कुमार किशोर की विशेषता यह थी कि वे किसी भी बंगला नाटक को देख कर पूरी रात भर में उसकी हिन्दी स्क्र‍िप्ट तैयार कर लेते थे। कुमार क‍िशोर ने रमेन दत्ता निर्देश‍ित बंगला नाटक रक्ते सआ धान को देख कर हिन्दी में ‘खून में बोई धान’ की स्क्र‍िप्ट एक रात भर में लिखी थी। दिव्येन्दु बंगला नाटकों के हिन्दी रूपांतरण को मिल रही सफलता से उत्साहित हुए। उन्होंने शैलेश गुहा नियोगी के शताब्दी गान का हिन्दी रूपांतरण किया। इसके बाद वे अजितेश बंदोपाध्याय के बंगला नाटकों के प्रति आकर्ष‍ित हुए। अजितेश बंदोपाध्याय ने चेखव के Swan Song का बंगला में अनुवाद किया था। इस बंगला अनुवाद को दिव्येन्दु गांगुली ने हिन्दी में 'वो दिन रंग बिरंगे' नाम से रूपांतरित किया। यह हिन्दी रूपांतरण इतना लोकप्रिय हुआ कि इसकी स्क्र‍िप्ट अभी तक नाट्य समूह के बीच मंचन के लिए घूमती रहती है। इसे रेड‍ियो नाटक के रूप में भी खूब प्रस्तुत किया गया। जबलपुर में लक्ष्मेन्द्र चोपड़ा इसको प्रोड्यूस करते थे। दिव्येन्दु गांगुली ने अजितेश बंदोपाध्याय के एक बंगला नाटक का 'तम्बाकू के दुष्परिणाम' नाम से रूपांतरण किया था, जो कि रेड‍ियो नाटक के रूप में लोकप्रिय हुआ। उन्होंने बंगला नाटक ‘तृतीय कंठ’ का हिन्दी अनुवाद किया। इस नाटक को जबलपुर के रंगमंच में सफलता के साथ प्रस्तुत किया गया। इस नाटक में मुख्य भूमिका कुमार क‍िशोर ने निभाई थी और कंठ के रूप में कामता मिश्रा व दिव्येन्दु गांगुली की आवाज़ें थीं। यह एक प्रायोगिक नाटक था।
दिव्येन्दु गांगुली का बंगला नाटकों के हिन्दी रूपांतरण के साथ मंच पर अभ‍िनय की सक्र‍ियता भी बनी रही। उन्होंने अपने नाट्य गुरू रवीन्द्र भट्टाचार्य से नाटकों को एडिट करना सीखा। डा. शंकर शेष के नाटक फंदी को दिव्येन्दु ने एडिट कर के प्रस्तुत किया। वर्ष 1974 में दिव्येन्दु गांगुली और प्रभात मित्रा ने मिलकर जबलपुर में एक नाट्य संस्था 'अनुराग' बनाई। उसी समय दिव्येन्दु गांगुली, कामता मिश्रा, गौरीशंकर यादव, कुमार किशोर, प्रभात मित्रा, आर. खान व सुरेश बाथरे के विचार में जबलपुर नाट्य संघ के गठन की बात आई। जबलपुर में नाट्य गतिव‍िध‍ि जोरों पर थीं। मिलन संस्था त्रिभाषीय लघु नाट्य प्रतियोगिता का आयोजन करता था, जिसमें हिन्दी, बंगला व मराठी भाषा के नाटकों का मंचन होता था। इस प्रतियोगिता की अवधारणा इलाहाबाद नाट्य प्रतियोगिता की ही तरह की थी। 8 व 9 फरवरी 1975 को जबलपुर जिला नाट्य संघ द्वारा प्रथम नाट्य महोत्सव का आयोजन महाराष्ट्र हाई स्कूल के मनोहर प्रेक्षागृह के हर्षें रंगमंच पर किया गया। दिव्येन्दु गांगुली ने 'अनुराग' संस्था की ओर से इस नाट्य महोत्सव में 'वो दिन रंग बिरंगे' की प्रस्तुति दी।
दिव्येन्दु गांगुली ‘वो दिन रंग बिरंगे’ की प्रस्तुति को ले कर काफ़ी उत्तेजित थे। वे स्वयं रजनी चटर्जी और प्रभात मित्रा कालीनाथ की भूमिका में थे। रवीन्द्र भट्टाचार्य ने निर्देशन में पूरी जान लगा दी थी। नाटक का पूरा ऑड‍ियो आधुनिकतम माने जाने वाले कैरव्ज स्टूडियो में तैयार किया गया। मन्नूलाल पुजारी जैसे जबलपुर के निर्देशक मेकअप करने को तैयार हो गए थे। बैक स्टेज में संगीतज्ञ बसंत त‍िमोथी, सोहन पांडे राजेश तिवारी, आकाशवाणी में उद्घोषक रहे जितेन्द्र महाजन, सुभाष पात्रो जैसे गुणी लोग थे। अलखनंदन जैसे निर्देशक बैक स्टेज में थे। ‘अनुराग’ की पूरी टीम नाटक के मंचन को ले कर उतावली थी। उसी समय जबलपुर रंगमंच के दो बड़े कलाकार राजेन्द्र दुबे व मिर्जा अजहर बेग का असामयिक निधन हो गया। जबलपुर की रंग संस्थाएं व रंगकर्मी ऐसे समय में नाट्य महोत्सव का आयोजन करने से हिचक रहे थे। आम राय बन रही थी कि नाट्य महोत्सव को स्थगित कर दिया जाए। नाट्य महोत्सव के स्थगित होने की जानकारी से दिव्येन्दु गांगुली लगभग निराश हो गए। उन्हें महसूस हुआ कि नाट्य मंचन को ले कर जो रफ़्तार बनी थी वह भविष्य में रह पाएगी कि नहीं। काफ़ी जद्दोजहद के बाद अंत में सब ने यह समाधान निकाला कि नाट्य महोत्सव को राजेन्द्र दुबे व मिर्जा अजहर बेग को समर्पित कर नाटकों का मंचन किया जाए।
वो दिन रंग बिरंगे का मंचन हुआ। दर्शकों को रजनी चटर्जी की भूमिका में दिव्येन्दु गांगुली का अभ‍िनय और नाटक का कथ्य दोनों बहुत पसंद आया। सत्तर के दशक के हिसाब से नाटक की विषयवस्तु बिल्कुल नई थी। एक कलाकार जीवन संध्या में अपने अतीत को याद करता है। नाटक के माध्यम से कलाकार ने समाज से कई सवाल उठाए थे। इस नाट्य महोत्सव में दिव्येन्दु गांगुली ने विश्वभावन देवलिया निर्देश‍ित ‘हयवदन’ में भागवत की भूमिका निभाई थी। नाटक में उस समय जबलपुर रंगमंच के बड़े कलाकार गोविंद मिश्रा, कुमार किशोर, कामता मिश्रा, गौरीशंकर यादव, प्रभात मित्रा, सिंधु गडकरी, पुष्पा श्रीवास्तव ने अभि‍नय किया था। बाल कलाकारों में मधुसूदन नागराज, अरूणा काले, न‍िध‍ि द्वि‍वेदी थीं। हयवदन की व‍िश‍िष्टता सतीश तिवारी का संगीत था। नाटक में आभा तिवारी ने सितार, तेजराज मावजी ने सेक्साफोन क्लारीनेट, रत्नाकर कुंडले ने वायलिन और अल्हाद पंड‍ित ने तबले पर ऐसा संगीत रचा था जिसकी नाट्य प्रस्तुतियों में कल्पना नहीं की जा सकती। श्याम श्रीवास्तव ने बन आई सोन चिरैया, उजले से घोड़े पे होके सवार, चंदन डुलिया बैठी रे दुल्हनियां व तन मन को बांधे क्यों सिर्फ एक देह के साथ जैसे गीत नाटक के लिख दिए। हयवदन में दिव्येन्दु गांगुली ने आंगिक, वाचिक, सात्व‍िक और आहार्य अभ‍िनय के सिद्धांतों को मंच पर प्रस्तुत किया। जबलपुर का रंगकर्म कितना आगे था यह इससे पता चलता है कि 1973 में 20 व 21 अक्टूबर को कचनार संस्था ने मध्यप्रदेश में पहली बार ‘हयवदन’ का मंचन किया था। नाटक का ब्रोशर चौबीस पृष्ठ का था।
उस समय जबलपुर में साहित्य, कला, सांस्कृतिक वातावरण जबर्दस्त था। कलाकारों में अभ‍िनय की होड़ थी तो नाटकों को अन्य भारतीय भाषाओं से हिन्दी में रूपांतरित करने की प्रतिस्पर्धा भी। ज्ञानरंजन के संपादन में पहल का प्रकाशन शुरू हो चुका था। रंगकर्मी रात में एक स्थान पर एकत्र‍ित हो कर पहल में छपी कहानियों या विचारोत्तेजक लेखों का पाठ करते थे और उसे रंगकर्मी शांति से बैठ कर सुन कर उन पर लंबी-लंबी बहसें किया करते थे। ऐसी कई बैठकों का दिव्येन्दु अभ‍िन्न हिस्सा हुआ करते थे। उस दौरान उन्होंने रेड‍ियो नाटक में काम किया। उस समय जबलपुर के सीनियर रेलवे इंस्टीट्यूट में एक रेड‍ियो नाटक को लाउड स्पीकर के जरिए लोगों को सुनाया गया। उस समय जबलपुर आकाशवाणी से रेड‍ियो नाटकों का खूब प्रसारण हुआ।
दिव्येन्दु गांगुली को कॉलेज की पढ़ाई के बाद ड‍िफेंस अकाउंट में नौकरी मिल गई। उस समय ड‍िफेंस अकाउंट में जबलपुर के रंगकर्मी मनोहर कुंभोजकर, अलखनंदन, तपन बैनर्जी, रूद्रदत्त दुबे, हिमांशु राय भी नौकरी किया करते थे। दिव्येन्दु गांगुली ने नौकरी के बाद मिले समय का उपयोग हिन्दी अनुवाद व रूपांतरण में करने लगे। उन्होंने इन कामों में शोध के जरिए विषयवस्तु तो वही रखी लेकिन भाषा को सहज बनाया। इस दौरान दिव्येन्दु ने अलखनंदन ल‍िखि‍त शीर्षकहीन नाटक में भूमिका निभाते हुए उसे निर्देश‍ित भी किया। जबलपुर में आधुनिक नाटकों के मंचन की शुरूआत हो चुकी थी ऐसे समय उन्होंने 1982 में अपना तबादला बंबई करवा लिया। वे पेशेवर तरीके से थ‍िएटर करना चाहते थे। बंबई में वे इप्टा से जुड़ गए। फ‍िल्मों में कुछ अनुभव अच्छे नहीं रहे। टीवी सीरियल राग दरबारी में उन्होंने भूमिका निभाई। बंबई में उनकी मुलाकात जबलपुर के ही मनोहर महाजन से हुई। मनोहर महाजन रेड‍ियो सिलोन से जुड़ कर लोकप्रियता हासिल कर रहे थे। दिव्येन्दु की वॉयसिंग में रूचि थी। मनोहर महाजन ने इस क्षेत्र में उनकी मदद व मार्गदर्शन किया। दिव्येन्दु फ‍िल्म डि‍वीजन में कमेन्ट्री करने लगे। बंबई में भी उन्होंने बंगला से हिन्दी व अंग्रेजी में रचनात्मक अनुवाद व रूपांतरण किया। विज्ञापन की दुनिया में वॉयसिंग में काम किया। कई फ‍िल्मों में डबिंग की। सुदर्शन व्यक्त‍ित्व के कारण उन्होंने मॉडलिंग भी की। एक डॉक्यूमेंट्री में दिव्येन्दु ने विंस्टल चर्चिल का वॉयस ओवर किया। ब्रुक बांड चाय का कुंभ मेले के दौरान बनाए गए एक विज्ञापन में दादा जी के चरित्र में उनकी आवाज़ के उतार चढ़ाव को विज्ञापन जगत के साथ उस विज्ञापन को देखने वालों ने भी बहुत सराहा।
दिव्येन्दु का अब नाम दिनपाल गांगुली हो चुका है। मुंबई की दुनिया में वे इसी नाम से विख्यात हैं। नाम बदलने की एक कहानी है। बंबई में दिव्येन्दु का नाम हर समय गलत ढंग से लिखा जाता था। नाम गलत लिखने या बोलने से वे परेशान हो गए। दिव्येन्दु का अर्थ चंद्रमा होता है। उन्होंने सोचा कि दिव्येन्दु से वे अपना नाम सूरज के पर्यायवाची दिनपाल में परिवर्तित कर लेते हैं। तब से वे दिव्येन्दु से दिनपाल गांगुली बन गए।
दिव्येन्दु गांगुली ने श्याम बेनेगल द्वारा राज्यसभा टीवी के लिए निर्देश‍ित संविधान फ‍िल्म में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कुछ साल पहले केड्बरि के बंगला संस्करण के विज्ञापन में दिव्येन्दु की आवाज़ का उपयोग एक वृद्ध चरित्र दामोदर के लिए किया गया। वे अभी भी विज्ञापनों की दुनिया, डबिंग, वॉयस ओवर, अभ‍िनय में सक्र‍िय हैं। इस दुनिया में उनकी बहुत प्रतिष्ठा है। दिव्येन्दु की बेटी सुमिता भी पिता की तरह मनोरंजन इंडस्ट्री में हैं। वे डिस्नेस्टार और कई इस तरह के प्लेटफार्म के लिए अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद व ट्रांसस्क्र‍िप्ट का काम लगातार कर रही हैं। दामाद फिल्म एडीटर हैं।
व्योमकेश गांगुली की तीसरी पीढ़ी उनके बताए रास्ते पर चल रही है। व्योमकेश गांगुली जब कलकत्ता में एक अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती थे, तब एक उनके एक दर्शक ने देख कर कहा था-‘’अरे यह तो एक्टर व्योमकेश बाबू हैं।‘’ शायद उस समय यह क्षण उनके पिता के लिए कष्ट वाला रहा होगा लेकिन उस वक्त उनके चेहरे पर यह संतुष्ट‍ि का भाव था कि मृत्यु के समय उन्हें एक अभ‍िनेता के रूप में पहचाना गया।
आज भी टूटु या दिव्येन्दु या दिनपाल के दिल में जबलपुर धड़कता है। उन्हें याद आता है कि वे कैसे झुंड में घंटों खड़े हो कर दोस्तों व रंगकर्मियों के साथ मालवीय चौक, श्याम टॉकीज, शहीद स्मारक में अपना समण् बिताते थे। वे लोग देर रात कैसे नाटकों और पात्रों को ले कर बहस किया करते थे। जबलपुर उनको अपनी ओर खींचता रहता है। वे गुरू पूर्ण‍िमा के दिन अपने गुरू रवीन्द्र भट्टाचार्य और जबलपुर को याद करते हैं। जब मौका मिलता है दिव्येन्दु मुंबई से जबलपुर दौड़ कर चले आते हैं। वे कोई मौका चूकना नहीं चाहते।

रविवार, 24 अक्टूबर 2021

बाल एकांकी : एक चवन्नी चाँदी की

बाल एकांकी :
एक चवन्नी चाँदी की
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
पात्र परिचय :
रामरती - सात-आठ वर्षीय बालिका।
वीरेंद्र, महेंद्र, ऊषा, प्रभा, उमा आदि हम उम्र बच्चे। लड़के पेंट-कमीज, कुरता-पायजामा, लड़कियाँ फ्रॉक, शलवार-कुर्ती पहने हैं।
ज्वाला प्रसाद वर्मा - गठीके कद के प्रौढ़ व्यक्ति, मध्यम ऊँचाई, सूती धोती, खादी का कुरता, सूती कोट, गाँधी टोपी, पैरों में चप्पल, कंधे पर एक थैला जिसमें कुछ कागज और किताबें हैं।
शिव प्रसाद वर्मा - छोटा कद, युवा, क्लीन शेव, पैंट-कमीज, जूते पहने हुए।
छेदीलाल उसरेठे - पायजामा, कुरता, प्रौढ़, चमरौधा,उमेंठी हुई मूँछें।
गणेश प्रसाद श्रीवास्तव - तरुण, इकहरा शरीर, पायजामा-कमीज, लंबे बाल।
कन्हैया लाल पंडा - किशोर, हाफ पैंट, कमीज, जूते। 
*
सूत्रधार :
दर्शकों! वंदे भारत भारती। इतिहास के पन्ने पलटते हुए साक्षी बन रहे हैं एक घटना के और मिल रहे हैं उसका हिस्सा रहे कुछ गुमनाम लोगों से। जिस इमारत की भव्यता जग जाहिर हो, उसकी और उसके मालिक की तारीफ होती है किन्तु उसको बनाने में पसीना बहानेवालों का नाम गुमनाम रहा आता है। भारतीय स्वतंत्रता सत्याग्रहों में भी ऐसा ही हुआ। नेतृत्व कर रहे चंद नेताओं को प्रशस्ति और सत्ता में भागीदारी मिली किन्तु आंदोलनों में प्राण फूँकनेवाले सत्याग्रही, उनके परिवार जन आदि का योगदान अनदेखा ही रह गया। इस एकांकी में ऐसे ही कुछ सत्याग्रहियों और बच्चों से मिलने जा रहे हैं हम।
पर्दा उठता है
एक कमरा, एक ओर एक चारपाई पर एक चादर बिछी है, एक किनारे एक तकिया रखा है। एक मेज पर लोटा-गिलास, कलम-दावात, अखबार और कुछ कागज रखें हैं। खूँटी पर एक छड़ी और खादी का थैला टँगा है। ज्वाला प्रसाद बैठे हुए कुछ सोच रहे हैं। दरवाजा खटखटाने की आवाज सुनकर पूछते हैं - 'कौन है भाई?'
शिव प्रसाद -'कक्का! मैं शिव प्रसाद' (कहते हुए एक युवक प्रवेश करता है।)
ज्वाला प्रसाद - 'आओ, भाई आओ। मैं तुम्हारी ही राह देख रहा हूँ, छेदीलाल और जमना भी आते ही होंगे। आज का अखबार देखा?'
शिव प्रसाद - 'नहीं कक्का! अभी नहीं देखा। क्या खबर है?'
ज्वाला प्रसाद - 'बापू ने २४ मई १९४२ के हरिजन में अंग्रेजों से भारत को बिना शर्त छोड़कर जाने की जो माँग की थी, उसे वर्धा में हुई कांग्रेस कार्यकारिणी बैठक में मंजूर कर लिया गया है। गाँधी जी ने 'करो या मरो' का नारा दिया है'
गणेश प्रसाद श्रीवास्तव, कन्हैया लाल पंडा आदि प्रवेश करते हैं।
शिव प्रसाद - 'अब क्या होगा?'
ज्वाला प्रसाद - 'होगा क्या? बंबई में सात अगस्त को कांग्रेस महासमिति ने 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' प्रस्ताव पारित कर आंदोलन की घोषणा कर दी है। ८ अगस्त की रात में ही बंबई में मौजूद सभी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया है। बंबई से लौटते समय हमारे गोविंददास जी तथा द्वारका प्रसाद मिश्र जी को रेल में ही गिरफ्तार कर लिया गया है। यह देखकर भाई हुकुमचंद नारद ने 'इंकलाब ज़िंदाबाद' का नारा लगाया तो उन्हें भी धर लिया गया।'
गणेश प्रसाद श्रीवास्तव - 'यह तो होना ही था। अब हमें भी सम्हल जाना चाहिए। यहाँ भी गिरफ्तारियाँ होंगी। हमारे पास जो भी कागजात और अन्य सामग्री है उसे तुरंत छिपाना होगा।' ज्वाला प्रसाद मेज पर रखे पर्चे उनको बाँटने लगते हैं। सभी अपने अपने थैलों में रखे पर्चे किताबें आदि रख लगते हैं।
बाहर कुछ बच्चों का शोर सुनाई देता है।
कन्हैया लाल पंडा - 'जे हल्ला कौन कर रओ आय?
छेदीलाल उसरेठे - 'बच्चे खेल रहे होंगे, भगा दो।'
कन्हैया लाल बाहर जाते हैं, नेपथ्य से आवाजें सुनाई देती हैं।
कन्हैया लाल - 'बच्चों! यहाँ हल्ला मत करो, कहीं और खेलो। अंदर आवाज सुनाई देती है तो बात नहीं कर पाते।'
रामरती - 'भैया! हमको मत भगाओ। हमको भी बताओ क्या हो रहा है? हम भी कुछ करना चाहते हैं।'
कन्हैया लाल - 'तुम बच्चे हो, बड़े हो जाओ तब कुछ करना।'
वीरेंद्र - 'क्यों बच्चे किसी काम नहीं आ सकते क्या?'
उमा - 'हम कुछ तो कर ही सकते हैं।'
महेंद्र - 'इंदिरा जी ने वानर सेना बनाई है न? बाबूजी बता रहे थे।'
ऊषा - 'हम हल्ला नहीं करेंगे।'
प्रभा - 'हमको कोई काम देकर तो देखो।'
कन्हैया लाल - 'तुम सब चुपचाप कन्नागोटी खेलो, मैं ज्वाला चच्चा से बात करता हूँ, कुछ काम होगा तो बताऊँगा।'
रामरती - 'ठीक है, हम शोर नहीं करेंगे। आप लोग अपना काम करो। हम यहाँ देखते रहेंगे। जैसे ही पुलिसवाले आते दिखेंगे, हम हल्ला करने लगेंगे।'
कन्हैया लाल - 'ठीक है।'
कन्हैया लाल कमरे में प्रवेश करता है। ज्वाला प्रसाद उसे बचे हुए पर्चे देते हैं।
ज्वाला प्रसाद - 'यह सुंदरलाल तहसीलदार का बाड़ा और सिमरिया वाली रानी की कोठी तो पहले से पुलिस की निगाह में है। भाई गणेश प्रसाद नायक ने बुलेटिन भेजे थे, आप सब इन्हें अपने-अपने क्षेत्र में बाँट दो। कोई भी अपने पास ज्यादा देर तक न रखे।'
शिव प्रसाद - 'देर-सबेर पुलिस हम सब तक पहुँच ही जाएगी, इसके पहले ही सारे बुलेटिन और पर्चे बाँट देना है।'
कन्हैया लाल पंडा - 'जमना भैया अब लौं नई आए? का मालूम कितै बिलम गए ?'
गणेश प्रसाद श्रीवास्तव - 'मैं बद्रीनाथ गुप्ता के घर से आ रहा हूँ। वे भी गिरफ्तारी की तैयारी से हैं। आज की रात भर मिल जाए हम लोगों को, सब कार्यकर्ता बुलेटिन और पर्चे पाते ही आगे बढ़ाते जाएँगे। सर फरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है।'
छेदीलाल उसरेठे - कदम कदम बढ़ाए जा ख़ुशी के गीत गाए जा, ये ज़िंदगी है कौम की तू कौम पे लुटाए जा। 
ज्वाला प्रसाद - 'कन्हैया लाल! तुम्हारी बालक सेना की क्या तैयारी है?'
कन्हैया लाल पंडा - 'हम तैयार हैं। बड़ों के कैद किये जाने के बाद हम महिलाओं के साथ मिलकर काम जारी रखेंगे। गलियों और नुक्कड़ों पर नारे लगाएँगे और पुलिस के आने के पहले ही घरों में घुस जाया करेंगे।'
तभी बाहर से बच्चों का शोर फिर सुनाई देता है।
'एक चवन्नी चाँदी की, जय बोलो महात्मा गाँधी की।
'झंडा ऊँचा रहे हमारा, विजयी विश्व तिरंगा प्यारा'
'वंदे मातरम, वंदे मातरम।'
शिव प्रसाद झुंझलाते हुए - 'ये बच्चे ऐसे नहीं मानेंगे, मैं देखता हूँ...'
कन्हैया लाल उन्हें रोकते हुए- 'नाराज न हो। ये बच्चों का हल्ला नहीं, हमारे लिए अलार्म है, पुलिस आ रही है। बच्चों का हल्ला बाड़े के दरवाजे की तरफ से हो रहा है, इसका मतलब पुलिस उसी तरफ से आ रही है।'
ज्वाला प्रसाद - 'गणेश भैया मौलाना की कुलिया की तरफ से निकल जाओ। कन्हैया तुम पंडितों की गली में दौड़ जाओ। शिव प्रसाद तुम पन्ना नाऊ की टपरिया की बगल से छिपते हुए भागो। मैं यही रुकता हूँ। मेरे पास कोई कागजात न छोड़ना, सब लेते जाओ।'
सभी लोग एक-एक कर शीघ्रता से निकल जाते हैं।
'ऐ बच्चों! क्यों गड़बड़ कर रहे हो। भागो, अपने घरों में जाओ' एक सिपाही की रोबीली आवाज सुनाई देती है।
रामरती - 'चच्चा! हम बच्चे कहाँ जाएँ? घर में खेलो तो अम्मा भगाती हैं कि सर मत खाओ बाहर जाओ। बाहर आते तो आप भगाते हो तो फिर हम जाएँ तो जाएँ कहाँ?'
महेंद्र - 'बताइए न कहाँ खेलें हम बच्चे??
उमा - 'कल सड़क पर खेल रहे थे तो ज्वाला चच्चा ने डाँटा 'सड़क पर मत खेलो। रिक्शा, साइकिल से टकरा जाओगी।'
प्रभा - 'मंदिर पर पंडित जी नहीं खेलने देते।'
ऊषा - 'स्कूल में भी खेलने नहीं मिलता।'
वीरेंद्र - 'ये बड़े भी अजीब हैं, खुद तो खेलते नहीं और बच्चों को तंग करते हैं।'
रामरती - 'पुलिस चच्चा ! आप ही बताओ बिना खेले हम बच्चे कैसे रहें?'
प्रभा - 'आप जब बच्चे थे तो नहीं खेलते थे क्या?'
उमा - 'आप कहो तो हम आपके साथ थाना चलें वहीं खेल लेंगे।'
दूसरा सिपाही डपटते हुए - 'थाना कोई खेलने की जगह है? वहाँ मुजरिम रखे जाते हैं। तुम लोग कहीं और खेलो।
पहला सिपाही - 'बच्चो! एक बात बताओ यहाँ कोई गड़बड़ी तो नहीं है? कोई कॉँग्रेसवाले तो नहीं आए? पूरी बात बताओगे तो ईनाम मिलेगा।'
रामरती - 'नहीं नहीं, पुलिस चच्चा यहाँ कोई नहीं आता।हम बच्चे किसी को यहाँ आने ही नहीं देते, हमारा खेल ख़राब हो जाता है न?
दूसरा सिपाही - 'इन बच्चों से मत उलझो। चलो, ज्वाला प्रसाद के यहाँ चलो। वहीं जुड़ते हैं सारे बदमाश।'
रामरती- उच्च स्वर से 'जाओ पुलिस चच्चा, ज्वाला चच्चा इसी तरफ रहते हैं, बायें हाथ पे दूसरा मकान है।'
सिपाही आगे बढ़ते हैं, बच्चे फिर गाने लगते हैं 'एक चवन्नी चाँदी की, जय बोलो महात्मा गाँधी की।'
सिपाही ज्वाला प्रसाद वर्मा के घर का दरवाजा खटखटाते हैं। कुछ देर बाद ज्वाला प्रसाद की आवाज सुनाई देती है - 'कौन है भाई? क्यों तंग करते हो? सोने भी नहीं देते।'
सिपाही फिर दरवाजा खटखटाते हैं। दरवाजा खुलता है, सिपाही झपट कर अंदर घुसते हैं, ज्वाला प्रसाद को धकेल कर एक तरफ करते हैं और तलाशी लेने लगते हैं। तलाशी में कुछ न मिलने पर खिसियाते हुए धमकाते हैं -
पहला सिपाही - 'कहाँ छिपाए हैं नायक जी के घर से आए बुलेटिन?'
दूसरा - 'तुम्हारे बाकी साथी कहाँ है?, क्या करनेवाले हो?
पहला - जुलूस और मीटिंग कहाँ है?
ज्वाला प्रसाद - 'जरा दम तो ले लो। मेरे पास कोई बुलेटिन वगैरा नहीं है। सिपाहियों के पीछे-पीछे बच्चे भी घुस आते हैं। सिपाही ज्वाला प्रसाद के साथ एक कमरे में जाते हैं तो बच्चे दूसरे कमरे में घुसकर एक थैला लेकर बाहर भाग आते हैं।
सिपाहियों को तलाशी में कुछ नहीं मिलता तो सर झुकाए घर से बाहर निकल आते हैं। फिर धमकाते हैं - 'कोई गड़बड़ करी तो तुरंत धर लिए जाओगे। सब नेता जेल में हैं। सठिया कुआँ वाले ब्योहार राजेंद्र सिंह अभी थोड़ी देर पहले कटनी से लौटे, हम उन्हें पकड़ने गए लेकिन वे हमारे पहुँचने से पहले ही गली के रास्ते कोतवाली पहुँच गए। डिप्टी कमिश्नर पैटरसन साहिब ने उनको भी तुरंत जेल भिजवा दिया।'
ज्वाला प्रसाद - 'भरोसा रखो हम कोई गड़बड़ी नहीं कर रहे हैं।'
सिपाही - 'भरोसा और तुम्हारा? १९३० में दमोह जेल में कैद काटने और जुरमाना भरने के बाद भी तुम कहाँ सुधरे? अपने छोटे-छोटे बच्चों का ख्याल तो रखते नहीं और जब देखो तब आंदोलनों में भाग लेते फिरते हो। धंधा नहीं करोगे तो इनको पालोगे कैसे? आज तो कुछ नहीं मिला, लेकिन हमारी नज़र है तुम पर, खबर भी थी की तुम्हीं को बुलेटिन भेजे गए हैं।
दूसरा सिपाही दरवाजे पर डंडा मारते हुए - 'सुधर जाओ, नहीं तो जेल में चक्की पीसोगे।'
सिपाही जाते हैं। ज्वाला प्रसाद उन्हें जाते देखते रहते हैं, दरवाजा बंद करने लगते है तो दूसरी और से रामरती दिखती है जो हाथ में वहीं थैला लिए है जो बच्चे उनके घर से छिपाकर ले आए थे। रामरती दूसरे बच्चों को थैला देकर पास आती है। कहती है- 'चच्चा! आज जमना कक्का नई आए थे। ये थैला उनई को देने है ना? आप फ़िक्र मत करो। हम बच्चे अपने स्कूल के बस्ते में किताबों के बीच मेंथोड़े-थोड़े परचे छिपाकर जमुना कक्का को दे देंगे। किसी को कछु पता नई चलने।
ज्वाला प्रसाद की आँखों में आँसू आ जाते हैं। वे रामरती को दुलारते हुए कहते हैं - 'अब तो अंग्रेजों को भारत से जाना ही पड़ेगा। जिस देश के बच्चे-बच्चे आजादी के सिपाही बन जाएँ, उसे गुलाम नहीं रखा जा सकता। फ़्रांस की जॉन ऑफ़ आर्क और नाना साहेब की बिटिया मैना देवी अब भारत के घर-घर में हैं। जाओ, बिटिया! सम्हाल के जाना।'
रामरती - चच्चा! हम जे गईं और जे आईं। चलो री वानर सेना, सब बच्चे अपना-अपना बस्ता लिए आते दिखते हैं। रामरती नारा लगाती है- 'एक चवन्नी चाँदी की,
'जय बोलो महात्मा गाँधी की।' कहते हुए ज्वालाप्रसाद दरवाजा बंद कर लेते हैं।
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किसी देश का इतिहास केवल बड़े ही नहीं बनाते, यथासमय बच्चे भी यथाशक्ति योगदान करते हैं किन्तु इतिहास लिखते समय केवल बड़ों का ही उल्लेख किया जाता है और बच्चों का अवदान बहुधा अनदेखा-अनलिखा रह जाता है। जॉन ऑफ़ आर्क (१४१२-३० मई १४३१) का नाम पूरी दुनिया में विख्यात है कि उसे मात्र १२ वर्ष की आयु से फ़्रांस से अंग्रेजों को खदेड़ने का सपना देखा और युद्ध हारती हुई सेना की बागडोर सम्हाल कर उसे विजय की राह पर ले गई। भारतीय स्वातंत्र्य समर में नाना साहेब की किशोरी बेटी मैना देवी के बलिदान की अमर गाथा आज की पीढ़ी नहीं जानती। महात्मा गाँधी जी के नेतृत्व में स्वतंत्रता सत्याग्रह के दौर में केवल बड़ों ने नहीं अपितु किशोरों और बच्चों ने भी महती भूमिका का निर्वहन किया था। स्वतंत्रता सत्याग्रह के इतिहास के एक ऐसे ही अछूते पृष्ठ को अनावृत्त कर रहा है यह लेख।




सनातन सलिला नर्मदा तट पर बसी संस्कारधानी जबलपुर को तब यह विशेषण मिलता तो दूर देश ने आजादी की सांस भी नहीं ली थी, जब का यह प्रसंग है। शहर कोतवाली के पास अंग्रेजों ने सागर के राजा के अंत पश्चात् परिवार की विधवाओं को रहने का स्थान दिया था कि उन पर नज़र रखी जा सके। राजा सागर के बड़े के सामने ही था (अब भी भग्न रूप में है) सुन्दरलाला तहसीलदार का बाड़ा जो पन्ना के राजा के विश्वस्त थे और अंग्रेजों द्वारा विशेष सहायक के रूप में जबलपुर में लाए गए थे। उन्हें पूर्व के भोंसला राजाओं की टकसाल (जहाँ सिक्के ढलते थे) के स्थान पर बसाया गया। वे ज़ाहिर तौर पर अंग्रेजों के लिए काम करते और खुफिया तौर पर क्रांतिकारियों और राजा सागर परिवार के सहायक होते। कालांतर में इस बाड़े के मकान में किरायेदार के रूप में रहने आए नन्हें भैया सोनी। वे सोने-चाँदी के जेवर बनानेवाले कारीगर थे, निकट ही सराफा बाजार (अब भी है) में व्यापारियों की दुकानों से काम मिलता और उनका परिवार पलता। नन्हें भैया के चार बच्चे हुए पहली दो पुत्रियाँ कृष्णा और रामरती तथा बाद में दो पुत्र मणिशंकर और गौरी शंकर।


रामरती (१५-९-१९३५-२३-५-२००२) केवल सात वर्ष की थी, जब १९४२ का स्वतंत्रता सत्याग्रह आरंभ हुआ। माता-पिता की लाड़ली बिटिया, दो भाइयों की इकलौती बहिन रामरती दूसरी कक्षा की छात्रा थी। रामरती बाड़े के मैदान और दो शिवमंदिरों के समीप अन्य बच्चों के साथ चिड़ियों की तरह फुदकती-खेलती। बच्चे ऊँच-नीच का भेद नहीं जानते। मकान मालिक धर्मनारायण वर्मा वकील की बड़ी लड़की ऊषा, लड़का बीरु, और अन्य करायेदारों के बच्चे टीपरेस, कन्ना गोटी, खर्रा, खोखो खेलते। उन्हें सबसे अधिक ख़राब लगते थे ज्वाला चच्चा (ज्वाला प्रसाद वर्मा, स्वतंत्रता सत्याग्रही जिन्हें कारावास हुआ था) जो अपने कुछ साथियों के साथ आते। सबके सिरों पर सफ़ेद टोपी और सफेद ही कपड़े होते। वे आपस में अजीब अजीब बातें करते। आस-पास खेलते-खेलते रामरती को अंग्रेज, आजादी, सत्याग्रह, अत्याचार, तिरंगा आदि शब्द सुनाई दे जाते तो उसके मन में उत्सुकता जागती कि यह क्या है? वे लोग थैलों में पभुत से पर्चे लाते, फिर आपस में बाँट लेते और उपरायणगंज, दीक्षितपुरा, सिमरियावाली रानी की कोठी की गलियों में चलेजाते। कभी-कभी पुलिस के सिपाही भी बाड़े में आते, बड़ों को डाँटते, छोटों को भगा देते लेकिन उनके आने के पहले ही ज्वाला चच्चा की मित्र मंडली दबे पाँव गलियों में गुम हो जाती।




एक दिन खेलते-खेलते बाड़े में बने पुराने कुएँ की जगत पर उसने पढ़ा 'नानक चंद'। कौन था यह नानक चंद? अपनी माँ से पूछा तो डाँट पड़ी कि फालतू बातों से दूर रहो। एक दिन वह पड़ोस के बच्चों के बाड़े के साथ बाड़े के बड़े दरवाजे के पास साथ सड़क पर खेल रही थी क्योंकि ज्वाला चच्चा अपने मित्रों के साथ मंदिर के पीछे बातचीत कर रहे थे। रामरती की नजर सड़क की तरफ पड़ी तो उसे कुछ सिपाही आते दिखे, बाकी बच्चे तो खेल में मग्न थे पर रामरती को न जाने क्या सूझा, ज्वाला चच्चा से डाँट पड़ने का भय भूलकर वह मंदिर की ओर दौड़ पड़ी चिल्लाते हुए 'पुलिस आई', जैसे ही सत्याग्रहियों ने आवाज सुनी वे बाड़े के पिछवाड़े से मुसलमानों की गली में कूद कर भाग गए। पुलिस के जवान जब तक बड़े के अंदर घुसे, चिड़िया उड़ चुकी थी, उनके हाथ कुछ न लगा। आसपास के लोगों को धमकाते-गालियाँ बकते पूछताछ करते रहे पर किसी ने कुछ न बताया। खिसियानी बिल्ली खंबा नोचे, आखिरकार चले गए।




उस दिन के बाद ज्वाला चच्चा और उनके साथी बच्चों को डाँटते नहीं थे। बच्चे खेलते रहते, वे लोग अपना काम करते रहते, कभी-कभी बच्चों के हाथ पर अधेला रख देते कि सेव-जलेबी खा लेना। रामरती उनके स्नेह की विशेष पात्र थी। एक दिन ज्वाला चच्चा पर्चों का थैला लिए आए लेकिन उनके दो साथ नहीं आए। वे परेशान थे कि उनके पर्चे कैसे उन तक जाएँ? रामरती देखती थी ज्वाला चच्चा के साथ रहनेवाले जमुना कक्का नहीं थे। जमुना कक्का उसके पिता के भी मित्र थे, कई बार दोनों साथ-साथ काम करते थे। रामरती पिता के साथ जमुना कक्का के घर भी हो आई थी। उसने ज्वाला चच्चा से पूछ लिया 'जमुना कक्का नई आए?' चच्चा ने घूर कर देखा तो वह डर गई पर हिम्मत कर फिर कहा 'हमें उनको घर मालून आय, परचा पौंचा दें?' अब चच्चा ने उस की तरफ ध्यान दिया और पूछा 'डर ना लगहै?, कैसे जइहो? पुलिस बारे भी तो हैं।'




'चच्चा तनकऊ फिकिर नें करो हम बस्ता में किताबों के बीच परचा छिपा लैहें और मनी भैया साथ दे आहें। हमने बाबू (पिता) के संगै उनको घर है।' चच्चा हिचकते रहे पर और कोई चारा न देख रामरती के बस्ते में पर्चे रख दिए। रामरती दे आई। चच्चा के साथी 'एक चवन्नी चाँदी की, जय बोलो महात्मा गांधी की' बोलकर घर-घर से चवन्नी माँगते। सुन सुन कर यह नारा बच्चों को भी याद हो गया। वे झंडा ऊँचा रहे हमारा, चलो दिल्ली, जय हिन्द जैसे नारे लगते और बड़ों की नकल कर जुलुस की तरह निकलते। पुलिस के सिपाही खिसियाकर भगाते और बच्चे झट से घरों में जा छिपते। सत्याग्रहियों और बच्चों में यह तालमेल चलता रहा, पुलिस के सिपाही खिसियाते रहे। एक दिन एक सिपाही ने रामरती की पीठ पर धौल जमा दी, वह औंधे मुँह गिरी तो घुटना और माथा चोटिल हो गया। माँ ने पूछा तो उसने कहा कि एक सांड दौड़ा आ रहा था, उससे बचने के लिए दौड़ी तो गिर पड़ी। इस घटना के बाद भी पर्चे पहुँचाने, चंदा इकठ्ठा करने, पुलिस की आवागमन से सत्याग्रहियों को खबरदार करने जैसे काम करती रही।




रामरती सातवीं कक्षा में थी जब सुना कि देश आज़ाद हो गया। खूब रौनक रही। रामरती 'पुअर बॉयस फंड' से वजीफा पाकर सेंट नॉर्बट स्कूल में पढ़ रही थे। उसके भाई मणि को उनके निस्संतान रेलवेकर्मी मामा नारायणदास अवध ने गोद ले लिया था। आठवीं कक्षा पास कर रामरती अपनी ननहाल राहतगढ़ (सागर) चली गई। मैट्रिक पास कर, ट्रेनिंग कर शिक्षिका हो गयी और प्राइवेट पढ़ती भी रही। कांग्रेस सेवादल के कैंप में उसकी मुलाकात अन्य कार्यकर्ता शंकरलाल कौशिक हुई जो बेगमगंज का निवासी था। वह भोपाल रियासत के कोंग्रेसी नेता शंकर दयाल शर्मा (कालांतर में भारत के राष्ट्रपति हुए) के निकट था। प्राइवेट बस में कंडक्टरी और पढ़ाई साथ-साथ करता। कांग्रेस की गतिविधियों और बस स्कूल जाते-आते समय उनकी मुलाकातें पहले आकर्षण और फिर प्रेम में बदल गई। दोनों के घरवालों ने जातिभेद के कारण विरोध किया। शंकरलाल की मेहनत और ईमानदारी के कारण वह शर्मा जी के घर के सदस्य की तरह हो गया था। शर्मा जी के आशीर्वाद से दोनों ने शादी कर ली। दोनों का जीवट और संघर्ष लाया। शंकर लाल डिप्लोमा पास कर बी एच ई एल भोपाल में सुपरवाइज़र हो गया। रामरती शासकीय शिक्षिका हो गई। दोनों के तीन बच्चे हुए। रामरती की कलात्मक अभिरुचि ने उसे गणतंत्र दिवस व स्वाधीनता झाँकियों को बनाने दिलाया। वह भोपाल और दिल्ली में पुरस्कृत हुई, पदोन्नत होकर प्राचार्य हो गई।




शंकरलाल, शर्मा जी के साथ आंदोलन में कारावास भी जा चुका था। स्वतंत्रता सत्याग्रहियों को सम्मान और लाभ मिलने के अनेक अवसर आए पर दोनों ने इंकार कर दिया की उन्होंने जो भी किया, देश के लिए किया, यह उनका कर्तव्य था और उन्हें कोई सम्मान या लाभ की लालच नहीं है। एक ओर सुविधाओं की लालच में लोग स्वतंत्रता सत्याग्रही होने के झूठे दावे कर रहे थे, दूसरी यह सच्चा सत्याग्रही दंपत्ति किसी लाभ को लेने से इंकार कर जीवन में संघर्ष कर रहा था। इस कारण दोनों का सम्मान बढ़ा। बच्चों के विवाह में शर्मा जी उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति होते हुए भी बच्चों को आशीर्वाद देने आए। उन्होंने अपने बच्चों के विवाह बिना किसी लेन-देन के किए। रामरती का बड़ा लड़का विजय वायुसेना में ग्रुपकैप्टन पद से सेवानिवृत्त होकर अहमदाबाद में है। छोटा लड़का विनय दिल्ली में उद्योगपति है और लड़की वंदना अपनी ससुराल में कोलकाता है।
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स्वतंत्रता सत्याग्रह में कायस्थों का योगदान
१. स्व.गणेश प्रसाद श्रीवास्तव
आत्मज स्व. शंभु प्रसाद श्रीवास्तव।
जन्म - १९११, जबलपुर।
शिक्षा - माध्यमिक।
वर्ष १९२३ से राजनैतिक गतिविधियाँ। १९३२ के आंदोलन में गिरफ्तार ६ माह कैद, २५/- अर्थदंड।
नेशनल बॉय स्काउट संस्था के संस्थापक सदस्य। १९३३ तथा १९३५ में राष्ट्रीय स्काउट प्रदर्शनी का सफल आयोजन किया।
१९३९ में कांग्रेस अधिवेशन त्रिपुरी, जबलपुर में स्वयं सेवकों के प्लाटून कमांडर। सराहनीय प्रदर्शन कर प्रशंसा पाई।
महाकौशल युवक कांफ्रेंस को सफल बनाने हेतु अथक परिश्रम किया।
व्यक्तिगत सत्याग्रह १९४१ में ४ माह की सजा हुई।
'अंग्रेजों भारत छोड़ो' आंदोलन १९४२ में २ वर्ष तक नज़रबंद।
सत्याग्रही साथियों के बीच 'लाला जी' संबोधन से लोकप्रिय।
स्वस्थ्य बिगड़ने के बावजूद स्वतंत्रता संबंधी गतिविधियों में अंतिम सांस तक सक्रिय रहे।
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टीप - निधन तिधि अज्ञात, चित्र अप्राप्त। परिवार जनों की जानकारी हो तो उपलब्ध कराइए।