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शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

जनवरी १६, रातरानी, सॉनेट, कुंडलिया, भाषा विज्ञान, गीता, शिव, गीत, नाग, चीता, सूर्य

सलिल सृजन जनवरी १६
पौधारोपण ही मानव स्वास्थ्य हेतु अपरिहार्य- संजीव वर्मा सलिल'

            जबलपुर। ''पौधारोपण मानव स्वास्थ्य हेतु अपरिहार्य है। कोरोना काल और दिल्ली की आबोहवा खतरे की घंटी बज चुकी हैं। मनुष्य ने हरियाली नष्ट करना न छोड़ा तो वह खुद नष्ट हो जाएगा। हमें धरती के चप्पे-चप्पे पर पौधे लगाकर उन्हें पेड़ बनाना होगा। पेड़ मनुष्य के पूर्वज और वंशज दोनों हैं। जन मानव नहीं था तब भी पेड़-पौधे थे और जब मानव नहीं रहेगा तब भी पेड़-पौधे रहेंगे।'' यह विचार इंडियन जिओटेक्नीकल सोसायटी जबलपुर चैप्टर के अध्यक्ष, विश्ववाणी हिन्दी संस्थान अभियान जबलपुर के सभापति इंजी. संजीव वर्मा 'सलिल' ने स्थानीय गुरु रामदास खालसा इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के परिसर में पौधारोपण करते हुए व्यक्त किए। पानी की कमी को देखते हुए परिसर में विद्यार्थियों द्वारा फेंकी गई प्लास्टिक बोतलों का प्रयोग कर बूँद-बूँद सिंचाई का तरीका भी सिखाया।


            प्राचार्य डॉ. राज मेहता ने ३२५ पौधे और कलमें आरोपित किए जाने पर हर्ष व्यक्त करते हुए पानी और हरियाली संरक्षण के प्रति विद्यार्थियों को जागृत करते हुए दोनों संस्थाओं का पौधे उपलब्ध कराने के लिए आभार व्यक्त किया। डॉ. विक्टोरिया प्रधायपक कृषि अभियांत्रिकी तथा छात्रों-छात्राओं ने पौधारोपण करते हुए उनके संरक्षण का संकल्प लिया। इंजी. व्ही.पी. विश्वकर्मा ने बताया कि विदेशों में निर्माण कार्यों हेतु वृक्षों को काटा नहीं जाता, जड़ों सहित स्थानांतरित कर दिया जाता है। पौधरोपण में संजय मिश्र, सौरभ विश्वकर्मा, अनामिका सेन, विवेक चतुर्वेदी, रश्मि मिश्रा आदि का उल्लेखनीय सहयोग रहा।
०००
पूर्णिका
.
चोर, पढ़ाकू, पहरेदार
सारी रात जगे सरकार! 
नेता रचते जाग कुचक्र
जगे विरहिणी तज सिंगार।
चमगादड़ उलूक बिन नींद
करें अँधेरे से ही प्यार।
पर्वत सागर नभ धरती
सोने से करते इंकार।
मछली नहीं मूँदती नैन
कभी न सोता तारणहार।
१६.१.२०२६
०००
रातरानी
रातरानी
खींचती है गंध-रेखा
कर रहा है समय क्यों
यह सच अदेखा?
जिंदगी निर्गंध
क्या अच्छी लगेगी?
फैलती दुर्गंध
क्या मन को रुचेगी?
गर नहीं तो
रातरानी बनें हम सब।
स्नेह का परिमल बिखेरें
भुला जब-तब।
महमहाए श्वास
पूरी आस हो हर।
नर्मदा में नहा गाएँ
गीत मनहर।।
१६.१.२०२५
०००
सॉनेट
सूफियाना सोनेट :
-------------------
साकी! जब हो स्याह जमाना
रौशन कर दूँ मैं चराग बन,
दिल में जलता सिर्फ आग बन,
अंधकार में मुझे जलाना।
नहीं भुलाकर मुझे सताना,
साथ रहूँगा मैं सुहाग बन,
बसूँ साँस में अमिट राग बन,
कर आलिंगन हृदय बसाना।
रौशन करूँ अंजुमन सारी,
करो निगाहे-करम अगर तुम,
हो निसार तुम पर जाऊँ मैं।
मैं राधा तुम हो बनवारी,
मिलकर अब न अलग होंगे हम,
तुममें ही गम हो जाऊँ मैं।
***
कुंडलिया
अंग अंग जेवर सजा, बनीं लक्ष्मी आप।
नर को मिला न एक भी, ज्यों पाया हो शाप।।
ज्यों पाया हो शाप, मजूरी करता सूरज।
उषा दुपहरी शाम, रात अलबेली सज-धज।।
माता भाभी बहिन, बीबी मिल करतीं तंग।
नर की किस्मत वाम, हारता घर में ही जंग।।
***
समस्यापूर्ति
विधा :- पद्य (सोनेट, इतालवी शैली)
विषय : झरोखे से झाँकते नयन करे इंतज़ार
*
झरोखे से झाँकते नयन करें इंतज़ार
सूर्य साथ उषा देख नींद छोड़ हाथ जोड़,
आलस तज उठ भू को कर प्रणाम मुँह न मोड़,
अपनों के सपनों को करना साकार यार।
लेना कम देना है ज्यादा ही बार बार,
ईश सुमिर ले-दे आशीष तू प्रथा न तोड़,
बैर भाव पाल नहीं, द्वेष जलन तुरत छोड़,
गैर कौन? सब अपने बाँट सदा सहज प्यार।
सोने के हिरना को मन खोजे छाँट-छाँट,
लछमन रेखा न लाँघ, पैर नहीं मोड़ा था,
तापस में निशिचर था पर मन को कब दीखा?
गगरी का काव्यामृत छलक रहा बाँट बाँट
गोकुल के कान्हा ने माखन कब जोड़ा था?
लूटा झट लुटा दिया, मन तूने क्या सीखा?
***
लेख-
भारतीय भाषा विज्ञान की समृद्ध परंपरा
*
संस्कृत और आधुनिक भारतीय भाषाएँ भिन्न कालों की भाषाएँ हैं। एक काल की भाषा पर दूसरे काल की भाषा के नियमों को नहीं थोपा जा सकता। संस्कृत और आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं की व्यवस्थाओं एवं संरचनाओं के अन्तर नकारा नहीं जा सकता। किसी भाषा के व्याकरण के नियमों को दूसरी किसी अन्य भाषा पर थोपना गलत है। भाषाविज्ञान का यह सार्वदेशिक एवं सार्वकालिक नियम है। भाषा नदी की धारा की तरह होती है। नदी की धारा को अनियंत्रित, अमर्यादित एवं बेलगाम नहीं होने दिया ज सकता। नदी की धारा खुद अपने तटों के द्वारा मर्यादित रहती है। भाषा अपने व्याकरण की व्यवस्था एवं संरचना के तटों के द्वारा मर्यादित रहती है। भाषा में बदलाव एवं ठहराव दोनों साथ-साथ रहते हैं।
‘शब्दावली’ गतिशील एवं परिवर्तनशील है। व्याकरण भाषा को ठहराव प्रदान करता है। ऐसा नहीं है कि ‘व्याकरण’ कभी बदलता नहीं है। व्याकरण भी बदलता है मगर बदलाव की रफ़तार बहुत धीमी होती है। ‘शब्द’ आते-जाते रहते हैं। हम विदेशी अथवा अन्य भाषा से शब्द तो आसानी से ले लेते हैं मगर उनको अपनी भाषा की प्रकृति के अनुरूप ढाल लेते हैं। ‘शब्द’ को अपनी भाषा के व्याकरण की पद रचना के अनुरूप विभक्ति एवं परसर्ग लगाकर अपना बना लेते हैं। हम यह नहीं कहते कि मैंने चार ‘फिल्म्स' देखीं; हम कहते हैं कि मैंने चार फिल्में देखीं।
संस्कृत के महान वैयाकरणों एवं निरुक्तकारों का योगदान ही नहीं, प्रातिशाख्यों तथा शिक्षा-ग्रंथों में भाषाविज्ञान और विशेष रूप से ध्वनि विज्ञान से सम्बंधित सूक्ष्मदर्शी और गहन विचार हमारी कालजयी विरासत है। भारतीय भाषाविज्ञान की परम्परा बहुत समृद्ध है और उसमें न केवल वैदिक संस्कृत और लौकिक संस्कृत के भाषाविद् समाहित हैं अपितु प्राकृतों एवं अपभ्रंशों के भाषाविद् भी समाहित हैं।
पाणिनी ने अपने काल के पूर्व के १० आचार्यों का उल्लेख किया है। उन आचार्यों ने वेदों के काल की छान्दस् भाषा पर कार्य किया था। पाणिनी ने वैदिक काल की छान्दस भाषा को आधार बनाकर अष्टाध्यायी की रचना नहीं की। उन्होंने अपने काल की जन-सामान्य भाषा संस्कृत को आधार बनाकर व्याकरण के नियमों का निर्धारण किया। वाल्मीकीय रामायण में इस भाषा के लिए ‘मानुषी´ विशेषण का प्रयोग हुआ है। पाणिनी के समय संस्कृत का व्यवहार एवं प्रयोग बहुत बड़े भूभाग में होता था। उसके अनेक क्षेत्रीय भेद-प्रभेद रहे होंगे। पाणिनी ने भारत के उदीच्य भाग के गुरुकुलों में बोली जानेवाली भाषा को आधार बनाया। पाणिनी के व्याकरण का महत्व सर्वविदित है। अमेरिका के प्रसिद्ध भाषावैज्ञानिक बेंजामिन ली व्होर्फ के मत में- ‘यद्यपि भाषाविज्ञान बहुत प्राचीन है तथापि इसका आधुनिक प्रयोगात्मक रूप, जो अलिखित बोलचाल की भाषा के विश्लेषण पर जोर देता है, सर्वथा आधुनिक है। जहाँ तक हमें ज्ञात है, ईसा से कई शताब्दी पूर्व, पाणिनी ने इस विज्ञान का शिलान्यास किया था। पाणिनी ने उस युग में, वह ज्ञान प्राप्त कर लिया था, जो हमें आज उपलब्ध है। संस्कृत भाषा को नियमबद्ध करने के लिए पाणिनी के सूत्र बीजगणित के जटिल सूत्रों की भाँति हैं´।
प्रत्याहार, गणपाठ, विकरण, अनुबंध आदि की विपुल तकनीक से अलंकृत पाणिनीय सूत्र उनकी अद्वितीय प्रतिभा को प्रमाणित करते हैं। उत्तर-वैदिक काल में संस्कृत भारत की सभी दिशाओं में चारों ओर फैलती गई। संस्कृत का यह प्रसार केवल भौगोलिक दिशाओं में ही नहीं हो रहा था; सामाजिक स्तर पर मानक संस्कृत से भिन्न अनेक आर्य एवं अनार्य भाषाओं के बोलने वाले समुदायों में भी हो रहा था। (Burrow. T.: The Sanskrit Language, P. 63, Faber & Faber, London).।
संस्कृत भाषा के भारत के विभिन्न भागों एवं विभिन्न सामाजिक समुदायों में व्यवहार एवं प्रसार के कारण -
१. संस्कृत ने अपने प्रसार के कारण भारत के प्रत्येक क्षेत्र की भाषा को प्रभावित किया।
२. संस्कृत भाषा स्वयं भी भारत में अन्य भाषा-परिवारों की भाषाओं से तथा संस्कृत युग में भारतीय आर्य परिवार की संस्कृतेतर अन्य लोक भाषाओं / जनभाषाओं से प्रभावित हुई। निर्विवाद है कि संस्कृत काल में अन्य लोक भाषाओं / जनभाषाओं का भी व्यवहार होता था। संस्कृत के प्रभाव से संस्कृत-विद्वान परिचित हैं मगर संस्कृत पर संस्कृतेतर अन्य लोक भाषाओं / जनभाषाओं के प्रभाव से वे शायद परिचित नहीं हैं अथवा इस पक्ष को अनदेखा कर जाते हैं। पाणिनी के बाद के संस्कृत साहित्य में प्रयुक्त किन धातुओं का (शब्दों का नहीं) प्रयोग हुआ है जिनका उल्लेख पाणिनी की अष्टाध्यायी में नहीं हुआ है। यह जानकारी ‘भारत की भाषाएँ एवं भाषिक एकता तथा हिन्दी´ ग्रंथ में है।
शब्दावली के स्तर पर संस्कृत की शब्दावली ने सभी भारतीय भाषाओं को प्रभावित किया है जिसे तत्सम शब्दावली के नाम के पुकारा जाता है। मध्यकालीन साहित्यिक तमिल की ‘मणिप्रवालम शैली’ से भारतीय भाषाओं पर संस्कृत के व्यापक प्रभाव की बात सिद्ध होती है। जो शब्द लोक में प्रचलित हो गए हैं, उनके लिए संस्कृत की शब्द रचना का सहारा लेकर नए शब्द गढ़ना उचित नहीं है। हिंदी भाषाविज्ञान का ज्ञान तथा लोक-व्यवहार का विवेक इसे उचित नहीं समझता। किसी भाषा के व्याकरण के नियमों को दूसरी किसी अन्य भाषा पर थोपना गलत है। भाषाविज्ञान का यह सार्वदेशिक एवं सार्वकालिक नियम है।
१६.१.२०२४
***
सॉनेट
मानस
*
भक्ति करो निष्काम रह
प्रभु चरणों में समर्पित
हर पल मन जय राम कह
लोभ मोह मद कर विजित।
सत्ता जन सेवा करे
रहे वीतरागी सदा
जुमलाबाजी मत करे
रहे न नृप खुद पर फिदा।
वरण धर्म पथ का करो
जनगण की बाधा हरो।
१६-१-२०२२
***
सॉनेट
गीता
*
जो बीता वह भुलाकर
जो आगत वह सोच रे,
रख मत किंचित लोच रे!
कर्म करो फल भुलाकर।
क्या लाए जो खो सके?
क्या जाएगा साथ रे?
डर मत, झुका न माथ रे!
काल न रोके से रुके।
कौन यहाँ किसका सगा?
कर विश्वास मिले दगा
जीव मोह में है पगा।
त्याग न लज्जा, शर्म कर,
निर्भय रहकर कर्म कर
चलो हमेशा धर्म पर।
१६-१-२०२२
***
अभिनव प्रयोग:
गीत
वात्सल्य का कंबल
*
गॉड मेरे! सुनो प्रेयर है बहुत हंबल
कोई तो दे दे हमें वात्सल्य का कंबल....
*
अब मिले सरदार सा सरदार भारत को
अ-सरदारों से नहीं अब देश गारत हो
असरदारों की जरूरत आज ज़्यादा है
करे फुलफिल किया वोटर से जो वादा है
एनिमी को पटकनी दे, फ्रेंड को फ्लॉवर
समर में भी यूँ लगे, चल रहा है शॉवर
हग करें क़ृष्णा से गंगा नर्मदा चंबल
गॉड मेरे! सुनो प्रेयर है बहुत हंबल
कोई तो दे दे हमें वात्सल्य का कंबल....
*
मनी फॉरेन में जमा यू टर्न ले आये
लाहौर से ढाका ये कंट्री एक हो जाए
दहशतों को जीत ले इस्लाम, हो इस्लाह
हेट के मन में भरो लव, ​शाह के भी शाह
कमाई से खर्च कम हो, हो न सिर पर कर्ज
यूथ-प्रायरटी न हो मस्ती, मिटे यह मर्ज
एबिलिटी ही हो हमारा, ओनली संबल
गॉड मेरे! सुनो प्रेयर है बहुत हंबल
कोई तो दे दे हमें वात्सल्य का कंबल....
*
कलरफुल लाइफ हो, वाइफ पीसफुल हे नाथ!
राजमार्गों से मिलाये हाथ हँस फुटपाथ
रिच-पुअर को क्लोद्स पूरे गॉड! पहनाना
चर्च-मस्जिद को गले, मंदिर के लगवाना
फ़िक्र नेचर की बने नेचर , न भूलें अर्थ
भूल मंगल अर्थ का जाएँ न मंगल व्यर्थ
करें लेबर पर भरोसा, छोड़ दें गैंबल
गॉड मेरे! सुनो प्रेयर है बहुत हंबल
कोई तो दे दे हमें वात्सल्य का कंबल....
(इस्लाम = शांति की चाह, इस्लाह = सुधार)
१६.१.२०१९
***
शिव दोहावली
शिव शंकर ओंकार हैं, नाद ताल सुर थाप।
शिव सुमरनी सुमेरु भी, शिव ही जापक-जाप।।
*
पूजा पूजक पूज्य शिव, श्लोक मंत्र श्रुति गीत।
अक्षर मुखड़ा अंतरा, लय रस छंद सुरीत।।
*
आत्म-अर्थ परमार्थ भी, शब्द-कोष शब्दार्थ।
शिव ही वेद-पुराण हैं, प्रगट-अर्थ निहितार्थ।।
*
तन शिव को ही पूजना, मन शिव का कर ध्यान।
भिन्न न शिव से जो रहे, हो जाता भगवान।।
*
इस असार संसार में, सार शिवा-शिव जान।
शिव में हो रसलीन तू, शिव रसनिधि रसखान।।
*
१६-१-२०१८ , जबलपुर
***
शिव को पा सकते नहीं, शिव से सकें न भाग।
शिव अंतर्मन में बसे, मिलें अगर अनुराग।।
*
शिव को भज निष्काम हो, शिव बिन चले न काम।
शिव-अनुकंपा नाम दे, शिव हैं आप अनाम।।
*‍
वृषभ-देव शिव दिगंबर, ढंकते सबकी लाज।
निर्बल के बल शिव बनें, पूर्ण करें हर काज।।
*
शिव से छल करना नहीं, बल भी रखना दूर।
भक्ति करो मन-प्राण से, बजा श्वास संतूर।।
*
शिव त्रिनेत्र से देखते, तीन लोक के भेद।
असत मिटा, सत बचाते, करते कभी न भेद।।
१५.१.२०१८
एफ १०८ सरिता विहार, दिल्ली
***
नागों का रहस्य :
*
भारत के शासन-प्रशासन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभानेवाले, निर्गुण ब्रम्ह चित्रगुप्त के उपासक कायस्थ अपने आदि पुरुष कि अवधारणा-कथा में उनके दो विवाह नाग कन्या तथा देव कन्या से तथा उनके १२ पुत्रों के विवाह बारह नाग कन्याओं से होना मानते हैं. कौन थे ये नाग? सर्प या मनुष्य? आर्य, द्रविड़ या गोंड़?
श्रेष्ठ-ज्येष्ठ पुरातत्वविद डॉ. आर. के. शर्मा लिखित पुस्तक से नागों संबंधी जानकारी दे रही हैं माँ जीवन शैफाली.
*
नागों की उत्पत्ति का रहस्य अंधकार में डूबा है, इसलिए प्राचीन भारत के इतिहास की जटिल समस्याओं में से एक ये भी समस्या है. कुछ विद्वानों के अनुसार नाग मूलरूप से नाग की पूजा करनेवाले थे, इस कारण उनका संप्रदाय बाद में नाग के नाम से ही जाना जाने लगा. इसके समर्थन में जेम्स फर्ग्यूसन ने अपनी पुस्तक (Tree and Serpent Worship) में अक्सर उद्धृत करते हुए विचार व्यक्त किए हैं, और निःसंदेह काफी प्रभावित भी किया है, लेकिन आज के विद्वानों में उनका समर्थक मिलना मुश्किल होगा.
उनके अनुसार नाग, साँप की पूजा करनेवाली उत्तर अमेरिका में बसे तुरेनियन वंश की एक आदिवासी जाति थी जो युद्ध में आर्यों के अधीन हो गई. फर्ग्यूसन सकारात्मक रुप से ये घोषणा करते हैं कि ना आर्य साँप की पूजा करनेवाले थे, ना द्रविड़, और अपने इस सिद्धांत पर बने रहने के लिए वे ये भी दावा करते हैं कि नाग की पूजा का यदि कोई अंश वेद या आर्यों के प्रारंभिक लेखन में पाया भी गया है तो या तो वह बाद की तारीख का अंतर्वेशन होना चाहिए या आश्रित जातियों के अंधविश्वासों को मिली छूट. सर्प पूजा के स्थान पर जब बौद्ध धर्म आया, तो उसने उसे “आदिवासी जाति के छोटे मोटे अंधविश्वासों के थोड़े से पुनरुत्थारित रुप” से अधिक योग्य नहीं माना. वॉगेल ठीक ही कह गया है कि ‘ये सब अजीब और निराधार सिद्धांत हैं’.
कुछ विद्वानों का यह भी दावा है कि सर्प पूजा करने वालों की एक संगठित संप्रदाय के रुप में उत्पत्ति मध्य एशिया के सायथीयन के बीच से हुई है, जिन्होने इसे दुनियाभर में फैलाया. वे सर्प को राष्ट्रीय प्रतीक के रुप में उपयोग करने के आदि थे. इस संबंध में यह भी सुझाव दिया गया है कि भारत में आए प्रोटो-द्रविड़ियन (आद्य-द्रविड़), सायथियन जैसी ही भाषा बोलते थे जिसका आधुनिक शब्दावली में अर्थ होता था फ़िनलैंड मे बसने वाले कबीलों के परिवार की भाषा. (फिनो-अग्रिअन भाषाओं का परिवार).
यह अवलोकन 19वीं शताब्दी के द्रविड़ भाषओं के अधिकारी कॅल्डवेल के साथ शुरू हुआ और जिसे ऑक्सफ़ोर्ड के प्रोफेसर टी. बरौ का समर्थन मिला. वहीं दूसरी ओर एस. सी. रॉय एवं अन्य ने सुझाव दिया कि प्रोटो-द्रविड़ियन (आद्य-द्रविड़) भूमध्यसागर की जाति के आदिम प्रवासी थे जिनका भारत के सर्प संप्रदाय में योगदान रहा. इसलिए इस संप्रदाय की उत्पत्ति और प्रसार के सिद्धांतो में बहुत मतभेद मिलता है, जिनमें से कोई भी पूर्णरूपेण स्वीकार्य नहीं है, इसके अलावा नाग की पूजा मानव जगत में व्यापक रूप से प्रचलित थी.
सायथीयन का दावा दो कारणों से ठहर नहीं सकता, पहला नाग पूजा का जो सिद्धांत भारत लाया गया वह मात्र द्रविड़ और फिनो-अग्रिअन भाषाओं की सतही समानता पर आधारित है और मध्य एशिया के आक्रमण का कोई ऐतिहासिक उदाहरण नहीं मिलता. नवीनतम पुरातात्विक और आनुवंशिक निष्कर्ष ने यह सिद्ध कर दिया है कि दूसरी सहस्राब्दी ई.पू. का आर्य आक्रमण/प्रवास सिद्धांत एक मिथक है. दूसरा, मध्य एशिया में सामान्य सर्प संप्रदाय का इस बात के अलावा कोई अंश नहीं मिलता कि वे साँपों का गहने या प्रतीक के रुप में उपयोग करते थे.
नाग सामान्य महत्व से अधिक शक्तिशाली और व्यापक लोग थे, जो आदिम समय से भारत के विभिन्न भागों में आजीविका चलाते दिखाई देते थे. संस्कृत में नाग नाम से बुलाये जाने से पहले वे किस नाम से जाने जाते थे ये ज्ञात नहीं है. द्रविड़ भाषा में नाग का अर्थ ‘पंबु’ या ‘पावु’ होता है. कदाचित ‘पावा’ नाम उत्तरी भारत के शहरों में से किसी एक से लिया गया था जो मल्ल की राजधानी हुआ करती थी और बुद्ध के समय में यहाँ निवास करनेवालों ने कबीले के पुराने नाम ‘नाग’ को बनाए रखा था. यह भी संभव है कि जैसे ‘मीना’ का नाम ‘मत्स्य’ में परिवर्तित हुआ, ‘कुदगा’ का ‘वानर’ में उसी तरह बाद में आर्यों द्वारा,’पावा’ (जिसका अर्थ है नाग) का नाम ‘नाग’ में परिवर्तित किया गया और संस्कृतज्ञ द्वारा समय के साथ साँप पालने वाले को नाग कहा जाने लगा.
हड़प्पा में खुदाई से मिले कुछ अवशेष अधिक रुचिकर है क्योंकि यह समकालीन लोगों के धार्मिक जीवन में सर्प के महत्व को अधिक से अधिक उजागर करते हैं. उनमें से एक छोटी सुसज्जित मेज है (faience tablet) है जिस पर एक देव प्रतिमा के दोनों ओर घुटने टेककर आदमी द्वारा पूजा की जा रही है. प्रत्येक उपासक के पीछॆ एक कोबरा अपना सिर उठाए और फन फैले दिखाई देता है जो प्रत्यक्ष रुप से यह दर्शाता है कि वह भी प्रभु की आराधना में साथ दे रहा है. इसके अलावा चित्रित मिट्टी के बर्तन भी पाए गए जिनमें से कुछ पर सरीसृप चित्रित थे, नक्काशी किया हुआ साँप का चित्र, मिट्टी का ताबीज जिस पर एक सरीसृप के सामने एक छोटी मेज पर दूध जैसी कोई भेंट दिखाई देती है.
हड़प्पा में भी एक ताबीज पाया गया जिस पर एक गरुड़ के दोनों ओर दो नागों को रक्षा में खड़े हुए चित्रित किया गया है. ऊपर दी गई खोज सिंधु घाटी के लोगों की पूजा में साँप के होने के तथ्य को इंगित करती है, केनी के अनुसार आवश्यक रुप से ख़ुद पूजा की वस्तु के रुप में ना सही, और उस क्षेत्र में नाग टोटेम वाले लोग होना चाहिए.
महाभारत में दिए वर्णन के अनुसार नाग जो कि कश्यप और कद्रु की संतान है, रमणियका की भूमि जो समुद्र के पार थी, पर बहुत गर्मी, तूफान और बारिश का सामना करने के बाद पहुँचे थे, ऐसा माना जाता है कि नाग मिस्र द्वारा खोजे गए देश की ओर चले गए थे. ये कहा जाता है कि वे गरुड़ प्रमुख के नेतृत्व में आगे बढ़े थे. चाहे यह सिद्धांत स्वीकार्य हो या ना हो यह जानना रुचिकर है कि मिस्र के फरौह (pharaohs of egypt -प्राचीन मिस्त्र के राजाओं की जाति या धर्म या वर्ग संबंधी नाम) कुछ हद तक बाज़ या गरुड़ और सर्प से संबंधित थे.
नाग आर्य थे या गैर-आर्य, इस प्रश्न के उत्तर में बहुत कुछ लिखा गया और अधिकतर विद्वानों का यही मानना है कि आर्यों के भारत में आने से पहले नाग द्रविड़ थे जो भारत के उत्तरी क्षेत्र में रहते थे. आर्यन आव्रजन सिद्धांत के विवाद में प्रवेश के बिना, जो नवीनतम शोधकर्ता द्वारा मिथक साबित हुई है यह इंगित किया जा सकता है कि नाग सिर्फ साँप जो कि उनका टोटेम था ना कि पूजा के लिए आवश्यक वस्तु, की पूजा की वजह से गैर-आर्य लोग नहीं थे. वे गैर-आर्य कबीले के थे चाहे वे साँप की पूजा करते थे या नहीं. कबीले के टोटेम के रुप में सर्प और पूजा की एक वस्तु के रुप में सर्प, ये दो अलग कारक है. पहले कारक को स्वीकार करने के लिए दूसरे को स्वीकार करना आवश्यक नहीं है. प्राचीन भारत के संपूर्ण इतिहास में यह पर्याप्त रुप से सिद्ध कर दिया गया है कि नाग के टोटेम को अपनाने वाले सत्तारूढ़ कबीले/राजवंश नाग की पूजा करनेवाले और गैर-आर्य हो ये आवश्यक नहीं है.
प्राचीन भारत के दौरान, उत्तरी भारत का सबसे अधिक भाग नागों द्वारा बसा हुआ था. ऋग्वेद में व्रित्र और तुग्र के लिए स्थान है. महाभारत कई नाग राजाओं के शोषण के विवरण से भरा है . महान महाकाव्य इन्द्रप्रस्थ या पुरानी दिल्ली के पास जमुना की घाटी में महान खांडव जंगल में रहने वाले राजा तक्षक के तहत नाग के ऐतिहासिक उत्पीड़न के साथ खुलता है.
वास्तव में नाग कबीले या जनजाति के कई बहुत शक्तिशाली राजा थे जिनमें सबसे अधिक ज्ञात थे शेषनाग या अनंत, वासुकि, तक्षक, कर्कोतक, कश्यप, ऐरावत, कोरावा और धृतराष्ट्र, जो सब कद्रु में पैदा हुए थे. धृतराष्ट्र जो सभी नागों के अग्रणी थे उनके अकेले के अपने अनुयायियों के रूप में अट्ठाईस नाग थे. उत्तर भारत में नाग के अस्तित्व को साबित करने के लिए जातक (jatakas) में भी उल्लेखों की कमी नहीं है.
इक्ष्वाकु (iksvauku) वंश के महान राजा पाटलिपुत्र के प्राचीन नाग थे. भारत राजाओं को भी सर्प जाति में सम्मिलित किया गया था. महान राजा ययति, समान रुप से महान राजा पुरु के पिता, नहुसा नाग के पुत्र और अस्तक के नाना थे. पाँच पाँडव भाई भी नाग आर्यक या अर्क के पोते के पोते थे. फिर इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि अर्जुन ने नाग राजकुमारी युलूपि से विवाह किया.
यादव भी नाग थे. ना केवल कुंती बल्कि पाँच वीर पाँडव की माता और कृष्ण की चाची, कृष्ण तो नाग प्रमुख आर्यक जो कि वासुदेव के महान दादा और यादव राजा के पितृ थे, के सीधे वंशज थे. बल्कि उनके बड़े भाई बलदेव के सिर को विशाल साँपों से ढँका हुआ प्रस्तुत किया गया है, जिसे वास्तव में छत्र कहा जाता था, जो महान राजाओं की पहचान में भेद के लिए होता था. बलदेव को शेषनाग का अंश कहा जाता है, जिसका अर्थ है या तो वह महान शेषनाग का कोई संबंधी है या उनके जितना शक्तिशाली. चूंकि यादव कुल के इन दो सूरमाओं के मामा कंस, मगध के जरसंधा राजा बर्हद्रथ के दामाद थे, हम देखते हैं कि मगध के प्राचीन राज्यवंश में भी नाग शासक के रुप में थे, जिन्हें बर्हद्रथ कहा गया.
पुराण के अनुसार मगध के बर्हद्रथ प्रद्योत द्वारा जीत लिए गए, जो बदले में शिशुनाग के अनुयायी हुए. कई लेखकों ने ठीक ही कहा है, कि शिशुनाग में मगध के पास एक नाग राजवंश उस पर शासन करने के लिए था. शिशुनाग शब्द अपने आप में ही बहुत महत्वपूर्ण है. बर्हद्रथ राजवंश जो कि एक नाग राजवंश था, के पतन के बाद एक अन्य राजवंश सत्तारूढ़ हुआ, जिसे प्रद्योत राजवंश कहा गया. परंतु यह राजवंश जो कि अपने पूर्ववर्ति नाग राजवंश से बिल्कुल भिन्न था, शिशुनाग राजवंश जैसे कि उसके नाम से ही पता चलता है कि एक नाग राजवंश है, द्वारा फिर से पराजित हुई. अर्थात प्रद्योत के एक छोटे से अंतराल के बाद नाग एक बार फिर सत्ता में आया. यह शिशुनाग बर्हद्रथ राजवंश के प्राचीन नागों के ही अनुयायी थे. प्राचीन सीनियर नाग बर्हद्रथ के अनुयायी होने के कारण सत्ता में आने के बाद एक बार फिर वे शिशुनाग या जूनियर नाग के रूप में पहचाने जाने लगे. नागओ द्वारा रक्षित बौद्ध परंपरा जो कि शिशुनाग की संस्थापक बल्कि पुंर्स्थापक थी, ने शिशुनाग की उत्पत्ति के बारे में यही सिद्ध किया है कि वह नाग थे.
यहाँ तक कि चंद्रगुप्त मौर्य भी नाग वंश के अंतर्गत माने जाते हैं. सिंधु घाटी को पार करने के बाद सिकंदर (Alexander I) जिन लोगों के संपर्क में आया वे भी नाग थे.
१६.१.२०१७
***
कलह कथा
*
कुर्सी की जयकार हो गयी, सपा भाड़ में भेजें आज
बेटे के अनुयायी फाड़ें चित्र बाप के, आये न लाज
स्वार्थ प्रमुख, निष्ठा न जानते, नारेबाजी शस्त्र हुआ
भीड़तंत्र ही खोद रहा है, लोकतंत्र के लिए कुआं
रंग बदलता है गिरगिट सम, हुआ सफेद पूत का खून
झुका टूटने के पहले ही बाप, देख निज ताकत न्यून
पोल खुली नूरा कुश्ती की, बेटे-बाप हो गए एक
चित्त हुए बेचारे चाचा, दिए गए कूड़े में फेंक
'आजम' की जाजम पर बैठे, दाँव आजमाते जो लोग
नींव बनाई जिनने उनको ठुकराने का पाले रोग
'अमर' समर में हों शहीद पछताएँ, शत्रु हुए वे ही
गोद खिलाया जिनको, भोंका छुरा पीठ में उनने ही
जे.पी., लोहिया, नरेन्द्रदेव की, आत्माएँ करतीं चीत्कार
लालू, शरद, मुलायम ने ही सोशलिज्म पर किया प्रहार
घर न घाट की कोंग्रेस के पप्पू भाग चले अवकाश
कहते थे भूकम्प आएगा, हुआ झूठ का पर्दाफाश
अम्मा की पादुका उठाये हुईं शशिकला फिर आगे
आर्तनाद ममता का मिथ्या, समझ गए जो हैं जागे
अब्दुल्ला कर-कर प्रलाप थक-चुप हो गए, बोलती बन्द
कमल कर रहा आत्मप्रशंसा, चमचे सुना रहे हैं छंद
सेनापति आ गए नए हैं, नया साल भी आया है
समय बताएगा दुश्मन कुछ काँपा या थर्राया है?
इनकी गाथा छोड़ चलें हम,घटीं न लेकिन मिटीं कतार
बैंकों में कुछ बेईमान तो मिले मेहनती कई हजार
श्री प्रकाश से नया साल हो जगमग करिये कृपा महेश
क्यारी-क्यारी कुसुम खिलें नव, काले धन का रहे न लेश
गुप्त न रखिये कोई खाता, खुला खेल खेलें निर्भीक
आजीवन अध्यक्ष न होगा, स्वस्थ्य बने खेलों में लीक
१.१.२०१७
***
नवगीत
समय की कीमत
*
समय की
कीमत न करते
*
दूध पीते अब न तुम
बच्चे रहे हो
तन युवा पर अकल के
कच्चे रहे हो
हो नहीं गंभीर यदि
तो सत्य मानो
आप अपने शत्रु तुम
सच्चे रहे हो
नाश अपना
आप वरते
समय की
कीमत न करते
*
पढ़ रहे तो तुम नहीं
अहसान करते
अवसरों को क्यों नहीं
वरदान करते?
तोड़ अनुशासन-नियम
खुश हो रहे पर
सफलता हित पगों को
अनजान करते
दोष निज
औरों पे धरते
समय की
कीमत न करते
***
काव्य वार्ता
अचल वर्मा
समय की कीमत भला कैसे मनुज ये कर सकेगा ।
आज है पर क्या पता कब तक यहां वो रह सकेगा ॥
संजीव वर्मा 'सलिल'
काल से होता प्रगट मनु
काल में होता विलय है
तभी तो है सलिल नभ भू
अग्नि भी सँग-सँग मलय है
अचल वर्मा
है सभी कुछ समय के आधीन ही , सबने ये माना।
पर समय कबसे शुरू किसने ये जाना।
जब नहीं आरम्भ जाना कैसे उसका मोल जाने।
है कहीं पर अंत भी इसका नहीं मन इसको माने॥
संजीव वर्मा 'सलिल'
है सभी कुछ समय के आधीन लेकिन / समय डिक्टेटर नहीं है
वृत्त का आरंभ या आखिर न देखा / तो कहें क्या वृत्त ही भास्वर नहीं है?
समय को असमय करें मर काल-कवलित
समय असमय में नहीं क्या रहा करता?
बन सुसमय ही रहे वह साथ बेहतर
देव कुसमय से सदा मैं मनुज डरता
***
नवगीत
गीत सूर्य
*
गीत-सूर्य की
नवल किरण नवगीत है
*
नवल किरण मृदु-शुचि होती है
जन-मन में आशा बोती है
जुड़ जमीन से पनपा करती
अंकुर से पल्लव होती है
गीत-पौध की
कुसुम कली नवगीत है
*
परिवर्तन की नव चाहों में
जिजीविषा पाले बाँहों में
लड़ विडंबना को मेटे जो
कोशिश, कदम, दृष्टि राहों में
गीत-स्वेद की
एक बूँद नवगीत है
*
जीवन का हर रंग समेटे
जीने का हर ढंग समेटे
सिर्फ रुदन-संत्रास नहीं, यह
सत्य-न्याय की जंग समेटे
गीत इन्द्रधनु
एक छटा नवगीत है
*
यह संक्रांक्ति काल की गणना
पाँव-बिमाई-पीड़ा हरना
अब मरते-मरते जीना है
तब जीते-जीते था मरना
गीत आँख का
एक स्वप्न नवनीत है
*
व्याप्ति धरा से नभ तक इसकी
कथा न कहता कहिए किसकी?
अलंकार-रस-छंद बदन है
आत्मकथा जो निरखे उसकी
गीत काल का
एक चरण नवगीत है
१६.१.२०१६
***
मुक्तिका:
.
अपने क़द से बड़ा हमारा साया है
छिपा बीज में वृक्ष समझ अब आया है
खड़ा जमीं पर नन्हे पैर जमाये मैं
मत रुक, चलता रह रवि ने समझाया है
साया-साथी साथ उजाले में रहते
आँख मुँदे पर किसने साथ निभाया है?
'मैं' को 'मैं' से जुदा कर सका कब कोई
सब में रब को देखा गले लगाया है?
है अजीब संजीव मनुज जड़ पत्थर सा
अश्रु बहाता लेकिन पोंछ न पाया है
===
नवगीत:
.
वह खासों में खास है
रुपया जिसके पास है
.
सब दुनिया में कर अँधियारा
वह खरीद लेता उजियारा
मेरी-तेरी खाट खड़ी हो
पर उसकी होती पौ बारा
असहनीय संत्रास है
वह मालिक जग दास है
.
था तो वह सच का हत्यारा
लेकिन गया नहीं दुतकारा
न्याय वही, जो राजा करता
सौ ले दस देकर उपकारा
सीता का वनवास है
लव-कुश का उपहास है
.
अँगना गली मकां चौबारा
हर सूं उसने पैर पसारा
कोई फर्क न पड़ता उसको
हाय-हाय या जय-जयकारा
उद्धव का सन्यास है
सूर्यग्रहण खग्रास है
.
१६-१-२०१५
कविता:
चीता
*
कौन कहता है कि
चीता मर गया है?
हिंस्र वृत्ति
जहाँ देखो बढ़ रही है.
धूर्तता
किस्से नये
नित गढ़ रही है.
शक्ति के नाखून पैने
चोट असहायों पर करते
स्वाद लेकर रक्त पीते
मारकर औरों को जीते
और तुम?
और तुम कहते हो
चीता मर गया है.
नहीं,
वह तो
आदमी की
नस्ल में घर कर गया है.
झूठ कहते हो कि
चीता मर गया है.
१६.१.२०१४

===

शनिवार, 10 जनवरी 2026

जनवरी १०, पूर्णिका, आजाद, सोरठा, सॉनेट, हिंदी, हिंदी आरती, छंद, गंग, गीत, लघुकथा, सोरठा, दोहा

सलिल सृजन जनवरी १०
पूर्णिका
कोई माने या न माने
हम खुदी‌ को खुदा माने
.
छंद जाने बिना कवि जी
जोड़कर तुक लिखें गाने
.
नोट ले, पी सुरा, झूमे
लतीफे कहते पुराने
.
नित नई तितली तलाशे
भ्रमर लगता गीत गाने
.
जड़ जमीं को नहीं भूले
थिर-अचल नाते पुराने
.
काम करना जब न आए
तब बनाओ सौ बहाने
.
नहीं मन की तनिक चिंता
लगे हैं तन को सजाने
.
बिना बाना बने बाना
सोच ताने लगे ताने
.
हाथ थामे अँधेरे का
चला युग सूरज उगाने
.
'सलिल' पाने सुखी जीवन
चल पड़ो सीकर बहाने
१०.१.२०२६
०००
पुण्य स्मरण- चंद्रशेखर आजाद जी
महान क्रांतिकारी चंद्र शेखर आजाद को चित्र खिंचवाना नापसंद था। काकोरी कांड के बाद अंग्रेज संबंधित क्रांतिकारियों के पीछे पड़ गए। आजाद के साथियों की गिरफ्तारी होने लगी। चारों तरफ जासूसों का जाल बिछा हुआ था। आजाद ने जासूसों से बचते-बचते किसी तरह झाँसी पहुँचकार रूद्रनारायण सिंह "मास्टर जी" के आवास में शरण ली । मास्टर जी का आवास कला-संस्कृति और व्यायाम का केंद्र था। सरकारी जासूसों और नौकरशाहों का भी आना-जाना लगा रहता था। आजाद ने अधिक समय तक वहाँ रूकना सुरक्षित नहीं समझा। वे पास के जंगल में एक छोटे से हनुमान मंदिर के पुजारी बनकर रहने लगे ।
एक दिन आजाद को मास्टर जी अपने आवास पर ले आये । कला-प्रेमी होने के साथ-साथ मास्टरजी फोटोग्राफी भी कर लिया करते थे। मास्टरजी आजाद को बिना बताए उनकी तस्वीर कैमरे में कैद करने की कोशिश बहुत देर तक करते रहे लेकिन आजाद थे कि सही पॉजिशन ले ही नहीं रहे थे। बाद में तंग होकर मास्टरजी ने आजाद से एक फोटो खिंचवाने का निवेदन ही कर दिया । पहले तो आजाद तैयार नहीं हो रहे थे लेकिन बाद में फोटो खिंचवाने के लिए खड़े हो गए।
फिर मास्टरजी ने जैसे ही अपना कैमरा संभाला और बोला- " आज तुम मुझे ऐसे ही तुम्हारा एक फोटो खींच लेने दो।
आजाद ने कहा- " अच्छा! तो ज़रा मेरी मूँछे एँठ लेने दो" और उन्होंने अपनी मूँछें घुमानी शुरू कर दी। इसी बीच मास्टर जी ने उस ऐतिहासिक तस्वीर को अपने कैमरे में कैद कर लिया जो आज राष्ट्र की महान नीधि बन गया। यह आजाद का एकमात्र प्रामाणिक चित्र है।
***
सोरठा सलिला
कालिंदी के तीर, लिखा गया इतिहास था।
मन में धरकर धीर, जन-हित साधा कृष्ण ने।।
*
प्रकृति मैया पोस, मारा शोषक कालिया।
सहा इंद्र का रोष, गोवर्धन छिप कान्ह ने।।
*
मिला पूत नहिं एक, बंजर भू सम पूतना।
खोकर चली विवेक, कृष्ण मारने खुद मरी।।
*
जोशीमठ में आज, कान्हा हो जाओ प्रगट।
जन-जीवन की लाज, मात्र तुम्हारे हाथ में।।
*
दोषी शासन-नीति, रही प्रकृति को छेड़ती।
है पाखंडी रीति, घड़ियाली आँसू बहे।।
*
जनता जागे आज, कहें कृष्ण विप्लव करो।
बदल इंद्र का राज, करो प्रकृति से मित्रता।।
१०-१-२०२३
***
सॉनेट
हिंदी
*
जगवाणी हिंदी का वंदन, इसका वैभव अनुपम अक्षय।
हिंदी है कृषकों की भाषा, श्रमिकों को हिंदी प्यारी है।
मध्यम वर्ग कॉंवेंटी है, रंग बदलता व्यापारी है।।
जनवाणी, हैं तंत्र विरोधी, न्यायपालिका अंग्रेजीमय।।
बच्चों से जब भी बतियाएँ, केवल हिंदी में बतियाएँ।
अन्य बोलिओं-भाषाओँ को, सिखा-पढ़ाएँ साथ-साथ ही।
ह्रदय-दिमाग न हिंदी भूले, हिंदी पुस्तक लिए हाथ भी।।
हिंदी में प्रार्थना कराएँ, भजन-कीर्तन नित करवाएँ।।
शिक्षा का माध्यम हिंदी हो, हिंदी में हो काम-काज भी।
क्यों अंग्रेजी के चारण हैं, तनिक न आती हया-लाज भी।
हिंदी है सहमी गौरैया, अंग्रेजी है निठुर बाज सी।
शिवा कह रहे हैं शिव जी को, कैसे आए राम राज जी?
हो जब निज भाषा में शिक्षा, तभी सधेंगे, सभी काज जी।।
देवनागरी में लिखिए हर भाषा, होगा तब सुराज जी।।
***
सॉनेट
जात को अपनी कभी मरने न दीजिए।
बात से फिरिए नहीं, तभी तो बात है।
ऐब को यह जिस्म-जां चरने न दीजिए।।
करें फरेब जीत मिले तो भी मात है।।
फायदा हो कायदे से तभी लीजिए।
छीनिए मत और से, न छीनने ही दें।
वायदा टूटे नहीं हर जतन कीजिए।।
पंछियों को अन्न कभी बीनने भी दें।।
दुर्दशा लोगों की देखकर पसीजिए।
तंत्र रौंद लोक को गर्रा रहा हुज़ूर।
आईने में देख शकल नहीं रीझिए।।
लोग मरे जा रहे हैं; देखिए जरूर।।
सचाई से आखें कभी चार कीजिए।
औरों की सुन; तनिक ख़ुशी कभी दीजिए।।
१०-१-२०२२
***
हिंदी आरती
*
भारती भाषा प्यारी की।
आरती हिन्दी न्यारी की।।
*
'लोक' की भाषा है हिंदी
'तंत्र' की आशा है हिंदी
करोड़ों जिह्वाओं आसीन
न कोई सकता इसको छीन
ब्रह्म क , विष्णु - पुरारी की
आरती हिन्दी न्यारी की।।
*
वाक्-ध्वनि हिंदी का आधार
पाँच वर्गों बाँटे उच्चार
बोलते वह जो लिखते आप
वर्तनी - स्वर - व्यंजन अनुसार
नगरी लिपि सुविचारी की
आरती हिन्दी न्यारी की।।
*
एकता पर हिंदी बलिहार,
वचन दो लिंग क्रिया व्यापार
संधियाँ काल शक्ति हैं तीन
विशेषण हैं हिंदी में चार
पांच अव्यय व्यवहारी की
आरती हिंदी न्यारी की।।
*
वर्ण हिंदी के अति सोहें,
शब्द मानव - मन को मोहें
काव्य रचना सुडौल सुंदर
वाक्य लेते सबका मन हर
छंद सुमनों की क्यारी की
आरती हिन्दी न्यारी की।।
*
समेटे ज्ञान निति विज्ञान
सीख पढ़ लिख हों हम विद्वान
विषय जो कठिन जटिल नीरस
बना देती हिंदी रसवान
विश्ववाणी गुणकारी की
आरती हिन्दी न्यारी की।।
१०.१.२०१९
***
लघुकथा-
गूँगे का गुड़
*
अपने लेखन की प्रशंसा सुन मित्र ने कहा आप सब से प्रशंसा पाकर मन प्रसन्न होता है किंतु मेरे पति प्राय: कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करते। मेरा ख़याल था कि उन्हें मेरा लिखना पसंद नहीं है परन्तु आप कहते हैं कि ऐसा नहीं है। यदि उन्हें मेरा लिखना और मेरा लिखा अच्छा लगता है तो यह जानकर मुझे ख़ुशी और गौरव ही अनुभव होगा। मुझे उनकी जो बात अच्छी लगती है, मैं कह देती हूँ, वे क्यों नहीं कहते?
मैंने कहा- 'गूँगे का गुड़' न होता तो कहावत कैसे बनती।
***
मुक्तक
मन जी भर करता रहा, था जिसकी तारीफ
उसने पल भर भी नहीं, कभी करी तारीफ
जान-बूझ जिस दिन नहीं, मन ने की तारीफ
उस दिन वह उन्मन हुई, कर बैठी तारीफ
***
सोरठा
मन बैठा था मौन, लिखवाती संगत रही।
किसका साथी कौन?, संग खाती पंगत रही।।
***
दोहा सलिला
*
मन मीरां तन राधिका,तरें जपें घनश्याम।
पूछ रहे घनश्याम मैं जपूँ कौन सा नाम?
*
जिसको प्रिय तम हो गया, उसे बचाए राम।
लक्ष्मी-वाहन से सखे!, बने न कोई काम।।
*
प्रिय तम हो तो अमावस में मत बालो दीप।
काला कम्बल ओढ़कर, काजल नैना लीप।।
*
प्रियतम बिन कैसे रहे, मन में कहें हुलास?
विवश अधर मुस्का रहे, नैना मगर उदास।।
*
चाह दे रही आह का, अनचाहा उपहार।
वाह न कहते बन रहा, दाह रहा आभार।।
*
बिछुड़े आनंदकंद तो, छंद आ रहा याद।
बेचारा कब से करे, मत भूलो फरियाद।।
*
निठुर द्रोण-मूरत बने, क्यों स्नेहिल संजीव।
सलिल सलिल सा तरल हो, मत करिए निर्जीव।।
***
आलेख-
मत करें उपयोग इनका
हम जाने-अनजाने ऐसी सामग्री का उपयोग करते रहते हैं जो हमारे स्वस्थ्य, पर्यावरण और परिवेश के लिए घातक होती है. निम्न वस्तुएँ ऐसी ही हैं, इनका प्रयोग बंद कर हम आप तथा समाज और पर्यावरण को बेहतर बना सकते हैं.
१. प्लास्टिक निर्मित सामान- मनुष्य द्वारा किसी सामान का उपयोग किये जाने के बाद बचा निरुपयोगी कचरा कूड़े के ढेर, नाली, नाला, नदी से होते हुए अंतत: समुद्र में पहुँचकर 'रत्नाकर' को 'कचराघर' बना देता है. समुद्र को प्रदूषित करते कचरे में ८०% प्लास्टिक होता है. प्लास्टिक सड़ता, गलता नहीं, इसलिए वह मिट्टी में नहीं बदलता. भूमि में दबाये जाने पर बरसों बाद भी ज्यों का त्यों रहता है. प्लास्टिक जलने पर ओषजन वजू नष्ट होती है और प्रदूषण फैलानेवाली हानिप्रद वायु निकलती है. प्लास्टिक की डब्बियाँ, चम्मचें, प्लेटें, बर्तन, थैलियाँ, कुर्सियाँ आदि का कम से कम प्रयोग कर हम प्रदूषण कम कर सकते हैं.
प्लास्टिक के सामान मरम्मत योग्य नहीं होते. इनके स्थान पर धातु या लकड़ी का सामान प्रयोग किया जाए तो उसमें टूट-फूट होने पर मरम्मत तथा रंग-रोगन करना संभव होता है. इससे स्थानीय बेरोजगारों को आजीविका मिलती है जबकि प्लास्टिक सामग्री पूंजीपतियों का धन बढ़ाती है.
२. दन्तमंजन- हमने बचपन में कंडों या लकड़ी की राख में नमक-हल्दी मिले मंजन या दातौन का प्रयोग वर्षों तक किया है जिससे दांत मुक्त रहे. आजकल रसायनों से बने टूथपेस्ट का प्रयोग कर शैशव और बचपन दंत-रोगों से ग्रस्त हो रहा है. टूथपेस्ट कंपनियाँ ऐसे तत्वों (माइक्रोबीड्स) का प्रयोग करती हैं जिन्हें सड़ाया नहीं जा सकता. कोयले को घिसकर अथवा कोयले की राख से दन्तमंजन का काम लिया का सकता है. वनस्पतियों से बनाये गए दंत मंजन का प्रयोग बेहतर विकल्प है.
स्टीरोफोम
३. स्टिरोफोम से बने समान- आजकल तश्तरी, कटोरी, गिलास और चम्मच न सड़नेवाले (नॉन बायोडिग्रेडेबल) तत्वों से बनाये जाते हैं. हल्का और सस्ता होने पर भी यह गंभीर रोगों को जन्म दे सकता है. इसके स्थान पर बाँस, पेड़ के पत्तों, लकड़ी या छाल से बने समान का प्रयोग करें तो वह सड़कर मिटटी बन जाता है तह स्थानीय रोजगार का सर्जन करता है. इनकी उपलब्धता के लिए पौधारोपण बड़ी संख्या में करना होगा जिससे वन बढ़ेंगे और वायु प्रदूषण घटेगा.
१०.१.२०१७
***
नवगीत:
क्यों?
*
इसे क्यों
हिर्स लगती है
जिठानी से?
उसे क्यों
होड़ लेना
देवरानी से?
*
अँगुलियाँ कब हुई हैं
एक सी बोलो?
किसी को बेहतर-कमतर
न तुम तोलो
बँधी रख अँगुलियाँ
बन जाओ रे! मुट्ठी
कभी मत
हारना, दुनिया
दीवानी से
*
लड़े यदि नींव तो
दीवार रोयेगी
दिखाकर आँख छत
निज नाश बोयेगी
न पूछो हाल कलशों का
कि क्या होगा?
मिटाओ
विषमता मिल
ज़िंदगानी से
*
न हीरे-मोतियों से
प्यास मिटती है
न ताकत से अधर पर
हँसी खलती है
नयन में आस ही
बन प्रीत पलती है
न छीने
स्वप्न युग
नादां जवानी से
१०-१-२०१६
***
लघुकथा
जीत का इशारा
*
पिता को अचानक लकवा क्या लगा घर की गाड़ी के चके ही थम गये। कुछ दिन की चिकित्सा पर्याप्त न हुई. आय का साधन बंद और खर्च लगातार बढ़ता हुआ रोजमर्रा के खर्च, दवाई-इलाज और पढ़ाई।
उसने माँ के चहरे की खोती हुई चमक और पिता की बेबसी का अनुमान कर अगले सवेरे औटो उठाया और चल पड़ी स्टेशन की ओर। कुछ देर बाद माँ जागी, उसे घर पर न देख अनुमान किया मंदिर गयी होगी। पिता के उठते ही उनकी परिचर्या के बाद तक वह न लौटी तो माँ को चिंता हुई, बाहर निकली तो देखा औटो भी नहीं है।
बीमार पति से क्या कहती?, नन्हें बेटे को जगाकर पड़ोसी को बुलाने का विचार किया। तभी एकदम निकट हॉर्न की आवाज़ सुनकर चौंकी। पलट कर देख तो उन्हीं का ऑटो था। ऑटो लेकर भागनेवाले को पकड़ने के लिए लपकीं तो ठिठक कर रह गयीं, चालक के स्थान पर बैठी बेटी कर रही थी जीत का इशारा।
***
लघुकथा :
सहारे की आदत
*
'तो तुम नहीं चलोगे? मैं अकेली ही जाऊँ?' पूछती हुई वह रुँआसी हो आयी किंतु उसे न उठता देख विवश होकर अकेली ही घर से बाहर आयी और चल पड़ी अनजानी राह पर।
रिक्शा, रेलगाड़ी, विमान और टैक्सी, होटल, कार्यालय, साक्षात्कार, चयन, दायित्व को समझना-निभाना, मकान की तलाश, सामान खरीदना-जमाना एक के बाद एक कदम-दर-कदम बढ़ती वह आज विश्राम के कुछ पल पा सकी थी। उसकी याद सम्बल की तरह साथ होते हुए भी उसके संग न होने का अभाव खल रहा था।
साथ न आया तो खोज-खबर ही ले लेता, मन हुआ बात करे पर स्वाभिमान आड़े आ गया, उसे जरूरत नहीं तो मैं क्यों पहल करूँ? दिन निकलते गये और बेचैनी बढ़ती गयी। अंतत: मन ने मजबूर किया तो चलभाष पर संपर्क साधा, दूसरी और से उसकी नहीं माँ की आवाज़ सुन अपनी सफलता की जानकारी देते हुए उसके असहयोग का उलाहना दिया तो रो पड़ी माँ और बोली बिटिया वह तो मौत से जूझ रहा है, कैंसर का ऑपरेशन हुआ है, तुझे नहीं बताया कि फिर तू जा नहीं पाती। तुझे इतनी रुखाई से भेजा ताकि तू छोड़ सके उसके सहारे की आदत।
स्तब्ध रह गयी वह, माँ से क्या कहती?
तुरंत बाद माँ के बताये चिकित्सालय से संपर्क कर देयक का भुगतान किया, अपने नियोक्ता से अवकाश लिया, आने-जाने का आरक्षण कराया और माँ को लेकर पहुँची चिकित्सालय, वह इसे देख चौंका तो बोली मत परेशान हो, मैं तम्हें साथ ले जा रही हूँ। अब मुझे नहीं तुम्हें डालनी है सहारे की आदत।
***
लघुकथा:
विधान
*
नवोढ़ा पुत्रवधू के हर काम में दोष निकलकर उन्हें संतोष होता, सोचतीं यह किसी तरह मायके चली जाए तो पुत्र पर फिर एकाधिकार हो जाए. बेटी भी उनका साथ देती। न जाने किस मिट्टी की बनी थी पुत्रवधु कि हर बात मुस्कुरा कर टाल देती।
कुछ दिनों बाद बेटी का विवाह बहुत अरमानों से किया उन्होंने। कुछ दिनों बाद बेटी को अकेला देहरी पर खड़ा देखकर उनका माथा ठनका, पूछा तो पता चला कि वह अपनी सास से परेशान होकर लौट आयी फिर कभी न जाने के लिये। इससे पहले कि वे बेटी से कुछ कहें बहू अपनी ननद को अन्दर ले गयी और वे सोचती रह गयीं कि यह विधि का विधान है या शिक्षा-विधान?
१०.१.२०१६
***
विचित्र भारत
सोनिया गांधी मंदिर महबूबनगर, आंध्र
आंध्र प्रदेश में कांग्रेस के एक कार्यकर्ता पूर्व मंत्री पी शंकर राव ने वर्ष १९१४ में सत्ताधारी दल की मुखिया सोनिया गांधी की ९ फुट ऊंची प्रतिमा स्थापित कर मंदिर तैयार करवाया है। इतालवी मूल की ७१ वर्षीय श्रीमती सोनिया गांधी देश के सबसे ताकतवर राजनीतिज्ञों में से एक हैं। वे उस नेहरू-गाँधी परिवार की सदस्य हैं जिसने देश को ३ तीन प्रधानमंत्री (जवाहर लाल जी, इंदिरा गाँधी जी और राजीव गाँधी जी) दिए हैं जिनमें से बाद के दोनों शहीद हुए। राव ने जुलाई १९९३ में आंध्र प्रदेश के विभाजन और अलग तेलंगाना राज्य बनाने के पार्टी के फैसले के बाद सोनिया गांधी को धन्यवाद देने के लिए महबूबनगर में यह मंदिर बनवाया है। ३.५ करोड़ आबादी वाले तेलंगाना इलाके में हैदराबाद समेत आंध्र प्रदेश के 23 जिलों के 10 जिले शामिल किए गए हैं। राव ने कहा, ''अलग तेलंगाना राज्य बनाने की दशकों पुरानी माँग को पूरा करने में ऐतिहासिक भूमिका अदा करने के लिए सोनिया गाँधीको धन्यवाद देने का यह हमारा तरीक़ा है।''
उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्य मंत्री रहीं बहुजन समाजवादी पार्टी की मायावती जी ने राजधानी लखनऊ में खुद अपनी प्रतिमा युक्त मंदिर का उद्घाटन किया है। दक्षिण भारत में साहित्यकारों, राजनेताओं और अभिनेताओं के मंदिर बनाने की लंबी परंपरा रही है।
***
नवगीत:
.
छोड़ो हाहाकार मियाँ!
.
दुनिया अपनी राह चलेगी
खुदको खुद ही रोज छ्लेगी
साया बनकर साथ चलेगी
छुरा पीठ में मार हँसेगी
आँख करो दो-चार मियाँ!
.
आगे आकर प्यार करेगी
फिर पीछे तकरार करेगी
कहे मिलन बिन झुलस मरेगी
जीत भरोसा हँसे-ठगेगी
करो न फिर भी रार मियाँ!
.
मंदिर में मस्जिद रच देगी
गिरजे को पल में तज देगी
लज्जा हया शरम बेचेगी
इंसां को बेघर कर देगी
पोंछो आँसू-धार मियाँ!
नवगीत:
.
रब की मर्ज़ी
डुबा नाखुदा
गीत गा रहा
.
किया करिश्मा कोशिश ने कब?
काम न आयी किस्मत, ना रब
दुनिया रिश्ते भूल गयी सब
है खुदगर्ज़ी
बुला, ना बुला
मीत भा रहा
.
तदबीरों ने पाया धोखा
तकरीरों में मिला न चोखा
तस्वीरों का खाली खोखा
नाता फ़र्ज़ी
रहा, ना रहा
जीत जा रहा
.
बादल गरजा दिया न पानी
बिगड़ी लड़की राह भुलानी
बिजली तड़की गिरी हिरानी
अर्श फर्श को
मिला, ना मिला
रीत आ रहा
***
नवगीत:
.
उम्मीदों की फसल
ऊगना बाकी है
.
अच्छे दिन नारों-वादों से कब आते हैं?
कहें बुरे दिन मुनादियों से कब जाते हैं?
मत मुगालता रखें जरूरी खाकी है
सत्ता साध्य नहीं है
केवल साकी है
.
जिसको नेता चुना उसीसे आशा है
लेकिन उसकी संगत तोला-माशा है
जनप्रतिनिधि की मर्यादा नापाकी है
किससे आशा करें
मलिन हर झाँकी है?
.
केंद्रीकरण न करें विकेन्द्रित हो सत्ता
सके फूल-फल धरती पर लत्ता-पत्ता
नदी-गाय-भू-भाषा माँ, आशा काकी है
आँख मिलाकर
तजना ताका-ताकी है
***
नवगीत:
.
लोकतंत्र का
पंछी बेबस
.
नेता पहले डालें दाना
फिर लेते पर नोच
अफसर रिश्वत गोली मारें
करें न किंचित सोच
व्यापारी दे
नशा रहा डँस
.
आम आदमी खुद में उलझा
दे-लेता उत्कोच
न्यायपालिका अंधी-लूली
पैरों में है मोच
ठेकेदार-
दलालों को जस
.
राजनीति नफरत की मारी
लिए नींव में पोच
जनमत बहरा-गूँगा खो दी
निज निर्णय की लोच
एकलव्य का
कहीं न वारिस
१०-१-२०१५
छंद सलिला:
नौ मात्रिक छंद गंग
(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रा वज्रा, उपेन्द्र वज्रा, कीर्ति, घनाक्षरी, प्रेमा, वाणी, शक्तिपूजा, सार, माला, शाला, हंसी, दोधक, सुजान, छवि)
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९ वसुओं के आधार पर नौ मात्राओं के छंदों को वासव छंद कहा गया है. नवधा भक्ति, नौ रस, नौ अंक, अनु गृह, नौ निधियाँ भी नौ मात्राओं से जोड़ी जा सकती हैं. नौ मात्राओं के ५५ छंदों को ५ वर्गों में विभाजित किया जा सकता है.
१. ९ लघु मात्राओं के छंद १
२. ७ लघु + १ गुरु मात्राओं के छंद ७
३. ५ लघु + २ गुरु मात्राओं के छंद २१
४. ३ लघु + ३ गुरु मात्राओं के छंद २०
५. १ लघु + ४ गुरु मात्राओं के छंद ५
नौ मात्रिक छंद गंग
नौ मात्रिक गंग छंद के अंत में २ गुरु मात्राएँ होती हैं.
उदाहरण:
१. हो गंग माता / भव-मुक्ति-दाता
हर दुःख हमारे / जीवन सँवारो
संसार चाहे / खुशियाँ हजारों
उतर आसमां से / आओ सितारों
जन्नत जमीं पे, नभ से उतारो
शिव-भक्ति दो माँ / भाव-कष्ट-त्राता
२. दिन-रात जागो / सीमा बचाओ
अरि घात में है / मिलकर भगाओ
तोपें चलाओ / बम भी गिराओ
सेना लड़ेगी / सब साथ आओ
३. बचपन हमेशा / चाहे कहानी
है साथ लेकिन / दादी न नानी
हो ज़िंदगानी / कैसे सुहानी
सुने न किस्से, न / बातें बनानी
१०.१.२०१४

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