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शुक्रवार, 11 सितंबर 2020

पंचम नगर एक वीरान धरोहर

पुरोवाक :
पंचम नगर एक  वीरान धरोहर
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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                           मानव सभ्यता निर्माण और ध्वंस की कहानी है। इतिहास स्वयं को दुहराता है। माटी मीनार बनती है और मीनार माटी
में मिल जाती है। समय चक्र रुकता नहीं। मिट्टी से निर्माण करने वाला मानव ही निर्माणों को मिट्टी में मिलता है और विधि की विडंबना यह कि मिट्टी में मिल चुके को खोजकर ध्वंसावशेषों से अतीत में झाँककर अजाने को जानने की कोशिश में तन-मन-धन लगाकर मानव को संतुष्टि मिलती है। मिट्टी में मिले हुए जितना अधिक समय बीतता है, उसे जानने की जिज्ञासा उतनी अधिक बढ़ती जाती है। मोहनजोदारो, हड़प्पा, मिस्र के पिरामिड, नालंदा, तक्षशिला आदि के अवशेषों को खोजने में अकूत धन और अन्य साधन मानव खर्च करता है वह भी तब जब धनाभाव और साधनहीनता के कारण असंख्य मानव नियत प्रति दम तोड़ते रहते हैं। राममंदिर के अवशेषों को लेकर सदियों से चलते रहे विवाद का पटाक्षेप होते न होते मथुरा और वाराणसी के अवशेषों को लेकर कानाफूसी आरंभ हो चुकी है। 
                           मानव अपनी भूलों से कुछ सीखता नहीं। मजबूत किले, गगनचुम्बी अट्टालिकाएँ, मनोहर प्रतिमाएँ मिट्टी में मिली देखने पर भी मानव फिर-फिर इन्हें बनाता जाता है। हर देश में पुरातत्व विभाग, पुरातत्वविद खोये को खोजने में निमग्न रहते हैं। यह बात और है कि जितना खोज पाते हैं उससे अधिक निरंतर खोता जाता है। हम अपने बचपन का परिदृश्य याद करें तो अपने ही शहर में अपने चारों और क्या-कितना नष्ट हो गया यह देख सकते हैं। ऐसे ही विनष्ट स्थानों में एक है पंचम नगर। बहुत पुरानी बात नहीं है जब पंचम नगर बुन्देलखंड  का समृद्ध नगर था जिसकी ख्याति दूर-दूर तक थी। हवा का एक झोंका आया और पंचम नगर वीरान खंडहरों में परिवर्तित हो गया। क्या हुआ, क्यों हुआ, कैसे हुआ, कब हुआ जैसे प्रश्न मन को उद्वेलित करते हैं। 
                           कुछ वर्ष पूर्व १८५७ की सशस्त्र क्रांति का इतिहास खंगालते समय राजा बखतबली द्वारा पंचमनगर थाने को लूटने का विवरण पढ़ा था। जबलपुर के ख्यात प्रशासक, भाषाविद रायबहादुर हीरालाल राय के साहित्यिकी अवदान की खोज करते समय दमोह दीपिका में पंचम नगर की जानकारी मिले थी। कुछ अन्य सन्दर्भों में भी यह नाम आया। विवाह के पश्चात फुटेरा वार्ड दमोह निवासी मामा ससुर  द्वय स्व. इंद्रभूषण लाल व् स्व. चंद्र्भूषणलाल के विश्वस्त कारिंदे पंचम के नाम पर हुई चर्चा में भी पंचम नगर का उल्लेख हुआ। रनेह  में बौद्ध मठ, तला की देवी आदि के अवशेषों को देखने का अवसर मिला पर पंचम नगर जाने का अवसर नहीं मिला सका। मन में दबी इच्छा को प्रस्फुटित होने का अवसर मिला जब अजित जैन जी पंचम नगर संबंधी चर्चा हेतु आये। पंचम नगर का उद्भव और पतन बहुत पुरानी बात नहीं है। सत्रहवीं सदी में यह क्षेत्र हस्त निर्मित कागज़ हेतु ख्यात हुआ। खनिज, कृषि और वनोपजों  का व्यवसाय तो होता ही था। 
                           मुग़ल शासकों के पतन के बाद बुंदेलखंड की बागडोर मराठा शासकों के हाथ में आयी जो नागपुर में बैठकर सागर में अपना किलेदार रखकर राज कर रहे थे। उनके कारिंदे निर्मम निष्ठुर और क्रूर थे। पिंडारी और ठग लोगों का जीना हराम किये थे। भोंसले शासन में लगन वसूली में मनमानी का आलम यह कि भोंसलेशाही को भर्राशाही कहा जाता था। पिंडारी अपने सूत्रों से समृद्ध लोगों का पता लगाकर दिन दहाड़े लूट लिया करते थे। मेरे श्वसुर जी के पूर्वज भी इसके शिकार होते-होते बचे। एक रात घर के पुरुष बाहर थे। गाँव के आसपास में दस्यु देखे जाने की खुसफुस हुई। महिलाओं के कान में कहीं से भनक पडी और विक्टोरिया सिक्कों को कपड़े में कमर के चारों और करधन की तरह लपेट कर, घोड़े के दाने की बोरी में जेवर छिपाकर साहसी दादी माँ रनेह से रातों-रात घोड़ों पर निकल पड़ीं और दमोह में रिश्तेदारों के पास पहुँच गयीं। अन्य सदस्य भी परिचितों के यहाँ जा छिपे। उसी रात गाँव के अन्य सेठ के परिवार को लूटने के बाद दस्युओं ने हत्याएँ भी कीं। यह अराजकता का वातावरण पंचमहल ही नहीं समूचे बुंदेलखंड की बर्बादी का कारण  बना। 
                           पंचमहल पशु मंडी, अनाज मंडी, कागज़ उत्पादन का केंद्र, प्राकृत्रिक सौंदर्य, पानी की सर्वकालिक सुविधा संपन्न नगर था। इसलिए संपन्न और निपुण जान आते-बसते रहे।  मराठा शासन का अंत कर अंग्रेजों ने शासन सम्हाला तो आरंभ में जनता ने चैन की सांस ली किन्तु क्रमश: अंग्रेजों ने भी मनमानी आरंभ कर दी। फलत:, राजाओं और मालगुजारों ने कुछ देशभक्त क्रांतिकारियों से प्रोत्साहित होकर देश से विदेशियों को भागने का अभियान छेड़ दिया। पंचम नगर का पुलिस थाना  हटा के राजा बखतबली ने लूट लिया। स्वातंत्र्य विद्रोह असफल होने पर बख्तबली को अंग्रेजों से संधि करनी पड़ी। 
                           स्वाभाविक है कि अंग्रेजों ने बखतबली के प्रभावशाली सहायकों को खोज-खोज कर प्रताड़ित किया। दस्युओं, बीमारियों, प्रशासनिक प्रताड़ना, व्यापार-व्यवसाय नष्ट होने के कारण क्रमश: समृद्ध जन सुरक्षा की तलाश में और आम कृषक-मजदूर आजीविका की तलाश में यत्र-तत्र विस्थापित हो गए। रह गयी इमारतें तो तूफ़ान, बरसात, गर्मी झेलते हुई धीरे-धीरे उसी मिट्टी में मिलती गयीं जिनसे बनी थीं। धरती मन ने उन्हें अपने अंचल में स्थान दे दिया। शेष रह गए हैं खँडहर जो पंचम नगर के वैभवशाली अतीत की कहानियाँ कहते हैं।
                           लोकोक्तियाँ, लोकापवाद और  जनश्रुतियाँ अनेक हैं। पंचमनगर कब, किसके शासनकाल में बना यह शोध का विषय है।
                           पंचम नगर के जिला मुख्यालय दमोह का इतिहास बहुत प्राचीन है। सिंग्रामपुर में मिले पौराणिक काल के पाषाण हथियार इस बात का साक्ष्य है कि यह स्थान करोड़ो वर्ष पूर्व मानव सभ्यता का पालना रहा है। ५ वीं शताब्दी मे यह पाटिलीपुत्र के भव्य एवं शक्तिशाली गुप्त साम्राज्य का हिस्सा था। इसका प्रमाण जिले के विभिन्न स्थानों पर मिले शिलालेख, सिक्के, (दुर्गा मंदिर) व अन्य वस्तुए हैंजिनका संबंध समुद्रगुप्त, चन्द्रगुप्त, और स्कंन्दगुप्त के शासन काल से था। ८ वीं शाताब्दी से १२ वीं शताब्दी के मध्य दमोह जिले का कुछ भाग चेदी साम्राज्य के अंतर्गत आता था। जिसमें कलचुरी राजाओं का शासन था और उनकी राजधानी त्रिपुरी थी। दसवीं शताब्दी के कलचुरी शासकों के स्थापत्य कला और शासन का जीता जागता उदाहरण है नोहटा का नोहलेश्वर मंदिर। दमोह जिले पर चंदेलों का शासन था जिसे जेजाक मुक्ति कहा जाता था। १४ वीं शताब्दी में दमोह में मुगलो का अधिपत्य शासन रहा और ग्राम सलैया तथा बटियागढ़ में पाए जाने वाले पाषाण शिलालेखो में खिलजी और तुगलक वंश के शासन का उल्लेख है। बाद में मालवा के सुल्तान ने यहाँ शासन किया। १५ वीं शताब्दी के आखिरी दशक में गौड़ वंश के शासक संग्राम सिंह ने इसे अपने शक्तिशाली एंव बहुआयामी साम्राज्य में शामिल किया जिसमें ५२ किले थे। यह समय क्षेत्र के लिए शांति और समृद्धि का था। सिंग्रामपुर में रानी दुर्गावती मुगल साम्राज्य के सेनापति आसफ खान, की सेना से साहस पूर्ण युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुई।  गोंड़ वंश के राजा तेजीसिंह  के काल में निर्मित तेजगढ़  का किला अभी भी खड़ा है। 
                           क्षेत्र में बुंदेलो ने कुछ समय के लिए यहाँ राज्य किया इसके बाद मराठों ने राज्य किया। सन् १८८८ में पेशवा की मृत्यु के बाद अंगे्रजो ने मराठों को उखाड फेंका। अंगे्रजो से भारत के स्वतंत्र कराने के लिए दमोह ने देश की स्वतंत्रता के लिए हो रहे संघर्ष में बराबरी से भाग लिया। हिडोरिया के ठाकुर किशोर सिंह सिग्रामंपुर के राजा देवी सिंह, करीजोग के पंचम सिंह गंगाधर राव, रघुनाथ राव, मेजवान सिंह, गोविंद राव, इत्यादि के कुशल नेतृत्व में अंगे्रजों के खिलाफ 1857 के विद्रोह में भाग लिया। पौराणिक कक्षा के अनुसार दमोह शहर का नाम नरवर की रानी दमयंती के नाम पर पड़ा, जबकि रनेह  ग्राम (मूल नाम नलेह) राजा नल के नाम पर बसा बताया जाता है।दमोह जिले में ज्योतिर्लिंग की तरह प्रतिष्ठा प्राप्त जागेश्वर धाम बांदकपुर है जिसे मराठा दीवान चांदुरकर ने बनवाया था। कहते हैं कि दीवान चांदुरकर शिकार पर निकले। एक स्थान पर उनका घोडा बारंबार उछल रहा था। वहीं विश्राम में उनको स्वप्न में भगवान शिव की प्रतिमा दिखी। वहाँ खुदाई करायी तो स्वयंभू शिवलिंग दिखा। दीवान चादुंरकर ने इसे दमोह लाकर समीप सिविल वार्ड में स्थापित करने हेतु एक मंदिर बनवाया। एक बडी चटटान से जुडा शिवलिंग खुदाई के बाद भी अलग नहीं हुआ। तब वहीं जागेश्वर मंदिर बनाया गया।  दमोह में बने मंदिर में मराठों के कुलदैवत श्री राम की मूर्ति बिठाकर राममंदिर बनाया गया।  वहाँ आज भी मराठी पदधति से ही श्री राम की पूजा होती है।                                                                                                                            इस काल क्रम में पंचम नगर कब बसा? कब समृद्ध हुआ? कौन-कौन से उद्योग-व्यवसाय विकसित हुए? पंचम नगर का देश-प्रदेश के क्या योगदान रहा और किन कारणों से नष्ट हुआ? यह खोजा जाना आवश्यक है। वर्तमान में पंचम नगर का समीपस्थ क्षेत्र विकास की राह पर है। वर्ष २०१४ में जिला दमोह के अन्तग्रत पंचम नगर परियोजना के पगरा बांध हेतु ग्राम निहानी से भीकमपुर रैयतवारी एवं भीकमपुर रैयतवारी से भीकमपुर मुस्तजरी तक ग्राम सड़क का निर्माण कार्य हो चुका है । बाँध ने क्षेत्रीय विकास के द्वार खोले हैं। भारत सरकार तथा प्रदेश सरकार के पुरातत्व विभाग पंचम नगर के खंडहरों का संरक्षण कर, इसे पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करना चाहिए। यहाँ प्रचुर शासकीय भूमि उपलब्ध है। मात्र डेढ़-दो किलोमीटर  कर सड़क निर्माण कर पंचमनगर में नयानगर बसाया जा सकता है। एक मेडिकल कॉलेज का निर्माण कर इस अंचल का कायाकल्प किया जा सकता है।                                                              श्री अजित जैन ने अपना अध्ययन पंचम नगर में जैन समाज और जैन मंदिरों तक सीमित रखा है। उनके द्वारा संकलित सामग्री में कतिपय विरोधाभास भी हैं। उन्होंने जो जैसा पाया सहेज कर पाठक पंचायत में प्रस्तुत कर दिया है। यह महत्वपूर्ण इसलिए हैं कि पंचम नगर की गाथा के अन्वेषण में यह सामग्री कच्ची मिट्टी का काम करेगी। अजित जी को उनकी सुरुचि के लिए साधुवाद, पुरातात्विक अन्वेषण में संकुचित दृष्टि और मतों की परिधि से परे जाकर निष्पक्ष भाव से स्थापनाएँ करनी होती हैं, वह कार्य इस आधारशिला पर किया जा सकेगा। श्री जैन के श्रम और सुरुचि के प्रति अनंत मंगल कामनाएँ। 
परिचय : संजीव वर्मा 'सलिल',
जन्म: २०-८-१९५२, मंडला मध्य प्रदेश। माता-पिता: स्व. शांति देवी - स्व. राज बहादुर वर्मा। प्रेरणास्रोत: बुआश्री महीयसी महादेवी वर्मा।शिक्षा: त्रिवर्षीय डिप्लोमा सिविल अभियांत्रिकी, बी.ई., एम. आई. ई., विशारद, एम. ए. (अर्थशास्त्र, दर्शनशास्त्र), एलएल. बी., डिप्लोमा पत्रकारिता, डी. सी. ए.। संप्रति: पूर्व कार्यपालन यंत्री लोक निर्माण विभाग म. प्र., अधिवक्ता म. प्र. उच्च न्यायालय, संयोजक विश्ववाणी हिंदी परिषद - अभियान जबलपुर, पूर्व वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष / महामंत्री राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद, पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अखिल भारतीय कायस्थ महासभा, संरक्षक राजकुमारी बाई बाल निकेतन, संयोजक समन्वय संस्था प्रौद्योगिकी विश्व विद्यालय भोपाल, संचालक समन्वय प्रकाशन जबलपुर। प्रकाशित कृतियाँ: १. कलम के देव, २. भूकंप के साथ जीना सीखें, ३. लोकतंत्र का मक़बरा, ४. मीत मेरे ५. काल है संक्रांति का ६. कुरुक्षेत्र गाथा प्रबंध काव्य ७. सड़क पर। संपादन: १२ पुस्तकें, १६ स्मारिकाएँ, ८ पत्रिकाएँ। भूमिका लेखन: ६५ पुस्तकें, तकनीकी लेख: १५, समीक्षा ३०० से अधिक पुस्तकें। ट्रू मीडिया मासिकी दिल्ली द्वारा अगस्त २०१९ में आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' विशेषांक प्रकाशित। जीवन परिचय प्रकाशित ७ कोश। ७ संस्कृत-हिंदी काव्यानुवाद। साझा संकलन २०। अप्रकाशित पुस्तकें १२। अंतरजाल पर- १९९८ से सक्रिय, हिन्द युग्म पर छंद-शिक्षण २ वर्ष तक, साहित्य शिल्पी पर 'काव्य का रचनाशास्त्र' ८० अलंकारों पर लेखमाला, छंदों पर लेखमाला जारी ८० छंद हो चुके हैं। गूगल पर २,५१,००० प्रविष्टियाँ। दिव्य नर्मदा अंतर्जाल पत्रिका ३१,४८,३०८ पाठक संख्या। उपलब्धि ५०० नए छंदों का आविष्कार। सम्मान- १० राज्यों संस्थाओं द्वारा शताधिक सम्मान तथा अलंकरण।
   

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