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सोमवार, 2 मार्च 2026

मार्च २, पूर्णिका, इंग्लिश सॉनेट, रामकिंकर, इटेलियन सॉनेट, नवगीत, दोहा, माँ, श्रृंगार, होली, कुण्डलिया

 सलिल सृजन मार्च २

*
एक लघुकथा फागुन की
जुगाड़ टेक्नोलॉजी
फागुन के महीने में एक इंटरव्यू के लिए बुलावा आया। मुझे पता चला कि नौकरी सांसद के रिश्तेदार को दी जाना है, दिखावे के लिये इंटरव्यू हो रहा है। ऐसे सवाल पूछे जा रहे थे, जिनका कोई जवाब संभव नहीं था, एक के बाद एक केंडीडेट आ रहे थे, बिना जवाब दिए असफल होकर जा रहे थे।
मेरी बारी आई तो सवाल पूछा गया- 'आप नदी के बीच एक बोट पर हैं, और आपके पास दो candle के अलावा कुछ भी नहीं है। आपको एक candle जलानी है, कैसे जलाओगे?' मैंने जुगाड़ टेक्नोलॉजी का उपयोग कर उत्तर दिया- 'सर! इसके तीन-चार सोल्युशन हो सकते हैं।' प्रश्नकर्ता को बहुत आश्चर्य हुआ कि जिस सवाल का एक भी जवाब नहीं हो सकता, उसके तीन-चार जवाब कैसे हो सकते हैं? उसने कहा- 'बताओ।' मैंने हिंगलिश में कहा- 'एक candle पानी में फेंक दो, then boat will become lighter (हल्की), और "lighter" से आप candle जला सकते हैं।' इन्टरव्यू बोर्ड के सदस्य एक दूसरे का मुँह ताकने लगे। अब एक दादी अम्मा टाइप की महिला ने दादागिरी करते हुए पूछा- 'दूसरा उत्तर क्या है?' मैंने सोचने की मुद्रा बनाते हुए कहा- 'Throw a candle up and catch it. Catches win the Matches. Using the matches that you win, you can light the candle. दादी अम्मा की बोलती बंद हो गई।
अब बारी थी एक तेज तर्रार आधुनिका की। नायक पर टिके चश्मे में से झाँकते हुए उसने फरमाया- Next option? मैंने उत्तर दिया- 'Take some water in your hand and drop it, drop-by-drop. It will sound like .. Tip.. Tip-Tip.. Tip आधुनिका- So what? मैं- 'Madam! आपने वो गाना नही सुना टिप-टिप बरसा पानी, पानी ने आग लगाई। इस आग से आप अपनी candle जला सकती हैं। यदि ये काफी नही हैं तो एक और उपाय है। आप एक candle से प्यार करने लगिए, दूसरी को जलन होगी, वह अपने आप जलने लगेगी। प्रश्न पूछने वाली चारों खाने चित्त। मैंने जैसे ही कहा आप कहे तो एक और तो सब के सब बोल पड़े- संसद के रिश्तेदार को मारो गोली, नौकरी तो इस जुगाड़ टेक्नोलॉजी वाले को दी जाती है।
००० 
छंद शाला २ छंद के तत्व ० पंक्ति/ पद (मिसरा, लाइन) पंक्ति को पद भी कहा जाता है। पंक्ति संख्या छंद वर्गीकरण का एक आधार भी है। यथा- दो पदिक/दो पदीय छंद- दोहा, सोरठा, चौपाई, शे'र, कप्लेट आदि, त्रिपदिक छंद- माहिया हाइकु, कुकुप, दुमदार दोहा, कबीरा आदि, चतुष्पदिक काव्य- सवैया, दंडक, रोला, मुक्तक, रूबाई आदि, षट्पदिक छंद- कुंडलिया, कुंडलिका आदि, चौदह पदीय छंद- सॉनेट आदि। पद शब्द काव्य रचना के अर्थ में भी प्रयोग किया जाता है। जैसे- सूर के पद, भक्ति के पद आदि।

काव्य के कथ्य को लयबद्ध करने हेतु तुकांत (काव्य-पंक्तियों के अंत में समान ध्वनि/स्वर वाले शब्द का होना यथा- मुक्ति-युक्ति, युद्ध-बुद्ध, सरल-विरल आदि) व पदांत (एंड ऑफ लाइन अर्थात पंक्ति का अंतिम शब्द) का प्रयोग किया जाता है।
पदांत/पंकत्यांत (रदीफ़) पंक्ति के अंत में प्रयुक्त उच्चार/वर्ण/मात्रा को पदांत कहा जाता है। यह 'पद' और 'अंत' शब्दों से मिलकर बना है। यह छंद पंक्ति के अंत में प्रयुक्त शब्द का आखिरी वर्ण होता है। निम्न दोहे में 'र' पदांत है।

तुकांत (अंत्यानुप्रास, काफ़िया, राइम स्कीम)
यह पदांत के पहले आया समान ध्वनि/स्वर (तुक) वाला शब्द होता है। 'काफ़िया मिलाना' एक रोचक खेल है। निम्न दोहे में 'त्योहार' तथा 'उपहार' तुकांत हैं।
पदांत और तुकांत में अंतर- हर तुकांत शब्द पदांत होता है लेकिन हर पदांत शब्द तुकांत नहीं होता। तुकांत का उद्देश्य समान ध्वनि है जबकि पदांत का उद्देश्य केवल पंक्ति का अंत सूचित करना है। 
समांत तुकांत के पूर्व प्रयुक्त समान समान ध्वनि/स्वर (तुक) वाला शब्द समांत कहा जाता है। निम्न दोहे में 'प्रवेश' तथा 'निवेश' समांत हैं। समांत का होना अनिवार्य नहीं होता।

चरणान्त/गणान्त चरण के अंत में प्रयुक्त गण (तीन अक्षर) को चरणान्त कहते हैं। उक्त दोहे में 'त्योहार' व 'उपहार' (२२१ तगण) चरणांत है।

जन्म ब्याह राखी तिलक, गृह-प्रवेश त्योहार।
२ १ २ १ २ २ १ १ १ १ १ १ २ १ २ २ १ पानी पौधे पुस्तकें, शुभ निवेश उपहार।।
२ २ २ २ २ १ २ १ १ १ २ १ १ १ २ १ यह दोहा है, इसमें दो पंक्तियाँ (पद) हैं। पहली पंक्ति पूर्ण विराम तक तथा दूसरी पंक्ति पूर्ण विराम के बाद है। इसमें २ विषम चरण (पहला- तीसरा १३ मात्रिक) 'रहिमन देख बड़ेन को' व 'जहाँ काम आवै सुई' तथा २ सम चरण (दूसरा- चौथा ११ मात्रिक) 'लघु न दीजिए डार' तथा 'कहा करे तरवार' हैं।

दोहा लिखना सीखिए ० दोहा उच्चार काल गणना पर आधारित दो पंक्तियों का छंद है। दो छंद में 'दो' का वर्चस्व है। पंक्ति संख्या २- जन्म ब्याह राखी तिलक, गृह-प्रवेश त्योहार तथा पानी पौधे पुस्तकें, शुभ निवेश उपहार।। हर पंक्ति में चरण २- एक विषम चरण एक सम चरण । तेरह मात्रिक विषम चरण २ (पहला, तीसरा)- जन्म ब्याह राखी तिलक तथा पानी पौधे पुस्तकें । ग्यारह मात्रिक सम चरण २ (दूसरा, चौथा)- गृह-प्रवेश त्योहार तथा शुभ निवेश उपहार। चरण के आरंभ में समान उच्चार २- २ १ तथा २ १ एवं २ २ २ २। सम तुकीय चरणान्त २- २ १ तथा २ १।
***
क्रमश:
कार्यशाला दोहा+रोला=कुंडलिया ० दायें या बायें रहें, उभय नयन के कोर। उत्तर दक्षिण ध्रुव रहें, ज्यों धरती के छोर।। -अशोक व्यग्र ज्यों धरती के छोर, क्षितिज पर भू-नभ मिलते। उषा-सूर्य नव भोर, स्वप्न नयनों में पलते।। कठपुतली की डोर, हाथ में इन्हें नचायें। कभी न करिए शोर, करें श्रम मंज़िल पायें ।। १.३. २०२६ ०००
पूर्णिका
जबलपूर की शान
सच मानो इरफान
कहे बाद में शे'र
पहले फूँके जान
है ऐसा किरदार
कहें जिसे इंसान
आम आदमी की
बोले खरी जुबान
दोस्त जमाने को
मान रहा नादान
'सलिल'-मुहब्बत ही
है इसका उनवान
हुईं सरस्वती जी
इस पर मेहरबान
०००
कुंडलिया
होली खेली एक से, दूजे की सुधि संग।
रंग बदलते देखकर, रंग हो रहे दंग।।
रंग हो रहे दंग, भंग पी हुए नशीले।
मुँदे आप ही आप, अजाने नैन कँटीले।।
अधर अधर बिन विकल,
कहे नहिं सजनी भोली।
थाम अधर से अधर, मना ले साजन होली।।
२.३.२०२५
०००
इंग्लिश सॉनेट
रामकिंकर
हैं रामकिंकर नहीं देह केवल,
भजन-भक्ति में लीन प्रज्ञा सनातन,
नहीं देह उनको रही गेह केवल,
बनी उपकरण राम जप हित पुरातन।
पहना वसन आत्मा ने तभी तक,
जब तक सभी कर्म बंधन न टूटे,
किया स्वच्छ दर्पण मन का गमन तक,
सजग थे कहीं कोई कालिख न छूटे।
न दो हैं किशन-राम जग को बताया,
चरित कैकई का बताया महत्तम,
शिव-राम-हनुमत को मस्तक नवाया,
कहा प्रभु कृपा पाए वह जो लघुत्तम।
थे रामकिंकर कहे जो ग़लत वो,
हैं रामकिंकर जिएँ राम को जो।
२.३.२०२४
•••
इटेलियन सॉनेट
तेरा मेरा साथ
*
तेरा मेरा साथ,
नामी अरु गुमनाम,
ज्यों हों छंद-विराम,
ले हाथों में हाथ।
राजमार्ग-फुटपाथ,
जुमला अरु पैगाम,
खास आदमी आम,
पैर उठाए माथ।
साथ मगर है दूर,
नदिया के दो तीर,
हम हैं नाथ-अनाथ।
आँखें रहते सूर,
लोई और कबीर,
साथ न रहकर साथ।
***
सॉनेट
मीन प्यासी है अपने दरिया में
*
मीन प्यासी है अपने दरिया में
डाल दो जाल फँस ही जाएगी,
इश्क है कीच धँस भी जाएगी,
ज्यों हलाला है बीच शरीआ में।
कौन किसका हुआ है दुनिया में,
साँस अरु आस सँग ही जाएगी,
ज़िंदगी खूब आजमाएगी,
गुन ही होता नहीं है गुनिया में।
आपने खुद को नहीं जाना
आईना व्यर्थ ही सदा देखा,
टकतीं और को रही आँखें।
जान लूँ गैरों को सदा ठाना,
खुद का खुद ही किया कभी लेखा?
काट लीं खुद की खुद सभी शाखें।
२.३.२०२४
***
सॉनेट
जो चले गए; वे नहीं गए।
जो रुके रहे; वे नहीं रहे।
कहें कौन बह के नहीं बहे?
कहें कौन हैं जो सदा नए?
.
जो परे रहे; न परे हुए।
जो जुड़े; नहीं वे कभी जुड़े।
जहाँ राह पग भी वहीं मुड़े।
जो सगे बने; न सगे हुए।
.
न ही आह हो; न ही वाह हो।
नहीं गैर की परवाह हो।
प्रभु! धैर्य दे जो अथाह हो।।
.
पाथेय कुछ न गुनाह हो।
गहराई हो तो अथाह हो।
गर सलिल हो तो प्रवाह हो।।
२-३-२०२३
•••
सॉनेट
प्रार्थना
सरस्वती जी सुमति दीजिए।
अंगुलियों पर रमें रमा माँ।
शिवा शक्ति दे कृपा कीजिए।।
विधि-हरि-हर हृदय सर्वदा।।
चित्र गुप्त मस्तक में बसिए।
गोद खिलाए धरती माता।
पिता गगन हो कभी न तजिए।।
पवन सखा सम शांति प्रदाता।।
आत्म दीप कर अग्नि प्रकाशित।
रहे जीव संजीव सलिल से।
मानवता हित रहें समर्पित।।
खिलें रहें हम शत शतदल से।।
कर जोड़ें, दस दिश प्रणाम कर।
सभी सुखी हों, सबका शुभ कर।।
२-३-२०२२
•••
नवगीत
सुनो शहरियों!
*
सुनो शहरियों!
पिघल ग्लेशियर
सागर का जल उठा रहे हैं
जल्दी भागो।
माया नगरी नहीं टिकेगी
विनाश लीला नहीं रुकेगी
कोशिश पार्थ पराजित होगा
श्वास गोपिका पुन: लुटेगी
बुनो शहरियों !
अब मत सपने
खुद से खुद ही ठगा रहे हो
मत अनुरागो
संबंधों के लाक्षागृह में
कब तक खैर मनाओगे रे!
प्रतिबंधों का, अनुबंधों का
कैसे क़र्ज़ चुकाओगे रे!
उठो शहरियों !
बेढब नपने
बना-बना निज श्वास घोंटते
यह लत त्यागो
साँपिन छिप निज बच्चे सेती
झाड़ी हो या पत्थर-रेती
खेत हो रहे खेत सिसकते
इमारतों की होती खेती
धुनो शहरियों !
खुद अपना सिर
निज ख्वाबों का खून करो
सोओ, मत जागो
१५-११-२०१९
***
दोहा सलिला
माँ
*
माता के दरबार में, आत्म ज्योति तन दीप।
मुक्ता मणि माँ की कृपा, सफल साधना सीप।।
*
मैया कर इतनी कृपा, रहे सत्य का बोध।
लोभ-मोह से दूर रख, बालक भाँति अबोध।।
*
जो पाया पूरा नहीं, कम कुबेर का कोष।
मातु-कृपा बिन किस तरह, हो मन को संतोष।।
*
रचना कर संसार की, माँ लेती है पाल।
माई कब कुछ दे सका, हर शिशु है कंगाल।।
*
जननी ने जाया जिन्हें, जातक सभी समान।
जाति देश या धर्म की, जय बोलें नादान।।
*
अंब! तुम्हीं जगदंब हो, तुमसे सकल जहान।
तुम ही लय गति यति तुम्हीं, तुम ही हो रस-खान।।
*
बेबे आई ई अनो, तल्ली जीजी प्लार।
अमो अमा प्यो मोज मुम, म्ये बा इमा दुलार।।
*
बीजी ब्वे माई इया, मागो पुई युम मम।
अनो मम्ज बीबी इजू, मैडी मुम पुरनम।।
*
आमा मागो मुमा माँ, मामा उम्मा स्नेह।
थाई, माई, नु, अम्मे, अम्मी, भाभी गेह।।
*
मम्मी मदर इमा ममी, अम्मा आय सुशांत।
एमा वाहू चईजी, बाऊ मामा कांत ।।
(माँ के ६० पर्यायवाची शब्द प्रयुक्त)
***
श्रृंगार गीत
*
जीवन की बगिया में
महकाये मोगरा
पल-पल दिन आज का।
*
श्वास-श्वास महक उठे
आस-आस चहक उठे
नयनों से नयन मिलें
कर में कर बहक उठे
प्यासों की अँजुरी में
मुस्काये हरसिंगार
छिन-छिन दिन आज का।
*
रूप देख गमक उठे
चेहरा चुप चमक उठे
वाक् हो अवाक 'सलिल'
शब्द-शब्द गमक उठे
गीतों की मंजरी में
खिलखलाये पारिजात
गिन -गिन दिन आज का।
*
चुप पलाश दहक उठे
महुआ सम बहक उठे
गौरैया मन संझा
कलरव कर चहक उठे
मादक मुस्कानों में
प्रमुदित हो अमलतास
खिल-खिल दिन आज का।
***
कुंडलिया
*
थोड़ी सी मस्ती हमें, दे दे जग के नाथ।
थोड़ी सी सस्ती मिले, ठंडाई भंग साथ।।
ठंडाई भंग साथ, रंग बरसाने जाएँ।
बरसाने की लली दरस दिखलाने आएँ।।
रंग लगाने मची रहे, होड़ाहोड़ी सी।
दे दे मस्ती नाथ, हमें जग के थोड़ी सी।।
***
मुक्तक
*
आप-हम हैं साथ सुख-संतोष है
सृजन सार्थक शांति का जयघोष है
सत्य-शिव-सुंदर रचें साहित्य सब
सत्-चित्-आनंद जीवन कोष है
***
मुक्तिका
*
बेच घोड़े सोइए, अब शांति है
सत्य से मुँह मोड़िए, अब शांति है
मिल गई सत्ता, करें मनमानियाँ
द्वेष नफरत बोइए, अब शांति है
बाँसुरी ले हाथ में, घर बारिए
मार पत्थर रोइए, अब शांति है
फसल जुमलों की उगाई आपने
बोझ शक का ढोइए, अब शांति है
अंधभक्तों! आँख अपनी खोलिए
सत्य को मत खोइए, अब शांति है
हैं सभी नंगे हमामों में यहाँ
शकल अपनी धोइए, अब शांति है
शांत शोलों में छिपीं चिनगारियाँ
जिद्द नाहक छोड़िए, अब शांति है
२-३-२०२०
***
दोहा की होली
*
दीवाली में दीप हो, होली रंग-गुलाल
दोहा है बहुरूपिया, शब्दों की जयमाल
*
जड़ को हँस चेतन करे, चेतन को संजीव
जिसको दोहा रंग दे, वह न रहे निर्जीव
*
दोहा की महिमा बड़ी, कीर्ति निरुपमा जान
दोहा कांतावत लगे, होली पर रसखान
*
प्रथम चरण होली जले, दूजे पूजें लोग
रँग-गुलाल है तीसरा, चौथा गुझिया-भोग
*
दोहा होली खेलता, ले पिचकारी शिल्प
बरसाता रस-रंग हँस, साक्षी है युग-कल्प
*
दोहा गुझिया, पपडिया, रास कबीरा फाग
दोहा ढोलक-मँजीरा, यारों का अनुराग
*
दोहा रच-गा, झूम सुन, होला-होली धन्य
दोहा सम दूजा नहीं. यह है छंद अनन्य
***
होलिकोत्सव २-३-२०१८
***
विमर्श - 'गाय' और सनातन धर्म ?
कहते हैं गाय माता है, ऐसा वेद में लिखा है। गौरव की बात है! माता है तो रक्षा करें; किन्तु वेद में यह कहाँ लिखा है कि गाय सनातन धर्म है, उसकी पूजा करो ?
वेद में लिखा है कि गाय माता है तो वेद में यह भी लिखा है कि उसका पति कौन है? अथर्ववेद के नवम् काण्ड का चतुर्थ ऋषभ सुक्त है, जिसके दूसरे और चौथे मन्त्र में बैल को ''पिता वत्सानां पतिरध्यानाम्'' अर्थात गाय का पति और बछड़ों का पिता कहा गया है।
तो क्या बैल को पिता मानकर पूजना होगा? गाय को ही क्यों,
ऋग्वेद (१०/६२/३१) में पृथ्वी को माता कहा गया है।,
(१०६४/९) में जल को माता कहा गया,
(यजुर्वेद १२/७८) में ''औषधीरिती मातर:'' औषधियों को माता कहा गया, तो क्या इनको पूजने लगें ?
इसी प्रकार मानस में-
''जनु मरेसि गुर बाँभन गाई।''
(मानस २/१४६/३) इनका विशेष महत्त्त्व है, गाय का भी महत्त्त्व है। जो वस्तु विकास में सहयोगी , उसी का महत्त्व होगा।
जैसे आजकल बिजली का बड़ा महत्त्व है, राष्ट्रीय सम्पत्ति है। आविष्कारों का महत्त्व तो घटता-बढ़ता ही रहता है; किन्तु इससे कोई वस्तु धर्म नहीं हो जाती।
वेद में तो यह भी लिखा है कि अत्यन्त झूठ बोलनेवालों को, मारपीट और तोड़फोड़ करनेवाले को, घमण्डी लोगों को हे राजन! उसी प्रकार छेद डालो जैसे;
कूदने वाली गाय को लात से और हाड़ी को एड़ी से मारते हैं। (अथर्ववेद, ८/६/१७)
इसी प्रकार ऋग्वेद में है-
''रजिषठया रज्या पश्व: आ गोस्तू तूर्षति पर्यग्रं दुवस्यु''
(१०/१०१/१२)
अर्थात् जिस प्रकार सेवक गाय आदि, पशु की नाक में रस्सी लगाकर, उसे पीड़ीत करते हुए आगे ले जाता है....।
इस ऋचा में गाय को पशु कहा गया और उसके रखरखाव की एक व्यवस्था दी गई, न कि ऐसा करना कोई धर्म है।
जब श्रीलंका में भारती शान्ति सेना गयी थी तो वहाँ के लिट्टे वाले कहते- जय लंकामाता! यहाँ हम कहते हैं-भारतमाता। कहीं कहते हैं गंगामाता। अमेरिका में अमेजन नदी को पिता कहते हैं।
यह तो मनुष्यों द्वारा दी हुयी मान्यताएँ हैं। उपाधि किसी को भी मिल सकती है, जैसे मदर टेरेसा। हर पादरी को क्रिश्चियन फादर कहते हैं।
हिरोशिमा पर बम गिरा तो उसे बसाने के प्रयास में उनतीस बच्चों को जन्म देनेवाली माता को वहाँ 'मदरलैण्ड' की उपाधि से विभूषित किया गया।
अस्तु परिवर्तनशील सामाजिक व्यवस्था के बारे में कोई भी लिखा-पढ़ी हर समय के लिये उपयोगी नहीं हो सकती।
उसका पीछा करेंगे तो विकसित देशों से सैकड़ों वर्ष पीछे उसी युग में पहूँच जायेंगे।
जब मोरपंख से भोजपत्र पर लिखते थे, अरणीयों को घिस कर- दो लकड़ीयों को घिस कर आग जलाते थे, उसके संग्रह की व्यवस्था भी न थी जैसा कि महाभारत काल तक था- एक ब्राह्मण की अरणी लेकर मृग भागा तो युधिष्ठिर ने पीछा किया।
.... वैदिक काल से परावर्ती पूर्वजों की शोध को नकारना तो अन्याय है ही, धृष्टता की पराकाष्ठा भी है कि उपयोग तो हम भैंस का करें किन्तु गुण गाय के गायें;
उपयोग ट्रैक्टर का करें गीत बैलों का गायें, उर्वरकों के बिना जीवन यापन न हो किन्तु महिमा गोबर की बताएँ।
गाय के पीछे नारेबाजी करनेवाले कितने ऐसे हैं जो उन बैलो को बिठाकर खिलाते हों, जिन्हों ने आजीवन उनका खेत जोता है? शायद ही कोई बैल किसान के खूँटे पर मरता हो? वृद्ध से वृद्ध बैल को सौ-पचास रुपये में बेचनेवाले क्या अपनी बला नहीं टालते? क्या वे नहीं जानते कि लेजाने वाला इनका क्या करेगा ?
(शंका-समाधान से साभार)
# विचार अवश्य करें ।।
|| श्री परमात्मने नम: ||
>~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~<
त्रुटियों हेतु क्षमायाचना पश्चात- धर्मशास्त्र 'धर्म' का मार्ग निर्देशक प्रकाश-स्तम्भ होता है। कहीं भ्रम या भटकाव पर दिशा-निर्देश का कार्य करते हैं, के अभाव में आज हम सनातन-धर्मी इस दशा-दिशा को प्राप्त हो अपेक्षाकृत अति छोटे भूखण्ड वर्तमान 'भारत' में भी अल्पसंख्यक-बहुसंख्क के विवाद में उलझे पड़े हैं। हमारा/समाज/राष्ट्र का व्यापक हित इस में सन्निहित है कि एक सर्वमान्य धर्मशास्त्र का अनुसरण करें जबकि 'गीता' हमारा ही नहीं अपितु मानवमात्र का आदिशास्त्र है।
'गीता' आज की प्रचलित भाषा में नहीं है की हमारे समकालीन महापुरुष (तपस्वी सन्त) की अनुभवगम्य व्याख्या 'यथार्थ गीता' की २-३ आवृत्ति करें और भगवान श्रीकृष्ण के आध्यात्मिक संदेश से अवगत हों। धर्मशास्त्र के रुप में उचित सम्मान प्रदान करें 'हिन्दू' के वास्तविक सम्वर्धन की ओर कदम बढायें।
***
मुक्तिका: तुम
*
तुम कैसे जादू कर देती हो
भवन-मकां में आ, घर देती हो
*
रिश्तों के वीराने मरुथल को
मंदिर होने का वर देती हो
*
चीख-पुकार-शोर से आहत मन
मरहम, संतूरी सुर देती हो
*
खुद भूखी रह, अपनी भी रोटी
मेरी थाली में धर देती हो
*
जब खंडित होते देखा विश्वास
नव आशा निशि-वासर देती हो
*
नहीं जानतीं गीत, ग़ज़ल, नवगीत
किन्तु भाव को आखर देती हो
*
'सलिल'-साधना सफल तुम्हीं से है
पत्थर पल को निर्झर देती हो
***
श्रृंगार गीत
तुम सोईं
*
तुम सोईं तो
मुँदे नयन-कोटर में सपने
लगे खेलने।
*
अधरों पर छा
मंद-मंद मुस्कान कह रही
भोर हो गयी,
सूरज ऊगा।
पुरवैया के झोंके के संग
श्याम लटा झुक
लगी झूलने।
*
थिर पलकों के
पीछे, चंचल चितवन सोई
गिरी यवनिका,
छिपी नायिका।
भाव, छंद, रस, कथ्य समेटे
मुग्ध शायिका
लगी झूमने।
*
करवट बदली,
काल-पृष्ठ ही बदल गया ज्यों।
मिटा इबारत,
सबक आज का
नव लिखने, ले कोरा पन्ना
तजकर आलस
लगीं पलटने।
*
ले अँगड़ाई
उठ-बैठी हो, जमुहाई को
परे ठेलकर,
दृष्टि मिली, हो
सदा सुहागन, कली मोगरा
मगरमस्त लख
लगी महकने।
*
बिखरे गेसू
कर एकत्र, गोल जूड़ा धर
सर पर, आँचल
लिया ढाँक तो
गृहस्वामिन वन में महुआ सी
खिल-फूली फिर
लगी गमकने।
*
मृगनयनी को
गजगामिनी होते देखा तो
मकां बन गया
पल भर में घर।
सारे सपने, बनकर अपने
किलकारी कर
लगे खेलने।
२-३-२०१६
***
श्रृंगार गीत:
.
खफ़ा रहूँ तो
प्यार करोगे
यह कैसा दस्तूर है ?
प्यार करूँ तो
नाजो-अदा पर
मरना भी मंज़ूर है.
.
आते-जाते रंग देखता
चेहरे के
चुप-दंग हो.
कब कबीर ने यह चाहा
तुम उसे देख
यूं तंग हो?
गंद समेटी सिर्फ इसलिए
प्रिय! तुम
निर्मल गंग हो
सोचा न पाया पल आयेगा
तुम्हीं नहीं
जब सँग हो.
होली हो ली
अब क्या होगी?
भग्न आस-सन्तूर है.
खफ़ा रहूँ तो
प्यार करोगे
यह कैसा दस्तूर है ?
प्यार करूँ तो
नाजो-अदा पर
मरना भी मंज़ूर है.
.
फाग-राग का रिश्ता-नाता
कब-किसने
पहचाना है?
द्वेष-घृणा की त्याज्य सियासत
की होली
धधकाना है.
जड़ जमीन में जमा जुड़ सकें
खेत-गाँव
सरसाना है.
लोकनीति की रंग-पिचकारी
संसद में
भिजवाना है.
होली होती
दिखे न जिसको
आँखें रहते सूर है.
खफ़ा रहूँ तो
प्यार करोगे
यह कैसा दस्तूर है ?
प्यार करूँ तो
नाजो-अदा पर
मरना भी मंज़ूर है.
२.३.२०१५
***
मुक्तिका:
रूह से...
*
रूह से रू-ब-रू अगर होते.
इस तरह टूटते न घर होते..
आइना देखकर खुशी होती.
हौसले गर जवां निडर होते..
आसमां झुक सलाम भी करता.
हौसलों को मिले जो पर होते..
बात बोले बिना सुनी जाती.
दिल से निकले हुए जो स्वर होते..
होते इंसान जो 'सलिल' सच्चे.
आह में भी लिए असर होते..
२.३.२०१३
***

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026

फरवरी ५, सरस्वती, पूर्णिका, मुक्तक, गजल, सॉनेट, नयन, रामा छंद, सोरठा, दोहा, गीत, माहिया, यमक, बसंत,

सलिल सृजन फरवरी ५

पूर्णिका 

ना मिली है जगह, ना छिनी है जगह

क्यों कशमकश यहाँ, फँस गए बेवजह 

कोशिशों का सिला, मंज़िलें पा मिला 

मुश्किलों को हरा, पा रहे हैं फतह

ईद आई, न बकरा हमें जानना 

खूब कोशिश करो, पर न हों हम जिबह 

जड़ जमीं में जमीं, हम न फिसलें कभी 

लाख चिकनी करो, तुम भले ही सतह 

हो तरहदार तुम, दिल से माना 'सलिल'  

दो न दिल, लो न दिल, दें तरह किस तरह       

000  

मुक्तक

बह्र- 1222 1222 122

जहाँ तुम हो, वहाँ हम हमकदम हैं

जहाँ अपने, वहाँ हम ही सपन हैं।

किसे कब कौन चाहे या न चाहे-

जहाँ फन हैं, वहाँ ही अंजुमन हैं ।।

५.२.२०२६

०००

कार्य शाला 
दो कवि एक कुण्डलिया
जन्म दिवस की मंगल कामना। आप शतायु हों और स्वास्थ्य-मस्त रहिए। 

प्रत्यूषा उठ, पूर्व के, खोले बंद किवाड़।
सोते को हर दिन रहा, सूरज प्रहरी ताड़। -राजकुमार महोबिया

सूरज प्रहरी ताड़, कह रहा है उड़ान भर।
पूरे कर अरमान, आसमां झट करले सर।।
राजकुमारों! उठो, खोल श्रम की मंजूषा।
हो जाओ संजीव, जगाती है प्रत्यूषा।। - संजीव
•••
दोहा सलिला

ज्यों का त्यों संजय कहे, करे न निंदा-वाह।
मौन सुने धृतराष्ट्र फिर, मुँह से निकले आह।।
दृष्टिकोण हो रुकावट, तब करिए बदलाव।
हों न निगेटिव, पॉजिटिव बनकर पाएँ वाह।।
किसे प्राथमिकता मिले, किसे रखेंगे बाद।
पहले तय कर लीजिए, समय न कर बर्बाद।।
अग्र वाल पर जो रहे, उसे सराहें आप।
कर न आय का वाह पर, सदा सदय हो आप।।
•••
प्रसंग
सोरठा गजल
है प्रसंग मकबूल, अमर नयन अभियान।
करते सभी कुबूल,आस श्वास की शान।।
रुही हो संजीव, सत-शिव-सुंदर गान।
शब्द-शब्द राजीव, गीत-गजल रस-खान
होकर संत बसंत, बन जाता रहमान।
मिलें कामिनी-कंत, तृप्त करें रस-पान।।
दुर्गा सिंह आसीन, हरे अशिव अभिमान।
नत सिर कह आमीन, हो आकाश समान।।
करते रहें विनोद, सतत सृजन पहचान।
नेह-नर्मदा ओद, जबलपूर की शान।।
किसलय अगर प्रवीण, हो तरुवर गुणवान।
शुभ आलोक न क्षीण, अंबर भू महमान।।
हो चिर तरुण प्रसंग, मिले कीर्ति यश मान।
नित नव सृजन अभंग, सलिल-धार सम ठान।।
मकबूल = सर्वप्रिय, रुही = आत्मावान,
संजीव = प्राणवान,रहमान = कृपालु,
आमीन = ऐसा ही हो, ओद = पौधे की कलम,
•••
विमर्श
*
किस पौधे में बिना फूल के फल लगते हैं?

वनस्पति विज्ञान के संदर्भ में, परिजात को 'ऐडानसोनिया डिजिटाटा' के नाम से जाना जाता है, तथा इसे एक विशेष श्रेणी में रखा गया है, क्योंकि यह अपने फल या उसके बीज का उत्पादन नहीं करता है, और न ही इसकी शाखा की कलम से एक दूसरा परिजात वृक्ष पुन: उत्पन्न किया जा सकता है। अंजीर ऐसा पेड़ है जिस पर फल आते हैं फूल नहीं। अफ्रीका में विटीशिया नामक वृक्ष में बिना फूल के ही फल लगते हैं।
•••
दो नयन दो सॉनेट दो शैली
१.
नयन अबोले सत्य बोलते
नयन असत्य देख मुँद जाते
नयन मीत पा प्रीत घोलते
नयन निकट प्रिय पा खुल जाते


नयन नयन में रच-बस जाते
नयन नयन में आग लगाते
नयन नयन में धँस-फँस जाते
नयन नयन को नहीं सुहाते


नयन नयन-छवि हृदय बसाते
नयन फेरकर नयन भुलाते
नयन नयन से नयन चुराते
नयन नयन को नयन दिखाते


नयन नयन को जगत दिखाते
नयन नयन सँग रास रचाते
(इंग्लिश शैली)
•••
सॉनेट
नयन
नयन खुले जग जन्म हुआ झट
नयन खोजते नयन दोपहर
नयन सजाए स्वप्न साँझ हर
नयन विदाई मुँदे नयन पट
नयन मिले तो पूछा परिचय
नयन झुके लज बात बन गई
नयन उठे सँग सपने कई कई
नयन नयन में बसे मिटा भय


नयन आईना देखें सँवरे
नयन आई ना कह अकुलाए
नयन नयन को भुज में भरे
नय न नयन तज, सकुँचे-सिहरे
नयन वर्जना सुनें न, बहरे
नयन न रोके रुके, न ठहरे
(इटैलियन शैली)
●●●

सोरठा सलिला
उसे नमन कर मौन, जो अपना मन जीत ले।
छिपा आपमें कौन?, निज मन से यह पूछिए।।
*
जब हो कन्यादान, नारी पाती दो जगत।
भले न हो वर-दान, पा-देती वरदान वह।।
*
उछल छुएँ आकाश, अब बैसाखी छोड़कर।
वे जो रहें हताश, गिर उठ फिर बढ़ते नहीं।।
*
'जो घर में बेकार, सब रद्दी सामान दें।'
गृहणी कहे पुकार, 'फिर आना, बाहर गए'।।
*
भू से नभ पर रोज, चंद्र-कांता कूदती।
हो इसकी कुछ खोज, हिम्मत लाती कहाँ से।।
वचन दोष-
तुम हो मेरे साथ, नेता बोले भीड़ से, ।
रखें हाथ में हाथ, हम यह वादा कर रहे।।
***
सॉनेट
सुरेश पाल वर्मा
*
बहुमुखी प्रतिभा के हैं धनी
मेहनत करें सतत हैं धुनी
मंज़िल से मित्रता है घनी
सपनों की चादर नव बुनी
है सुरेश पर्याय जसाला
मन का मनका मन से फेरा
वर्ण पिरामिड गूँथी माला
शारद मैया को नित टेरा
छंद नए रच; करी साधना
छंद सिखा नव दीप जलाए
प्रसरित पल-पल पुण्य भावना
बालारुण शत शत मुस्काए
गगन छुए तव कीर्ति पताका
तुम सा हुआ न दूजा बाँका
५-२-२०२३
***
शारद वंदन
*
शारद मैया शस्त्र उठाओ,
हंस छोड़ सिंह पर सज आओ...
.
सीमा पर दुश्मन आया है, ले हथियार रहा ललकार।
वीणा पर हो राग भैरवी, भैरव जाग भरें हुंकार।।
रुद्र बने हर सैनिक अपना, चौंसठ योगिनी खप्पर ले।
पिएँ शत्रु का रक्त तृप्त हो, गुँजा जयघोषों से जग दें।।
नव दुर्गे! सैनिक बन जाओ
शारद मैया! शस्त्र उठाओ...
.
एक वार दो को मारे फिर, मरे तीसरा दहशत से।
दुनिया को लड़ मुक्त कराओ, चीनी दनुजों के भय से।।
जाप महामृत्युंजय का कर, हस्त सुमिरनी हाे अविचल।
शंखघोष कर वक्ष चीर दो, भूलुंठित हों अरि के दल।।
रणचंडी दस दिश थर्राओ,
शारद मैया शस्त्र उठाओ...
.
कोरोना दाता यह राक्षस,मानवता का शत्रु बना।
हिमगिरि पर अब शांति-शत्रु संग, शांति-सुतों का समर ठना।।
भरत कनिष्क समुद्रगुप्त दुर्गा राणा लछमीबाई।
चेन्नम्मा ललिता हमीद सेंखों सा शौर्य जगा माई।।
घुस दुश्मन के किले ढहाओ,
शारद मैया! शस्त्र उठाओ...
***
शारद! अमृत रस बरसा दे।
हैं स्वतंत्र अनुभूति करा दे।।
*
मैं-तू में बँट हम करें, तू तू मैं मैं रोज।
सद्भावों की लाश पर, फूट गिद्ध का भोज।।
है पर-तंत्र स्व-तंत्र बना दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
*
अमर शहीदों को भूले हम, कर आपस में जंग।
बिस्मिल-भगत-दत्त आहत हैं, दुर्गा भाभी दंग।।
हैं आजाद प्रतीति करा दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
*
प्रजातंत्र में प्रजा पर, हावी होकर तंत्र।
छीन रहा अधिकार नित, भुला फर्ज का मंत्र।।
दीन-हीन को सुखी बना दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
*
ज॔गल-पर्वत-सरोवर, पल पल करते नष्ट।
कहते हुआ विकास है, जन प्रतिनिधि हो भ्रष्ट।।
जन गण मन को इष्ट बना दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
*
शोक लोक का बढ़ रहा, लोकतंत्र है मूक।
सारमेय दलतंत्र के, रहे लोक पर भूँक।।
दलदल दल का मातु मिटा दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
*
'गण' पर 'गन' का निशाना, साधे सत्ता हाय।
जन भाषा है उपेक्षित, पर-भाषा मन भाय।।
मैया! हिंदी हृदय बसा दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
*
जन की रोटी छिन रही, तन से घटते वस्त्र।
मन आहत है राम का, सीता है संत्रस्त।।
अस्त नवाशा सूर्य उगा दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
*
रोजी-रोटी छीनकर, कोठी तानें सेठ।
अफसर-नेता घूस लें, नित न भर रहा पेट।।
माँ! मँहगाई-टैक्स घटा दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
*
जिए आखिरी आदमी, श्रम का पाए दाम।
ऊषा गाए प्रभाती, संध्या लगे ललाम।।
रात दिखाकर स्वप्न सुला दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
***
कृति चर्चा
'चुनिंदा हिंदी गज़लें' संग्रहणीय संकलन
*
[कृति विवरण : चुनिंदा हिंदी गज़लें, संपादक डॉ. रोहिताश्व अस्थाना, आकार डिमाई, आवरण सजिल्द बहुरंगी जैकेट सहित, पृष्ठ १८४, मूल्य ५९५/-, प्रकाशक - ज्ञानधारा पब्लिकेशन, २६/५४ गली ११, विश्वास नगर, शाहदरा, दिल्ली ११००३२]
*
विश्ववाणी हिंदी की काव्य परंपरा लोक भाषाओँ प्राकृत, अपभृंश और संस्कृत से रस ग्रहण करती है। द्विपदिक छंद रचना के विविध रूपों को प्रकृत-अपभृंश साहित्य में सहज ही देखा जा सकता है। संस्कृत श्लोक-परंपरा में भिन्न पदभार और भिन्न तुकांत प्रयोग किए गए हैं तो दोहा, चौपाई, सोरठा आदि में समभारिक-संतुकांती पंक्तियों का प्रयोग किया जाता रहा है। द्विपदिक छंद की समतुकान्तिक एक अतिरिक्त आवृत्ति ने चतुष्पदिक छंद का रूप ग्रहण किया जिसे मुक्तक कहा गया। मुक्तक की तीसरी पंक्ति को भिन्न तुकांत किन्तु समान पदभार के साथ प्रयोग से चारुत्व वृद्धि हुई। भारतीय भाषा साहित्य अरब और फारस गया तो भारतीय लयखण्डों के फारसी रूपान्तरण को 'बह्र' कहा गया। मुक्तक की तीसरी और चौथी पंक्ति की तरह अन्य पंक्तियाँ जोड़कर रची गयी अपेक्षाकृत लंबी काव्य रचनाओं को 'ग़ज़ल' कहा गया। भारत में लोककाव्य में यह प्रयोग होता रहा किन्तु भद्रजगत ने इसकी अनदेखी की। मुग़ल आक्रांताओं के विजयी होकर सत्तासीन होनेपर उनकी अरबी-फारसी भाषाओं और भारतीय सीमंती भाषाओँ का मिश्रण लश्करी, रेख़्ता, उर्दू के रूप में प्रचलित हुआ। लगभग २००० वर्ष पूर्व 'तश्बीब' (लघु प्रणय गीत), 'ग़ज़ाला-चश्म' (मृगनयनी से वार्तालाप) या 'कसीदा' (प्रेयसी प्रशंसा के गीत) के रूप में प्रचलित हुई ग़ज़ल भारत में आने पर सूफ़ी रंगत में रंगने के साथ-साथ, क्रांति के आह्वान-गान और सामाजिक परिवर्तनों की वाहक बन गई। अरबी ग़ज़ल का यह भारतीय रूपांतरण ही हिंदी ग़ज़ल का मूल है।
डॉ. रोहिताश्व अस्थाना हिंदी ग़ज़ल के प्रथम शोधार्थी ही नहीं उसके संवर्धक भी हैं। कबीर, खुसरो, वली औरंगाबादी, ज़फ़र, ग़ालिब, रसा, बिस्मिल, अशफ़ाक़, सामी, नादां, साहिर, अर्श, फैज़, मज़ाज़, जोश, नज़रुल, नूर, फ़िराक, मज़हर, शकील, केशव, अख्तर, कैफ़ी, जिगर, सौदा, तांबा, चकबस्त, दाग़, हाली, इक़बाल, ज़ौक़, क़तील, रंग, अंचल, नईम, फ़ुग़ाँ, फ़ानी, निज़ाम, नज़ीर, राही, बेकल, नीरज, दुष्यंत, विराट, बशीर बद्र, अश्क, साज, शांत, यति, परवीन हक़, प्रसाद, निराला, दिनकर, कुंवर बेचैन, अंबर, अनंत, अंजुम, सलिल, सागर मीरजापुरी, बेदिल, मधुकर, राजेंद्र वर्मा, समीप, हस्ती, आदि सहस्त्राधिक हिंदी ग़ज़लकारों ने हिंदी ग़ज़ल को समृद्ध-संपन्न करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी।
डॉ. रोहिताश्व अस्थाना ने हिंदी ग़ज़ल को लेकर शोध ग्रन्थ 'हिंदी ग़ज़ल : उद्भव और विकास', व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह 'बांसुरी विस्मित है', हिंदी ग़ज़ल पंचदशी संकलन श्रृंखला आदि के पश्चात् 'चुनिंदा हिंदी गज़लें' के समापदं का सराहनीय कार्य किया है। इस पठनीय, संग्रहणीय संकलन में ४४ ग़ज़लकारों की ४-४ ग़ज़लें संकलित की गयी हैं। डॉ, अस्थाना के अनुसार "मैं आश्वस्त हूँ कि संकलित कवि अथवा गज़लकार किसी मिथ्याडंबर अथवा अहंकार से मुक्त होकर निस्वार्थ भाव से हिंदी ग़ज़ल के क्षेत्र में साधनारत हैं।'' इस संकलन में वर्णमाला क्रमानुसार अजय प्रसून, अनिरुद्ध सिन्हा, अशोक आलोक, अशोक 'अंजुम', अशोक 'मिज़ाज', ओंकार 'गुलशन, उर्मिलेश, किशन स्वरूप, सजल, कृष्ण सुकुमार, कौसर साहिरी, ख़याल खन्ना, गिरिजा मिश्रा, नीरज, विराट, चाँद शेरी, पथिक, वियजय, नलिन, याद राम शर्मा, महर्षि, रोहिताश्व, विकल सकती, निर्मम, श्याम, अंबर, बिस्मिल, विशाल, संजीव 'सलिल', मुहसिन, हस्ती, वहां, प्रजापति, विनम्र, दिनेश रस्तोगी, दिनेश सिंदल, दीपक, राकेश चक्र, विद्यासागर वर्मा, सत्य, भगत, मिलान, अडिग, रऊफ परवेज की सहभागिता है। ग़ज़लकारों के वरिष्ठ और कनिष्ठ दोनों ही हैं। ग़ज़लकारों और ग़ज़लों का चयन करने में रोहिताश्व जी विषय वैविध्य और शिल्प वैविध्य में संतुलन स्थापित कर संकलन की गुणवत्ता बनाए रखने में सफल हैं।
डॉ. अजय प्रसून 'हर कोई अपनी रक्षा को व्याकुल है' कहकर असुरक्षा की जन भावना को सामने लाते हैं। अनिरुद्ध सिन्हा 'दर्द अपना छिपा लिया उसने' कहकर आत्मगोपन की सहज मानवीय प्रवृत्ति का उल्लेख करते हैं। 'सच बयानी धुंआ धुंआ ही सही' - अशोक अंजुम, धीरे-धीरे शोर सन्नाटों में गुम हो जायेगा' - मिज़ाज, अपने कदमों पे खड़े होने के काबिल हो जा - उर्मिलेश, अंधियारे ने सूरज की अगवानी की - किशन स्वरूप, आँसू पीकर व्रत तोड़े हैं - गिरिजा मिश्रा, बढ़ता था रोज जिस्म मगर घाट रही थी उम्र - नीरज, कालिख है कोठरी की लगेगी अवश्य ही - विराट, शहर के हिन्दोस्तां से कुछ अलग / गाँव का हिन्दोस्तां है और हम - महर्षि, राहत के दो दिन दे रब्बा - श्याम, सुविधा से परिणय मत करना -अंबर, रिश्तों की कब्रों पर मिटटी मत डालो - विशाल, छोड़ चलभाष प्रिय! / खत-किताबत करो -संजीव 'सलिल', सच है लहूलुहान अगर झूठ है तो बोल - हस्ती, सर उठाकर न जमीन पर चलिए - वहम, सुख मिथ्या आश्वासन जैसा - विनम्र, रोज ही होता मरण है - राकेश चक्र, एक सागर नदी में रहता है - मिलन, घर में पूजा करो, नमाज पढ़ो - रऊफ परवेज़ आदि हिंदी जगत के सम सामायिक परिवेश की विसंगतियों, विडंबनाओं, अपेक्षाओं, आशंकाओं आदि को पूरी शिद्दत से उद्घाटित करते हैं।
डॉ. अस्थाना ने रचना-चयन करते समय पारंपरिकता पर अधुनातन प्रयोगधर्मिता को वरीयता ठीक ही दी है। इससे संकलन सहज ग्राह्य और विचारणीय बन सका है। हर दिन प्रकाशित हो रहे सामूहिक संकलनों की भीड़ में यह संकलन अपनी पृथक पहचान स्थापित करने में सफल है। आकर्षक आवरण, त्रुटिहीन मुद्रण, स्तरीय रचनाएँ इसे 'सोने में सुहागा' की तरह पाठकों में लोकप्रिय और शोधार्थियों के लिए उपयोगी सिद्ध करेगी।
*
संपर्क - विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, वॉट्सऐप ९४२५१८३२४४
***
सॉनेट
शीत
पलट शीत फिर फिर है आती।
सखी! चुनावी नेता जैसे।
रँभा रहीं पगुराती भैंसे।।
यह क्यों बे मौसम टर्राती।।
कँपा रही है हाड़-माँस तक।
छुड़ा रही छक्के, छक्का जड़।
खड़ी द्वार पर, बन छक्का अड़।।
जमी जा रही हाय श्वास तक।।
सूरज ओढ़े मेघ रजाई।
उषा नवेली नार सुहाई।
रिसा रही वसुधा महताई।।
पाला से पाला है दैया।
लिपटे-चिपटे सजनी-सैंया।
लल्ला मचले लै लै कैंया।।
५-२-२०२२
•••
गीत
छंद - दोहा
पदभार- २४।
यति - १३-११।
पदांत - लघु गुरु।
*
तू चंदा मैं चाँदनी, तेरी-मेरी प्रीत।
युगों-युगों तक रहेगी, अमर रचें कवि गीत।।
*
सपना पाला भगा दें
हम जग से तम दूर।
लोक हितों की माँग हो,
सहिष्णुता सिंदूर।।
अनगिन तारागण बनें,
नभ के श्रमिक-किसान।
श्रम-सीकर वर्षा बने, कोशिश बीज पुनीत।
चल हम चंदा-चाँदनी, रचें अनश्वर रीत।।
*
काम अकाम-सकाम वर,
बन पाएँ निष्काम।
श्वासें अल्प विराम हों,
आसें अर्ध विराम।।
पूर्ण विराम अनाम हो, छोड़ें हम नव नीत।
श्री वास्तव में पा सकें, मन हारें मन जीत।।
*
अमल विमल निर्मल सलिल, छप्-छपाक् संजीव।
शैशव वर वार्धक्य में, हो जाएँ राजीव।।
भू-नभ की कुड़माई हो, भावी बने अतीत।
कलरव-कलकल अमर हो, बन सत स्वर संगीत।।
५-२-२०२१
***
सोरठा गीत
पदभार- २४।
यति - १३-११।
पदांत - लघु गुरु।
*
तेरी-मेरी प्रीत, युगों-युगों तक रहेगी।
अमर रचें कवि गीत, तू चंदा मैं चाँदनी।।
*
कर जग से तम दूर, हम मिल पाला भगा दें।
सहिष्णुता सिंदूर, लोक हितों की माँग हो।।
नभ के श्रमिक-किसान, अनगिन तारागण बनें।
कोशिश बीज पुनीत, श्रम-सीकर वर्षा बने।
रचें अनश्वर रीत, चल हम चंदा-चाँदनी।।
*
बन पाएँ निष्काम, काम अकाम-सकाम वर।
आसें अर्ध विराम, श्वासें अल्प विराम हों।।
रच दें हम नव नीत, पूर्ण विराम अनाम हो।
मन हारें मन जीत, श्री वास्तव में पा सकें।।
*
छप्-छपाक् संजीव, विमल निर्मल सलिल।
हो जाएँ राजीव, शैशव वर वार्धक्य में।।
भावी बने अतीत, भू-नभ की कुड़माई हो।
बन सत स्वर संगीत, कलरव-कलकल अमर हो।।
५-२-२०२१
***

प्रार्थना
छंद मुक्तक
*
अजर अमर माँ शारद जय जय।
आस पूर्ण कर करिए निर्भय।।
इस मन में विश्वास अचल हो।
ईश कृपा प्रति श्रद्धा अक्षय।।
उमड़ उजाला सब तम हर ले।
ऊसर ऊपर सलिल प्रचुर दे।।
एक जननि संतान अगिन हम
ऐक्य भाव पथ, माँ! अक्षर दे।।
ओसारे चहके गौरेया।
और रँभाए घर घर गैया।
अंकुर अंबर छू ले बढ़कर
अः हँसे सँग बहिना-भैया।।
क्षणभंगुर हों शंका संशय।
त्रस्त रहे बाधा, शुभ की जय।
ज्ञान मिले सत्य-शिव-सुंदर का
ऋद्धि-सिद्धि दो मैया जय जय।।
*
५-२-२०१०
***
सामयिक माहिया
*
त्रिपदिक छंद।
मात्रा भार - १२-१०-१२।
*
भारत के बेटे हैं
किस्मत के मारे
सड़कों पर बैठे हैं।
*
गद्दार नहीं बोलो
विवश किसानों को
नेता खुद को तोलो।
*
मत करो गुमान सुनो,
अहंकार छोड़ो,
जो कहें किसान सुनो।
*
है कुछ दिन की सत्ता,
नेता सेवक है
है मालिक मतदाता।
*
मत करना मनमानी,
झुक कर लो बातें,
टकराना नादानी।
*
सब जनता सोच रही
खिसियानी बिल्ली
अब खंबा नोच रही।
*
कितनों को रोकोगे?
पूरी दिल्ली में
क्या कीले ठोंकोगे?
*
जनमत मत ठुकराओ
रूठी यदि जनता
कह देगी घर जाओ।
*
फिर है चुनाव आना
अड़े रहे यूँ ही
निश्चित फिर पछताना।
५-२-२०२१
***
दोहा सलिला अब बैसाखी छोड़कर, उछल छुएं आकाश।
चल गिर उठ बढ़ते नहीं, जो वे रहें हताश।।
*
चंद्र कांता कूदती, भू से नभ पर रोज।
हिम्मत लाती कहाँ से, हो इसकी कुछ खोज।।
***
विमर्श
वचन दोष-
उदाहरण:
नेता बोले भीड़ से,
तुम हो मेरे साथ।
हम यह वादा कर रहे,
रखें हाथ में हाथ।।
टीप- नेता एकवचन, बोले बहुवचन, भीड़ बहुवचन, तुम एकवचन, हम बहुवचन।
*
छाया सक्सेना जबलपुर- वचन दोष का सटीक उदाहरण देकर आपने हम सभी को लाभान्वित किया।
नेता कहते भीड़ से, रखें हाथ में हाथ।
हम ये वादा कर रहे, सब हो मेरे साथ ।।
क्या यह ठीक है?
संजीव वर्मा 'सलिल'

नेता बोला भीड़ से, तुम सब मेरे साथ।
मैं यह वादा कर रहा, रखो हाथ में हाथ।।
बीनू भटनागर दिल्ली- बोले आदर सूचक भी तो है , इसलिये ग़लत नहीं है। भीड़ शब्द एकवचन की तरह प्रयोग होता है। 'हम' बहुवचन होता है पर बहुत अधिक लोग उत्तर प्रदेश में इसे एकवचन की तरह प्रयोग करते हैं।
संजीव वर्मा 'सलिल'

अब बैसाखी छोड़कर, उछल छुएँ आकाश।
चल गिर उठ बढ़ते नहीं, जो वे रहें हताश।।
अवनीश तिवारी

संजीव जी, प्रणाम। कभी कभी सम्मान सूचक के रूप में एक वचन संज्ञा के साथ बहुवचन क्रिया उपयोग करते हैं। जैसे यहाँ 'नेता' और 'बोले'।
क्या यह सही नही ?
संजीव वर्मा 'सलिल'- ऐसे तर्क हर अंचल में दिए जाते हैं। बिहार में कारक और क्रिया में भिन्नता होती है। मानक हिंदी को उन्हें अपवाद मान अनदेखी कर बढ़ना ही है।

बीनू भटनागर, दिल्ली- लेकिन हिन्दी में इंगलिश की तरह collective noun को एक वचन नहीं माना जाता क्या? जैसे भीड़! आदर सूचक के लिये तो मानक हिंदी क्रिया में बहुवचन लगाना ही सही मानती है। एक और जिज्ञासा कि नेता का बहुवचन क्या होगा? "नेता हमेशा झूठ बोलते है।" इस वाक्य में नेता बहुवचन के रूप में सही नहीं है? यदि ग़लत है तो सही क्या है? 'हम'को एकवचन में प्रयोग करना तो मानक हिन्दी के हिसाब से ग़लत है, आंचलिक भाषा का प्रयोग है।
काव्य में क्या आंचलिक भाषा का प्रयोग वर्जित है?
संजीव वर्मा 'सलिल'- काव्य में आंचलिक भाषा का प्रयोग वर्जित नहीं है। वह रचनाकार की शैलीगत विशेषता है। जाना व्याकरण का प्रश्न हो वहाँ उसे मानक नहीं कहा जाएगा।
***
कार्यशाला
दोहे पर दोहे
'सब रद्दी सामान दें, जो घर में बेकार।'
'फिर आना, बाहर गए,' गृहणी कहे पुकार।।
- दर्शन बेजा़र, आगरा

ना पति रद्दी ना कभी पत्नी रद्दी होय-
बृद्धावस्था में यही रह पाते संग दोय।।
रह पाते संग दोय, शिथिल जब तन हो जाये-
ज्यादा तर को छोड़ पुत्र अमरीका जाये।।
बात सलिल"बेज़ार" हो रही संस्कार क्षति-
रद्दी होते नहीं कभी पत्नी या ना पति।।
बहुत सुंदर वक्रोक्ति सलिल जी , अद्भुत प्रयोग
- संजीव वर्मा 'सलिल'
क्या रहते हैं यहां ही, शायर श्री बेजा़र?
गृहस्वामिन ने आ कहा, मैं भी हूँ बेजा़र।।
- मनोरमा सक्सेना, गुड़गाँव
संस्कार ,संस्कृति सुखद भूल गए परिवार ।
घर के बूढ़े हो गए ज्यूँ रद्दी अखबार।।
-जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर
वंदन करता हूँ सखे, वक्रोक्ति मे प्यार ।
चुहल चाल से ही खुशी, रहता यह संसार ।
५.२.२०१८
गले मिले दोहा-यमक
*
नारी पाती दो जगत, जब हो कन्यादान
पाती है वरदान वह, भले न हो वर-दान
*
दिल न मिलाये रह गए, मात्र मिलकर हाथ
दिल ने दिल के साथ रह, नहीं निभाया साथ
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निर्जल रहने की व्यथा, जान सकेगा कौन?
चंद्र नयन-जल दे रहा, चंद्र देखता मौन
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खोद-खोदकर थका जब, तब सच पाया जान
खो देगा ईमान जब, खोदेगा ईमान
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कौन किसी का सगा है, सब मतलब के मीत
हार न चाहें- हार ही, पाते जब हो जीत
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निकट न होकर निकट हैं, दूर न होकर दूर
चूर न मद से छोर हैं, सूर न हो हैं सूर
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इस असार संसार में, खोज रहा है सार
तार जोड़ता बात का, डिजिटल युग बे-तार
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५-२-२०१७
बाल गीत:
"कितने अच्छे लगते हो तुम "
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कितने अच्छे लगते हो तुम |
बिना जगाये जगते हो तुम ||
नहीं किसी को ठगते हो तुम |
सदा प्रेम में पगते हो तुम ||
दाना-चुग्गा चुगते हो तुम |
चूँ-चूँ-चूँ-चूँ करते हो तुम ||
आलस कैसे तजते हो तुम?
क्या प्रभु को भी भजते हो तुम?
चिड़िया माँ पा नचते हो तुम |
बिल्ली से डर बचते हो तुम ||
क्या माला भी जपते हो तुम?
शीत लगे तो कँपते हो तुम?
सुना न मैंने हँसते हो तुम |
चूजे भाई! रुचते हो तुम |
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बासंती दोहा ग़ज़ल:
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स्वागत में ऋतुराज के, पुष्पित हैं कचनार
किंशुक कुसुम दहक रहे, या दहके अंगार?
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पर्ण-पर्ण पर छा गया, मादक रूप निखार
पवन खो रहा होश निज, लख वनश्री-श्रृंगार
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महुआ महका देखकर, चहका-बहका प्यार
मधुशाला में बिन पिये, सिर पर नशा सवार
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नहीं निशाना चूकती, पञ्चशरों की मार
पनघट-पनघट हो रहा, इंगित का व्यापार
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नैन मिले लड़ झुक उठे, करने को इंकार
देख नैन में बिम्ब निज, कर बैठे इकरार
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मैं-तुम, यह-वह ही नहीं, बौराया संसार
सब पर बासंती नशा, मिल लें गले खुमार
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ढोलक, टिमकी, मंजीरा, करें ठुमक इसरार
दुनियावी चिंता भुला, नाचो-झूमो यार
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घर आँगन तन धो दिया, तन का रूप निखार
अंतर्मन का मेल भी, प्रियवर! कभी बुहार।
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बासंती दोहा-गज़ल, मन्मथ की मनुहार
सीरत-सूरत रख 'सलिल', निर्मल सहज सँवार
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छंद सलिला:
रामा छंद
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(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, एकावली, कीर्ति, घनाक्षरी, छवि, तांडव, तोमर, दीप, दोधक, निधि, प्रेमा, मधुभार, रामा, माला, लीला, वाणी, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शिव, शुभगति, सार, सुगति, सुजान, हंसी)
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रामा छंद में माला छंद के सर्वथा विपरीत प्रथम पद में दो चरण इंद्र वज्रा छंद के तथा द्वितीय पद में उपेन्द्र वज्रा छंद के दो चरण होते हैं.
उदाहरण:
१. पूजा उसे ही हमने हमेशा, रामा हमारा सबका सहारा
उसे सभी की रहती सदा ही, फ़िक्र न भूले वह देव प्यारा
२. कैसे बहलायें परदेश में जो, भाई हमारे रहने गये हैं
कहीं रहें वे हमको न भूलें, बसे हमारे दिल में वही हैं
३. कोई नहीं है अपना-पराया, जैसा जहाँ जो सब है तुम्हारा
तुम्हें मनायें दिन-रात देवा!, हमें न मोहे भ्रम-मोह-माया
५-२-२०१४
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एक दोहा
जो निज मन को जीत ले, उसे नमन कर मौन.
निज मन से यह पूछिए, छिपा आपमें कौन?
५.२.२०१०

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