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गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026

फरवरी ५, सरस्वती, पूर्णिका, मुक्तक, गजल, सॉनेट, नयन, रामा छंद, सोरठा, दोहा, गीत, माहिया, यमक, बसंत,

सलिल सृजन फरवरी ५

पूर्णिका 

ना मिली है जगह, ना छिनी है जगह

क्यों कशमकश यहाँ, फँस गए बेवजह 

कोशिशों का सिला, मंज़िलें पा मिला 

मुश्किलों को हरा, पा रहे हैं फतह

ईद आई, न बकरा हमें जानना 

खूब कोशिश करो, पर न हों हम जिबह 

जड़ जमीं में जमीं, हम न फिसलें कभी 

लाख चिकनी करो, तुम भले ही सतह 

हो तरहदार तुम, दिल से माना 'सलिल'  

दो न दिल, लो न दिल, दें तरह किस तरह       

000  

मुक्तक

बह्र- 1222 1222 122

जहाँ तुम हो, वहाँ हम हमकदम हैं

जहाँ अपने, वहाँ हम ही सपन हैं।

किसे कब कौन चाहे या न चाहे-

जहाँ फन हैं, वहाँ ही अंजुमन हैं ।।

५.२.२०२६

०००

कार्य शाला 
दो कवि एक कुण्डलिया
जन्म दिवस की मंगल कामना। आप शतायु हों और स्वास्थ्य-मस्त रहिए। 

प्रत्यूषा उठ, पूर्व के, खोले बंद किवाड़।
सोते को हर दिन रहा, सूरज प्रहरी ताड़। -राजकुमार महोबिया

सूरज प्रहरी ताड़, कह रहा है उड़ान भर।
पूरे कर अरमान, आसमां झट करले सर।।
राजकुमारों! उठो, खोल श्रम की मंजूषा।
हो जाओ संजीव, जगाती है प्रत्यूषा।। - संजीव
•••
दोहा सलिला

ज्यों का त्यों संजय कहे, करे न निंदा-वाह।
मौन सुने धृतराष्ट्र फिर, मुँह से निकले आह।।
दृष्टिकोण हो रुकावट, तब करिए बदलाव।
हों न निगेटिव, पॉजिटिव बनकर पाएँ वाह।।
किसे प्राथमिकता मिले, किसे रखेंगे बाद।
पहले तय कर लीजिए, समय न कर बर्बाद।।
अग्र वाल पर जो रहे, उसे सराहें आप।
कर न आय का वाह पर, सदा सदय हो आप।।
•••
प्रसंग
सोरठा गजल
है प्रसंग मकबूल, अमर नयन अभियान।
करते सभी कुबूल,आस श्वास की शान।।
रुही हो संजीव, सत-शिव-सुंदर गान।
शब्द-शब्द राजीव, गीत-गजल रस-खान
होकर संत बसंत, बन जाता रहमान।
मिलें कामिनी-कंत, तृप्त करें रस-पान।।
दुर्गा सिंह आसीन, हरे अशिव अभिमान।
नत सिर कह आमीन, हो आकाश समान।।
करते रहें विनोद, सतत सृजन पहचान।
नेह-नर्मदा ओद, जबलपूर की शान।।
किसलय अगर प्रवीण, हो तरुवर गुणवान।
शुभ आलोक न क्षीण, अंबर भू महमान।।
हो चिर तरुण प्रसंग, मिले कीर्ति यश मान।
नित नव सृजन अभंग, सलिल-धार सम ठान।।
मकबूल = सर्वप्रिय, रुही = आत्मावान,
संजीव = प्राणवान,रहमान = कृपालु,
आमीन = ऐसा ही हो, ओद = पौधे की कलम,
•••
विमर्श
*
किस पौधे में बिना फूल के फल लगते हैं?

वनस्पति विज्ञान के संदर्भ में, परिजात को 'ऐडानसोनिया डिजिटाटा' के नाम से जाना जाता है, तथा इसे एक विशेष श्रेणी में रखा गया है, क्योंकि यह अपने फल या उसके बीज का उत्पादन नहीं करता है, और न ही इसकी शाखा की कलम से एक दूसरा परिजात वृक्ष पुन: उत्पन्न किया जा सकता है। अंजीर ऐसा पेड़ है जिस पर फल आते हैं फूल नहीं। अफ्रीका में विटीशिया नामक वृक्ष में बिना फूल के ही फल लगते हैं।
•••
दो नयन दो सॉनेट दो शैली
१.
नयन अबोले सत्य बोलते
नयन असत्य देख मुँद जाते
नयन मीत पा प्रीत घोलते
नयन निकट प्रिय पा खुल जाते


नयन नयन में रच-बस जाते
नयन नयन में आग लगाते
नयन नयन में धँस-फँस जाते
नयन नयन को नहीं सुहाते


नयन नयन-छवि हृदय बसाते
नयन फेरकर नयन भुलाते
नयन नयन से नयन चुराते
नयन नयन को नयन दिखाते


नयन नयन को जगत दिखाते
नयन नयन सँग रास रचाते
(इंग्लिश शैली)
•••
सॉनेट
नयन
नयन खुले जग जन्म हुआ झट
नयन खोजते नयन दोपहर
नयन सजाए स्वप्न साँझ हर
नयन विदाई मुँदे नयन पट
नयन मिले तो पूछा परिचय
नयन झुके लज बात बन गई
नयन उठे सँग सपने कई कई
नयन नयन में बसे मिटा भय


नयन आईना देखें सँवरे
नयन आई ना कह अकुलाए
नयन नयन को भुज में भरे
नय न नयन तज, सकुँचे-सिहरे
नयन वर्जना सुनें न, बहरे
नयन न रोके रुके, न ठहरे
(इटैलियन शैली)
●●●

सोरठा सलिला
उसे नमन कर मौन, जो अपना मन जीत ले।
छिपा आपमें कौन?, निज मन से यह पूछिए।।
*
जब हो कन्यादान, नारी पाती दो जगत।
भले न हो वर-दान, पा-देती वरदान वह।।
*
उछल छुएँ आकाश, अब बैसाखी छोड़कर।
वे जो रहें हताश, गिर उठ फिर बढ़ते नहीं।।
*
'जो घर में बेकार, सब रद्दी सामान दें।'
गृहणी कहे पुकार, 'फिर आना, बाहर गए'।।
*
भू से नभ पर रोज, चंद्र-कांता कूदती।
हो इसकी कुछ खोज, हिम्मत लाती कहाँ से।।
वचन दोष-
तुम हो मेरे साथ, नेता बोले भीड़ से, ।
रखें हाथ में हाथ, हम यह वादा कर रहे।।
***
सॉनेट
सुरेश पाल वर्मा
*
बहुमुखी प्रतिभा के हैं धनी
मेहनत करें सतत हैं धुनी
मंज़िल से मित्रता है घनी
सपनों की चादर नव बुनी
है सुरेश पर्याय जसाला
मन का मनका मन से फेरा
वर्ण पिरामिड गूँथी माला
शारद मैया को नित टेरा
छंद नए रच; करी साधना
छंद सिखा नव दीप जलाए
प्रसरित पल-पल पुण्य भावना
बालारुण शत शत मुस्काए
गगन छुए तव कीर्ति पताका
तुम सा हुआ न दूजा बाँका
५-२-२०२३
***
शारद वंदन
*
शारद मैया शस्त्र उठाओ,
हंस छोड़ सिंह पर सज आओ...
.
सीमा पर दुश्मन आया है, ले हथियार रहा ललकार।
वीणा पर हो राग भैरवी, भैरव जाग भरें हुंकार।।
रुद्र बने हर सैनिक अपना, चौंसठ योगिनी खप्पर ले।
पिएँ शत्रु का रक्त तृप्त हो, गुँजा जयघोषों से जग दें।।
नव दुर्गे! सैनिक बन जाओ
शारद मैया! शस्त्र उठाओ...
.
एक वार दो को मारे फिर, मरे तीसरा दहशत से।
दुनिया को लड़ मुक्त कराओ, चीनी दनुजों के भय से।।
जाप महामृत्युंजय का कर, हस्त सुमिरनी हाे अविचल।
शंखघोष कर वक्ष चीर दो, भूलुंठित हों अरि के दल।।
रणचंडी दस दिश थर्राओ,
शारद मैया शस्त्र उठाओ...
.
कोरोना दाता यह राक्षस,मानवता का शत्रु बना।
हिमगिरि पर अब शांति-शत्रु संग, शांति-सुतों का समर ठना।।
भरत कनिष्क समुद्रगुप्त दुर्गा राणा लछमीबाई।
चेन्नम्मा ललिता हमीद सेंखों सा शौर्य जगा माई।।
घुस दुश्मन के किले ढहाओ,
शारद मैया! शस्त्र उठाओ...
***
शारद! अमृत रस बरसा दे।
हैं स्वतंत्र अनुभूति करा दे।।
*
मैं-तू में बँट हम करें, तू तू मैं मैं रोज।
सद्भावों की लाश पर, फूट गिद्ध का भोज।।
है पर-तंत्र स्व-तंत्र बना दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
*
अमर शहीदों को भूले हम, कर आपस में जंग।
बिस्मिल-भगत-दत्त आहत हैं, दुर्गा भाभी दंग।।
हैं आजाद प्रतीति करा दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
*
प्रजातंत्र में प्रजा पर, हावी होकर तंत्र।
छीन रहा अधिकार नित, भुला फर्ज का मंत्र।।
दीन-हीन को सुखी बना दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
*
ज॔गल-पर्वत-सरोवर, पल पल करते नष्ट।
कहते हुआ विकास है, जन प्रतिनिधि हो भ्रष्ट।।
जन गण मन को इष्ट बना दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
*
शोक लोक का बढ़ रहा, लोकतंत्र है मूक।
सारमेय दलतंत्र के, रहे लोक पर भूँक।।
दलदल दल का मातु मिटा दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
*
'गण' पर 'गन' का निशाना, साधे सत्ता हाय।
जन भाषा है उपेक्षित, पर-भाषा मन भाय।।
मैया! हिंदी हृदय बसा दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
*
जन की रोटी छिन रही, तन से घटते वस्त्र।
मन आहत है राम का, सीता है संत्रस्त।।
अस्त नवाशा सूर्य उगा दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
*
रोजी-रोटी छीनकर, कोठी तानें सेठ।
अफसर-नेता घूस लें, नित न भर रहा पेट।।
माँ! मँहगाई-टैक्स घटा दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
*
जिए आखिरी आदमी, श्रम का पाए दाम।
ऊषा गाए प्रभाती, संध्या लगे ललाम।।
रात दिखाकर स्वप्न सुला दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
***
कृति चर्चा
'चुनिंदा हिंदी गज़लें' संग्रहणीय संकलन
*
[कृति विवरण : चुनिंदा हिंदी गज़लें, संपादक डॉ. रोहिताश्व अस्थाना, आकार डिमाई, आवरण सजिल्द बहुरंगी जैकेट सहित, पृष्ठ १८४, मूल्य ५९५/-, प्रकाशक - ज्ञानधारा पब्लिकेशन, २६/५४ गली ११, विश्वास नगर, शाहदरा, दिल्ली ११००३२]
*
विश्ववाणी हिंदी की काव्य परंपरा लोक भाषाओँ प्राकृत, अपभृंश और संस्कृत से रस ग्रहण करती है। द्विपदिक छंद रचना के विविध रूपों को प्रकृत-अपभृंश साहित्य में सहज ही देखा जा सकता है। संस्कृत श्लोक-परंपरा में भिन्न पदभार और भिन्न तुकांत प्रयोग किए गए हैं तो दोहा, चौपाई, सोरठा आदि में समभारिक-संतुकांती पंक्तियों का प्रयोग किया जाता रहा है। द्विपदिक छंद की समतुकान्तिक एक अतिरिक्त आवृत्ति ने चतुष्पदिक छंद का रूप ग्रहण किया जिसे मुक्तक कहा गया। मुक्तक की तीसरी पंक्ति को भिन्न तुकांत किन्तु समान पदभार के साथ प्रयोग से चारुत्व वृद्धि हुई। भारतीय भाषा साहित्य अरब और फारस गया तो भारतीय लयखण्डों के फारसी रूपान्तरण को 'बह्र' कहा गया। मुक्तक की तीसरी और चौथी पंक्ति की तरह अन्य पंक्तियाँ जोड़कर रची गयी अपेक्षाकृत लंबी काव्य रचनाओं को 'ग़ज़ल' कहा गया। भारत में लोककाव्य में यह प्रयोग होता रहा किन्तु भद्रजगत ने इसकी अनदेखी की। मुग़ल आक्रांताओं के विजयी होकर सत्तासीन होनेपर उनकी अरबी-फारसी भाषाओं और भारतीय सीमंती भाषाओँ का मिश्रण लश्करी, रेख़्ता, उर्दू के रूप में प्रचलित हुआ। लगभग २००० वर्ष पूर्व 'तश्बीब' (लघु प्रणय गीत), 'ग़ज़ाला-चश्म' (मृगनयनी से वार्तालाप) या 'कसीदा' (प्रेयसी प्रशंसा के गीत) के रूप में प्रचलित हुई ग़ज़ल भारत में आने पर सूफ़ी रंगत में रंगने के साथ-साथ, क्रांति के आह्वान-गान और सामाजिक परिवर्तनों की वाहक बन गई। अरबी ग़ज़ल का यह भारतीय रूपांतरण ही हिंदी ग़ज़ल का मूल है।
डॉ. रोहिताश्व अस्थाना हिंदी ग़ज़ल के प्रथम शोधार्थी ही नहीं उसके संवर्धक भी हैं। कबीर, खुसरो, वली औरंगाबादी, ज़फ़र, ग़ालिब, रसा, बिस्मिल, अशफ़ाक़, सामी, नादां, साहिर, अर्श, फैज़, मज़ाज़, जोश, नज़रुल, नूर, फ़िराक, मज़हर, शकील, केशव, अख्तर, कैफ़ी, जिगर, सौदा, तांबा, चकबस्त, दाग़, हाली, इक़बाल, ज़ौक़, क़तील, रंग, अंचल, नईम, फ़ुग़ाँ, फ़ानी, निज़ाम, नज़ीर, राही, बेकल, नीरज, दुष्यंत, विराट, बशीर बद्र, अश्क, साज, शांत, यति, परवीन हक़, प्रसाद, निराला, दिनकर, कुंवर बेचैन, अंबर, अनंत, अंजुम, सलिल, सागर मीरजापुरी, बेदिल, मधुकर, राजेंद्र वर्मा, समीप, हस्ती, आदि सहस्त्राधिक हिंदी ग़ज़लकारों ने हिंदी ग़ज़ल को समृद्ध-संपन्न करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी।
डॉ. रोहिताश्व अस्थाना ने हिंदी ग़ज़ल को लेकर शोध ग्रन्थ 'हिंदी ग़ज़ल : उद्भव और विकास', व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह 'बांसुरी विस्मित है', हिंदी ग़ज़ल पंचदशी संकलन श्रृंखला आदि के पश्चात् 'चुनिंदा हिंदी गज़लें' के समापदं का सराहनीय कार्य किया है। इस पठनीय, संग्रहणीय संकलन में ४४ ग़ज़लकारों की ४-४ ग़ज़लें संकलित की गयी हैं। डॉ, अस्थाना के अनुसार "मैं आश्वस्त हूँ कि संकलित कवि अथवा गज़लकार किसी मिथ्याडंबर अथवा अहंकार से मुक्त होकर निस्वार्थ भाव से हिंदी ग़ज़ल के क्षेत्र में साधनारत हैं।'' इस संकलन में वर्णमाला क्रमानुसार अजय प्रसून, अनिरुद्ध सिन्हा, अशोक आलोक, अशोक 'अंजुम', अशोक 'मिज़ाज', ओंकार 'गुलशन, उर्मिलेश, किशन स्वरूप, सजल, कृष्ण सुकुमार, कौसर साहिरी, ख़याल खन्ना, गिरिजा मिश्रा, नीरज, विराट, चाँद शेरी, पथिक, वियजय, नलिन, याद राम शर्मा, महर्षि, रोहिताश्व, विकल सकती, निर्मम, श्याम, अंबर, बिस्मिल, विशाल, संजीव 'सलिल', मुहसिन, हस्ती, वहां, प्रजापति, विनम्र, दिनेश रस्तोगी, दिनेश सिंदल, दीपक, राकेश चक्र, विद्यासागर वर्मा, सत्य, भगत, मिलान, अडिग, रऊफ परवेज की सहभागिता है। ग़ज़लकारों के वरिष्ठ और कनिष्ठ दोनों ही हैं। ग़ज़लकारों और ग़ज़लों का चयन करने में रोहिताश्व जी विषय वैविध्य और शिल्प वैविध्य में संतुलन स्थापित कर संकलन की गुणवत्ता बनाए रखने में सफल हैं।
डॉ. अजय प्रसून 'हर कोई अपनी रक्षा को व्याकुल है' कहकर असुरक्षा की जन भावना को सामने लाते हैं। अनिरुद्ध सिन्हा 'दर्द अपना छिपा लिया उसने' कहकर आत्मगोपन की सहज मानवीय प्रवृत्ति का उल्लेख करते हैं। 'सच बयानी धुंआ धुंआ ही सही' - अशोक अंजुम, धीरे-धीरे शोर सन्नाटों में गुम हो जायेगा' - मिज़ाज, अपने कदमों पे खड़े होने के काबिल हो जा - उर्मिलेश, अंधियारे ने सूरज की अगवानी की - किशन स्वरूप, आँसू पीकर व्रत तोड़े हैं - गिरिजा मिश्रा, बढ़ता था रोज जिस्म मगर घाट रही थी उम्र - नीरज, कालिख है कोठरी की लगेगी अवश्य ही - विराट, शहर के हिन्दोस्तां से कुछ अलग / गाँव का हिन्दोस्तां है और हम - महर्षि, राहत के दो दिन दे रब्बा - श्याम, सुविधा से परिणय मत करना -अंबर, रिश्तों की कब्रों पर मिटटी मत डालो - विशाल, छोड़ चलभाष प्रिय! / खत-किताबत करो -संजीव 'सलिल', सच है लहूलुहान अगर झूठ है तो बोल - हस्ती, सर उठाकर न जमीन पर चलिए - वहम, सुख मिथ्या आश्वासन जैसा - विनम्र, रोज ही होता मरण है - राकेश चक्र, एक सागर नदी में रहता है - मिलन, घर में पूजा करो, नमाज पढ़ो - रऊफ परवेज़ आदि हिंदी जगत के सम सामायिक परिवेश की विसंगतियों, विडंबनाओं, अपेक्षाओं, आशंकाओं आदि को पूरी शिद्दत से उद्घाटित करते हैं।
डॉ. अस्थाना ने रचना-चयन करते समय पारंपरिकता पर अधुनातन प्रयोगधर्मिता को वरीयता ठीक ही दी है। इससे संकलन सहज ग्राह्य और विचारणीय बन सका है। हर दिन प्रकाशित हो रहे सामूहिक संकलनों की भीड़ में यह संकलन अपनी पृथक पहचान स्थापित करने में सफल है। आकर्षक आवरण, त्रुटिहीन मुद्रण, स्तरीय रचनाएँ इसे 'सोने में सुहागा' की तरह पाठकों में लोकप्रिय और शोधार्थियों के लिए उपयोगी सिद्ध करेगी।
*
संपर्क - विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, वॉट्सऐप ९४२५१८३२४४
***
सॉनेट
शीत
पलट शीत फिर फिर है आती।
सखी! चुनावी नेता जैसे।
रँभा रहीं पगुराती भैंसे।।
यह क्यों बे मौसम टर्राती।।
कँपा रही है हाड़-माँस तक।
छुड़ा रही छक्के, छक्का जड़।
खड़ी द्वार पर, बन छक्का अड़।।
जमी जा रही हाय श्वास तक।।
सूरज ओढ़े मेघ रजाई।
उषा नवेली नार सुहाई।
रिसा रही वसुधा महताई।।
पाला से पाला है दैया।
लिपटे-चिपटे सजनी-सैंया।
लल्ला मचले लै लै कैंया।।
५-२-२०२२
•••
गीत
छंद - दोहा
पदभार- २४।
यति - १३-११।
पदांत - लघु गुरु।
*
तू चंदा मैं चाँदनी, तेरी-मेरी प्रीत।
युगों-युगों तक रहेगी, अमर रचें कवि गीत।।
*
सपना पाला भगा दें
हम जग से तम दूर।
लोक हितों की माँग हो,
सहिष्णुता सिंदूर।।
अनगिन तारागण बनें,
नभ के श्रमिक-किसान।
श्रम-सीकर वर्षा बने, कोशिश बीज पुनीत।
चल हम चंदा-चाँदनी, रचें अनश्वर रीत।।
*
काम अकाम-सकाम वर,
बन पाएँ निष्काम।
श्वासें अल्प विराम हों,
आसें अर्ध विराम।।
पूर्ण विराम अनाम हो, छोड़ें हम नव नीत।
श्री वास्तव में पा सकें, मन हारें मन जीत।।
*
अमल विमल निर्मल सलिल, छप्-छपाक् संजीव।
शैशव वर वार्धक्य में, हो जाएँ राजीव।।
भू-नभ की कुड़माई हो, भावी बने अतीत।
कलरव-कलकल अमर हो, बन सत स्वर संगीत।।
५-२-२०२१
***
सोरठा गीत
पदभार- २४।
यति - १३-११।
पदांत - लघु गुरु।
*
तेरी-मेरी प्रीत, युगों-युगों तक रहेगी।
अमर रचें कवि गीत, तू चंदा मैं चाँदनी।।
*
कर जग से तम दूर, हम मिल पाला भगा दें।
सहिष्णुता सिंदूर, लोक हितों की माँग हो।।
नभ के श्रमिक-किसान, अनगिन तारागण बनें।
कोशिश बीज पुनीत, श्रम-सीकर वर्षा बने।
रचें अनश्वर रीत, चल हम चंदा-चाँदनी।।
*
बन पाएँ निष्काम, काम अकाम-सकाम वर।
आसें अर्ध विराम, श्वासें अल्प विराम हों।।
रच दें हम नव नीत, पूर्ण विराम अनाम हो।
मन हारें मन जीत, श्री वास्तव में पा सकें।।
*
छप्-छपाक् संजीव, विमल निर्मल सलिल।
हो जाएँ राजीव, शैशव वर वार्धक्य में।।
भावी बने अतीत, भू-नभ की कुड़माई हो।
बन सत स्वर संगीत, कलरव-कलकल अमर हो।।
५-२-२०२१
***

प्रार्थना
छंद मुक्तक
*
अजर अमर माँ शारद जय जय।
आस पूर्ण कर करिए निर्भय।।
इस मन में विश्वास अचल हो।
ईश कृपा प्रति श्रद्धा अक्षय।।
उमड़ उजाला सब तम हर ले।
ऊसर ऊपर सलिल प्रचुर दे।।
एक जननि संतान अगिन हम
ऐक्य भाव पथ, माँ! अक्षर दे।।
ओसारे चहके गौरेया।
और रँभाए घर घर गैया।
अंकुर अंबर छू ले बढ़कर
अः हँसे सँग बहिना-भैया।।
क्षणभंगुर हों शंका संशय।
त्रस्त रहे बाधा, शुभ की जय।
ज्ञान मिले सत्य-शिव-सुंदर का
ऋद्धि-सिद्धि दो मैया जय जय।।
*
५-२-२०१०
***
सामयिक माहिया
*
त्रिपदिक छंद।
मात्रा भार - १२-१०-१२।
*
भारत के बेटे हैं
किस्मत के मारे
सड़कों पर बैठे हैं।
*
गद्दार नहीं बोलो
विवश किसानों को
नेता खुद को तोलो।
*
मत करो गुमान सुनो,
अहंकार छोड़ो,
जो कहें किसान सुनो।
*
है कुछ दिन की सत्ता,
नेता सेवक है
है मालिक मतदाता।
*
मत करना मनमानी,
झुक कर लो बातें,
टकराना नादानी।
*
सब जनता सोच रही
खिसियानी बिल्ली
अब खंबा नोच रही।
*
कितनों को रोकोगे?
पूरी दिल्ली में
क्या कीले ठोंकोगे?
*
जनमत मत ठुकराओ
रूठी यदि जनता
कह देगी घर जाओ।
*
फिर है चुनाव आना
अड़े रहे यूँ ही
निश्चित फिर पछताना।
५-२-२०२१
***
दोहा सलिला अब बैसाखी छोड़कर, उछल छुएं आकाश।
चल गिर उठ बढ़ते नहीं, जो वे रहें हताश।।
*
चंद्र कांता कूदती, भू से नभ पर रोज।
हिम्मत लाती कहाँ से, हो इसकी कुछ खोज।।
***
विमर्श
वचन दोष-
उदाहरण:
नेता बोले भीड़ से,
तुम हो मेरे साथ।
हम यह वादा कर रहे,
रखें हाथ में हाथ।।
टीप- नेता एकवचन, बोले बहुवचन, भीड़ बहुवचन, तुम एकवचन, हम बहुवचन।
*
छाया सक्सेना जबलपुर- वचन दोष का सटीक उदाहरण देकर आपने हम सभी को लाभान्वित किया।
नेता कहते भीड़ से, रखें हाथ में हाथ।
हम ये वादा कर रहे, सब हो मेरे साथ ।।
क्या यह ठीक है?
संजीव वर्मा 'सलिल'

नेता बोला भीड़ से, तुम सब मेरे साथ।
मैं यह वादा कर रहा, रखो हाथ में हाथ।।
बीनू भटनागर दिल्ली- बोले आदर सूचक भी तो है , इसलिये ग़लत नहीं है। भीड़ शब्द एकवचन की तरह प्रयोग होता है। 'हम' बहुवचन होता है पर बहुत अधिक लोग उत्तर प्रदेश में इसे एकवचन की तरह प्रयोग करते हैं।
संजीव वर्मा 'सलिल'

अब बैसाखी छोड़कर, उछल छुएँ आकाश।
चल गिर उठ बढ़ते नहीं, जो वे रहें हताश।।
अवनीश तिवारी

संजीव जी, प्रणाम। कभी कभी सम्मान सूचक के रूप में एक वचन संज्ञा के साथ बहुवचन क्रिया उपयोग करते हैं। जैसे यहाँ 'नेता' और 'बोले'।
क्या यह सही नही ?
संजीव वर्मा 'सलिल'- ऐसे तर्क हर अंचल में दिए जाते हैं। बिहार में कारक और क्रिया में भिन्नता होती है। मानक हिंदी को उन्हें अपवाद मान अनदेखी कर बढ़ना ही है।

बीनू भटनागर, दिल्ली- लेकिन हिन्दी में इंगलिश की तरह collective noun को एक वचन नहीं माना जाता क्या? जैसे भीड़! आदर सूचक के लिये तो मानक हिंदी क्रिया में बहुवचन लगाना ही सही मानती है। एक और जिज्ञासा कि नेता का बहुवचन क्या होगा? "नेता हमेशा झूठ बोलते है।" इस वाक्य में नेता बहुवचन के रूप में सही नहीं है? यदि ग़लत है तो सही क्या है? 'हम'को एकवचन में प्रयोग करना तो मानक हिन्दी के हिसाब से ग़लत है, आंचलिक भाषा का प्रयोग है।
काव्य में क्या आंचलिक भाषा का प्रयोग वर्जित है?
संजीव वर्मा 'सलिल'- काव्य में आंचलिक भाषा का प्रयोग वर्जित नहीं है। वह रचनाकार की शैलीगत विशेषता है। जाना व्याकरण का प्रश्न हो वहाँ उसे मानक नहीं कहा जाएगा।
***
कार्यशाला
दोहे पर दोहे
'सब रद्दी सामान दें, जो घर में बेकार।'
'फिर आना, बाहर गए,' गृहणी कहे पुकार।।
- दर्शन बेजा़र, आगरा

ना पति रद्दी ना कभी पत्नी रद्दी होय-
बृद्धावस्था में यही रह पाते संग दोय।।
रह पाते संग दोय, शिथिल जब तन हो जाये-
ज्यादा तर को छोड़ पुत्र अमरीका जाये।।
बात सलिल"बेज़ार" हो रही संस्कार क्षति-
रद्दी होते नहीं कभी पत्नी या ना पति।।
बहुत सुंदर वक्रोक्ति सलिल जी , अद्भुत प्रयोग
- संजीव वर्मा 'सलिल'
क्या रहते हैं यहां ही, शायर श्री बेजा़र?
गृहस्वामिन ने आ कहा, मैं भी हूँ बेजा़र।।
- मनोरमा सक्सेना, गुड़गाँव
संस्कार ,संस्कृति सुखद भूल गए परिवार ।
घर के बूढ़े हो गए ज्यूँ रद्दी अखबार।।
-जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर
वंदन करता हूँ सखे, वक्रोक्ति मे प्यार ।
चुहल चाल से ही खुशी, रहता यह संसार ।
५.२.२०१८
गले मिले दोहा-यमक
*
नारी पाती दो जगत, जब हो कन्यादान
पाती है वरदान वह, भले न हो वर-दान
*
दिल न मिलाये रह गए, मात्र मिलकर हाथ
दिल ने दिल के साथ रह, नहीं निभाया साथ
*
निर्जल रहने की व्यथा, जान सकेगा कौन?
चंद्र नयन-जल दे रहा, चंद्र देखता मौन
*
खोद-खोदकर थका जब, तब सच पाया जान
खो देगा ईमान जब, खोदेगा ईमान
*
कौन किसी का सगा है, सब मतलब के मीत
हार न चाहें- हार ही, पाते जब हो जीत
*
निकट न होकर निकट हैं, दूर न होकर दूर
चूर न मद से छोर हैं, सूर न हो हैं सूर
*
इस असार संसार में, खोज रहा है सार
तार जोड़ता बात का, डिजिटल युग बे-तार
*
५-२-२०१७
बाल गीत:
"कितने अच्छे लगते हो तुम "
*
कितने अच्छे लगते हो तुम |
बिना जगाये जगते हो तुम ||
नहीं किसी को ठगते हो तुम |
सदा प्रेम में पगते हो तुम ||
दाना-चुग्गा चुगते हो तुम |
चूँ-चूँ-चूँ-चूँ करते हो तुम ||
आलस कैसे तजते हो तुम?
क्या प्रभु को भी भजते हो तुम?
चिड़िया माँ पा नचते हो तुम |
बिल्ली से डर बचते हो तुम ||
क्या माला भी जपते हो तुम?
शीत लगे तो कँपते हो तुम?
सुना न मैंने हँसते हो तुम |
चूजे भाई! रुचते हो तुम |
***
बासंती दोहा ग़ज़ल:
*
स्वागत में ऋतुराज के, पुष्पित हैं कचनार
किंशुक कुसुम दहक रहे, या दहके अंगार?
*
पर्ण-पर्ण पर छा गया, मादक रूप निखार
पवन खो रहा होश निज, लख वनश्री-श्रृंगार
*
महुआ महका देखकर, चहका-बहका प्यार
मधुशाला में बिन पिये, सिर पर नशा सवार
*
नहीं निशाना चूकती, पञ्चशरों की मार
पनघट-पनघट हो रहा, इंगित का व्यापार
*
नैन मिले लड़ झुक उठे, करने को इंकार
देख नैन में बिम्ब निज, कर बैठे इकरार
*
मैं-तुम, यह-वह ही नहीं, बौराया संसार
सब पर बासंती नशा, मिल लें गले खुमार
*
ढोलक, टिमकी, मंजीरा, करें ठुमक इसरार
दुनियावी चिंता भुला, नाचो-झूमो यार
*
घर आँगन तन धो दिया, तन का रूप निखार
अंतर्मन का मेल भी, प्रियवर! कभी बुहार।
*
बासंती दोहा-गज़ल, मन्मथ की मनुहार
सीरत-सूरत रख 'सलिल', निर्मल सहज सँवार
***
छंद सलिला:
रामा छंद
*
(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, एकावली, कीर्ति, घनाक्षरी, छवि, तांडव, तोमर, दीप, दोधक, निधि, प्रेमा, मधुभार, रामा, माला, लीला, वाणी, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शिव, शुभगति, सार, सुगति, सुजान, हंसी)
*
रामा छंद में माला छंद के सर्वथा विपरीत प्रथम पद में दो चरण इंद्र वज्रा छंद के तथा द्वितीय पद में उपेन्द्र वज्रा छंद के दो चरण होते हैं.
उदाहरण:
१. पूजा उसे ही हमने हमेशा, रामा हमारा सबका सहारा
उसे सभी की रहती सदा ही, फ़िक्र न भूले वह देव प्यारा
२. कैसे बहलायें परदेश में जो, भाई हमारे रहने गये हैं
कहीं रहें वे हमको न भूलें, बसे हमारे दिल में वही हैं
३. कोई नहीं है अपना-पराया, जैसा जहाँ जो सब है तुम्हारा
तुम्हें मनायें दिन-रात देवा!, हमें न मोहे भ्रम-मोह-माया
५-२-२०१४
***
एक दोहा
जो निज मन को जीत ले, उसे नमन कर मौन.
निज मन से यह पूछिए, छिपा आपमें कौन?
५.२.२०१०

***

मंगलवार, 20 जनवरी 2026

जनवरी २०, पूर्णिका, पेंसिल, राम, सॉनेट, विवाह, दीप, विजाति छंद, सबरीमाला, गीत, कल्पना, शारदा

सलिल सृजन जनवरी २०
*
पूर्णिका 
आम आदमी की है गलती
व्यर्थ आस क्यों मन में पलती
.
क्यों न समझता उगती ऊषा
दिन बीते हो संध्या ढलती
.
अपनी भूल नज़र कब आती? 
औरों की त्रुटि चुभती-खलती
.
साथ छोड़ती परछाईं भी
साथ न तम में पल भर चलती
.
मृगतृष्णा पल-पल भटकाती
माया अपनी बनकर छलती
.
होनी होकर ही रहती है
अनहोनी ही देखी टलती
.
कोशिश 'सलिल' व्यर्थ मत मानो
जिजीविषा मंज़िल बन फलती
२०.१.२०२६
०००
पूर्णिका
रात रानी को बिदा कर रातरानी।
सुबह का स्वागत करे सविनय सयानी।।
.
पहन बाना श्वेत हरियल हँस रही है।
सूर्य माली कर रहा खुद निगहबानी।।
.
धरा जननी 'हो न ओझल आँख से' कह
रहे चिंतित हो रही बिटिया लुभानी।।
.
बाँध सेहरा द्वार पर आ गया गेंदा।
नाच-गाए भ्रमर दल सुन धुन सुहानी।।
.
मिले समधी गले बरगद और पीपल।
गाए गारी कूक कोयल मधुर बानी।।
.
हो न कन्या दान, अब वर दान होगा।
हो तभी गुणवान नव संतति अजानी।।
.
सलिल स्नेहिल सुवासित संबंध सपने।
कर सके साकार जो वह मनुज ज्ञानी।।
०००
नयन नयन को बाँचते, गए नयन में डूब।
नयन नयन को बाँधते, नयन न करते चूक।।
०००
पेंसिल
एक बच्चे ने अपनी दादी को पत्र लिखते हुए देखकर उत्सुकता से पूछा- "दादी, आप क्या लिख ​​रही हो? क्या आप कुछ दिलचस्प बातें लिख रही हो? या क्या आप मेरे बारे में कुछ लिख रही हो?"
दादी ने लिखना बंद कर अपने पोते की ओर मुड़ते हुए कहा- "हाँ बेटा! मैं आपके बारे में ही लिख रही हूँ खत से ज्यादा महत्वपूर्ण यह पेंसिल है, जिसका मैं उपयोग कर रही हूँ। मुझे आशा है कि आप इस पेंसिल से बहुत कुछ सीखेंगे।"
उत्सुकतावश वह बच्चा अपनी दादी की ओर दौड़ता हुआ आया और थोड़ी देर पेंसिल का बारीकी से निरीक्षण करने के बाद उसने पूछा- "इस पेंसिल से सबक? हम एक पेंसिल से क्या सीख सकते हैं?"
उसकी दादी ने जवाब दिया, "बेटे!, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप चीज़ों को कैसे देखते हैं। इस पेंसिल में सात गुण हैं, जिन्हें अगर आप जीवन में शामिल करते हैं, तो आप एक अद्भुत व्यक्ति बन जाएँगे और हमेशा शांति और प्रेम से रहेंगे।"
बच्चे ने पूछा- कैसे?
दादी ने कहा- " पेंसिल में ७ गुण हैं।
पहला- इस पेंसिल की तरह, हम भी काम कर सकते हैं लेकिन याद रखें कि हर समय, किसी का हाथ हमारे हर कार्य के पीछे रहकर हमें आगे बढ़ने के लिए सक्षम बनाता है। हम उसे भगवान कहते हैं।।"
दूसरा- हमें अपनी पेंसिल की नोक को बार-बार नुकीला करना पड़ता है, पेंसिल को पहले कष्ट होता है, लेकिन बाद में यह अधिक दक्षता के साथ काम करती है। इसी तरह, कठिन समय हमें जीवन में बड़ी चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करता है, जो आगे चलकर हमारे आंतरिक विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और हमें एक बेहतर इंसान बनने में मदद करता है।
तीसरा- गलती होने पर पेंसिल उसे सुधारने का मौका देती है। हम रबर से मिटाकर गलती सुधार सकते हैं। गलतियाँ करना मानव स्वभाव है, गलती हो जाए तो उसे स्वीकार कर सुधारें और फिर न दोहराएँ।
चौथा- पेंसिल बाहर से खूबसूरत हो और उसके अंदर का ग्रेफाइट लिखने के काम न आए तो वह निरुपयोगी होगी। इसलिए हमें बाहरी साज-सज्जा के स्थान पर अपने अंदर सद्गुणों को अधिक महत्व देना चाहिए।
पाँचवा- पेंसिल लिखकर अपने पीछे एक छाप छोड़ जाती है जिससे कई जन प्रेरणा लेकर बेहतर बन सकते हैं। हमें भी जीवन में विचारों और कार्यों की छाप छोड़नी चाहिए जिससे अन्य जन प्रेरणा ले सकें।
छठवाँ- पेंसिल दिन-ब-दिन अधिक से अधिक छोटी होती जाती है और उसके समाप्त होने का समय निकट आता जाता है। हमारा जीवन इसी तरह घटता रहता है। उम्र बढ़ती है पर शेष समय घटता है इसलिए काम टालना नहीं चाहिए।
सातवाँ - पेंसिल फेंके जाने तक बिना विरोध या माँग किए लिखती रहती है। इसी तरह हमें भी जितना भी जीवन मिल है उसमें बिना थके-रुके काम करते रहना चाहिए।
बच्चे के पेंसिल को स्नेहपूर्वक निहारा और दादी से लेकर सम्हालकर रख लिया।
२०.१.२०२५
०००
राम लला स्वागत
स्वागत में तैयार, सुरग स्यूं देव पधार्या।
खड़्या अवध र द्वार, सुरज चंदा जस गार्या ।।
पात मिलावै ताल, नाच रय फुलड़ा कलियाँ।
रए झूम तरु शाख, मगन व्है रईं तितलियाँ ।।
ऊषा लए गुलाल, भाल पै टाँके टीका।
रजनी करे मलाल, दरस बिन जीवन फीका।।
सरयू चरन पखार, भई बड़भागी मैया।
सिकता तन लिपटाय, हँस रए चारउं भैया।।
दस रथ थाम लगाम, प्रभाती सुन नृप गदगद।
बिसरे मंत्र सुमंत्र, मातु त्रै सुमधुर गाउत।।
झूम अजुध्या नची, पताका जै कह उछली।
नारी-नर तर रए, लला लख किस्मत बदली।।
बिधि-हर ठाँड़े द्वार, जुरे कर लेखें लीला।
धरा छुए पग मौन, छत्र नभ लै है नीला।।
२०.१.२०२४
***
राम दोहावली
*
राम आत्म परमात्म भी, राम अनादि-अनंत।
चित्र गुप्त है राम का, राम सृष्टि के कंत।।
विधि-हरि-हर श्री राम हैं, राम अनाहद नाद।
शब्दाक्षर लय-ताल हैं, राम भाव रस स्वाद।।
राम नाम गुणगान से, मन होता है शांत।
राम-दास बन जा 'सलिल', माया करे न भ्रांत।।
राम आम के खास के, सबके मालिक-दास।
राम कर्म के साथ हैं, करते सतत प्रयास।।
वाम न राम से हो सलिल, हो जाने दे पार।
केवट के सँग मिलेगा, तुझको सुयश अपार।।
राम न सहते गलत को, राम न रहते मौन।
राम न कहते निज सुयश, नहीं जानता कौन?
राम न बाधा मानते, राम न करते बैर।
करते हैं सत्कर्म वे, सबकी चाहें खैर।।
लक्ष्य रखे जो एक ही, वह जन परम सुजान।
लख न लक्ष मन चुप करे, साध तीर संधान।।
.
लखन लक्ष्मण या कहें, लछ्मन उसको आप।
राम-काम सौमित्र का, हर लेता संताप।।
.
सिया-सिंधु की उर्मि ला, अँजुरी रखें अँजोर।
लछ्मन-मन नभ, उर्मिला मनहर उज्ज्वल भोर।।
.
लखन-उर्मिला देह-मन, इसमें उसका वास।
इस बिन उसका है कहाँ, कहिए अन्य सु-वास।।
.
मन में बसी सुवास है, उर्मि लखन हैं फ़ूल।
सिया-राम गलहार में, शोभित रहते झूल।।
***
राम बारात - बधाई गीत
चलो मिलके सजाएँ बारात, बधाई हो सबको २
*
जुही-चमेली अंजलि छाया, आभा देखे जग चकराया।
वसुधा जगमग करे ज्योत्सना, निशि संग चंदा आया।
चलो मिल के बनाएँ बारात, बधाई हो सबको २
*
विभा सजाए सुंदर टीका, सरला बिन मजमा है फीका।
हैं कमलेश मगन गायन में, रजनी का सेहरा है नीका।
चलो मिल के निकालें बारात, बधाई हो सबको २
*
इंद्रा संग संतोष सुसज्जित, राजकुमार नर्मदा मज्जित।
पाखी नीलम छाया शोभा लख , सुर नर मुनि लज्जित।
चलो मिल के घुमाएँ बारात, बधाई हो सबको २
***
गीत
मधुर मधुर चितवन ने हेरा
मन-पत्थर पर सुमन खिल गए।
मदिर स्वप्न ने डाला डेरा
नज़र उतारें दाई तिल हुए।।
*
अधर रसाल बोल कलरव से
शशि सम बिंदी शोभित उज्ज्वल।
कहती श्याम बसे अंतर्मन
केश राशि सर्पीली श्यामल।
नयन नयन को दे आमंत्रण
ह्रदय हृदय से सँकुच मिल गए।
मधुर मधुर चितवन ने हेरा
मन-पत्थर पर सुमन खिल गए।
*
भाल प्रशस्त गगन सम सुंदर
शशि सम बिंदी शोभित उज्ज्वल।
भौंह-कमान दृष्टि शर बंकिम
मुक्ता मणि रद करते झिलमिल।
प्रणय पत्रिका करते प्रेषित
हस्ताक्षर बन विकल दिल गए
मधुर मधुर चितवन ने हेरा
मन-पत्थर पर सुमन खिल गए।
*
कुंडल डोल रहे कानों में
ग्रीवा राजहंसिनी गर्वित।
भाग्यवान भुज-हार पा सके
करपल्लव गह चंदन चर्चित।
द्वैत मिटा, अद्वैत पंथ चल
अधराधर अनकहे सिल गए।
मधुर मधुर चितवन ने हेरा
मन-पत्थर पर सुमन खिल गए।
*
सॉनेट
विवाह
*
प्रकृति-पुरुष का मिलन ही, सकल सृष्टि का मूल।
द्वैत मिटा अद्वैत वर, रहें साथ गह हाथ।
दो अपूर्ण मिल पूर्ण हों, सुख-सपनों में झूल।।
सप्तपदी पर वचन दें, लें ऊँचा कुल माथ।।
हल्दी-मेंहदी-तेल है, रूप-रंग अरु स्नेह।
पूजें माटी-कूप हँस, जड़ जमीन से जोड़।
लग्न पत्रिका कह रही, लगन लगी चल गेह।।
नीर-क्षीर सम मिल रहें, कोई सके न तोड़।।
श्वास गीतिका आस हो, मन्वन्तर तक रास।
नेह निनादित नर्मदा, कलकल करे सदैव।
प्यास-त्रास से मुक्त हो, सदा बिखेरे हास।।
चित्र गुप्त होकर प्रगट, शुभाशीष दे दैव।।
कलगी अचकन पर रहे, नथ बेंदा बलिहार।
चूड़ी पायल नथ लखे, पटका निज मन हार।।
***
मन से मन का मिलन हो, रोज मने त्यौहार।
सुख-दुख साझा हो सदा, कदम हमेशा संग।
दो कुटुंब मिल एक हों, बाँधें बंदनवार।।
अंतर में अंतर न हो, मनभावन हो संग।।
सात जन्म तक साथ की, कभी न कम हो चाह।
ध्रुव तारे सी प्रीत हो, सहज सरस मनुहार।
अपनापन हो अपरिमित, सबसे पाओ वाह।।
पहनो पहनाए रहो, आस-हास भुजहार।।
गंग-जमुन सम साथ हो, बने प्रेरणा स्रोत।
चाह-राह हो एक ही, सुख-दुख भी हो एक।
सूर्य-उषा जैसी रहे, आनन पर सुख-ज्योत।।
नातों से नाता रखो, तान न ताना नेंक।।
विष्णु-लक्ष्मी हृद बसें, अँगना बाल गुपाल।
विजय तिलक से सुशोभित, रहे हमेशा भाल।।
२०-१-२०२२
***
सॉनेट
दीप प्रज्जवलन
*
दीप ज्योति सब तम हरे, दस दिश करे प्रकाश।
नव प्रयास हो वर्तिका, ज्योति तेल जल आप।
पंथ दिखाएँ लक्ष्य वर, हम छू लें आकाश।।
शिखर-गह्वर को साथ मिल, चलिए हम लें नाप।।
पवन परीक्षा ले भले, कँपे शिखा रह शांत।
जले सुस्वागत कह सतत, कर नर्तन वर दीप।
अगरु सुगंध बिखेर दे, रहता धूम्र प्रशांत।।
भवसागर निर्भीक हो, मन मोती तन सीप।।
एक नेक मिल कर सकें, शारद का आह्वान।
चित्र गुप्त साकार हो, भाव गहें आकार।
श्री गणेश विघ्नेश हर, विघ्न ग्रहणकर मान।।
शुभाशीष दें चल सके, शुभद क्रिया व्यापार।।
दीप जले जलता रहे, हर पग पाए राह।
जिसके मन में जो पली, पूरी हो वह चाह।।
छंद- दोहा
१८-१-२०२२
***
नवगीत
*
रहे तपते गर्मियों में
बारिशों में टपकते थे
सर्दियों में हुए ठन्डे
रौशनी गायब हवा
आती नहीं है
घोंसलें है कॉन्क्रीटी
घुट रही दम
हवा तक दूभर हुई है
सोम से रवि तक न अंतर
एक से सब डे
श्वास नदिया सूखती
है नहीं पानी
आस घाटों पर न मेले
नहीं हलचल
किंतु हटने को नहीं
तैयार तिल भर भी यहाँ से
स्वार्थ के पंडे
अस्पताली तीर्थ पर है
जमा जमघट
पीडितों का, लुटेरों का
रात-दिन नित
रोग पहचाने बिना
परीक्षण-औषधि अनेकों
डॉक्टरी फंडे
***
छंद शाला
* विजाति छंद
* मापनी-१२२२ १२२२
*सूत्र -यरगग
*
निहारा क्या?
गुहारा क्या?
कहो क्या साथ लाया था?
कहो क्या साथ जायेगा?
रहेंगे हाथ खाली ही -
न कोई साथ आयेगा
बनाया क्या?
बिगाड़ा क्या?
न कोई गीत है तेरा
न कोई मीत है तेरा
सुनेगा बात ना कोई
लगेगा व्यर्थ ही टेरा
अँधेरा क्या?
सवेरा क्या?
तुझे तेरे भुला देंगे
सगे साथी जला देंगे
कहेंगे तेरही तेरी
मँगा मीठा मजा लेंगे
हमारा क्या?
तुम्हारा क्या?
२०-१-२०२०
***
एक रचना
सबरीमाला
*
सबरीमाला केंद्र है,
जनगण के विश्वास का।
नर-नारी के साम्य का,
ईश्वर के अहसास का
*
जो पतितों को तारता,
उससे दूर न कोई रहे-
आयु-रंग प्रतिबंध न हो,
हर जन हरिजन व्यथा कहे।।
अन्धकार में देवालय
स्रोत अनंताभास का
*
बना-बदलता परंपरा,
मानव जड़ता ठीक नहीं।
लिंग-भेद हो पूजा में,
सत्य ठीक यह लीक नहीं।
राजनीति ही कारन है,
मानव के संत्रास का
*
पोंगापंथी दूर करें,
एक समान सभी संतान।
अन्धी श्रद्धा त्याज्य सखे!
समता ईश्वर का वरदान।।
आरक्षण कारण बनता
सदा विरोधाभास का
२०-१-२०१९
***
स्तवन
*
सरस्वती शारद ब्रम्हाणी!
जय-जय वीणा पाणी!!
*
अमल-धवल शुचि,
विमल सनातन मैया!
बुद्धि-ज्ञान-विज्ञान
प्रदायिनी छैंया।
तिमिरहारिणी,
भयनिवारिणी सुखदा,
नाद-ताल, गति-यति
खेलें तव कैंया।
अनहद सुनवाई दो कल्याणी!
जय-जय वीणापाणी!!
*
स्वर, व्यंजन, गण,
शब्द-शक्तियां अनुपम।
वार्णिक-मात्रिक छंद
अनगिनत उत्तम।
अलंकार, रस, भाव,
बिंब तव चारण।
उक्ति-कहावत, रीति-
नीति शुभ परचम।
कर्मठ विराजित करते प्राणी
जय-जय वीणापाणी!!
*
कीर्ति-गान कर,
कलरव धन्य हुआ है।
यश गुंजाता गीत,
अनन्य हुआ है।
कल-कल नाद प्रार्थना,
अगणित रूपा,
सनन-सनन-सन वंदन
पवन बहा है।
हिंदी हो भावी जगवाणी
जय-जय वीणापाणी!!
२०.१.२०१८
***
एक रचना
कल्पना
*
जन्म दिन कब कल्पना का?
प्रश्न कौन बूझेगा?
पूछता यथार्थ से मैं
उसे कुछ न सूझेगा।
कल्पना अजन्मी है
अनादि है, अनंत है।
श्वास-श्वास व्याप्त प्रिया
आस-आस कंत है।
कलप ना, सदा खुश हो
कल-पना ले आज ने
काल को बताया है
कल्पना अनंत है
२०.१.२०१७
***
नवगीत
चीनी जैसा नुक्ता
*
चीनी जैसा नुक्ता है या
नुक्ता जैसी चीनी है?
नुक़्ती के लड्डू में खुश्बू
नेह-प्रेम की भीनी है....
*
तकलीफों दरी बिछाई
ढाई आखर की चादर।
मसनद मुसीबतों के रखकर
बैठी कोशिश मुस्काकर।
जरूरतों की दाल गल सके
मिल हर अड़चन बीनी है।
चीनी जैसा नुक्ता है या
नुक्ता जैसी चीनी है?
*
गम ढोलक पर थाप ख़ुशी की
कोकिल-कंठों में कजरी।
मर्यादा की चूड़ी खनकी
उठ उमंग बनरी सज री!
पीस हिया हिना रचायी
अँखियाँ गीली कीनी है।
चीनी जैसा नुक्ता है या
नुक्ता जैसी चीनी है?
*
घोडा चुनौतियों का बाँका
सपना नौशा थामे रास।
आम आदमी भी बाराती
बनकर हो जाता है ख़ास।
ऐ नसीब! मत आँख दिखा
मेहनत ने खुशियाँ दीनी है
चीनी जैसा नुक्ता है या
नुक्ता जैसी चीनी है?
२०-१-२०१६
***
आइये कविता करें: ७
.
एक और प्रयास.......
नव गीत
आभा सक्सेना
.
सूरज ने छाया को ठगा १५
किरनों नेे दिया दग़ा १२
अब कौन है, जो है सगा १४
कांपता थर थर अंधेरा १४
कोहरे का धुन्ध पर बसेरा १७
जागता अल्हड़ सवेरा १४
रोशनी का अधेरों से १४
दीप का जली बाती से १४
रिश्तें हैं बहुत करीब से १५
कांपती झीनी सी छांव १४
पकड़ती धूप की बांह १३
ताकती एक और ठांव १४
इस नवगीत के कथ्य में नवता तथा गेयता है. यह मानव जातीय छंद में रचा गया है. शैल्पिक दृष्टि से बिना मुखड़े के ४ त्रिपंक्तीय समतुकान्ती अँतरे हैं।एक प्रयोग करते हैं, पहले अंतरे की पहली पंक्ति को मुखड़ा बना कर शेष २ पंक्तियों को पहले तीसरे अंतरे के अंत में प्रयोग किया गया है। दूसरे अँतरे के अंत में पंक्ति जोड़ी गई है। आभा जी! क्या इस रूप में यह अपनाने योग्य है? विचार कर बतायें।
सूर्य ने ५
छाया को ठगा ९
काँपता थर-थर अँधेरा १४
कोहरे का है बसेरा १४
जागता अल्हड़ सवेरा १४
किरनों नेे ६
दिया है दग़ा ८
रोशनी का दीपकों से १४
दीपकों का बातियों से १४
बातियों का ज्योतियोँ से १४
नेह नाता ७
क्यों नहीं पगा? ८
सूर्य ने ५
छाया को ठगा ९
छाँव झीनी काँपती सी १४
बाँह धूपिज थामती सी १४
ठाँव कोई ताकती सी १४
अब कौन है ७
किसका सगा? ७
सूर्य ने ५
छाया को ठगा ९
.
***
कार्यशाला
आइये! कविता करें ६ :
.
मुक्तक
आभा सक्सेना
कल दोपहर का खाना भी बहुत लाजबाब था, = २६
अरहर की दाल साथ में भुना हुआ कबाब था। = २६
मीठे में गाजर का हलुआ, मीठा रसगुल्ला था, = २८
बनारसी पान था पर, गुलकन्द बेहिसाब था।। = २६
लाजवाब = जिसका कोई जवाब न हो, अतुलनीय, अनुपम। अधिक या कम लाजवाब नहीं होता, भी'' से ज्ञात होता है कि इसके अतिरिक्त कुछ और भी स्वादिष्ट था जिसकी चर्चा नहीं हुई। इससे अपूर्णता का आभास होता है। 'भी' अनावश्यक शब्द है।
तीसरी पंक्ति में 'मीठा' और 'मीठे' में पुनरावृत्ति दोष है. गाजर का हलुआ और रसगुल्ला मीठा ही होता है, अतः यहाँ मीठा लिखा जाना अनावश्यक है।
पूरे मुक्तक में खाद्य पदार्थों की प्रशंसा है. किसी वस्तु का बेहिसाब अर्थात अनुपात में न होना दोष है, मुक्तककार का आशय दोष दिखाना प्रतीत नहीं होता। अतः, इस 'बेहिसाब' शब्द का प्रयोग अनुपयुक्त है।
कल दोपहर का खाना सचमुच लाजवाब था = २५
दाल अरहर बाटी संग भर्ता-कवाब था = २४
गाजर का हलुआ और रसगुल्ला सुस्वाद था- = २६
अधरों की शोभा पान बनारसी नवाब था = २५

१८-१-२०१५

बुधवार, 14 जनवरी 2026

जनवरी १४, पूर्णिका, लोहड़ी, संक्रांति, सॉनेट, दोहा, लघुकथा, शोक गीत, नवगीत, जोशीमठ,

सलिल सृजन जनवरी १४
पूर्णिका
आधी हकीकत, आधा फ़साना
मिला-जुलाकर खिचड़ी खाना
.
सत्य न बोले, झूठ न कहना
छिपना भी मत, मत दिख जाना
.
कथा-कहानी, कहती नानी
धूप-छाँव को, गले लगाना
.
थोड़ी ठंडी, थोड़ी गर्मी
मौसम लगता, तभी सुहाना
.
आँख मिलाकर, आँख चुराना
तब ही होता दिल दीवाना
.
जड़ जमीन में, रहे जमी पर
हाथों में आकाश उठाना
.
कोशिश का माँझा-डोरी ले
विश्वासों की पतंग उड़ाना
.
सजग रहो संक्रांति काल है
स्नेह सौख्य सद्भाव बढ़ाना
.
निर्मल रहना अगर सलिल तो
बहो अनवरत ठहर न जाना
१४.१.२०२६
०००
संस्कृति
लोहड़ी का गीत : सुंदर मुंदरीए होए
*
लोहड़ी उत्तर भारत विशेषकर हरियाणा और पंजाब का एक प्रसिद्ध त्योहार है। लोहड़ी पर्व पर लोगों के घर जा कर लोहड़ी जलाने के लिए लकड़ियाँ माँगी जाती हैं और दुल्ला भट्टी के गीत गाए जाते हैं। लोहड़ी के की शाम को लोग सामूहिक रूप से आग जलाकर उसकी पूजा करते हैं। महिलाएँ आग के चारों और चक्कर काट-काटकर लोकगीत गाती हैं। कहते हैं कि अकबर के शासन काल में दुल्ला भट्टी एक लुटेरा था लेकिन वह हिंदू लड़कियों को गुलाम के तौर पर बेचे जाने का विरोधी था। उन्हें बचा कर वह उनकी हिंदू लड़कों से शादी करा देता था। उसे लोग पसंद करते थे। लोहड़ी गीतों में उसके प्रति आभार व्यक्त किया जाता है।’ कहा जाता है कि एक मुस्लिम फ़क़ीर ने एक हिन्दू अनाथ लड़की को पाला था। फिर जब लड़की जवान हुई तो उस फ़कीर ने उस लड़की की शादी के लिए घूम-घूम कर पैसे इकट्ठे किए और फिर धूमधाम से उसका विवाह किया। इस त्यौहार से जुड़ी और भी कई किवदंतियां हैं। कहा जाता है कि सम्राट अकबर के ज़माने में लाहौर से उत्तर की ओर पंजाब के इलाक़ों में दुल्ला भट्टी नामक एक दस्यु या डाकू हुआ था, जो धनी ज़मींदारों को लूटकर ग़रीबों की मदद करता था। इस गीत का नातालोक नायक दुल्ला भट्टी से ज़रूर है। यह गीत आज भी लोहड़ी के मौक़े पर ख़ूब गया जाता है।
*
लोहड़ी का गीत
सुंदर मुंदरीए होए
सुंदर मुंदरीए होए
तेरा कौन बचारा होए
दुल्ला भट्टी वाला होए
तेरा कौन बचारा होए
दुल्ला भट्टी वाला होए
दुल्ले धी ब्याही होए
सेर शक्कर पाई होए
कुड़ी दे लेखे लाई होए
घर घर पवे बधाई होए
कुड़ी दा लाल पटाका होए
कुड़ी दा शालू पाटा होए
शालू कौन समेटे होए
अल्ला भट्टी भेजे होए
चाचे चूरी कुट्टी होए
ज़िमींदारां लुट्टी होए
दुल्ले घोड़ दुड़ाए होए
ज़िमींदारां सदाए होए
विच्च पंचायत बिठाए होए
जिन जिन पोले लाई होए
सी इक पोला रह गया
सिपाही फड़ के ले गया
आखो मुंडेयो टाणा टाणा
मकई दा दाणा दाणा
फकीर दी झोली पाणा पाणा
असां थाणे नहीं जाणा जाणा
सिपाही बड्डी खाणा खाणा
अग्गे आप्पे रब्ब स्याणा स्याणा
यारो अग्ग सेक के जाणा जाणा
लोहड़ी दियां सबनां नूं बधाइयां
***
दोहा सलिला
सूर्य रश्मि लोरी सुना, कहे जगो हे राम!
राजकुमार उठो करो, धन्य धरा भू धाम।।
कोहरा घूँघट ओट से, कर चितवन का वार।
रश्मि निमंत्रण दे करो, सबसे सब दिन प्यार।।
वाक् ब्रह्म है नाद हरि, ताल- थाप शिव जान।
स्वर सरगम शारद-रमा, उमा तान मतिमान।।
योग प्रयोग करें सतत, मिट जाए हर रोग।
हों वियोग अति भोग से, संयम सदा सुयोग।।
मिला मुकद्दर मुफ्त में, मान महज मेहमान।
अवसर-कशिश की कशिश, घरवाली वत जान।।
श्याम पूर्ण हो शुभ्र से, शुभ्र श्याम से पूर्ण।
शुभ न अशुभ बिन शुभ रहे, अशुभ बिना शुभ चूर्ण।।
कर अक्षर आराधना, होगा नहीं अभाव।
भाव शब्द में रस भरे, सब से कर निभाव।।
००० 
सॉनेट
रस
*
रस जीवन का सार है।
रस बिन नीरस जिंदगी।
रसमय प्रभु की बंदगी।।
सरस ईश साकार है।।
नीरसता भाती नहीं।
बरस बरस रस बरसता।
रस पाने मन तरसता।।
पारसता आती नहीं।।
परस मिले प्रिय का सदा।
चरस दूर हो सर्वदा।
दरस ईश का हो बदा।
हो रसलीन करूँ सृजन।।
रसानंद पा कर जतन।।
हो रसनिधि रसखान मन।।
१४.१.२०२४
•••
शोक गीत
जोशीमठ बर्बाद कर दिया है विकास के नाम पर।
थू थू थू धृतराष्ट्री शासन थू थू तेरे काम पर।।
प्रकृति प्रेमी चेताते थे, हुआ प्रशासन था बहरा।
शासन ने भी बात न मानी, स्वार्थ-राज अंधा ठहरा।।
जंगल काट लिए धरती माँ का है चीर हरा तुमने।
कच्चे नए पहाड़ों की छाती छलनी की दानव ने।।
दुःशासन-शासन को तरस न आता किस्मत वाम पर।
जोशीमठ बर्बाद कर दिया है विकास के नाम पर।
थू थू थू धृतराष्ट्री शासन थू थू तेरे काम पर।।
आँसू बहा रही हैं नदियाँ, चीख रहे पर्वत-टीले।
आर्तनाद करती है जनता, नयन सभी के हैं गीले।।
नेता-अफसर-सेठ काटते माल तिजोरी भरते हैं।
सरकारी धन चारा समझें, बेरहमी से चरते हैं।।
सपने टूट गए, सिर पीटें राहत के पैगाम पर।
जोशीमठ बर्बाद कर दिया है विकास के नाम पर।
थू थू थू धृतराष्ट्री शासन थू थू तेरे काम पर।।
चेताया केदारनाथ ने, लेकिन तनिक नहीं चेते।
बना-बना सीमेंट कंठ गिरि-पर्वत के तुमने रेते।।
पॉवर प्लांट बना न्योता है खुद विनाश को तुमने ही।
बर्फ ग्लेशियर पिघल रहे, यह बतलाया इसरो ने भी।।
धँसती धरा' मशीन दानवी है अभिशाप अवाम पर।
जोशीमठ बर्बाद कर दिया है विकास के नाम पर।
थू थू थू धृतराष्ट्री शासन थू थू तेरे काम पर।।
विस्फोटों से कँपी दिशाएँ, आसमान भी दहल गया।
भाषण-आश्वासन सुन भोला जनगण- जनमत बहल गया।।
बाँध-सुरंगों को रोको, भू संरक्षण तत्काल करो।
दूब-पौध से आच्छादित कर धरती को नवजीवन दो।।
पूर्ण नाश के पहले सम्हले, शासन जीवन-शाम पर।
जोशीमठ बर्बाद कर दिया है विकास के नाम पर।
थू थू थू धृतराष्ट्री शासन थू थू तेरे काम पर।।
सकल हिमालय की घाटी पर खतरा कम मत आँको तुम।
दोष न औरों को दो, अपने अंतर्मन में झाँको तुम।।
जनगण मन ने किया भरोसा, सिसक रहा है ठगा गया।
गया पुराना भी हाथों से, आया हाथ विनाश नया।।
हाय राम! तुम चीख न सुनते, मुग्ध हुए श्री राम पर।
जोशीमठ बर्बाद कर दिया है विकास के नाम पर।
थू थू थू धृतराष्ट्री शासन थू थू तेरे काम पर।।
१४-१-२०२३
•••
सॉनेट
संक्रांति
*
भुवन भास्कर शत अभिनंदन।
दक्षिणायणी था अब तक पथ।
उत्तरायणी होगा अब रथ।।
अर्पित अक्षत रोली चंदन।।
करूँ पुष्प बंधूक समर्पित।
दो संक्रांति काल को मति-गति।
शारद-रमा-उमा की हो युति।।
विधि-हरि-हर मन-मंदिर अर्चित।।
चित्र गुप्त उज्जवल हो अपना।
शुभ सबका, अब रहे न सपना।
सत-शिव-सुंदर हो प्रभु! नपना।।
पोंगल बैसाखी हँस गाए।
बीहू सबको गले लगाए।
मिल खिचड़ी गुड़ लड्डू खाए।।
१४-१-२०२२
***
सॉनेट
रस
*
रस जीवन का सार है।
रस बिन नीरस जिंदगी।
रसमय प्रभु की बंदगी।।
सरस ईश साकार है।।
नीरसता भाती नहीं।
बरस बरस रस बरसता।
रस पाने मन तरसता।।
पारसता आती नहीं।।
परस मिले प्रिय का सदा।
चरस दूर हो सर्वदा।
दरस ईश का हो बदा।
हो रसलीन करूँ सृजन।।
रसानंद पा कर जतन।।
हो रसनिधि रसखान मन।।
१४-१-२०२२
***
गीत
सरकार
*
बेगानी है सरकार
*
करते न जो कहते तुम
कैसे भरोसा हो?
कहते न जो करते तुम।
जनता को दिया बिसार
अब दीख रहा तुमको
मनमानी में ही सार।
बेगानी है सरकार
*
किस्मत के भरोसे ही
आवाज दे रहे हैं
सुनते ही नहीं बहरे।
सुलझे कैसे तकरार
दूर न करते पीर
अनसुनी रही इसरार।
बेगानी है सरकार
***
दोहागीत
संकट में हैं प्राण
*
लोकतंत्र तरु बचाओ
संकट में हैं प्राण
*
अफसरशाही मत्त गज
चाहे सके उखाड़
तना लोकमत तोड़ता
जब-तब मौका ताड़
दलबंदी विषकूप है
विषधर नेता लोग
डँसकर आँसू बहाते
घड़ियाली है सोग
ईश्वर देख; न देखता
कैसे होगा त्राण?
लोकतंत्र तरु बचाओ
संकट में हैं प्राण
*
धनपति चूहे कुतरते
स्वार्थ साधने डाल
शोषण करते श्रमिक का
रहा पेट जो पाल
न्यायतंत्र मधु-मक्षिका
तौला करता न्याय
सुविधा मधु का भोगकर
सूर करे अन्याय
मुर्दों का सा आचरण
चाहें हों संप्राण
लोकतंत्र तरु बचाओ
संकट में हैं प्राण
*
आवश्यकता-डाल पर
आम आदमी झूल
चीख रहा है 'बचाओ
श्वास-श्वास है शूल
पत्रकार पत्ते झरें
करें शहद की आस
आम आदमी मर रहा
ले अधरों पर प्यास
वादों को जुमला कहे
सत्ता डँस; ले प्राण
लोकतंत्र तरु बचाओ
संकट में हैं प्राण
*
१४-१-२०२१
नवगीत
दूर कर दे भ्रांति
*
दूर कर दे भ्रांति
आ संक्राति!
हम आव्हान करते।
तले दीपक के
अँधेरा हो भले
हम किरण वरते।
*
रात में तम
हो नहीं तो
किस तरह आये सवेरा?
आस पंछी ने
उषा का
थाम कर कर नित्य टेरा।
प्रयासों की
हुलासों से
कर रहां कुड़माई मौसम-
नाचता दिनकर
दुपहरी संग
थककर छिपा कोहरा।
संक्रमण से जूझ
लायें शांति
जन अनुमान करते।
*
घाट-तट पर
नाव हो या नहीं
लेकिन धार तो हो।
शीश पर हो छाँव
कंधों पर
टिका कुछ भार तो हो।
इशारों से
पुकारों से
टेर सँकुचे ऋतु विकल हो-
उमंगों की
पतंगें उड़
कर सकें आनंद दोहरा।
लोहड़ी, पोंगल, बिहू
जन-क्रांति का
जय-गान करते।
*
ओट से ही वोट
मारें चोट
बाहर खोट कर दें।
देश का खाता
न रीते
तिजोरी में नोट भर दें।
पसीने के
नगीने से
हिंद-हिंदी जगजयी हो-
विधाता भी
जन्म ले
खुशियाँ लगाती रहें फेरा।
आम जन के
काम आकर
सेठ-नेता काश तरते।
१२-१-२०१७
***
बाल नवगीत:
*
सूरज बबुआ!
चल स्कूल
.
धरती माँ की मीठी लोरी
सुनकर मस्ती खूब करी
बहिन उषा को गिरा दिया
तो पिता गगन से डाँट पड़ी
धूप बुआ ने लपक चुपाया
पछुआ लाई
बस्ता-फूल
सूरज बबुआ!
चल स्कूल
.
जय गणेश कह पाटी पूजन
पकड़ कलम लिख ओम
पैर पटक रो मत, मुस्काकर
देख रहे भू-व्योम
कन्नागोटी, पिट्टू, कैरम
मैडम पूर्णिमा के सँग-सँग
हँसकर
झूला झूल
सूरज बबुआ!
चल स्कूल
.
चिड़िया साथ फुदकती जाती
कोयल से शिशु गीत सुनो
'इकनी एक' सिखाता तोता
'अ' अनार का याद रखो
संध्या पतंग उड़ा, तिल-लड़ुआ
खा पर सबक
न भूल
सूरज बबुआ!
चल स्कूल
...
लघुकथा-
पतंग
*
- बब्बा! पतंग कट गयी....
= कट गयी तो कट जाने दे, रोता क्यों है? मैंने दूसरी लाकर रखी है, वह लेकर उड़ा ले।
- नहीं, नयी पतंग उड़ाऊँगा तो बबलू फिर काट देगा।
= काट देगा तो तू फिर नयी पतंग ले जाना और उड़ाना
- लेकिन ऐसा कब तक करूँगा?
= जब तक तू बबलू की पतंग न काट दे। जीतने के लिये हौसला, कोशिश और जुगत तीनों जरूरी हैं। चरखी और मंझा साथ रखना, पतंग का संतुलन साधना, जिस पतंग को काटना हो उस पर और अपनी पतंग दोनों पर लगातार निगाह रखना, मौका खोजना और झपट्टा मारकर तुरंत दूर हो जाना, जब तक सामनेवाला सम्हाले तेरा काम पूरा हो जाना चाहिए। कुछ समझा?
- हाँ, बब्बा! अभी आता हूँ काटकर बबलू की पतंग।
***
लघुकथा -
रफ्तार
*
प्रतियोगिता परीक्षा में प्रथम आते ही उसके सपनों को रफ्तार मिल गयी। समाचार पत्रों में सचित्र समाचार छपा, गाँव भी पहुँचा। ठाकुर ने देखा तो कलेजे पर साँप लोट गया। कर्जदार की बेटी हाकिम होकर गाँव में आ गयी तो नाक न कट जायेगी? जैसे भी हो रोकना होगा।
जश्न मनाने के बहाने हरिया को जमकर पिलाई और बिटिया के फेरे अपने निकम्मे शराबी बेटे से करने का वचन ले लिया। उसने नकारा तो पंचायत बुला ली गयी जिसमें ठाकुर के चमचे ही पञ्च थे जिन्होंने धार्मिक पाखंड की बेडी उसके पैर में बाँधने वरना जात बाहर करने का हुक्म दे दिया।
उसके अपनों और सपनों पर बिजली गिर पड़ी। उसने हार न मानी और रातों-रात दद्दा को भेज महापंचायत करा दी जिसने पंचायत का फैसला उलट दिया। ठाकुर के खिलाफ दबे मामले उठने लगे तो वह मन मसोस कर बैठ रहा।
उसने धार्मिक पाखंड, सामाजिक दबंगई और आर्थिक शोषण के त्रिकोण से जूझते हुए भी फिर दे दी अपने सपनों को रफ्तार।
***
लघुकथा:
अनजानी राह
*
कोशिश रंग ला पाती इसके पहले ही तूफ़ान ने कदमों को रोक दिया, धूल ने आँखों के लिये खुली रहना नामुमकिन कर दिया, पत्थरों ने पैरों से टकराकर उन्हें लहुलुहान कर दिया, वाह करनेवाला जमाना आह भरकर मौन हो रहा।
इसके पहले कि कोशिश हार मानती, कहीं से आवाज़ आयी 'चली आओ'। कौन हो सकता है इस बवंडर के बीच आवाज़ देनेवाला? कान अधिकाधिक सुनने के लिये सक्रिय हुए, पैर सम्हाले, हाथों ने सहारा तलाशा, सर उठा और चुनौती को स्वीकार कर सम्हल-सम्हल कर बढ़ चला उस ओर जहाँ बाँह पसारे पथ हेर रही थी अनजानी राह।
***
लघुकथा-
चेतना शून्य
*
उच्च पदस्थ बेटी की उपलब्धि पर आयोजित अभिनन्दन भोज में आमंत्रित माँ पहुँची। बेटी ने शैशव में दिवंगत हो चुके पिता के निधनोपरांत माँ द्वारा लालन-पालन किये जाने पर आभार व्यक्त करते हुए अपनी श्रेष्ठ शिक्षा, आत्म विश्वास और उच्च पद पाने का श्रेय माँ को दिया तो पत्रकारों के प्रश्न और छायाकारों के कैमरे माँ पर केंद्रित हो गये।
सामान्य घरेलू जीवन की अभ्यस्त माँ असहज अनुभव कर शीघ्र ही हट गयी। घर आते ही माँ ने बेटी से उसकी सफलता के इतने बड़े आयोजन में उसके जीवन साथी और संतान की अनुपस्थिति के बारे पूछा। बेटी ने झिझकते हुए अपने लिव इन रिलेशन, वैचारिक टकराव और जीवनसाथी तथा संतान से अलगाव की जानकारी दी। माँ को लगा वह हुई जा रही है चेतना शून्य ।
***
लघुकथा :
सहारे की आदत
*
'तो तुम नहीं चलोगे? मैं अकेली ही जाऊँ?' पूछती हुई वह रुँआसी हो आयी किंतु उसे न उठता देख विवश होकर अकेली ही घर से बाहर आयी और चल पड़ी अनजानी राह पर।
रिक्शा, रेलगाड़ी, विमान और टैक्सी, होटल, कार्यालय, साक्षात्कार, चयन, दायित्व को समझना-निभाना, मकान की तलाश, सामान खरीदना-जमाना एक के बाद एक कदम-दर-कदम बढ़ती वह आज विश्राम के कुछ पल पा सकी थी। उसकी याद सम्बल की तरह साथ होते हुए भी उसके संग न होने का अभाव खल रहा था।
साथ न आया तो खोज-खबर ही ले लेता, मन हुआ बात करे पर स्वाभिमान आड़े आ गया, उसे जरूरत नहीं तो मैं क्यों पहल करूँ? दिन निकलते गये और बेचैनी बढ़ती गयी। अंतत: मन ने मजबूर किया तो चलभाष पर संपर्क साधा, दूसरी और से उसकी नहीं माँ की आवाज़ सुन अपनी सफलता की जानकारी देते हुए उसके असहयोग का उलाहना दिया तो रो पड़ी माँ और बोली बिटिया वह तो मौत से जूझ रहा है, कैंसर का ऑपरेशन हुआ है, तुझे नहीं बताया कि फिर तू जा नहीं पाती। तुझे इतनी रुखाई से भेजा ताकि तू छोड़ सके उसके सहारे की आदत।
स्तब्ध रह गयी वह, माँ से क्या कहती?
तुरंत बाद माँ के बताये चिकित्सालय से संपर्क कर देयक का भुगतान किया, अपने नियोक्ता से अवकाश लिया, आने-जाने का आरक्षण कराया और माँ को लेकर पहुँची चिकित्सालय, वह इसे देख चौंका तो बोली मत परेशान हो, मैं तम्हें साथ ले जा रही हूँ। अब मुझे नहीं तुम्हें डालनी है सहारे की आदत।
***
लघुकथा-
यह स्वप्न कैसा?
*
आप एक कार से उतर कर दूसरी में क्यों बैठ रहे है? जहाँ जाना है इसी से चले जाइये न.
नहीं भाई! अभी तक सरकारी दौरा कर रहा था इसलिए सरकारी वाहन का उपयोग किया, अब निजी काम से जाना है इसलिए सरकारी वाहन और चालक छोड़कर अपने निजी वाहन में बैठा हूँ और इसे खुद चलाकर जा रहा हूँ अगर मैं जन प्रतिनिधि होते हुए सरकारी सुविधा का दुरूपयोग करूँगा तो दूसरों को कैसे रोकूँगा?
सोच रहा हूँ जो कभी साकार न हो सके वह स्वप्न कैसा?
***
लघुकथा
जीत का इशारा
*
पिता को अचानक लकवा क्या लगा घर की गाड़ी के चके ही थम गये। कुछ दिन की चिकित्सा पर्याप्त न हुई. आय का साधन बंद और खर्च लगातार बढ़ता हुआ रोजमर्रा के खर्च, दवाई-इलाज और पढ़ाई।
उसने माँ के चहरे की खोटी हुई चमक और पिता की बेबसी का अनुमान कर अगले सवेरे औटो उठाया और चल पड़ी स्टेशन की ओर। कुछ देर बाद माँ जागी, उसे घर पर न देख अनुमान किया मंदिर गयी होगी। पिता के उठते ही उनकी परिचर्या के बाद तक वह न लौटी तो माँ को चिंता हुई, बाहर निकली तो देखा औटो भी नहीं है।
बीमार पति से क्या कहती?, नन्हें बेटे को जगाकर पडोसी को बुलाने का विचार किया। तभी एकदम निकट हॉर्न की आवाज़ सुनकर चौंकी। पलट कर देख तो उन्हीं का ऑटो था। ऑटो लेकर भागने वाले को पकड़ने के लिए लपकीं तो ठिठक कर रह गयीं, चालक के स्थान पर बैठी बेटी कर रही थी जीत का इशारा।
***
लघुकथा -
संक्रांति
*
- छुटका अपनी एक सहकर्मी को आपसे मिलवाना चाहता है, शायद दोनों....
= ठीक है, शाम को बुला लो, मिलूँगा-बात करूँगा, जम गया तो उसके माता-पिता से बात की जाएगी।बड़की को कहकर तमिल ब्राम्हण, छुटकी से बातकर सरदार जी और बड़के को बताकर असमिया को भी बुला ही लो।
- आपको कैसे?... किसी ने कुछ.....?
= नहीं भई, किसी ने कुछ नहीं कहा, उनके कहने के पहले ही मैं समझ न लूँ तो उन्हें कहना ही पड़ेगा। ऐसी नौबत क्यों आने दूँ? हम दोनों इस घर-बगिया में सूरज-धूप की तरह हैं। बगिया में किस पेड़ पर कौन सी बेल चढ़ेगी, इसमें सूरज और धूप दखल नहीं देते, सहायता मात्र करते हैं।
- किस पेड़ पर कौन सी बेल चढ़ाना है यह तो माली ही तय करता है फिर हम कैसे यह न सोचें?
= ठीक कह रही हो, किस पेड़ों पर किन लताओं को चढ़ाना है, यह सोचना माली का काम है। इसीलिये तो वह माली ऊपर बैठे-बैठे उन्हें मिलाता रहता है। हमें क्या अधिकार कि उसके काम में दखल दें?
- इस तरह तो सब अपनी मर्जी के मालिक हो जायेंगे, घर ही बिखर जायेगा।
= ऐसे कैसे बिखर जायेगा? हम संक्रांति के साथ-साथ पोंगल, लोहड़ी और बीहू भी मना लिया करेंगे, तब तो सब एक साथ रह सकेंगे। सब अँगुलियाँ मिलकर मुट्ठी बनेंगीं तभी तो मनेगी संक्रांति।
१४.१.२०१६
***
नवगीत:
.
काल है संक्रांति का
तुम मत थको सूरज!
.
दक्षिणायन की हवाएँ
कँपाती हैं हाड़
जड़ गँवा, जड़ युवा पीढ़ी
काटती है झाड़
प्रथा की चूनर न भाती
फेंकती है फाड़
स्वभाषा को भूल, इंग्लिश
से लड़ाती लाड़
टाल दो दिग्भ्रान्ति को
तुम मत रुको सूरज!
*
उत्तरायण की फिज़ाएँ
बनें शुभ की बाड़
दिन-ब-दिन बढ़ता रहे सुख
सत्य की हो आड़
जनविरोधी सियासत को
कब्र में दो गाड़
झाँक दो आतंक-दहशत
तुम जलाकर भाड़
ढाल हो चिर शांति का
तुम मत झुको सूरज!
६-१-२०१५
***
नवगीत:
आओ भी सूरज
*
आओ भी सूरज!
छट गये हैं फूट के बादल
पतंगें एकता की मिल उड़ाओ
गाओ भी सूरज!
*
करधन दिप-दिप दमक रही है
पायल छन-छन छनक रही है
नच रहे हैं झूमकर मादल
बुराई हर अलावों में जलाओ
आओ भी सूरज!
*
खिचड़ी तिल-गुड़वाले लडुआ
पिज्जा तजकर खाओ बबुआ
छोड़ बोतल उठा लो छागल
पड़ोसी को खुशी में साथ पाओ
आओ भी सूरज!
*
रविवार, ४ जनवरी २०१५
***
नवगीत:
संक्रांति काल है
.
संक्रांति काल है
जगो, उठो
.
प्रतिनिधि होकर जन से दूर
आँखें रहते भी हो सूर
संसद हो चौपालों पर
राजनीति तज दे तंदूर
संभ्रांति टाल दो
जगो, उठो
.
खरपतवार न शेष रहे
कचरा कहीं न लेश रहे
तज सिद्धांत, बना सरकार
कुर्सी पा लो, ऐश रहे
झुका भाल हो
जगो, उठो
.
दोनों हाथ लिये लड्डू
रेवड़ी छिपा रहे नेता
मुँह में लैया-गज़क भरे
जन-गण को ठेंगा देता
डूबा ताल दो
जगो, उठो
.
सूरज को ढाँके बादल
सीमा पर सैनिक घायल
नाग-सांप फिर साथ हुए
गुँजा रहे बंसी-मादल
छिपा माल दो
जगो, उठो
.
नवता भरकर गीतों में
जन-आक्रोश पलीतों में
हाथ सेंक ले कवि तू भी
जाए आज अतीतों में
खींच खाल दो
जगो, उठो
२-१-२०१५
***