रविवार, 28 जुलाई 2019

दोहा दुनिया

दोहा दुनिया
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जब तक मन उन्मन न हो, तब तक तन्मय हो न
शांति वरण करना अगर, कुछ अशान्ति भी बो न
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तब तक कुछ मिलता कहाँ, जब तक तुम कुछ खो न.
दूध पिलाती माँ नहीं, बच्चा जब तक रो न.
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खोज-खोजकर थक गया, किंतु मिला इस सा न.
और सभी कुछ मिला गया, मगर मिला उस सा न.
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बहुत हुआ अब मानिए, रूठे रहिए यों न.
नीर-क्षीर सम हम रहे, मिल आपस में ज्यों न.
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गँवा नहीं सकते कभी, जब तक लें कुछ पा न.
अधर अधर से मिल रचे, जब खाया हो पान.
२८-७-२०१८
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संजीव 

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