शुक्रवार, 26 जुलाई 2019

मुक्तक, द्विपदी दोहे,

मुक्तक 

खिलखिलाती रहो, चहचहाती रहो 
जिंदगी में सदा गुनगुनाती रहो
मेघ तम के चलें जब गगन ढाँकने
सूर्य को आईना हँस दिखाती रहो
*
गए मिलने गले पड़ने नहीं,पर तुम न मानोगे.
दबाने-काटने के जुर्म में, बंदूक तानोगे.
चलाओ स्वच्छ भारत का भले अभियान हल्ला कर-
सियासत कीचड़ी कर, हाथ से निज पंक सानोगे
*
द्विपदी 
ग़ज़ल कहती न तू आ भा, ग़ज़ल कहती है जी मुझको 
बताऊँ मैं उसे कैसे, जिया है हमेशा तुझको
*
न बारिश तुम इसे समझो, गिरा है आँख से पानी. 
जो आहों का असर होगा, कहाँ जाओगे ये सोचो.
*
न केवल बात में, हालात में भी है वहाँ सीलन 
जहाँ फौजों के साए में, चुनावी जीत होती है
*


दोहे 

डर से डर ही उपजता, मिले स्नेह को स्नेह. 
निष्ठा पर निष्ठा अडिग, सम हो गेह-अगेह.



*
मन के मनसबदार! तुम, कहो हुए क्यों मौन?
तनकर तन झट झुक गया, यहाँ किसी का कौन?
*
हम सब कारिंदे महज, एक राम दीवान
करा रहा वह; भ्रम हमें, अपना होता मान 
*
वही द्विवेदी जो पढ़े, योग-भोग दो वेद.
अंत समय में हो नहीं, उसको किंचित खेद.
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शोक न करता जो कभी, कहिए उसे अशोक.
जो होता होता रहे, कोई न सकता रोक
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जहाँ अँधेरा घोर हो, बालें वहीं प्रदीप 
पल में तम कर दूर दे, ज्यों मोती सह सीप
*
विजय भास्कर की तभी, तिमिर न हो जब शेष
ऊषा दुपहर साँझ को, बाँटे नेह अशेष
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चमक रहे चमचे चतुर, गोल-मोल हर बात 
पोल ढोल की खुल रही, नाजुक हैं हालात
*
सेना नौटंकी करे, कहकर आम चुनाव.
जिसको चाहे लड़ा दे, डगमग है अब नाव
*

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