रविवार, 7 जुलाई 2019

विलक्षण साहित्य साधक –संजीव वर्मा 'सलिल' डॉ. पुष्पा जोशी



विलक्षण साहित्य साधक –संजीव वर्मा 'सलिल'
डॉ. पुष्पा जोशी 
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संजीव जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर ट्रू मीडिया राष्ट्रीय पत्रिका में जब विशेषाँक निकालने की बात चली तो मुझे लगा कि बेशक संजीव जी के महादेवी वर्मा जी से पारिवारिक संबंध हैं परंतु हमसे भी उनके शब्द संबंध तो हैं ही । इसी संबंध के चलते लगा उनके विषय में कुछ लिखूँ । मुझे याद आ रहा ११ जनवरी २०१८  का वह दिन जब विश्व पुस्तक मेले में लेखक मंच पर ऋत फाउंडेशन एवं युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच के तत्वाधान में पुस्तक लोकार्पण एवं साहित्यिक परिचर्चा में मुख्य अतिथि के आसन पर संजीव जी विराजमान थे । ''साहित्य और राज्याश्रय'' विषयक परिचर्चा में मैं सद्म को संबोधित काट रही थी।  कुछ देर बाद जब सलिल जी का बोलने का समय आया तो उन्होंने सबसे पहले पूर्व वक्ताओं, विमोचित पुस्तकों और उनके लेखकों के नामों का संयोजन करते हुए तत्काल रचित छंद सुनाये, सभागार करतल ध्वनि से गूँज उठा। तभी उनकी काव्य क्षमता का अनुमान हो गया.... भात तैयार हो गया यह जानने के लिए चावल के एक दो- दाने ही तो पतीली से निकाल कर दबाकर तसल्ली कर ली जाती है। 

संजीव जी आजकल सवैया छंद पर काम कर रहे हैं। मुझे लगता है नवान्वेषित सवैये उन्हें साहित्याकाश की ऊँचाईयों पर ले जाएंगे। आईये ! देखते हैं एक सवैया –
तलाशते रहे कमी, न खूबियाँ निहारते , प्रसन्नता कहाँ मिले ?
विराजते रहें हमीं, न और को पुकारते, हँसी–खुशी कहाँ मिले?
बटोरते रहे सदा, न रंक बंधु हो सके, न आसमां–जमीं मिले ।
निहारते रहे छिपे, न मीत प्रीत पा सके, मिटे–कभी नहीं गिले।

साहित्य में नए प्रयोग करने में सलिल जी का सानी नहीं। जापानी छंद हाइकु से बने गीत की एक झलक -
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आँख का पानी,
मर गया तो कैसे
धरा हो धानी?...
*
तोड़ बंधन
आँख का पानी बहा.
रोके न रुका.
आसमान भी
हौसलों की ऊँचाई
के आगे झुका.
कहती नानी
सूखने मत देना
आँख का पानी....
*
हमारी सनातन परंपराओं का निर्वहन करते हुए भी सलिल जी साहित्य को नहीं भूलते। पितृ पक्ष में तर्पण से जुड़ा नवगीत सलिल जी की सामर्थ्य का प्रमाण है।  कुछ पंक्तियाँ देखें-  
पुरुखों!
तुम्हें तिलोदक अर्पित
*
श्री-समृद्धि दी तुमने हमको
हम देते तिल-पानी
भूल विरासत दान-दया की
जोड़ रहे अभिमानी
भोग न पाते, अगिन रोगों का
देह बनी है डेरा
अपयश-अनदेखी से अाहत
मौत लगाती फेरा
खाली हाथ न फैला पाते
खुद के बैरी दर्पित
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सलिल जी के कवि हृदय ने कल्पना के सप्तरंगी आकाश में आसन जमाकर जिस काव्य का सृजन किया है, वह घर-घर पहुँचे। अपनी अन्तर्मुखी मनोवृत्ति एवं साहित्य सुलभ गहरे अनुभवों के कारण आपके द्वारा रचित काव्य में वेदना एवं सूक्ष्म अनुभूतियों के कोमल भाव मुखरित हुए हैं। आपके काव्य में संगीतात्मकता एवं भाव-तीव्रता का सहज स्वाभाविक समावेश हुआ है। साहित्य के विलक्षण साधक आप निरंतर साहित्य –पथ पर अग्रसर रहें, युगों-युगों तक आपका यश गान हो।
[लेखिका परिचय: सह- संपादक ट्रू मीडिया नोएडा एक्सटैंशन यू.पी.] 

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