रविवार, 7 जुलाई 2019

जापानी छंद ताँका

जापानी छंद ताँका (短歌) 
जापानी काव्य की कई सौ साल पुरानी काव्य विधा तांका को नौवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी के मध्य प्रसिद्धि मिली। उस समय इसके विषय धार्मिक या दरबारी हुआ करते थे। तांका में क्रमश: ७+५+७+७=३१ वर्णों की पाँच पंक्तियाँ होती है। तांका की रचना दो कवि मिलकर करते रहे। भारत में प्रश्नोत्तर शैली में वाचिक लोक छंदों बम्बुलिया आदि की सुदीर्घ परंपरा रही है। इनमें दो अलग-अलग स्थानों सामान्यत: खेतों के मचान पर एक-दूसरे से अनजान गायक टेर (आवाज) सुन कर ही सहभागी हो जाते थे। बम्बुलिया में वर्ण या मात्रा के स्थान पर लय प्रधान होती है जबकि तांका में एक कवि पहले भाग में ५+७+५=१७ ध्वनिखण्डों की रचना करता था तो दूसरा कवि दूसरे भाग में ७+७=१४ ध्वनिखण्डों की रचना कर छंद को पूर्ण करता था। फिर पूर्ववर्ती ७+७ ध्वनिखंड को आधार बनाकर अगली शृंखला में ५+७+५ ध्वनि खंड प्रस्तुत करता था और यह क्रम चलता रहता था। सूत्रबद्धता के कारण ऐसी श्रंखलाओं में  तांका की संख्या १०० तक भी पहुँच जाती थी। इस काव्य शृंखला को रेंगा कहा जाता था। 
ताँका की पाँच पंक्तियों और ५+७+५+७+७=३१ ध्वनिखण्डों ( सामान्यत: वर्णों) के लघु कलेवर में भावों को गुम्फित करना सतत अभ्यास और सजग शब्द साधना से ही सम्भव है। taanka की पहली तीन पंक्तियाँ स्वतन्त्र हाइकु नहीं होतीं। तांका का कथ्य पहली से पाँचवीं पंक्ति तक व्याप्त होकर पाँचवी पंक्ति में पूर्ण होता है।
ताँका का शाब्दिक अर्थ लघुगीत अथवा छोटी कविता है। लयविहीन काव्यगुण (सार्थकता, माधुर्य, लालित्य, बिम्ब, प्रतीक आदि) से हीन रचना, ५+७+५+७+७ वर्ण की काया धारण करने मात्र से ताँका नहीं बन सकती। ताँका को किसी विषय विशेष तक सीमित नहीं होता। हाइकु का उद्भव तांका से ही हुआ है। 
हाइकु 
मूलत: जापानी काव्य विधा हाइकु जापानी संस्कृति की परम्परा, जापानी जनमानस और सौन्दर्य चेतना में उत्पन्न, प्रचलित और विकसित हुआ है। हाइकु में अनेक विचार-धाराओं यथा- बौद्ध-धर्म (आदि रूप, उसका चीनी और जापानी परिवर्तित रूप, विशेष रूप से जेन सम्प्रदाय) चीनी दर्शन और प्राच्य-संस्कृति से संबंधित विचार-धाराओं की झाँकी मिल जाती है। हाइकु को काव्य विधा के रूप में मात्सुओ बाशो(१६४४-१६९४) ने प्रतिष्ठा प्रदान की।  १७ वीं शताब्दी में जीवन - दर्शन से जुड़कर जापानी काव्य की युगधारा के रूप में प्रवाहित होकर अब विश्व वांग्मय की अमूल्य निधि है। हाइकु अनुभूति के चरम क्षण की काव्याभिव्यक्ति है। बिंब-सामीप्यता (juxtaposition of the images) हाइकु संरचना का मूल लक्षण है। हाइकु तीन पंक्तियों में ५-७-५=१७ ध्वनि-खण्डों की कविता है। विविध भाषाओं में ध्वनिखण्डों को  लिपिबद्ध करने और गिनने के नियम भिन्न-भिन्न हैं किंतु तीन पंक्तियों का नियम सभी में सामान्य है। कीगो (ऋतु, मौसम या प्रकृति से जुड़े शब्द) हाइकु का वैशिष्ट्य है किंतु अनिवार्यता नहीं। मानव मन की अनुभूति, प्राणी-प्रेम आदि भी हाइकु के विषय होते हैं। 

हिंदी में हाइकु, तांका, रेंगा या सदोका आदि जापानी छंदों का भारतीयकरण कर विषयवस्तु संबंधी पारम्परिकता से मुक्ति पा ली गयी है। साथ ही ध्वनिखंड की गणना उच्चार के आधार पर तथा वर्ण के आधार पर करनेवाली दो धाराएँ समांतर बह रही हैं जो एक-दूसरे को गलत ठहराती रहती हैं। लघु छंद हाइकु की रचना जितनी आसान है उत्तम हाइकु रच पाना उतना ही कठिन है। डॉ॰ करुणेश प्रकाश भट्ट ने लखनऊ विश्वविद्यालय से हाइकु पर शोध किया है।
सन्दर्भ: 
१.Ueda, Makoto.Modern Japanese Tanka. NY: Columbia University Press, 1996. p1.ISBN 978-0-231-10433-3
२.Keene, Donald. A History of Japanese Literature: Volume 1. NY: Columbia University Press, 1999. p98, 164. ISBN 978-0-231-11441-7
३. धर्मयुग, १६ अक्टूबर १९६६
४. जापानी कविताएँ, अनुवादक- डॉ॰सत्यभूषण वर्मा, सीमान्त पब्लिकेशंस इंडिया, १९७७, पृष्ठ-२२
५.हाइकु दर्पण, प्रकाशक- हाइकु दर्पण, बी-12 ए / 58 ए, धवलगिरि, सेक्टर-34, नोएडा-201301
६. हिन्दी तथा आधुनिक जापानी हाइकु का तुलनात्मक अध्ययन, डॉ॰ करुणेश प्रकाश भट्ट, संस्करण-प्रथम 2013, विकास प्रकाशन, 311 सी, विश्व बैंक बर्रा, कानपुर-208027, ISBN- 978-93-81317-58-7  

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