बुधवार, 10 जुलाई 2019

ट्रू मिडिया : संध्या सिंह


एक बटोही की छंद यात्रा
संध्या सिंह 
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किसी व्यक्ति को जानने के लिए ज़रूरी नहीं कि लम्बे समय तक बार बार मिल कर बहस और चर्चाएँ हों। कभी कभी कुछ मुलाकातें और आत्मीयता के साथ महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर किया गया विचार-विमर्श एवं सीमित समय में सार्थक चर्चा भी अमिट प्रभाव छोड़ती है। छंद आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' जी के साथ मेरा ऐसा ही अनुभव है विनम्र और दृढ संजीव 'सलिल' जी ने अनेक सेमिनार और संगोष्ठियों में अपने प्रभावी वक्तव्य से सदा श्रोताओं का न केवल ज्ञान वर्धन किया अपितु एक सरसता और रोचकता निरंतर बनाए रखी इस दौर में जब कविता छंद से बाहर हो कर अपना प्रवाह खो चुकी है, शब्द बेलगाम हो कर लय ताल पर संकट पैदा कर चुके हैं, कविता तरल न हो कर ठोस होती जा रही है, गद्य और पद्य में अंतर करना मुश्किल हो गया है, ऐसे कठिन समय में संजीव जी का शब्दों के अनुशासन का न केवल पालन करना अपितु लोगों में जागरूकता बढाने के लिये सतत प्रयासरत रहना एक सुखद संकेत है|
धीर-गंभीर संजीव जी किसी परिचय के मोहताज नहीं उन्होंने छंदों के शिल्प पर न केवल निरंतर कार्य किया अपितु लगातार सृजन भी करते रहे हैं । छंदों पर आधारित प्रश्नोत्तर काल में वे बड़ी निपुणता से गंभीर श्रोताओं की न केवल जिज्ञासा शांत करते हैं अपितु सहज संवाद से उनके साथ एक तारतम्य बना लेते हैं। श्रोता की मानसिक तरंगों से जुड़ना उन्हें भली-भाँति  आता है सधी हुई दृढ़ आवाज़ में एक एक प्रश्न का तार्किक उत्तर दे कर संजीव जी एक ज़िम्मेदार वक्ता का धर्म बखूबी निभाते हैं
उनकी रचनाओं से गुजरने पर एहसास हुआ जैसे अनुभूतियों की एक व्यवस्थित सड़क से गुजरता हुआ शब्दों का अनुशासित यातायात हो। छंद के कड़े अनुशासन में चुने हुए शब्द उन्हें एक शब्द शिल्पी के रूप में स्थापित करते हैंउनके विविध विषयों पर लिखे दोहों में आध्यात्म पर बहुत प्रभावी दोहे हैं। जीवन की छोटी छोटी घटनाओं में आनंद लेने का सन्देश देते हुए ये दोहे अमूल्य हैं -----
छोटी-छोटी बात में, रस लेना मत भूल।
छुओ सलिल किंचित अगर, लगे खिले शत फ़ूल।
लाओत्से ने बताया, नहीं सरलता व्यर्थ।
रस बिन भोजन का नहीं, सत्य समझ कुछ अर्थ।।
जैसे बूँद-बूँद से सागर भरता है इसी प्रकार छोटी-छोटी खुशियों से ही मिल कर जीवन सुखी होता है - 
सार्थक सन्देश देता हुआ एक और दोहा देखिये
युग-परिवर्तन अटल है, पर न भुला गंतव्य।
सबका सबसे हो भला, साध्य यही मंतव्य।।
सलिल जी ने जहाँ एक ओर आध्यात्म पर दोहे लिखे वहीं दूसरी ओर वसंत जैसे मादक विषय पर भी सफलता से उदगार व्यक्त किये। यही विविधता उन्हें सम्पूर्णता की ओर ले जाती है उदाहरण देखें -
पर्ण-पर्ण पर छा गया, मादक रूप निखार
पवन खो रहा होश है, लख वनश्री श्रृंगार
मैं तुम यह वह ही नहीं, बौराया संसार
ऋतु बसंत में मन करे, मिल लें गले खुमार
सिलसिलेवार चलते हुए वसंत की खुमारी और आध्यात्म के बाद एक और अनमोल दोहा भी में देखते चलें आत्मशुद्धि के लिए सहज सरल शब्द चयन में एक उच्च विचार को बाँधना भी एक दुष्कर कार्य है जिसे उन्होंने बखूबी अंजाम दिया --
घर आँगन तन धो लिया, सचमुच रूप निखार
अपने मन का मैल भी, हँसकर 'सलिल' बुहार
इसी क्रम में उनकी एक सशक्त बुन्देली मुक्तिका देखिये जिस तरह व्यंग्य में वो नसीहत देते हैं-
बखत बदल गओ, आँख चुरा रए।
सगे पीठ में भोंक छुरा रए।।
लतियाउत तें कल लों जिनखों
बे नेतन सें हात जुरा रए।।
पाँव कबर मां लटकाए हैं
कुर्सी पा खें चना मुरा रए।। 
पान तमाखू गुटका खा खें
भरी जवानी गाल झुरा रए।। 
झूठ प्रसंसा सुन जी हुमसें
सांच कई तें अश्रु ढुरा रए।। 
अगर इसके शब्द विन्यास पर गौर करें तो इसके एक-एक युग्म में संजीव जी ने बुन्देली मधुरता कायम रखते हुए तीखे प्रहार किये हैं पान तम्बाकू गुटका खैनी खाने वालों को सिरे से फटकार लगाई है संजीव 'सलिल' जी की ने छंद विधान पर बहुत कार्य  किया है शब्द कौशल के साथ उपेक्षित और लुप्त प्राय छंदों को पुनर्जीवित ही नहीं किया ५०० प्रकार से अधिक नए  छंदों का अन्वेषण कर पिंगल शास्त्र को समृद्ध किया है।  उदाहरण स्वरूप -
अमरकंटक छंद 
विधान- 
१. प्रति पंक्ति ७ मात्रा।  
२.  प्रति पंक्ति मात्रा क्रम : लघु लघु लघु गुरु लघु लघु। 
मात्र सात-सात मात्रा की पंक्तियों में अपनी बात कहना आसान नहीं है।  गीत 'नरक चौदस' का एक अंश देखें कि गीत किस प्रकार छंद विशेष पर कितनी साधना और अनुशासन का प्रमाण है -
मनुज की जय 
नरक चौदस
.
मटकना मत / भटकना मत
अगर चोटिल / चटकना मत
नियम-संयम / वरित चौदस
मनुज की जय
नरक चौदस
.
बहक बादल / मुदित मादल
चरण नर्तित / बदन छागल
नरमदा मन '/ सलिल' चौदस
मनुज की जय
नरक चौदस
उपर्युक्त गीतांश सजीव 'सलिल' जी की कठिन छंद साधना का दुर्लभ उदाहरण है। कहना अतिशियोक्ति नहीं कि आचार्य संजीव 'सलिल' जी के महत्त्वपूर्ण आलेख, वक्तव्य उनकी रचनात्मकता, उनके छंद ज्ञान से होती हुई उनकी साहित्यिक यात्रा ने छंद और गीतों को पुनर्स्थापित करने में अपनी अविस्मरणीय सहभागिता दर्ज कराई है। आचार्य संजीव 'सलिल' जी न केवल सृजन की दुनिया में अपितु बाहर के क्षेत्र में भी एक लोकप्रिय व्यक्तित्व के स्वामी हैं एक ओर छंद और शिल्प में उनका कठोर अनुशासन एवं दूसरी ओर उनका सहज सरल मित्रवत व्यवहार उन्हें विशेष बनाता है हम उनकी इस उपलब्धि पर उन्हें बधाई देते हैं और उनके दीर्घायु होने की कामना करते हैं
*
[लेखिका परिचय: संध्या सिंह, सफल नवगीतकार, एक संग्रह प्रकाशित, संपर्क : डी १२२५ इंदिरा नफ़र, लखनऊ २२६०१६, उत्तर प्रदेश, चलभाष: ७३८८१७८४५९, ७३७६०६१०५६, sandhya.20july@gmail.com
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"आदरणीया मंजूषा मन,
आप आचार्य संजीव 'सलिल' से चार वर्ष पूर्व मिलीं और इतना कुछ लिख डाला, हम दादा को विगत २५ वर्षों से 
जानते हैं।
'लोकतंत्र का मकबरा' काव्य-संग्रह का लोकार्पण उन्होंने कृपाकर हमारे लखनऊ आवास पर आकर श्री गिरीश नारायण पाण्डेय, वरि०साहि० एवं तत्कालीन आयकर आयुक्त के कर-कमलों द्वारा लखनऊ नगर के साहित्य -कारों के बीच इं०अमरनाथ और इं० गोविन्दप्रसाद तथा इं०संतोष प्रकाश माथुर ,संयुक्त प्र०नि०सेतु निगम एवं अध्यक्ष 'अभियान' की उपस्थिति में कराया था।
बाद में वे इन्स्टीट्यूटशन्स आफ़ इन्जीनियर्स आफ़ इण्डिया आदि की पत्रिका से सम्बद्ध होकर हिन्दी की सेवा में अभूतपूर्व कार्य करते रहे।
नर्मदा विषयक उनके कार्य का सानी नहीं तो महादेवी वर्मा से प्राप्त आशीष जगत् विख्यात है।
हमने आचार्य संजीव 'सलिल' को सदैव की भाँति सरल, गम्भीर, स्मित हास्य-युक्त उनका व्यक्तित्व मोहित करता है।
आपने उनके विषय में जो भी कहा अक्षरश: सत्य है।"
-देवकी नन्दन'शान्त',साहित्यभूषण, 'शान्तम्',१०/३०/२,इन्दिरानगर, लखनऊ-२२६०१६(उ०प्र०), मो० 9935217841;8840549296   

काव्य सुमन : 
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की सेवा निष्काम
डॉ. सतीश सक्सेना 'शून्य'
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हृदय हुआ गद् गद् अनुज, सुन कर शुभ संवाद।
शीर्ष हुआ उन्नत अधिक, प्रभु की कृपा प्रसाद।
हिन्दी के उत्थान में, अमर रहेगा नाम।
भाषा के विज्ञान में, की सेवा निष्काम।।
[कवि परिचय : से.नि. अभियंता, होमिओपेथिक चिकित्सक, निष्णात कवि, संस्कृत स्तोत्रों का हिंदी काव्यानुवाद, चलभाष संपर्क : १३४ गायत्री विहार, मयूर मार्किट, थाटीपुर ग्वालियर चलभाष ९८२७२२५४९९ ]
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इस युग के हैं चिंतक-चन्दन
कुमार अनुपम
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सरस्वती पुत्र संजीव 'सलिल'
इस युग के हैं चिंतक-चन्दन 
वंदन पद-पद पर कर रहे
उनचास पवन रह रह, क्षण क्षण
कलम-स्वरों का अभियान चला जब
सलिल की बही अविरल सरिता
निर्झर मन ने दिया समय को
ज्ञान सागर की अप्रतिम कविता
.
साहित्य सृजन का वेद व्यास
वह रहा, सितारो! झुक जाओ
संजीव 'सलिल' के ब्रह्म नाद में
तांडव कर झूमो-गाओ
चित्रगुप्त का चन्द्रगुप्त यह
कर्मयोगी सा बढ़ता जाता
अक्षर-साधन की गंगा में
सृजन-नौका खेता जाता
शंकर है यह, शोध ऋषि भी
हालाहल वह पीता है
अमृत शब्दों की वाणी उसकी
जन गण मन में जीता है
जिस ओर चला,गिरि-श्रृंग गिरे
जिस ओर बढ़ा तूफ़ान उठा
संकल्प लिया, ब्रम्हांड हिला
कलम चला, अंधकार मिटा
जागो विसुवियस, मचलो जल-थल
शशि ले किरणों का हार चलो
अमिताभ गगन से तुम उतरो
अक्षर-कुंकुम ले श्रृंगार करो

अब बोल रहे हैं दिग्दिगंत
वरद पुत्र तव स्वागत है
संजीव 'सलिल' हैं नहीं यही 
अनुपम साहित्य सुसाधक है 
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[कवि परिचय : से.नि. सुरक्षा लेखा निदेशक, संपूर्ण क्रांति सत्याग्रही, ख्यात समाजसेवी, पत्रकार। संपर्क : बी २ हाउसिंग कॉलोनी, सी- कंकड़बाग पटना ८०००२०, चलभाष ९४३१४२६९९१, ७०००५४९१८७]
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सृजन-ऋषि आचार्य श्री
सुरेश कुशवाहा तन्मय
आ - आचरण पावन विशुद्ध विचार, मंगल भाव हैं
चा - चाह कविता की सुघड़तम, व्याकरणिक प्रभाव है।
आर्य - आर्य संस्कृति से निबंधित, सद्गुणों में श्रेष्ठ हैं
सलिल - 
सलिल निर्मल सर्वहितकर, श्री संजीव ज्येष्ठ हैं।
सं - संचरित साहित्य छांदस ज्ञान में हों सब निपुण
जी - जीत निश्चित है सलिल सी, प्राप्त कर शुभ सृजन गुण।
व - वंदना के स्वर मधुर, माँ का अभय वरदान है
      वाग्देवी की कृपा तुम पर, अपरिमित ज्ञान है।
व - वचन मन से अहर्निश, साहित्य को सम्पूर्ण अर्पण
र - रमे हैं लेखन, पठन-पाठन, सृजन हित है समर्पण।
मा - माननीय सम्माननीय, श्री सलिल हृदय उदार है
       संजीवनी के रूप में, अनमोल से उपहार है।
स - सतत अनुशीलन सृजन, नवकाव्य सूत्र विधान है
लि - लिख रहे साहित्य प्रचुर, विविध विधागत ज्ञान है।
ल - लक्ष्य है साहित्य हिंदी का, प्रचार प्रसार है
      बाँटने को व्यग्र, मन में प्यार भाव उदार है।
      पथ प्रदर्शक, मित्र, गुरु, भ्राता, विविध से रूप हैं
      है अलग वैशिष्ट्य दाता, भाव परम अनूप है।
      शुद्ध निश्छल हृदय से, है व्यक्त तन्मय भावनाएँ
      सृजन-ऋषि आचार्य श्री, आनंदमय शुभ कामनाएँ।
*
[कवि परिचय: वरिष्ठ गीतकार, दोहाकार, लघुकथाकार, ३ कृतियाँ प्रकाशित।  संपर्क : बी १०१ महानंदा ब्लॉक, विराशा हाइट्स, समीप दानिश कुञ्ज पुल, कोलर मार्ग, भोपाल ४६२०४२, चलभाष ९८९३२६६०१४, shrutyindia@gmail.com ] 
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दोहा सलिला 
सारस्वत अभियान हैं
प्रो.शरद नारायण खरे
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सारस्वत अभियान हैं, श्रीमान संजीव।
लेखन, सम्पादन करें, रखकर हुनर सजीव।।
करते अक्षर-साधना, विनत भाव से नित्य।
इसीलिये साहित्य के, बने हुए आदित्य।।
कलम चली निर्बाध नित, जा पहुँचे आकाश।
फिर भी रहते धरा पर, रहें सदा सब काश।।
रच दीं ऐसी पुस्तकें, जिनका नहीं जवाब।
सृजन कर्म को आपने, दे दी चोखी आब।।
चिंतन में हैं उच्च जो, जिनमें गति, मति, वेग।
जो देते हैं नित्य ही, सिरजन के नव नेग।।
जिनने रोशन कर दिया, पूरा मध्यप्रदेश।
वह वर्मा संजीव जी, जाने सारा देश।।
मित्रों के जो मित्र हैं, सदा निभायें साथ।
जो परहित के वास्ते, सदा बढ़ाते हाथ।।
जो तन-मन से सात्विक, मानुष नेक,महान।
ऐसे बंदे को 'शरद', ही मिलता है मान।।
सत्य,ज्ञान,सत्कर्म से, जो रखते हैं प्रीत।
श्रीमान संजीव जी, की हरदम ही जीत।।
यश पाया,नित मान भी, बढ़ी निरंतर शान।
हर कवि, लेखक 'सलिल' का, करता है जयगान।।
दुआ कर रहा,है नमन, वंदन बारम्बार।
भाई श्री संजीव जी,' शरद' करे जयकार।।
*
[ कवि परिचय : ख्यात दोहाकार, १ क्षणिका संग्रह प्रकाशित, विभागाध्यक्ष इतिहास शासकीय जे.एम.सी. महिला महाविद्यालय, मंडला म.प्र. ४८१६६१, चलभाष ९४२५४८४३८२ ]
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(आदरणीय आचार्य संजीव सलिल जी को सादर नमन करते हुए यह कहने में कोई संकोच नहीं कि मैं उनके व्यक्तित्व व कृतित्व से अभिभूत हूँ. मेरी नवगीत कृति ‘जब से मन की नाव चली’ और गीतिका शतक ‘चलो प्रेम का दूर क्षितिज तक पहुँचायें संदेश’’ की अप्रतिम भूमिका के लिए मैं सदैव उनका कृतज्ञ रहूँगा. उन पर कुछ भी लिखना सूर्य को दीपक दिखाना है, फिर भी मेरी लेखनी से मैं जितना लिख पाया समर्पित है-)
गीतिका
निर्मल सलिल सुजान से
डॉ. गोपाल कृष्ण भट्ट ‘आकुल'
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छंद- मरहट्ठा माधवी, विधान- 16, 13 (चौपाई+दोहा का विषम चरण)
पदांत- है, समांत- आर 
*
छंद प्रवीण, गीत-नवगीतों, काव्यम विधा में धार है.
गद्य-पद्य में सहज सरल हैं, भाषा पर अधिकार है.
मेरी कृतियों पर सम्पादन, लिखीं भूमिकायें अप्रतिम,
समालोचना, समाधान में, लेखन भी दमदार है.
हैं साहित्य सुधा रस सागर, निर्मल सलिल सुजान से,
संरक्षण देता, हितकारी, इतना हृदय उदार है.
माँ वाणी मुख पर राजित है, होते सिद्ध मनोरथ ज्यों,
पंच वृक्ष नंदन कानन में, कल्पवृक्ष मंदार है.
विधि-विधान का जो अकाट्य देते प्रमाण भी दृढ़ता से, 
’आकुल’ ऐसे उद्भट कवि को, साष्टांग नमस्कार है.
*
[कवि परिचय : से. नि. अनुभाग अधिकारी राजस्थान तकनीकी विद्यालय कोटा, १ नाटकी, १ ग़ज़ल संग्रह, १ काव्य संग्रह, १ लघुकथा संग्रह २ गीत-नवगीत संग्रह प्रकाशित। संपर्क : ८१७ महावीर नगर-२, कोटा ३२४००५ राजस्थान
चलभाष ७७२८८२४८१७] 
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मुक्तक 
नाम सलिल का हुआ है
मनोज श्रीवास्तव
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अंतर्मन से कलकल बहती रसधार सलिल की कविता है
जीवन का सत्य समाहित है उपहार सलिल की कविता है
युग बोध कराती जन-जन के आक्रांत क्लांत मानव मन को
अंतस के छिपे पहलुओं का आधार सलिल की कविता है
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समय फिसलता चला जा रहा शायद सिर्फ प्रयासों में
जैसे बीती उमर हमारी खुद की तो वनवासो में
लेकिन शायद अश्व समय का थकता रुकता नहीं कभी
नाम सलिल का हुआ है अच्छी कविता के इतिहासों में
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[कवि परिचय : से. नि. वरिष्ठप्रबंधक( ट्रेनिंग) एच.ए.एल. लखनऊ मंडल, ख्यात गीत-गज़लकार, गीत संग्रह व् ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित।  संपर्क : २/७८ विश्वास खंड गोमती नगर, लखनऊ २२६०१० उ. प्र. भारत चलभाष  ९४५२०६३०२४, -hasyavyangkavi @yahoo . co]
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कुण्डलिया
श्रीधरप्रसाद द्विवेदी 
धन्य धन्य संजीव
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रचना छल-छल सलिल सा, कर लेते 'संजीव'।
करते जब कल नाद कवि, हिलता सबका ग्रीव।
हिलता सबका ग्रीव, बन्द से मस्त बनाते।
नव-नव रचते छन्द, कभी नवगीत सुनाते।
कह श्रीधर मतिमन्द, छन्द का अद्भुत गढ़ना।
धन्य धन्य संजीव, आपकी अद्भुत रचना।।

लेखन परिचय : वरिष्ठ कवि, संस्कृत-हिंदी छंदों के जानकार, दो काव्य संग्रह प्रकाशित, संपादक अनुनाद त्रैमासिकी, संपर्क : अमरावती, गायत्री मंदिर मार्ग, सुदना, डाल्टनगंज, पलामू ८२२१०२ झारखण्ड, ९४३१५५४४२८, ९९३९२३३९९३, sp.dwivedi7@gmail.com।]

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कुण्डलिया 
चोखे श्री संजीव
डॉ. नीलम खरे
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सदा लेखनी के धनी, श्रीमान संजीव
करते सिरजन नित्य ही, हैं सारस्वत जीव
हैं सारस्वत जीव, करें साहित्य-वंदना
हैं ज्ञानी,उत्कृष्ट, जानते लक्ष्य-साधना
कहती 'नीलम' आज, कभी ना कहें अलविदा
चोखे श्री संजीव, रहें गतिमान वे सदा।
[कवयित्री परिचय : समर्पित, प्रतिष्ठित रचनाकार। आज़ाद वार्ड मंडला ४८१६६१ म.प्र., चलभाष ९४२५४८४३८२] 
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समय से आगे आचार्य सलिल जी
प्रो. (डॉ.) नीना उपाध्याय
*
एक सजग रचनाकार अपने समय के पूर्व के विरासत से सतत जुड़ा रहता है,  अपनी रचनाओं के माध्यम से अपने समय के साथ भी होता है और  रचनाओं में भविष्य में पल्लवित-पुष्पित होने वाले विचारों और शिल्प के माध्यम से समय से आगे भी होता है। रचनाकार की ऐसी कालजयी रचनाएँ ही उसे शाश्वतता प्रदान करती हैं। आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' अपने साहित्य सृजन के माध्यम से इन तीनों रूपों में हमारे साथ हैं। उनके सृजन में अगणित प्रयोगों और उनके द्वारा निरंतर नवीन छंदों के अन्वेषण को देखते  हुए यह मानना होगा कि वे अपने समय से आगे के साहित्यकार हैं जिनके बोये बीज हिंदी साहित्य की उर्वर भूमि पर भविष्य में पल्लवित-पुष्पित होकर विश्ववाणी को समृद्ध करते रहेंगे। सलिल जी ने शास्वत मानवीय मूल्यों को अपने छंदों में समन्वित-समाहित किया है। वे वैश्विक मानवीय चेतना संपन्न रचनाकार होने के साथ ही भारत की सनातन सांस्कृतिक विरासत की श्रेष्ठता के पक्षधर हैं, जिसका सजीव चित्रण उनके दोहों और अन्य छंदों में होता रहता है।
सलिल जिओ आँखिन देखी को झुठलाकर केवल पुरातन गौरव गान तक सीमित नहीं रहते।  वे वर्तमान राजनैतिक विसंगतियों, चाटुकारिता, नौकरशाही, सामाजिक अंध विश्वासों व रूढ़ियों पर  अपने नवगीतों के माध्यम से सटीक और प्रभावी व्यंग्य भी करते हैं। नवगीतों के ही माध्यम से आपने धर्म, समाज, संस्कृति एवं ऋतु वर्णन का मनोहारी-सुन्दर चित्रण किया है।
कालजयी छंद दोहा की मणिदीप संकलन  त्रयी दोहा-दोहा नर्मदा, दोहा सलिला निर्मला तथा दोहा दीप्त दिनेश के माध्यम से आपने संपादन कला के मापदंड स्थापित किये हैं। इस संकलन त्रयी के सभी दोहे कथ्य, शिल्प विधान,  भाषा, भाव-भंगिमा, मिथक, प्रतीकों तथा बिम्बालङ्कारों से समृद्ध व् दोहाकार का वैशिष्ट्य प्रगट करनेवाले हैं। हर दोहाकार के दोहों के पूर्व  उनपर दी गयी निष्पक्ष संपादकीय टिप्पणी सलिल जी की पारखी दृष्टी और गहरी परख साक्षी है। भक्ति, अध्यात्म, प्रकृति-चित्रण, राष्ट्र -अर्चन, राजनैतिक-सामाजिक समस्याएँ व् पर्यावरण संरक्षण आदि विषयों को अपने दोहों, नवगीत व अन्यान्य छंदों के माध्यम से संतुलित भावाभिव्यक्ति के साथ प्रस्तुत किया है। रंग बदलते समाज की विसंगतियों, ग्रामीण समाज व्यवस्था का यथार्थ, गरीबी और चुनावी दाँव-पेंच आदि को भी आपने अपने नवगीतों के माध्यम से उद्घाटित कर उनका उपचार व् निदान भी नवगीतों में इंगित करने का अभिनव सार्थक प्रयास किया है।
नित्य निरंतर नए-नए छंदों का अन्वेषण कर रहे सलिल जी ने  स्वामी सत्यमित्रानंद जी गिरि (अंबिका प्रसाद पांडेय, जन्म : १९ सितम्बर १९३२ आगरा, मृत्युः २५ जून २०१९) के निधन पर शोकाकुल सलिल जी ने तत्काल रचनाधीन सवैया कोष में तत्काल एक नए सवैये का निर्माण कर उसे सत्यमित्रानंद सवैया नाम दिया।  
नवान्वेषित सत्यमित्रानंद सवैया 
*
विधान -
गणसूत्र - य न त त र त र भ ल ग।
पदभार - १२२ १११ २२१ २२१ २१२ २२१ २१२ २११ १२ ।
यति - ७-६-६-७ ।
*
गए हो तुम नहीं, हो दिलों में बसे, गई है देह ही, रहोगे तुम सदा।
तुम्हीं से मिल रही, है हमें प्रेरणा, रहेंगे मोह से, हमेशा हम जुदा।
तजेंगे हम नहीं, जो लिया काम है, करेंगे नित्य ही, न चाहें फल कभी।
पुराने वसन को, है दिया त्याग तो, नया ले वस्त्र आ, मिलेंगे फिर यहीं।
*
तुम्हारा यश सदा, रौशनी दे हमें, रहेगा सूर्य सा, घटेगी यश नहीं।
दिये सा तुम जले, दी सदा रौशनी, बँधाई आस भी, न रोका पग कभी।
रहे भारत सदा, ही तुम्हारा ऋणी, तुम्हीं ने दी दिशा, तुम्हीं हो सत्व्रती।
कहेगा युग कथा, ये सन्यासी रहे, हमेशा कर्म के, विधाता खुद जयी।
*
मिला जो पद तजा, जा नई लीक पे, लिखी निर्माण की, नयी ही पटकथा।
बना मंदिर नया, दे दिया तीर्थ है, नया जिसे कहें, सभी गौरव कथा।
महामानव तुम्हीं, प्रेरणास्रोत हो, हमें उजास दो, गढ़ें किस्मत नयी।
खड़े हैं सुर सभी, देवतालोक में, प्रशस्ति गा रहे, करें स्वागत सभी।
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ऐसा प्रतीत होता है कि पूज्यपाद संत महाराज को सकल भारतवासियों की से सबसे अधिक सार्थक श्रद्धांजलि के माध्यम से सलिल जी ने ही दे है। अब यह सवैया सलिल जी द्वारा लिखित शीघ्र प्रकाश्य सवैया कोशा में सम्मिलित होकर पूज्यपाद के स्मृति को अक्षुण्ण रखने के साथ-साथ, सवैयाकारों  प्रेरणास्रोत भी होगा। यह मर्मस्पर्शी सवैया सलिल जी के व्यक्तित्व की तरलता, सरलता और संवेदनशीलता का साक्षी है। 

सलिल जी के नवगीत  मांगल्य की जीवंत अवधारणापरक जीवन मूल्यों, सामाजिक समरसता एवं सहज संवेदनशीलता के महत्वपूर्ण कारक हैं। श्रेष्ठ दोहाकार, समर्पित समाजसेवी, कुशल अभियंता तथा निपुण छंदकार सलिल जी विविध सारस्वत समारोहों का संयोजन दायित्व भी समान कुशलता के साथ कर पाते हैं। मैं सलिल जी के स्वस्थ्य, सुखी, दीर्घायु व् सृजनशील जीवन की कामना ईश्वर से करती हूँ।
[लेखिका परिचय: विभागाध्यक्ष हिंदी, शास. मानकुँवर बाई स्नातकोत्तर स्वशासी महाविद्यालय जबलपुर, चलभाष ९४२४३०५६४१, upadhyayneena1974@gmailcom]
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सम्माननीय काव्य गुरु आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
अमरेंद्र नारायण 
*
आचार्य संजीव वर्मा सलिल जी बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति हैं। वे एक कुशल अभियंता, एक सफल विधिवेत्ता, एक प्रशिक्षित पत्रकार और एक विख्यात साहित्यकार तो हैं ही, साथ ही हिंदी साहित्य के प्रचार-प्रसार हेतु निरंतर कार्यरत एक कर्मठ हिंदी सेवी संयोजक भी हैं।

सलिल जी ने कई मधुर गीत लिखे हैं और एक विशेषज्ञ अभियंता के रूप में तकनीकी विषयों पर उपयोगी लेख लिखकर उन्होंने तकनीक के प्रचार में अपना सहयोग भी दिया है। साहित्य, अभियान्त्रिकी और सामाजिक विषयों से जुड़े कई सामयिक विषयों पर उन्होंने मौलिक और व्यावहारिक विचार रखे हैं।
सलिल जी विभिन्न संस्थाओं के सदस्य मात्र ही नहीं हैं, वे कई संस्थाओं के जन्मदाता भी हैं और संयोजक भी हैं। उनकी योग्यता और उनके समर्पित व्यक्तित्व से प्रभावित हो कर कई साहित्यकार साहित्य के क्षेत्र में उन्हें अपना गुरु मानते और उनसे पूछते-सीखते हैं। साहित्य सृजन हेतु उत्सुक अनेक जनों को उन्होंने विधिवत भाषा, व्याकरण और पिंगल सिखाया और उनके लिखे को तराशा-सँवारा है।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का कोई अभिवक्ता एक प्रतिष्ठित अभियंता हो और पिंगल तथा उरूज का ज्ञाता भी हो यह कोई साधारण बात नहीं है। विस्मृति के गह्वर से पुराने छंदों को खोज-खोज कर उनका मधुर शब्दावली से श्रृंगार कोई ऐसा शब्द चितेरा ही कर सकता है जिसमें एक विद्वान् की अन्वेषण क्षमता, अभियंता की व्यावहारिक सृजन प्रतिभा और एक सिद्धहस्त कलाकार के सौन्दर्य बोध का सम्यक समन्वय हो। सलिल जी का प्रभावशाली व्यक्तित्व इसी कोटि का है ।
सलिल जी का आग्रह है-
''मौन तज कर मनीषा कह बात अपनी''
यह आज के ऐसे परिवेश में और भी आवश्यक है जहाँ
''तंत्र लाठियाँ घुमाता, जन खाता है मार
उजियारे की हो रही अन्धकार से हार!''
कई रचनाकार संवेदनशील तो होते हैं पर वे मुखर नहीं हो पाते। सलिल जी का कहना है-
''रही सड़क पर अब तक चुप्पी,पर अब सच कहना ही होगा!''
साहित्यकार जब अपना मौन तोड़ता है तो उसकी वाणी कभी गर्जना कर चुनौती देती है तो कभी तीर बन कर बेंधती है । सलिल जी का साहित्यकार इसी प्रकृति का है! सलिल जी शुभ जहाँ है,उसका नमन करते हुए सनातन सत्य की अभिव्यक्ति में विश्वास रखते हैं।

माँ सरस्वती से उनकी प्रार्थना है-
''अमल -धवल शुचि विमल सनातन मैया!
बुद्धि-ज्ञान-विज्ञान प्रदायिनी छैयां''
तिमिर हारिणी
भय निवारिणी सुखदा,
नाद-ताल, गति-यति
खेलें तव कैंया
अनहद सुनवा दो कल्याणी!
जय-जय वीणापाणी!''
उम्मीदों की फसल उगाने का आह्वान करते हुए सलिल जी ईश्वर, अपने माता पिता और पुरखों के प्रति भक्ति,श्रद्धा और कृतज्ञता अर्पित कर अपनी विनम्रता और शुभ का सम्मान करने की अपनी प्रवृत्ति का परिचय देते हैं। हर भावुक और संवेदनशील साहित्यकार अपने आस-पास बिखरे परिवेश पर अपनी दृष्टि डालता है और जहाँ उसकी भावुकता ठहर जाती है, वहां उसका चिंतन उसे उद्वेलित करने लगता है। इस ठहराव में भी गति का सन्देश है और आशा की प्रेरणा भी! सलिल जी का आह्वान है-
''आज नया इतिहास लिखें हम
कठिनाई में संकल्पों का
नव हास लिखें हम!''
सलिल जी एक कर्मठ साहित्य साधक और एक सम्माननीय काव्य गुरु भी हैं। अनेक युवा साहित्यकार उनसे प्रेरणा पाकर उत्कृष्ट साहित्य की सर्जना कर रहे हैं। उनका यह योगदान निरंतर फूलता-फलता रहे और उनकी प्रखर प्रतिभा के प्रसून खिलते रहें! हिंदी भाषा के विकास,विस्तार,प्रसार के लिये ऐसे समर्पित साधकों की बहुत आवश्यकता है। उन्हें सप्रेम नमस्कार।

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[लेखक परिचय : विख्यात दूसंचार अभियंता, उपन्यासकार, कवि, हिंदी में २ तथा अंगरेजी में १ उपन्यास, ४ काव्य कृतियाँ, १ उपन्यास उर्दू में अनुवादित। भूतपूर्व महासचिव एशिया पैसिफिक टेलीकौम्युनिटी शुभा आशीर्वाद, १०५५, रिज रोड, साउथ सिविल लाइन्स ,जबलपुर ४८२००१ मध्य प्रदेश दूरभाष +९१ ७६१ २६० ४६०० ई मेल amarnar@gmail.com]
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संस्मरण
श्लाघनीय व्यक्तित्त्व एवं कृतित्त्व के धनी श्री संजीव वर्मा ‘सलिल’
-    राजेन्द्र वर्मा
यों किसी के व्यक्तित्त्व में उसका कृतित्त्व समाया रहता है, फिर भी कृतित्त्व की अतिरिक्त सराहना होती है। यह कृतित्त्व ही है जिसके कारण हम किसी से आकर्षित होते हैं। बाह्य आकर्षण क्षणिक होता है, उसका स्थायी महत्त्व नहीं होता। हम यदि किसी से आकर्षित होते हैं तो उसके गुणों के कारण। ये गुण साहित्य, समाज, अध्यात्म, विज्ञानआदि किसी भी क्षेत्र के हो सकते हैं। एक सुधी साहित्यकार में सभी क्षेत्र के थोड़े-थोड़े गुण रहते हैं, क्योंकि इन गुणों के अवगाहन और आत्मसात करने के कारण ही वह कुछ ऐसा सृजित कर पाता है जो न केवल समाज को मार्ग दिखाता है, बल्कि उसमें कलात्मक मूल्यों की स्थापना भी करता है। पर ऐसे साहित्यकार विरल होते हैं।
बहुमुखी प्रतिभा के धनी श्री संजीव वर्मा ‘सलिल’ इसी कोटि के साहित्यकार हैं, पर इसका एक कारण है। वे महीयसी महादेवी वर्मा के भतीजे हैं। वे उनके स्नेह-भाजन रहे हैं। फिर वे महीयसी के बहुआयामी विराट व्यक्तित्त्व एवं कृतित्त्व से भला कैसे प्रभावित न होते। सहजता, सरलता, उदात्तता जैसे मानवीय गुण उन्हें विरासत में मिले हैं जिनकी उन्होंने प्रत्येक परिस्थिति में रक्षा की है। विभिन्न वय के लोगों के साथ उनका मित्रवत व्यवहार उन्हें और ऊँचा उठाता है। परस्पर भेंट होने पर औपचारिकता देर तक नहीं ठहर पाती। पाँच-दस मिनटों में ही वे सहज आत्मीयता के पाश में बँध जाते हैं अथवा बाँध लेते हैं। तब प्रेमपूरित साहित्यालाप के अतिरिक्त कुछ नहीं होता। तनिक देर के वार्तालाप में ही उनकी साहित्यिक संवर्धन की उत्कट अभिलाषा परिलक्षित हो जाती है। उत्तेजित बहसों में मतभेद के बावजूद उनके मन में कोई भेद स्थान नहीं ले पाता। जैसे ही उत्तेजना शांत होती है, वे पूर्ववत शांत समुद्र की भाँति व्यवहार करने लगते हैं।
मेरी उनसे पहली मुलाक़ात लखनऊ में 2001 में हुई। अवसर था उनकी पुस्तक, ‘लोकतंत्र का मकबरा’ के लोकार्पण समारोह का जो लखनऊ के प्रसिद्ध ग़ज़लकार श्री देवकीनंदन ‘शांत’के आवास पर आयोजित था। समारोह में कई नामचीन कवि-साहित्यकार उपस्थित थे। कृति का विमोचन हमारे ही शहर के प्रख्यात शायर कृष्णबिहारी नूर साहब ने किया था। विमोचन के पश्चात एक कवि-गोष्ठी हुई थी जिसमें बीस-पच्चीस कवियों ने भाग लिया था। प्रथम परिचय में ही मैं उनके सरल-सहज और आत्मीय व्यक्तित्त्व से प्रभावित हुए बिना न रह सका। उन्होंने मुझे अपनी सद्द्यः लोकार्पित कृति भेंट की। उसके बाद फिर टेलीफोन पर बातचीत का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह आज तक चल रहा है।
सलिल जी जब कभी लखनऊ आते हैं, तो मेरा प्रयास रहता है कि उनसे व्यक्तिगत भेंट हो और प्रायः होती भी रहती है। हम लोग जब भी बैठते हैं, तो पारिवारिक बातचीत की औपचारिकता के पश्चात साहित्य की चर्चा प्रारंभ हो जाती है। मैं उन्हें सदैव उत्कृष्ट साहित्य-सृजन, हिंदी भाषा के उन्नयन और छंदोबद्ध काव्य-सृजन-प्रकाशन-प्रसारण के लिए प्रतिबद्ध पाया। एक बार अमरनाथ जी (लखनऊ के साहित्यकार) के यहाँ वे ठहरे हुए थे। मैं उनसे मिलने गया। साहित्यिक वार्ता होनी थी, हुई। उन दिनों मैं छंद-शास्त्र और काव्य-विधाओं पर एक किताब (रस, छंद, अलंकार और काव्य विधाएँलिख रहा था। किताब के प्रारूप पर वे बहुत उत्साहित थे। उन्होंने बताया कि वे स्वयं छंदों पर काम कर रहे हैं। जब थोड़े विस्तार से बात हुई तो पता चला कि उन्होंने तमाम छंदों की खोज की है जो आज तक पिंगल-सूत्र और उसके परवर्ती कार्यों में आये ही नहीं हैं। कमाल की बात यह थी कि सभी छंदों के उदाहरणों की रचना उन्होंने की थी, जबकि मैंने उदाहरण प्रसिद्ध कवियों के लिए थे और कहीं जब कोई उदाहरण नहीं उपलब्ध था तो मैंने रचित किया था। मैंने वर्णिक और मात्रिक छंदों के अंतर्गत प्रचलित छंदों को ही लिया था, जबकि वे सभी छंदों को समेटना चाहते थे। हम लोगों के इस पर विचार-विनिमय किया। उनकी योजना के अनुसार दोनों प्रकार के छंदों की संख्या बीस-पचीस हज़ार हो रही थी। मैंने कहा, यह अत्यंत श्रमसाध्य कार्य है और शायद ही इसका कोई उपयोग कर पायेगा! इस पर वे बोले, “राजेन्द्र भाई! उपयोग की बात तो तब पैदा होगी, जब चीज़ सामने हो।... फिर हम इस आशंका से अपना काम क्यों छोड़ दें कि शायद उसका उचित मूल्यांकन न हो। मैं चाहता हूँ कि छंदों के जितने प्रकार हो सकते हैं, वे लोगों तक पहुँचें!” तो, ऐसी सृजन-दृष्टि के स्वामी हैं सलिल जी।
एक बात का ज़िक्र करना चाहूँगा यहाँ, जब छंदों पर हमारी परस्पर चर्चा हो रही थी, तो मेरे एक सिद्धांत से वे असहमत हो गये। वर्णिक छंद के सम्बन्ध में बात हिंदी के गणों की थी- मैंने एक जगह लिखा था कि नगण (तीनों लघु) एक साथ नहीं बोले जाते, बल्कि न+गण (IS) यानी लघु-दीर्घ ही बोले जाते हैं, अतः इस गण की कोई उपयोगिता नहीं है। मैंने उदाहरण दिया कमल को क+मल ही बोलते हैं, न कि क-म-ल । और भी तमाम शब्द इस प्रकार के हैं, जैसे- अधर, अचल, पवन, मनन,  शमभ। मेरी यह धारणा उर्दू के छंदशास्त्र पर आधारित थी। वहाँ दो लघु यदि एक साथ आ रहे हैं, तो वे मिलकर दीर्घ हो जाते हैं, जैसे फ़इल (फ़+इल=IS) । मैंने अन्य उदाहरण दिये जहाँ दो लघु एक दीर्घ के रूप में प्रयुक्त हो रहे थे, जैसे अजगर (SS), क्योंकि इन्हें चार लघु के रूप में कोई नहीं कहता या पढ़ता— अ+ज+ग+र (IIII) ।
इस पर वे बिगड़ पड़े, “इसका मतलब, हमारे पूर्वज मूर्ख थे जो ‘नगण’ की अवधारणा रखी।... आपको जो लिखना हो लिखिए, लेकिन मैं इससे बिलकुल सहमत नहीं। आपको उर्दू के व्याकरण के हिसाब से चलना है तो चलिए।”
मैंने कहा, “बात हिंदी-उर्दू की नहीं, उच्चारण की है। हम जो बोलते हैं वह स्वर हिंदी-उर्दू का तो नहीं होता। यह तो बाद में तय होता है कि हमने क्या शब्द कहा और वह किस भाषा का है!... अच्छा अब स्वयं बोलकर देखिए, इन शब्दों को आप कैसे बोलेंगे?”
उन्होंने अपने ढंग से बोलकर सुना दिया— क-म-ल, अ-ध-र... ।
मैंने कहा, “अभी जिस तरह से आप बोल रहे हैं, क्या आप इसी तरह से सामान्य बातचीत में बोलते हैं?”           
उन्होंने तपाक से कहा, “बिलकुल!”
मैं असहमत, लेकिन असमंजस में, क्या करूँ? फिर इस प्रकरण को विराम देने के उद्देश्य से मैंने कहा, “अच्छा, मैं इस पर विचार करूँगा, लेकिन आप भी व्यावहारिक दृष्टि से देखिएगा, जो मैं कह रहा हूँ। लेकिन वे कुछ न बोले, चुप ही रहे। (यह प्रश्न  आज भी अनुत्तरित है कि क्या हम हिंदी वर्णिक छंदों में, उर्दू की तरह, दो लघु वर्णों को एक दीर्घ मान सकते हैं या नहीं? जबकि ग़ज़ल कहने और लिखने में हम इस नियम का पालन चुपचाप कर लेते हैं।) 
अमरनाथ जी स्तब्ध! बोले, “बहुत देर हो गयी है बातचीत करते। मैं चाय की व्यवस्था करता हूँ।”
विषयांतर के साथ माहौल हल्का हो गया था। चाय आयी। पी गयी और दस मिनट में ही सलिल जी पूर्ववत बड़े भाई की तरह बात करने लगे थे। वय में वे मुझसे बड़े हैं ही।
लखनऊ में पूर्णिमा बर्मन साहित्यिक विधाओं, विशेषतः नवगीत के उन्नयन हेतु लगातार कार्यक्रम कराती रहती हैं।  नवगीत महोत्सव का वार्षिक आयोजन उनकी पहचान बन चुका है। कुछ दिनों पहले उन्होंने लघुकथा पर भी कार्यक्रम आयोजित किया था जिसमें देश के कई लघुकथाकार सम्मिलित हुए थे। ये कार्यक्रम रायबरेली रोड के पास ओमैक्स सिटी में स्थित उनके गुलमोहर स्कूल में होते हैं। यह स्कूल बहुत शानदार बना है और उसी प्रकार उसका छोटा-सा ऑडिटोरियम।
पिछले वर्ष इसी ऑडिटोरियम में काव्य में छंद-विधान नामक कार्यक्रम के अंतर्गत दोहा छंद पर एक कार्यक्रम हुआ जिसमें प्रमुख वक्ता सलिल जी ही थे। उन्होंने भाषा की उत्पत्ति और उसके विकास पर बहुत ही वैज्ञानिक ढंग से भाषण दिया और काव्य-भाषा में छंदों का प्रयोग कैसे प्रारंभ हुआ, इस पर बहुत ही विद्वत्तापूर्ण ढंग से अपनी बात रखी। अपभ्रंश में ‘सरह’ से लेकर खड़ी बोली में आज तक की दोहे की यात्रा से सबको परिचित कराया। ज़ाहिर है इस यात्रा में प्रमुख पड़ावों का भी ज़िक्र हुआ, जैसे- हिन्दवी में आमिर खुसरो, सधुक्कड़ी भाषा में कबीर, अवधी में तुलसीदास आदि। इसके अलावा, दोहों के शिल्प के बारे में, विशेषतः उसके मात्रा-विधान को लेकर जिसमें दोहे की लय बनी रहे, उनके सम्प्रेषण का ढंग निराला था। इस प्रसंग में उनका यह सिद्धांत बहुत सराहा गया कि दोहे में दुहराव की बड़ी प्रधानता है, दो पंक्तियाँ, प्रत्येक में दो-दो चरण। मात्रा-बाँट में भी दो की बड़ी भूमिका है। अगर दोहे के किसी भी चरण का प्रारंभ तीन मात्रिक शब्द से हो रहा है तो उसकी लय बनाये रखने के लिए अगला शब्द पुनः तीन ही मात्रों का होना चाहिए। इसी प्रकार दो या चार मात्रिक शब्दों के साथ यह नियम लागू होता है। दोहा छंद के उदाहरणों के माध्यम से उन्होंने भाषा-शक्ति, काव्य-गुण, रस और अलंकार आदि को बहुत ही सरलता से समझाया।      
श्रोता दीर्घा मंत्रमुग्ध हो उठी। इस कार्यक्रम में मुझे भी सम्मिलित होने और सलिल जी के कारण मंच पर बैठने का भी अवसर मिला। विशेष बात यह थी कि लखनऊ में यह पहला कार्यक्रम था जहाँ प्रवेश शुल्क देकर साहित्यिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था, और शुल्क भी थोडा नहीं, तीन सौ रुपए। फिर भी मैं समझता हूँ कि पर्याप्त श्रोता जिनमें कई साहित्यकार भी थे, उपस्थित थे। इस कार्यक्रम में मेरे भाग लेने का श्रेय सलिल जी को तो है ही, फेसबुक पर ‘गीतकार साहित्यिक मंच’ के पुरोधा और एक ज़माने की गीत-पत्रिका, ‘गीतकार’ के सह-सम्पादक, श्री संजीव ‘तनहा’ को भी है जो मेरे घर पधारे और मुझे अपनी से कार्यक्रम तक ले गये और वापस भी छोड़ा। वे लखनऊ इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए ही पधारे थे।    
            सलिल जी पेशे से इंजीनियर रहे हैं, अतः उनकी सृजन-दृष्टि में वैज्ञानिकता और आधुनिक-बोध है। परन्तु उत्कृष्ट पारंपरिक मूल्यों को भी साधते हैं। इस संतुलन को साधने में बेजोड़ हैं। अपने इस गुण के कारण वे जो भी साहित्य-रचना करते हैं, वह समाज के लिए दिग्दर्शक बन जाती है और उसकी उपादेयता अक्षुण्ण रहती है। अनेक संस्कृत के श्लोकों और सूक्तियों के ललित  काव्यात्मक अनुवादों के माध्यम से उन्होंने उनके मूल्यों में एक आयाम और दे दिया है। फलतः वे हिंदी के काव्य-रसिकों  को सर्वथा नवीन तृप्ति देते आये हैं। दुर्गा सप्तशती का सरल हिंदी में काव्यानुवाद उनके ऐसे कार्य का अप्रतिम उदाहरण है।
            गीत, नवगीत, दोहे, सोरठे, सवैये, ग़ज़ल, मुक्तक प्रभृति विधाओं में उन्होंने विपुल सृजन किया है। इन विधाओं में उनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और अनेकानेक प्रकाशन-पथ पर हैं। उनकी पहली पुस्तक, कलम के देव (भक्ति गीतसंग्रह) १९९७ में आयी। तत्पश्चात, भूकंप के साथ जीना सीखें (जनोपयोगी तकनीकी), लोकतंत्र का मक़बरा (कविताएँ), मीत मेरे (कविताएँ), काल है संक्रांति का (नवगीत-संग्रह)योगराज प्रभाकरकुरुक्षेत्र गाथा (प्रबंध काव्य) आदि प्रकाशित हुईं। इनमें से कई पुस्तकों का विमोचन साहित्यजगत के ख्यातलब्ध लोगों ने किया है, यथा-  आचार्य विष्णुकांत शास्त्री, तत्कालीन राज्यपाल, उ.प्र.प्रख्यात शायर कृष्णबिहारी नूर तथा आज के मशहूर शायर ज़हीर कुरैशी, रामकृष्ण कुसुमारिया, मंत्री, म. प्र. शासन। 
            सलिल जी की गद्य और पद्य रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं, जिनकी संख्या चार सौ के आस-पास होगी। कुछेक नाम द्रष्टव्य हैं मुक्तक मंजरी (४० मुक्तक)कन्टेम्परेरी हिंदी पोएट्री (८ रचनाएँ)मेकलसुता पत्रिका में २ वर्ष तक लेखमाला 'दोहा गाथा सनातनप्रकाशितपत्रिका शिखर वार्ता में भूकंप पर आमुख कथा।
            उनकी अप्रकाशित कृतियाँ हैं— जंगल में जनतंत्र कुत्ते बेहतर हैं ( लघुकथाएँ),  आँख के तारे (बाल गीत)दर्पण मत तोड़ो (गीत)आशा पर आकाश (मुक्तक)पुष्पा जीवन बाग़ (हाइकु)काव्य किरण (कवितायें)जनक सुषमा (जनक छंद)मौसम ख़राब है (गीतिका)गले मिले दोहा-यमक (दोहा)दोहा-दोहा श्लेष (दोहा)मूं मत मोड़ो (बुंदेली)जनवाणी हिंदी नमन (खड़ी बोलीबुंदेलीअवधीभोजपुरीनिमाड़ीमालवीछत्तीसगढ़ीराजस्थानीसिरायकी रचनाएँ),छंद कोशअलंकार कोशमुहावरा कोशदोहा गाथा सनातनछंद बहर का मूल हैतकनीकी शब्दार्थ सलिला।  इन मौलिक कृतियों के अलावा उन्होंने अनेक संस्कृत के ग्रंथों का हिंदी काव्यानुवाद किया है जिनका प्रकाशन होना शेष है : नर्मदा स्तुति (५ नर्मदाष्टकनर्मदा कवच आदि)शिव-साधना (शिव तांडव स्तोत्र,शिव महिम्न स्तोत्रद्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र आदि), रक्षक हैं श्रीराम (रामरक्षा स्तोत्र)गजेन्द्र प्रणाम (गजेन्द्र स्तोत्र),  नृसिंह वंदना (नृसिंह स्तोत्रकवचगायत्री,आर्तनादाष्टक आदि)महालक्ष्मी स्तोत्र (श्री महालक्ष्यमष्टक स्तोत्र)विदुर नीति, सत्य सूक्त (दोहानुवाद) तथा दिव्य गृह (रोमानियन खंडकाव्य, ल्यूसिआ फेरूल) । 
इसके अतिरिक्त उन्होंने पिंगल पर उल्लेखनीय काम किया है। इनकी इस विलक्षण प्रतिभा के कारण ही उन्हें आचार्यत्व की पदवी मिली है।
उन्होंने अनेक पुस्तकों का सम्पादन भी किया है। उनकी सम्पादित कृतियाँ हैं— निर्माण के नूपुर, नींव के पत्थर (दोनों अभियंता कवियों के संकलन), राम नाम सुखदाई, तिनका-तिनका नीड़ सौरभ (संस्कृत श्लोकों का दोहानुवाद) ऑफ़ एंड ऑन (अंग्रेजी ग़ज़ल संग्रह), यदा-कदा  (ऑफ़ एंड ऑन का हिंदी काव्यानुवाद),  द्वार खड़े इतिहास के, समयजयी साहित्यशिल्पी प्रो. भागवतप्रसाद मिश्र 'नियाज़' (विवेचना) और काव्य मंदाकिनी । समय-समय पर उन्होंने दर्जनों स्मारिकाओं और पत्रिकाओं के विशेषांकों का भी संपादन किया है।  हाल ही में उन्होंने ‘दोहा-दोहा नर्मदा’, ‘दोहा सलिला निर्मला’ और ‘दोहा दीप्त दिनेश’ नामक तीन दोहा-संकलनों का संपादन किया है। प्रत्येक संकलन में देश के पंद्रह-पंद्रह दोहाकार सम्मिलित हैं। इन संकलनों में जहाँ एक-से-एक दोहे हैं, वहीं दोहे पर अलग-अलग आलेख हैं जो दोहे विधा को समझने में सहायक हैं।
            सलिल जी देश के अनेक रचनाकारों को प्रोत्साहित करने तथा उनके कार्य को उचित ढंग से मूल्यांकित करने के उद्देश्य से अब तक छत्तीस पुस्तकों की भूमिकाएँ तथा शताधिक समीक्षाएँ लिखी हैं। वे इन्टरनेट १९९८ से सक्रिय हैं। ‘हिन्द युग्म’ पर उन्होंने दो वर्षों तक छंद-शिक्षण का महती कार्य संपन्न किया है। साथ-ही उन्होंने ‘साहित्य शिल्पी’ पर 'काव्य का रचनाशास्त्र' तथा अस्सी अलंकारों और इतने ही छंदों पर लेखमालाएँ दी हैं।
            उनके साहित्यिक अवदान की सर्वस्वीकृति है। यही कारण है कि उन्हें दस राज्यों (मध्यप्रदेशराजस्थानमहाराष्ट्रउत्तर प्रदेशहरयाणादिल्लीगुजरात,छत्तीसगढ़असमबंगाल) की विविध संस्थाओं द्वारा शताधिक सम्मानों एवं अलंकरणों से विभूषित किया गया है। इन अलंकरणों में, ‘सरस्वती रत्नसंपादक रत्नविज्ञान रत्न२० वीं शताब्दी रत्नआचार्यवाग्विदाम्बरसाहित्य वारिधिसाहित्य शिरोमणिवास्तु गौरवमानस हंससाहित्य गौरवसाहित्य श्रीकाव्य श्रीभाषा भूषणहरि ठाकुर स्मृति सम्मानसारस्वत साहित्य सम्मानकविगुरु रवीन्द्रनाथ सारस्वत सम्मानयुगपुरुष विवेकानंद पत्रकार रत्न सम्मानसाहित्य शिरोमणि सारस्वत सम्मानभारत गौरव सारस्वत सम्मानकामता प्रसाद गुरु वर्तिका अलंकरणउत्कृष्टता प्रमाणपत्रसर्टिफिकेट ऑफ़ मेरिटलोक साहित्य अलंकरण गुंजन कला सदन जबलपुर, राजा धामदेव अलंकरण, गहमरयुग-सुरभि आदि विशेष उल्लेखनीय हैं।
            सम्प्रति वे समन्वय प्रकाशन, जबलपुर – म.प्र. (जहाँ के वे निवासी हैं) से विभिन्न विधाओं के संकलन प्रकाशन कर देश के अनेक रचनाकारों के साहित्यिक कार्य को आगे बढ़ा रहे हैं।
            उनके श्लाघनीय कार्य हेतु उनका अभिनन्दन और उनके शतायु होने की कामना!
[लेखक परिचय : ख्यात कहानीकार, दोहाकार, व्यंग्यकार पिंगलविद, २० पुस्तकें प्रकाशित , संपर्क    ३/२९विकास नगर, लखनऊ-२२६०२२ चलभाष ८००९६०००९६, rajendrapverma@gmail.com]    


...ज्ञान और विद्या के सितारों की झिलमिल इं.संजीव.वर्मा 'सलिल'--
इं. अमरनाथ 
*
श्रीमती शांति देवी वर्मा एवं श्री राजबहादुर वर्मा जी के आँगन में २० अगस्त १९५२ को एक शिशु ने किलकारी भरी। समूचे परिवार में नवजीवन और नव-हर्ष की मरमरी नर्मदा बहने लगी। नवजात का नाम रखा गया, "संजीव" जिसके आगमन मात्र से ही प्राणों में नव- ऊर्जा का संचार होने लगे, तो वह संजीव ही हो सकता है। यही संजीव, नित्य नव-संजीवनी बिखेरता हुआ शिक्षा और साहित्य के आकाश में झिलमिला उठा, जब सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा, उसके बाद बी.ई., एम.आई.ई. अर्थशास्त्र व दर्शनशास्त्र में परास्नातक, एलएल. बी. विशारद, पत्रकारिता में डिप्लोमा, आदि विविध शिक्षा क्षेत्रों मे अपनी आभा बिखेरी। सतत अन्वेषणात्मक सृजन हेतु आपको जेमिनी अकादमी पानीपत हरयाणा द्वारा १९९९ में "आचार्य" की मानद उपाधि से नवाजा गया। सरल स्वभाव, मिलनसार, मृदुभाषी इस महामानव से मेरी प्रथम मुलाकात सन १९८५ में हुई।तभी से हम दोनों 'सलिल' की तरह एक-दूजे में घुले हुए हैं। 
आप म.प्र.सरकार के कार्यपालन अभियंता पद से सेवा निवृत्त होकर, म. प्र. उच्च न्यायलय  अधिवक्ता हैं।  
आयु के हिसाब से सलिल जी मुझसे छोटे हैं, लेकिन ज्ञान-विज्ञान में, मुझ जैसे देहाती कीचड़ी-जोहड़ की तुलना में आप प्रशांत महासागर हैं। मेरा उपनाम 'अनुज' हैं और सलिल जी खुद को मेरा अनुज मानते हैं। इस नाते वे साधिकार मेरे घर रुकते हैं और अपनी भाभी श्री (मेरी धर्मपत्नि) का चरणस्पर्श कर आशीष पाते हैं। उनकी यह सरलता और सहजता ही स्नेहिल संबंधों की थाती को सुदृढ़ बनाती है। मुझे १९८९ में  सलिल जी की अनुजा के विवाह में सम्मिलित होने का अवसर मिला। विवाहों में अपव्यय रोकने के सामाजिक आदर्श को समाज में स्थापित करने के लिए यह समारोह दिन में किया गया था।
उत्तर प्रदेश में अभियंताओं की हड़ताल के समय वे मध्य प्रदेश की ओर से  उत्तर प्रदेश में आये उत्तर प्रदेश के अधिकांश अभियंता नेताओं को स्नेह सूत्र में बाँध गए। एक यात्रा में सलिल जी सपरिवार लखनऊ आये और होटल में रुके। हम सूचना मिलते ही तुरंत उन्हें होटल से ग्रामीण अभियंत्रण सेवा के संघ भवन में ले गए। उस संगठन के प्रांताध्यक्ष इं. अनिल श्रीवास्तव के परिवार से सलिल परिवार कुछ पलों में नीर-खीर की तरह घुल गया। तब सलिल जी स्वागत कार्यक्रम में अब के ख्याति प्राप्त हास्य अभिनेता राजू श्रीवास्तव ने (जो तब नवोदित कलाकार थे) प्रस्तुति दी थी। 
सलिल जी मूलतः अभियंता हैं और अभियंत्रण साहित्य लेखन में आप सिद्धहस्त हैं। अभियंताओं की सर्वोच्च संस्था इन्टीट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स के आप आजीवन सदस्य हैं। अभियंत्रण साहित्य को हिंदी मे लिखने हेतु सलिल जी सतत प्रयासरत हैं। अभियंत्रण साहित्य समेटी कई स्मारिकाओं का आपने कुशल संपादन किया है और " भूकंप के साथ जीना सीखें* जैसी अमूल्य ज्ञान की भंडार लघु-पुस्तिका का सृजन भी किया है।
हिंदी साहित्य में आपकी अब तक अनेक कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि आपकी उत्तम कृतियाँ है, जबकि 
स्व. दुर्गा प्रसाद खरे जी रचित गीता के पद्यानुवाद 'कुरुक्षेत्र गाथा' की अपूर्ण पांडुलिपि को सलिल जी आत्मसात कर संशोधित और पूर्ण किया है। निर्माण के नूपुर, नींव के पत्थर, तिनका तिनका नीड़, आपके द्वारा संपादित अभियंता कवियों के सामूहिक काव्य संग्रह हैं। डॉ. श्यामसुंदर के संस्कृत श्लोकों का दोहनूवाद सलिल जी ने किया हुए यह कृति सौरभ: शीर्षक से प्रकाशित हुई है। गिरिमोहन गुरु - संवेदना और शिल्प तथा समयजयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्र नियाज़ सलिल जी द्वारा संपादित समालोचनात्मक कृतियाँ हैं। डॉ. अनिल जैन के अंगरेजी ग़ज़ल संग्रह 'ऑफ़ एन्ड ऑन' तथा डॉ. बाबू जोसेफ व स्टीव विन्सेंट द्वारा हिंदी पद्यानुवादित 'उदा-कड़ा का संपादन-प्रकाशन सलिल द्वारा भाषिक एकता की दृष्टि से किया गया असाधारण कार्य है। आप और आपकी धर्मपत्नी श्रीमती साधना वर्मा जी के संयुक्त संपादन मे वर्ष २०१८ मे तीन दोहा संकलनों का प्रकाशन 'दोहा शतक मञ्जूषा' श्रृंखला के अंतर्गत हुआ है। आप "नर्मदा" पैतृक और "दिव्य नर्मदा" अंतर्जाल पत्रिका का संपादक-संचालक हैं। सलिल जी इंस्टीट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स की वार्षिक पत्रिका "अभियंता बंधु" का भी संपादन कर चुके हैं। 
सलिल जी हिंदी साहित्य की हर विधा लेखन में तो सिद्धहस्त है ही, विभिन्न.बोलियों में भी आपने साहित्य रचना की है।छांदसिक गीत, नवगीत, कहानी, लघुकथा, निबंध, आलेख, संस्मरण, समीक्षा, अनुवाद, रिपोर्ताज, साक्षात्कार, आमुख कथा, पर्यटन वृत्तांत, हाइकु, माहिया, सॉनेट आदि लेखन में आप बहुचर्चित हैं। नवगीत और छंदशास्त्र पर आप कार्यशाला का आयोजन कर नव रचनाकारों को निशुल्क प्रशिक्षित करते हैं। छंदशास्त्र के पुरातन और नवीन छंदों पर आप शोध कर रहे है। सभी प्रकार के सवैया-छंदों पर शोध करते हुए आपने अनेक नवीन सवैयों का सृजन किया है।
सोशल मीडिया से आप ब्लागिंग फेसबुक, व्हाट्सएप के द्वारा गहराई तक जुड़े है। छंद की लगभग हर विधा पर आपने नवांकुरों को सिखाने हेतु अलग-अलग ५० समूहों / पटलों की स्थापना कर रखी है। स्वयं भी अनेक साहित्यिक समूहों से जुड़े हुए है। छंदों के आचार्य के रूप में आपकी लम्बे समय से पहचान है।अनेक साहित्यिक संस्थाओं में निर्णायक की भूमिका भी निभा चुके हैं। अभियान जबलपुर के आप संस्थापक और विश्ववाणी हिंदी संस्थान के संचालक हैं। समन्वय प्रकाशन,अभियान, जबलपुर आपका अपना प्रकाशन संस्थान है।
इण्डिया जिओ टैक्नीकल सोसायटी जबलपुर चैप्टर के अध्यक्ष, इन्स्टीट्यूट आफ इंजीनियर्स जबलपुर केंद्र के सक्रिय सदस्य, राष्ट्रीयकायस्थ महापरिषद के वरिष्ठ उपाध्यक्ष व् महामंत्री, अखिल भारतीय कायस्थ महासभ एके मंडलाध्यक्ष व् राष्ट्रीय उपाध्यक्ष,विश्व कायस्थ समाज के संचालक के रूप में सलिल जी को योगदान चर्चित रहा है।
आपकी रचनायें भारत की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपती रहती है। अभियंता साहित्यकार मंच, लखनऊ द्वारा आप दो बार सम्मानित किये गए हैं। विभिन्न संस्थायें आपको सम्मानित करके स्वयं गौरवान्वित होती है। सलिल जी सैम,ाजिक समस्याओं के प्रति सचेत रहते हुए चिंतन करते हैं तथा समस्याओं का समाधान रचनाओं में सुझाते हैं-
हिंदी आटा माँढिए, उर्दू मोयन डाल।
सलिल संस्कृत ज्ञान दे, पूड़ी बने कमाल।। 
[लेखक परिचय : निष्णात सिविल अभियंता, कुशल संपादक, कवि, कहानीकार, छन्द शास्त्र के ज्ञाता, छंद शिक्षण हेतु समर्पित, चुटकी काव्य विधा के जनक।  संपर्क : अभिषेक, ४०१ ए सेक्टर १, उदयन १, लखनऊ ९४५१७०२१०५, ८७०७४८२५९४। ] 
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संजीव वर्मा और मैं
- जयप्रकाश श्रीवास्तव
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मैं संजीव वर्मा 'सलिल' के विषय में यह कतई नहीं कहना चाहता कि वे सर्वगुण सम्पन्न हैं, वे साहित्याकाश के दैदीप्तमान नक्षत्र हैं, वे नवीन छंदों के पुरोधा हैं, उनकी लेखनी सतत प्रवाहमान है, साहित्य के प्रति उनका समर्पण स्तुत्य है, सीखनेवालों के प्रति उनका स्वभाव सदा प्रेरणादायी रहा है, वे सदैव नये सृजन के पक्षधर रहे हैं, उनकी वाकपटुता वैचारिक रूप से सामने वाले को निरुत्तर कर देती है, वे एक कुशल मार्गदर्शक की भाँति अपने विचारों को सप्रमाण पुष्टि देते हैं, मैं यह भी नहीं कहना चाहता कि उनका व्यक्तित्व असाधारण है, यह सब कुछ सबने अपने-अपने ढँग से कहा होगा, कहते होंगे। मेरे नजरिये से संजीव वर्मा 'सलिल', संजीव वर्मा सरल ज्यादा उपयुक्त लगते हैं, उनकी सरलता और सहजता ही है जो किसी को भी अपने आकर्षण में बाँध लेती है। 
मेरी उनसे मुलाक़ात कुछ ज्यादा पुरानी नहीं है। ज़िला साहित्यकार परिषद की एक गोष्ठी में उनसे साक्षात्कार हुआ। गोष्ठी के उपराँत सामान्य परिचय के बाद मेरे हाथ मेरे द्वितीय गीत संग्रह की प्रति देख उन्होंने आग्रह किया कि यह प्रति मुझे दे सकते हों तो दे दें मैं इस पर कुछ लिखना चाहूँगा। मैंने वह प्रति उन्हें भेंट कर दी। कुछ दिन बाद फेसबुक वाल पर 'परिंदे संवेदना के' की एक बृहत् समीक्षा लगी थी, समीक्षाकार थे आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' समीक्षा पढ़कर मैं अभिभूत हो गया बगैर किसी लाग-लपेट के अपने ही गीतों पर बेबाक उनका अभिमत पढ़ उनकी सरलता ने मुझे आकर्षित कर लिया था। बाद में दो-एक पत्रिकाओं ने भी उनकी अनुमति से उक्त समीक्षा अपनी-अपनी पत्रिकाओं में छापी और इस तरह उनसे प्रथम परिचय प्रगाढ़ मित्रता में परिवर्तित हो गया।

आज भी जब कभी हम मिलते हैं तो तमाम औपचारिकताओं के बाद भी बहुत कुछ हमारे बीच ऐसा होता है जिसके लिए शब्द छोटे हो जाते हैं और एक अंतर्निहित विचारधारा नि:सृत होने लगती है जो सहजता और सरलता से हमारे मनों को शीतल कर जाती है। यूँ भी जब कभी मन होता है अपनी कहने और सुनने का तो जा पहुँचता हूँ उनके पास फिर शुरु होती है अंतहीन वैचारिक गोष्ठी, पता ही नहीं चलता समय कब कितना गुज़र गया।

जहाँ तक उनके कृतित्व की बात है तो बहुत अधिक परिचित नहीं हूँ। फिर भी जो कुछ सामने आया है उससे उनकी थाह पाना मुश्किल ही है। हाँ, इतना ज़रूर कहना चाहता हूँ कि उनके व्यक्तित्व को उनके कृतित्व से नहीं नापा जा सकता। अंत में वे दीर्घायु हों और सदैव अपनी ऊर्जा से साहित्य जगत को रोशन करते रहें।

इतिइत्यम। 

[लेखक परिचय : से. नि. शिक्षक, वरिष्ठ गीतकार, ३ गीत-नवगीत संग्रह प्रकाशित, विविध संस्थाओं से सम्मानित। संपर्क : आई. सी. ५ सैनिक सोसायटी, शक्ति नगर, जबलपुर ४८२००१, चलभाष ७८६९१९३९२७, ९७१३५४४६४२, jaiprakash09shrivastava@gmail.com ]   


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आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल': जैसा मैंने जाना
श्रीधर प्रसाद द्विवेदी
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क्या आपने चलता-फिरता बृहद ज्ञान कोष (encyclopedia) देखा है? 
नहीं देखा न? 
नहीं देखा, तो आप जबलपुर (मध्य प्रदेश) के एक सेवा निवृत्त कार्यपालक अभियन्ता श्री संजीव वर्मा 'सलिल' जी से मिलिए। जी हाँ, सलिल जी ही वह encyclopedia हैं।
सरल और सहज व्यक्तित्व के धनी 'सलिल' जी से मुझे पहली बार मिलने का सौभाग्य गहमर (गाजीपुर) के साहित्य सम्मेलन में मिला। वहाँ बड़ी आत्मीयता से वे सभी नव सिखुआ कलमकारों से भी मिल रहे थे और बात-बात में ही जिज्ञासुओं को छन्द के कई गुर सीखा दे रहे थे। मैं वहीं उनके विशाल एव सरल व्यक्तित्व से प्रभावित हुआ। तबसे उनकी संगति लाभ का इंतजार में था। इस इन्तजार का अंत इस वर्ष ९-१० मार्च को हुआ जब साहित्यिक संस्था 'परिमल-प्रवाह' के वैनर तले मेदिनीनगर, पलामू (झारखण्ड) में एक वृहदसाहित्यिक सम्मेलन का आयोजन किया गया। आयोजन में मेरे आमंत्रण पर 'सलिल' जी पलामू पधारे और मुझे उनके आतिथ्य का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इस अवसर पर उनके साथ बिताए गए क्षणों का संस्मरण आप से साझा कर रहा हूँ-
' सलिल' जी से दो दिनों का साथ हुआ और उनका साथ समकालीन साहित्य की दिशा और दशा पर चर्चा हुई। हिन्दी के प्रति सलिल जी का समर्पण देखा और बात करते-करते भी कुछ न कुछ लिखते-रचते पाया। किसी व्यक्ति की मेधा एक साथ कई दिशाओं में कैसे चलती है, यह सलिल जी के सत्संग में रहकर ही जाना जा सकता है। ऐसा मैं इसलिये कह रहा हूँ कि मेरी छोटी पोती परी जो अभी नर्सरी में पढ़ती है और बातूनी भी है, अक्सर आकर उनके पास बैठ जाती और उनसे बात करने लगती, इसी क्रम में उसे उसे अपना लिखा 'नवगीत' " सूरज बबुआ! चल स्कूल।" बात- बात में याद करा दिया। यह उनका कौशल है कि बच्चों के बीच भी सहज भाव से घुल-मिल कर उनको भी अच्छे संस्कार में ढाल लेते हैं तथा यह उनके व्यक्तित्व का आकर्षण है कि बच्चे भी इनसे सम्मोहित हो जुड़ जाते हैं।
'सलिल' जी साहित्य की अनेक विधाओं में दर्जनाधिक पुस्तकों की रचना तो कर ही चुके हैं, कई संकलनों, पत्रिकाओं तथा स्मारिकाओं का उत्कृष्ट सम्पादन भी आपने किया हैं। लगभग सौ से अधिक कवि-लेखकों के पुस्तक की समीक्षा लिखी है और उन्हें उत्कृष्ट लेखन की और प्रेरित भी किया है। समीक्षक के रूप में सलिल जी कथ्य की मौलिकता, प्रमाणिकता, सामयिकता आदि के साथ-साथ भाषा की शुद्धता, सम्यक शब्द-चयन, आंचलिकता, मानवीय मूल्यपरकता तथा वैश्विकता को भी महत्व देते हैं। सलिल जी का स्पष्ट मत है कि साहित्य वही है जो सबके लिए हितकारी हो। संकुचित-संकीर्ण, स्वार्थपरकता को प्रोत्साहित करती रचना सत्साहित्य नहीं हो सकती।
कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि काव्य कृतियों के प्रणेता सलिल जी में आशुकवित्व की शक्ति है। पलामू भ्रमण के समय 'वेतला वन भ्रमण' के क्रम में बस में बैठे-बैठे प्राकृतिक सौंदर्य निहारते हुए-विचरते हुए ही सलिल जी ने न जाने कब-कैसे प्रकृति सौंदर्य के 'हायकू' रचकर, सुनाते हुए हम सबको हतप्रभ कर दिया। कमाल यह कि हर हाइकु निर्दोष और मननीय। सलिल जी छन्दों के कोष ही हैं। पारम्परिक छन्दों के अतिरिक्त इन्होंने लक्षण- उदाहरण सहित सैकड़ों नए छंद आविष्कृत कर भी साहित्य जगत को समृद्ध किया है।
साहित्यिक चर्चाओं के दौरान अपने काव्य गुरु चेतन
'सलिल' जी हिन्दी भाषा में अंगरेजी-उर्दू के अत्यधिक घाल-मेल के पक्षधर नहीं हैं पर क्षेत्रीय भाषाओं-बोलियों के साहित्य में आपकी गहरी रुचि है। ये स्वयं भी बघेली, बुंदेली, निमाड़ी, भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, रास्थानी, हरयाणवी, सरायकी, नेपाली आदि में आदि बोलियों में काव्य रचना करते हैं।
बहुमुखी प्रतिभा के धनी आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' से साहित्य जगत को अभी बहुत-बहुत आशाएँ हैं। 'आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी' की तरह नए-नए रचनाकारों को गढ़ते तराशते सलिल दीर्घ जीवी और यशस्वी हों।

[लेखन परिचय : वरिष्ठ कवि, संस्कृत-हिंदी छंदों के जानकार, दो काव्य संग्रह प्रकाशित, संपादक अनुनाद त्रैमासिकी, संपर्क : अमरावती, गायत्री मंदिर मार्ग, सुदना, डाल्टनगंज, पलामू ८२२१०२ झारखण्ड, ९४३१५५४४२८, ९९३९२३३९९३, sp.dwivedi7@gmail.com
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लाड़ले लला संजीव सलिल  
कान्ति शुक्ला
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मानव जीवन का विकास चिंतन, विचार और अनुभूतियों पर निर्भर करता है। उन्नति और प्रगति जीवन के आदर्श हैं। जो कवि जितना महान होता है, उसकी अनुभूतियाँ भी उतनी ही व्यापक होतीं हैं। मूर्धन्य विद्वान सुकवि छंद साधक आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' जी का नाम ध्यान में आते ही एक विराट साधक व्यक्तित्व का चित्र नेत्रों के समक्ष स्वतः ही स्पष्टतः परिलक्षित हो उठता है। मैंने 'सलिल' जी का नाम तो बहुत सुना था और उनके व्यक्तित्व, कृतित्व, सनातन छंदों के प्रति अगाध समर्पण संवर्द्धन की भावना ने उनके प्रति मेरे मन ने एक सम्मान की धारणा बना ली थी और जब रू-ब-रू भेंट हुई तब भी उनके सहज स्नेही स्वभाव ने प्रभावित किया और मन की धारणा को भी बल दिया परंतु यह धारणा मात्र कुछ दिन ही रही और पता नहीं कैसे हम ऐसे स्नेह-सूत्र में बँधे कि 'सलिल' जी मेरे नटखट देवर यानी 'लला' (हमारी बुंदेली भाषा में छोटे देवर को लला कहकर संबोधित करते हैं न) होकर ह्रदय में विराजमान हो गए और मैं उनकी ऐसी बड़ी भौजी जो गाहे-बगाहे दो-चार खरी-खोटी सुनाकर धौंस जमाने की पूर्ण अधिकारिणी हो गयी। हमारे बुंदेली परिवेश, संस्कृति और बुंदेली भाषा ने हमारे स्नेह को और प्रगाढ़ करने में महती भूमिका निभाई। हम फोन पर अथवा भेंट होने पर बुंदेली में संवाद करते हुए और अधिक सहज होते गए। अब वस्तुस्थिति यह है कि उनकी अटूट अथक साहित्य-साधना, छंद शोध, आचार्यत्व, विद्वता या समर्पण की चर्चा होती है तो मैं आत्मविभोर सी गौरवान्वित और स्नेहाभिभूत हो उठती हूँ।

व्यक्तित्व और कृतित्व की भूमिका में विराट को सूक्ष्म में कहना कितना कठिन होता है, मैं अनुभव कर रही हूँ। व्यक्तित्व और विचार दोनों ही दृष्टियों से स्पृहणीय रचनाकार'सलिल' जी की लेखनी पांडित्य के प्रभामंडल से परे चिंतन और चेतना में - प्रेरणा, प्रगति और परिणाम के त्रिपथ को एकाकार करती द्वन्द्वरहित अन्वेषित महामार्ग के निर्माण का प्रयास करती दिखाई देती है। उनके वैचारिक स्वभाव में अवसर और अनुकूलता की दिशा में बह जाने की कमजोरी नहीं- वे सत्य, स्वाभिमान और गौरवशाली परम्पराओं की रक्षा के लिए प्रतिकूलता के साथ पूरी ताकत से टक्कर लेने में विश्वास रखते हैं। जहाँ तक 'सलिल'जी की साहित्य संरचना का प्रश्न है वहाँ उनके साहित्य में जहाँ शाश्वत सिद्धांतों का समन्वय है, वहाँ युगानुकूल सामयिकता भी है, उत्तम दिशा-निर्देश है, चिरंतन साहित्य में चेतनामूलक सिद्धांतों का विवरण है जो प्रत्येक युग के लिए समान उपयोगी है तो सामयिक सृजन युग विशेष के लिए होते हुए भी मानव जीवन के समस्त पहेलुओं की विवृत्ति है, जहाँ एकांगी दृष्टिकोण को स्थान नहीं। 
"सलिल' जी के रचनात्मक संसार में भाव, विचार और अनुभूतियों के सफल प्रकाशन के लिए भाषा का व्यापक रूप है जिसमें विविधरूपता का रहस्य भी समाहित है। एक शब्द में अनेक अर्थ और अभिव्यंजनाएँ हैं, जीवन की प्रेरणात्मक शक्ति है तो मानव मूल्यों के मनोविज्ञान का स्निग्धतम स्पर्श है, भावोद्रेक है। अभिनव बिम्बात्मक अभिव्यंजना है जिसने मुझे विशेष रूप से प्रभावित किया है। माँ वाणी की विशेष कृपा दृष्टि और श्रमसाध्य बड़े-बड़े कार्य करने की अपूर्व क्षमता ने जहाँ अनेक पुस्तकें लिखने की प्रेरणा दी है, वहीं पारंपरिक छंदों में सृजन करने के साथ सैकड़ों नवीन छंद रचने का अन्यतम कौशल भी प्रदान किया है- तो हमारे लाड़ले लला हैं कि कभी ' विश्व वाणी संवाद' का परचम लहरा रहे हैं, कभी दोहा मंथन कर रहे हैं तो कभी वृहद छंद कोष निर्मित कर रहे हैं ,कभी सवैया कोष में सनातन सवैयों के साथ नित नूतन सवैये रचे जा रहे हैं। सत्य तो यह है कि लला की असाधारण सृजन क्षमता, निष्ठा, अभूतपूर्व लगन और अप्रतिम कौशल चमत्कृत करता है और रचनात्मक कौशल विस्मय का सृजन करता है। समरसता और सहयोगी भावना तो इतनी अधिक प्रबल है कि सबको सिखाने के लिए सदैव तत्पर और उपलब्ध हैं, जो एक गुरू की विशिष्ट गरिमा का परिचायक है। मैंने स्वयं अपने कहानी संग्रह की भूमिका लिखने का अल्टीमेटम मात्र एक दिन की अवधि का दिया और सुखद आश्चर्य रहा कि वह मेरी अपेक्षा में खरे उतरे और एक ही दिन में सारगर्भित भूमिका मुझे प्रेषित कर दी । 

जहाँ तक रचनाओं का प्रश्न है, विशेष रूप से पुण्यसलिला माँ नर्मदा को जो समर्पित हैं- उन रचनाओं में मनोहारी शिल्पविन्यास, आस्था, भाषा-सौष्ठव, वर्णन का प्रवाह, भाव-विशदता, ओजस्विता तथा गीतिमत्ता का सुंदर समावेश है। जीवन के व्यवहार पक्ष के कार्य वैविध्य और अन्तर्पक्ष की वृत्ति विविधता है। प्राकृतिक भव्य दृश्यों की पृष्ठभूमि में कथ्य की अवधारणा में कलात्मकता और सघन सूक्ष्मता का समावेश है। प्रकृति के ह्रदयग्राही मनोरम रूप-वर्णन में भाव, गति और भाषा की दृष्टि से परिमार्जन स्पष्टतः परिलक्षित है । 'सलिल' जी के अन्य साहित्य में कविता का आधार स्वरूप छंद-सौरभ और शब्दों की व्यंजना है जो भावोत्पादक और विचारोत्पादक रहती है और जिस प्रांजल रूप में वह ह्रदय से रूप-परिग्रह करती है , वह स्थायी और कालांतर व्यापी है। 

'सलिल' जी की सर्जना और उसमें प्रयुक्त भाषायी बिम्ब सांस्कृतिक अस्मिता के परिचायक हैं जो बोधगम्य ,रागात्मक और लोकाभिमुख होकर अत्यंत संश्लिष्ट सामाजिक यथार्थ की ओर दृष्टिक्षेप करते हैं। जिन उपमाओं का अर्थ एक परम्परा में बंधकर चलता है- उसी अर्थ का स्पष्टीकरण उनका कवि-मन सहजता से कर जाता है और उक्त स्थल पर अपने प्रतीकात्मक प्रयोग से अपने अभीष्ट को प्राप्त कर लेता है जो पाठक को रसोद्रेक के साथ अनायास ही छंद साधने की प्रक्रिया की ओर उन्मुख कर देता है। अपने सलिल नाम के अनुरूप सुरुचिपूर्ण सटीक सचेतक मृदु निनाद की अजस्र धारा इसी प्रकार सतत प्रवाहित रहे और नव रचनाकारों की प्रेरणा की संवाहक बने, ऐसी मेरी शुभेच्छा है। मैं संपूर्ण ह्रदय से 'सलिल' जी के स्वस्थ, सुखी और सुदीर्घ जीवन की ईश्वर से प्रार्थना करते हुए अपनी हार्दिक शुभकामनाएँ व्यक्त करती हूँ ।


[लेखिका परिचय : वरिष्ठ कहानीकार-कवयित्री, ग़ज़ल, बाल कविता तथा कहानी की ५ पुस्तकें प्रकाशित, ५ प्रकाशनाधीन। सचिव करवाय कला परिषद्, प्रधान संपादक साहित्य सरोज रैमसीकी। संपर्क - एम आई जी ३५ डी सेक्टर, अयोध्या नगर, भोपाल ४६२०४१, चलभाष ९९९३०४७७२६, ७००९५५८७१७, kantishukla47@gamil.com .] 
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विद्वता और शालीनता के संगम आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
हरि फ़ैज़ाबादी 
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सन् २०१६ की बात है। मेरा प्रथम दोहा संग्रह 'जीवन की हर बात' के प्रकाशन की प्रक्रिया मेरे दोहा गुरु कविवर चेतन दुबे 'अनिल' जी के मार्गदर्शन में आकार ले रही थी। जब पुस्तक के लिए विद्वतजनों और विशेष रूप से कुछ दोहाकारों के अभिमत हेतु मैंने चेतन जी से कहा तो उन्होंने मेरे दोहा संग्रह हेतु आदरणीय सलिल जी से बात की। सलिल जी ने सहर्ष उनका अनुरोध स्वीकार किया और मेरे दोहा संग्रह के लिए अपना अभिमत दिया। उनकी सरलता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि उस समय मेरा-उनका परिचय भी नहीं था, फिर भी उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया। इस प्रकार उनसे मेरा प्रथम परिचय उस लेख के माध्यम से हुआ।तत्पश्चात उनसे फ़ोनपर नियमित सम्पर्क बना रहा और वे सदैव कुछ न कुछ सृजन की प्रेरणा और मार्गदर्शन देते रहे। विगत वर्ष के अंत में एक साहित्यिक आयोजन में आने पर उन्होंने मुझे अपने लखनऊ आने की सूचना दी और मुझे उनसे मिलकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का भी सौभाग्य मिला।

संजीव वर्मा 'सलिल' जी के ज्ञान और विद्वता की व्याख्या कर पाना मेरे जैसे साहित्य के विद्यार्थी के लिए लगभग असंभव है लेकिन अब तक उनके बारे में जो भी जाना-समझा है मैंने उस आधार पर इतना अवश्य कह सकता हूँ कि वर्तमान समय में हिंदी साहित्य के प्रमुख विद्वानों की सूची किसी भी आधार पर बनाई जाए तो उसमें 'सलिल' जी का नाम अवश्य आएगा।आमतौर पर अधिकांश साहित्यकार गद्य या पद्य में से किसी एक में ही विशेष दक्षता प्राप्त कर पाते हैं लेकिन सलिल जी जितने बड़े कवि हैं, उससे भी बढ़कर लेखक हैं और उससे भी कहीं बढ़कर एक बेहतरीन इंसान हैं। हिंदी काव्य की शायद ही कोई ऐसी विधा हो जिसमें उनकी लेखनी न चली हो और मात्र लेखनी ही नहीं चली बल्कि हिंदी काव्य की हर विधा में वो भरपूर महारत भी रखते हैं। 

सलिल जी की अपनी भी अनेक कृतियाँ प्रकाशित हुई हैं और अनेक साझा संग्रहों का संपादन भी उन्होंने किया है। वैसे तो वे हमेशा से नए रचनाकारों का प्रोत्साहन और मार्गदर्शन करते रहे हैं लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया विशेष रूप से व्हाट्सएप के माध्यम से अब और अधिक साहित्य सेवा वो कर रहे हैं और अनेक नए रचनाकार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उनके मार्गदर्शन में अपनी लेखन क्षमता निखार रहे हैं। मैं ईश्वर से उनके स्वास्थ्य और दीर्घायु की प्रार्थना करते हुए इस कामना के साथ अपनी लेखनी को विराम देता हूँ कि वे इसी प्रकार आजीवन साहित्य सृजन और साहित्य साधना में रत रहते हुए हिंदी साहित्य को समृद्ध करते रहें।

[लेखक परिचय : प्राध्यापक हिंदी, ख्यात शायर, दोहाकार, छंद शिक्षण भी, १ ग़ज़ल संग्रह हिंदी में, १ ग़ज़ल संग्रह उर्दू में,, १ दोहा संग्रह, हनुमत दोहा चालीसा प्रकाशित। संपर्क: बी १०४ / १३ निराला नगर, लखनऊ, चलभाष ९४५०४८९७८९, ९७९५९१८३५०, hari.faizbadi@gmail.com]
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विमोहित करती है आचार्य सलिल की साहित्य-साधना
-हिमकर श्याम
कविता शब्दों की गंभीर साधना है। सृजन का कर्म अत्यंत कठिन है। काफ़ी जद्दोजहद और मशक्कत के बाद लिखने का काम हो सकता है। सृजन कार्य को भारतीय मनीषा ने प्रसव पीड़ा से जोड़ा है। कवि सर्जना के क्षण अत्यधिक बेचैन रहता है और रचना पूरी होने के बाद ही निश्चिन्त हो पाता है। कविता सरल और सादे शब्दों में लयबद्ध होती है तो सहजता से हृदय तक पहुंचती है।
काव्य और छंद का घनिष्ट संबंध है। काव्य में छंद का प्रयोग प्राचीन काल से ही होता रहा है। भारतीय दृष्टि में छंद लय पर आधृत एक नाद-योजना है। प्रत्येक छंद की एक लय होती है जिसके अनुसार वर्णों एवं मात्राओं की योजना कर एक विशेष नाद की सृष्टि की जाती है। छंद शब्द वेद का भी पर्याय है। छंद काव्य को अमरता प्रदान करने में समर्थ है।  पहले कविता छंद में स्वत: लिखी जाती थी।  आधुनिक कविता वह मानी गई जिसने स्वयं को बंधी-बंधायी पुरातन काव्यशास्त्रीय नियमों से खुद को मुक्त कर लिया हो। आजकल की कविता मुक्तछंद में लिखी जा रही है इसमें सपाटबयानी ज्यादा है। कविता का कथन मुख्य, कला और शिल्प पक्ष गौण हो गया है गद्य लेखन और काव्य लेखन में फर्क है गद्य की आवश्कता अपनी बात दूसरों तक पहुँचाने के लिए होती है जबकि कविता की रचना सुन्दरता के लिए होती है दिखाई दे रही घटनाओं को या महसूस की गई भावनाओं को यथास्थिति में रख देना कविता लिखना नहीं है ऐसा करने से कविता के समाप्त होने का खतरा है क्योंकि कविता अपनी सर्जनात्मक पहचान से मुक्त हो जाती है        
विडम्बना है कि भारतीय छंद विद्या का प्रचार-प्रसार सही ढंग से नहीं हो पाया है। यही वजह है कि साहित्य-लेखन में छंदों का प्रयोग नगण्य होता जा रहा है तथापि कुछ  ऐसे मनीषा हैं जिन्होंने छंदों के प्रति असीम निष्ठा का भाव अपनाकर छंद-रचना से खुद को अलग नहीं किया है। इन्हीं मनीषियों में एक नाम है आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' का। इन्होंने शास्त्रीय छन्दों के संवर्द्धन और प्रचार-प्रसार में महती एवं संयत भूमिका का निर्वहन किया है। पिंगल शास्त्र का गहन अध्ययन किया है। परंपरागत छंदों के साथ ३५० से अधिक नवीन छंदों की भी रचना की है। सलिल जी नये रचनाकारों को सदैव छंद रचना का प्रशिक्षण देते रहे हैं और उनके लिखे हुए का परिष्कार करते रहे हैं। सैकड़ों लोग इनसे हिंदी छंद रचना सीख चुके हैं। 
आचार्य सलिल की एकांतिक साहित्य-साधना विमोहित करती है। वह समकालीन हिंदी काव्य में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। वह विगत बीस वर्षों से अंतरजाल पर भी सक्रिय हैं और हिंदी की विभिन्न विधाओं में सार्थक रच रहे हैं। ब्लॉग ही वह माध्यम है जिससे मेरा उनसे परिचय हुआ। २०१३ में मैंने ब्लॉगिंग शुरू की थी। फिर ब्लॉग एग्रीगेटरडायरेक्ट्री और संकलक से जुड़ा। उसी दौरान 'दिव्य नर्मदानामक ब्लॉग की जानकारी मिली। इस ब्लॉग ने पहली नज़र में ही प्रभावित किया।  यह ब्लॉग संजीव वर्मा 'सलिल' जी का है। इससे बाद हम फेसबुक पर एक-दूसरे से जुड़े। फेसबुक से जुड़ने के बाद उनकी रचनाओं का रसास्वादन  करता रहा। हम कभी मिले नहीं है पर हमारे बीच एक आत्मीय रिश्ता बन गया है। पहले मैसेंजर, फिर फोन से बातचीत भी होने लगी। बताता चलूँ कि दिव्य नर्मदा’ वेबसाइट बन गया है इस पर हिंदी भाषा सिखाने से संबंधित करीब दो  लाख पेज हैं। जिससे २६ लाख से अधिक फॉलोअर्स जुड़े हैं। आचार्य सलिल सीखनेवालों को इंटरनेट के माध्यम से पहले हिंदी छंद की जानकारी देते हैं फिर लिखने का तरीका बताते हैं। नए रचनाधर्मियों का लगातार दिशा निर्देश कर रहे हैं। 
छंद को पुनः साहित्य के केन्द्र में लाने के लिए इन्होंने बहुत बड़ा योगदान दिया है। गत वर्ष इनके और प्रो. साधना वर्मा के संपादकत्व में दोहा शतक मंजूषा का प्रकाशन हुआ। दोहों पर इतना बड़ा और प्रामाणिक कार्य सम्भवतः पहली बार हुआ है।'दोहा-दोहा नर्मदादोहा शतक मञ्जूषा,  'दोहा सलिला-निर्मलाएवं 'दोहा दीप्त दिनेश'  तीन भागों में प्रकाशित यह संकलन संग्रहणीय दस्तावेज है। तीन अल-अलग संग्रहों में पंद्रह-पंद्रह दोहाकारों के सौ-सौ दोहों को संकलित किया गया है। पैंतालीस दोहाकारों के चार हजार पाँच सौ दोहों के साथ सलिल जी के द्वारा रचित लगभग ५०० दोहे और अन्य १०० दोहे यानी लगभग ५१०० दोहों को पुस्तकाकार रूप दिया गया है। एक साथ इतने दोहाकारों को एक ही मंच पर लाकर अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य किया गया है। निश्चय ही यह दोहा छंद के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित होगा। मेरे लिए हर्ष की बात है कि मैं भी इस संकलन का हिस्सा हूँ। सलिल जी के संपादकीय कौशल और छंद के प्रति समर्पण भाव की जितनी तारीफ़ की जाए कम है।
लेखक परिचय : समर्पित कवि, पत्रकार, १ काव्य संग्रह प्रकाशित, १ प्रकाशनाधीन। सम्पर्क :  बी १शांति इंक्लेवरोड नम्बर ४ ए कुसुम विहारमोराबादीराँची ४३४००८झारखण्ड, चलभाष ८६०३१७१७१०]
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बेबाक आत्मीय संस्मरण

व्यक्ति नहीं संस्था-समूह हैं भाई संजीव वर्मा सलिल

इं. विवेक रंजन श्रीवास्तव
*
शिक्षा व नौकरी से मूलतः सिविल इंजीनियर, पर मन व कर्म से हरफन मौला,
दिव्य नर्मदा साहित्यिक पत्रिका के प्रधान संपादक, समन्वय प्रकाशन
अभियान जबलपुर के संचालक, विश्व वाणी हिंदी संस्थान के संस्थापक,
अखिल भारतीय कायस्थ महासभा तथा राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद के
पूर्व महामंत्री व वरिष्ठ उपाध्यक्ष, कानून वेत्ता, समाज सेवाके हर कार्य में बढ़ चढ़ कर
हिस्सेदारी करनेवाले भाई संजीव वर्मा 'सलिल' एक संस्था नहीं संस्थाओं के समूह हैं।
बात १९९० की होगी वे जबलपुर में कायस्थ सभा तथाडिप्लोमा इंजीनियर्स संघ में बहुत
सक्रिय थे। सारे प्रदेश में युवा संजीव भाई दौरे करके दोनों संगठनों को मजबूत करने में
जुटे हुये थे। मैं मण्डला में चित्रगुप्त मंदिर की स्थापना समिति में सक्रिय था। बालाघाट
से किसी आयोजन के बाद लौटते हुए वे हमारे घर आये। फिर हमारी आत्मीयता दिन पर
दिन बढ़ती ही गई। अखिल भारतीय कायस्थ महासभा के लोकप्रिय राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ.
रतन चंद्र वर्मा के मंडला कार्यक्रम को हमने मूर्त रूप दिया। हमने राजस्थान कायस्थ
महासभा द्वारा आयोजित राष्ट्रीय कायस्थ सम्मेलन में साथ-साथ भागीदारी की।
सलिल जी के संपादन में चित्राशीष नाम से सामाजिक पत्रिका लगभग १२ वर्षों
तक जबलपुर से तथा संपर्क सामाजिक पत्रिका बिलासपुर से प्रकाशित हुई। उन्होंने अथक
श्रम कर अनेक स्थाओं पर दहेज़ रहिर सामूहिक विवाह भी संपन्न कराये।
अभियान के बैनर तले हमने मण्डला व नैनपुर में अखिल भारतीय दिव्य नर्मदा अलंकरण
के राष्ट्रीय साहित्यिक आयोजन वर्ष २००० तथा २००१ में संपन्न किये। दिव्य नर्मदा नाम
से एक विशुद्ध साहित्यिक पत्रिका प्रारंभ की गई। बाद में प्रकाशन बढ़ते खर्च के चलते मेरे
सुझाव व तकनीकी सहयोग से ही इसे ब्लॉग का रूप दिया गया। वर्तमान में यह ई पत्रिका
http://www.divyanarmada.in/ के रूप में अंतरजाल पर है। २६ लाख से अधिक पाठक
इससे जुड़ चुके हैं। आज यह इंटरनेट की वैश्विक पहुँच वाली लोकप्रिय पत्रिका है, जिसे
लगभग सभी हिन्दी भाषी देशो से नियमित लाखों हिट्स मिलते हैं।
मेरे जबलपुर स्थानांतरण के बाद इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स में, इंडियन
जियोलाजिकल सोसायटी जबलपुर चैप्टर (जिसके वे अध्यक्ष हैं) में, विश्ववाणी हिन्दी संस्थान,
अभियान, वर्तिका सहित अनेक संस्थाओं के विभिन्न आयोजनो में हमने साथ-साथ कार्यक्रम
किये। हिंदी में तकनीकी लेखन आरम्भ करने वालों में उनका भी शुमार है। अभियंताओं की शिखर
संस्था इंस्टीट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स की राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाश्य वार्षिक पत्रिका 'अभियंता बंधु'
के जबलपुर से प्रकाशित अंक के वे संपादक रहे।
दोहे की, छंद की, व्यंग्य की जाने कितनी लम्बी बातें हमने की हैं, जिन्हें ४ दोहे संग्रहो के
मूर्त स्वरूप में साहित्य जगत ने देखा है। छंद शास्त्र के वे व्यकरणाचार्य हैं। दिल्ली पुस्तक मेले,
भोपाल विश्व हिन्दी सम्मेलन में हमने घंटों साथ समय गुजारा है। हम एक दूसरे के सुख-दुख में
सहभागी पारिवारिक सदस्य हैं। कभी मैंने संजीव भाई के घर भाभी जी के हाथों बनी प्याज डली
सुस्वादु रोटियों के साथ बेतकल्लुफ भोजन किया है तो जब कभी वे हमारे घर के पास से निकले
तो खुद-ब-खुद उनकी गाड़ी मेरे घर की ओर निसंकोच मुड़ गई है।
अभी ढ़ेर सारे सामाजिक साहित्यिक अनुष्ठान हैं जो हमारे बीच चर्चा में हैं उन्हें मूर्त रूप देना बाकी
है। इतने अपनेपन को सीमित शब्दो में ढ़ालकर प्रस्तुत करना दुष्कर कार्य है। संजीव भाई का
विस्तृत परिचय इंटनेट के एक क्लिक पर ढ़ेरो वेबसाइट्स में सुलभ है। उन पर केंद्रित ट्रू मीडिया का
यह विशेषांक साहित्य जगत की धरोहर और नवोदितों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा, यह विश्वास है।
*
[लेखक परिचय : ख्यात व्यंग्यकार, नाटककार, कवि, ५ पुस्तकें प्रकाशित, अतिरिक्त मुख्य अभियंता
सिविल म. प्र. पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी, जबलपुर ४८२००८ चलभाष ७०००३७५७९८]

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जग-जीवन के नूर ‘सलिल’
प्रतुल श्रीवास्तव
*
अपना अधिकतम समय अपने अध्ययन कक्ष में पुस्तकों और
कागज-कलम के साथ बिताने वाले श्याम वर्ण के प्रभावशाली
व्यक्तित्व के धनी, धीर-गंभीर इस साहित्य-साधक को हम सभी संजीव
‘सलिल’ के नाम से जानते हैं । उनके मन-मस्तिष्क में उमड़ता-घुमड़ता
विचारों का ज्वार और देश-विदेश में रहने वाले ऐसे साहित्य प्रेमी जो
उनसे निरन्तर मार्गदर्शन चाहते हैं उन्हें अपना अध्ययन कक्ष छोड़ने
का अवसर ही नहीं देते। आत्म प्रचार, आत्म प्रशंसा, धन और शासकीय
-अशासकीय पदों और सम्मानों की जोड़-तोड़ भरी राजनीति के इस
दौर में संजीव ‘सलिल’ शायद देश के ऐसे बिरले साहित्य साधकों में से
हैं जो इससे दूर सिर्फ साहित्य सृजन और नवोदित साहित्य-प्रतिभाओं
का मार्गदर्शन कर उनका आत्म विश्वास बढ़ाने, उन्हें निखारने-चमकाने
और समाज को कवि-साहित्यकारों की नई पीढ़ी समर्पित करने में लगे
हैं।
‘संजीव’ का अर्थ होता है- मृतक को पुनः जीवन देने वाला, ऊर्जा
से ओत-प्रोत करने वाला। वे अपने नाम के अनुरूप थके-हारे, निराश
पुराने रचनाकारों और सिद्धि के मार्ग को खोज रहे नवोदित साहित्य-
साधकों को अपने ज्ञान, अनुभव और ओजस्वी वाणी से संजीवनी प्रदान
कर उनके लक्ष्य की ओर उनका मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। ‘सलिल’ के
रूप में संजीव जी के सत्संगियों को उनसे जल जैसी तरलता, निर्मलता,
शीतलता, प्रवाह और स्फूर्ति प्राप्त होती है। जबलपुर के लगभग सभी
साहित्यकारों से नगर में जब-तब होते रहने वाले साहित्यिक-
सांस्कृतिक कार्यक्रमों-समारोहों में मेरी मुलाकात होती रहती है, किन्तु
सलिल जी मनोरंजन और राग-द्वेष से परे अपने घर, अपने अध्ययन
कक्ष में ही व्यस्त मिलते हैं।
उन्होंने तकनीकी शिक्षा प्राप्त की। डी.सी.ई, बी.ई., एम.आई.ई.
तक अध्ययन किया। कार्यपालन यंत्री के रूप में सेवानिवृत्त हुए, किन्तु
साहित्य में रुचि और ज्ञान पिपासा के कारण उन्होंने विशारद,
अर्थशास्त्र एवं दर्शनशास्त्र में एम.ए., एल.एल.बी. और पत्रकारिता का
अध्ययन भी किया। वे अभियान संस्था के सभापति, विश्ववाणी हिन्दी
संस्थान के संयोजक तो हैं ही उन्होंने कायस्थ समाज के विभिन्न पदों
पर रहते हुए भी बहुत कार्य किया। विशिष्ट अवसरों पर लोगों ने उन्हें
काला कोट धारण कर वकील के रूप में म.प्र. उच्च न्यायालय में
भी देखा है ।
अनेक पुस्तकों के रचियता संजीव जी व्याकरण के जानकार हैं,
उनकी भाषा सहज-सरल, प्रभावी और त्रुटिहीन है। उन्होंने दोहों पर
चमत्कृत कर देने वाला कार्य किया है। पहले हिन्दीं में २० प्रकार के
सवैये (वार्णिक) थे। सलिल जी ने २५० प्रकार के नए सवैयों की रचना
कर इनकी संख्या २७० कर दी । इसी तरह उनके द्वारा ३०० प्रकार के
नए मात्रिक छंदों की रचना भी हिन्दी साहित्य जगत को उनकी
अनुपम भेंट है। कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, काल है
संक्रांति का, कुरूक्षेत्र गाथा और सड़क पर उनके श्रेष्ठ काव्य संग्रह हैं ।
भूकम्प के साथ जीना सीखें (तकनीकी) पुस्तक व्यवहारिक ज्ञान से
भरी है। ‘दिव्य नर्मदा’ मासिक पत्रिका को उनके संपादन कौशल ने
नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं हैं।
श्री सलिल का कहना है कि गद्य हो अथवा पद्य, हिन्दी लेखन
में नई पीढ़ी पर्याप्त रूचि ले रही है । नई पीढ़ी विचारवान तो है,
किन्तु शब्द भंडार और संरचना तकनीक के अभाव से उनकी रचनाओं
में अपेक्षित प्रभाव पैदा नहीं हो पाता। संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी ने देश
भर के हिन्दी के जानकार और प्रतिष्ठित वरिष्ठ साहित्यकारों से
अपील की है कि वे सिर्फ अपने सृजन संसार में ही न डूबे रहें वरन्
अपना कुछ समय नवोदित साहित्य साधकों के मार्गदर्शन को भी दें
ताकि स्तरीय हिन्दी साहित्य में श्रीवृद्धि जारी रहे। सलिल जी के
मन में साहित्यिक -सांस्कृतिक जगत के विकास के लिए अनेक
योजनाएँ हैं। मुझे विश्वास है कि ये योजनाएँ आने वाले समय में
स्वरूप ग्रहण करेंगी। सलिल जी तो आत्म साक्षात्कार करते रहते हैं,
हमें भी स्वयं को पहचानना चाहिये। वे कहते हैं –
आँखे रहते / सूर हो गए
जब हम खुद से दूर हो गए
खुद से खुद की/भेंट हुई तो
जग - जीवन के नूर हो गए
*
[लेखक परिचय : प्रखर पत्रकार, व्यंग्यकार, कवि, सामाजिक कार्यकर्ता, ६ व्यंग्य संग्रह प्रकाशित, संपर्क : ४०३ टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर ४८२००२ चलभाष : ९४२५१ ५३६२९]
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भाषिक एकता के लिए समर्पित सलिल जी
डॉ. बाबू जोसफ
*
आचार्य संजीव वर्मा सलिल जी के साथ मेरा संबंध वर्षों पुराना है। उनके साथ मेरी पहली मुलाकात सन् २००३ में कर्णाटक के बेलगाम में हुई थी। सलिल जी द्वारा संपादित पत्रिका नर्मदा के तत्वावधान में आयोजित दिव्य अलंकरण समारोह में मुझे हिंदी भूषण पुरस्कार प्राप्त हुआ था। उस सम्मान समारोह में उन्होंने मुझे कुछ किताबें उपहार के रूप में दी थीं, जिनमें एक किताब मध्य प्रदेश के दमोह के अंग्रेजी प्रोफसर अनिल जैन के अंग्रेजी ग़ज़ल संकलन 'ऑफ़ एन्ड ऑन' भी थी। उस पुस्तक में संकलित अंग्रेजी ग़ज़लों से हम इतने प्रभावित हुए कि हमने उन ग़ज़लों का हिंदी में अनुवाद करने की इच्छा प्रकट की। सलिल जी के प्रयास से हमें इसके लिए प्रोफसर अनिल जैन की अनुमति मिली और 'ऑफ़ एन्ड ऑन' का हिंदी अनुवाद 'यदा-कदा' शीर्षक पर जबलपुर से प्रकाशित भी हुआ। 
सलिल जी हमेशा उत्तर भारत के हिंदी प्रांत को हिंदीतर भाषी क्षेत्रों से जोड़ने का प्रयास करते रहे हैं। उनके इस श्रम के कारण सीमा सुरक्षा बल के उप महानिरीक्षक मनोहर बाथम की हिंदी कविताओं का संकलन 'सरहद से' हमारे हाथ में आ गया। हिंदी साहित्य में फौजी संवेदना की सुंदर अभिव्यक्ति के कारण इस संकलन की कविताएं बेजोड़ हैं। हमने इस काव्य संग्रह का मलयालम में अनुवाद किया, जिसका शीर्षक है 'अतिर्ति'। इस पुस्तक के लिए बढ़िया भूमिका लिखकर सलिल जी ने हमारा उत्साह बढ़ाया। यह विशेष रूप से उल्लेखनीय बात है कि सलिल जी के कारण हिंदी के अनेक विद्वान, कवि,लेखक आदि हमारे मित्र बन गए हैं। 
हिंदी साहित्य में कवि, आलोचक एवं संपादक के रूप में विख्यात सलिल जी की बहुमुखी प्रतिभा से हिन्दी भाषा का गौरव बढ़ा है। उन्होंने हिंदी को बहुत कुछ दिया है। इसलिए हिंदी साहित्य में उनका नाम हमेशा अमर रहेगा। हमने सलिल जी को बहुत दूर से देखा है, मगर वे हमारे बहुत करीब हैं। हमने उन्हें किताबें और तस्वीरों में देखा है, मगर वे हमें अपने मन की दूरबीन से देखते हैं। उनकी लेखनी के अद्भुत चमत्कार से हमारे दिल का अंधकार दूर हो गया है। सलिल जी को केरल से ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ।
[ लेखक परिचय : दक्षिण भारत के समर्पित हिंदी सेवी, कई पुस्तकें प्रकाशित, कई शोध कार्य कराये, विभागाध्यक्ष हिंदी, के. ई. कॉलेज मान्नानम, वडक्कन हाऊस, कुरविलंगाडु पोस्ट, कोट्टायम जिला, केरल-६८६६३३ चलभाष ०९४४७८६८४७४ ]
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आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ - मानवीय संवेदनाओं के कवि
बसंत कुमार शर्मा, IRTS
*
आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी का नाम अंतर्जाल पर हिंदी साहित्य जगत में विशेष रूप से सनातन एवं नवीन छंदों पर किये गए उनके कार्य को लेकर अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। गूगल पर उनका नाम लिखते ही सैकड़ों के संख्या में अनेकानेक पेज खुल जाते हैं जिनमें छंद पिंगलशास्त्र के बारे में अद्भुत ज्ञान वर्धक आलेख तथ्यों के साथ उपलब्ध हैं और हम सभी का मार्गदर्शन कर रहे हैं।  फेसबुक एवं अन्य सोशल मिडिया के माध्यम से नवसिखियों को छंद सिखाने का कार्य वे निरनतर कर रहे हैं। पेशे से इंजीनियर होने के बाव्जूद उनका हिंदी भाषा, व्याकरण का ज्ञान अद्भुत है। उन्होंने वकालत की डिग्री भी हासिल की है जो दर्शाता है कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती। वे विगत लगभग ५० वर्षों से हिंदी की सेवा माँ के समान निष्काम भाव से कर रहे हैं।  उनका यह समर्पण वंदनीय तथा हम जैसे नवोदितों के लिए अनुकरणीय है। गीतों में छंदबद्धता और गेयता के वे पक्षधर हैं।
आचार्य जी से मेरी प्रथम मुलाकात आदरणीय अरुण अर्णव खरे जी के साथ उनके निज आवास पर अक्टूबर २०१६ में हुई। उसे कार्यालय या एक पुस्तकालय कहूँ तो उचित होगा। उनके पास दो फ्लैट हैं, एक में उनका परिवार रहता है दूसरा साहित्यिक गतिविधियों को समर्पित है।  लगभग दो घंटे हिंदी साहित्य के विकास में हम मिलकर क्या कर सकते हैं, इस पर चर्चा हुई। उनके सहज-सरल व्यक्तित्व और हिंदी भाषा के लिए पूर्ण समर्पण के भाव ने मुझे बहुत प्रभावित किया। यह निर्णय लिया गया कि विश्ववाणी हिंदी संस्थान के अंतर्गत अभियान के माध्यम से जबलपुर में हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे लघुकथा, कहानी, दोहा छंद आदि विधाओं पर सीखने सिखाने हेतु कार्यशालाएँ/गोष्ठी आयोजित की जाएँ, तब से लेकर आज तक २५ गोष्ठियों का आयोजन किया चुका है और यह क्रम अनवरत जारी है। व्हाट्सएप समूह के माध्यम से भी यह कार्य प्रगति कर रहा है। इसी अवधि में शान्तिराज पुस्तक प्रकाशन योजना के अंतर्गत दोहा शतक मंजूषा शीर्षक से तीन दोहा संकलन दोहा-दोहा नर्मदा, दोहा सलिला निर्मला तथा दोहा दीप्त दिनेश उन्होंने सम्पादित किये हैं, सम्पादन उत्कृष्ट एवं शिक्षाप्रद है। 
वे एक कुशल वक्ता हैं, आशुकवि हैं। समयानुशासन का पालन उनकी आदत में शुमार है, चाहे वह किसी आयोजन में उपस्थिति का हो या फिर वक्तव्य, काव्यपाठ की अवधि का, निर्धारित अवधि में अपनी पूरी बात कह देने की कला में वे निपुण हैं। अनुशासन हीनता उन्हें बहुत विचलित करती है, कभी-कभी वे इसे सबके सामने प्रकट भी कर देते हैं। 
उन्होंने कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, काल है संक्रांति का, सड़क पर, कुरुक्षेत्र गाथा आदि कृतियों के माध्यम से साहित्य में सबका हित समाहित करने का अनुपम कार्य किया है। यदि सामाजिक विसंगतियों पर करारा प्रहार करना आचार्य सलिल के काव्य की विशेषता है तो समाज में मंगल, प्रकृति की सुंदरता का वर्णन भी समान रूप से उनके काव्य का अंश है।  माँ नर्मदा पर उनके उनके छंद हैं, दिव्य नर्मदा के नाम से वे ब्लॉग निरंतर लिख रहे हैं। 
उनके साथ मुझे कई साहित्यिक यात्राएँ करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, अपने पैसे एवं समय खर्च कर साहित्यिक गतिविधियों में भाग लेने का उनका उत्साह सराहनीय है, अनुकरणीय है। ट्रू मीडिया ने उनके कृतित्व पर एक विशेषांक निकालने का निर्णय लिया है, स्वागत योग्य है, इससे संस्कारधानी जबलपुर गौरवान्वित हुई है। मैं उनके उज्जवल भविष्य और उत्तम स्वास्थ्य की कामना करता हूँ। माँ शारदा की अनुकम्पा सदैव उन पर बनी रहे।
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[ लेखक परिचय: नवोदित नवगीतकार, गज़लकार, नवगीत संग्रह यंत्रस्थ, वरिष्ठ मंडल वाणिज्य प्रबंधक, जबलपुर मंडल, पश्चिम मध्य रेल, निवास - 354, रेल्वे डुप्लेक्स, फेथ वैली स्कूल के सामने
पचपेढ़ी, साउथ सिविल लाइन्स, जबलपुर ४८२००१ म.प्र. चलभाष ९४७९३५६७०२, basant5366@gmail.com]
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साहित्य सेवा के लिए समर्पित संजीव वर्मा 'सलिल' 
डॉ. कुँवर वीरसिंह 'मार्तण्ड'
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उत्तर प्रदेश में एशिया का सबसे बड़ा गाँव गहमर, हर घर से फौजी देनेवाला गाँव, कई बार दूरदर्शन पर देखा-सुना, उपन्यासकार गोपाल राम गहमरी का गाँव। अब, अखंड गहमरी (अखंड प्रताप सिंह) के साहित्यिक कार्यक्रम द्वारा अपनी नयी पहचान बनाता हुआ गहमर। सभागार में फोल्डिंग चारपाइयाँ लगी हुई हैं,दूर-दूर से साहित्यकार एक-एक कर आते जा रहे हैं।दो व्यक्ति आये। अपने बगल में पड़े खाली पलंगों पर बैठने का इशारा करता हूँ। दुआ-सलाम के बाद, सामान्य सा परिचय, सामान रखकर 'बहुत गर्मी है' कहकर अपने कपड़े खोलकर पंखे की हवा लेने का प्रयास करते हैं दोनों। बातों का सिलसिला शनैः शनैः आगे बढ़ता है। परिचय की परतें खुलने लगती हैं। पता लगता है, जबलपुर से हैं, संस्मरण लेखिका एवं छायावादी कवयित्री महादेवी वर्मा के भतीजे। जबलपुर के कवि आचार्य भगवत दुबे एवं गार्गीशरण मिश्र से परिचय होने की बात कहता हूँ, बात और आगे बढ़ती है। धीरे-धीरे नाम पता चलता है आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'। एक बार कोलकाता के श्यामलाल उपाध्याय के मुँह से सुना था उनका नाम। उनके दो काव्य संकलनों की भूमिका लेखक यही थे, बहुत ही विद्वतापूर्ण भूमिका लिखी थी दोनों संकलनों की जो व्यापक चर्चा का विषय बनी थीं। 
आधुनिक कविता को लेकर काफी चर्चा होती रही। प्रश्न था आजकल के कवियों की कविताओं में छंद-भंग का दोष, छंद के व्याकरण की जानकारी का अभाव, कविताओं में रसानुभूति की कमी,मंच पर बढ़ती हुई लफ़्फ़ाजी आदि आदि। उनका विचार था कि कविता पर चर्चा के लिए कार्यशाला होना अति आवश्यक है। एक समय था जब गोष्ठियों में समस्या पूर्तियाँ दी जाती थीं, सुनी जाती थीं, कविताओं की आलोचना की जाती थी, वरिष्ठ कवि कनिष्ठों को समझाते थे और कनिष्ठ बड़े अदब के साथ उनके सुझावों को सुनते, गुनते व मानते थे। अब तो “आपै गुरु आपै चेला” वाली स्थिति आ गई है। कोई किसी की सुनता ही नहीं। दो चार लाइनें लिखकर महाकवि होने का भ्रम पाल लेते हैं। बहुत सारी बातें हुईं, कार्यक्रम समाप्त हुआ। जो जहाँ से आये थे, वापस चले गये। 
अखिल भारतीय साहित्य परिषद का जबलपुर अधिवेशन, साढ़े छह सौ लोगों का जमावड़ा, मैं भी पहुँचा, प्रवेश द्वार पर एक सज्जन दिखे वही गहमर में मिले सज्जन सलिल जी, पुरानी यादें ताजा हो गईं। दुआ-सलाम के बाद चले गये। हम लोग भी कार्यक्रम के विभिन्न सत्रों में व्यस्त हो गये। 
दूसरे दिन उनसे सूचना मिली विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान के तत्वावधान में बसंत कुमार शर्मा जी के निवास पर एक गोष्ठी है, आप को आना है। रामेश्वर शर्मा उर्फ रामू भैया (कोटा), डॉ. रामसनेही लाल शर्मा यायावर जी (फीरोजाबाद), श्रीमती क्रान्ति कनाटे (वड़ोदरा), मैं (कोलकाता) और भी कई लोग विशेष रूप से आमंत्रित थे। गाड़ी आई और हम लोग समय से थोड़े बाद में पहुँचे। कार्यक्रम आरंभ हुआ, सबका परिचय दिया गया। कविता पाठ हुए। कविता पर फिर कुछ चर्चा हुई। “साहित्य त्रिवेणी” के एक अंक का विमोचन भी हुआ। 
मेरे मस्तिष्क में गहमर में छन्दों पर हुई चर्चा उमड़-घुमड़ रही थी। मैंने सलिल के सामने प्रस्ताव रखा कि “भारतीय छंद विधा” को लेकर “साहित्य त्रिवेणी” का एक विशेषांक निकाला जाए और आप उसके अतिथि संपादन का भार संभालें। उससे पहले यायावर जी के अतिथि संपादन में “साहित्य त्रिवेणी” का “नवगीत विशेषांक” भी आ चुका था। जिसमें सलिल जी का भी नवगीत छपा था। वे पत्रिका के स्तर को देख चुके थे। अतः, तुरंत तैयार हो गये। 
विशेषांक की तैयारी शुरू हो गई। विषय निर्धारित कर समर्थ लेखकों से संपर्क कर लेख आमंत्रित किये जाने लगे। उन्होंने अथक परिश्रम किया। मैं, शनैः शनैः उनके ज्ञान के अपार भंडार से परिचित होता चला गया। बार-बार याद दिलाकर, कुछ को संग्रह भेज कर, सन्दर्भ दे-देकर लेख लिखवाये गए। वैदिक छंद, उद्भव, छंद और संगीत, बुंदेली, छत्तीसगढी, मेरठी, हिमाचली, हरयाणवी, मगही, बृज आदि लोकभाषाओं के लोकगीतों में छंद, छंद का चिकित्सा शास्त्र में उपयोग, छंद और बह्र का अंतर्संबंध, बाल साहित्य में छंद, रेल अभियांत्रिकी में छंद, शास्त्रीय नृत्य और छंद, लोकनाट्य और छंद, नवगीत का छंद विधान जैसे अकल्पनीय विषयों पर लेख लिखवाना और उनसे जिनका साहित्य में कोई रुचि नहीं थी,  फसल उगाने की तरह कठिन सिद्ध हुआ। सलिल जी ने विषयों के अनुरूप लेखक चुनें, उन्हें लगातार परामर्श देकर लेख लिखा ही लिए।   

मुझे पता लगा वे वाट्सएप पर ‘अभियान जबलपुर’, ‘हिन्दी व्याकरण और साहित्य’, ‘सवैया सलिला’ और फेसबुक पर ‘विश्व वाणी हिन्दी संस्थान’ का संचालन-परिचालन करते हैं। इसके अलावा अंतर्जाल पर ‘हिन्द युग्म’ पर ‘छंद-शिक्षण’, ‘साहित्य शिल्पी’ पर ‘काव्य का रचना शास्त्र’ सिखाते आ रहे हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने छंद और अलंकारों पर अनेक लेख भी लिखे हैं। तात्पर्य यह है वे पूर्णरूपेण साहित्य को समर्पित हैं। उनकी एक-एक सांस साहित्य सेवा के लिए समर्पित है। उनका अपना रचना संसार तो है ही, संपादन आदि के लिए भी समय निकालते हैं। उनका एक-एक पल साहित्यमय बन गया है। इसमें कोई शक नहीं। 
मैं उनके दीर्घ जीवन, अच्छे स्वास्थ्य, यशस्वी व कीर्तिमय जीवन की कामना करते हुए ‘ट्रू मिडिया’ एवं उसके संपादक मण्डल को भी धन्यवाद देता हूँ कि उन्होंने अपने विशेषांक हेतु उचित व्यक्ति को चुना है। उनका जीवन हम सबके लिए प्रेरणा का स्रोत है।  
[लेखक परिचय: संपादक साहित्य-त्रिवेणी, बहुभाषिक त्रैमासिक साहित्य-पत्रिका, डी १, ९४/ए, पश्चिम पुटखाली, मंडलपाड़ा, पो. दौलतपुर वाया विवेकानंद पल्ली, महेशतला, कोलकाता ७००१३९, चलभाष ९८३१०६२३६२,  email: sahityatriveni@gmail।.com]

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दुर्लभ सरलता-सहजता के धनी आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
डॉ विनीता राहुरिकर
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भोपाल के विश्व संवाद केंद्र में जब भारतीय साहित्य परिषद की मासिक गोष्ठी चल रही थी तब अचानक ही एक धीर-गम्भीर प्रभावशाली व्यक्ति ने हॉल में प्रवेश किया। कौतूहल से मैं देखने लगी। फिर उनका परिचय प्राप्त हुआ कि वे "आचार्य संजीव वर्मा सलिल जी" हैं।
हम सब उन्हें अपने बीच पाकर हर्षित और गौरवान्वित हुए। विश्वास नहीं हो रहा था कि वे सच में हमारे बीच हैं।
गोष्ठी के विषय पर आचार्य जी ने सारगर्भित वक्तव्य दिया था। उनके परिचय में हमें बताया गया था कि वे छायावाद की सशक्त कवयित्री महादेवी जी से संबंधित हैं। हमारी अभिलाषा उनसे महीयसी के संदर्भ में कुछ सुनने-जानने की थी किन्तु आचार्य जी से कहे कौन? सब संकोच में बैठे थे, हमारी कानाफूसी की ध्वनि आचार्य जी के कानों में पड़ गयी और उन्होंने तत्काल हमें संबोधित करते हुए महीयसी से सुने हुए अनेक संस्मरण सुनाये। उन संस्मरणों से हमें राष्ट्रपति राजेंद्र बाबू की सिद्धांत प्रियता, मैथिलीशरण जी की उदारता, निराला जी वीतरागिता, दिनकर जी की आकांक्षा, नेहरु जी निराला जी के विचार वैभिन्न्य, निराला जी राजेंद्र प्रसाद जी की भेंट, निराला जी पंत जी के अंतर्संबंध आदि के अछूते पहलू ज्ञात हुए। हम समझ सके की श्रेष्ठ साहित्यकार में श्रेष्ठ मनुष्य के गुण होते हैं। यह भी की साहित्य के पथ पर चलते हुए हमें अपने व्यक्तित्व में किन तत्वों का विकास करना चाहिए। आचार्य की सरलता, सहजता, वक्तृत्व क्षमता, भाषा शैली, शब्द सामर्थ्य के हम कायल हो गए थे।

गोष्ठी के बाद आचार्य जी से सबका अनौपचारिक वार्तालाप प्रारम्भ हुआ। कुछ सदस्य अपनी पुस्तकें भी लाये थे। उन्होंने अपनी पुस्तक भेंट की। उस दिन भाग्य से मेरे पास भी मेरे कहानी संग्रह की एक प्रति थी। बहुत मन हो रहा था कि मैं भी अपनी पुस्तक आचार्य जी को भेंट करूँ किन्तु संकोच हो रहा था कि इतने वरिष्ठ साहित्यकार भला क्या पढ़ेंगे मेरी पुस्तक और स्वीकार भी क्या करेंगे क्योंकि पूर्व में कुछ साहित्यकारों के साथ यह अनुभव भी हुआ था कि उन्होंने पुस्तक लेने में ही आनाकानी की थी। तो बहुत मन होने के बाद भी संकोच में घिरी रही। तब एक साथी लेखिका से कहा तो उन्होंने सलिल जी को बताया। आचार्य जी ने बड़ी आत्मीयता से तुरंत मुझे बुलाया। बड़े स्नेह से मेरा संग्रह लेकर उस पर बात भी की। मेरे बारे में भी पूछा। लेखन पर भी बात की। कुछ ही क्षणों बाद तो लगा ही नहीं कि उनसे पहली बार मिल रही हूँ। लगा वर्षों का आत्मीय परिचय हो मानों उनसे। इतने वरिष्ठ लेकिन उतने ही सरल, सहज। मैं तो नतमस्तक हो गई उनकी सहृदयता के आगे।
फिर भी लगता रहा कि जबलपुर जाकर व्यस्त हो जाएँगे तो कहाँ याद रहेगा मेरा संग्रह उनको। लेकिन अभिभूत रह गई जब उनकी गहन, विस्तृत समीक्षा प्राप्त हुई। जिसे आचार्य जी ने न केवल फेसबुक के सभी साहित्यिक समूहों में लगाया वरन अपने ब्लॉग पर भी पोस्ट किया। व्यस्त दिनचर्या में से समय निकालकर किसी नवोदित की पुस्तक पढ़ना अपने आपमें नवोदित के लिए सौभाग्य की बात है और उस पर इतनी विस्तृत, आत्मीय समीक्षा पाना, वो पल एक गौरवमयी अविस्मरणीय पल के रूप में मेरे साहित्यिक जीवन पर अंकित हो गया।
इसके बाद भी आचार्य जी ने बहुत बार साहित्य की हर विधा में मुझे अपना स्नेहपूर्ण मार्गदर्शन दिया है। उनके जैसी सरलता और सहजता अन्यत्र दुर्लभ है। उनका स्नेहाशीष सदैव बना रहे।
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[लेखिका परिचय : कहानीकार, उपन्यासकार, कवयित्री, १२ भाषाओँ में कहानियां अनुवादित, संपर्क : श्री गोल्डन सिटी २८ फेस २ होशंगाबाद  राजमार्ग, भोपाल ४६२०४३ चलभाष  : ९८२६०४४७४१, vinitarahurikar@gmail.com ] 
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छंदों का सम्पूर्ण विद्यालय : आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
मंजूषा मन
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आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' से मेरा परिचय पिछले चार वर्षों से है। लगभग चार वर्ष पहले की बात है, मैं एक छंद के विषय मे जानकारी चाहती थी पर यह जानकारी कहाँ से मिल सकती है यह मुझे पता नहीं था, सो जो हम आमतौर पर करते हैं मैंने भी वही किया... मैंने गूगल की मदद ली और गूगल पर छंद का नाम लिखा तो सबसे पहले मुझे "दिव्य नर्मदा" वेब पत्रिका से छंद की जानकारी प्राप्त हुई। मैंने दिव्य नर्मदा पर बहुत सारी रचनाएँ पढ़ीं।
चूँकि मैं भी जबलपुर की हूँ और जबलपुर मेरा नियमित आनाजाना होता है तो मेरे मन में आचार्य जी से मिलने की तीव्र इच्छा जागृत हुई। दिव्य नर्मदा पर मुझे आदरणीय संजीव वर्मा 'सलिल' जी का पता और फोन नम्बर भी मिला। मैं स्वयं को रोक नहीं पाई और मैंने आचार्य सलिल जी को व्हाट्सएप पर सन्देश लिखा कि मैं भी जबलपुर से हूँ और जबलपुर आने पर आपसे भेंट करना चाहती हूँ। उन्होंने कहा कि मैं जब भी आऊँ तो उनके निवास स्थान पर उनसे मिल सकती हूँ।
उसके बाद जब में जबलपुर गई तो मैं सलिल जी से मिलने उनके के घर गई। आप बहुत ही सरल हृदय हैं बहुत ही सहजता से मिले और हमने बहुत देर तक साहित्यिक चर्चा की। हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए आप बहुत चिंतित एवं प्रयासरत लगे। चर्चा के दौरान हमने हिन्दी छंद, गीत-नवगीत, माहिया एवं हाइकु आदि पर विस्तार से बात की। लेखन की लगभग सभी विधाओं पर आपका ज्ञान अद्भुत है।
ततपश्चात मैं जब भी जबलपुर जाती हूँ तो आचार्य सलिल जी से अवश्य मिलती हूँ। उनके अथाह साहित्य ज्ञान के सागर से हर बार कुछ मोती चुनने का प्रयास करती हूँ। ऐसी ही एक मुलाकात के दौरान उन्होंने सनातन छंदों पर अपने शोध पर विस्तार से बताया। सनातन छंदों पर किया गया यह शोध नवोदित रचनाकारों के लिए गीता साबित होगा।
आचार्य सलिल जी के विषय में चर्चा हो और उनके द्वारा संपादित "दोहा शतक मंजूषा" की चर्चा हो यह सम्भव नहीं। विश्व वाणी साहित्य संस्थान नामक संस्था के माध्यम से आप साहित्य सेवारत हैं। इसी प्रकाशन से प्रकाशित ये दोहा संग्रह पठनीय होने के साथ साथ संकलित करके रखने के योग्य हैं इनमें केवल दोहे संकलित नहीं हैं बल्कि दोहों के विषय में विस्तार से समझाया गया है जिससे पाठक दोहों के शिल्प को समझ सके और दोहे रचने में सक्षम हो सके।
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' जी के लिए कुछ कहते हुए शब्द कम पड़ जाते हैं किंतु साहित्य के लिए आपके योगदान की गाथा पूर्ण नहीं होती। आपकी साहित्य सेवा सराहनीय है। मैं अपने हृदयतल से आपको प्रणाम करते हुए शुभकामनाएँ देती हूँ कि आप आपकी साहित्य सेवा की चर्चा दूर दूर तक पहुँचे। आप सफलता के नए नए कीर्तिमान स्थापित करें, विश्व वाणी संस्थान के माध्यम से हिंदी का प्रचार प्रसार करते रहें।

[लेखिका परिचय : निपुण दोहाकार, हाइकुकार, हाइकू संकलन प्रकाशित, कार्यकारी अधिकारी, अम्बुजा सीमेंट फाउंडेशन, ग्राम - रवान, जिला बलौदा बाजार ४९३३३१ छत्तीसगढ़ ]
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समर्पित हिंदी सेवी सलिल जी
सुनीता सिंह

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ सर जबलपुर (म.प्र.) एक अत्यन्त विद्वान तथा हिन्दी माँ की सेवा में पूर्ण रूप से रत हिन्दीसेवी हैं एवं हमारे देश की कालजयी कवयित्री महादेवी वर्मा के भतीजे हैं। वे न केवल विभिन्न प्रकार के नए छंद रच कर हिन्दी साहित्य को समृद्ध करने की दिशा में अग्रसर हैं बल्कि नव-लेखकों की फौज तैयार करने एवं उत्कृष्ट लेखन सिखाने की दिशा में भी निरन्तर रत हैं। उन्होंने इन्टरनेट पर प्रकाशित मेरी रचनाओं का स्वतः संज्ञान लिया। उनका यह कथन कि ‘मेरा लेखन परिपक्व है बस उसे थोड़ा तराशने की जरूरत है’ और यह कि ‘मुझ पर माँ सरस्वती की विशेष कृपा है’ ने मुझे बेहद अचम्भित व प्रोत्साहित किया क्योंकि यह कथन हिन्दी के वरिष्ठ साहित्यकार एवं प्रकाण्ड विद्वान की ओर से आया था। उन्होंने लेखन विधा के शिल्पगत तथ्यों से अवगत कराते हुए मेरा मार्गदर्शन किया, उसे निरंतर तराशते रहने हेतु प्रोत्साहित किया तथा अपनी रचनाओं को प्रकाशित करने में सहयोग व दिशा-निर्देशन भी प्रदान किया। जिसके लिए मैं सदा आभारी रहूँगी।
लेखिका परिचय : गीतकार, दोहाकार, गज़लकार, ८ पुस्तकें प्रकाशित, संप्रति सहायक मुख्य निर्वाचन अधिकारी उ. प्र., संपर्क sunitasingheci@gmail.com]
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अप्रतिम साहित्य शिल्पी संजीव वर्मा 'सलिल' जी
सुषमा शैली
कलम के देव के पुजारी, साहित्य शिल्पी श्री संजीव वर्मा 'सलिल'जी किसी परिचय के मोहताज नहीं है। वे ऐसे साहित्य शिल्पी हैं, जिनके तराशे शब्द हम सबको अपने आस-पास गुम्बदीय आभा लिए प्रकाशित होते मिलते हैं। २०/८/१९५२ मंडला प्रदेश में कायस्थ परिवार कवियत्री स्व० श्रीमती शान्ति देवी तथा लेखक श्री०राजबहादुर वर्मा सेवा निवृत्त जेल अधीक्षक के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में श्री संजीव वर्मा 'सलिल'जी का अवतरण हुआ। बहुमुखी प्रतिभा के धनी श्री०सलिल जी ने अभियंत्रण में त्रिवर्षीय डिप्लोमा, बी०ई०एम०आई०ई०, अर्थशास्त्र तथा दर्शनशास्त्र में एम.ए., एलएल. बी,, विशारद, पत्रकारिता में डिप्लोमा, कम्प्यूटर एप्लिकेशन में डिप्लोमा किया है। अपनी बुआ जी पूज्यनीया महादेवी वर्मा जी से एवं स्व० माता शान्ति देवी जी से साहित्य सेवा विरासत में इन्हें मिली है।
श्री सलिल जी पर अपनी बुआ जी का प्रभाव इतना पड़ा कि पारिवारिक मतभेदों के बाद भी उन्होंने अपनी विदुषी बुआ जी से संपर्क कर उनका आशीष और नैकट्य पाया... बिन्दु सिन्धु से जा मिला।
सलिल जी की प्रथम काव्य कृति कलम के देव भक्ति गीत संग्रह है। भूकंप के साथ जीना सीखें जनोपयोगी तकनीकी कृति है जिसमें भूकंपीय आपदा से त्रस्त आम लोगों को कच्छी झोपड़ियों से लेकर बहुमंजिला मकान बनाने व् क्षतिग्रस्त मकान की मरम्मत करने की सम्यक सरल सस्ती तकनीक वर्णित है। लोकतंत्र का मकबरा कविताएँ व मीत मेरे कविता संग्रह हैं जिनमें पारिस्थितिक वैषम्य पर प्रहार करते हुए परिवर्तन का आव्हान किया गया है। काल है संक्रांति तथा सड़क पर गीत-नवगीत संग्रह हैं जिनमें सलिल जी ने सामाजिक पाखंड  उद्घाटित करते आदमी के दुहरे चेरों पर कटाक्ष किया है। इन कृतियों में पूर्व प्रकाशित काव्य कृतियों से सर्वथा हटकर छांदस रचनाएँ हैं, कई नए छंदों का अन्वेषण कर प्रयोग भी किया गया है।
निम्न पंक्तियों में  कुशासन एवं कुपात्रों पर सीधा वार करते हैं 'सलिल'जी-
कागा आया है
जयकार करो,
जीवन के हर दिन
सौ बार मरो....
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राजहंस को
बगुले सिखा रहे
मानसरोवर तज
पोखर उतरो
सेवा पर
मेवा की वरीयता
नित उपदेशो
मत आचरण करो
तुलसी त्यागो
कैक्टस अपनाओ......
परिस्थितियों से समझौता कमज़ोर लोग कर ही लेते हैं।  जनमानस कुपात्र की जयकार करने को न चाहते हुए भी मजबूर होते हैं।  इन सभी हालातों में सजग प्रहरी  'सलिल'जी समय के कुचक्र पर प्रहार कर मानवीय मूल्यों के पतन को इंगित करते हैं- ' तुलसी त्यागो, कैक्टस अपनाओ।' अंतर्जाल के कवि के रूप में हम इन्हें समझ सकते हैं, कितनी सहज शैली में तीर जैसे शब्द बिना वार के वापस नहीं जाते।
लोकतंत्र का बरगद सूखा
उल्लू बैठे हरी डाल पर
माली नोंच रहे कलियों को
शूल फूल का हृदय वेधते
फटा हुआ दोशाला सीने
तलवारों से रहे छेदते.
जीवन्त पंक्तियाँ आज कल की घटनाओं पर आधारित कही जा सकती हैं, कालजयी रचना, कालजयी पंक्तियाँ।
अनेकों भाषाओं को जानने वाले साहित्यकार हैं श्री 'सलिल'जी भाषा उनके मार्ग को बाधित नहीं कर सकती है। देश की विभिन्न बोलियों से उन्हें प्रेम है तथा मन के टीस को कुछ इस तरह से भोजपुरी बोली में दोहे रूप में उजागर किया है जहाँ पर चौपाल रोता है, स्त्री को सौत का डाह है एवं अपनेपन का अल्हड़ फागुनी रंग, निम्नवत दोहे देखिए.....
पनघट के रंग अलग बा, आपनपन के ठौर।
निंबुआ अमुआ से मिले, फगुआ अमुआ बौर।।
खेत हुई रहा खेत क्यों, 'सलिल' सून खलिहान।
सुन सिसकी चौपाल के, पनघट के पहचान।।
परसउती के दरद के, मर्म न बूझे बाँझ।
दुपहरिया के जलन के, कइसे समझे साँझ।।
स्त्री मन को भी समझते हैं सलिल जी एवं पीर पराई को समझने पर विवश करते हैं। विसंगतियों का सटीक उदाहरण है "परसउती के दरद के, मर्म न बूझे बाँझ" पंक्ति के द्वारा। 'खेत हुई रहा खेत क्यों?..पंक्ति में रहीम एवं कबीर जी की अभिधा शक्ति है। इनके प्रभावशाली दोहे इन्हें अपनी अपनी मिट्टी से जोड़े रहते हैं, खेत खलिहान की पहचान देते हैं। 'सलिल'जी को जितना पढ़ो और भी अधिक पढ़ने का मन करता है, यह उनके कवी की सफलता है। सलिल जी के नवगीतों में कभी 'धूमिल'जी की खरी-खरी वाला पुट मिलता है तो कभी सर्वेश्वर जी की सहजता याद आने लगती है।
मानवीय मूल्यों के क्षरण का दुःख, नव समाज सृजन हेतु आह्वान, चरमराती व्यवस्थाजनित कसक, सुधारने के लिए कलम को तलवार बनाने की प्रेरणा और शंखनाद भी। इसी तरह से कलम चलती रहे आदरणीय 'सलिल'जी की कलम, पैंनी धार हो लेखनी की और युग परिवर्तन की रचनाएँ रचकर वे साहित्य को जनआकांक्षाओं का पर्याय बनाते रहें।
[लेखिका परिचय : नवोदित कवयित्री, संपर्क मकान २५६, गली ५, सुरेंद्र कॉलोनी पार्ट २,, झारोड़ा माजरा, बुरारी, दिल्ली ८४ चलभाष ९७११२३८२३८, s.singh3489@gmail.com  ]
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संस्मरण-
सरल ह्रदय के स्वामी सलिल जी
शशि पुरवार
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आ. सलिल जी को सर्वप्रथम बहुत बहुत बधाई। सलिल जी से मेरी मुलाकात व मित्रता सन २०११ में फेसबुक पर हुई थी। आज भी एक किस्सा जहन मे याद आता है। हम अभिव्यक्ति विश्वम के माध्यम से रचनाओं पर चर्चा करते थे।  एक बार अनुभूति के पटल पर उनके कुछ माहिया की पोस्ट लगी हुई थी।  मैने उस पोस्ट पर अपनी जानकारी के अनुरूप शिल्प को लेकर अपनी टिप्पणी कर दी, जिससे समूह के कुछ लोगों को यह चर्चा नागवार गुजरी। उन्होनें मुझे संदेश दिया कि तुम्हें ऐसा नही करना चाहिये था, इसका कारण यह था कि साहित्य में छंद के आचार्य कहे जाने वाले सलिल जी से हर कोई अपने विचार साझा करने या चर्चा करने में हिचकता था।  मैं अपने स्वभाव के अनुरूप सरल मन से चर्चा करने में विश्वास रखती थी। 
मुझे रचना के शिल्प में जिस नियम पर आपत्ति थी मैं अडिग रही, हालाँकि हमारी चर्चा प्राय: समूह से इतर ही होती थी। मैंने उन्हें अपने विचारों व लोगों की प्रतिक्रिया से अवगत कराते हुए संदेश दिया "यदि आपको अनुचित प्रतीत हुआ हो तो क्षमा चाहती हूँ, जो गलत लगा वही कहा।"
जबाब में सलिल जी का संदेश मिला- "आप सही हैं और आपके अतिरिक्त कोई भी चर्चा नहीं करता है। मैं चाहता हूँ कि लोग प्रतिक्रिया दें किंतु कोई नहीं आता है। 
उस वाकये के बाद सलिल जी से चर्चा व वार्ता दोनों सतत होने लगी, हम एक साथ एक ही समूह हेतु कार्यरत हैं, व बहुत अच्छे मित्र भी हैं।  आ. सलिल जी का साहित्य के लिये योगदान अतुलनीय है। सरल ह्रदय के स्वामी सलिल जी के पास साहित्य का अथाह सागर है। उन्होनें लोगों को छंद सिखाकर साहित्य जगत को अनेक अच्छे रचनाकार देकर अपना विशेष योगदान दिया हैँं। गीत-नवगीत कुछ लोगों को हमने मिलकर सिखाया किंतु लोगों के स्वार्थ, अति महत्वाकांक्षा, साधना व धैर्य की कमी ने आहत भी किया। 
सलिल जी ने उसके बाद अनगिनत गीत, नवगीत व छंद की किताबों की समिक्षा भी की। छंद-अलंकारों पर सुदीर्घ श्रृंखलाओं के माध्यम से सृजन-साधना करके, दोहों की बेहद उम्दा श्रृंखला तैयार करके अपने समय व श्रम की आहुति देकर सलिल जी ने महानतम कार्य को अंजाम दिया है। 
[लेखिका परिचय : नवगीतकार, दोहाकार, कहानीकार, व्यंग्यकार, व्यंग्य संग्रह प्रकाशित, सी ३० गुलमोहर, ७ क़्वींस गार्डन, समीप अल्प बचत भवन, सदन कमांड ऑफिस के सामने, पुणे ४११००१ महाराष्ट्र] 
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नवोदितों के संरक्षक आचार्य जी
प्रो. शोभित वर्मा
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" नयी प्रतिभाओ को खोजना उनका स्वभाव है।"
किसी भी क्षेत्र या विधा का निरंतर विकास तभी संभव है जब उसमे नये विचार यानी की नये लोगो का जुड़ाव समय-समय पर होता रहेl
साहित्य का क्षेत्र भी इस से अछूता नहीं है परन्तु नये साहित्यकारों की खोज वही कर सकता है जिसका हृदय विशाल हो एवं वह अपने ज्ञान को बाँटनेवाला भाव मन में रखता हो l
श्री संजीव वर्मा जी का व्यक्तित्व भी कुछ इस ही तरह का है, वह अपने व्यक्तिगत कार्यों से जहाँ भी जाते है, वहाँ साहित्य के क्षेत्र में रुचि रखनेवालो को अपने संपर्क में रखने का प्रयास अवश्य करते हैं ताकि उनकी प्रतिभाओ में और निखार आ सकेl युवाओं को साहित्य सृजन के लिए आकर्षित करने में श्री संजीव वर्मा जी की विशेष रूचि रही है l इस कार्य के लिए वह निरंतर विद्यालयों और महाविद्यालो के प्राध्यापकों और विद्यार्थियो के संपर्क में बने रहते है l साहित्यकारों के मध्य संजीव जी को आचार्यजी विशेषण से ही संबोधित किया जाता हैl
आचार्य जी भी सदा अपना साहित्यिक ज्ञान सदा बाँटने तत्पर रहते है l उनके निवास पर एक कक्ष सिर्फ साहित्यिक सेवा के लिए ही समर्पित है l जहाँ युवा साहित्यकार जाकर लेखन कार्य कर सकते है l कक्ष में आचार्य जी का निजी पुस्तकालय भी है जहाँ साहित्य की सभी कलाओं को दर्शाने वाली ५००० से अधिक पुस्तकों का अनूठा संग्रह हैl जो नये साहित्यकारों के लिए किसी खजाने से कम नहीं हैl समय-समय पर आचार्य जी पुस्तकें विद्यालयों में भी बिना किसी शुल्क के पहुँचाते रहते हैं l उनका मानना है कि पुस्तकें सजावट की वस्तुऐं नहीं हैंl
साहित्य की विभिन्न विद्याओं को जन-जन तक पहुँचाने के लिए आपके द्वारा समय-समय पर विद्यालयों और महाविद्यालयों में साहित्य कार्यशालाओं का आयोजन किया जाता रहा है ताकि युवाओं को साहित्य की हर विद्याओ का ज्ञान प्राप्त हो सकेl आचार्य जी निरंतर कहते रहते है ज्ञान जितना बाँटोगे उतना ही बढ़ेगा l
आप के द्वारा आयोजित किसी भी प्रकार के कवि सम्मेलन या साहित्यिक कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकारों के साथ, नवोदित साहित्यकार भी अवश्य देखने मिल जाते है l नवोदित साहित्यकार के भीतर ऐसे ही अवसरों पर अपनी कला के प्रदर्शन की भूख रहती है l
आचार्य जी को कई बार संस्कारधानी जबलपुर के बाहर भी साहित्यिक कार्यक्रमों में विशिष्ट अतिथि के रूप में बुलाया जाता है। ऐसे अवसरों पर भी आप का प्रयास रहता है की किसी युवा नवोदित साहित्यकार को भी अपने साथ लेते जाएँ ताकि उसे साहित्य जगत में स्थापित सज्जनों से मिलने का अवसर मिले तथा नयी-नयी साहित्यिक विधाओ की जानकारी वरिष्ठ साहित्यकारों से प्राप्त हो सके l
आज के समय में साहित्य जगत में स्थापित सभी वरिष्ठ साहित्यकार यदि आचार्य जी का ही अनुसरण करे तो वह समय दूर नहीं जब हिंदी भाषा की सेवा के लिए बिना किसी विशेष प्रयास के नित्य नये साहित्यकार उपलब्ध होते रहेंगेl
लेखक परिचय : दोहाकार, तकनीकी लेखन, विभागध्यक्ष इलेक्ट्रॉनिक्स, तक्षशिला इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंजीनियरिंग एन्ड टेक्नोलॉजी जबलपुर, संपर्क : टी ९ निकट मानस मंदिर, शक्तिनगर, गुप्तेश्वर, जबलपुर चलभाष ९९९३२०१११९, shobhitteachingmaterial@gmail.com]   
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साहित्य के वटवृक्ष सलिल जी 
गुरू सक्सेना
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काव्य शास्त्र के विश्वविद्यालय, रोम रोम में छंदों को बसाये ,अनेक नये छंदों का सृजन करते हुए कविता के गौरव को बढाने वाले आदरणीय सलिल जी को प्रणाम करता हूँ। उनके बारे में ठीक से लिखा जाये तो एक-एक विधा पर एक अध्याय बन सकता है । सलिल जी का स्नेह, आशीर्वाद, सानिध्य मुझे मिलता रहा है। वे साहित्य के ऐसे वटवृक्ष हैं जिसकी घनी छायादार शाखायें दूर दूर तक फैली हुई हैं। हम उन शाखाओं के तले बैठकर काव्य के जटिल प्रश्नों का सहजता से हल पाकर सुखद अनुभव करते हैं। उनके व्यक्तित्व पर जो विशेषांक प्रकाशित होने जा रहा है, उस हेतु सभी बधाई के पात्र हैं। सलिल जी को अपना विनम्र प्रणाम निवेदित है।
[लेखक परिचय : राष्ट्रव्यापी ख्याति के हास्य कवि, छंद शास्त्री, नरसिंहपुर मध्यप्रदेश
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काव्य-रस-भ्रमर आचार्य संजीव 'सलिल'
नवीन सी. चतुर्वेदी
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प्रणाम।
काव्य-रस-भ्रमर आचार्य आदरणीय संजीव वर्मा सलिल जी से अन्तर्जाल पर भेंट हुई। शनै:-शनै: ज्ञात हुआ कि आप बहुत पहले से किस तरह साहित्य की उपासना में लगे हुए हैं। आदरणीय सलिल जी के साथ समस्या पूर्ति आयोजनों के दौरान हुए अनुभव बड़े ही रुचिकर हैं। अन्तर्जालीय संकलक साहित्यम का ऐसा एक भी आयोजन नहीं है जिसे सलिल जी ने ओज प्रदान न किया हो। सीखने के इच्छुक लोगों के प्रति आप का लगाव और समर्पण श्लाघनीय है। स्वयं मैं भी आप से समय-समय पर लाभान्वित होता रहा हूँ। लिखने को इतना कुछ है कि बस लिखता जाऊँ, लिखता जाऊँ परन्तु मर्यादा का ध्यान रखना भी अनिवार्य है। मैं, परमपिता परमेश्वर से आप के स्वस्थ एवम् दीर्घायु होने की कामना करता हूँ।
जय श्री कृष्ण
सादर
[ लेखक परिचय : प्रथम बृज ग़ज़ल सबग्रह के रचयिता, हिंदी, बृज, अंग्रेजी, गुजरती, मराठी आदि में सृजन, छंदज्ञ, संपादक साहित्यम समूह, संपर्क :  मुम्बई चलभाष ९९६७०२४५९३  www.saahityam.org, www.facebook.com/navin chaturvedi,
www.navincchaturvedi.blogspot.com]
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बहुआयामी प्रतिभा के धनी संजीव वर्मा 'सलिल'
अनिल जी. खंडेलवाल
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२७ अक्टूबर २०१७  को *सलिल जी* से पहली मुलाकात जबलपुर में 'इंस्टीटयूशन आफ इंजीनियर्स' के सेमिनार में हुई थी। उसके बाद उनके *"अभियान जबलपुर"* पटल व व्यक्तिगत दूरभाष के माध्यम से संपर्क सतत व प्रगाढ़, प्रमुख रूप से दो कारणों से होता गया, पहला, किशोरावस्था में पनपी साहित्यिक अभिरूचि व दूसरा जबलपुर अभियांत्रिकी महाविद्यालय के छात्र रहने के कारण जबलपुर से विशेष लगाव।
सलिल जी नैसर्गिक रूप से सरल, सहज व समग्र तो हैं ही, साथ ही बहुआयामी प्रतिभा के धनी भी हैं। वे भिन्न भाषाओं व बोलियों में *साहित्य की विविध विधाओं के माध्यम से अपने सामाजिक सरोकारों को निष्ठापूर्वक निभाने के साथ-साथ साहित्य के प्रति भी पूर्णरूपेण समर्पित व्यक्ति भी हैं जिनकी ख्याति निःसंदेह नियत हैं ।
अक्सर होता यह है बड़े होने पर पाई विद्वता से सहमकर हमारे बाल सुलभ ठहाके दुबक जाते हैं या बाहरी (पढे-सुने) के शोर में हमारी खुद की आवाज दब जाती हैं, नियम-उपनियम के जंजाल मे मौलिक चिंतन उलझकर रह जाता है लेकिन लगता है कि सलिल जी ने अब तक इन सबसे खुद को बचाकर रखा है और आगे भी रखने मे सक्षम रहकर स्वनाम को सार्थक करेंगे।
*उनके सार्वकालिक मौलिक साहित्य सृजन हेतू हार्दिक शुभकामनाएँ !*
[लेखक परिचय : परामर्शदाता संरचना अभियंता, जिज्ञासु अध्येता, सजग चिंतक, ५३ अनूप नगर, निकट यूको बैंक, आगरा मुम्बई मार्ग, इंदौर ४५२००८, चल ९४२५४१०१४३, anil.khandelwal54@gmail.com]  
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अनुभवजन्य प्रेरणा स्त्रोत आचार्य इं. संजीव वर्मा 'सलिल' जी
डॉ. मुकुल तिवारी
मानव जीवन में अनुभव की अनौपचारिक पाठशाला अत्यन्त महत्वपूर्ण होती है। अनुभव का पाठ किसी निर्धारित पाठ्यक्रम के अन्तर्गत किसी निर्धारित पाठशाला में प्राप्त नहीं किया जा सकता है। यह तो मानव जीवन के सांसों की गिनती बढ़ने के साथ साथ प्राप्त होता है। उम्र एवं कार्य अभ्यास की परिपक्वता अनुभवजन्यता को बढ़ाती है। ऐसे ही अनुभवजन्य प्रेरणा स्रोत एक सशक्त मिसाल हैं हमारे अग्रज भाई श्रद्धेय आचार्य ई. संजीव वर्मा 'सलिल'। आप अध्ययन के क्षेत्र में अभियांत्रिकी, न्याय एवं कानून आदि अनेकों क्षेत्रों में प्रवीण हैं। विभिन्न भाषाओँ के साहित्य की जानकारी में भी आप महारथ हासिल किये हैं। हिन्दी साहित्य की विभिन्न विधाओं में भी आपकी गहरी पकड़ है। अनेंक वर्षों से आप हिन्दी साहित्य की विभिन्न विधाओं पर अपनी लेखनी चला रहे हैं। आपको सरस्वती जी का वरदान प्राप्त है। आपने कविता, कहानी, गीत ,गजल, छंद (दोहा, सोरठा, चौपाई, छप्पय, चौपाई, आलेख, निबंध, रिपोर्ताज, समीक्षा, साक्षात्कार आदि अनेकों विधाओं में विशेषज्ञता हासिल की है। आप अनुभवजन्य प्रेरक के रूप में सभी को सदैव उपलब्ध रहते हैं। विविध विषयों, विविध क्षेत्रों में आप लेखन कार्य करते रहते हैं। चित्रकारी, छायांकन, प्राचीन एवं नवीन उपकरण तकनीकी आदि विभिन्न कला-कौशल में आप प्रवीण हैं। अनेकों साहित्यक,सामाजिक सांस्कृतिक, वैज्ञानिक, शिक्षा, कला, क्रीड़ा आदि अनेंक क्षेत्रों में आपको सम्मान, पुरुस्कार प्राप्त हुए है। अनेकों संस्थाओं द्वारा आपको अभिनन्दित किया गया है। आप जैसे अनुभवजन्य प्रेरणायुक्त प्रेरक की आज अत्यंत आवश्कता है।
[लेखिका परिचय : प्राचार्य महाविद्यालय, कई पुस्तकें प्रकाशित, बालमुकुन्द त्रिपाठी मार्ग, राम मंदिर के पास, दीक्षितपुरा,जबलपुर,म.प्र. चलभाष ९४२४८३७५८५।]
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मित्रवत गुरु आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
महातम मिश्र 'गौतम गोरखपुरी'
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आचार्य श्री संजीव वर्मा सलिल जी महान साहित्यिक कवियित्री महादेवी वर्मा जी के परिवार से हैं। महीयसी का श्री सलिल पर प्रगाढ़ स्नेह रहा जो साहित्यिक सृजन सामर्थ्य की विरासत में आपको आशीष के रूप में मिला है। माँ शारदा के कृपा-पात्र श्री सलिल जी एक कुशल साहित्यकार के साथ ही साथ एक परिपक्व इंसान भी है। मेरी रूबरू मुलाकात तो अभी तक न हो पाई पर दूरवार्ता  से मैं कई बार आप का आशीष प्राप्त कर चुका हूँ। मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं है कि आप मेरे मित्रवत गुरु हैं। एक संकलन में मेरे सौ दोहे आप के द्वारा सम्पादित-प्रकाशित हुए जिसके लिए मैं हृदय से आभारी हूँ।  मेरी कृतियों का प्रकाशन आप द्वारा ही हो इसकी कामना करता हूँ। आप मुझे अनुज का प्यार देते हैं जो आप के विशाल हृदयता को दर्शाता है। आप से जुड़कर दोहा विधा में मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। प्रभु से विनय विनय करता हूँ कि आप दीर्घायु रहें और साहित्य को और भी प्रखर बनाते हुए हम सभी के अभिवावक बने रहें।
[लेखक परिचय : दोहाकार, से. नि. वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी, चलभाष ९४२६५७७१३९, ८१६०८७५७८३, mahatammishra@gmail.com  ]
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मेरे वीर जी संजीव 'सलिल'
लता यादव
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आचार्य संजीव 'सलिल' जी के लिए तो बड़े-बड़े साहित्यकारों के आलेख आयेंगे। मैं अदना सी लेखिका संजीव जी के बारे में लिखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही हूँ । संजीव 'सलिल' जी जितने बड़े लेखक हैं, उससे भी बहुत अधिक ऊँचाई पर है उनकी इंसानियत। पिछले पाँच साल से सम्पर्क में रह कर मुझे उनके जीवन के जिस पहलू को जानने का अवसर मिला है, वह शायद ही किसी अन्य को मिला हो। 
२०१८ में दिल्ली पुस्तक मेले के अवसर पर वे कुछ पुस्तकों के विमोचन हेतु आ रहे थे। जानकारी मिलने पर मैंने उन्हें गुड़गाँव आने का आमंत्रण दिया। युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच के कार्यक्रम में वे मुख्य अतिथि थे, मैं कार्यक्रम में सम्मिलित हुई और लौटते हुए उन्हें साथ ही ले आई। मैं उन्हेंवीर  जी कहती  और उन्होंने भाई की ही तरह मेरे घर तीन दिवस मेरे साथ बिताए। उन्हें अहंकार छू भी नहीं गया है। मेरे ख़राब स्वास्थ्य को देखते हुए वे बार-बार ध्यान रखने को कहते। रोज पूछते कि मैंने दवाईयां खाई या नहीं? एक दिन उनकी नज़र मेरे स्वर्गीय पति को मिलिट्री सेवा के दौरान प्राप्त पदकों पर पड़ी। आलमारी में ऊंचाई पर रखे होने के कारण मैं उन्हें बार-बार नहीं देख-सहेज पाती। सलिल जी चुपचाप सारे स्मृति चिन्ह और पदक निकाल कर साफ़ करने लगे, मैं रोकती ही रह गयी पर उन्होंने चिन्हों व पदकों को भली-भाँति  सजा ही दिया। 
उनके आगमन का समाचार पाकर गुड़गांव के साहित्य मनीषियों के साथ प्रो. विशंभर नाथ शुक्ल भी गुड़गाँव पधारे। अपने घर पर गोष्ठी में उनको सुनने का अवसर मिला। जब तक सलिल जी रहे निरंतर साहित्यिक चलती चलती रहीं। छन्दों पर उनकी जानकारी विस्मित करने वाली है। वे हिंदी के प्रचार हेतु मन-प्राण से समर्पित हैं। 
आचार्य जी निरंतर साहित्य साधना हिंदी में ही नहीं बल्कि आंचलिक भाषाओं में भी कर रहे हैं। सलिल जी के द्वारा किये गए दुर्गा सप्तशती के कवच, अर्गला और कीलक स्तोत्र का हिंदी में काव्य बद्ध रुप पढ़ कर विभोर हो गई। मेरे वीर जी सलिल जी को हार्दिक बधाई।
[लेखिका परिचय : ]
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सुमन श्रीवास्तव 
आदरणीय संजीव सलिल जी के विषय में भला क्या लिख सकती हूँ , संजीव जी साहित्य प्रतिभा के धनी व्यक्ति हैं साथ ही उनका व्यक्तित्व इतना सहज,सरल एंव अति प्रभावशाली है ।
साहित्य-सलिला ग्रुप मे मेरा प्रथम अनुरोध सलिल जी ने स्वीकार कर मुझे धन्य कर दिया और तभी से मैं फेसबुक पर मुखर होने लगी ।
संजीव सलिल जी ने महीयसी महादेवी वर्मा जी के विषय में बहुत सुन्दर लेख प्रस्तुत किया था और उस लेख में महादेवी जी से अपने भतीजे होने का संबंध उजागर किए थे तो उसे पढ़कर लगा जैसे सलिल जी को मै वर्षों से जानती हूँ क्योंकि महादेवी जी की कविताओं में मेरी विषेश रुचि रहती थी ।
इसके उपरान्त उनका लखनऊ आगमन हुआ मेरे आग्रह मेरे घर भी आए । मै काफी परेशान चल रही थी कि मेरी परिस्थिति पर बैठे-बैठे एक कविता लिख दिए और साथ ही मुझे बहुत प्रोत्साहित किया कि मैं साहित्य के क्षेत्र में क्रियाशील रहूं ।
मै उनके ज्ञान- गंगा में गोते लगाती रहती हूँ । व्याकरण एवं छंद के विविध विधाओं के ज्ञाता सभी साहित्यकारों का मार्ग दर्शन कराते रहते हैं ।आपकी रचनाओं में नवगीत एवं दोहे अद्वितीय है ।
साहित्य जगत आपके अमूल्य सहयोग से सदैव लाभान्वित होता रहेगा । ईश्वर की कृपा सदैव आपपर बनी रहे शुभ कामनाओं सहित ।
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आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
व्यक्तित्व एवं कृतित्व
संतोष शुक्ला, ग्वालियर
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पारिवारिक परिशिष्ट
माँ भारती के वरद पुत्र आचार्य संजीव वर्मा ' सलिल 'जी का नाम साहित्य जगत में, झिलमिलाते ध्रुव तारे के समान है, जो तारामंडल में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है।
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल ' जी का निवास मध्यप्रदेश के जबलपुर शहर में है, पर उनके ज्ञान का प्रकाश यत्र-तत्र-सर्वत्र फैला है।
आपको ज्ञान का अथाह भण्डार मानो उन्हें विरासत में मिला है, स्वयं ' सलिल 'जी अपनी माँ कवियत्री शान्ति देवी एवं बुआश्री महादेवी वर्मा को साहित्य और भाषा के प्रति अटूट स्नेह और विश्वास का प्रेरणा श्रोत मानते हैं।उनकी रग-रग में बचपन से ही संस्कारों के बीज अंकुरित, प्रस्फुटित और पल्लवित हुए हैं जिसकी पुष्टि सलिल जी द्वारा लिखित महादेवी वर्मा के संस्मरण में कई स्थानों पर हुई है। सलिल जी को बुआश्री का प्यार आसानी से नहीं मिल गया।
दो पीढ़ियों के मध्य का अंतराल नई पीढ़ियों के लिए अपरिचय बन जाना इसका मुख्य कारण बना।
उन्होंने अथक परिश्रम कर खोजबीन की, पत्रकारिता का कोर्स करने के कारण, उनका खोजी होना स्वाभाविक था।ऐसे मिला बुआश्री का अपरिमित स्नेह। वैसे बुआ का भतीजों पर विशेष स्नेह होता है।
सलिल जी को पूर्वजों की सेवा करना तथा उनकी जानकारी रखने की अलग ही आदत है।
आज भी वो अपने नाना जी रायबहादुर माता प्रसाद सिन्हा ' रईस ' जो मैनपुरी में ऑनरेरी मजिस्ट्रेट थे, उनके बारे में विषद जानकारी के लिए परेशान हैं।
सलिल जी को वृद्धों की सेवा और उनको सम्मान करना युवावस्था से ही प्रिय था।
उपनाम ' सलिल ' रखने का विशेष कारण था ।उनकी बुआश्री ने कहा 'सलिल' ही क्यों 'सलिलेश' क्यों नहीं।
दिनकर जी के निबंध ' नेता नहीं नागरिक चाहिए 'से प्रभावित हो कर, उनके किशोर मन में वैशिष्ट्य से सामान्यता की चाह उपजी।
सलिल जी आज इतने लब्धप्रतिष्ठ होने के बावजूद भी अपने को सामान्य ही मानते हैं।
वे बुआश्री के शब्दों में 'शैतान' भी थे। वह तो बचपन का स्वाभाविक गुण होता है लड़कों में।
आचार्य जी ने माता-पिता, मौसी,बहनों के स्नेह को रचनाओं में अंकित किया है।माँ को समर्पित बहुत ही मार्मिक कविता का सृजन किया। माँ के जाने के बाद पिता की स्थिति को भी दर्शाया है।
अपनी काव्य कृति ' सड़क पर ' अपनी स्नेहमयी मौसी को समर्पित की।
आज के स्वार्थी युग में आचार्य सलिल जी एक अच्छे इंसान हैं।
साहित्य सेवा:-
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' जी अभियंता और अधिवक्ता होते हुए भी हिन्दी के परम साधक हैं। विविध विधाओं में लेखन कार्य के कारण ही हिन्दी जगत में उनकी अच्छी पहचान बनी हुई है।
उनकी कृति ' काल है संक्रांति का 'में जिन गीतों और नवगीतों का संकलन हुआ है, उनका क्षेत्र बहुत व्यापक है।उनको पढ़कर ऐसा लगता है कि सलिल जी समाज के जागरूक पहरेदार हैं।आपने अपनी रचनाओं में किसी पहलू को नहीं छोड़ा है, सारे समाज का ही मूल्यांकन किया है।
उनकी अभिव्यंजनाओं में विश्वास की झलक है।वो एक संवेदनशील रचनाकार हैं। जिस समाज में रहते हैं ,उसकी हर गतिविधि को समझते हैं और उन्हीं में से अपनी रचना की सामग्री चुन लेते हैं। यही कारण है कि उनकी रचना पाठकों की भावनाओं तक गहराई से पहुंचती हैं।
जिधर देखो उधर विरोधाभास ही नजर आता है, जो चाहिए उसके विपरीत होता है।
सलिल जी की रचनाओं के अध्ययन से यह निष्कर्ष निकलता है की उनकी पैनी दृष्टि से कोई क्षेत्र ,कोई वर्ग नहीं बचा है।
आचार्य जी की कविताओं की यह विशेषता है कि जैसा वह सोचते हैं वैसा पाठक भी सोचने को विवश हो जाता है।
आज का इंसान जानते हुए भी गलत राह पर चलता है, समझाने पर भी नहीं समझता तब देखिए सलिल जी के तेवर
'मनुज न किंचित चेतते/श्वान थके हैं भौंक।'
भारतीय सभ्यता और संस्कृति पर पड़ रहे पाश्चात्य प्रभाव को भली-भाँति समझ रहे हैं लेकिन वे आस्था और संभावना के कवि हैं वो निराश नहीं होते, जानते हैं सदियों से दासता के कारण उदास और सोये हुए लोगों को जगाने के लिए तीव्र ध्वनि की आवश्यकता होती है। सलिल जी की कविता वही शंखध्वनि है।
प्रकाशित कृतियाँ:
कलम के देव,भूकंप के साथ जीना सीखें, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, काल है संक्रांति का, कुरुक्षेत्र गाथा, सड़क पर।
उल्लेखनीय घटनाएँ
अनूठा उदाहरण:
सलिल जी की पत्नी साधना वर्मा जी कैंसर जैसी भयंकर बीमारी से ग्रसित हो अस्पताल में भर्ती थीं उस विषम परिस्थिति में भी सलिल जी ने गीत, नवगीत, मुक्तक, मुक्तिकाओं की सर्जना की, जब अपने को सम्हालना ही कठिन होता है।
इतना ही नहीं स्वयं आचार्य जी ने एक के बाद भयंकर कष्ट झेले।
१९९४, १९९६ और १९९९ में सड़क दुर्घटना में फ्रैक्चर हुआ।१९९४ में तो बाएं पैर का हिप ज्वाइंट ही निकाल दिया गया। चलने में कष्ट होता है इसके बावजूद भी वो साहित्य साधना में लीन सुदूरवर्ती प्रांतों में जाते ही रहते हैं। धन्य है उनकी साहित्य साधना।
विहगावलोकन :
काल है संक्रांति का -
'काल है संक्रांति का' सलिल जी गीत नवगीत की अनुपम कृति है।आपको समय की अच्छी पकड़ है। वास्तव में यह काल संक्रांति का ही है।आज सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है, टूट रहे हैं, बिखर रहे हैं और उनके स्थान पर नये मूल्यों की स्थापना हो रही है।इसी संदर्भ में सलिल जी ने सूर्य को सम्बोधित करते हुए कई गीत लिखे हैं। सभी एक से बढ़कर एक सुन्दर, भावप्रवण एवं नवीनता से भरपूर हैं। सभी रचनाएँ छंदों के अनुशासन में एवं लयबद्ध हो सभी बिन्दुओं पर खरी उतरी हैं। जब सूर्य दक्षिणायन में होता है, उस समय को बड़े ही सुन्दर प्रतीकों से वर्णित किया है। यह उनकी अद्भुत क्षमता का ही द्योतक है।
इस कृति में राजनीति की दुर्दशा, विसंगति की बाढ़, हताशा, निराशा, वेदना, संत्रास, आतंक और आक्रोश को दर्शाते अनेकों दृश्य हैं जो बहुत ही प्रेरक हैं।
काल है संक्रांति का कृति के कुछ अंश
१. काल है संक्रांति का,
तुम मत थको सूरज
२. स्वभाषा को भूल
इंग्लिश से लड़ाती लाड़
३. प्रथा की चूनर न भाती
फेंकती है फाड़
४. जनविरोधी सियासत
को कब्र में दो गाड़
५. प्राच्य पर पाश्चात्य का
अब चढ़ गया है रंग
६. शराफत को शरारत
नित कर रही है तंग
७. मनुज करनी देखकर
खुद नियति भी है दंग
८.अनवरत विस्फोटक होता
गगन, सागर चरण धोता
९. कैंसर झेलो ग्रहण का
कीमियो नव आस बोल
१०. खिचड़ी तिल गुड़वाले। लड़ुआ
पिज्जा तजकर खाओ बबुआ
११. करना सदा जो सही हो
तकदीर से मत हों गिले
तदवीर से जय हो किले
१२.लेटा हूँ मखमल गादी
पर लेकिन नींद नहीं आती है
इस करवट में पड़े दिखाई
कमसिन बरतनवाली बाई
१३. वेश संत का मन शैतान
१४. लोकतंत्र का बंदी बेबस
१५ .उड़ चल हंसा मत रुकना
१६.हम में हर एक तीसमारखाँ
कोई नहीं किसी से कम
१७. हम आपस में उलझ उलझ कर
दिखा रहे हैं अपनी दम
१८. लिए शपथ सब
संविधान की
देश देवता हैं सबका
देश हितों से करो न सौदा
तुम्हें वास्ता है रब का
दूसरी कृति 'सड़क पर' नवगीत संग्रह
गीतकार-आचार्य संजीव वर्मा ' सलिल' का नाम नवीन छंदों के निर्माण तथा उनपर गहनता से किये गए कार्यों के लिए प्रबुद्ध जगत में बड़े गौरव से लिया जाता है।
रस,अलंकार और छंद का गहन ज्ञान उनकी कृतियों में स्पष्ट दिखाई देता है। विषय वस्तु की दृष्टि से कोई विषय उनकी लेखनी से बचा नहीं है।रचनाओं पर उनकी पकड़ गहरी है। हर क्षेत्र का अनुभव उसी रूप में बोलता है जिससे पाठक और श्रोता उसी परिवेश में पहुंच जाता है।हिन्दी के साथ साथ बुन्देली, पचेली,भोजपुरी, ब्रजभाषा, अवधी, राजस्थानी, मालवी, छत्तीसगढ़ी, हरियाणवी तथा अंग्रेजी भाषा में भी लेखन कार्य किया है।
मूल्यांकन -
उनकी कृति 'काल है संक्रांति की 'उद्भट समीक्षकों द्वारा की समीक्षा पढ़कर ही पता चलता है कि आचार्य सलिल जी ज्ञान के अक्षय भण्डार हैं अनन्त सागर हैं।
'काल है संक्रांति का 'और 'यदा कदा 'जैसी अमूल्य कृतियाँ मुझे उपहार के रूप में प्राप्त हैं।
आचार्य सलिल जी की सद्य प्रकाशित 'सड़क पर'
मैंने अभी पढ़ी -
'सड़क पर' नवगीत संग्रह में गीतकार सलिल जी ने देश में हो रहे राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक परिवर्तनों को स्पष्ट रूप से दर्शाया है।
उनके नवगीतों में भाग्य के सहारे न रहकर परिश्रम द्वारा लक्ष्य प्राप्त करने पर सदैव जोर दिया है। छोटे-छोटे शब्दों द्वारा बड़े-बड़े संदेश दिये हैं और चेतावनी भी दी है।
कहीं अभावग्रसित होने के कारण तो कहीं अत्याधुनिक होने पर प्यार की खरीद फरोख्त को भी उन्होंने सृजन में उकेरा है। आजकल शादी कम और तलाक ज्यादा होते हैं, यह भी आधुनिकता का एक चोला है।
इसके अतिरिक्त सलिल जी ने एक और डाइवोर्स की बात लिखी है
निष्ठा ने मेहनत से
डाइवोर्स चाहा है।
आगे भी
मलिन बिंब देख-देख
मन दर्पण
चटका है
आजकल बिना रिश्वत के कोई काम नहीं होता
सलिल जी के शब्दों में
पद-मद ने रिश्वत का
टैक्स फिर उगाहा है ।
पाश्चात्य के प्रभाव में लोगों को ग्रसित देख गीतकार का हृदय व्यथित है-
देह को दिखाना ही
प्रगति परिचायक है
मानो लगी होड़
कौन कितना सकता है छोड़?
पाश्चात्य प्रभाव के कारण ही लोग अपने माता-पिता को असहाय छोड़, बृद्धाश्रम में छोड़ कर अपनी जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ लेते हैं।
अपने पुराने स्वास्थ्यवर्धक खान-पान को भूलकर हानिकारक चीजों को शौक से खाते हैं देखिए
ब्रेड बटर बिस्कुट
मन उन्मन ने
गटका है।
अब
लोरी को राइम ने
औंधे मुँह पटका है
इसी क्रम में
नाक बहा, टाई बाँध
अंग्रेजी बोलेंगे
अब कान्हा गोकुल में
शायद ही डोलेंगे।
आजकल शिक्षा बहुत मँहगी हो गई है। उच्च शिक्षा प्राप्त युवक नौकरी की तलाश इधर- उधर भटकते हैं। बढ़ती बेरोजगारी पर भी आचार्य जी ने चिंता व्यक्त की है। शायद ही कोई ऐसा विषय है जिस पर सलिल जी की पैनी दृष्टि न पड़ी हो।
आचार्य जी के नवगीतों के केंद्र में श्रमजीवी श्रमिक है।चाहे वह खेतों में काम करनेवाला किसान हो, फैक्ट्रियों में काम करनेवाला श्रमिक या दिनभर पसीना बहाने वाला कोई मजदूर जो अथक परिश्रम के बाद भी उचित पारिश्रमिक नहीं पाता तो दूसरी ओर मिल मालिक, सेठों,सूदखोरों की तोंद बढ़ती रहती है। देखिए-
चूहा झाँक रहा हंडी में
लेकिन पाई
सिर्फ हताशा
यह भी देखने में आता है
जो नहीं हासिल
वही सब चाहिए
जितनी आँखें
उतने सपने
समाज के विभिन्न पहलुओं पर बड़ी बारीकी से कलम चलाई है।
घर में काम वाली बाइयों, ऑफिस में सहकर्मियों तथा पास पड़ोस में रहने वाली महिलाओं के प्रति पुरुषों की कुदृष्टि को भी पैनी नजर का शिकार बनाया है।
महिलाएँ आज भले ही लगभग सभी क्षेत्रों में अपना वर्चस्व स्थापित कर रही हैं फिर भी मध्यम और सामान्य वर्ग की महि,लाओं की स्थिति अभी भी बहुत अच्छी नहीं है।कार्यरत महिलाओं को दोहरी भूमिका निभाने के बाद भी ताने, प्रताड़ना और उपेक्षा का सामना करना पड़ता है।
सलिल जी के शब्दों में
मैंने पाए कर कमल, तुमने पाए हाथ
मेरा सर ऊँचा रहे झुके तुम्हारा माथ
सलिल जी ने नवगीतों में विसंगतियों को खूब उकेरा है।कुछ उदाहरण देखते हैं-
आँखें रहते सूर हो गए
जब हम खुद से दूर हो गए
.
मन की मछली तन की तितली
हाथ न आई पल में फिसली
जब तक कुर्सी तब तक ठाट
नाच जमूरा नाच मदारी
.
मँहगाई आई
दीवाली दीवाला है
नेता हैं अफसर हैं
पग-पग घोटाला है
आजादी के इतने वर्षों बाद भी गाँव और गरीबी का अभी भी बुरा हाल है लेकिन गीतकार का कहना है-
अब तक जो बीता सो बीता
अब न आस घट होगा रीता
.
मिल कर काटें तम की कारा
उजियारे के हों पौ बारा
.
बहुत झुकाया अब तक तूने
अब तो अपना भाल उठा
मन भावन सावन के माध्यम से जहाँ किसानों की खुशी का अंकन किया है वहीं बरसात में होने वाली समस्याओं को भी चित्रित किया है।
आचार्य जी ने नये नये छंदों की रचना कर अभिनव प्रयोग किया है।
सलिल जी ने नवगीतों में परिवेश की सजीवता बनाए रखने के लिए घरों में उपयोग में आने वाली वस्तुओं, रिश्तों के सम्बोधनों आदि का ही प्रयोग किया है।
संचार क्रांति के आने से लोगों में कितना बदलाव आया है उसकी चिंता भी गीतकार को है
.
हलो हाय मोबाइल ने
दिया न हाय गले मिलने
नातों को जीता छलने
.
' सलिल 'जी ने गीतों नवगीतों में लयबद्धता पर विशेष जोर दिया है।
लोक गीतों में गाये जाने वाले शब्दों, छंदों , अन्य भाषाओं के शब्दों, नये-नये बिम्बों तथा प्रतीकों का निर्माण कर लोगों के लिए सड़क पर भी फुटपाथ बनाये हैं।जो बहुत ही महत्वपूर्ण हैं।
' सड़क ' गीत नवगीत संग्रह में अनेकानेक छोटे छोटे बिन्दुओं को अंकित किया है उन सब को इंगित करना असंभव है।
सलिल जी ने ' सड़क पर ' गीत नवगीत संग्रह में सड़क को केंद्र बिन्दु बनाकर जीवन के अनेकानेक पहलुओं को बड़ी कुशलता से चित्रित किया है
सड़क पर जनम है
सड़क पर मरण है
सड़क पर शरम है
सड़क बेशरम है
सड़क पर सियासत
सड़क पर भजन है
सड़क ही सख्त लेकिन
सड़क ही नरम है
सड़क पर सड़क से
सड़क मिल रही है।
आचार्य संजीव वर्मा ' सलिल 'जी ने अपनी सभी रचनाओं में माँ नर्मदा के वर्चस्व को सदा वर्णित किया है तथा 'सलिल' को अपनी रचनाओं में भी यथासंभव प्रयुक्त किया है।
माँ नर्मदा के पावन निर्मल सलिल की तरह आचार्य 'सलिल 'जी भी सदा प्रवहमान हैं और सदा रहेंगे।
उनकी इस कृति को पाठकों का भरपूर मान, सम्मान और प्यार मिलेगा ऐसा मेरा विश्वास है।
***
*शब्द ब्रम्ह के पुजारी*
श्रुति-स्मृति की सनातन परंपरा के देश भारत में शब्द को ब्रम्ह और शब्द साधना को ब्रह्मानंद माना गया है। पाश्चात्य जीवन मूल्यों और अंग्रेजी भाषा के प्रति अंधमोह के काल में, अभियंता होते हुए भी कोई हिंदी भाषा, व्याकरण और साहित्य के प्रति समर्पित हो सकता है, यह आचार्य सलिल जी से मिलकर ही जाना।
भावपरक अलंकृत रचनाओं को कैसे लिखें यह ज्ञान आचार्य संजीव 'सलिल' जी अपने सम्पर्क में आनेवाले इच्छुक रचनाकारों को स्वतः दे देते हैं। लेखन कैसे सुधरे, कैसे आकर्षक हो, कैसे प्रभावी हो ऐसे बहुत से तथ्य आचार्य जी बताते हैं। वे केवल मौखिक जानकारी ही नहीं देते वरन पढ़ने के लिए साहित्य भी उपलब्ध करवाते हैं । उनकी विशाल लाइब्रेरी में हर विषयों पर आधारित पुस्तकें सुसज्जित हैं । विश्ववाणी संस्थान अभियान के कार्यालय में कोई भी साहित्य प्रेमी आचार्य जी से फोन पर सम्पर्क कर मिलने हेतु समय ले सकता है । एक ही मुलाकात में आप अवश्य ही अपने लेखन में आश्चर्य जनक बदलाव पायेंगे ।
साहित्य की किसी भी विधा में आप से मार्गदर्शन प्राप्त किया जा सकता है । चाहें वो पुरातन छंद हो , नव छंद हो, गीत हो, नवगीत हो या गद्य में आलेख, संस्मरण, उपन्यास, कहानी या लघुकथा इन सभी में आप सिद्धस्थ हैं।
आचार्य सलिल जी संपादन कला में भी माहिर हैं। उन्होंने सामाजिक पत्रिका चित्राशीष, अभियंताओं की पत्रिकाओं इंजीनियर्स टाइम्स, अभियंता बंधु, साहित्यिक पत्रिका नर्मदा, अनेक स्मारिकाओं व पुस्तकों का संपादन किया है। अभियंता कवियों के संकलन निर्माण के नूपुर व नींव के पत्थर तथा समयजयी साहित्यकार भागवत प्रसाद मिश्र 'नियाज़' के लिए आपको
नाथद्वारा में 'संपादक रत्न' अलंकरण से अलंकृत किया गया है।
आचार्य सलिल जी ने संस्कृत से ५ नर्मदाष्टक, महालक्ष्यमष्टक स्त्रोत, शिव तांडव स्त्रोत, शिव महिम्न स्त्रोत, रामरक्षा स्त्रोत आदि का हिंदी काव्यानुवाद किया है। इस हेतु हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग को रजत जयंती वर्ष में आपको 'वाग्विदांबर' सम्मान प्राप्त हुआ। आचार्य जी ने हिंदी के अतिरिक्त बुंदेली, छत्तीसगढ़ी, भोजपुरी, राजस्थानी, अवधी, हरयाणवी, सरायकी आदि में भी सृजन किया है।
बहुआयामी सृजनधर्मिता के धनी सलिल जी अभियांत्रिकी और तकनीकी विषयों को हिंदी में लिखने के प्रति प्रतिबद्ध हैं। आपको 'वैश्विकता के निकष पर भारतीय अभियांत्रिकी संरचनाएँ' पर अभियंताओं की सर्वोच्च संस्था इंस्टीटयूशन अॉफ इंजीनियर्स कोलकाता का अखिल भारतीय स्तर पर द्वितीय श्रेष्ठ पुरस्कार महामहिम राष्ट्रपति जी द्वारा प्रदान किया गया।
जबलपुर (म.प्र.)में १७ फरवरी को आयोजित सृजन पर्व के दौरान एक साथ कई पुस्तकों का विमोचन, समीक्षा व सम्मान समारोह को आचार्य जी ने बहुत ही कलात्मक तरीके से सम्पन्न किया । दोहा संकलन के तीन भाग सफलता पूर्वक न केवल सम्पादित किया वरन दोहाकारों को आपने दोहा सतसई लिखने हेतु प्रेरित भी किया । आपके निर्देशन में समन्वय प्रकाशन भी सफलता पूर्वक पुस्तकों का प्रकाशन कर नए कीर्तिमान गढ़ रहा है ।
छाया सक्सेना प्रभु
जबलपुर ( म. प्र. )
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मैंने आदरणीय संजीव 'सलिल' जी के निर्देशन में खड़ीबोली में सौ दोहों का सृजन किया है । अतः दोहा लेखन में मैं उन्हें अपने परमश्रद्धेय गुरु मानती हूँ ।
आपका प्रथम परिचय दिल्ली में युवा उत्कर्ष साहित्य मंच के कार्यक्रम में हुआ था । आप उस कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में मंच की शोभा बढ़ा रहे थे । सौभाग्य से मुझे भी उनके समक्ष काव्यपाठ करने का सौभाग्य मिला । अवसर था मुक्तक विधा में काव्यपाठ करने का । आपसे परिचय होने के पश्चात दूसरी बार मोबाइल पर बात करने का अवसर मिला । उन दिनोंआप दोहा विधा का तीसरा भाग "दोहा दीप्त दिनेश" नामक पुस्तक का संपादन कर रहे थे । आपने मुझसे भी पूछा कि क्या मैं दोहा लेखन में रुचि रखती हूँ । उस समय मैंने मात्र तीस दोहे लिख रखे थे, जो मैंने तुरंत आपको ई मेल कर दिए। उन दोहों में मैंने देशज शब्दों का प्रयोग भी किया हुआ था। क्योंकि अब तक जो दोहे मुझे स्मरण थे उन में भी इस प्रकार की ही भाषा का प्रयोग किया गया था । दोहा गायन मुझे बहुत ही अच्छा लगता है । मैं स्वयं तो दोहे गाती ही हूँ । शिक्षिका भी हूँ अतः अपने विद्यालय के बच्चों को भी दोहे गाना सिखाती हूँ । पाठ्यक्रम में न हों तब भी अन्य गतिविधि के अंतर्गत दोहा गायन प्रतियोगिता कराना बहुत अच्छा लगता है ।
आदरणीय सलिल जी ने मुझे एक सप्ताह का समय दिया और कहा कि आप सौ दोहे लिखिए । यह मेरे लिए एक चुनौती पूर्ण कार्य था ।
मैंने संकल्प लिया कि इस कार्य को मैं अवश्य पूर्ण करूँगी । पूरी निष्ठा और लगन से मैंने दोहे लिखे । अनेक बार सलिल जी से दोहों पर विचार विमर्श भी किया। सीखने का उत्साह बढ़ता गया और मेरा साहित्यिक संकल्प माननीय 'सलिल जी' के निर्देशन में पूर्ण हुआ।" विभिन्न विधाओं हाइकु,पिरामिड,चौका,कविता के उपरांत साझा संकलन में एक और पद्य विधा खड़ीबोली में "दोहा" की बढ़ोत्तरी हुई,जिसका श्रेय परम आदरणीय सलिल जी को जाता है ।
"दोहा दीप्त दिनेश" के नाम से साझा संग्रह प्रकाशित हुआ। लखनऊ में पुस्तक का लोकार्पण हुआ, जिसमें मैं व्यक्तिगत कारण से उपस्थित होने में असमर्थ रही ।
कुछ ही दिन पश्चात मेरे पते पर कोरियर से दोहा संकलन के तीनों भाग पहुँचा दिए गए ।
सच मानिए मुझे इस बात की खुशी तो बहुत थी कि पुस्तकें घर बैठे ही मिल गई, लेकिन मैं उन्हें
इतनी दूर से आने पर भी आतिथ्य न दे सकी जिसका मुझे आजीवन खेद रहेगा।
सरल वाणी , सरल वार्तालाप अति प्रबुद्ध ,ज्ञानवान तथा मेघों सी धीर गम्भीर वाणी के धनी परम श्रद्धेय परम आदरणीय सलिल जी को मेरा सादर चरण स्पर्श।
शशि त्यागी
अमरोहा
9045172402
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विश्ववाणी हिन्दी संस्थान अभियान
दिल्ली संस्थान इकाई स्थापना
के शुभ अवसर पर
आचार्य संजीव वर्मा सलिल जी
से एक आत्मीय मुलाकात
जबलपुर,,,, पत्थरों का शहर,,, जो अपने संगमरमर पत्थर के लिए बहुत प्रसिद्ध है । इस पत्थर का उपयोग आभूषण व मूर्तियाँ बनाने में इस्तेमाल होता है जो पूरे भारत में भेजा जाता है । इस शहर से अनेक साहित्यकार उदित हुए जिनमें से एक है आचार्य संजीव वर्मा सलिल जी ।
उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश आपके सामने पेश हैं । उन्होंने बेहद खूबसूरत ढंग से बातचीत आरंभ करते हुए कहा-
मैं जिस शहर से आता हूँ वहीं से अपनी बात शुरु करता हूँ । नर्मदा के किनारे बसे जबलपुर में कल पत्थर बहुत है,,,,बेसालट,,,, इसलिए इसे पत्थरों का शहर कहते हैं और आजकल तो हर शहर पत्थरों का शहर हो गया है ।
"पत्थर से हर शहर में मिलते मकां हजारों
मैं ढूंढ ढूंढ हारा घर एक नही मिलता!"
उन्होंने बताया कि मैंने भी चालीस बरस नौकरी की है और नौकरीपेशा लोगों की मानसिकता पर बहुत ही सटीक बात कही-
"बाप की दो बात सहन नही कर पाते
अफसरों की लट भी प्रसाद है!!!"
बातचीत के दौरान समाजिकता की चर्चा चली तो झट दो पँक्तियाँ हाजिर कर दी-
"जब तलक जिंदा था रोटियाँ न मुहैया थी
मर गया तो तेहरवीं में दावतें हैं!!"
उन्होंने बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए कहा कि भारत में साहित्य साधना न तो शौक है न व्यवसाय! हमारे ऋषि मुनि जिस परम्परा का सृजन कर रहे हैं वैदिक काल से उसमें साहित्य का एक ही उद्देश्य है जिसमें सबका हित समाहित हो, वह साहित्य है जिसमें वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं आती ।
उन्होंने खूबसूरत समां बांधते हुए बताया कि दोहा उनकी खास विधा है । दोहों पर चर्चा चल निकली तो बेहद दिलकश अन्दाज में उन्होंने वातावरण व पुस्तक उपहार पर संदेश देते हुए दोहा सुनाया-
"जन्म ब्याह राखी तिलक गृहप्रवेश त्योहार
सलिल बचा पोघे लगा, दें पुस्तक उपहार!"
भाषा को लेकर वे सदा जागरुक रहते हैं तथा जागरुकता का संदेश फैलाते हैं ।
"हिन्दी आटा माढिए उर्दू मोयन डाल
सलिल संस्कृत सान दे पूरी बने कमाल!"
अलंकारों का प्रयोग वे बड़ी बेबाकी से करते है । यमक अलंकार का उदाहरण देते हुए वे मुस्करा कर बोले-
" ठाकुर जी को कर रहे ठाकुर नम्र प्रणाम
ठाकुराइन मुसका रहीं आज पड़ा फिर काम!"
बातचीत के दौरान उन्होंने पूछा- कई बार ये बात उठती है कि हम कौन हैं,,,,हमारा क्या परिचय है । आज के वातावरण को लेकर उन्होंने लाजवाब रचना प्रस्तुत की-
"क्या बताऊं कौन हूँ मैं
नाद अनहद मौन हूँ मैं
दूरियों को नापता हूँ
दिशाओं में व्यापता हूँ. संयोजिका- अंजू खरबंदा, दिल्ली
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*आदर चित्रांश संजीव भैया*
उन दिनों मेरी पदस्थापना मंडला में थी।यही 80 के दशक का दौर।मंडला छोटा सा जिला, इने गिने अधिकारी वगैरह।उसी दौरान चित्रगुप्त कायस्थ सभा की स्थापना हो गई और राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ आर सी वर्मा के साथ साथ संजीव कुमार वर्मा सलिल साहब से भी भेंट मुलाकात हुई।उस समय ये कायस्थ सभाके मंडल अध्यक्ष पद को सुशोभित करते थे।
इसके बाद अन्य जगहों के बाद मेरी पदस्थापना जबलपुर में हुई तब यह परिचय प्रगाढ़ता में बदला।यह भी जानकारी हुई सरनेम गोत्र यहां तक कि अल्ल भी हम दोनों का एक ही है।चूंकि मै कनिष्ठ था अतः मुझे स्नेह का पूरा पूरा लाभ मिला।
वे जहाँ तहां समाज के अलावा साहित्य चर्चा करते मुझे इससे लगाव नहीं था अतः एक दिन स्पष्ट कर दिया कि भैया अपनी ऊपर की खिड़की जिसे दिमाग कहते हैं खाली है ये पद्य, अविता कविता अपने को समझ नहीं आती।आप तो मोटा मोटी गद्य का अध्ययन ही मुझ जैसे को सिखा दो।
इसके बाद मैने उनके साथ कई विद्वानों की संगत की, लोगों को सुनना एवं उससे भी बड़ी बात तथ्यों को समझना सीखा है।
पहिले पहल जो मिला सो पढ़ लिया की तर्ज़ पर इब्ने सफी, गुलशन नंदा, चतुरसेन जी, शिवानी ,वृंदावन लाल वर्मा कुछ भी पढ़ लेता था।पर उनकी संगत के उपरांत लेखक/विषय चयन कर सबसे पहिले किताब की भूमिका पढ़ता हूँ तदुपरान्त कतिपय चेप्टर, टॉपिक दुबारा पढ़ने एवं मनन करने काबिल होते हैं।
कोर्स का अध्ययन और आनंद हेतु (स्वाद लेकर पढ़ना) में बहुत फर्क होता है।
किस्से कहानी, यात्रा विवरण, संस्मरण, जीवनी, साक्षात्कार,समाज काफी कुछ पर बात तो कर लेते हैं हम लोग। सबसे बड़ी बात जो सीखने को मिली वह विनयशीलता है बिना किसी अहंकार के।
उनका आशीर्वाद हम पर बना रहे यही चित्रगुप्त से प्रार्थना है।
रामकुमार वर्मा
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संस्मरण
एक दिन मेरे फ़ोन पर सुबह-सुबह एक कॉल आया, मैं उठाई और उधर से एक आवाज़ आयी हेलो मैं संजीव वर्मा 'सलिल' बोल रहा हूँ। मैं धन्य हो गई उनकी आवाज़ सुनकर, फिर हमारी बातें हुई। आदरणीय संजीव वर्मा 'सलिल' सर वास्तव में दोहा सलिला के सिलसिले में बात करना चाह रहे थे। उन्होंने मुझसे कहा कि अपने 100 दोहे दोहा सलिला के लिए भेजो, और मैंने भेज दिया। दोहा सलिला में मेरे दोहों को भी स्थान मिला और काफी कुछ त्रुटियां रही होंगी मेरे दोहों में क्योंकि
यह मेरा प्रथम साझा संग्रह था। सर ने उन्हें ठीक किया मैं उनका सदैव आभारी रहूँगी।
दूसरी बार जब हमारी फ़ोन पर बातें हुई तो समय का पता नहीं चला कि कितने घंटे हम लोग बात किये। वो बातें सिर्फ हम सबकी चहेती साहित्यकारा आदरणीया महादेवी वर्मा जी के बारे में हुई। मैं बचपन से ही महादेवी वर्मा जी की बहुत बड़ी प्रशंसक रही हूँ। इन से मिलकर मुझे बहुत अच्छा लगा और महादेवी वर्मा जी के बारे में बहुत कुछ जानने को मिला। मैं अपने आप को भाग्यशाली समझता हूँ कि मुझे इनका सानिध्य मिला।
तीसरी बात मेरी प्रथम कृति 'जपले मन हनुमान' के लिए मैं सर को लेख लिखने के लिए बोली तो सर ने अपना आशीष मुझे दोहों में दिये। जो कि एक अद्भुत बात है।
रीता सिवानी
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गीता गीत
संपादक गीत पराग
सलिल भैया की तुलना कम्प्यूटर से करूं तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
विद्वत्ता में उनका कोई सानी नही। 
वे क्षण भर में काव्य रचना और समीक्षा में पारंगत हैं।
वे कब नाराज होते हैं कब खुश होते हैं समझ में नहीं आता। तभी तो वे सलिल कहलाते हैं।
उनके घर में उनकी हजारों हजार किताबों की लायब्रेरी अद्भुत है।
उनके पास कुछ समय के लिये भी बैठने से ज्ञान की बहुत सी बातें पता चलती हैं।
वे स्वंम किसी भी विषय पर बहुत विस्तृत और सारगर्भित सुन्दर लिख सकते हैं।
हमारे लिये उनके लिये कुछ लिखना सूर्य को दिया दिखाने जैसा है।
हम उनका बहुत मान सम्मान और आदर करते हैं।
ईश्वर उन्हैं हमेशा स्वस्थ और ऊर्जावान बनाये रखे।
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आदरणीय आचार्य संजीव सलिल जी साहित्य में बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। मैं उनके साहित्य का अध्येता हूं। उनका साहित्य श्लाघनीय है। वे पिंगल शास्त्री हैं। उन्होंने अनेक नवीन छंदों की रचना की। वे एक सफल नवगीतकार, समीक्षक भी हैं। वे लासानी हैं। उनका साहित्य अनुकरणीय है। अनेक पुस्तकों के वे संपादक प्रकाशक हैं। उनके अनेक गीत नवगीत, दोहा संग्रह प्रकाशित हैं। वर्तमान समय की वे धरोहर हैं। कोई भी विधा उनसे अछूती नहीं है। वे निष्णात हैं। हर साहित्यकार उनसे मशवरा करने को लालायित रहता है। उनके विषय में जो आंशिक जानकारी थी वो प्रस्तुत की।
विश्ववाणी हिंदी संस्थान एवं समन्वय प्रकाशन हिंदी को समर्पित संस्थान है जिसमें साझा संकलनो का संपादन प्रकाशन होता है। नवोदित रचनाकारों के लिए पाठशाला है। आचार्य जी की रचनाधर्मिता मील का पत्थर है। ऐसे लोगों से ही आज हिंदी साहित्य प्रगति के सोपान चढ़ता है। असल में विश्ववाणी हिंदी संस्थान छंदशाला है। न जाने कितने लोग लाभान्वित हुए। आचार्य जी का सानिध्य पाकर हर कोई धन्य हो जाता है।
समय समय पर काव्यगोष्ठी का आयोजन होता है। हिंदी साहित्य के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा होती है।
बहुमुखी व्यक्तिव के साहित्य पुरोधा - 'संजीव वर्मा सलिल'
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श्री संजीव वर्मा 'सलिल" बहुमुखी प्रतिभा के धनी है । अभियांत्रिकी, विधि, दर्शा शास्त्र और अर्थशास्त्र विषयों में शिक्षा प्राप्त श्री संजीव वर्मा 'सलिल' जी देश के लब्ध-प्रतिष्ठित साहित्यकार है जिनकी कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीट मेरे, काल है संक्रांति का, सड़क पर और कुरुक्षेत्र गाथा सहित अनेक पुस्तके चर्चित रही है ।
दोहा, कुण्डलिया, रोला, छप्पय और कई छन्द और छंदाधारित गीत रचनाओ के सशक्त हस्ताक्षर सही सलिल जी का पुस्तक प्रेम अनूठा है। इसका प्रमाण इनकी 10 हजार से अधिक श्रेष्ठ पुस्तको का संग्रह से शोभायमान जबलपुर में इनके घर पर इनका पुस्तकालय है ।
इनकी लेखक, कवि, कथाकार, कहानीकार और समालोचक के रूप में अद्वित्तीय पहचान है । मेरे प्रथम काव्य संग्रह 'करते शब्द प्रहार' पर इनका शुभांशा मेरे लिए अविस्मरणीय हो गई । इन्होंने ने कई नव प्रयोग भी किये है । दोहो और कुंडलियों पर इनकी शिल्प विधा पर इनके आलेख को कई विद्वजन उल्लेख करते है ।
जहाँ तक मुझे जानकारी है ये महादेवी वर्मा के नजदीकी रिश्तेदार है । इनकी कई वेसाइट है । ईश्वर के प्रति प्रगाढ़ आस्था के कारण इन्होंने के भजन सृजित किये है और कई संस्कृत की पुस्तकों का हिंदी काव्य रूप में अनुवाद किया है ।
सलिल जी से जब भी कोई जिज्ञासा वश पूछता है तो सहभाव से प्रत्युत्तर दे समाधान करते है । ये इनकी सदाशयता की पहचान है । एक बार इनके अलंकारित दोहो के प्रत्युत्तर में मैंने दोहा क्या लिखा, दोहो में ही आधे घण्टे तक एक दूसरे को जवाब देते रहे, जिन्हें कई कवियों ने सराहा । ऐसे साहित्य पुरोधा श्री 'सलिल' जी साहित्य मर्मज्ञ के साथ ही ऐसे नेक दिल इंसान है जिन्होंने सैकड़ों नवयुवकों को का हौंसला बढ़ाया है । मेरी हार्दिक शुभकामनाएं है ।
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अविनाश ब्यौहार
जबलपुर
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कलम के धनी , हमारे वरद् हस्त., सरस्वती पुत्र आदरणीय आचार्य श्री संजीव वर्मा सलिल जी से मेरी प्रथम वार्ता मोबाइल पर हुई ,,, उनके सानिध्य ने हिन्दी साहित्य की विधाओं पर लिखने की प्रेरणा दी ,,, फलतः दोहा दोहा नर्मदा मे मेरे दोहो का प्रकाशन हुआ ,,, दोहा सतसई पर कार्य चल रहा है ,,, 300 हाइकु भी प्रकाशित करने प्रेषित किये है ,, बून्देलखण्ड़ की यात्रा के दौरान कुछ पल का सानिध्य मिला ,, मिलकर ऐसा लगा जैसे बरसों से जानते हो ,, हृदय अभिभूत हो गया ,, हिन्दी साहित्य उनके कण कण में बसा है .उनके साहित्य प्रेम का जीता जागता प्रमाण उनका निजी बैठक गृह है जो किसी पुस्तकालय से कम नहीं ,, दुर्लभ ग्रन्थ भी उपलब्ध है ...मिलकर नयी ऊर्जा का संचार हुआ ,, खूदा यह अवसर बार बार लाए ... उनके साहित्य कर्म की प्रशंसा करना , वह शब्द शक्ति मेरी कलम मेंं कहाँ ... माँ शारदे की कृपा व उनका सानिध्य हर पल मिलता रहे ।।
विनोद कुमार जैन वाग्वर सागवाड़ा
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गुरुवर सलिल सर जी से मेरी बातें अक्सर होती रहती है, उनके मार्गदर्शन में गीत, दोहे, मुक्तक एवं छंदबद्ध कविताएँ लिखना एवं सिखना निरंतर जारी है।
उनसे बातें कर ऐसा लगता है जैसे किसी घर के सदस्य से बातें हो रही हो,इतने प्यार एवं आत्मीयता से बात करते हैं कि वक्त का पता ही नहीें चलता और उनसे बातें कर अपने-आप को गौरवान्वित महसूस होने लगता है।
दोहा सलिला हेतु दोहे मँगाकर उसे तराशने से लेकर उसकी विस्तृत व्याख्या एवं संपादन इतनी कुशलता से किया आपने कि पढ़ने को लोग विवश हो जाएँ।
साझा संकलन हेतु श्रद्धेय श्री ने सौ प्रतिशत अपनी जिम्मेदारी निर्वहन करते हुए नव रचनाकारों को एक प्लेटफार्म दिये हैं।
उनका सानिध्य अविस्मरणीय रहेगा, उनकी रचनाएँ पढ़कर उसी तरह लिखने की कोशिश हर रचनाकार करता है।
आप एक सहृदय व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति हैं ।
सादर नमन गुरुवर।
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सलिल जी रेवा पुत्र हैं।
महमहिमामयी महादेवी वर्मा के
मानस पुत्र की भांति उनके स्नेह भाजन भी।
छंद विधान,नवीन छन्दों के निर्माण में पटु।
मुझे भी उनका साहचर्य कुछ समय के लिए मिला जो यादगार है।सहित्य के प्रति जागरूक करना, नव लेखकों को प्रोत्साहित करना उनकी रुचि के विषय हैं।

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विराट चेतना का अंश आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

माँ नर्मदा की गोद में पल्लवित एक ऐसा सुरभित पुष्प हैं जिसकी सुरभि से देश देशांतर महकते हैं।
माँ नर्मदा के अनन्य भक्त महीयसी महादेवी वर्मा जी के कुल गौरव आचार्य संजीव वर्मा सलिल विगत तीन दशकों से उनकी साहित्य साधना अनवरत चल रही है ।
उन्होंने अपना सारा जीवन साहित्य को समर्पित किया है । उनका समर्पण देख अच्छे-अच्छे साहित्य साधक नतमस्तक हो जाते हैं ।
छंद कोष एवं नवीन छंदों की खोज के लिए किये गए उनके असीम प्रयासों के लिए उनका नाम साहित्याकाश में स्वर्ण अक्षरों से अंकित होगा और उन्हें साहित्यकारों के बीच सदा सदा याद किया जाएगा।
सौभाग्य की बात है कि मेरा निवास स्थान भी जबलपुर में होने के कारण मुझे आचार्य जी से मिलने और उन्हें जानने के शुभ अवसर मिले । उन्होंने मेरे लेखन को एक नूतन दिशा दी। मेरे साहित्यिक गुरु हैं आचार्य जी।
आचार्य जी ने मुझे सदैव छंद सीखने और छंद लिखने को प्रेरित किया दोहा कुंडलिया सवैया गीतिका हरिगीतिका इत्यादि।
उनके लिए दोहा लेखन इतना सरल है कि वह बात भी दोहों में करते हैं ।

दोहों में बातें करते हैं , दोहों में समझाते हैं ।
वो हिंदी लिखने वालों पर अपना स्नेह लुटाते हैं ।
आचार्य जी के शब्दों में-
जनगण-मन को मुग्ध कर, करे ह्रदय पर राज्य।
नव यश का रस कलश है, दोहों का साम्राज्य।

अपनी इतनी व्यस्त दिनचर्या के बावजूद नव रचनाकारों के लिए उनके पास सदैव समय होता है।
मुझे याद नहीं कि कभी उनसे किसी तरह की सहायता चाही गई हो और उन्होंने व्यस्तता की बात कहकर सहायता न की हो।
उनकी सहजता और समय की पाबंदी के गुण अनुकरणीय हैं ।
अब तक न जाने कितनी ही पुस्तकों का लेखन ,सम्पादन, भाषानुवाद, भूमिका लेखन ,ब्लॉग लेखन, दिव्य नर्मदा ब्लॉग पत्रिका का संपादन ,दोहा शतकों की श्रंखला का सम्पादन और ना जाने कितने ही कार्य में उनकी व्यस्तता होने के बावजूद सीखने सिखाने हेतु सदैव तत्पर रहते हैं।
यदि मैं उन्हें एक शिक्षाविद् भी कहूं तो अतिशयोक्ति न होगी । जब भी मेरी उनसे बात होती है, वह हमेशा मुझे शिक्षा से संबंधित अनेक सलाह देते रहते हैं उनके पास कक्षा प्रबंधन, शाला प्रबंधन, दक्षता उन्नयन व विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास जैसे कितने ही विषयों पर अनेक योजनाएं हैं जिन का क्रियान्वयन किया जा सके तो शिक्षा में विकास के नवीन द्वार खुल जाएंगे।
आचार्य जी एक विराट व्यक्तित्व के धनी हैं, उनका असीमित ज्ञान ,चिंतन, मनन सामाजिक सरोकारों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हें आज के साहित्यकारों से पृथक करती हैं।
आचार्य जी का कथन है कि साहित्यकार को ना सिर्फ सामाजिक विडंबना विद्रूपताओं विसंगतियों पर अपनी नजर रखना चाहिए बल्कि सामाजिक ,आर्थिक विकास, सामाजिक-समरसता , तकनीकी विकास का चितेरा भी होना चाहिए।
आध्यात्मिक चिंतन, प्राकृतिक सौंदर्य एवं विराट चेतना पर उनका लेखन अतुलनीय है । बानगी देखें---
मत अभाव रख भाव का ,समरस रहे स्वभाव।
हो सुख दुख में एक जो ,उसका बढ़े प्रभाव।।

कम शब्दों में अपनी बात कह देने का हुनर उनकी एक महती विशेषता है।
उनके व्यक्तित्व व कृतित्व को शब्दों में अभिव्यक्त करना मेरे लिए कठिन ही नहीं असम्भव है ,उनकी लेखनी को मेरा शत-शत नमन ।
मैं उनके यशस्वी व दीर्घ जीवन की कामना करती हूँ।

मिथिलेश बड़गैंया

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