सोमवार, 1 जुलाई 2019

मामा भांजा मंदिर

बस्तर में गंगयुगीन स्थापत्य की अनुपम विरासत – मामा भांजा मंदिर 
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बस्तर के इतिहास में सर्वाधिक उपेक्षा गंग शासकों को प्राप्त हुई है यद्यपि दो सौ वर्ष से कुछ अधिक समय तक (498 – 702 ई.) इस राजवंश का दण्डकारण्य वनांचल में आधिपत्य रहा है। सर्वप्रथम बस्तर की प्राचीनतम संदर्भ कृति बस्तर भूषण (1908) से उद्धरण लेते हैं जहाँ केदारनाथ ठाकुर गंग राजवंश के बारे में उल्लेख करते हैं - “लोगों का कथन है कि जगन्नाथ पुरी के राजा गंगवंशीय थे। उनके छ: औरस संताने थी तथा एक दासीपुत्र था। किसी कारणवश राजा ने औरस पुत्रों को राजगद्दी न दे कर दासीपुत्र को दे दिया। परिणामस्वरूप ये छहों राजकुमार इधर उधर विचरण करने लगे तथा उनमे से एक बस्तर में आ कर बारसूर में राज्य करने लगा। उनके साथ बहुत से विद्वान कारीगर तथा अन्य लोग आये। बारसूर आ कर वह मंदिर बनवाने लगा। उस समय बारसूर बहुत ही बड़ा शहर था; क्योंकि वर्तमान बारसूरगढ के आसपास पूर्व, दक्षिण और पश्चिम तीनो ओर चार चार कोस की दूरी पर अच्छे मंदिर और तालाब बने हुए हैं”। डॉ. हीरालाल शुक्ल (एतिहासिक समारम्भ और बस्तर के नल) मानते हैं कि गंगों ने पाँचवी शताब्दी के अंत में इस क्षेत्र में पदार्पण किया होगा; क्योंकि यही वह अवधि है जब कि स्कन्द वर्मा के पश्चात नल अत्यधिक दुर्बल हो जाते हैं और लगभग दो सौ वर्षों तक वे अंधकार में रहते है।
गंग राजाओं के सम्बन्ध में क्रमवार जानकारियाँ अब भी उपलब्ध नहीं हैं। प्राचीनतम ज्ञात गंग राजा हैं इन्द्रवर्मन प्रथम (537 ई.) जिन्होंने जिरजिंगी दानपत्र (537 ई.) जारी किया था तथा स्वयं वे त्रिकलिंगाधिपति की उपाधि धारण करते थे। उल्लेखनीय है कि त्रिकलिंग के अंतर्गत बस्तर का पर्वतीय क्षेत्र, कोरापुट तथा कालाहाण्डी के क्षेत्र प्रमुखता से आते थे। पोन्नुतुरु दानपत्र (562 ई.) के आधार पर अगले ज्ञात गंग शासक हैं सामंतवर्मन; इस काल का सर्वाधिक महत्वपूर्ण उल्लेख प्राप्त होता है कि इन्होंने दंतपुर को छोड कर सौम्यवन को राजधानी बनाया था। नरसिंहपल्ली ताम्रपत्र (577 ई.) तथा उरलाम दानपत्र (578 ई.) के आधार पर कहा जा सकता है कि अगले ज्ञात गंगवंशी राजा थे हस्तिवर्मन। उपलब्ध साक्ष्य यह संकेत देते हैं कि हस्तिवर्मन का काल युद्धों से भरा रहा तथा उन्हें किसी अरातिसंध के साथ निरंतर युद्धरत रहना पड़ा था। इसके पश्चात इन्द्रवर्मन द्वितीय की जानकारी अच्युतपुरम तथा पारलाखिमेण्डी दानपत्र के आधार पर ज्ञात होती है। अस्पष्ट और आधी अधूरी जानकारियों के बीच तेकाली पत्र (652 ई.) के आधार पर इन्द्रवर्मन तृतीय, चिकाकोल पत्र (681 ई.) के आधार पर देवेन्द्रवर्मन प्रथम तथा धर्मलिंगेश्वर दानपत्र (702 ई.) के आधार पर अनंतवर्मन की जानकारी प्राप्त होती है। इसके पश्चात लगभत 760 ई. तक का समय धीरे धीरे व्यवस्थापरिवर्तन का काल बन गया और दक्षिण से आ कर नागों ने बस्तर क्षेत्र पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया [एतिहासिक समारम्भ और बस्तर के नल]।
गंग राजाओं का बस्तर में कितना और किस तरह का प्रभाव रहा यह विषय अभी किसी इतिहासकार ने नहीं छुवा है। इतना अवश्य कहा जा सकता है कि नल राजाओं (ईसा पूर्व 600 से 760 ई. तक) की अशक्तता के कारण बिना किसी बड़े प्रतिरोध के गंग राजवंश जो कि जगन्नाथपुरी से अग्रसारित हुआ था ने दण्ड़क वन क्षेत्र में “बाल सूर्य” (वर्तमान बारसूर) नगर की स्थापना की। गंग-शासकों ने अनेकों मंदिर, तालाब बनवाये। आज का बारसूर ग्राम अपने खंड़हरों को सजोए अतीत की ओर झांकता प्रतीत होता है। जंगल और ग्रामीण बस्तियों में सिमट कर रह गयी अतीत की यह राजधानी उन शासकों को तलाशती है, जिन्हे सभ्यता की इबारत लिखनी थी वे अपने पीछे आदिमता का साम्राज्य कैसे छोड़ गये? इसी प्रश्न के साथ बारसूर की गंगवंशीय प्रमुख विरासत अर्थात मामा-भांजा मंदिर पर बात करते हैं। मामा-भांजा मंदिर; यह नाम सुनने वालों को विचित्र लगता है। वस्तुत: इस मंदिर का नाम इससे जुड़ी दंतकथा के कारण है। कहते हैं कि गंगवंशीय राजा का कोई भांजा उत्कल देश से कारीगरों को बुलवा कर इस मंदिर को बनवा रहा था। मंदिर की सुन्दरता ने राजा के मन में जलन की भावना भर दी। इस मंदिर के स्वामित्व को ले कर मामा-भांजा में युद्ध हुआ। मामा को जान से हाँथ धोना पड़ा। भाँजे ने पत्थर से मामा का सिर बनवा कर मंदिर में लगवा दिया फिर भीतर अपनी मूर्ति भी रखवा दी।
उपरोक्त कथा के आलोक में इस मंदिर का बारीकी से प्रेक्षण करते हैं। मंदिर के स्थापत्य पर बहुत विस्तार से डॉ. कामता प्रसाद वर्मा ने कार्य किया है। उनकी शोध कृति “बस्तर की स्थापत्य कला” से प्राप्त विवरणों को विवेचित किया जाये तो कह सकते हैं कि इस मंदिर के भूविन्यास में गर्भगृह तथा अर्ध मंडप निर्मित हैं। मामा-भांजा मंदिर पूर्वाभिमुख है। इसके मंदिर का गर्भगृह आयताकार है जो पूर्व-पश्चिम में 3.10 मीटर लम्बा और 2.80 मीटर चौडा है। गर्भमंदिर के चारो कोनों में एक एक भित्तिस्तम्भ स्थापित हैं जो वर्गाकार (40X40 सेंमी) है। मध्य के अर्ध-भित्ति स्तम्भ अलंकृत है। इस प्रकार गर्भगृह की एक भित्ति में दो भित्तिस्तम्भों के मध्य में एक अलंकृत अर्धभित्ति स्तम्भ तथा उसके दोनो तरफ सर्पयुग्म, कीर्तिमुख तथा जंजीर सहित घंटी का अलंकरण है। गर्भगृह के वितान में कमलपुष्प खिला हुआ तथा अलंकृत है जिसमे तीन परतों में पंखुडियाँ निर्मित हैं। मंदिर की पश्चिमी भित्ति के सहारे ललितासन में द्विभुजी गणेश प्रतिमा स्थापित है। इस प्रतिमा के बायी ओर चतुर्भुजी नरसिंह की प्रतिमा रखी हुई है। ये दोनो ही प्रतिमायें बाद में रखी हुई प्रतीत होती हैं। गर्भगृह की द्वार शाखा के ललाट बिम्ब में चतुर्भुजी गणेश बैठे हुए प्रदर्शित हैं। इस मंदिर का अंतराल आयताकार है, इसके चारो कोनों मे एक एक अलंकृत भित्तिस्तम्भ हैं। मंदिर के शिखर में मध्यरथ, अनुरथ तथा कोणरथ स्पष्ट रूप से विभाजित हैं। इन तीनो रथो में उपर से नीचे तक जालिकावत अलंकरण हैं। शिखर के पूर्वीभाग में अर्धकमलपुष्प आकृति के मध्य एक मानवमुख निर्मित है। संभवत: इसी मुखाकृति के कारण ही वह दंतकथा प्रचलित है जिसके कारण इस मंदिर का नाम मामाभांजा मंदिर पडा। शिखर के उपरी भाग में चारो दिशाओं में एक एक योगी की चतुर्भुजी प्रतिमा स्थापित है जिसके उपरी दायें हाथ में त्रिशूल दिखाई पडता है तो दायाँ हाथ वरद मुद्रा में है। योगी के सिर पर पगडी बंधी हुई है। मंदिर के सामने बायें कोने में एक तेलुगू भाषा में लिखा प्रस्तर स्तम्भ जमीन में गडा हुआ है।
पुरातत्व विभाग ने इस स्थल को घेर कर संतोषजनक पुनरुद्धार कार्य किये हैं। तथापि इस मंदिर के विषय में विशेषज्ञों से बहुत कुछ कहा-सुना जाना अभी शेष है। मंदिर से तेलुगुलिपि में लिखे गये प्रस्तर स्तम्भ का क्या सम्बन्ध है इस पर सभी विवरण और विद्वान मौन हैं। यह मंदिर नागों की स्थापत्यकला के भी बहुत करीब है तथा चन्द्रादित्य मंदिर की संरचना से बहुत साम्यता रखता है। तो क्या नागों ने गंगों की विरासत को ही आगे बढाया अथवा मामा-भांगा मंदिर का कोई सम्बन्ध नागों से भी है? संरचात्मक समकालीनता को आधार बना कर डॉ. कामता प्रसाद वर्मा इस मंदिर का निर्माणकाल 1060 ई. के लगभग मानते हैं। यह कालखण्ड तो बस्तर में नाग सत्ता का ही था। बहुत से सवाल उठते हैं जिसके उत्तर बस्तर के अतीत को समझने की दृष्टि से बहुत आवश्यक हैं।

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