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शनिवार, 24 अप्रैल 2021

दोहा सलिला

दोहा सलिला 
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माँ गौ भाषा मातृभू, प्रकृति का आभार.
श्वास-श्वास मेरी ऋणी, नमन करूँ शत बार.. 
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भूल मार तज जननि को, मनुज कर रहा पाप. 
शाप बना जेवन 'सलिल', दोषी है सुत आप.. 
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दो माओं के पूत से, पाया गीता-ज्ञान. 
पाँच जननियाँ कह रहीं, सुत पा-दे वरदान.. 
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रग-रग में जो रक्त है, मैया का उपहार. 
है कृतघ्न जो भूलता, अपनी माँ का प्यार.. 
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माँ से, का, के लिए है, 'सलिल' समूचा लोक. 
मातृ-चरण बिन पायेगा, कैसे तू आलोक?
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२४-४-२०१० 

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