सलिल सृजन मार्च २४
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छंद शाला
ग़ज़ल
उनको ये लगता है उनके राज़ खुल सकते नहीं,
आईना बनकर के सच्चाई दिखा सकती हूँ मैं।
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जो निगाहें ढूँढती हैं सिर्फ़ मेरी हार को,
उनकी उम्मीदों पे भी पानी फिरा सकती हूँ मैं। - डॉ. भावना कुँवर, आस्ट्रेलिया
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फिक्र है जिनको कि नदियाँ सूखती सब जा रहीं
जान लें कि आँख से गंगा बहा सकती हूँ मैं
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कम न मुझको आँकना जब आकलन मेरा करो
ईश्वर को भी जमीं पर ला-खिला सकती हूँ मैं
.
भावना जब लापता तो गीत कैसे जी सके
शब्द कर संजीव हँस ग़ज़लें सुना सकती हूँ मैं
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छंद शाला
दोहा-रोला-कुंडलिया
०
संबंधों के छंद नव, रच दे यह नव वर्ष।
जन जन के मन में नवल, पूरित कर दे हर्ष।। -अशोक व्यग्र
पूरित कर दे हर्ष, विमल उत्कर्ष साथ दे।
सुख समृद्धि संतोष, सफलता हाथ-हाथ दे।।
लिखें नित्य अध्याय, लगन श्रम अनुबंधों के।
सहिष्णुता सद्भाव, स्नेहमय संबंधों के।।
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नयन अकर पर कर सकें, विग्रह सन्धि समास।
शब्दशक्तियाँ हैं सभी, मौन नयन के पास। - अशोक व्यग्र
मौन नयन के पास, छंद हैं गीत-ग़ज़ल भी।
मिथक-बिंब रस-राग, पुरातन संग नवल भी।।
मिलें अगर तो फेर न, तोड़ ना कभी भी वचन।
प्रवास न, वास करें, नयन में 'सलिल' नित नयन।।
२४.३.२०२६
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समरेंद्र कुमार मित्रा
समरेंद्र कुमार मित्रा (१४ मार्च १९१६-२६ सितंबर १९९८) वह भारतीय वैज्ञानिक और गणितज्ञ थे जिन्होंने १९५३ - ५४ में भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI) में भारत का पहला कंप्यूटर (एक इलेक्ट्रॉनिक एनालॉग कंप्यूटर) डिजाइन विकसित और निर्मित किया। मित्रा को कलकत्ता मैथमैटिकल सोसाइटी द्वारा भारत में कंप्यूटर के पिता के रूप में मान्यता दी गई थी। मित्रा भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI) में कम्प्यूटिंग मशीन और इलेक्ट्रॉनिक्स डिवीजन के संस्थापक और पहले प्रमुख थे।
समरेंद्र कुमार मित्रा (१४ मार्च १९१६-२६ सितंबर १९९८) वह भारतीय वैज्ञानिक और गणितज्ञ थे जिन्होंने १९५३ - ५४ में भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI) में भारत का पहला कंप्यूटर (एक इलेक्ट्रॉनिक एनालॉग कंप्यूटर) डिजाइन विकसित और निर्मित किया। मित्रा को कलकत्ता मैथमैटिकल सोसाइटी द्वारा भारत में कंप्यूटर के पिता के रूप में मान्यता दी गई थी। मित्रा भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI) में कम्प्यूटिंग मशीन और इलेक्ट्रॉनिक्स डिवीजन के संस्थापक और पहले प्रमुख थे।
हममें से कितने इन्हें पहचानते या इनके बारे में कुछ जानते हैं।
०००
ग़ज़लिका
परिवार
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चोट एक को, दर्द शेष को, जिनमें वे ही, हैं परिवार।
जहाँ रहें वे,उसी जगह हो, स्वर्ग करें सुख, सभी विहार।।
मेरा-तेरा, स्वार्थ नहीं हो, सबसे सबको, प्यार असीम।
सब सबका हित, रहें साधते, करें सभी का, सब उद्धार।।
नेह नर्मदा, रहे प्रवाहित, विमल सलिल की, धार अपार।
जो अवगाहे, वही सुखी हो, पाप मिटें सब, दें-पा प्यार।।
शूल फूल हों, पतझर सावन, दर्द हर्ष हो, संग न दूर।
हो मनभेद न, रहे एकता, मरुथल में भी, रहे बहार।।
मुझको वर दो, प्रभु बन पाए, मेरा भारत, घर-परिवार।
बने रवायत, जनसेवा कर, बने सियासत, हरि का द्वार।।
(मात्रिक सवैया, यति ८-८-८-७, पदांत गुरु लघु)
२४.३.२०२३
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दोहा
है भवि शुचि तो कीजिए, खुश रहकर आनंद.
'सलिल' जीव संजीव हो, रचकर गाए छंद.
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महीयसी महादेवी की अद्भुत होली
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हिंदी साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान रखनेवाली बुआ श्री (महीयसी महादेवी वर्मा) से जुड़े संस्मरण की शृंखला में इस बार होली चर्चा। बुआ श्री ने बताया था कि रंग पर्व पर भंग की तरंग में मस्ती करने में साहित्यकार भी पीछे नहीं रहते थे किंतु मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया जाता था। हिन्दू पंचांग के अनुसार होली बुआ श्री का जन्म दिवस भी है। प्रयाग राज (तब इलाहाबाद) में अशोक नगर स्थित बंगले में साहित्यकारों का जमघट दो उद्देश्यों की पूर्ति हेतु होता था। पहला महादेवी जी को जन्म दिवस की बधाई देना और दूसरा उनके स्नेह पूर्ण आतिथ्य के साथ साहित्यकारों की फागुनी रचनाओं का रसास्वादन कर धन्य होना। बुआ श्री होली की रात्रि अपने आँगन में होलिका दहन करती थीं। उसके कुछ दिन पूर्व से बुआश्री के साथ उनके मानस पुत्र डॉ. रामजी पांडेय का पूरा परिवार होली के लिए गुझिया, पपड़िया, सेव, मठरी आदि तैयार करा लेता था। एक एक पकवान इतनी मात्रा में बनता कि कई पीपों (कनस्तरों) और टोकनों में रखा जाता। होली का विशेष पकवान गुझिया (कसार की, खोवे की, मेवा की, नारियल चूर्ण की, चाशनी में पगी), सेव (नमकीन, तीखे, मोठे गुण की चाशनी में पगे), पपड़ी (बेसन की, माइडे की, मोयन वाली), खुरमे व मठरी, दही बड़ा, ठंडाई आदि आदि बड़ी मात्रा में तैयार करे जाते कि कम न हों।
होली खेलत रघुवीरा
सवेरा होते ही शहर के ही नहीं, अन्य शहरों से भी साहित्यकार आते, राई-नोन से उनकी नजर उतरी जाती, बुआ श्री स्वयं उन्हें गुलाल का टीका लगाकर आशीष देतीं। आगंतुक साहित्यिक महारथियों में आकर्षण का केंद्र होते महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, फिराक गोरखपुरी, सुमित्रानंदन पंत, डॉ. हरिवंशराय बच्चन, उमाकांत मालवीय, रघुवंश, अमृत राय, सुधा चौहान, कैलाश गौतम, एहतराम इस्लाम आदि आदि। साहित्यकारों पर किंशुक कुसुम (टेसू के फूल) उबालकर बनाया गया कुसुंबी रंग डाला जाता था। यह रंग भी बुआ श्री की देख-रेख में घर पर ही तैयार किया जाता था। क्लाइव रोड से बच्चन जी की अगुआई में एक टोली 'होली खेलत रघुवीरा, बिरज में होली खेलत रघुवीरा' आदि होली के लोक गीत गाते, झूमते मस्ताते हुए पहुँचती। बच्चन जी स्वयं बढ़िया ढोलक बजाते थे।
'बस करो भइया...'
महाप्राण निराला बुआ श्री को अपनी छोटी बहिन मानते थे, फिर होली पर बहिन से न मिलें यह तो हो ही नहीं सकता था। उनके व्यक्तित्व की दबंगई के कारण अनकहा अनुशासन बना रहता था। निराला विजय भवानी (भाँग) का सेवन भी करते थे। एक वर्ष अलीगंज स्थित निराला जी के घर कुछ साहित्यकार भाँग लेकर पहुच गए, निराला जी को ठंडाई में मिलाकर जमकर भाँग पिला दी गई। भाँग के नशे में व्यक्ति जो करता है करता ही चला जाता है। यह टोली जब महादेवी निवास पहुँची तो गुझिया बाँटी-खाई जा रही थीं। निराला जी ने गुझिया खाना आरभ किया तो बंद ही न करें, किसका साहस कि उन्हें टोंककर अपनी मुसीबत बुलाए। बुआ जी अन्य अतिथियों का स्वागत कर रही थी, किसी ने यह स्थिति बताई तो वे निराला जी के निकट पहुँचकर बोलीं- ''भैया! अब बस भी करो और लोग भी हैं, उन्हें भी देना है, गुझिया कम पड़ जाएँगी।'' निराला जी ने झूमते हुआ कहा- 'तो क्या हुआ? भले ही कम हो जाए मैं तो जी भर खाऊँगा, तुम और बनवा लो।'' उपस्थित जनों के ठहाकों के बीच फिर गुझिया खत्म होने के पहले ही फिर से बनाने का अनुष्ठान आरंभ कर दिया गया।
राम की शक्ति पूजा
एक वर्ष होली पर्व पर बुआ श्री के निवास पर पधारे साहित्यकारों ने निराला जी से उनकी प्रसिद्ध रचना ''राम की शक्ति पूजा'' सुनाने का आग्रह किया। निराला जी ने मना कर दिया। आग्रहकर्ता ने बुआ श्री की शरण गही। बुआ श्री ने खुद निराला जी से कहा- ''भैया! मुझे शक्ति पूजा सुना दो।'' निराला जी ने ''अच्छा, इन लोगों ने तुम्हें वकील बना लिया, तब तो सुनानी ही पड़ेगी। उन्होंने अपने ओजस्वी स्वर में समा बाँध दिया। सभी श्रोता सुनकर मंत्रमुग्ध हो गए।
खादी की साड़ी
महादेवी जी सादगी-शालीनता की प्रतिमूर्ति, निराला जी के शब्दों में 'हिंदी के विशाल मंदिर की वीणापाणी' थीं।वे खादी की बसंती अथवा मैरून बार्डर वाली साड़ी पहनती थीं। प्रेमचंद जी के पुत्र अमृत राय उन्हें प्रतिवर्ष जन्मदिन के उपहार स्वरूप खादी की साड़ी भेंट करते थे। उल्लेखनीय है कि अमृत राय का विवाह महादेवी जी की अभिन्न सखी सुभद्रा कुमारी चौहान की पुत्री सुधा चौहान के साथ बुआ श्री की पहल पर ही हुआ था।
बिटिया काहे ब्याहते
बुआ श्री अपने पुत्रवत डॉ. रामजी पाण्डेय के परिवार को अपने साथ ही रखती थीं। उनके निकटस्थ लोगों में प्रसिद्ध पत्रकार उमाकांत मालवीय भी रहे। रामजी भाई की पुत्री के विवाह हेतु स्वयं महादेवी जी ने पहल की तथा यश मालवीय जी को जामाता चुना। विवाह का निमात्रण पत्र भी बुआ श्री ने खुद ही लिखा था। वर्ष १९८६ में यश जी होली की सुबह अमृत राय जी के घर पहुँच गए, वहाँ भाग मिली ठंडाई पीने के बाद सब महादेवी जी के घर पहुँचे। जमकर होली खेल चुके यश जी का चेहरा लाल-पीले-नीले रंगों से लिपा-पूत था, उस पर भाग का सुरूर, हँसी-मजाक होते होते यश जी ने हँसना शुरू किया तो रुकने का नाम ही न लें, ठेठ ग्रामीण ठहाके। बुआ श्री ने स्वयं भी हँसते हुई चुटकी ली '' पहले जाना होता ये रूप-रंग है तो अपनी बिटिया काहे ब्याहते?''
बुआ श्री ने हमेश अपना जन्मोत्सव अंतरंग आत्मीय सरस्वती पुत्रों के के साथ ही मनाया। वे कभी किसी दिखावे के मोह में नहीं पड़ीं। होली का रंग पर्व किस तरह मनाया जाना चाहिए यह बुआ श्री के निवास पर हुए होली आयोजनों से सीखा जा सकता है।
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पैरोडी
'लेट इज बैटर दैन नेवर', कबहुँ नहीं से गैर भली
होली पर दिवाली खातिर धोनी और सब मनई के
मुट्ठी भर अबीर और बोतल भर ठंडाई ......
होली पर एगो ’भोजपुरी’ गीत रऊआ लोग के सेवा में ....
नीक लागी तऽ ठीक , ना नीक लागी तऽ कवनो बात नाहीं....
ई गीत के पहिले चार लाईन अऊरी सुन लेईं
माना कि गीत ई पुरान बा
हर घर कऽ इहे बयान बा
होली कऽ मस्ती बयार मे-
मत पूछऽ बुढ़वो जवान बा--- कबीरा स र र र र ऽ
अब हमहूँ७३-के ऊपरे चलत, मग्गर ३७ का हौसला रखत बानी ..
भोजपुरी गीत : होली पर....
कईसे मनाईब होली ? हो धोनी !
कईसे मनाईब होली..ऽऽऽऽऽऽ
बैटिंग के गईला त रनहू नऽ अईला
एक गिरउला ,तऽ दूसर पठऊला
कईसे चलाइलऽ चैनल चरचा
कोहली त धवन, रनहू कम दईला
निगली का भंग की गोली? हो धोनी !
मिलके मनाईब होली ?ऽऽऽऽऽ
ओवर में कम से कम चउका तऽ चाही
मौका बेमौका बाऽ ,छक्का तऽ चाही
बीस रनन का रउआ रे टोटा
सम्हरो न दुनिया में होवे हँसाई
रीती न रखियो झोली? हो राजा !
लड़ के मनाईब होली ?,ऽऽऽऽऽऽऽ
मारे बँगलदेसीऽ रह-रह के बोली
मुँहझँऊसा मुँह की खाऽ बिसरा ठिठोली
दूध छठी का याद कराइल
अश्विन-जडेजा? कऽ टोली
बद लीनी बाजी अबोली हो राजा
भिड़ के मनाईब होली ?,ऽऽऽऽऽऽऽ
जमके लगायल रे! चउआ-छक्का
कैच भयल गए ले के मुँह लटका
नानी स्टंपन ने याद कराइल
फूटा बजरिया में मटका
दै दिहिन पटकी सदा जय हो राजा
जम के मनाईब होली ?,ऽऽऽऽऽऽऽ
अरे! अईसे मनाईब होली हो राजा,
अईसे मनाईब होली...
२४.३.२०१६
***
सत श्लोकी दुर्गा
हिंदी भावानुवाद
•
शिव बोले- हो सुलभ भक्त को, कार्य नियंता हो देवी!
एक उपाय प्रयत्न मात्र है, कार्य-सिद्धि की कला यही।।
•
देवी बोलीं- सुनें देव हे!, कला साधना उत्तम है।
स्नेह बहुत है मेरा तुम पर, स्तुति करूँ प्रकाशित मैं।।
•
ॐ मंत्र सत् श्लोकी दुर्गा, ऋषि नारायण छंद अनुष्टुप।
देव कालिका रमा शारदा, दुर्गा हित हो पाठ नियोजित।।
•
ॐ चेतना ज्ञानी जन में, मात्र भगवती माँ ही हैं।
मोहित-आकर्षित करती हैं, मातु महामाया खुद ही।१।
•
भीति शेष जो है जीवों में, दुर्गा-स्मृति हर लेती,
स्मृति-मति हो स्वस्थ्य अगर तो, शुभ फल हरदम है देती।
कौन भीति दारिद्रय दुख हरे, अन्य न कोई है देवी।
कारण सबके उपकारों का, सदा आर्द्र चितवाली वे।२।
•
मंगलकारी मंगल करतीं, शिवा साधतीं हित सबका।
त्र्यंबका गौरी, शरणागत, नारायणी नमन तुमको।३।
•
दीन-आर्त जन जो शरणागत, परित्राण करतीं उनका।
सबकी पीड़ा हर लेती हो, नारायणी नमन तुमको।४।
•
सब रूपों में, ईश सभी की, करें समन्वित शक्ति सभी।
देवी भय न अस्त्र का किंचित्, दुर्गा देवि नमन तुमको।५।
•
रोग न शेष, तुष्ट हों तब ही, रुष्ट काम से, अभीष्ट सबका।
जो आश्रित वह दीन न होता, आश्रित पाता प्रेय अंत में।६।
•
सब बाधाओं को विनाशतीं, हैं अखिलेश्वरी तीन लोक में।
इसी तरह सब कार्य साधतीं, करें शत्रुओं का विनाश भी।७।
•••
चित्रगुप्त-रहस्य
*
चित्रगुप्त पर ब्रम्ह हैं, ॐ अनाहद नाद
योगी पल-पल ध्यानकर, कर पाते संवाद
निराकार पर ब्रम्ह का, बिन आकार न चित्र
चित्र गुप्त कहते इन्हें, सकल जीव के मित्र
नाद तरंगें संघनित, मिलें आप से आप
सूक्ष्म कणों का रूप ले, सकें शून्य में व्याप
कण जब गहते भार तो, नाम मिले बोसॉन
प्रभु! पदार्थ निर्माण कर, डालें उसमें जान
काया रच निज अंश से, करते प्रभु संप्राण
कहलाते कायस्थ- कर, अंध तिमिर से त्राण
परम आत्म ही आत्म है, कण-कण में जो व्याप्त
परम सत्य सब जानते, वेद वचन यह आप्त
कंकर कंकर में बसे, शंकर कहता लोक
चित्रगुप्त फल कर्म के, दें बिन हर्ष, न शोक
मन मंदिर में रहें प्रभु!, सत्य देव! वे एक
सृष्टि रचें पालें मिटा, सकें अनेकानेक
अगणित हैं ब्रम्हांड, है हर का ब्रम्हा भिन्न
विष्णु पाल शिव नाश कर, होते सदा अभिन्न
चित्रगुप्त के रूप हैं, तीनों- करें न भेद
भिन्न उन्हें जो देखता, तिमिर न सकता भेद
पुत्र पिता का पिता है, सत्य लोक की बात
इसी अर्थ में देव का, रूप हुआ विख्यात
मुख से उपजे विप्र का, आशय उपजा ज्ञान
कहकर देते अन्य को, सदा मनुज विद्वान
भुजा बचाये देह को, जो क्षत्रिय का काम
क्षत्रिय उपजे भुजा से, कहते ग्रन्थ तमाम
उदर पालने के लिये, करे लोक व्यापार
वैश्य उदर से जन्मते, का यह सच्चा सार
पैर वहाँ करते रहे, सकल देह का भार
सेवक उपजे पैर से, कहे सहज संसार
दीन-हीन होता नहीं, तन का कोई भाग
हर हिस्से से कीजिये, 'सलिल' नेह-अनुराग
सकल सृष्टि कायस्थ है, परम सत्य लें जान
चित्रगुप्त का अंश तज, तत्क्षण हो बेजान
आत्म मिले परमात्म से, तभी मिल सके मुक्ति
भोग कर्म-फल मुक्त हों, कैसे खोजें युक्ति?
सत्कर्मों की संहिता, धर्म- अधर्म अकर्म
सदाचार में मुक्ति है, यही धर्म का मर्म
नारायण ही सत्य हैं, माया सृष्टि असत्य
तज असत्य भज सत्य को, धर्म कहे कर कृत्य
किसी रूप में भी भजे, हैं अरूप भगवान्
चित्र गुप्त है सभी का, भ्रमित न हों मतिमान
२४.३.२०१४
***