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बुधवार, 1 अप्रैल 2009

ग़ज़ल -- रसूल अहमद 'सागर'

हमें अपने वतन में आजकल अच्छा नहीं लगता.
हमारा देश जैसा था हमें वैसा नहीं लगता.

मेरी ममता के महलों को किया खंडहर विद्वेषों ने.
यहाँ थी प्रेम की बस्ती कभी ऐसा नहीं लगता.

भुलाये हमने सब आदर्श सीता-राम-लक्ष्मण के
हमारा आचरण रघुवंश के घर का नहीं लगता.

मिलन के नाम पर त्यौहार और उत्सव नहीं होते.
सभी धर्मों के सम्मलेन का अब मेला नहीं लगता.

कि जिनकी एक-इक रग में भरा है ज़हर नफरत का.
उन्हीं लोगों को अमृत प्रेम का मीठा नहीं लगता.

दिया विश्वास ने धोखा भरोसा घात कर बैठा.
हमारा खून भी 'सागर' हमें अपना नहीं लगता.

छंद: सुघोष (कोकिल- मूल अश्त्पदीय)
सूत्र: तगन गन गन - चार आवृत्ति
बहर; हजज सालिम मुसम्मन सालिम
अरकान: मफाईलुन - चार बार

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