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शुक्रवार, 25 मार्च 2011

अष्टावक्र गीता काव्यानुवाद --मृदुल कीर्ति

 
काव्यानुवाद : मृदुल कीर्ति  
   संग्रह —
अष्टावक्र गीता / मृदुल कीर्ति
यह देह , मन ,बुद्धि ,अहम् भ्रम जाल किंचित सत नहीं ,
पर कर्म कर कर्तव्य वत्बिन चाह फल के , रत नहीं .[1]
अब तेरी चेष्टाएं सब प्रारब्ध के आधीन हैं
कर्म रत पर मन विरत , चित्त राग द्वेष विहीन हैं [ २ ]
पर रूप में जो अरूप है , वही सत्य ब्रह्म स्वरूप है
दृष्टव्य अनुभव गम्य जो , तेरे भाव के अनुरूप है. [ ३ ]
तू शुद्ध , बुद्ध, प्रबुद्ध , चिन्मय आत्मा चैतन्य है .
बोध रूप अरूप ब्रह्म का , तत्व है तू धन्य है . [ ४ ]
यह तू है और मैं का विभाजन , अहम् मय अभिमान है ,
व्यक्तिव जब अस्तित्व में मिल जाए तब ही विराम है , [ ५ ]
निर्जीव होने से प्रथम , निर्बीज यदि यह जीव है
उन्मुक्त , मुक्त विमुक्त , यद्यपि कर्मरत है सजीव है . [ ६ ]
अनेकत्व से एकत्व का , जब बोध उदबोधन हुआ ,
बस उसी पल आत्मिक जीवन का संशोधन हुआ , [ ७ ]
विक्षेप मन चित , देह और संसार के निःशेष हैं ,
सर्वोच्च स्थिति आत्मज्ञान में आत्मा ही शेष है . [ ८ ]
ब्रह्माण्ड में चैतन्य की ही ऊर्जा है , विधान है ,
निर्जीव रह निर्बीज कर , यही मूल ज्ञान प्रधान है [ ९ ]
जनक उवाचः

हे ईश ! मानव ज्ञान कैसे , प्राप्त कर सकता अहो !
हमें मुक्ति और वैराग्य कैसे , मिल सकें कृपया कहो [ १ ]

अष्टावक्र उवाचः
प्रिय तात यदि तू मुमुक्ष, तज विषयों को ,जैसे विष तजें,
सन्तोष, करूणा सत, क्षमा, पीयूष वत नित -नित भजें . [ २ ]

न ही वायु, जल, अग्नि, धरा और न ही तू आकाश है,
मुक्ति हेतु साक्ष्य तू, चैतन्य रूप प्रकाश है . [ ३ ]

यदि पृथक करके देह भाव को, देही में आवास हो
तब तू अभी सुख शांति, बन्धन मुक्त भव, विश्वास हो .[ ४ ]

वर्ण आश्रम का न आत्मा, से कोई सम्बन्ध है,
आकार हीन असंग केवल, साक्ष्य भाव प्रबंध है . [ ५ ]

सुख दुःख धर्म - अधर्म मन के, विकार हैं तेरे नहीं,
कर्ता, कृतत्त्व का और भर्ता भाव भी घेरे नहीं . [ ६ ]

सर्वस्व दृष्टा एक तू , और सर्वदा उन्मुक्त है ,
यदि अन्य को दृष्टा कहे, भ्रम, तू ही बन्धन युक्त है . [ ७ ]

तू अहम् रुपी सर्प दंषित, कह रहा कर्ता मैं ही ,
विश्वास रुपी अमिय पीकर कह रहा, कर्ता नहीं . [ ८ ]

मैं सुध, बुद्ध, प्रबुद्ध, चेतन, ज्ञानमय चैतन्य हूँ,
अज्ञान रुपी वन जला कर, ज्ञान से मैं धन्य हूँ . [९ ]

सब जगत कल्पित असत, रज्जु मैं सर्प का आभास है
इस बोध का कारण कि तुझमें, भ्रम का ही वास है .[१०]

प्रथम प्रकरण / श्लोक 11-20 / मृदुल कीर्ति

 
अष्टावक्र उवाचः
जो मुक्त माने ,मुक्त स्व को, बद्ध माने बद्ध है,
जैसी मति वैसी गति, किवंदंती ऐसी प्रसिद्ध है.---११

परिपूर्ण,पूर्ण है, एक विभु, चैतन्य साक्षी शांत है,
यह आत्मा निःस्पृह विमल , संसारी लगती भ्रांत है .---१२

यह देह मन बुद्धि अहम्, ममकार , भ्रम, है अनित्य हैं,
कूटस्थ बोध अद्वैत निश्चय , आत्मा ही नित्य है.---१३

बहुकाल से तू देह के अभिमान में आबद्ध है,
कर ज्ञान रूपी अरि से बेधन, नित्य तब निर्बद्ध है.---१४

निष्क्रिय निरंजन स्व प्रकाशित , आत्म तत्व असंग है,
तू ही अनुष्ठापित समाधी, कर रहा क्या विसंग है.---१५

यह विश्व तुझमें ही व्याप्त है, तुझमें पिरोया सा हुआ,
तू वस्तुतः चैतन्य, सब तुझमें समाया सा हुआ.---१६

निरपेक्ष अविकारी तू ही, चिर शान्ति मुक्ति का मूल है,
चिन्मात्र चिद्घन रूप तू, चैतन्य शक्ति समूल है .---१७

देह मिथ्या आत्म तत्व ही , नित्य निश्चल सत्य है ,
उपदेश यह ही यथार्थ, जग आवागमन, से मुक्त है.---१८

ज्यों विश्व में प्रतिबिम्ब अपने रूप का ही वास है,
त्यों बाह्य अंतर्देह में, परब्रह्म का आवास है.---१९

ज्यों घट में अन्तः बाह्य स्थित सर्वगत आकाश है,
त्यों नित निरंतर ब्रह्म का सब प्राणियों में प्रकाश है.---२०

द्वितीय प्रकरण / श्लोक 1-12 / मृदुल कीर्ति

बोधस्वरूपी मैं निरंजन , शांत प्रकृति से परे,
ठगित मोह से काल इतने , व्यर्थ संसृति में करे.----१

ज्यों देह देही से प्रकाशित, जगत भी ज्योतित तथा,
या तो जगत सम्पूर्ण या कुछ भी नहीं मेरा यथा .----२

इस देह में ही विदेह जग से त्याग वृति आ गई
आश्चर्य ! कि पृथकत्व भाव से ब्रह्म दृष्टि भा गई ----३

ज्यों फेन और तरंग में , जल से न कोई भिन्नता,
त्यों विश्व ,आत्मा से सृजित , तद्रूप एक अभिन्नता ----४

ज्यों तंतुओं से वस्त्र निर्मित, तन्तु ही तो मूल हैं.
त्यों आत्मा रूपी तंतुओं से, सृजित विश्व समूल हैं.----५

ज्यों शर्करा गन्ने के रस से ही विनिर्मित व्याप्त है,
त्यों आत्मा में ही विश्व , विश्व में आत्मा भी व्याप्त है.----६

संसार भासित हो रहा, बिन आत्मा के ज्ञान से,
ज्यों सर्प भासित हो रहा हा,रज्जू के अज्ञान से.----७

ज्योतिर्मयी मेरा रूप मैं, उससे पृथक किंचित नहीं ,
जग आत्मा की ज्योति से ,ज्योतित निमिष वंचित नहीं ----८

अज्ञान- से ही जगत कल्पित , भासता मुझमें अहे,
रज्जू में ,अहि सीपी में चांदी , रवि किरण में जल रहे .-----९

माटी में घट जल में लहर , लय स्वर्ण भूषन में रहे ,
वैसे जगत मुझसे सृजित , मुझमें विलय कण कण अहे.----१०

ब्रह्मा से ले पर्यंत तृण, जग शेष हो तब भी मेरा,
अस्तित्व, अक्षय , नित्य, विस्मय, नमन हो मुझको मेरा.---११

मैं देहधारी हूँ, तथापि अद्वैत हूँ, विस्मय अहे,
आवागमन से हीन जग को व्याप्त कर स्थित महे.-----१२
 
मुझको नमन आश्चर्यमय ! मुझसा न कोई दक्ष है.
स्पर्श बिन ही देह धारूँ, जगत क्या समकक्ष है.------१३

मैं आत्मा आश्चर्य वत हूँ , स्वयं को ही नमन है,
या तो सब या कुछ नहीं, न वाणी है न वचन है.------१४

जहाँ ज्ञेय, ज्ञाता,ज्ञान तीनों वास्तविकता मैं नहीं,
अज्ञान- से भासित हैं केवल, आत्मा सत्यम मही.------१५

चैतन्य रस अद्वैत शुद्ध,में,आत्म तत्व महिम मही,
द्वैत दुःख का मूल, मिथ्या जगत, औषधि भी नहीं.-----१६

अज्ञान- से हूँ भिन्न कल्पित, अन्यथा मैं अभिन्न हूँ,
मैं निर्विकल्प हूँ, बोधरूप हूँ, आत्मा अविछिन्न हूँ.------१७

में बंध मोक्ष विहीन, वास्तव में जगत मुझमें नहीं,
हुई भ्रांति शांत विचार से, एकत्व ही परमं मही.-------१८

यह देह और सारा जगत, कुछ भी नहीं चैतन्य की,
एक मात्र सत्ता का पसारा, कल्पना क्या अन्य की -----१९

नरक, स्वर्ग, शरीर, बन्धन, मोक्ष भय हैं, कल्पना,
क्या प्रयोजन आत्मा का, चैतन्य का इनसे बना.----२०

हूँ तथापि जन समूहे, द्वैत भाव न चित अहो,
एकत्व और अरण्य वत, किसे दूसरा अपना कहो.----२१

न मैं देह न ही देह मेरी, जीव भी में हूँ नहीं,
मात्र हूँ चैतन्य, मेरी जिजीविषा बन्धन मही.-----२२

मैं महोदधि, चित्त रूपी पवन भी मुझमें अहे,
विविध जग रूपी तरंगें, भिन्न न मुझमें रहे .----२३

मैं महोदधि चित्त रूपी, पवन से मुझमें मही,
विविध जगरूपी तरंगें, भाव बन कर बह रहीं .----२४

मैं महोदधि, जीव रूपी, बहु तरंगित हो रहीं,
ज्ञान से मैं हूँ यथावत, न विसंगति हो रही.-----२५

तृतीय प्रकरण / श्लोक 1-7 / मृदुल कीर्ति
 
अद्वैत आत्मिक अमर तत्व से, सर्वथा तुम् विज्ञ हो,
क्यों प्रीति, संग्रह वित्त में, ऋत ज्ञान से अनभिज्ञ हो.---१

ज्यों सीप के अज्ञान से,चांदी का भ्रम और लोभ हो,
त्यों आत्मा के अज्ञान से,भ्रमित मति, अति क्षोभ हो.----२

आत्मा रूपी जलधि में, लहर सा संसार है,
मैं हूँ वही, अथ विदित, फ़िर क्यों दीन, हीन विचार हैं.------३

अति सुन्दरम चैतन्य पावन, जानकर भी आत्मा,
अन्यान्य विषयासक्त यदि,तू मूढ़ है, जीवात्मा.-------४

आत्मा को ही प्राणियों में,आत्मा में प्राणियों
आश्चर्य !ममतासक्त मुनि, यह जान कर भी ज्ञानियों.-----५

स्थित परम अद्वैत में, तू शुद्ध, बुद्ध, मुमुक्ष है,
आश्चर्य ! है यदि तू अभी, विषयाभिमुख कामेच्छु है.-----६

काम रिपु है ज्ञान का, यह जानते ऋषि जन सभी,
आश्चर्य ! कामासक्त हो सकता है मरणासन्न भी.------७
 
 
 
 
विरत नित्यानित विवेचक, भोग हैं निरपेक्ष में,
आश्चर्य ! है यद्यपि मुमुक्षु , भय तथापि मोक्ष में.-----८

ज्ञानी जन तो भोग पीडा , भाव में समभाव हैं,
हर्ष क्रोध का आत्मा ,पर कोई भी न प्रभाव है.----९

देह में वैदेह ऋत अर्थों में ,है ज्ञानी वही,
हों भाव सम निंदा प्रसंशा , में कोई अन्तर नहीं . ------१०

अज्ञान जिसका शेष, ऐसा धीर इस संसार को,
मात्र माया मान, तत्पर मृत्यु के सत्कार को.-----११

इच्छा रहित मन मोक्ष में भी, महि महिम महिमा महे,
उस आत्म ज्ञानी से तृप्त जन की, साम्यता किससे अहे.----१२

धीर ज्ञानी जानता है, जगत छल है प्रपंच है,
ग्रहण त्याग से मन परात्पर, न रमे कहीं रंच है.-----१३

वासना के कषाय कल्मष, जिसने अंतस से तजे,
निर्द्वंद दैविक सुख या दुःख, पर शान्ति अंतस में सजे.-----१४
 
 
आत्म ज्ञानी धीर जन के, कर्म अतिशय गूढ़ हैं,
जग लिप्त जन से साम्यता, किंचित करें वे मूढ़ हैं.----१

देवता इन्द्रादि भी, इच्छुक हैं जिस पद को मही,
स्थित उसी पद पर अहो! योगी को किंचित मद नहीं.-----२

निर्लिप्त अंतस पाप -पुण्य से, आत्म ज्ञानी का रहे,
ज्यों गगन का धूम से ,सम्बन्ध किंचित न रहे.------३

विश्वात्मा के रूप में, देखा जगत जिस संत ने,
उसे कोई इच्छित कार्य से, नहीं रोक सकता अनंत में.------४

ब्रह्मा से पर्यंत चींटी, चार जीव प्रकार हैं,
बस विज्ञ को इच्छा अनिच्छा, त्याग पर अधिकार है.-------५

है आत्मा परमात्म मय, कोई विरला जानता,
ज्ञानी ही निर्द्वंद केवल कर सके जो ठानता .--------६
 
अष्टावक्र उवाचः
नहीं संग है तेरा किसी से, शुद्ध तू चैतन्य है,
त्याज्य, तन अभिमान ताज दे, मोक्ष पा तू अनन्य है.-----१

तुझसे निःसृत संसार, जैसे जलधि से हो बुलबुला
आत्मा के एकत्व बोध से, मोक्ष शान्ति पथ खुला.------२

दृश्य जग प्रत्यक्ष किंतु , रज्जू सर्प प्रतीत है,
चैतन्य पर तेरी आत्म तत्व में, सत्य दृढ़ प्रतीति है.----३

आशा-निराशा , दुःख -सुख, जीवन -मरण समभाव हैं,
ब्रह्म -दृष्टि, प्रज्ञ स्थित, पर न इसका प्रभाव है.------४
 
अष्टावक्र उवाचः
घटवत जगत, प्रकृति निःसृत आकाश वाट में अनंत है,
अतः इसके ग्रहण त्याग और लय में भी निश्चिंत है.-------१

में समुद्र सदृश्य हूँ, यह जग तरंगों तुल्य है,
अतः इसके ग्रहण, लय और त्याग का क्या मूल्य है.------२

सीपवत मैं हूँ यथा जग में रजत सम भ्रान्ति है,
अतः इसको ग्रहण लय न त्याग, ज्ञान ही, शान्ति है.------३

में आत्मा अद्वैत व्यापक , प्राणियों का मूल हूँ,
अतः इसके ग्रहण लय और त्याग में निर्मूल्य हूँ.------४
 
मुझ अनंत महोदधि में, विश्व रूपी नाव जो,
मन स्वरूपी पवन विचलित, पर न मैं सम्भव जो.------१

मुझ अनंत महोदधि में, जग कल्लोल स्वभाव जो,
उदय, चाहे अस्त, अब मैं वृद्धि क्षय, समभाव जो.-----२

मैं अनंत महोदधि , जग कल्पना निःसार है,
अब शांत, मैं स्थित अवस्था, में न कोई विकार है .----३

आसक्ति विषयों के प्रति, मन देह की मेरी नहीं,
आत्मज्ञ , मुक्त हूँ स्पृहा से, विषयों की चेरी नहीं.------४

आश्चर्य ! मैं चैतन्य और यह विश्व मात्र प्रपंच है,
अतः जग की लाभ हानि मैं, रूचि नहीं रंच है.-----५
 
कुछ त्यागता कुछ ग्रहण करता, मन दुखित हर्षित कभी,
यही भाव मन के विकार , बंधन युक्त हैं, बंधित सभी.--------१

न ही ग्रहण, न ही त्याग , दुःख से परे मन मोक्ष है,
एक रस मन की अवस्था, सर्वदा निरपेक्ष है.-----२

मन लिप्त होता जब कहीं, तो बंध बंधन हेतु है,
निर्लिप्त होता जब वही मन , मोक्ष का मन सेतु है.-----३

"मैं" भाव ही बंधन महत, " मैं " का हनन ही मोक्ष है,
त्याग और ग्रहण से हो परे मन, तब मनन निरपेक्ष है.----------४
 
अष्टावक्र उवाचः
कर्म कृत और अकृत दुःख - सुख, शांत कब किसके हुए
त्यक्त वृति, अव्रती चित्त, निरपेक्ष हैं जिनके हिये.-----१

उत्पत्ति और विनाश धर्मा तात ! विश्व नितांत है,
जगत के प्रति जिजीविषा, नहीं संत की भी शांत है.-----२

त्रैताप दूषित, हेय, निन्दित , जगत केवल भ्रान्ति है,
त्यक्त है, निःसार जग को, त्यागने में शान्ति है.-----३

वह अवस्था काल कौन सी, जब मनुज निर्द्वंद हो,
सुलभ से संतुष्ट, सिद्धि पथ चले , स्वच्छंद हो.------४

बहु मत मतान्तर योगियों की, मति भ्रमित करते यथा,
अध्यात्म और वैरागियों की, शान्ति भंग करें तथा.-----५

प्रारब्ध के अनुसार तेरी, देह गति व्यवहार है,
तू वासनाएं सकल तज दे, वासना संसार है.------६

जब इन्द्रियों ही इन्द्रियों में, देह वर्ते देह में,
तत्काल बंधन मुक्त प्राणी, आत्मा निज गह में.-----७

हेय तात ! तज दे वासनाएं, वासना संसार है,
कृत कर्म अब जो भी करे, प्रारब्ध का ही प्रकार है.-----८
 
 
सब अनर्थों का मूल कारण, अर्थ है और काम है,
इनकी उपेक्षा मूल धर्म है, कर्म में निष्काम है.------१

धन, मित्र, क्षेत्र , निकेत, स्त्री, बंधु स्वप्न समान हैं,
इन्द्र जाल समान, पाँच या तीन दिन के विधान हैं.-----२

जिस वस्तु में इच्छा बसे , समझो वहां संसार है,
वैराग्य भाव प्रधान चित्त से,जान सब निःसार है.------३

संसार तृष्णा रूप है,तृष्णा जहों संसार है,
वैराग्य आश्रय हो मना, तृष्णा रहित सुख सार है.-----४

यह अविद्या भी असत और असत जड़ संसार है,
चैतन्य रूप विशुद्ध, तुझको तो जगत निःसार है.-----५

देह, नारी, राज्य, सुत आसक्त जन के सुख सभी,
हर जनम में मरण धर्मा, नष्ट ये होंगे सभी.-----६

धर्म, अर्थ, और काम हित, बहु कर्म तो कितने किए,
जगत रुपी वन में तो भी, शान्ति हित भटके हिये.-----७

देह, मन, वाणी से श्रम, दुःख पूर्ण बहु तूने किए,
उपराम कर अब तो तनिक, विश्रांति चित हिय में किए.-----८

1 टिप्पणी:

Divya Narmada ने कहा…

अष्टावक्र गीता

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