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गुरुवार, 15 जनवरी 2015

navgeet: - sanjiv

अभिनव प्रयोग:
नवगीत 
संजीव 
. 


जब लौं आग न बरिहै तब लौं, 
ना मिटहै अंधेरा
सबऊ करो कोसिस मिर-जुर खें 
बन सूरज पगफेरा 
. 

कौनौ बारो चूल्हा-सिगरी  
कौनौ ल्याओ पानी 
रांध-बेल रोटी हम सेंकें 
खा रौ नेता ग्यानी 
झारू लगा आज लौं काए 
मिल खें नई खदेरा 
. 
दोरें दिखो परोसी दौरे 
भुज भेंटें बम भोला 
बाटी भरता चटनी गटखें 
फिर बाजे रमतूला 
गाओ राई, फाग सुनाओ
जागो, भओ सवेरा 
. 
(बुंदेलों लोककवि ईसुरी की चौकड़िया फाग की तर्ज़ पर प्रति पर मात्रा १६-१२)
facebook: sahiyta salila / sanjiv verma 'salil' 

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