सलिल सृजन अगस्त ३०
*
संजय
०
संजय जो देखे
वह सच कह
सब जग को
करता आगाह।
कोई गैर न,
सब अपने हैं,
अपनापन ही
सबकी चाह।
सुख कर वितरित
दुख समेट लो,
बेहतर हो
जीवन की राह।
हर तन-मन में
प्रभु का डेरा,
कौन इस सके
किसकी थाह?
*
विमर्श:
पुस्तक समीक्षा
०
पुस्तक समीक्षा हमेशा कथ्य को केंद्र में रखकर होनी चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं होता। अक्सर देखने को मिलता है कि समीक्षक लेखक की पहचान, राजनीतिक विचारधारा, निजी संबंध आदि को केंद्र में रखकर समीक्षा लिखते हैं। यहाँ तक कि स्वयं दर्शक बनकर अपनी निजी भावनाओं को केंद्र में रखकर भी समीक्षा लिखी जाती है।
नतीजा यह है कि किसी पुस्तक के विमोचित होने के बाद हम जो चर्चाएँ पढ़ते हैं, उनमें से अधिकांश में यही बातें होती हैं- पुस्तक के लेखक व पात्र कौन हैं, प्रकाशन किसका है, कितने पृष्ठों की है, आवरण कैसा है, छपाई कैसी हुई है, पुस्तक में क्या कहा गया है आदि लेकिन पुस्तक की विधा के मानकों, भाषा शैली, मौलिकता, विषय पर पूर्व कृतियों, प्रामाणिकता, समाज को संदेश आदि पक्षों पर चर्चा बहुत कम होती है।
भारत में पुस्तक समीक्षा के क्षेत्र में प्रचलित ५ प्रमुख प्रवृत्तियाँ हैं।
१. भावनात्मक समीक्षा: इस तरह की समीक्षा का मुख्य विषय भावना होती है। समीक्षक पुस्तक पढ़कर रोया, हँसा, भावुक हुआ, पुरानी यादों में खो गया, आश्चर्यचकित हुआ, देशभक्ति से अभिभूत हुआ या पुस्तक को अपनी किसी निजी स्मृति से जोड़ दिया, यही समीक्षा का आधार बन जाता है। ऐसी समीक्षा में समीक्षक लिखता है “मैं पुस्तक पढ़कर रो पड़ा।”, ''ऐसी पुस्तक पहले कभी नहीं लिखी गई।”, “इस पुस्तक ने भूला समय याद दिल दिया।” आदि।
भावना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। लेकिन जब भावना ही विश्लेषण का एकमात्र साधन बन जाती है, तब पुस्तक के कथ्य पर चर्चा पृष्ठभूमि में चली जाती है।
२. लोकप्रिय समीक्षा: सोशल मीडिया के दौर में यह सबसे शक्तिशाली प्रवृत्ति है। ऐसी समीक्षा का उद्देश्य पुस्तक को समझना नहीं, बल्कि तेजी से एक राय बनाना होता है। जरूर पढ़ें, अद्वितीय, निरर्थक, साधुवाद, कालजयी आदि शब्द ही समीक्षा की भाषा बन जाते हैं। एकाएक अपनी निर्णय सुनाकर पाठकों को प्रभावित करने की प्रवृत्ति बढ़ गई है। ऐसी स्थिति में पुस्तक समीक्षा सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म पर निर्भर हो जाती है, जितने अधिक शेयर और व्यू, उतना अधिक प्रचार और उतनी ही अधिक स्वीकार्यता। कुछ पत्रकार या समीक्षक पैसे लेकर पुस्तक के प्रचार के हिस्से के रूप में इस तरह की समीक्षाएँ करते हैं। कई बार गहरे विश्लेषण की तुलना में तत्काल प्रतिक्रिया को दर्शक तैयार करने के हथियार के रूप में अधिक महत्व दिया जाता है। कभी-कभी पाठक भी पुस्तक पढ़ने से पहले समीक्षा नहीं, बल्कि फैसला चाहते हैं।
३. पत्रकारिता-आधारित समीक्षा: पत्र-पत्रिकाओं और और ऑनलाइन पोर्टलों में प्रकाशित समीक्षाओं का एक बड़ा हिस्सा इस श्रेणी में आता है।इन समीक्षाओं में पुस्तक से जुड़ी विभिन्न जानकारियाँ- कथ्य क्या है, पात्र कौन-कौन हैं, विषय विश्लेषण कैसा था, विमोचन की तारीख क्या है, पाठकों की प्रतिक्रिया कैसी है, लेखक का क्या कहना है आदि को प्राथमिकता दी जाती है। समस्या यह है कि इस तरह की समीक्षा वास्तव में पुस्तक समीक्षा नहीं, बल्कि सूचना संग्रह मात्र है। सूचना महत्वपूर्ण है, लेकिन क्या सूचना और समीक्षा एक ही चीज हैं?
४. भक्ति समीक्षा: संभवतः यह समीक्षा की सबसे खतरनाक प्रवृत्ति है। इसमें समीक्षक वास्तव में समीक्षक नहीं होता, बल्कि लेखक का एक प्रशंसक होता है। उसके पसंदीदा लेखक कुछ भी लिखे, वह समीक्षक को पढ़ने से पहले से ही असाधारण प्रतीत होता है। समीक्षक को कृति में अच्छाई के अलावा बुराई कभी दिखाई नहीं देती। ऐसी समीक्षा में खामियाँ नजर नहीं आतीं, कमजोरियों का उल्लेख नहीं किया जाता और सवाल नहीं उठाए जाते। इसके बजाय समीक्षा की भाषा केवल प्रशंसा की भाषा बन जाती है। कई बार यह सांस्कृतिक जनसंपर्क का काम करती है। भक्ति-आधारित समीक्षा साहित्य जगत के विकास में बड़ी बाधा पैदा करती है, क्योंकि लेखक को फिर यह एहसास ही नहीं होता कि उसमें सुधार की कोई जरूरत है।
५. गुरु-विद्या समीक्षा: इसमें किसी पुस्तक का मूल्यांकन इस सवाल के आधार पर किया जाता है कि वह किस साहित्य-गुरु की नकल करके लिखी गई है, किस विचार-धारा का अनुसरण करती है, किस स्थापित वाद के पक्ष में जाती है या किस विदेशी सिद्धांत से मेल खाती है। इस तरह की समीक्षा में अक्सर उद्धरणों की संख्या अधिक होती है। निराला, महादेवी, हजारी प्रसाद द्विवेदी, नामवर सिंह, या किसी अन्य प्रतिष्ठित साइटीकार कार का नाम ले लेने भर से मानो विश्लेषण पूरा हो जाता है। ज्ञान निश्चित रूप से आवश्यक है लेकिन जब ज्ञान पुस्तक और समीक्षा को प्रकाशित करने के बजाय उसे ढकने लगे, तब वह समीक्षा नहीं रहती, बल्कि विद्वता का प्रदर्शन बन जाती है।
तो फिर आवश्यकता किस चीज की है?
सबसे अधिक आवश्यकता पुस्तक के कथ्य और भाषा पर आधारित समीक्षा की है, जिसमें पुस्तक को पुस्तक के रूप में देखा और विश्लेषित किया जाए। किसी अंश विशेष ने प्रभाव क्यों पैदा किया?, किसी घटना ने क्या भाव संप्रेषित किया?
लेखकीय विश्लेषण ने प्रसंग के कौन-कौन से पहलू उद्घाटित किए? शब्दों ने पाठकों के साथ कैसा संबंध बनाया?, पारिस्थितिक वर्णन ने दर्शक को किस नैतिक दृष्टिकोण पर खड़ा किया? चरित्र चित्रण ने किस प्रकार की सामाजिक वास्तविकता को व्यक्त किया?
इन सवालों के बिना फिल्म समीक्षा पूर्ण नहीं हो सकती। समीक्षा साहित्य के साथ एक गहरा संवाद है। साहित्य समीक्षा बेहद महत्वपूर्ण विधा है। पुस्तक की भाषा, कथ्य, घटना क्रम, शब्दों में अंतर्निहित भावों की लय, लेखक का दृष्टिकोण या वैचारिक स्थिति जैसे विषयों पर समीक्षाओं में चर्चा बहुत कम दिखाई देती है।
आखिर में सवाल यह है कि आलोचना का अर्थ निराधार निंदा करना नहीं है और न ही अंधी प्रशंसा करना। आलोचना साहित्य के साथ एक गहरा संवाद है। जिस समाज में आलोचना कमजोर होती है, उस समाज में साहित्य भी कमजोर हो जाता है। समय आ गया है कि हम भावना, लोकप्रियता, पत्रकारिता, भक्ति और गुरु-विद्या से आगे बढ़ें और साहित्य को उसकी अपनी भाषा में पढ़ना सीखें।
अंतिम सवाल बहुत सरल है—
क्या हम वास्तव में साहित्य पढ़ते हैं, या पुस्तक के हर पात्र या प्रसंग मरण में खुद को ही खोजते रहते हैं?
३०.८.२०२६
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दोहा सलिला
रोकर कष्ट न दीजिए, उन्हें गए जो दूर।
आप सदा हँसते रहें, जी चाहा भरपूर।।
*
अभिनव प्रयोग
(संरचना सॉनेट, छंद हरिगीतिका)
हरतालिका
*
हरतालिका व्रत जो करे, शिव की कृपा उसको मिले
मन चाहता जिसको वही, हर जन्म में मनमीत हो
खुश हों उमा गणदेव भी, तन स्वस्थ हो मन भी खिले
व्रत कीजिए शुभकामना रख, प्रीत की तब जीत हो
कर थामिए जिसका उसे, कर दें थमा रख साथ में
जल पीजिए; मत पीजिए पर याद प्रभु को कीजिए
पग साथ ही रखिए सदा, हँस हाथ भी रख हाथ में
मन में रखें शुभ भावना, नित प्रेम रस में भीजिए
मतभेद दे तज द्वैत भी; रख ऐक्य भाव सदा सखे!
कुछ ऊँच हो; कुछ नीच हो, कुछ धूप हो; कुछ छाँव हो
यह प्रार्थना प्रभु जी सुनें, नित साथ ही हमको रखे
कुछ हो; न हो; मन में सदा, शिव औ' शिवा तव ठाँव हो
जब हों बिदा; तन से जुदा, भव को तजें हम नाथ हे!
तब आइए इस आत्म को, परमात्म लें हँस साथ में
***
निमाड़ी दोहा सलिला
*
सिंदूरी सुभ भोर छे, चटक दुपैरी धूप।
रंगीली संझा सरस, रातs सुहाणो रूप।।
*
खेती बाड़ी बावड़ी, अमरित पाणी सीच
ठुमके पर ओरावणी, नाच सयाणी मीच
*
सूनी गोद भरावणी, संजा चारइ पूज
बरसूद् या खs लावणी, हिवड़ा कहीं न दूज
*
दाणी मइया नरबदा, पाणी अमरित धार
धाणी गऊँ जुआर दs, माणी जीवन सार
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घड़ी-घड़ी खम्माघणी, अमर प्यार के बोल
परिकम्मा कर पुन्न ले, चलाया टोल का टोल
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चिंतन:
कौन बेहतर नर या नारी?
*
स्त्री विमर्शवादियों का मत है कि स्त्री का हमेशा शोषण किया गया, समानाधिकार नहीं दिया गया। प्रगतिशीलता की चाह अश्लील लेखन, पारिवारिक बिखराव, अंग प्रदर्शन, सहजीवन (लिव इन) तक सीमित रह गई।
पुरुष वर्ग और न्यायालय का आकलन है कि सब कानून स्त्री हितों को दृष्टि में रखकर बनाए गए हैं, प्रताड़ित और पीड़ित पुरुष की हितरक्षा हेतु कोई कानून ही नहीं है।
विवाह को बंधन मानकर नकारने और उन्मुक्त संबंध का दुष्परिणाम बालिका वधुऔर प्रशांत अर्थात स्त्री-पुरुष दोनों के लिए अहितकर रहा है।
साहित्य भ्रमित समाज को दिशा दिखाता है।
भारतीय चिंतन विद्या, धन और शक्ति की अधिष्ठात्री सरस्वती-रमा-उमा को पूजता रहा तो अप्सराओं से प्रणय-विवाह-संतान अधिकार छीननेवाली देव संस्कृति को आदर्श मानता रहा।
धरती को माता और आसमान को पिता मानने का समन्वयपरक चिंतन वेदपूर्व से मान्य रहा है।
तुलसी ने इसी समन्वयवादी दृष्टिकोण को अपनाया। "ढोल गँवार शूद्र पशु नारी, सकल तोड़ना के अधिकारी" को उद्धृत कर तुलसी को नारी-निंदक कहनेवाले भूल जाते हैं कि तुलसी ने अपनी पत्नि द्वारा तिरस्कृत किए जाने के बाद भी "जगत जननि दामिनी सुख दाता / नहिं तव आदि मध्य अफसाना, अमित प्रभाव वेद नहिं जाना" कहकर नारी वंदना की, मीरा का पथ प्रदर्शन किया, रत्नावली को रामभक्ति हेतु प्रेरित किया और रत्नावली आजीवन उन्हें पूजती रहीं।
मैथिलीशरण गुप्त जी के मत में-
एक नही दो दो मात्राएँ,
नर से बढ़कर है नारी।
नर-नारी दोनों की प्रकृति अलग है, स्वभाव अलग है, कार्यशैली अलग है।
दोनों एक-दूसरे के पूरक है, विरोधी नहीं। कुहीं नारी श्रेष्ठ है, कहीं नर।
नर गगन की तरह छाना चाहता है तो नारी धरती की तरह समेटना। नर पाकर खुश होता है, नारी देकर।
रामधारी सिंह दिनकर नर-नारी के मनोवैज्ञानिक अंतर को स्पष्ट करते हैं-
पुरुष चूमते तब जब वे सुख में होते हैं,
हम चूमती उन्हें जब वे दुख में होते हैं।
नर जीतना चाहता है , नारी आत्मसात करना।
जीवन पथ पर कभी तुम जो थके
मैं शीतल जल, बन आउंगी
बुझा सकी ना प्यास तेरी
तो, थके पाँव धो जाऊँगी
नारी प्यार में खो जाना चाहती ,प्यार में , प्रीत में मिट जाने को ही श्रेष्ठ मानती है-
दिया कहे तू सागर, मैं होती तेरी नदिया ,
लहर बहर कर तू अपने, पीया चमन जाती रे ,
सुन मेरे साथी रे
नारी पुरुषार्थ हीन नहीं है, न नर ममतारहित है। नारी का पौरुष और नर की ममता उनकी सुप्त वृत्ति है जो आवश्यकतानुसार प्रगट होती है।
वत्सला से वज्र में
ढल जाऊँगी,
मैं नहीं हिमकण हूँ
जो गल जाऊँगी।
भारतीय चिंतन संघर्ष नहीं समन्वय को इष्ट मानता है। वह सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा को पूजने में हिचकता नहीं है किंतु इन्हें क्रमश: ब्रह्मा-विष्णु-महेश का अभिन्न अंग मानता है।
हमारे शास्त्रों में भी परमेश्वर अर्थात परम शक्ति की कभी नर रूप में कभी नारी रूप में कल्पना की गई है। वास्तुत: वह शक्ति न तो नर है, न नारी है। उस शक्ति को आश्रयदाता के रूप में नर और पोषक के रूप में नारी कहा है। 'त्वमेव माता च पिता त्वमेव' में यही भाव अंतर्निहित है।
उपनिषद में भी समान अभिव्यक्ति है-
'रुद्रो नर उमा नारी तस्मै तस्यै नमो नमः।
रुद्रो ब्रह्म उमा वाणी तस्मै तस्यै नमो नमः।
रुद्रो विष्णु उमा लक्ष्मी तस्मै तस्यै नमो नमः।'
रुद्र, सूर्य है और उमा उसकी प्रभा है, रुद्र फूल है और उमा उसकी सुगंध है, रुद्र यज्ञ है और उमा उसकी वेदी है।
सृष्टि के मूल में प्रकृति और पुरुष ये दो तत्व हैं। ऐसा सांख्यदर्शन का स्पष्ट मत है।
श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं- 'प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्धयनादी उभावपि।'
प्रकृति और पुरुष दोनों के समन्वय-सहयोग से सृष्टि बनी है।
नर-नारी के अद्वैत को अर्धनारीश्वर (शिवा-शिव, राधा-कृष्ण) के रूप मे वर्णित किया गया है।
पुरुष के अंतःकरण में जब स्त्रीभाव का उदात्तीकरण होता है, तब वह करुणामय, प्रेमपूर्ण वात्सल्यमय बनता है, कवि और कलाकार बनता है, संवेदनाक्षम बनता है। इसी तरह स्त्री में 'पुरुष' जागृत होते ही वह धीर और दृढ़ सावित्री बनती है, उसमें से रणचंडी लक्ष्मीबाई प्रकट होती है।
इसीलिए शास्त्रों में कहा गया है कि स्त्रीत्व और पुरुषत्व के गुण जब एक मानव में होते हैं, तब मानव मे अर्धनारीश्वर प्रकट होते हैं।
२९-८-२०२०
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कार्यशाला:
चर्चा डॉ. शिवानी सिंह के दोहों पर
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गागर मे सागर भरें, भरें नयन मे नीर|
पिया गए परदेश तो, कासे कह दे पीर||
तो अनावश्यक, प्रिय के जाने के बाद प्रिया पीर कहना चाहेगी या मन में छिपाना? प्रेम की विरह भावना को गुप्त रखना करुणा को जन्म देता है।
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गागर मे सागर भरें, भरें नयन मे नीर|
पिया गए परदेश मन, चुप रह, मत कह पीर||
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सावन भादव तो गया गई सुहानी तीज|
कौनो जतन बताइए साजन जाए पसीज||
साजन जाए पसीज = १२
सावन-भादों तो गया, गई सुहानी तीज|
कुछ तो जतन बताइए, साजन सके पसीज||
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प्रेम विरह की आग मे, झुलस गई ये गात|
मिलन भई ना सांवरे उमर चली बलखात||
गात पुल्लिंग है., सांवरा पुल्लिंग, गई एकवचन, ये बहुवचन, नारी देह की विशेषता उसकी कोमलता है, 'ये' तो कठोर भी हो सकता है.
प्रेम-विरह की आग में, झुलस गया मृदु गात|
किंतु न आया साँवरा, उमर चली बलखात||
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प्रियतम तेरी याद में झुलस गई ये नार|
नयन बहे जो रात दिन भया समुन्दर खार||
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प्रियतम! तेरी याद में, मुरझी मैं कचनार|
अश्रु बहे जो रात-दिन, हुआ समुन्दर खार||
कचनार में श्लेष एक पुष्प, कच्ची उम्र की नारी,
नयन नहीं अश्रु बहते हैं, जलना विरह की अंतिम अवस्था है, मुरझाना से सदी विरह की प्रतीति होती है।
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अब तो दरस दिखाइए, क्यों है इतनी देर?
दर्पण देखूं रूप भी ढले साँझ की बेर|
क्यों है इतनी देर में दोषारोपण कर कारण पूछता है। दर्पण देखना सामान्य क्रिया है, इसमें उत्कंठा, ऊब, खीझ किसी भाव की अभिव्यक्ति नहीं है। रूप भी अर्थात रूप के साथ कुछ और भी ढल रहा है, वह क्या है?
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अब तो दरस दिखाइए, सही न जाए देर.
रूप देख दर्पण थका, ढली साँझ की बेर
सही न जार देर - बेकली का भाव, रूप देख दर्पण थका श्लेष- रूप को बार-बार देखकर दर्पण थका, दर्पण में खुद को बार-बार देखकर रूप थका
*
टिप्पणी- १३-११ मात्रावृत्त, पदादि-चरणान्त व पदांत का लघु गुरु विधान-पालन या लय मात्र ही दोहा नहीं है. इन विधानों से दोहा की देह निर्मित होती है. उसमें प्राण संक्षिप्तता, सारगर्भितता, लाक्षणिकता, मर्मबेधकता तथा चारुता के पञ्च तत्वों से पड़ते हैं। इसलिए दोहा लिखकर तत्क्षण प्रकाशन न करें, उसका शिल्प और कथ्य दोनों जाँचें, तराशें, संवारें तब प्रस्तुत करें।
३०-८-२०१७
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नवगीत -
*
पहले मन-दर्पण तोड़ दिया
फिर जोड़ रहे हो
ठोंक कील।
*
कैसा निजाम जिसमें
दो दूनी
तीन-पाँच ही होता है।
जो काट रहा है पौधों को
वह हँसिया
फसलें बोता है।
कीचड़ धोता है दाग
रगड़कर
कालिख गोर चेहरे पर।
अंधे बैठे हैं देख
सुनयना राहें रोके पहरे पर।
ठुमकी दे उठा, गिराते हो
खुद ही पतंग
दे रहे ढील।
पहले मन-दर्पण तोड़ दिया
फिर जोड़ रहे हो
ठोंक कील।
*
कैसा मजहब जिसमें
भक्तों की
जेब देख प्रभु वर देता?
कैसा मलहम जो घायल के
ज़ख्मों पर
नमक छिड़क देता।
अधनंगी देहें कहती हैं
हम सुरुचि
पूर्ण, कपड़े पहने।
ज्यों काँटे चुभा बबूल कहे
धारण कर
लो प्रेमिल गहने।
गौरैया निकट बुलाते हो
फिर छोड़ रहे हो
कैद चील।
पहले मन-दर्पण तोड़ दिया
फिर जोड़ रहे हो
ठोंक कील।
३०-८-२०१६
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मुक्तक
राखी :
नहीं धागा है महज यह यह स्नेह का आधार है
आस का, विश्वास का, परिहास का संसार है
सहारा है डूबते को यही तिनके सा 'सलिल'-
विदेहित शुभ भाव पूरित देह में आगार है
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