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बुधवार, 4 जनवरी 2023

दोहा, प्रेम

दोहा सलिला
प्रभु-प्रसाद है प्रेम
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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प्रेम जगत व्यवहार है, प्रभु-प्रसाद है प्रेम।
प्रेम आत्म उद्धार है, बिना प्रेम नहिं क्षेम।।
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मिले प्रेम को प्रेम जब, स्वर्ग बने संसार।
मिले प्रेम को प्रेम नहिं, तो संसार असार।।
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किया न जाता; आप ही, हो जाता है प्रेम।
स्वार्थ न हो किंचित अगर, तभी प्रेम हो क्षेम।।
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उमा अपर्णा हो गई, शिव के प्रेमाधीन।
शिवा जगत जननी हुई, जग-पितु हुए अधीन।।
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पुष्प वाटिका साक्ष्य है, प्रेम न तनिक मलीन।
मर्यादाएँ मानकर, प्रेमी रहे अदीन।।
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प्रेम यशोदा ने किया, पाली पर-संतान।
नर क्या आभारी हुए, उनके खुद भगवान।।
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श्री राधा के प्रेम की, कोई नहीं मिसाल।
ईश बनाकर गोप को, खुद ही हुईं निहाल।।
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द्रुपदसुता का प्रेम था, सचमुच ही अनमोल।
चीर बढ़ाया कृष्ण ने, सखी-साख अनमोल।।
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भिन्न प्रेम रुक्मिणी का, बंधु-शत्रु को न्योत।
खुद को अपहृत कराया, जली प्रेम की ज्योत।।
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गुणिजन शिशु को पढ़ाते, नित्य प्रेम का पाठ।
सब से मिलता प्रेम नित, होते उसके ठाठ।।
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बालक चाहे टालना नित्य, नए कुछ काम।
'सीखो बच्चे प्रेम से', कहते हो यश-नाम।।
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हो किशोर जब प्रेम से, लेता कहीं निहार।
करते निगरानी स्वजन, मिले डाँट-फटकार।।
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युवा प्रेम का पाठ पढ़, चाहे भरे उड़ान।
खाप कतरती पर- कहे: 'ले लो दोनों जान।।'
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क्षेम, प्रेम में हो अगर, दोनों दिल में आग।
इकतरफा हो तो 'सलिल', है जहरीला नाग।।
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हो वयस्क तो प्रेम के, आड़े आता काम।
जले न चूल्हा जेब में, अगर नहीं हों दाम।।
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साँप और रस्सी लगे, जब तुलसी को एक।
प्रेम वासना बन कहे, पाठ पढ़ाओ नेक।।
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प्रौढ़ हुआ तो प्रेम की, खुसरो फूले श्वास।
कविता पड़ती सुनाना, तब बुझ पाती प्यास।।
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लोक-नीति विपरीत जो, प्रेम करे वह नष्ट।
पृथ्वी-संयोगिता ने, भोगे अनगिन कष्ट।।
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प्रेम-पींग केशव भरे, 'सलिल' न दम दे साथ।
'बाबा' सुन कर माथ पर, पटक रहा कवि हाथ।।
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वृद्ध प्रेम कर राम से, वही बनाएँ काम।
रति न काम के प्रति रहे, प्रेम करे निष्काम।।
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तन न मिले ,मन से मिले, थे शीरीं-फरहाद।
लैला-मजनूं को रखा, सदा समय ने याद।।
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दूर सोहनी से रहा, मन में बस महिवाल।
ढोल-मारू प्रेम की, अब भी बने मिसाल।।
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प्रेम भगत सिंह ने किया, आजादी के साथ।
चूम लिया फंदा मगर नहीं झुकाया माथ।।
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कृष्ण-प्रेम में लीन थी, मीरा सका न मार।
पिया हलाहल हो गई, अमर विनत संसार।।
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प्रेम सत्य से कर पिए, गरल संत सुकरात।
देहपात के बाद भी, अमर जगत-विख्यात।।
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खोटा कहें न प्रेम के, सिक्के को कर भूल।
हैं वियोग-संयोग दो, पहलू काँटे-फूल।।
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'लव जिहाद'; 'लिव इन' नहीं, प्रेम- वासना-भोग।
हेय-त्याज्य-निंदाजनक, हैं सामाजिक रोग।।
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प्रेम खरा तब ही 'सलिल', जब करता है त्याग।
एक समान उसे लगे, दोनों राग-विराग।।
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प्रेम-वासना बीच है, अंतर बहुत महीन।
पहचानो तो सुख मिले, भूलो तो हो दीन।।
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मिल न मिलन के फर्क से, प्रेम रहे अनजान।
आत्म-प्रेम खुशबू सदृश, 'सलिल' रहे रस-खान।।
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संपर्क : विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१
चलभाष ९४२५१ ८३२४४, ईमेल salil.sanjiv@gmail.com
 

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