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मंगलवार, 20 जुलाई 2021

भारत को जानें पश्चिम बंगाल



















पश्चिम बंगाल (मूल) 
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PB01. जनसांख्यिकी : ज्योति जैन, ८१६७८ ८४४२७ 











ज्योति जैन'ज्योति'
जन्म - २८ जनवरी। 
पिता - श्रीमान मानिक चंद जैन। 
माता - श्रीमती मालती देवी जैन। 
शिक्षा - बी.ए.। 
प्रकाशित पुस्तक - मेरे मन के सारथी (महावीर दोहा चालीसा)। 
पता - ज्योति जैन'ज्योति'
पोस्ट - कोलाघाट,गाँव- बाड़बोरिसा,जिला- पूर्व मेदनीपुर ७२११३४ 
राज्य - पश्चिम  बंगाल, भारत।  
चलभाष - ८५१४० ४४०१८ ।  
ई मेल- jyotijain2223@gmail.com । 
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दोहा
कुदरत की अनुपम छटा, कहलाता सोनार।
भारत के है पूर्व में, बंगभूमि आमार।।
चौपाई 
भारत माता के आँगन  का।  एक फूल जो हिंद सदन का।। 
हमको दिलोजान से प्यारा, है पश्चिम बंगाल हमारा।१। 

हमें  गर्व  यह धरती प्यारी। मातृभूमि  है  बंग  हमारी।।
तेइस हैं कुल ज़िले हमारे, अपने में जो अनुपम सारे।२। 

अति पावन यह बंग ज़मीं है। गंगासागर  तीर्थ  यहीं है।।
संत कपिल का जहाँ बना घर। मेला लगता उसी जगह पर।३। 

हरिक माह में  पूजा उत्सव । 'ज्योति' स्वर्ग सा दिखता कलरव।। 
होली, दुर्गा पर्व, दिवाली। अधर ईद के खिलती लाली।४।

सजी-धजी कुदरत की प्याली। दार्जिलिंग की छटा निराली।।
अमित यहाँ का मौसम धानी। भरी धूप  में  बरसे  पानी।५। 
दोहा
सरिता निर्झर बह रही, बन जीवन की आस।
धरती पर है बंग की, जल संसाधन खास।।
चौपाई
सभी ओर से नदियाँ बहतीं। हरियाली के किस्से गढ़तीं।।
गाँव शहर का जीवन  यापन। खेती-बारी अव्वल साधन।६। 

शिक्षा सबको  मिले यहाँ  पर। सुत सम बेटीं पाती अवसर।।
सीधा-साधा बँगला जीवन। धोती कुर्ता पहने जन-जन।७।

नारी का भी रूप अनोखा। पहने साड़ी दिखतीं चोखा।।
मछली चावल इनका भोजन। आलू चौखा खाते  बैंगन।८।

तरह  तरह की  भाषा  बोली। रहते सबमिल बन हमजोली।।
बौद्ध जैन  हो या  हो   हिंदू । सबकी इस धरती पर ख़ुश्बू।९।

जन्मभूमि स्वामी-सुभाष की। बोस जतिन टैगोर दास की।।
क्रांतिकारियों का देवालय। वीरों का कहलाता आलय।१०।
दोहा
ज्ञान तथा विज्ञान का, 'ज्योति' बंग भंडार।
पौधे में भी प्राण का, दिया विश्व को सार।।
चौपाई
ओज बंग की ऐसी बिखरी। तारीख़ी   पन्नों में  निखरी।।
अति पुनीत थी किस्मत पापाई। जो मैं इस धरती पर आई।११।

अर्थ नीति  है  दुविधाकारी। डिजिटल सिस्टम लगता भारी।।
चौदह प्रतिशत धानोत्पादन। करे बंग है तन्हा अर्जन।१२। 

भूख  गरीबी अरु बेकारी। कहे  समस्या है  सरकारी।।
सकल  घरेलू  उत्पादन  का। छठा देश को हिस्सा देता।१३।

बंग दृष्टि से जनसंख्या  की। जगह  देश में पाए चौथी।।
इसकी धरती में श्यामलता। धान स्वर्ण सा इसपर उगता।१४।

दार्जिलिंग की चाय निराली। रंगत बेशक  उसकी काली।
सिक्किम इसके शीश विराजे । पग में जिसके ढाका साजे।१५। 
दोहा
दार्जिलिंग की चाय की, सीरत होती खास। 
तन को देती ताजगी, मन को आती है रास।।
चौपाई
जग में महके बनकर संदल। कोलकाता का तारामंडल।।
कोलकाता का रूप अनोखा। इस नगरी का रँग है चोखा।१६।

कोलकाता औद्योगिक नगरी। अर्थचक्र से  भरती  गगरी।।
माँ काली कोलकातावाली। करे बंग  भू की रखवाली।१७।

यहाँ हावड़ा पुल मनभावन। जिसपर चलते हरदम वाहन।।
दो  खंभों पर  खड़ा सत्य  है। दर्शनीय सच बहुतायत है।१८। 

बिना मिठाई  सूनी थाली। भरा पेट भी लगता खाली।।
चमचम रसगुल्ले-संदेसे। खाना चाहें लोग जहां के।१९। 

देश  प्रेम से ओत  प्रोत  है। बलिदानों से जली ज्योति है।।
बंग  श्रृंखला है वीरों  की। घर आजादी के तीरों  की।२०। 
दोहा
प्रमुख राज्य यह देश का, भारत माँ की शान।
पूरब में बंगाल है, भारत का अभिमान।।
चौपाई
भक्ति भाव भी अति है पावन। मातृ बंग  का उजला  दामन।।
मानवता का पाठ पढ़ाया, परमहंस ने हमें सिखाया।२१। 

साहित्यिक भू यह कहलाती। ऋषि-मुनियों की धरा कहाती।।
कला शिल्प से धरा सुशोभित। हस्तकला करती मन मोहित।२२। 

सघन यहाँ पर हैं वन उपवन। सुंदरवन से परिचित जन-जन।।
करते बाघ मुक्त विचरण हैं। वनजीवों  के पड़े चरण हैं।२३। 

हरसिंगार  बहुत  मनभावन। राज्य फूल का है अभिवादन।।
कई व्याधियाँ हरनेवाला। कहते इसको तन रखवाला।२४। 

नैतिक मूल्यों के संरक्षक। विद्यासागर नारी रक्षक।
आजादी-हित फौज बनाई। नेताजी ने की अगुवाई।२५। 
दोहा
हरियाली संग संस्कृति,' ज्योति' बंग पहचान। 
कर्मशीलता का मिला, कुदरत से वरदान।।
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PB02. संस्कृति 
वर्ग २ (संस्कृति, कला, साहित्य) 
लोकगीत, लोकनृत्य, लोकभाषा, खानपान, व्रत, त्यौहार, वास्तुकला, मूर्तिकला, वेशभूषा, साहित्य।
 प्रो. (डॉ.) साधना वर्मा 












 प्रो. डॉ. साधना वर्मा 
जन्म - १९५७ बिलासपुर, छत्तीसगढ़, भारत। 
माता पिता - स्व. आशा सहाय - स्व. प्रो. सत्य सहाय। 
शिक्षा - एम. ए. अर्थशास्त्र, पी-एच. डी.।
संप्रति - प्राध्यापक, शासकीय स्नातकोत्तर स्वशासी महाविद्यालय। 
संपादन - ३ पुस्तकें, कई स्मारिकाएँ-पत्रिकाएँ, लेखन २५ शोधलेख। 
पता - ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१। 
ईमेल - salil.sanjiv@gmail.com .
चलभाष - ९४२५१८३२४४।  
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भारत को जानें : पश्चिम बंगाल
PB02. संस्कृति
वर्ग २ (संस्कृति, कला, साहित्य)
लोकगीत, लोकनृत्य, लोकभाषा, खानपान, व्रत, त्यौहार, वास्तुकला, मूर्तिकला, वेशभूषा, साहित्य।
प्रो. (डॉ.) साधना वर्मा
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प्रो. डॉ. साधना वर्मा 
जन्म - १२-९-१९५७ बिलासपुर, छत्तीसगढ़, भारत। 
माता पिता - स्व. आशा सहाय - स्व. प्रो. सत्य सहाय। 
शिक्षा - एम. ए. अर्थशास्त्र, पी-एच. डी.।
संप्रति - प्राध्यापक, शासकीय स्नातकोत्तर स्वशासी महाविद्यालय। 
संपादन - ३ पुस्तकें, कई स्मारिकाएँ-पत्रिकाएँ, लेखन २५ शोधलेख। 
पता - ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१। 
ईमेल - salil.sanjiv@gmail.com .
चलभाष - ९४२५१८३२४४।  
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शस्य श्यामला भूमि है, भद्र लोक बंगाल। 
लोक संस्कृति दिव्य है, जन-जीवन खुशहाल।१।   
लोक नृत्य 
झूम-नाच हँसते बंगाली। लोक नृत्य लाते खुशहाली।।
खेती-भक्ति भाव इनमें है। इन जैसा हुलास किनमें है।।
ब्रिता नृत्य
आवाहन करता ईश्वर का। लोकनृत्य है 'ब्रिता' या 'वृता'।।
बाँझ नारियाँ कर माँगें वर। दें संतान उन्हें परमेश्वर।।

संक्रामक रोगों से बचकर। करते नृत्य लोग मिल-जुलकर।।
ईश्वर के प्रति हों आभारी। कट जातीं बाधाएँ सारी।।
छाऊ नृत्य
'छाऊ' मार्शल आर्ट सरीखा। नर्तक लगा मुखौटा दीखा।।
रामायण की कथा दिखाते। कृष्ण-प्रसंग बहुत मन भाते।।

पौराणिक प्रसंग हैं रुचिकर। दर्शक देखें हुलस-पुलककर।।
केंद्र छाऊ का जिला पुरलिया। सकल जगत में ख्याति पा लिया।।

नृत्य-गीत-संगीत की, बहे त्रिवेणी नित्य। 
विहँस जीव संजीव हों, पा-दें हर्ष अनित्य।२।

गम्भीरा नृत्य
खेती और भक्ति संबंधित। 'गंभीरा' है नृत्य सुचर्चित।।
जिला मालदा में जनप्रिय यह। 'चादक पर्व' मनाते दिल दह।।

मार्च और अप्रैल माह में। एकल नर्तक मुदित चाह में।।
पहन मुखौटा करें गँभीरा। दर्शक मन हो मुदित अधीरा।।
टुसू डांस
पौष, दिसंबर और जनवरी। 'टुसू नृत्य' की झलक से भरी।।
करते वनवासी नर-नारी। बीरभूम में छवि मनहारी।।

उत्सव आगामी फसलों का। सुख-समृद्धि का; नव खुशियों का।।
जिला मेदिनीपुर हर्षाता। हर नर-नारी खुश मनाता।।

कृषक संस्कृति ऋतु परिवर्तन। प्रकृति सुंदरी करती नर्तन। 
जब तब लोक मनाता उत्सव। गीत-नृत्य से प्रगटे लाघव।। 
 
ठुमुक-ठुमुक पग नाचते, कटि लच देती साथ। 
नयन-नयन से उलझते, उठते-झुकते माथ।३। 
संथाल नृत्य
वनवासी संथाल भक्त हैं। 'ठाकुर जी' ईश्वर सशक्त हैं।।
सारी सृष्टि बनाई प्रभु ने। जन में भक्ति जगाई विभु ने।।

कर 'संथाल नृत्य' हर नर्तक। करे वंदना प्रभु जग-सर्जक।।
प्रकृति की महिमा मिल गाते। सांगीतिक धुन साथ सुनाते।।
लाठी नृत्य
'लाठी नृत्य' अनूठा मानो। प्रेम पीर सुख-दुःख अनुमानो।।
नर्तकियों की चाल मनोहर। भाव व्यक्त करती अचूक हर।।

सुख-दुख; पीड़ा; हर्ष-प्रेम को। करे व्यक्त यह क्रोध क्षेम को। 
युवजन भर उछाह में नाचें। समय पत्रिका नैना बाँचें।।    

करें समूहों में छड़ियाँ ले। युवा साथ में गलबहियाँ दे।।
दस दिन बाद मुहर्रम आता। लाठी नृत्य सभी को भाता।।

बेल वृक्ष से लिपटकर, बिसरा देतीं द्वैत। 
लोक नृत्य दूरी मिटा, कहें वरो अद्वैत।४। 
रवा नृत्य
'रवा नृत्य' करतीं महिलाएँ। सज्जित बहुरंगी मन भाएँ।।
बजता साथ मधुर संगीत। विषय कार्य जीवन की रीत।।

मुंडारी; झूमुर; नटुआ; ढल। नचनी पैका डाम्फू कस-बल।।
नाचन; रेने; लूंगे लारी। लोखुन; बोलन जनप्रिय भारी।।

रायबेन्शे; बाउल मत भूलो। लीन गजन में हो नभ छू लो।।
लोक नृत्य तब ही हो सकता। लोक वाद्य जब संगत करता।।
लोकवाद्य 
बजते 'डुग्गी; खोल; मंजीरा'। झूमु उठे हर ह्रदय अधीरा।। 
सबके मन भाता 'इकतारा'। 'सूफी गीत' लगे अति प्यारा।।

'धमशा' बड़ा नगाड़ा भाई। 'तुरही; ढोल' साथ 'शहनाई'।।
'खमक; डुरी' के संग 'दोतारा'। 'मुखबाशी, सारिंदा' न्यारा।।  

'रौशन चौकी; स्वरपटल', 'तमको; गाबुक' वाद्य। 
नहीं सरल ना असंभव, कोशिश से हैं साध्य।५।     
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भाषा
बंगाली भाषा मन भाती। बहिन मैथिली खूब सुहाती।।
हैं अपभृंश-मागधी जननी। असमी-उड़िया मानो भगिनी।।

वर्ष सहस्त्र पूर्व बंगाली। विकसी है अब वैभव शाली।।
बोल रहे तेइस करोड़ जन। हरे बाङ्ला जन-जन का मन।।

चौदह स्वर हैं तैंतिस व्यंजन। बोलें-लिखें इसे विद्वज्जन।।
टोटो माल्टो लेप्चा बोली। संथाली नेपाली डोली।।

राजबोंग्शी और अंगिका। अंग रही हैं सदा बंग का।।
जनभाषाओं में मिठास है। शब्द संपदा प्रचुर ख़ास है।.

भाषान्तरण और अनुवाद। करें निरंतर हो संवाद। 
लिप्यंतरण समय की माँग। करें सभी जन तजकर स्वांग।।   

भाषा जन को जोड़ती, करती सबको एक।
राजनीति दिल तोड़ती, रहें दूर सविवेक।६।  
खान-पान
'दोकर दलना' शाकाहारी। व्यंजन यहाँ लोकप्रिय भारी।।
'ताले भाजा' स्नैक्स तले हैं। 'काठी रोल्स' सुस्वाद भले हैं।।

'मिस्टी दोई', 'बैगुन भाजा'। 'चिंगरी भाप्पा' खाने आ जा।।
'मछली करी' मसालेवाली। जान-मन भाती मांसाहारी।।

'पत्ता प्रांस करी' मन भाए। 'प्रान मलाई करी' सुहाए।।
'भेटकी पातूरी' जो खाए। चाट अंगुलियाँ वह मुस्काए।।

'अलु पोटोल पोस्तो' 'शुक्टो'। 'लाउ गांतो' व 'मोचर गांतो'।
'टंगरा'-'हिलसा' माछेर झोल। 'अलूर हाउस' है अनमोल।।

'आमा पूरा शोर्बत' पान। फूँके थके-हुए में जान।।
'रोसोगुल्ला', 'संदेश' मिठास। 'मिष्टी दोई' खासुलखास।।

खान पान बंगाल का, है खासों में ख़ास। 
जी भर खा संतुष्ट हों, होगा सुखद प्रवास।७।  
व्रत-त्यौहार
'बारो मसे तेरो परबान'। बंगाली व्रत-पर्व महान।।
नौ दिवसों तक 'दुर्गा पूजा'। पर्व न इस सम कोई दूजा।।

महिषासुरमर्दिनी भवानी। पूजी जातीं माँ कल्याणी।।
दुर्गा-प्रतिमा 'चाला' भाए। वाहन शेर असुर खा जाए।।

चार माह में 'चाला' बनता। नेत्र अंत में सबसे सजता।।
दाएँ शारदा-कार्तिक सोहें। वाम गणेश-रमा मन मोहें।।

'अगोमोनी' के गीत सुनाते। बंगाली दुर्गा घर लाते।।
'चोखूदान' प्रथा है पावन। 'पुष्पांजलि' आठें मन भावन।।

'पारा' है पूजा सामूहिक। 'बारिर' घर में हो वैयक्तिक।।
करें 'कुमारी पूजा' नतशिर। 'सांध्य आरती' करते सस्वर।।

शक्ति-साधना कीजिए, रहे सुरक्षित देश। 
आँख उठा देखे अगर, दुश्मन रहे न लेश।८।  

दशमी को हो 'सेंदुर खेला'। 'धुनुची नृत्य' बहुत अलबेला।।
नारियल जटा हवन सामग्री। सुलगा; ढाक बजाते अग्री।।

करें विसर्जन भक्ति-भाव से। नर-नारी सम्मिलित चाव से।।
'गंगा सागर स्नान' करें सब। शिवरात्रि शिव भक्ति वरें शुभ।।

हो संक्रांति मकर पर उत्सव। होली पर रंगों का उद्भव।।
मिल बसंत पंचमी मनाएँ। गुरु रवींद्र की जय जय गाएँ।।

रोजा ईद जमाई छठ भी। बुद्ध पूर्णिमा है प्रिय सबकी।।
रथयात्रा दशहरा दिवाली। क्रिसमस पर होती खुशहाली।।

परमहंस-सारदा माँ की। जयंतियाँ प्रेरक अवसर भी।।
शपथ विवेकानंद दिवस पर। लें हों जनसेवा में तत्पर।।

स्वाधीनता दिवस मना, रखिए देश सशक्त। 
खास पर्व गणतंत्र का, देखें हो न अशक्त।९।  
कला - (संगीत-वास्तु-मूर्ति-चित्र-रंगमंच)  
भक्ति गीत; संगीत मनोहर। लोकगीत जनगीत धरोहर।।
है रवींद्र संगीत श्वास सम। सुन झूमो अँखियाँ होतीं नम।।

टेराकोटा-मृदा मूर्तियाँ। फाइन आर्ट से सजी वीथियाँ।।
इण्डोस्लामिक गोथिक रोमन। बरोक वास्तु पर मोहित जन जन।।

जात्रा नाटक और थियेटर। चर्चित होते रहते घर घर।।
फिल्म और फुटबाल सुहाए। खेल क्रिकेट सभी को भाए।।

चित्रकला बंगाली अप्रतिम। थे अवनींद्रनाथ गुरु परचम। 
आध्यात्मिक शैली बंगाली। नंदलाल बसु ध्वजा सम्हाली।।

देवीप्रसाद, घोषाल, हालदर। राय यामिनी, राममनोहर।।
ट्रांसपेरेंट-वाश-ओपेक,  तकनीकों में सिद्ध विशेष।।

रंगमंच बंगाल का, जनप्रिय लेखक ज्येष्ठ । 
ऋत्विक उत्पल सलिल सम, कलाकार अति श्रेष्ठ।१०।
वेशभूषा  
'छह गजिया' बंगाली साड़ी। कॉटन-रेशम की अतिप्यारी।।
कनक-रजत तारों की सुषमा। 'ढाकाई' साड़ी की गरिमा।।

'गरद' साड़ियाँ लाल किनारी। पहन लगे बंगालन प्यारी।।
'कोरियल' बूटे फूल समेटे। श्वेत-लाल चूड़ी संग भेंटे।।

'बलाचुरी' सुनहरी कढ़ाई। विविध चित्र छवियाँ मन भाई।।
देन मुर्शिदाबाद की मनहर। छटा भव्य लेती है मन हर।।

'तांत' बुनी जाती करघे पर। हल्की पहने रमणी जी भर।।
पारम्परिक 'पैसले-फूल'। पहन कामिनी जाती फूल।।

'टसर सिल्क' की अजब बुनावट। पहन मानिनी करे सजावट।।
कोमल नाजुक 'मलमल धोती'। नर्म सुखद शोभित ज्यों मोती।।

पहन रूपसी गिराती, बिजली लें दिल थाम। 
मन माफिक साड़ी मिलें, उचित किस्म अरु दाम।११।  

'कांथा साड़ी' हल्की-भारी। रनिंगस्टिच की आभा न्यारी।।
देशी ठाठ 'दुपट्टा-कुरता'। सज सलवारों संग मन हरता।।

'पंजाबी कुरता' घुटनों तक। धोती-शाल सजे पुरुषों पर।।
टसर सिल्क कॉटन या रेशम। सजे कसीदाकारी उत्तम।।

नेकलाइन या बटन होल पर। बूटे-बेल लगें अति सुंदर।।
फ्यूजन पहन जींस या ट्राउज़र। युवा आधुनिक उड़ते जी भर।।

लुंगी-पाजामा मन भाते। भद्र शेरवानी अपनाते।।
बाउल गायक बाँधें पगड़ी। कुरता लुंगी माला खजड़ी।।

कुपनी, कांचा, पटका, पंछी। संथाली मन भाए दहड़ी।। 
कुण्डल हसली खांगा गोदना। सांखा-बंकी मफ है घना।।

पहनावा है बदलता, शिक्षा-धन के संग। 
शहर-गाँव में भिन्न हो, भाँति-भाँति के ढंग।१२। 
साहित्य
ब्राह्मी लिपि में शिलालेख पर। बंगाली उभरी पत्थर पर।।
सदी आठवीं के चर्यापद। ताड़पत्र पर मिलते अंकित।।

अष्टपदिक रहस्य रचनाएँ। आम जनों को कम ही भाएँ।।
'गीतगोविन्द' रचें जयदेव। राधा-कृष्ण सुप्रेम सदैव।।

'रामायण कृतिवास' मनोहर। पंद्रह सौ की दिव्य धरोहर।।
'कृष्ण विजय'; 'चैतन्य भागवत'। 'चंडी मंगल' आदि काव्य शत।।

सदी बारहवीं कथा प्रसंग। 'पंचाली'; 'मंगला' अभंग।।
कथा-वार्ता; महाकाव्य रच। भक्ति काव्य ही अधिक गए रच।।

सदी सत्रहवीं में बदलाव। 'अरकानी' का हुआ प्रभाव।।
रोमांटिक बंगाली कविता। बही बहे जैसे जल सरिता।।

समय-समय की बात है, समय-समय का फेर। 
साथ समय के बदलता, लेखन करे न देर।१३। 

'सती मायना' 'दौलत काज़ी'। बदल रहा था खुद को माज़ी।।
'शिव-गौरी' को दीन कृषकवत। 'शिव संकीर्तन' में कर शब्दित।।

लेखक भट्टाचार्य रामेश्वर। बढ़ पाए थे नई लीक पर।।
अट्ठारह सौ पंद्रह आया। राम मोहन ने कदम बढ़ाया।।

संस्कृत से बंगला अनुवाद। किया लोक से हँस संवाद।।
सन अट्ठारह सौ सत्तावन। आया नाटक 'नील दोर्पन'।।

दीनबंधु मित्रा थे लेखक। बंग धरा; भारत माँ सेवक।।
दत्त माइकेल मधुसूदन ने। रची शुद्ध कविता थी पहले।।

'मेघनाथ वध' काव्य अमर है। हुआ समय के साथ समर है।।
'बंकिम' की 'दुर्गेशनंदिनी'। कहे चेतना है न बंदिनी।।

राह दिखा साहित्य ने, बदला राज-समाज। 
कल से बेहतर कर दिया, सबने मिलकर आज।१४। 

संतानों की विजय पताका। 'वंदे मातरम्' गाना बाँका।।
घोष गिरीश, बोस अमृत के। नाटक नव चेतन अवसर थे।। 

देवेंद्रनाथ व विद्यासागर। दत्त रमेशचंद्र गुण आगर।।
कवि रवींद्र, देवेंद्र, कामिनी। सुवर्णकुमारी कीर्ति भावनी।।

शरतचंद्र; ताराशंकर ने। राह दिखाई नव कृतियाँ दे।।
प्रमथ; विभूति; जतिन; अवधूत। घोष अरविंद संत थे पूत।।

अब के अनगिन रचनाकार। करें बांग्ला बोल प्रसार।।
लिखें देवनागरी लिपि मीत। पढ़ समझें सब तब हो प्रीत।।

है साहित्य न केवल दर्पण। मार्ग दिखाता कर सब अर्पण। 
कहिए इसे देश निर्माता। आदम को इंसान बनाता।। 

छवियाँ हैं बंगाल की, रम्य-रूप-गुण युक्त।
नीर-क्षीरवत हो  सकें, सब इससे संयुक्त।१५। 
***
दोहा 
चित्र गुप्त साकार हो, विधि-हरि-हर रच सृष्टि। 
शारद-रमा-उमा सहित, करें कृपा की वृष्टि।।
रिद्धि-सिद्धि विघ्नेश आ, करें हमें मतिमान। 
वर दें भारत भूमि हो, सुख-समृद्धि की खान।। 
चौपाई 
'भारत' की महिमा का वर्णन। करते युग-युग से मिल कवि जन।।
देश सनातन वैभवशाली। 'गंगारिदयी' धरा शुभ आली।१।

'पाल-सेन' ने भोगी सत्ता। चार सदी तक रख गुणवत्ता।।
तीन सदी थे मुस्लिम शासक। भोग विलास दमन के नायक।२।
दोहा 
हा! दुर्दिन थे देश के, जनगण था उद्भ्रांत। 
भद्र बंग विद्वान थे, दीन-हीन अति क्लांत।।
चौपाई 
प्लासी में अंग्रेज विजय पा। सके देश में पाँव थे जमा।।
हिंदू-मुस्लिम किया विभाजन। शोषक बन करते थे शासन।३।

'संतानों' ने किया जागरण। क्रांति शंख ने किया भय हरण।।
सदी आठवीं से रचनाएँ। साहित्यिक मिलती मन भाएँ।४।

'सिद्धाचार्य' पुरातन कवि थे। ताड़पत्र पर वे लिखते थे।।
'रामायण कृतिवास' लोकप्रिय। 'चंडीदास' कीर्ति थिर अक्षय।५।
दोहा 
मिल संस्कृति-साहित्य ने, जन मन को दी शक्ति। 
विपद काल में मनोबल, पाएँ कर प्रभु भक्ति।। 
चौपाई 
'मालाधर' 'चैतन्य' चेतना। फैला हरते लोक वेदना।।
काव्य कथा 'चंडी' व 'मनासा'। कवि 'जयदेव' नाम रवि जैसा।६।

सन अट्ठारह सौ सत्तावन। जूझा था बंगाली जन जन।।
नाटक 'दीनबंधु मित्रा' का। 'नील दोर्पन' लोक व्यथा का।७।

लोक जागरण का था माध्यम। अंग्रेजों को दिखता था यम।।
'राय राममोहन'  ने जमकर। सती प्रथा को दी थी टक्कर।८।
दोहा 
'ठाकुर देवेंद्रनाथ' ने, संस्था 'ब्रह्म समाज'। 
गठित करी ले लक्ष्य यह, मिठे बुराई राज।। 
चौपाई 
'माइकेल मधुसूदन' कवि न्यारे। 'कवि नज़रूल' आँख के तारे।।
'वंदे मातरम' दे 'बंकिम' ने। पाई प्रतिष्ठा सब भारत से।९।

'केशव सेन' व 'विद्यासागर'। शिशु शिक्षा विधवा विवाह कर।।
'चितरंजन' परिवर्तन लाए। रूढ़िवादियों से टकराए।१०। 
दोहा 
क्रांति ज्वाल थी जल रही, उबल रह था रक्त। 
डरते थे अंग्रेज भी, बेबस भीरु अशक्त।। 
चौपाई 
'सूर्यसेन' और 'प्रीतिलता' से। डरते-थर्राते थे गोरे।।
'गुरु रवींद्र' ने नोबल पाया। 'गीतांजलि' ने मान दिलाया।११।

'परमहंस श्री रामकृष्ण' ने। ईश्वर पाया सब धर्मों से।।
'उठो जाग कर मंज़िल पाओ'। अपनी किस्मत आप बनाओ।१२।

'संत विवेकानंद' धर्म ध्वज। फहरा सके दूर पश्चिम तक।।  
रामकृष्ण मठ कर निर्धन सेवा। कहे दीन में ही हैं देवा।१३।  
दोहा 
दलित-दीन-सेवा करी, सह न सके पाखंड। 
जाति प्रथा को चुनौती, दी कह सत्य अखंड।। 
चौपाई    
वैज्ञानिक 'सत्येन बोस' ने। कीर्ति कमाई 'बोसान कण' से।।
'बसु जगदीश' गज़ब के ज्ञानी। वैज्ञानिक महान वे दानी।१४।

'राय प्रफुल्ल चंद्र' रसायनी। 'नाइट्राइट' विद्या के धनी।। 
'मेघनाथ साहा' विशिष्ट थे। जगजाहिर एस्ट्रोफिसिस्ट थे।१५।  
दोहा 
प्रतिभाओं से दीप्त था,  भारत का आकाश। 
समय निकट था तोड़ दे, पराधीनता पाश।।  
चौपाई 
'रास बिहारी' क्रांतिवीर थे। 'बाघा जतिन' प्रचंड धीर थे।।
जला 'लाहिड़ी' ने मशाल दी। गोरी सत्ता थर्राई थी।१६। 

क्रांतिवीर 'अरविन्द-कनाई' । 'बारीलाल' ने धूम मचाई।।
'श्री अरविन्द घोष' थे त्यागी। क्रांति और दर्शन अनुरागी।१७।
 
'दत्त रमेश चंद्र' ऋग्वेदी। अर्थशास्त्री विख्यात अरु गुणी।। 
'वीर सुभाष' अमर बलिदानी। रिपु को याद कराई नानी।१८।
दोहा 
अपनी आप मिसाल थे, जलती हुई मशाल।  
नारा दे 'जय हिंद' हैं, अमर साक्षी देश के लाल।। 
चौपाई 
'शरतचंद्र' ने पाखंडों पे। किया प्रहार उपन्यासों में।। 
'ताराशंकर' 'बिमल मित्र' ने। उपन्यास अनुपम हैं रचे।१९। 
 
'नंदलाल-अवनींद्र-जैमिनी'। चित्रकार त्रय अनुपम गुनी।।   
बंग कोकिला थीं 'सरोजिनी'। 'राय बिधानचंद्र' अति धुनी।२०।

'रॉय बिमल' अरु 'सत्यजीत' ने। नाम कमाया फिल्म जगत में।।
'सेन सुचित्रा' श्रेष्ठ नायिका।श्रेया घोषाल' मधुर गायिका।२१। 
दोहा 
प्रतिभाओं की खान है, बंगभूमि लें मान। 
जो चाहें वह कर सकें, यदि लें मन में ठान।।  

दुर्गा पूजा दिवाली, बंगाली त्यौहार।
रथयात्रा रंगोत्सव, दस दिश रहे बहार।।
चौपाई
षष्ठी तिथि 'बोधन' आमंत्रण। प्राण प्रतिष्ठा भव्य सुतंत्रण।। 
भोर-साँझ पूजन फिर बलि हो। 'कोलाकुली' गले मिल खुश हो।२२।
 
'नीलकंठ' दर्शन शुभ जानो। सेंदुर ले-दे 'खेला' ठानो।।  
'हरसिंगार' 'कौड़िल्ला' 'छितवन'। 'रोसोगुल्ला' हरता सबका मन।२३। 

'सिक्किम' 'असम' 'बिहार' 'उड़ीसा'। 'झारखण्ड' संगी-साथी सा।।
स्नेह पड़ोसी सँग रख जीता। कोई किसी से रहे न भीता।२४।    
दोहा 
बांग्लादेश पड़ोस में, है सद्भाव विशेष। 
थे अतीत में एक ही, पाले स्नेह अशेष।। 
चौपाई 
'घुग्गी' 'चाट' 'झलमुरी' खाएँ। 'हिलसा मछली' भुला न पाएँ।।
घाट बैठ लें चाय चुस्कियाँ। सूर्य डूबता देख झलकियाँ।२५। 

खाड़ी तट पर 'दीघा' जाएँ। 'लतागुड़ी' घूमें हर्षाएँ।।   
बसा सिलिगुड़ी, तीर 'टोरसा'। 'जलदापारा' पार्क रम्य सा।२६। 

'सुंदरबन' 'बंगाल टाइगर'। 'दार्जिलिंग' है खूब नामवर।।
शोभा बंग भूमि की न्यारी। जहाँ-तहँ सुंदर छवि प्यारी।२७।   
दोहा 
'कालिपोंग' मठ-चर्च की, शोभा भव्य अनूप। 
'कुर्सिआंग' 'आर्किड्स' का, देखें रूप अरूप।।
चौपाई 
'कामाख्या' मंदिर अतिपावन। 'गंगासागर' छवि मनभावन।। 
'शांतिनिकेतन' 'विश्व भारती'। 'सेतु हावड़ा' 'गंग तारती'।२८।  

'गोरूमारा' 'बल्लभपुर' वन। 'बक्सा' घूम हुलस जाए मन।। 
'कूचबिहार', 'हल्दिया', 'माल्दा'। 'तारापीठ' 'सैंडकफू' भी जा।२९। 

'माछी-भात', 'पंटूआ', 'चमचम'। 'भज्जा', 'झोल' 'पिथा' खा तज गम।। 
सलिल भाँति निर्मल रह भैया। खुश रह सुख पा ता ता थैया।३०। 
दोहा 
'छेना लड्डू' खाइए, फिर छककर 'संदेश'। 
'रसमलाई' से पाइए, प्रिय! आनंद अशेष।। 

बंगाली हैं भद्रजन, शांत शिष्ट गुणवान। 
देशभक्ति है खून में, जां से प्यारी आन।। 
***

PB03. उपलब्धि : श्रीधर प्रसाद द्विवेदी, ०७३५२९१८०४४












श्रीधर प्रसाद द्विवेदी 
शिक्षा- एम.ए. भूगोल, बी.एड.
         राँची विश्व विद्यालय,राँची।
जन्म तिथि- २० मई १९५३।
लेखन विधा - कविता, कहानी, ललित- निबन्ध।
प्रकाशित रचना- (१)कनेर के फूल ( कविता संकलन )
(२) पाखी खोले पंख ( दोहा सतसई )
(३) आईना झूठ बोलता है ( कविता संकलन )
(४) व्रज आये व्रजराज ( खण्ड काव्य )
(५) गीता का काव्यानुवाद
(६) मेघदूतम काव्यानुवाद।
पता- अमरावती, गायत्री नगर, गायत्री मन्दिर रोड, सुदना, डालटनगंज, पलामू, झारखण्ड ८२२१०२।
चलभाष - ०७३५२९१८०४४।
*
दोहा
बंग भूमि को शत नमन, दर्शन कर जग धन्य।
श्रीधर बंग प्रसाद पा, मिलता हर्ष अनन्य।।

चौपाई 
भारत के पूरब-दिग देखा। सूर्य-बिंब सम उगता लेखा।।
बंग राज्य अपनी सीमा पर। हरा-भरा यह क्षेत्र गुणाकर।१।

खाड़ी से हिमनग तक पसरा। अतिसमृद्ध राज्य यह ठहरा।।
पूरब-दिशा  देश  बंगाला।उत्तर-दिग भूटान सम्हाला।२।

पश्चिम राज्य बिहार अड़ोसी। दक्षिण उड़िया खड़ा पड़ोसी।।
समतल भूमि  आर्द्र सब भूतल। सिंधु निकट ऊपर तक जल-तल।३।

धान- धरा  बहुतर  उपजाए। चावल-मछली भोग लगाए।।
पटुआ सनई उपज यहाँ के। थैले-टाट प्रसिद्ध जहाँ के।४।

अन्य उपज मक्का अधिकाई। सन-साठी  भी  रंग जमाई।।
पद्मा-हुगली सुरसरि शाखा। तीस्ता अजय नदी जल राखा।५।
दोहा
पटुआ के उद्योग से, ख्यात हुआ बंगाल।
ढाका तक चटकल चला, मिल का फैला जाल।।
चौपाई 
दार्जलिंग के चाय सुगन्धित। करें पसंद जगत के पण्डित।।
वणिजकेंद्र नगर कोलकाता। सेतु- हावड़ा दृढ़ मन-भाता।६।

काली-घाट दक्षिणा काली। करती नगरकीर्ति रखवाली।।
परमहंस राम- कृष्ण  राजे। बेलूरमठ शांति थल साजे।७।

गुरु रविन्द्र का ज्ञान पुरातन।कीर्तिकलानिधि शांतिनिकेतन।।
ऋषि चैतन्य विशिष्ट गुणाकर। कवि जयदेव  दास चंडी धर।८।

तरुण- तपस्वी  नंद- विवेका। जा परदेश विजय ध्वज टेका।।
कीर्ति-कौमुदी अब तक पसरी। गुरु- वेदांत- ज्ञान  गुण  गहरी।९।

प्राच्य-प्रभा जग में फैलाये। सुप्त देश को मार्ग दिखाये।।
पौरुष जगा देश के अन्दर। राष्ट्रजागरण हुआ शुभ्र तर।१०।
दोहा
ज्ञानवान की है धरा, जगा ज्ञान विज्ञान।
उद्भिज पौधे जगत के, इनमें भी है जान।।
चौपाई 
जगदीशचन्द्र वसु बतलाए। पौधों  में  भी  प्राण बसाये।।
शरतचन्द्र बंकिम की रचना। भाषा ललित बंग का गहना।११।

संग्रहालय विशदबड़ देखा। पुस्तकालय नेशनल लेखा।।
विक्टोरिया का संग्रहालय। अन्य कई हैं नूतन आलय।१२।

दर्शनीय और  कई स्थल हैं। पदमा नदी कई जल-थल हैं।।
दामोदर- नद  निगम बना है। जल विद्युत का केंद्र यहाँ है।१३।

दार्जिलिंग पर्वत का राजा। बसा गोरखा बड़ा समाजा।।
पुरुलिया के आदिम वासी। गिरि कानन में करें सुपासी।१४।

लाह वनोपज और अन्य हैं। जनजाति कर उपज धन्य हैं।।
अर्थ व्यवस्था कृषक प्रधाना। हरित प्रान्त जन कहें सुजाना।१५। 
दोहा
गंगा की शाखा यहाँ, फैली बनकर हार।
मिली सिन्धु के साथ जा, बनी सहस मुख धार।।
चौपाई 
डेल्टा भारी सुन्दर वन का। व्याघ्र विलोकें इस जंगल का।।
खान शिल्प उद्योग यहाँ के। नामी कुछ उत्पाद जहाँ के।१६।

नेता बोस सुभाष हुए हैं। अंग्रेजों से युद्ध लड़े हैं।।
प्रथम क्रांति की धरा यही है।बैरकपुर  की धरा सही  है।१७।

और कई थे विप्लवकारी। अंग्रेजों की सेना हारी।।
बंकिम बाबू यहीं पुकारा। वन्दे मातरम्  गान  हमारा।१८।

गीतांजली रची यह वसुधा। गाता यहाँ लोक जन बहुधा।।
रुचिकर है  रवीन्द्र संगीता। लोक मान्य जैसे जग गीता।१९।

नृत्य गीत रुचि पूर्ण यहाँ के। कन्दुक क्रीड़ा खेल जहाँ के।।
जन रंजन करती यह धरणी। विविध भाँति से शोभा वर्णी।२०।
दोहा
शिल्प कला साहित्य का, हुआ समागम नित्य।
बंग भूमि ने नित किए, अन्य बहुत से कृत्य।।
चौपाई 
चितरंजन उद्योग पुराना। रानीगंज सुकोल खजाना।।
बांकुड़ा वर्तन हित जाना। यह है अति उद्योग पुराना।२१।

बने बनाए कपड़े मिलते। गंजी बहुत काल से बनते।। 
शिल्पकला विद्या की नगरी। कोलकाता प्राचीन ठहरी।२२।

अतिनामी ढाका का मलमल।आती हमें याद यह पल पल।।
गृह उद्योग थे विपुल पुराने। गोरे लीन्हे लूट खजाने।२३।

जनसँख्या है घनी यहाँ की। दुर्गा पूजा उत्सव झाँकी।।
कोलकाता नगर प्रिय जाना। वणिज केंद्रका बना ठिकाना।२४।

पहली यही बनी रजधानी। गोरे प्रथम यही थल मानी।।
रहा नहीं यह- थल कंगाला। आज पतन मतकर बंगाला।२५।
दोहा
पूरब का यह प्रान्त जो, भारत का शुचि अंग।
प्रगति शील युग युग रहा, अपना प्यारा बंग।।
***
PB04. इतिहास : अरविंद श्रीवास्तव, ९४२५७ २६९०७












अरविंद श्रीवास्तव (शिक्षक, कवि,लेखक, संपादक, समीक्षक, वक्ता)
एम.ए (हिन्दी, अंग्रेजी, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, दर्शन शास्त्र, जे. ए. आई. आई. बी (हिंदी) 
पी-एच.डी. 
डी. आर. जे .एम. सी(पत्रकारिता) एवं संगीत व स्वास्थ्य के विभिन्न क्षेत्रों में डिप्लोमा होल्डर
रचना संसार-  
काव्य संग्रह ९, लघुकथा संग्रह २, धर्म तथा दर्शन ५, प्रेरक पुस्तक २, यात्रा वृत्त १, बाल साहित्य १। 
संपादन - मधुकर वाणी, साहित्य लोक, कायस्थ मंथन, रस भक्ति धारा, हम सफर (पत्रिकाएँ)  कई विशेषांक-यू• एस• एम •पत्रिका का दतिया विशेषांक तथा अनेक पुस्तकों का संपादन।  
अंग्रेजी में लेखन- उच्च कक्षाओं हेतु सीरीज, गाइड्स, ग्रामर बुक्स ८०  से अधिक।  
हिन्दी व अंग्रेजी में( लिखित व संपादित पुस्तकें ,पत्रिकाएं आदि)- १०० से अधिक। 
सम्मान-विदेश में (मास्को रूस, काठमांडू तथा म्यान्मार बर्मा  में) ७ सम्मान।  
 देश में-लोकसभा अध्यक्ष श्री ओमकृष्ण बिरला जी द्वारा 'साहित्य श्री ' सम्मान, उच्चायुक्त मारीशस  , गृह मंत्री (म.प्र. शासन),  अनेक विधायक  सहित १५० से अधिक सम्मान ।
 विशेष -जून २०१८ में मास्को में २ पुस्तकों का विमोचन, जनवरी २०२० में ३ पुस्तकों का विमोचन रंगून (बर्मा)में सम्पन्न  ।
संपर्क -१५० छोटा बाजार दतिया (म•प्र•) ४७५६६१ भारत। 
मोबाइल - ९४२५७ २६९०७।  
*
दोहा 
बंग राज्य महिमा अमित,करता हूँ गुणगान।
भारत के पूरब बसा,दुनिया में सम्मान।।
चौपाई 
भारत के पूरब-दिग शोभित।  बंग राज्य पर दुनिया मोहित ।।
इसका अति इतिहास पुराना । सभ्य-सुसंस्कृत जग ने माना ।१।

वर्ष सात सौ छप्पन आया। पाल वंश का शासन लाया।।
नृप गोपाल प्रथम था शासक। बंग राज्य हित शुभ फलदायक।२।

पाल वंश ने शासन कीन्हा। साम्राज्य विस्तार  कर दीन्हा।।
महिमावान पाल सिंहासन । वर्ष चार सौ उसका शासन।३।
दोहा 
पाल वंश शासन किया, ख्यात हुआ बंगाल ।
शासन में बदलाव तब,जनता भी बेहाल।।
चौपाई
सेन बीर तब करी चढ़ाई। पाल राजा ने शिकस्त खाई।।
सेन बीर का ध्वज फहराया। पाल वंश को मार भगाया।४।

बंग राज्य मुगलों को भाया। सेन राज्य का नाम मिटाया ।।
मुगलों ने सेनों से छीना। बहुत समय तक शासन कीना।५।
दोहा
परिवर्तन होते रहे, सत्ता हाथ अनेक ।
ईस्ट इंडिया कंपनी, बन कर आई नेक।।
चौपाई 
गोरों ने यह राज्य निहारा । छलियों ने व्यापार पसारा।।
सत्रह सौ सत्तावन आया । प्लासी में षडयंत्री साया ।६।

बक्सर युद्ध हुआ फिर  भारी। करे मीर जाफर गद्दारी।।
मुगलों ने थी बाजी हारी। गोरों के शासन की बारी।७।

दो सौ वर्ष चलाया शासन। क्रूर छल-कपट भरा प्रशासन।।
बंग भूमि चेतनता आई। पुण्य धरा ने ली अँगड़ाई।८।
दोहा
क्रान्ति भूमि ने कर दिया, आजादी का घोष।
गोरों को दिखने लगा, जन मन में आक्रोश ।।
चौपाई 
आजादी की उठी माँग तब । वीर सुभाष दिखाया करतब।
युवकों ने ताकत दिखलाई। गोरों की फिर शामत आई।९। 

पंद्रह  अगस्त का दिन पावन। सन् सैंतालिस मन अति भावन।।
नया बांग्ला जाग उठा था। वर्षों तक यह लुटा- पिटा था।१०। 
दोहा
बंग राज्य की धरा पर,जागृत रहा समाज।
सबके शासन को सहा,अब निज शासन आज।।
चौपाई 
बंगाली संस्कृति अनुपम है। जितना समझें उतना कम है।।
संघर्षों के दौर से गुजरा। झुका नहीं यह अनुपम निखरा।११।

बंगाली संस्कृति अनुपम है। जितना समझें उतना कम है।।
बांग्ला का संगीत निराला। गंगासागर मेला आला।१२।

हिमगिरि से माँ गंगा आई। गंगा सागर आन समाई।।
माँ काली का उत्सव प्यारा। बंग भूमि में अनुपम न्यारा।१३।

शस्य स्यामला धरती प्यारी। लोकसंस्कृति अद्भुत न्यारी। 
मानुस भला भद्र नहिं कायर। मिलें भवानी दुर्गा घर घर।१४। 

मेले राजा कथा कहानी। मिष्टि मनोहर बंगला बानी। 
बिखरी हैं इतिहास कथाएँ। सीखें सबक न इन्हें भुलाएँ।१५।  
दोहा
बंग भूमि पर सदा ही, सर्व धर्म समभाव ।
वर्णित यह इतिहास में, अब दिखता बदलाव।।
 
बंग राज्य की धरा पर,जागृत रहा समाज।
सबके शासन को सहा, अब निज शासन आज।।
***
PB05. प्राकृतिक सौंदर्य : अनिल अनवर, ७७३७६८९०६६, ८७६४७३७७८१














अनिल अनवर
माता-पिता    : श्रीमती तारा व श्री शारदा प्रसाद श्रीवास्तव ।
जन्म तिथि    : २७-७-१९५२। 
पैतृक ग्राम    : दरियावलाल का पुरवा, सुल्तानपुर। 
शिक्षा           : बी० एस सी०। 
डिप्लोमा      : इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग। 
सेवा            : भारतीय वायु सेना में।
सम्प्रति        : स्वतंत्र लेखन, संपादन मरु गुलशन पत्रिका।
पता            : ३३, व्यास कॉलोनी, एयर फोर्स, जोधपुर ३४२०११ भारत।
चलभाष      : ७७३७६८९०६६, ८७६४७३७७८१।   
*
दोहा 
सागर चरण पखारता, हिमगिरि शोभित भाल।
कविगुरु ने जिसको कहा, सोने का बंगाल।।

सुन्दर, सुखद सदा मनभावन। धरती इसकी है अति पावन।।
दार्जिलिंग, उत्तर के जनपद।  जहाँ भ्रमण है नित मंगलप्रद।१।  

पर्वत काट झूम की खेती। विविध भाँति की फ़सलें देती।
सुन्दर बहुत प्राकृतिक सुषमा। उच्च शिखर हिमगिरि की गरिमा।२।

सघन चाय बागान यहाँ पर। द्वार कहाता यह पूर्वोत्तर।
अनानास, लीची अरु कटहल। भाँति-भाँति के होते मृदु फल।३।

बहती शीतल वायु यहाँ पर। मेघ घूमते लगें धरा पर।।
नैरो गेज ट्रेन मनहारी। है आकर्षक यहाँ सवारी।४।

अधिक गोरखों की आबादी। जीवन शैली जिन की सादी।
सदा राष्ट्र-रक्षा को तत्पर। सैनिक मिल जाते हैं घर-घर।५।
दोहा 
कलिम्पोंग भी है यहीं, यहीं अलीपुर द्वार।
सुन्दर जलपाईगुड़ी, विस्तृत कूचबिहार।
चौपाई 
ग्राम-ग्राम में ताल-तलैया। प्रकृति नाचती ता-ता-थैया।।
सदा प्रचुर जल अरु हरियाली।  बंग-भूमि सुख देने वाली।६।

है फुटबाल लोकप्रिय खेला। उपजे धान, पान अरु केला।।
मीठा आम मालदा वाला। स्वाद अनूठा और निराला।७।

पटसन, जूट, नील की खेती। चमकीली नदियों की रेती।।
हरी सब्ज़ियाँ, साग प्रचुर हैं। कन्द-मूल-फल यहाँ मधुर हैं।८।

बाग़-बग़ीचे खेत हरे हैं। ताड़, नारियल वृक्ष भरे हैं।।
मत्स्य तथा मधुमक्खी पालन। सामिष भोजन का भी प्रचलन।९।
 
है अथाह जलराशि यहाँ पर। और वनों का जाल धरा पर।।
गंगा-बाँध फरक्का बैरेज। सुख-समृद्धि का देता मैसेज।१०। 
दोहा
झारखण्ड पश्चिम बसा, पूरब बांग्लादेश।
वृक्ष-विटप हर किस्म के, हरित-भरित परिवेश।
चौपाई 
जन-जागृति में सब से आगे। बंग जगाये, भारत जागे।
शान्ति निकेतन विद्या परिसर। 'गीताञ्जलि' थी रची जहाँ पर।११। 

यहीं हुए कविगुरु महान हैं। दो देशों के राष्ट्रगान हैं।।
रचे गए इक कवि के द्वारा। अनुपम गौरव बढ़ा हमारा।१२।  

मूल्यवान हैं खनिज यहाँ पर। बहु उद्योग पनपते घर-घर। 
जैव-विविधता विपुल बनी है। धरा यहाँ की बहुत धनी है।१३।

नृत्य, गीत-संगीत मधुरतम। है साहित्य रचा सर्वोतम।।
संस्कृति बहुत समृद्ध, पुरातन। वर्तमान विकसित अधुनातन।१४।

नगर-नगर नदियों की कल-कल। ग्राम-ग्राम तालाबों में जल। 
गौरवशाली संस्कृति वाला। अद्भुत है बंगाल निराला।१५।
दोहा 
भाँति-भाँति के शाक, फल, पकवानों के थाल।
पर मछली अनिवार्य है, सामिष है बंगाल।
चौपाई 
बैंगुन-भाजा, साग व मछली। तब बंगाली थाली असली।।
दाल-भात सँग लूची-पूरी।रसगुल्ला, सन्देश ज़रूरी।१६।

राजभोग, चमचम हैं खाते। मिष्ठान्नों से थाल सजाते।
मिष्टी दोही व रसमलाई। बंगाली मशहूर मिठाई।१७।

भाँति-भाँति के व्यञ्जन वाली। स्वाद भरी है पौष्टिक थाली।
और अन्त में पान चबाना। उस के बिन सम्पूर्ण न खाना।१८।

प्रशासनिक जनपद हैं बाइस। मुख्य खाद्य सब में है राइस। 
है सब की जलवायु सुहानी। सर्वसुलभ है खाना-पानी।१९।

महानगर केवल कलकत्ता। वहीं केन्द्रित इस की सत्ता।
यह भारत का सिंह-द्वार है। इस की हर महिमा अपार है।२०।
दोहा 
बना हावड़ा पुल यहाँ, चौड़ा गंगा पाट।
यहीं ख्यात बेलूर मठ, इस में कालीघाट।
चौपाई 
दर्शनीय, रमणीय नगर है। चहल-पहल है, जगर-मगर है।।
चौबिस घण्टे यह जगता है। यहाँ सभी का मन लगता है।२१।

नए-पुराने भ्रमण-स्थल हैं। कंकरीट के भी जंगल हैं।।
रोज़गार, व्यापार यहीं पर। जनता बसी अपार यहीं पर।२२।

पेट सभी का यह भरता है। मोहित भी सब को करता है।
यहीं डेल्टा सुन्दरवन है। करता चीता जहाँ भमण है।२३।

तीर्थ-राज है गंगासागर। जिस की महिमा कहते घर-घर।।
कहलाता जो मोक्षद्वार है। हर जन आता एक बार है।२४।

शक्ति-केन्द्र है राजनीति का। संचालक है अर्थनीति का।।
महाकेन्द्र है यह व्यापारिक। लोग यहाँ के हैं सामाजिक।२५।
दोहा 
हुआ विभाजित दो दफ़ा, अब पश्चिम बंगाल।
पीड़ायें सह-सह हुआ, बार-बार ख़ुशहाल।
***
PB06. भौगोलिक संरचना : तेजपाल शर्मा ९९५६७७९३६८












तेजपाल शर्मा
माता- स्व०श्रीमती कस्तूरी       
          देवी शर्मा।
पिता- स्व०श्री लक्ष्मी नारायण शर्मा।
जन्म- स्थान-- इरौली गूजर (मथुरा)।
जन्म-तिथि- १५ अक्टूबर १९५५।
शिक्षा- एम. ए. (हिन्दी), बी.एड.।
प्रकाशित कृतियाँ- १. मेरी कविता मेरे गीत, २. मैं अवधपुरी, मैं मथुरा हूँ , ३. कवि प्रणाम
सम्प्रति- अवकाश प्राप्त प्रवक्ता (जवाहर नवोदय विद्यालय)।
प्रधानाचार्य,श्री ब्रज आदर्श कन्या इंटर कॉलेज, मांट (मथुरा) ।
सम्पर्क- ९९५६७७९३६८।
*
बंगाल चित्रण
दोहा
दिश पूरब में शोभता, है बंगाल प्रदेश।
कला और साहित्य में, इसका नाम विशेष।।

काव्यकला धन धान्य से, सब प्रकार संपन्न।
इस बंगाल प्रदेश में, कोई नहींं विपन्न।।
चौपाई
बंग भूमि कितनी सुखदाई। शोभा श्री बरनी नहिं जाई।।
दक्षिण में सागर लहराता। मानो विजय गीत है गाता।१।

बोस सुभाष यही जन्म स्थली। अरु विवेक की है तपस्थली।।
बंकिम शरद गोद सुख पाए। गद्य पद्य सौरभ बिखराए।२।

कवि कुल गुरु रवीन्द्र कहाए। काव्यकला संगीत सुहाए।
शान्ति निकेतन के संस्थापक। गुरुवर थे जन मन में व्यापक।३।

दक्षिणेश्वर की महिमा न्यारी। रामकृष्ण की अमित दुलारी।
कोलकाता की काली मैया। पार लगातीं सबकी नैया।४।

कलकत्ता सुरम्य रजधानी, चरण पखारे सागर पानी।
कला साहित्य यहाँ पर पलते, राजनीति के चरचे चलते।५।
दोहा- 
सागर लहरें लहरकर, करती रहें किलोल।
देख देखकर दृश्य यह, उठतीं हृदय हिलोल।।
चौपाई 
सुंदर वन है सुंदर मनहर, हिरण बाघ विचरें तहँ मन भर।
दार्जिलिंग की शोभा प्यारी,  मोहे देख सकल नर-नारी।६।

शोभा सिलीगुड़ी मनभावन,  जलपाइगुड़ी अमित सुहावन।
इसके पावन अभयारण्ये,  हिरण गिलहरी बारहसिंघे।७।

हाथी बाघ व जीव वन्य जो, निर्भय विचरें जन्तु अन्य वो।
सुंदर जीव जगत का संगम, अति मनहर है दृश्य विहंगम।८।

वन्यजीव गृह जलदापारा, शक्तिपीठ जगजाहिर तारा।
तारापीठ शक्ति का संबल। सती नेत्र पत शुभ तीर्थस्थल।९।

वीरभूमि अति पवित्र पावन, भक्तों के मन को अति भावन।
वन्य जीव भी अभय यहाॅं हैं, ऐसा सुख फिर और कहाँ है।१०।
दोहा-
शक्तिपीठ सुंदर सुखद, दर्शन करते लोग।
दैन्य ताप से हो विमुख, ऐसा है संयोग।।
चौपाई-
धन्य क्षेत्र मालदा सुहावन, लभ कौशेय वसन मन भावन।
आम मालदा का है प्यारा, रसाल है यह रसाल सारा।११।

परिपूरित है रसाल वाला,  है मालदा रसद मतवाला।
जूट आदि का भी उत्पादक, कृषि भूमि है ये बहु व्यापक।१२।

गंगा सागर महिमा न्यारी, जाने सकल सभी नरनारी।
श्रद्धा संगम अति सुखकारी, अवगाहन आएँ नर-नारी।१३।

कपिल ऋषि आश्रम पर जाई, सागर में गंगा मिल धाई। 
निज पुरखों को मुक्ति दिलाई,  नृपति भगीरथ की पुण्याई।१४।

चमचम छैना पटुआ मज्जा,  खाने में है कैसी लज्जा।
मधुर यहाँ की सकल मिठाई,  सुस्वादिष्ट अमित सुखदाई।१५।
दोहा 
दोहा-निर्भय विचरण सब करें, लघु विशाल जो जीव।
अभयारण्य यही बने, इनके करुणासींव।।
चौपाई 
झलमुरी घुग्गी चाट मिठाई,  बंगाली मिष्ठान्न सुहाई।
खानपान यह सबको भाता,  जो खाता वह अति सुख पाता।१६।

साहित्य कला संगीत सरगम,  बजता, मन भाता है हरदम।
बैलूर मठ अध्यात्म का संगम,  दृश्य अलौकिक दिव्य विहंगम।१७।

रामकृष्ण शारदा तपस्थली,  यही विवेकानंद शुभ स्थली।
धीर वीर गंभीर बोस जी,  ज्ञानवान अरविंद घोष जी।१८।

देशभक्त स्वातंत्र्य पुरोधा,  वीर सुभाष क्रांति के योद्धा।
कतिपय शक्ति उपासक भारी,  कुछ को भक्ति साधना प्यारी।१९।

ऐसा है बंगाल हमारा,  अतिशय प्यारा कुछ कुछ खारा।
भरत भूमि का अंग दुलारा, यह बंगाल प्रदेश हमारा।२०।

दोहा 
मालदा जैसे क्षेत्र को, करिए सदा प्रणाम।
जूट कौशेय दे सदा, और खिलाता आम।।
चौपाई 
कला संस्कृति अभिमंडित है,  विवेक आध्यात्मिक पंडित है|
है सुभाष अति प्रचंड योद्धा,  क्रांति युद्ध का कुशल पुरोधा।२१।

बंकिम शरद रवींद्र दुलारे,  मात सरस्वती के अति प्यारे।
शरद छटा की विभा निराली,  बंकिम कला बड़ी मतवाली।२२।

इनका सदा त्रिवेणी संगम,  बांग्ला का साहित्य विहंगम।
नैसर्गिक सौन्दर्य सुहाना,  छटा देख मन स्वत: लुभाना।२३।

कवि की दृष्टि जहाँ तक जाती,  शोभा श्री बरनी नहीं जाती।
उन्नत ज्ञान विज्ञान यहाँ का,  बतलाओ है और कहाँ का।२४।

सागर नित प्रति अलख जगाता,  इसकी महिमा पल पल गाता।
गंगा का अवसान यहाँ है,  ठौर न ऐसा और कहाँ है।२५।
दोहा-
हर प्रकार मन मोहते, यहाँ के चित्र  विचित्र।
विचरण करने से यहाँ, बनें गैर भी मित्र।।
दोहा--इस प्रकार का है सुखद, यह बंगाल प्रदेश।
भक्ति शक्ति से पूर्ण है, अनुपम और विशेष।।  
***
७. रमेश श्रीवास्तव 'चातक'










PB07  रमेश श्रीवास्तव 'चातक' ९४०६७०६५६५  
जन्म - ३ अक्तूबर १९४८, सिवनी (भारत)।
शिक्षा - एम॰ ए॰हिंदी, राजनीति शास्त्र, बी॰ एड॰।
संप्रति - सेवा निवृत्त  शिक्षक। अध्यक्ष अखिल भारतीय साहित्य परिषद  शाखा सिवनी। सचिव श्री महावीर व्यायामशाला सिवनी।
 माता - स्व॰ श्रीमती गौरी बाई।
पिता - स्व॰ श्री भैरों प्रसाद श्रीवास्तव।
प्रकाशित पुस्तक - इंद्रधनुष
   एम॰ ए॰ के छात्रों के लिए।
डाक पता - शिव मंदिर, डूंडा सिवनी, कबीर वार्ड, सिवनी म॰ प्र॰ भारत ४८०६६१।
चलभाष - ९४०६७०६५६५, ८७७०९६५६६५।
*
दोहा
वीर प्रसवनि बंग धरा, करें सभी गुणगान।
रवि किरणों के तेज ने, सदा बढ़ाया मान।।
चौपाई 
देवभूमि है भारत माता। बंग भूमि से सबका नाता।।
सतयुग से कलियुग तक आए। संतों ने संदेश सुनाए।१।

आदि काल से धर्म मनुजता। बंग भूमि है सबकी माता।।
जाग्रति का संगीत सुनाओ। खुद जागो फिर देश जगाओ।२।

गीत-संगीत सजी सुर माला। बंग गीत है सबसे आला।।
राम कृष्ण से गुरु सुखदाई। थी नरेंद्र को राह दिखाई।३।

धर्म ध्वजा जग में फहराई। भारत महिमा सबने गाई।।
दक्षिणेश्वर की छटा निराली। यहाँ विराजे माता काली।४।

बिन माँगे माँ देने वाली। भरती सबकी झोली खाली।।
शांति निकेतन धाम बनाया। कवि ने जन गण मन गुंजाया।५।
दोहा
जग माता जग से बड़ी, माँ से बड़ा न अन्य।
नित माँ की पूजा करें, हो सुख शांति अनन्य।।
चौपाई 
गोरे जब भारत में आए, व्यापारी बन जाल बिछाए।
कल कारखाने भी लगाए, धन भारत में खूब कमाए।।६।।

व्यापारी शासक बन बैठे, फूट डालकर दौलत ऐंठे।
हाथ बाँध हम रहे देखते, अपनी हालत किससे कहते।।७।।

दो सौ वर्ष किया था शासन, मर मर कर जीता था जन जन।
शतरंज की बाजी बिछाई, रियासतों को लूटा भाई।।८।।

भोली जनता समझ न पाई, अपने हाथों जान गँवाई।
फिर शिक्षा का जाल बिछाया, पढ़े लिखों को दास बनाया।।९।।

अविवेकी फौजों की दम पर, नाचे खूब हमारे सिर पर।
कदम कदम पर ठोकर मारी, जंग हमारी भी थी जारी।।१०।।
दोहा
कर उपवास मना रहे, घर घर में नव वर्ष।
देवी की आराधना, सबको देती हर्ष।।
चौपाई 
नाम विवेकानंद सुहाना। जग ने जिसका लोहा माना।।
धर्म सभा में महिमा गाई। परहित सरिस धरम नहीं भाई।११।

मानवता की अलख जगाई। सब धर्मों की नींव बताई।।
बंगाली भाषा अति प्यारी। सारे जग में सबसे न्यारी।१२।

सर्व धर्म समभाव भावना। भारत की यह रही कामना।।
बंकिम जी ने अलख जगाई। संतानों ने ली अँगड़ाई।१३।

वंदे मातरम गीत गाया। फाँसी फंदा गले लगाया।।
क्रांतिवीर सुभाष जब आए।। आजादी का नारा लाए।१४।

आजाद हिंद फौज बनाई। अंग्रेजों की नींद उड़ाई।।
युवा हृदय सम्राट कहलाए। नेता जी की पदवी पाए।१५।
दोहा
देश प्रेम के भाव से, बढ़ता जब अनुराग।
तब बलिदानों के लिए, सीने लगती आग।।
चौपाई 
बंग भूमि ने ली अँगड़ाई, अंग्रेजों की शामत आई।
फिर शंखनाद हुआ क्रांति का, नया सवेरा हुआ शांति का।।१६।।

फिरंगियों ने जान बचाई, देश छोड़कर भागे भाई।
जान बची सो लाखों पाए, लौट के बुद्धू घर को आए।।१७।।

रेशम मलमल के परिधान, ये बंगाल की हैं पहचान।
हरी भरी प्रकृति है सुहाती, सबके मन को बहुत लुभाती।।१८।।

चाय बागान शान यहाँ की, खुशबू है पहचान जहाँ की।
चुसकी लेकर नींद भगाते, सुबह सुबह हर दिन गुण गाते।।१९।।

हावड़ा ब्रिज  बड़ा है साधन, आवागमन लगे मनभावन।
सफर छोटी रेल का भाता, बीते दिन की याद दिलाता।।२०।।
दोहा
आन बान अरु शान है, भारत की पहचान।
इसकी रक्षा के लिए, वीर हुए बलिदान।।
चौपाई 
अब तुम मुझे खून दो भाई। लंबी लड़ना हमें लड़ाई।।
क्रांतिकारियों की यह धरती। सारी दुनिया पैरों पड़ती।२१।

सती प्रथा को बंद कराया। घर घर नई चेतना लाया।।
शरतचंद अरु रास बिहारी। वंदन करती जनता सारी।२२।

क्रांतिपुरुष की जीवन लीला। अंतर्मन को करती गीला।।
सागर की लहरें लहराई। सूरज ने किरणें बिखराई।२३।

बहे पवन चंचल पुरवाई। जन जीवन ने ली अँगड़ाई।।
गीत गोविंद कृतिवास गाते। प्रभु महिमा जन जन पहुँचाते।२४।

पर्व दशहरा अनुपम भाई। माँ भवानी की छवि सुहाई।।
सब सुहागिन नाचती गाती। झूम झूम कर शंख बजाती।२५।
दोहा
त्याग और बलिदान से,  बनता देश महान।
अमर शहीदों पर हमें, सदा रहा अभिमान।।

हो समाज में शांति सुख, ऐसा करें प्रयास।
दीन हीन मजबूर की, कभी न टूटे आस।।
चौपाई 
विविध कला की पावन नगरी। कोलकता कंचन की गगरी।।
कलाकार वा खेल खिलाड़ी। रहे देश में सदा अगाड़ी।२६।

रसगुल्ला संदेश मिठाई। आँखें देख जीभ ललचाई।।
सुंदर वन का देख नजारा। पुलकित जन का तन-मन सारा।२७।

हिमगिरि से गंगा जी आई। प्रिय सागर के अंक समाई।।
गंगा सागर महिमा भारी। दर्शन कर तरते नर-नारी।२८। 
दोहा
बंग वीर बलिदान से, भरा हुआ इतिहास।
आम जनों के बीच में, बने हुए हैं खास।।

वीरों के उपकार का,कैसे होगा मोल।
प्राण वतन पर दे दिया, चातक जो अनमोल।। 

तन शोभा परिधान है, मन शोभा गुण ज्ञान।
तन मन की शोभा बढ़े,सही रूप पहचान।। 

धोती कुर्ता है पहनावा,बड़ी सादगी नहीं दिखावा।
मछली चाँवल सादा भोजन, वाणी मोहे जन जन का मन।।२९।।

गीत संगीत की अगुवाई, सारे जग में धाक जमाई।
कला ज्ञान की धरा सुहानी, जिसकी महिमा सबने मानी।।३०।।

खान पान सँग पान चबाना, पान महिमा देश ने जाना।
दर्शनीय सुंदर मन भावन, नगर मनोहर लोक लुभावन।।३१।।

आते हैं हर  दिन सैलानी, सबकी अपनी एक कहानी।
बंग भूमि की पावन महिमा, कही न जाए इसकी गरिमा।।३२।।

दोहा
मातृ भूमि का कर्ज है, मानो सब उपकार।
चातक तुम करना नहीं, कभी देश अपकार।। 
***
वर्ग 1 जनसांख्यिकी
1-राज्य की उत्पत्ति,स्थापना,आधार  2-राजधानी 3-जनसंख्या 4-आर्थिक स्थिति 5-शिक्षा का स्तर 6-धर्म  7-मंडल तथा जिले  8-नगर तथा कस्बे आदि-आदि 
वर्ग 2(संस्कृति, कला, साहित्य ) 
9 -लोकगीत
10-लोकनृत्य
11-लोकभाषा
12-खानपान
13. व्रत
14-त्यौहार
15 वास्तुकला 
16 मूर्तिकला 
17 वेशभूषा 
18  साहित्य आदि-आदि 

वर्ग 3 ( उपलब्धियाँ) 
19- उत्पादन में प्रमुख 
20 प्रमुख व्यवसाय 
21. निर्माण में सर्वोपरि 
22-स्मारक
23. नई खोज 
24.प्रमुख बातें 
25. मुख्य उपलब्धियां आदि 

वर्ग 4 ( इतिहास) 
26 ऐतिहासिक घटनाएँ 
27. मेला ,कुम्भ
28.राजा, महाराजा 
29 पौराणिक कथाएँ
30. ऐतिहासिक यात्रा आदि-आदि 

वर्ग 5-(प्राकृतिक सौन्दर्य) 
31-पशु 
32 -पक्षी
33-पुष्प
34-वृक्ष
35- पर्यटन स्थल
36-झीलें
37 नदियां आदि-आदि 

वर्ग 6 ( भौगोलिक संरचना) 
38-बांध
39 समुन्द्र 
40-जलवायु
41. प्रदेश की सीमाएं 
42 पहाड़ / पठार 
43 खनिज 
44 मिट्टी आदि-आदि 
 
वर्ग 7 (प्रमुख व्यक्तित्व) 
45- खिलाड़ी 
46 साहित्यकार 
47 संत महात्मा 
48- सेनानी 
49. नेता 
50. अभिनेता 
51. गायक 
52.नर्तकी
53. चित्रकार आदि-आदि
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बंगाल में पाषाण युग के अवशेष मिले हैं जो 20,000 साल पहले के हैं। स्वदेशी आबादी बंगाल में कोला, भील, संथाल, शबारा और पुलिंडा जैसी जनजातियां और ऑस्ट्रिक और ऑस्ट्रो-एशियाई मूल के लोग शामिल हैं। बंगाल एक ४,००० साल पुरानी सभ्यता है जो गंगा के किनारे ब्रह्मपुत्र के बीच पनपी और गंगा के डेल्टा के धन के साथ खुद को बनाए रखा। राज्य के शुरुआती शहरों के अवशेष वैदिक काल के हैं। बांग्लादेश में सबसे पुराना पुरातात्विक स्थल महास्थानगढ़ है, जो 700 ईसा पूर्व का है। बंगाल की संस्कृति और जातीयता वैदिक लोगों से अलग थी। उत्तरार्द्ध ने बंगाल के लोगों को 'दस्यु' या राक्षसों के रूप में संदर्भित किया । सिकंदर की वापसी:

ग्रीक यात्री और इतिहासकार मेगस्थनीज ने अपनी पुस्तक इंडिका (300 ईसा पूर्व) में बंगाल को गंगारिदाई के रूप में संदर्भित किया। जब सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया और पोरस को हराया, तो वह पूरे भारत को जीतना चाहता था और पूर्व की ओर चला गया जहां उसे गंगारिदाई योद्धाओं की शक्तिशाली ताकतों के बारे में पता चला। सिकंदर ने टॉलेमी और डियोडोरस द्वारा लिखित गंगा डेल्टा के वृत्तांत पढ़े। ग्रीक इतिहासकार डियोडोरस सिकुलस (90 ईसा पूर्व -30 ईसा पूर्व) ने गंगारिदाई योद्धाओं को इस प्रकार चित्रित किया:

"नदी को गंगा कहा जाता है, जिसकी चौड़ाई बत्तीस स्टेडियम की थी, और किसी भी अन्य भारतीय नदी की तुलना में अधिक गहराई थी। इसके अलावा फिर से प्रसीओ और गंडारिदाई राष्ट्र के प्रभुत्व स्थित थे, जिनके राजा, ज़ांद्राम्स, के पास एक था २०,००० घोड़ों, २००,००० पैदल सेना, २,००० रथों और ४,००० हाथियों की सेना को प्रशिक्षित और युद्ध के लिए सुसज्जित किया गया। अब यह (गंगा) नदी, जो ३० स्टेडियम चौड़ी है, उत्तर से दक्षिण की ओर बहती है, और अपना पानी समुद्र में खाली कर देती है। गंडारीदाई की पूर्वी सीमा, एक ऐसा राष्ट्र जिसमें हाथियों की सबसे बड़ी संख्या और आकार में सबसे बड़ी संख्या है।" सिल्क रूट का एंट्रेपोट:

बंगाल हमेशा से भारतीय उपमहाद्वीप के पूर्वी हिस्सों का प्रवेश द्वार रहा है। यह बंगाल की खाड़ी से हिमालय तक का सबसे छोटा और आसान मार्ग है। इस तरह के भौगोलिक लाभ ने बंगाल को एक वाणिज्यिक केंद्र बना दिया जो समुद्र को प्रसिद्ध रेशम मार्ग से जोड़ता था। महाभारत में उल्लेख:

महाभारत में बंगाली राजाओं चित्रसेन और सनुद्रसेन का उल्लेख है, जिन्हें पांडव राजा भीम ने हराया था। यह एक लोककथा के बारे में भी बात करता है कि भीम एक जहरीले तीर से घायल हो गए थे और वे बंगाल के दक्षिणी हिस्से, पतराताल को चंगा करने के लिए आए थे। बंगाल का सबसे दक्षिणी भाग सुंदरवन की मैंग्रोव भूमि की ओर संकेत करता है।

घटनाओं के एक महत्वपूर्ण विकास में, सुंदरबन के पाथर प्रतिमा ब्लॉक में गोवर्धनपुर की सतह के नीचे हाल ही में तीसरी शताब्दी की सभ्यता की खोज की गई है। इस जगह पर कड़ाही और बर्तनों के अवशेष हैं जिनका उपयोग हर्बल दवाएं बनाने के लिए किया जाता था। इसे बंगाल की खाड़ी क्यों कहा जाता है?

उत्तर सीधा है। बंगाल के शासकों ने हमेशा नौसैनिक विस्तार पर ध्यान दिया है। बंगाल, जावा, सुमात्रा और सियाम (अब थाईलैंड) के बीच व्यापार संबंधों का अब भी पता लगाया जा सकता है।

श्रीलंका के इतिहास, महावंश के अनुसार, बंगाल के राजकुमार विजया सिम्हा ने 544 ईसा पूर्व में लंका (आधुनिक दिन श्रीलंका) पर विजय प्राप्त की और 'सिंहल' नाम गढ़ा।

बंगाल में साम्राज्य:

मौर्य वंश (324 ईसा पूर्व - 185 ईसा पूर्व)

चंद्रगुप्त मौर्य ने उत्तर-पूर्व, तमिल और कलिंग को छोड़कर सभी भारतीय प्रांतों को एकीकृत किया। उसका साम्राज्य बंगाल से बलूचिस्तान तक फैला हुआ था। उसके शासनकाल के दौरान, बंगाल धन के साथ फला-फूला और उसके नौसैनिक बेड़े मजबूत हुए। गौड़ साम्राज्य (590 सीई - 626 सीई)

मौर्य साम्राज्य के बाद, अन्य राज्य और राजवंश जैसे गुप्त, कण्व, शुंग और महामेघवाहन बंगाल के सिंहासन पर चढ़े। लेकिन यह राजा शशांक के शासन के दौरान था कि बंगाल ने एक और समृद्ध काल देखा। शशांक एक मजबूत शासक था जिसने बंगाल की वास्तुकला और कैलेंडर का विकास किया। वह बौद्ध समुदायों पर अत्याचार करने और उन्हें बंगाल से बाहर निकालने के लिए कुख्यात है। शशांक की राजधानी कर्ण सुवर्णा को अब मुर्शिदाबाद के नाम से जाना जाता है।

मल्ला राजवंश

जिसे हम आधुनिक पश्चिम बंगाल में एक पश्चिमी जिले बांकुरा के नाम से जानते हैं, जिसे कभी मल्लों की भूमि मल्लभूम के नाम से जाना जाता था। मल्ल राजाओं ने सातवीं शताब्दी से बंगाल के पश्चिमी प्रांतों पर शासन किया और उनके वंश का पता आज तक लगाया जा सकता है। उनके अंतिम राजा कालीपाद सिंह ठाकुर 1930 में मल्लभूम के राजा बने और 1983 में अपनी मृत्यु तक 'शासन' किया।

पाल साम्राज्य (750 सीई - 1200 सीई)

अक्सर बंगाल के 'स्वर्ण युग' के रूप में जाना जाता है, पाल साम्राज्य ने वास्तव में बंगाल की संस्कृति और राजनीति के मानकों को उठाया। बौद्ध दर्शन के अनुयायी, पाल राजाओं ने शास्त्रीय भारतीय दर्शन, साहित्य, चित्रकला और मूर्तिकला अध्ययन को बढ़ावा दिया। यह इस अवधि के दौरान था कि बंगाली भाषा पूरी तरह से बनाई गई थी। महाकाव्य और गाथाएँ 'मंगल काव्य' जैसे लिखे गए थे। पाल अपने युद्ध हाथी घुड़सवार और मजबूत नौसैनिक बेड़े के लिए भी जाने जाते थे। मध्यकालीन बंगाल:

बंगाल सहित भारत का मध्यकालीन इतिहास सल्तनत, आक्रमण, लूट, सांस्कृतिक सुधार और स्थापत्य प्रतिभा का है।

सल्तनत:

खिलजी वंश (1200 सीई - 1230 सीई), मामलुक सल्तनत (1227 सीई - 1281 सीई), तुगलक सल्तनत (1324 सीई - 1339 सीई), इलियास शाही (1435 - 1487) के राज्य के बैनर तले इस्लामी शासक। सूरी साम्राज्य (1532 - 1555) मुख्य रूप से लुटेरे थे। शासन दांव पर लगा था और बंगाल की सामाजिक-राजनीतिक अखंडता गंभीर संकट में थी।

मुगल सूबेदार:

मुगल साम्राज्य के सहयोगियों और कमांडेंटों के बीच जिलों या सूबों को वितरित किया गया था। अकबर, जहांगीर और औरंगजेब जैसे मुगल बादशाहों ने बंगाल प्रांत के लिए उच्च सम्मान रखा और इस क्षेत्र के धन के बारे में भी जानते थे।

नवाब लिंक:

मुर्शीद कुली खान उर्फ ​​अला उद-दौला मुगल सम्राट बहादुर शाह प्रथम के शासनकाल में बंगाल के अंतिम मुगल सूबेदार थे। डेक्कन भारत में एक हिंदू ब्राह्मण पैदा हुए, मुर्शीद ने बंगाल के नवाब के रूप में सिंहासन ग्रहण किया। उन्होंने शशांक के कर्ण सुवर्ण के क्षेत्र का नाम बदलकर मुर्शिदाबाद कर दिया।

कोच राजवंश (1515 - 1949)

कूचबिहार रियासत को आजादी के बाद बंगाल के राजनीतिक मानचित्र में शामिल किया गया था। इससे पहले, बंगाल के उत्तरी क्षेत्र पर कोच राजवंश का शासन था। कोच राजाओं का प्रसिद्ध महल आज भी कूचबिहार शहर में स्थित है। मराठा आक्रमण:

18वीं शताब्दी में मुर्शिद कुली खान की मृत्यु के बाद राजनीतिक उथल-पुथल के दौरान, मराठा साम्राज्य ने बंगाल पर आक्रमण करने का फैसला किया। नागपुर के मराठा महाराजा रघुजी के नेतृत्व में, मराठा सेना ओडिशा और बंगाल के कुछ हिस्सों पर कब्जा करने में सक्षम थी, लेकिन पूरे प्रांत पर कब्जा करने में विफल रही। शब्द 'बरगी ', जो मराठा लुटेरों को संदर्भित करता है, अभी भी पश्चिम बंगाल में इस्तेमाल किया जाने वाला एक सामान्य शब्द है (यह एक लोरी में भी प्रयोग किया जाता है!) प्लासी और ब्रिटिश:

भारत का प्रवेश द्वार होने के नाते, एक मजबूत नौसैनिक उपस्थिति, धन से भरी भूमि और एक कमजोर मंत्रिपरिषद - इस सवाल का जवाब देने के लिए कि अंग्रेजों ने भारत पर कैसे आक्रमण किया, इन चार कारकों पर वापस आना चाहिए।

प्लासी की लड़ाई (जून 1757), जिसने अंग्रेजों को बंगाल में शासकों के रूप में अपनी पकड़ मजबूत करने की अनुमति दी, वह केवल एक भयावह विश्वासघात की साजिश पर पर्दा था।

बंगाल के अंतिम स्वतंत्र नवाब मिर्जा मुहम्मद सिराजुद्दौला ने अंग्रेजों को बंगाल से मलमल और जूट खरीदने का वाणिज्यिक लाइसेंस दिया। अंग्रेजों ने सिराज के मंत्रियों के साथ छेड़छाड़ की और उन्हें नवाब के खिलाफ खड़े होने के लिए रिश्वत दी।

सिराज को उसके भरोसेमंद सहयोगी मीर जाफर और अन्य मंत्रियों ने धोखा दिया था। वह प्लासी की लड़ाई हार गया और बंगाल पश्चिमी उपनिवेशवादियों से हार गया।
ब्रिटिश बंगाल:

कलकत्ता (अब कोलकाता) में फोर्ट विलियम भारत में पहला ब्रिटिश गढ़ था। हालांकि सिराज इस पर कब्जा करने में सक्षम था, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद, अंग्रेजों ने इसे फिर से बनाया और इसे एक गढ़वाले, तोप-सज्जित सैन्य अड्डे में बदल दिया।

मुगल साम्राज्य के पतन के बाद, भारतीय संस्कृति और राजनीति का ध्यान दिल्ली से कलकत्ता में स्थानांतरित हो गया। यह शहर धीरे-धीरे ब्रिटिश भारत की राजधानी बन गया। 1911 तक ऐसा ही रहा।

बंगाल ने 1776 और 1942 में दो विनाशकारी अकाल और ब्रिटिश राज के तहत 1905 और 1947 में दो विभाजन देखे हैं। इस प्रांत ने १९०५, १९४७ और १९७१ में तीन प्रवासों को सहन किया। शासन के अलावा, ब्रिटिश राज ने बंगाल की मूल आबादी के लिए कयामत का जादू बिखेरा।उपनिवेशवादियों के साथ पहली बार बातचीत और घनिष्ठता के कारण, बंगाली समुदाय आधुनिक विज्ञान और साहित्य में सबसे उन्नत बन गया, जिसने बंगाल पुनर्जागरण को जन्म दिया।

बंगाल पुनर्जागरण:

बंगाल पुनर्जागरण ने १९वीं और २०वीं शताब्दी में बंगाल प्रांत से असाधारण व्यक्तित्वों और दूरदर्शी लोगों का उदय देखा। छात्रों के बीच स्वतंत्र सोच को प्रोत्साहित किया गया, जातिगत भेदभाव की निंदा की गई, और साहित्य और विज्ञान को प्रगति के एजेंट के रूप में देखा गया।

'आधुनिक भारत के जनक' राजा राम मोहन राय पुनर्जागरण के प्रणेता थे। पंडित ईश्वर चंद्र विद्यासागर, स्वामी विवेकानंद, आचार्य जगदीश चंद्र बोस, सत्येंद्र नाथ बोस, बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय और रवींद्रनाथ टैगोर ने आंदोलन को आगे बढ़ाया और बंगाल को भारत में प्रगति और संस्कृति का चेहरा बनाया।स्वतंत्रता आंदोलन:

बंगाल ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अनुशीलन समिति और जुगंतर जैसी क्रांतिकारी इकाइयों ने बंगाल के युवाओं को इकट्ठा किया और उन्हें विदेशी शासकों के खिलाफ लड़ने के लिए प्रशिक्षित किया।

चित्तरंजन दास, सुरेंद्रनाथ बनर्जी, प्रफुल्ल चाकी, जतिंद्रनाथ मुखर्जी, खुदीराम बोस, सूर्य सेन, बिनॉय बसु, बादल गुप्ता, दिनेश गुप्ता, मातंगिनी हाजरा, सरोजिनी नायडू, अरबिंदो घोष, राशबिहारी बोस सहित भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के कई समर्थक बंगाल से आए थे। , श्यामाप्रसाद मुखर्जी और कई अन्य।भारतीय सशस्त्र स्वतंत्रता संग्राम के चेहरे नेताजी सुभाष चंद्र बोस को कई अन्य भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों की तरह बंगाल में बढ़ावा दिया गया था। अंडमान में सेलुलर जेल की दीवारें बंगाली युवाओं के बलिदान की गवाह हैं, क्योंकि जेल में बंद क्रांतिकारियों की सबसे अधिक संख्या बंगाल से आई थी।स्वतंत्रता के बाद बंगाल:

जबकि भारतीय राजनीति का दायित्व उत्तर-पश्चिमी होता गया, इस तथ्य पर कि 1947 और 1971 में बंगाल को दो बैक-टू-बैक विभाजन और पलायन का सामना करना पड़ा, पर्याप्त प्रशासनिक ध्यान आकर्षित नहीं किया। बांग्लादेश मुक्ति संग्राम ने बंगाल के युवाओं में आक्रोश पैदा कर दिया।

1970-71 में, राज्य ने नक्सली आंदोलन के रूप में सबसे बड़ी युवा क्रांति देखी। 1971 नक्सली आंदोलन के दौरान समाचार अंश

बाद में इसे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) द्वारा शासित किया गया, एक 35 साल का शासन जिसे 2011 में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने हटा दिया था।

टीएमसी को 19 मई 2016 को सत्ताधारी पार्टी के रूप में फिर से चुना गया था।
पश्चिम बंगाल (संशोधित)
PB01. जनसांख्यिकी : ज्योति जैन, ८१६७८ ८४४२७ 
वर्ग 1 जनसांख्यिकी
1-राज्य की उत्पत्ति, स्थापना,आधार 2-राजधानी 3-जनसंख्या 4-आर्थिक स्थिति 5-शिक्षा का स्तर 6-धर्म  7-मंडल तथा जिले  8-नगर तथा कस्बे आदि












ज्योति जैन'ज्योति'
जन्म - २८ जनवरी। 
पिता - श्रीमान मानिक चंद जैन। 
माता - श्रीमती मालती देवी जैन। 
शिक्षा - बी.ए.। 
प्रकाशित पुस्तक - मेरे मन के सारथी (महावीर दोहा चालीसा)। 
पता - ज्योति जैन'ज्योति'
पोस्ट - कोलाघाट,गाँव- बाड़बोरिसा,जिला- पूर्व मेदनीपुर ७२११३४ 
राज्य - पश्चिम  बंगाल, भारत।  
चलभाष - ८५१४० ४४०१८ ।  
ई मेल- jyotijain2223@gmail.com । 
*
दोहा
कुदरत की अनुपम छटा, कहलाता सोनार।
भारत के है पूर्व में, बंगभूमि आमार।।
चौपाई 
भारत माता के आँगन  का।  एक फूल जो हिंद सदन का।। 
हमको दिलोजान से प्यारा, है पश्चिम बंगाल हमारा।१। 

हमें  गर्व  यह धरती प्यारी। मातृभूमि  है  बंग  हमारी।।
तेइस हैं कुल ज़िले हमारे, अपने में जो अनुपम सारे।२। 

अति पावन यह बंग ज़मीं है। गंगासागर  तीर्थ  यहीं है।।
संत कपिल का जहाँ बना घर। मेला लगता उसी जगह पर।३। 

हरिक माह में  पूजा उत्सव । 'ज्योति' स्वर्ग सा दिखता कलरव।
होली, दुर्गा पर्व, दिवाली। अधर ईद के खिलती लाली।४।

सजी-धजी कुदरत की प्याली। दार्जिलिंग की छटा निराली।।
अमित यहाँ का मौसम धानी। भरी धूप  में  बरसे  पानी।५। 
दोहा
सरिता निर्झर बह रही, बन जीवन की आस।
धरती पर है बंग की, जल संसाधन खास।।
चौपाई
सभी ओर से नदियाँ बहतीं। हरियाली के किस्से गढ़तीं।।
गाँव शहर का जीवन  यापन। खेती-बारी अव्वल साधन।६। 

शिक्षा सबको  मिले यहाँ  पर। सुत सम बेटीं पाती अवसर।।
सीधा-साधा बँगला जीवन। धोती कुर्ता पहने जन-जन।७।

नारी का भी रूप अनोखा। पहने साड़ी दिखतीं चोखा।।
मछली चावल इनका भोजन। आलू चौखा खाते  बैंगन।८।

तरह  तरह की  भाषा  बोली। रहते सबमिल बन हमजोली।।
बौद्ध जैन  हो या  हो   हिंदू । सबकी इस धरती पर ख़ुश्बू।९।

जन्मभूमि स्वामी-सुभाष की। बोस जतिन टैगोर दास की।।
क्रांतिकारियों का देवालय। वीरों का कहलाता आलय।१०।
दोहा
ज्ञान तथा विज्ञान का, 'ज्योति' बंग भंडार।
पौधे में भी प्राण का, दिया विश्व को सार।।
चौपाई
ओज बंग की ऐसी बिखरी। तारीख़ी   पन्नों में  निखरी।।
अति पुनीत थी किस्मत पापाई। जो मैं इस धरती पर आई।११।

अर्थ नीति  है  दुविधाकारी। डिजिटल सिस्टम लगता भारी।।
चौदह प्रतिशत धानोत्पादन। करे बंग है तन्हा अर्जन।१२। 

भूख  गरीबी अरु बेकारी। कहे  समस्या है  सरकारी।।
सकल  घरेलू  उत्पादन  का। छठा देश को हिस्सा देता।१३।

बंग दृष्टि से जनसंख्या  की। जगह  देश में पाए चौथी।।
इसकी धरती में श्यामलता। धान स्वर्ण सा इसपर उगता।१४।

दार्जिलिंग की चाय निराली। रंगत बेशक  उसकी काली।
सिक्किम इसके शीश विराजे । पग में जिसके ढाका साजे।१५। 
दोहा
दार्जिलिंग की चाय की, सीरत होती खास। 
तन को देती ताजगी, मन को आती है रास।।
चौपाई
जग में महके बनकर संदल। कोलकाता का तारामंडल।।
कोलकाता का रूप अनोखा। इस नगरी का रँग है चोखा।१६।

कोलकाता औद्योगिक नगरी। अर्थचक्र से  भरती  गगरी।।
माँ काली कोलकातावाली। करे बंग  भू की रखवाली।१७।

यहाँ हावड़ा पुल मनभावन। जिसपर चलते हरदम वाहन।।
दो  खंभों पर  खड़ा सत्य  है। दर्शनीय सच बहुतायत है।१८। 

बिना मिठाई  सूनी थाली। भरा पेट भी लगता खाली।।
चमचम रसगुल्ले-संदेसे। खाना चाहें लोग जहां के।१९। 

देश  प्रेम से ओत  प्रोत  है। बलिदानों से जली ज्योति है।।
बंग  श्रृंखला है वीरों  की। घर आजादी के तीरों  की।२०। 
दोहा
प्रमुख राज्य यह देश का, भारत माँ की शान।
पूरब में बंगाल है, भारत का अभिमान।।
चौपाई
भक्ति भाव भी अति है पावन। मातृ बंग  का उजला  दामन।।
मानवता का पाठ पढ़ाया, परमहंस ने हमें सिखाया।२१। 

साहित्यिक भू यह कहलाती। ऋषि-मुनियों की धरा कहाती।।
कला शिल्प से धरा सुशोभित। हस्तकला करती मन मोहित।२२। 

सघन यहाँ पर हैं वन उपवन। सुंदरवन से परिचित जन-जन।।
करते बाघ मुक्त विचरण हैं। वनजीवों  के पड़े चरण हैं।२३। 

हरसिंगार  बहुत  मनभावन। राज्य फूल का है अभिवादन।।
कई व्याधियाँ हरनेवाला। कहते इसको तन रखवाला।२४। 

नैतिक मूल्यों के संरक्षक। विद्यासागर नारी रक्षक।
आजादी-हित फौज बनाई। नेताजी ने की अगुवाई।२५। 
दोहा
हरियाली संग संस्कृति,' ज्योति' बंग पहचान। 
कर्मशीलता का मिला, कुदरत से वरदान।।
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PB02. संस्कृति 
वर्ग २ (संस्कृति, कला, साहित्य) 
लोकगीत, लोकनृत्य, लोकभाषा, खानपान, व्रत, त्यौहार, वास्तुकला, मूर्तिकला, वेशभूषा, साहित्य।
 प्रो. (डॉ.) साधना वर्मा 












 प्रो. डॉ. साधना वर्मा 
जन्म - १९५७ बिलासपुर, छत्तीसगढ़, भारत। 
माता पिता - स्व. आशा सहाय - स्व. प्रो. सत्य सहाय। 
शिक्षा - एम. ए. अर्थशास्त्र, पी-एच. डी.।
संप्रति - प्राध्यापक, शासकीय स्नातकोत्तर स्वशासी महाविद्यालय। 
संपादन - ३ पुस्तकें, कई स्मारिकाएँ-पत्रिकाएँ, लेखन २५ शोधलेख। 
पता - ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१। 
ईमेल - salil.sanjiv@gmail.com .
चलभाष - ९४२५१८३२४४।  
*
दोहा 
चित्र गुप्त साकार हो, विधि-हरि-हर रच सृष्टि। 
शारद-रमा-उमा सहित, करें कृपा की वृष्टि।।
रिद्धि-सिद्धि विघ्नेश आ, करें हमें मतिमान। 
वर दें भारत भूमि हो, सुख-समृद्धि की खान।। 
चौपाई 
'भारत' की महिमा का वर्णन। करते युग-युग से मिल कवि जन।।
देश सनातन वैभवशाली। 'गंगारिदयी' धरा शुभ आली।१।

'पाल-सेन' ने भोगी सत्ता। चार सदी तक रख गुणवत्ता।।
तीन सदी थे मुस्लिम शासक। भोग विलास दमन के नायक।२।
दोहा 
हा! दुर्दिन थे देश के, जनगण था उद्भ्रांत। 
भद्र बंग विद्वान थे, दीन-हीन अति क्लांत।।
चौपाई 
प्लासी में अंग्रेज विजय पा। सके देश में पाँव थे जमा।।
हिंदू-मुस्लिम किया विभाजन। शोषक बन करते थे शासन।३।

'संतानों' ने किया जागरण। क्रांति शंख ने किया भय हरण।।
सदी आठवीं से रचनाएँ। साहित्यिक मिलती मन भाएँ।४।

'सिद्धाचार्य' पुरातन कवि थे। ताड़पत्र पर वे लिखते थे।।
'रामायण कृतिवास' लोकप्रिय। 'चंडीदास' कीर्ति थिर अक्षय।५।
दोहा 
मिल संस्कृति-साहित्य ने, जन मन को दी शक्ति। 
विपद काल में मनोबल, पाएँ कर प्रभु भक्ति।। 
चौपाई 
'मालाधर' 'चैतन्य' चेतना। फैला हरते लोक वेदना।।
काव्य कथा 'चंडी' व 'मनासा'। कवि 'जयदेव' नाम रवि जैसा।६।

सन अट्ठारह सौ सत्तावन। जूझा था बंगाली जन जन।।
नाटक 'दीनबंधु मित्रा' का। 'नील दोर्पन' लोक व्यथा का।७।

लोक जागरण का था माध्यम। अंग्रेजों को दिखता था यम।।
'राय राममोहन'  ने जमकर। सती प्रथा को दी थी टक्कर।८।
दोहा 
'ठाकुर देवेंद्रनाथ' ने, संस्था 'ब्रह्म समाज'। 
गठित करी ले लक्ष्य यह, मिठे बुराई राज।। 
चौपाई 
'माइकेल मधुसूदन' कवि न्यारे। 'कवि नज़रूल' आँख के तारे।।
'वंदे मातरम' दे 'बंकिम' ने। पाई प्रतिष्ठा सब भारत से।९।

'केशव सेन' व 'विद्यासागर'। शिशु शिक्षा विधवा विवाह कर।।
'चितरंजन' परिवर्तन लाए। रूढ़िवादियों से टकराए।१०। 
दोहा 
क्रांति ज्वाल थी जल रही, उबल रह था रक्त। 
डरते थे अंग्रेज भी, बेबस भीरु अशक्त।। 
चौपाई 
'सूर्यसेन' और 'प्रीतिलता' से। डरते-थर्राते थे गोरे।।
'गुरु रवींद्र' ने नोबल पाया। 'गीतांजलि' ने मान दिलाया।११।

'परमहंस श्री रामकृष्ण' ने। ईश्वर पाया सब धर्मों से।।
'उठो जाग कर मंज़िल पाओ'। अपनी किस्मत आप बनाओ।१२।

'संत विवेकानंद' धर्म ध्वज। फहरा सके दूर पश्चिम तक।।  
रामकृष्ण मठ कर निर्धन सेवा। कहे दीन में ही हैं देवा।१३।  
दोहा 
दलित-दीन-सेवा करी, सह न सके पाखंड। 
जाति प्रथा को चुनौती, दी कह सत्य अखंड।। 
चौपाई    
वैज्ञानिक 'सत्येन बोस' ने। कीर्ति कमाई 'बोसान कण' से।।
'बसु जगदीश' गज़ब के ज्ञानी। वैज्ञानिक महान वे दानी।१४।

'राय प्रफुल्ल चंद्र' रसायनी। 'नाइट्राइट' विद्या के धनी।। 
'मेघनाथ साहा' विशिष्ट थे। जगजाहिर एस्ट्रोफिसिस्ट थे।१५।  
दोहा 
प्रतिभाओं से दीप्त था,  भारत का आकाश। 
समय निकट था तोड़ दे, पराधीनता पाश।।  
चौपाई 
'रास बिहारी' क्रांतिवीर थे। 'बाघा जतिन' प्रचंड धीर थे।।
जला 'लाहिड़ी' ने मशाल दी। गोरी सत्ता थर्राई थी।१६। 

क्रांतिवीर 'अरविन्द-कनाई' । 'बारीलाल' ने धूम मचाई।।
'श्री अरविन्द घोष' थे त्यागी। क्रांति और दर्शन अनुरागी।१७।
 
'दत्त रमेश चंद्र' ऋग्वेदी। अर्थशास्त्री विख्यात अरु गुणी।। 
'वीर सुभाष' अमर बलिदानी। रिपु को याद कराई नानी।१८।
दोहा 
अपनी आप मिसाल थे, जलती हुई मशाल।  
नारा दे 'जय हिंद' हैं, अमर साक्षी देश के लाल।। 
चौपाई 
'शरतचंद्र' ने पाखंडों पे। किया प्रहार उपन्यासों में।। 
'ताराशंकर' 'बिमल मित्र' ने। उपन्यास अनुपम हैं रचे।१९। 
 
'नंदलाल-अवनींद्र-जैमिनी'। चित्रकार त्रय अनुपम गुनी।।   
बंग कोकिला थीं 'सरोजिनी'। 'राय बिधानचंद्र' अति धुनी।२०।

'रॉय बिमल' अरु 'सत्यजीत' ने। नाम कमाया फिल्म जगत में।।
'सेन सुचित्रा' श्रेष्ठ नायिका।श्रेया घोषाल' मधुर गायिका।२१। 
दोहा 
प्रतिभाओं की खान है, बंगभूमि लें मान। 
जो चाहें वह कर सकें, यदि लें मन में ठान।।  

दुर्गा पूजा दिवाली, बंगाली त्यौहार।
रथयात्रा रंगोत्सव, दस दिश रहे बहार।।
चौपाई
षष्ठी तिथि 'बोधन' आमंत्रण। प्राण प्रतिष्ठा भव्य सुतंत्रण।। 
भोर-साँझ पूजन फिर बलि हो। 'कोलाकुली' गले मिल खुश हो।२२।
 
'नीलकंठ' दर्शन शुभ जानो। सेंदुर ले-दे 'खेला' ठानो।।  
'हरसिंगार' 'कौड़िल्ला' 'छितवन'। 'रोसोगुल्ला' हरता सबका मन।२३। 

'सिक्किम' 'असम' 'बिहार' 'उड़ीसा'। 'झारखण्ड' संगी-साथी सा।।
स्नेह पड़ोसी सँग रख जीता। कोई किसी से रहे न भीता।२४।    
दोहा 
बांग्लादेश पड़ोस में, है सद्भाव विशेष। 
थे अतीत में एक ही, पाले स्नेह अशेष।। 
चौपाई 
'घुग्गी' 'चाट' 'झलमुरी' खाएँ। 'हिलसा मछली' भुला न पाएँ।।
घाट बैठ लें चाय चुस्कियाँ। सूर्य डूबता देख झलकियाँ।२५। 

खाड़ी तट पर 'दीघा' जाएँ। 'लतागुड़ी' घूमें हर्षाएँ।।   
बसा सिलिगुड़ी, तीर 'टोरसा'। 'जलदापारा' पार्क रम्य सा।२६। 

'सुंदरबन' 'बंगाल टाइगर'। 'दार्जिलिंग' है खूब नामवर।।
शोभा बंग भूमि की न्यारी। जहाँ-तहँ सुंदर छवि प्यारी।२७।   
दोहा 
'कालिपोंग' मठ-चर्च की, शोभा भव्य अनूप। 
'कुर्सिआंग' 'आर्किड्स' का, देखें रूप अरूप।।
चौपाई 
'कामाख्या' मंदिर अतिपावन। 'गंगासागर' छवि मनभावन।। 
'शांतिनिकेतन' 'विश्व भारती'। 'सेतु हावड़ा' 'गंग तारती'।२८।  

'गोरूमारा' 'बल्लभपुर' वन। 'बक्सा' घूम हुलस जाए मन।। 
'कूचबिहार', 'हल्दिया', 'माल्दा'। 'तारापीठ' 'सैंडकफू' भी जा।२९। 

'माछी-भात', 'पंटूआ', 'चमचम'। 'भज्जा', 'झोल' 'पिथा' खा तज गम।। 
सलिल भाँति निर्मल रह भैया। खुश रह सुख पा ता ता थैया।३०। 
दोहा 
'छेना लड्डू' खाइए, फिर छककर 'संदेश'। 
'रसमलाई' से पाइए, प्रिय! आनंद अशेष।। 

बंगाली हैं भद्रजन, शांत शिष्ट गुणवान। 
देशभक्ति है खून में, जां से प्यारी आन।। 
***

PB03. उपलब्धि : श्रीधर प्रसाद द्विवेदी, ०७३५२९१८०४४












श्रीधर प्रसाद द्विवेदी 
शिक्षा- एम.ए. भूगोल, बी.एड.
         राँची विश्व विद्यालय,राँची।
जन्म तिथि- २० मई १९५३।
लेखन विधा - कविता, कहानी, ललित- निबन्ध।
प्रकाशित रचना- (१)कनेर के फूल ( कविता संकलन )
(२) पाखी खोले पंख ( दोहा सतसई )
(३) आईना झूठ बोलता है ( कविता संकलन )
(४) व्रज आये व्रजराज ( खण्ड काव्य )
(५) गीता का काव्यानुवाद
(६) मेघदूतम काव्यानुवाद।
पता- अमरावती, गायत्री नगर, गायत्री मन्दिर रोड, सुदना, डालटनगंज, पलामू, झारखण्ड ८२२१०२।
चलभाष - ०७३५२९१८०४४।
*
दोहा
बंग भूमि को शत नमन, दर्शन कर जग धन्य।
श्रीधर बंग प्रसाद पा, मिलता हर्ष अनन्य।।

चौपाई 
भारत के पूरब-दिग देखा। सूर्य-बिंब सम उगता लेखा।।
बंग राज्य अपनी सीमा पर। हरा-भरा यह क्षेत्र गुणाकर।१।

खाड़ी से हिमनग तक पसरा। अतिसमृद्ध राज्य यह ठहरा।।
पूरब-दिशा  देश  बंगाला।उत्तर-दिग भूटान सम्हाला।२।

पश्चिम राज्य बिहार अड़ोसी। दक्षिण उड़िया खड़ा पड़ोसी।।
समतल भूमि  आर्द्र सब भूतल। सिंधु निकट ऊपर तक जल-तल।३।

धान- धरा  बहुतर  उपजाए। चावल-मछली भोग लगाए।।
पटुआ सनई उपज यहाँ के। थैले-टाट प्रसिद्ध जहाँ के।४।

अन्य उपज मक्का अधिकाई। सन-साठी  भी  रंग जमाई।।
पद्मा-हुगली सुरसरि शाखा। तीस्ता अजय नदी जल राखा।५।
दोहा
पटुआ के उद्योग से, ख्यात हुआ बंगाल।
ढाका तक चटकल चला, मिल का फैला जाल।।
चौपाई 
दार्जलिंग के चाय सुगन्धित। करें पसंद जगत के पण्डित।।
वणिजकेंद्र नगर कोलकाता। सेतु- हावड़ा दृढ़ मन-भाता।६।

काली-घाट दक्षिणा काली। करती नगरकीर्ति रखवाली।।
परमहंस राम- कृष्ण  राजे। बेलूरमठ शांति थल साजे।७।

गुरु रविन्द्र का ज्ञान पुरातन।कीर्तिकलानिधि शांतिनिकेतन।।
ऋषि चैतन्य विशिष्ट गुणाकर। कवि जयदेव  दास चंडी धर।८।

तरुण- तपस्वी  नंद- विवेका। जा परदेश विजय ध्वज टेका।।
कीर्ति-कौमुदी अब तक पसरी। गुरु- वेदांत- ज्ञान  गुण  गहरी।९।

प्राच्य-प्रभा जग में फैलाये। सुप्त देश को मार्ग दिखाये।।
पौरुष जगा देश के अन्दर। राष्ट्रजागरण हुआ शुभ्र तर।१०।
दोहा
ज्ञानवान की है धरा, जगा ज्ञान विज्ञान।
उद्भिज पौधे जगत के, इनमें भी है जान।।
चौपाई 
जगदीशचन्द्र वसु बतलाए। पौधों  में  भी  प्राण बसाये।।
शरतचन्द्र बंकिम की रचना। भाषा ललित बंग का गहना।११।

संग्रहालय विशदबड़ देखा। पुस्तकालय नेशनल लेखा।।
विक्टोरिया का संग्रहालय। अन्य कई हैं नूतन आलय।१२।

दर्शनीय और  कई स्थल हैं। पदमा नदी कई जल-थल हैं।।
दामोदर- नद  निगम बना है। जल विद्युत का केंद्र यहाँ है।१३।

दार्जिलिंग पर्वत का राजा। बसा गोरखा बड़ा समाजा।।
पुरुलिया के आदिम वासी। गिरि कानन में करें सुपासी।१४।

लाह वनोपज और अन्य हैं। जनजाति कर उपज धन्य हैं।।
अर्थ व्यवस्था कृषक प्रधाना। हरित प्रान्त जन कहें सुजाना।१५। 
दोहा
गंगा की शाखा यहाँ, फैली बनकर हार।
मिली सिन्धु के साथ जा, बनी सहस मुख धार।।
चौपाई 
डेल्टा भारी सुन्दर वन का। व्याघ्र विलोकें इस जंगल का।।
खान शिल्प उद्योग यहाँ के। नामी कुछ उत्पाद जहाँ के।१६।

नेता बोस सुभाष हुए हैं। अंग्रेजों से युद्ध लड़े हैं।।
प्रथम क्रांति की धरा यही है।बैरकपुर  की धरा सही  है।१७।

और कई थे विप्लवकारी। अंग्रेजों की सेना हारी।।
बंकिम बाबू यहीं पुकारा। वन्दे मातरम्  गान  हमारा।१८।

गीतांजली रची यह वसुधा। गाता यहाँ लोक जन बहुधा।।
रुचिकर है  रवीन्द्र संगीता। लोक मान्य जैसे जग गीता।१९।

नृत्य गीत रुचि पूर्ण यहाँ के। कन्दुक क्रीड़ा खेल जहाँ के।।
जन रंजन करती यह धरणी। विविध भाँति से शोभा वर्णी।२०।
दोहा
शिल्प कला साहित्य का, हुआ समागम नित्य।
बंग भूमि ने नित किए, अन्य बहुत से कृत्य।।
चौपाई 
चितरंजन उद्योग पुराना। रानीगंज सुकोल खजाना।।
बांकुड़ा वर्तन हित जाना। यह है अति उद्योग पुराना।२१।

बने बनाए कपड़े मिलते। गंजी बहुत काल से बनते।। 
शिल्पकला विद्या की नगरी। कोलकाता प्राचीन ठहरी।२२।

अतिनामी ढाका का मलमल।आती हमें याद यह पल पल।।
गृह उद्योग थे विपुल पुराने। गोरे लीन्हे लूट खजाने।२३।

जनसँख्या है घनी यहाँ की। दुर्गा पूजा उत्सव झाँकी।।
कोलकाता नगर प्रिय जाना। वणिज केंद्रका बना ठिकाना।२४।

पहली यही बनी रजधानी। गोरे प्रथम यही थल मानी।।
रहा नहीं यह- थल कंगाला। आज पतन मतकर बंगाला।२५।
दोहा
पूरब का यह प्रान्त जो, भारत का शुचि अंग।
प्रगति शील युग युग रहा, अपना प्यारा बंग।।
***
PB04. इतिहास : अरविंद श्रीवास्तव, ९४२५७ २६९०७












अरविंद श्रीवास्तव (शिक्षक, कवि,लेखक, संपादक, समीक्षक, वक्ता)
एम.ए (हिन्दी, अंग्रेजी, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, दर्शन शास्त्र, जे. ए. आई. आई. बी (हिंदी) 
पी-एच.डी. 
डी. आर. जे .एम. सी(पत्रकारिता) एवं संगीत व स्वास्थ्य के विभिन्न क्षेत्रों में डिप्लोमा होल्डर
रचना संसार-  
काव्य संग्रह ९, लघुकथा संग्रह २, धर्म तथा दर्शन ५, प्रेरक पुस्तक २, यात्रा वृत्त १, बाल साहित्य १। 
संपादन - मधुकर वाणी, साहित्य लोक, कायस्थ मंथन, रस भक्ति धारा, हम सफर (पत्रिकाएँ)  कई विशेषांक-यू• एस• एम •पत्रिका का दतिया विशेषांक तथा अनेक पुस्तकों का संपादन।  
अंग्रेजी में लेखन- उच्च कक्षाओं हेतु सीरीज, गाइड्स, ग्रामर बुक्स ८०  से अधिक।  
हिन्दी व अंग्रेजी में( लिखित व संपादित पुस्तकें ,पत्रिकाएं आदि)- १०० से अधिक। 
सम्मान-विदेश में (मास्को रूस, काठमांडू तथा म्यान्मार बर्मा  में) ७ सम्मान।  
 देश में-लोकसभा अध्यक्ष श्री ओमकृष्ण बिरला जी द्वारा 'साहित्य श्री ' सम्मान, उच्चायुक्त मारीशस  , गृह मंत्री (म.प्र. शासन),  अनेक विधायक  सहित १५० से अधिक सम्मान ।
 विशेष -जून २०१८ में मास्को में २ पुस्तकों का विमोचन, जनवरी २०२० में ३ पुस्तकों का विमोचन रंगून (बर्मा)में सम्पन्न  ।
संपर्क -१५० छोटा बाजार दतिया (म•प्र•) ४७५६६१ भारत। 
मोबाइल - ९४२५७ २६९०७।  
*
दोहा 
बंग राज्य महिमा अमित,करता हूँ गुणगान।
भारत के पूरब बसा,दुनिया में सम्मान।।
चौपाई 
भारत के पूरब-दिग शोभित।  बंग राज्य पर दुनिया मोहित ।।
इसका अति इतिहास पुराना । सभ्य-सुसंस्कृत जग ने माना ।१।

वर्ष सात सौ छप्पन आया। पाल वंश का शासन लाया।।
नृप गोपाल प्रथम था शासक। बंग राज्य हित शुभ फलदायक।२।

पाल वंश ने शासन कीन्हा। साम्राज्य विस्तार  कर दीन्हा।।
महिमावान पाल सिंहासन । वर्ष चार सौ उसका शासन।३।
दोहा 
पाल वंश शासन किया, ख्यात हुआ बंगाल ।
शासन में बदलाव तब,जनता भी बेहाल।।
चौपाई
सेन बीर तब करी चढ़ाई। पाल राजा ने शिकस्त खाई।।
सेन बीर का ध्वज फहराया। पाल वंश को मार भगाया।४।

बंग राज्य मुगलों को भाया। सेन राज्य का नाम मिटाया ।।
मुगलों ने सेनों से छीना। बहुत समय तक शासन कीना।५।
दोहा
परिवर्तन होते रहे, सत्ता हाथ अनेक ।
ईस्ट इंडिया कंपनी, बन कर आई नेक।।
चौपाई 
गोरों ने यह राज्य निहारा । छलियों ने व्यापार पसारा।।
सत्रह सौ सत्तावन आया । प्लासी में षडयंत्री साया ।६।

बक्सर युद्ध हुआ फिर  भारी। करे मीर जाफर गद्दारी।।
मुगलों ने थी बाजी हारी। गोरों के शासन की बारी।७।

दो सौ वर्ष चलाया शासन। क्रूर छल-कपट भरा प्रशासन।।
बंग भूमि चेतनता आई। पुण्य धरा ने ली अँगड़ाई।८।
दोहा
क्रान्ति भूमि ने कर दिया, आजादी का घोष।
गोरों को दिखने लगा, जन मन में आक्रोश ।।
चौपाई 
आजादी की उठी माँग तब । वीर सुभाष दिखाया करतब।
युवकों ने ताकत दिखलाई। गोरों की फिर शामत आई।९। 

पंद्रह  अगस्त का दिन पावन। सन् सैंतालिस मन अति भावन।।
नया बांग्ला जाग उठा था। वर्षों तक यह लुटा- पिटा था।१०। 
दोहा
बंग राज्य की धरा पर,जागृत रहा समाज।
सबके शासन को सहा,अब निज शासन आज।।
चौपाई 
बंगाली संस्कृति अनुपम है। जितना समझें उतना कम है।।
संघर्षों के दौर से गुजरा। झुका नहीं यह अनुपम निखरा।११।

बंगाली संस्कृति अनुपम है। जितना समझें उतना कम है।।
बांग्ला का संगीत निराला। गंगासागर मेला आला।१२।

हिमगिरि से माँ गंगा आई। गंगा सागर आन समाई।।
माँ काली का उत्सव प्यारा। बंग भूमि में अनुपम न्यारा।१३।

शस्य स्यामला धरती प्यारी। लोकसंस्कृति अद्भुत न्यारी। 
मानुस भला भद्र नहिं कायर। मिलें भवानी दुर्गा घर घर।१४। 

मेले राजा कथा कहानी। मिष्टि मनोहर बंगला बानी। 
बिखरी हैं इतिहास कथाएँ। सीखें सबक न इन्हें भुलाएँ।१५।  
दोहा
बंग भूमि पर सदा ही, सर्व धर्म समभाव ।
वर्णित यह इतिहास में, अब दिखता बदलाव।।
 
बंग राज्य की धरा पर,जागृत रहा समाज।
सबके शासन को सहा, अब निज शासन आज।।
***
PB05. प्राकृतिक सौंदर्य : अनिल अनवर, ७७३७६८९०६६, ८७६४७३७७८१














अनिल अनवर
माता-पिता    : श्रीमती तारा व श्री शारदा प्रसाद श्रीवास्तव ।
जन्म तिथि    : २७-७-१९५२। 
पैतृक ग्राम    : दरियावलाल का पुरवा, सुल्तानपुर। 
शिक्षा           : बी० एस सी०। 
डिप्लोमा      : इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग। 
सेवा            : भारतीय वायु सेना में।
सम्प्रति        : स्वतंत्र लेखन, संपादन मरु गुलशन पत्रिका।
पता            : ३३, व्यास कॉलोनी, एयर फोर्स, जोधपुर ३४२०११ भारत।
चलभाष      : ७७३७६८९०६६, ८७६४७३७७८१।   
*
दोहा 
सागर चरण पखारता, हिमगिरि शोभित भाल।
कविगुरु ने जिसको कहा, सोने का बंगाल।।

सुन्दर, सुखद सदा मनभावन। धरती इसकी है अति पावन।।
दार्जिलिंग, उत्तर के जनपद।  जहाँ भ्रमण है नित मंगलप्रद।१।  

पर्वत काट झूम की खेती। विविध भाँति की फ़सलें देती।
सुन्दर बहुत प्राकृतिक सुषमा। उच्च शिखर हिमगिरि की गरिमा।२।

सघन चाय बागान यहाँ पर। द्वार कहाता यह पूर्वोत्तर।
अनानास, लीची अरु कटहल। भाँति-भाँति के होते मृदु फल।३।

बहती शीतल वायु यहाँ पर। मेघ घूमते लगें धरा पर।।
नैरो गेज ट्रेन मनहारी। है आकर्षक यहाँ सवारी।४।

अधिक गोरखों की आबादी। जीवन शैली जिन की सादी।
सदा राष्ट्र-रक्षा को तत्पर। सैनिक मिल जाते हैं घर-घर।५।
दोहा 
कलिम्पोंग भी है यहीं, यहीं अलीपुर द्वार।
सुन्दर जलपाईगुड़ी, विस्तृत कूचबिहार।
चौपाई 
ग्राम-ग्राम में ताल-तलैया। प्रकृति नाचती ता-ता-थैया।।
सदा प्रचुर जल अरु हरियाली।  बंग-भूमि सुख देने वाली।६।

है फुटबाल लोकप्रिय खेला। उपजे धान, पान अरु केला।।
मीठा आम मालदा वाला। स्वाद अनूठा और निराला।७।

पटसन, जूट, नील की खेती। चमकीली नदियों की रेती।।
हरी सब्ज़ियाँ, साग प्रचुर हैं। कन्द-मूल-फल यहाँ मधुर हैं।८।

बाग़-बग़ीचे खेत हरे हैं। ताड़, नारियल वृक्ष भरे हैं।।
मत्स्य तथा मधुमक्खी पालन। सामिष भोजन का भी प्रचलन।९।
 
है अथाह जलराशि यहाँ पर। और वनों का जाल धरा पर।।
गंगा-बाँध फरक्का बैरेज। सुख-समृद्धि का देता मैसेज।१०। 
दोहा
झारखण्ड पश्चिम बसा, पूरब बांग्लादेश।
वृक्ष-विटप हर किस्म के, हरित-भरित परिवेश।
चौपाई 
जन-जागृति में सब से आगे। बंग जगाये, भारत जागे।
शान्ति निकेतन विद्या परिसर। 'गीताञ्जलि' थी रची जहाँ पर।११। 

यहीं हुए कविगुरु महान हैं। दो देशों के राष्ट्रगान हैं।।
रचे गए इक कवि के द्वारा। अनुपम गौरव बढ़ा हमारा।१२।  

मूल्यवान हैं खनिज यहाँ पर। बहु उद्योग पनपते घर-घर। 
जैव-विविधता विपुल बनी है। धरा यहाँ की बहुत धनी है।१३।

नृत्य, गीत-संगीत मधुरतम। है साहित्य रचा सर्वोतम।।
संस्कृति बहुत समृद्ध, पुरातन। वर्तमान विकसित अधुनातन।१४।

नगर-नगर नदियों की कल-कल। ग्राम-ग्राम तालाबों में जल। 
गौरवशाली संस्कृति वाला। अद्भुत है बंगाल निराला।१५।
दोहा 
भाँति-भाँति के शाक, फल, पकवानों के थाल।
पर मछली अनिवार्य है, सामिष है बंगाल।
चौपाई 
बैंगुन-भाजा, साग व मछली। तब बंगाली थाली असली।।
दाल-भात सँग लूची-पूरी।रसगुल्ला, सन्देश ज़रूरी।१६।

राजभोग, चमचम हैं खाते। मिष्ठान्नों से थाल सजाते।
मिष्टी दोही व रसमलाई। बंगाली मशहूर मिठाई।१७।

भाँति-भाँति के व्यञ्जन वाली। स्वाद भरी है पौष्टिक थाली।
और अन्त में पान चबाना। उस के बिन सम्पूर्ण न खाना।१८।

प्रशासनिक जनपद हैं बाइस। मुख्य खाद्य सब में है राइस। 
है सब की जलवायु सुहानी। सर्वसुलभ है खाना-पानी।१९।

महानगर केवल कलकत्ता। वहीं केन्द्रित इस की सत्ता।
यह भारत का सिंह-द्वार है। इस की हर महिमा अपार है।२०।
दोहा 
बना हावड़ा पुल यहाँ, चौड़ा गंगा पाट।
यहीं ख्यात बेलूर मठ, इस में कालीघाट।
चौपाई 
दर्शनीय, रमणीय नगर है। चहल-पहल है, जगर-मगर है।।
चौबिस घण्टे यह जगता है। यहाँ सभी का मन लगता है।२१।

नए-पुराने भ्रमण-स्थल हैं। कंकरीट के भी जंगल हैं।।
रोज़गार, व्यापार यहीं पर। जनता बसी अपार यहीं पर।२२।

पेट सभी का यह भरता है। मोहित भी सब को करता है।
यहीं डेल्टा सुन्दरवन है। करता चीता जहाँ भमण है।२३।

तीर्थ-राज है गंगासागर। जिस की महिमा कहते घर-घर।।
कहलाता जो मोक्षद्वार है। हर जन आता एक बार है।२४।

शक्ति-केन्द्र है राजनीति का। संचालक है अर्थनीति का।।
महाकेन्द्र है यह व्यापारिक। लोग यहाँ के हैं सामाजिक।२५।
दोहा 
हुआ विभाजित दो दफ़ा, अब पश्चिम बंगाल।
पीड़ायें सह-सह हुआ, बार-बार ख़ुशहाल।
***
PB06. भौगोलिक संरचना : तेजपाल शर्मा ९९५६७७९३६८












तेजपाल शर्मा
माता- स्व०श्रीमती कस्तूरी       
          देवी शर्मा।
पिता- स्व०श्री लक्ष्मी नारायण शर्मा।
जन्म- स्थान-- इरौली गूजर (मथुरा)।
जन्म-तिथि- १५ अक्टूबर १९५५।
शिक्षा- एम. ए. (हिन्दी), बी.एड.।
प्रकाशित कृतियाँ- १. मेरी कविता मेरे गीत, २. मैं अवधपुरी, मैं मथुरा हूँ , ३. कवि प्रणाम
सम्प्रति- अवकाश प्राप्त प्रवक्ता (जवाहर नवोदय विद्यालय)।
प्रधानाचार्य,श्री ब्रज आदर्श कन्या इंटर कॉलेज, मांट (मथुरा) ।
सम्पर्क- ९९५६७७९३६८।
*
बंगाल चित्रण
दोहा
दिश पूरब में शोभता, है बंगाल प्रदेश।
कला और साहित्य में, इसका नाम विशेष।।

काव्यकला धन धान्य से, सब प्रकार संपन्न।
इस बंगाल प्रदेश में, कोई नहींं विपन्न।।
चौपाई
बंग भूमि कितनी सुखदाई। शोभा श्री बरनी नहिं जाई।।
दक्षिण में सागर लहराता। मानो विजय गीत है गाता।१।

बोस सुभाष यही जन्म स्थली। अरु विवेक की है तपस्थली।।
बंकिम शरद गोद सुख पाए। गद्य पद्य सौरभ बिखराए।२।

कवि कुल गुरु रवीन्द्र कहाए। काव्यकला संगीत सुहाए।
शान्ति निकेतन के संस्थापक। गुरुवर थे जन मन में व्यापक।३।

दक्षिणेश्वर की महिमा न्यारी। रामकृष्ण की अमित दुलारी।
कोलकाता की काली मैया। पार लगातीं सबकी नैया।४।

कलकत्ता सुरम्य रजधानी, चरण पखारे सागर पानी।
कला साहित्य यहाँ पर पलते, राजनीति के चरचे चलते।५।
दोहा- 
सागर लहरें लहरकर, करती रहें किलोल।
देख देखकर दृश्य यह, उठतीं हृदय हिलोल।।
चौपाई 
सुंदर वन है सुंदर मनहर, हिरण बाघ विचरें तहँ मन भर।
दार्जिलिंग की शोभा प्यारी,  मोहे देख सकल नर-नारी।६।

शोभा सिलीगुड़ी मनभावन,  जलपाइगुड़ी अमित सुहावन।
इसके पावन अभयारण्ये,  हिरण गिलहरी बारहसिंघे।७।

हाथी बाघ व जीव वन्य जो, निर्भय विचरें जन्तु अन्य वो।
सुंदर जीव जगत का संगम, अति मनहर है दृश्य विहंगम।८।

वन्यजीव गृह जलदापारा, शक्तिपीठ जगजाहिर तारा।
तारापीठ शक्ति का संबल। सती नेत्र पत शुभ तीर्थस्थल।९।

वीरभूमि अति पवित्र पावन, भक्तों के मन को अति भावन।
वन्य जीव भी अभय यहाॅं हैं, ऐसा सुख फिर और कहाँ है।१०।
दोहा-
शक्तिपीठ सुंदर सुखद, दर्शन करते लोग।
दैन्य ताप से हो विमुख, ऐसा है संयोग।।
चौपाई-
धन्य क्षेत्र मालदा सुहावन, लभ कौशेय वसन मन भावन।
आम मालदा का है प्यारा, रसाल है यह रसाल सारा।११।

परिपूरित है रसाल वाला,  है मालदा रसद मतवाला।
जूट आदि का भी उत्पादक, कृषि भूमि है ये बहु व्यापक।१२।

गंगा सागर महिमा न्यारी, जाने सकल सभी नरनारी।
श्रद्धा संगम अति सुखकारी, अवगाहन आएँ नर-नारी।१३।

कपिल ऋषि आश्रम पर जाई, सागर में गंगा मिल धाई। 
निज पुरखों को मुक्ति दिलाई,  नृपति भगीरथ की पुण्याई।१४।

चमचम छैना पटुआ मज्जा,  खाने में है कैसी लज्जा।
मधुर यहाँ की सकल मिठाई,  सुस्वादिष्ट अमित सुखदाई।१५।
दोहा 
दोहा-निर्भय विचरण सब करें, लघु विशाल जो जीव।
अभयारण्य यही बने, इनके करुणासींव।।
चौपाई 
झलमुरी घुग्गी चाट मिठाई,  बंगाली मिष्ठान्न सुहाई।
खानपान यह सबको भाता,  जो खाता वह अति सुख पाता।१६।

साहित्य कला संगीत सरगम,  बजता, मन भाता है हरदम।
बैलूर मठ अध्यात्म का संगम,  दृश्य अलौकिक दिव्य विहंगम।१७।

रामकृष्ण शारदा तपस्थली,  यही विवेकानंद शुभ स्थली।
धीर वीर गंभीर बोस जी,  ज्ञानवान अरविंद घोष जी।१८।

देशभक्त स्वातंत्र्य पुरोधा,  वीर सुभाष क्रांति के योद्धा।
कतिपय शक्ति उपासक भारी,  कुछ को भक्ति साधना प्यारी।१९।

ऐसा है बंगाल हमारा,  अतिशय प्यारा कुछ कुछ खारा।
भरत भूमि का अंग दुलारा, यह बंगाल प्रदेश हमारा।२०।

दोहा 
मालदा जैसे क्षेत्र को, करिए सदा प्रणाम।
जूट कौशेय दे सदा, और खिलाता आम।।
चौपाई 
कला संस्कृति अभिमंडित है,  विवेक आध्यात्मिक पंडित है|
है सुभाष अति प्रचंड योद्धा,  क्रांति युद्ध का कुशल पुरोधा।२१।

बंकिम शरद रवींद्र दुलारे,  मात सरस्वती के अति प्यारे।
शरद छटा की विभा निराली,  बंकिम कला बड़ी मतवाली।२२।

इनका सदा त्रिवेणी संगम,  बांग्ला का साहित्य विहंगम।
नैसर्गिक सौन्दर्य सुहाना,  छटा देख मन स्वत: लुभाना।२३।

कवि की दृष्टि जहाँ तक जाती,  शोभा श्री बरनी नहीं जाती।
उन्नत ज्ञान विज्ञान यहाँ का,  बतलाओ है और कहाँ का।२४।

सागर नित प्रति अलख जगाता,  इसकी महिमा पल पल गाता।
गंगा का अवसान यहाँ है,  ठौर न ऐसा और कहाँ है।२५।
दोहा-
हर प्रकार मन मोहते, यहाँ के चित्र  विचित्र।
विचरण करने से यहाँ, बनें गैर भी मित्र।।
दोहा--इस प्रकार का है सुखद, यह बंगाल प्रदेश।
भक्ति शक्ति से पूर्ण है, अनुपम और विशेष।।  
***
७. रमेश श्रीवास्तव 'चातक'










PB07  रमेश श्रीवास्तव 'चातक' ९४०६७०६५६५  
जन्म - ३ अक्तूबर १९४८, सिवनी (भारत)।
शिक्षा - एम॰ ए॰हिंदी, राजनीति शास्त्र, बी॰ एड॰।
संप्रति - सेवा निवृत्त  शिक्षक। अध्यक्ष अखिल भारतीय साहित्य परिषद  शाखा सिवनी। सचिव श्री महावीर व्यायामशाला सिवनी।
 माता - स्व॰ श्रीमती गौरी बाई।
पिता - स्व॰ श्री भैरों प्रसाद श्रीवास्तव।
प्रकाशित पुस्तक - इंद्रधनुष
   एम॰ ए॰ के छात्रों के लिए।
डाक पता - शिव मंदिर, डूंडा सिवनी, कबीर वार्ड, सिवनी म॰ प्र॰ भारत ४८०६६१।
चलभाष - ९४०६७०६५६५, ८७७०९६५६६५।
*
दोहा
वीर प्रसवनि बंग धरा, करें सभी गुणगान।
रवि किरणों के तेज ने, सदा बढ़ाया मान।।
चौपाई 
देवभूमि है भारत माता। बंग भूमि से सबका नाता।।
सतयुग से कलियुग तक आए। संतों ने संदेश सुनाए।१।

आदि काल से धर्म मनुजता। बंग भूमि है सबकी माता।।
जाग्रति का संगीत सुनाओ। खुद जागो फिर देश जगाओ।२।

गीत-संगीत सजी सुर माला। बंग गीत है सबसे आला।।
राम कृष्ण से गुरु सुखदाई। थी नरेंद्र को राह दिखाई।३।

धर्म ध्वजा जग में फहराई। भारत महिमा सबने गाई।।
दक्षिणेश्वर की छटा निराली। यहाँ विराजे माता काली।४।

बिन माँगे माँ देने वाली। भरती सबकी झोली खाली।।
शांति निकेतन धाम बनाया। कवि ने जन गण मन गुंजाया।५।
दोहा
जग माता जग से बड़ी, माँ से बड़ा न अन्य।
नित माँ की पूजा करें, हो सुख शांति अनन्य।।
चौपाई 
गोरे जब भारत में आए, व्यापारी बन जाल बिछाए।
कल कारखाने भी लगाए, धन भारत में खूब कमाए।।६।।

व्यापारी शासक बन बैठे, फूट डालकर दौलत ऐंठे।
हाथ बाँध हम रहे देखते, अपनी हालत किससे कहते।।७।।

दो सौ वर्ष किया था शासन, मर मर कर जीता था जन जन।
शतरंज की बाजी बिछाई, रियासतों को लूटा भाई।।८।।

भोली जनता समझ न पाई, अपने हाथों जान गँवाई।
फिर शिक्षा का जाल बिछाया, पढ़े लिखों को दास बनाया।।९।।

अविवेकी फौजों की दम पर, नाचे खूब हमारे सिर पर।
कदम कदम पर ठोकर मारी, जंग हमारी भी थी जारी।।१०।।
दोहा
कर उपवास मना रहे, घर घर में नव वर्ष।
देवी की आराधना, सबको देती हर्ष।।
चौपाई 
नाम विवेकानंद सुहाना। जग ने जिसका लोहा माना।।
धर्म सभा में महिमा गाई। परहित सरिस धरम नहीं भाई।११।

मानवता की अलख जगाई। सब धर्मों की नींव बताई।।
बंगाली भाषा अति प्यारी। सारे जग में सबसे न्यारी।१२।

सर्व धर्म समभाव भावना। भारत की यह रही कामना।।
बंकिम जी ने अलख जगाई। संतानों ने ली अँगड़ाई।१३।

वंदे मातरम गीत गाया। फाँसी फंदा गले लगाया।।
क्रांतिवीर सुभाष जब आए।। आजादी का नारा लाए।१४।

आजाद हिंद फौज बनाई। अंग्रेजों की नींद उड़ाई।।
युवा हृदय सम्राट कहलाए। नेता जी की पदवी पाए।१५।
दोहा
देश प्रेम के भाव से, बढ़ता जब अनुराग।
तब बलिदानों के लिए, सीने लगती आग।।
चौपाई 
बंग भूमि ने ली अँगड़ाई, अंग्रेजों की शामत आई।
फिर शंखनाद हुआ क्रांति का, नया सवेरा हुआ शांति का।।१६।।

फिरंगियों ने जान बचाई, देश छोड़कर भागे भाई।
जान बची सो लाखों पाए, लौट के बुद्धू घर को आए।।१७।।

रेशम मलमल के परिधान, ये बंगाल की हैं पहचान।
हरी भरी प्रकृति है सुहाती, सबके मन को बहुत लुभाती।।१८।।

चाय बागान शान यहाँ की, खुशबू है पहचान जहाँ की।
चुसकी लेकर नींद भगाते, सुबह सुबह हर दिन गुण गाते।।१९।।

हावड़ा ब्रिज  बड़ा है साधन, आवागमन लगे मनभावन।
सफर छोटी रेल का भाता, बीते दिन की याद दिलाता।।२०।।
दोहा
आन बान अरु शान है, भारत की पहचान।
इसकी रक्षा के लिए, वीर हुए बलिदान।।
चौपाई 
अब तुम मुझे खून दो भाई। लंबी लड़ना हमें लड़ाई।।
क्रांतिकारियों की यह धरती। सारी दुनिया पैरों पड़ती।२१।

सती प्रथा को बंद कराया। घर घर नई चेतना लाया।।
शरतचंद अरु रास बिहारी। वंदन करती जनता सारी।२२।

क्रांतिपुरुष की जीवन लीला। अंतर्मन को करती गीला।।
सागर की लहरें लहराई। सूरज ने किरणें बिखराई।२३।

बहे पवन चंचल पुरवाई। जन जीवन ने ली अँगड़ाई।।
गीत गोविंद कृतिवास गाते। प्रभु महिमा जन जन पहुँचाते।२४।

पर्व दशहरा अनुपम भाई। माँ भवानी की छवि सुहाई।।
सब सुहागिन नाचती गाती। झूम झूम कर शंख बजाती।२५।
दोहा
त्याग और बलिदान से,  बनता देश महान।
अमर शहीदों पर हमें, सदा रहा अभिमान।।

हो समाज में शांति सुख, ऐसा करें प्रयास।
दीन हीन मजबूर की, कभी न टूटे आस।।
चौपाई 
विविध कला की पावन नगरी। कोलकता कंचन की गगरी।।
कलाकार वा खेल खिलाड़ी। रहे देश में सदा अगाड़ी।२६।

रसगुल्ला संदेश मिठाई। आँखें देख जीभ ललचाई।।
सुंदर वन का देख नजारा। पुलकित जन का तन-मन सारा।२७।

हिमगिरि से गंगा जी आई। प्रिय सागर के अंक समाई।।
गंगा सागर महिमा भारी। दर्शन कर तरते नर-नारी।२८। 
दोहा
बंग वीर बलिदान से, भरा हुआ इतिहास।
आम जनों के बीच में, बने हुए हैं खास।।

वीरों के उपकार का,कैसे होगा मोल।
प्राण वतन पर दे दिया, चातक जो अनमोल।। 

तन शोभा परिधान है, मन शोभा गुण ज्ञान।
तन मन की शोभा बढ़े,सही रूप पहचान।। 

धोती कुर्ता है पहनावा,बड़ी सादगी नहीं दिखावा।
मछली चाँवल सादा भोजन, वाणी मोहे जन जन का मन।।२९।।

गीत संगीत की अगुवाई, सारे जग में धाक जमाई।
कला ज्ञान की धरा सुहानी, जिसकी महिमा सबने मानी।।३०।।

खान पान सँग पान चबाना, पान महिमा देश ने जाना।
दर्शनीय सुंदर मन भावन, नगर मनोहर लोक लुभावन।।३१।।

आते हैं हर  दिन सैलानी, सबकी अपनी एक कहानी।
बंग भूमि की पावन महिमा, कही न जाए इसकी गरिमा।।३२।।

दोहा
मातृ भूमि का कर्ज है, मानो सब उपकार।
चातक तुम करना नहीं, कभी देश अपकार।। 
***


भारत को जानें परियोजना :

राज्य समन्वयक  और राज्य कोड सूची: 

क्रम    राज्य  -  राज्य समन्वयक 
1 मेघालय(M) -डॉ०सन्तोष कुमार सिंह 'सजल'
2   छत्तीसगढ़(CHG) - सरोज दुबे ' विधा' 
3   असम(A) -   ओम प्रकाश फुलारा 'प्रफुल्ल'
4.   दिल्ली(D) - डॉ० लाज कौशल 
5. लक्षद्वीप(L)  महेन्द्र सिंह 'सागर'
6- पुडुचेरी(P) । अरुण कुमार दुबे
7- हरियाणा(HY) ,राजपाल यादव 
8.त्रिपुरा(TP) , डॉ. दीप्ति गौड़
9 मणिपुर(M) ---चोवा राम वर्मा 'बादल'
10- सिक्किम(S) -डॉ सुधा मिश्रा 
11- महाराष्ट्र(MR) - संजय द्विवेदी
12- नागालैंड(NL) - डॉ. रमा सिंह
13-जम्मू(JK) - नमिता पाण्डेय      
                'अभिव्यक्ति'
14-उत्तराखण्ड(UTK) -श्रीमती स्नेहलता'नीर'
15- ओड़िशा(O) - सुश्री सुशीला साहू "विद्या"
16- ब्रजेन्द्र मिश्रा , बैंगलोर कर्नाटक(KT) 
17- आंध्र प्रदेश(AP) -
राज कुमार शर्मा,चित्रकूट
18 - गुजरात(GR) , शोभना श्याम 
19-गोवा(G) -दीपक दूबे "अकेला"
20-तेलंगाना(TG) -बी एस आनन्द
21- पंजाब(P)  डॉ ओमकार साहू मृदुल
22. उत्तरप्रदेश(UP) प्रवीना श्री 'निधि' 
23- तमिलनाडु(TN) ज्योत्स्ना प्रदीप 
24. झारखंड(JHK)   डॉ रजनी शर्मा 'चंदा'
25. चंडीगढ़ (CG) -  डॉ . श्याम मनोहर sirothia जी 
26.मध्य प्रदेश(MP) - विनीता श्रीवास्तव
27.राजस्थान(R) - राम पंचाल भारतीय
28.बिहार(B) - प्रीतम कुमार झा
29.केरला(K) - अशोक श्रीवास्तव 
30. अरूणाचल प्रदेश(ARP) - प्रेम लता जी 
31 मिजोरम (MZ) -  डॉ अनिल कोरी 
32.पश्चिम बंगाल(PB) -  डॉ साधना वर्मा 
33.हिमाचल प्रदेश (HP) - महिमा श्रीवास्तव वर्मा 
34. दादरा नगर हवेली(DN) - डॉ देवदत्त सरस
35.अंडमान निकोबार(AN) - पं. गिरि मोहन गुरु 
36. लद्दाख(L) - देवेश सिसोदिया (हाथरस उ. प्र)
***
अंडमान निकोबार 
वर्ग २ (संस्कृति, कला, साहित्य) 
लोकगीत, लोकनृत्य, लोकभाषा, खानपान, व्रत, त्यौहार, वास्तुकला, मूर्तिकला, वेशभूषा, साहित्य। 

वर्ग ४ (इतिहास) 
ऐतिहासिक घटनाएँ, मेला, कुम्भ, राजा, महाराजा, पौराणिक कथाएँ, ऐतिहासिक यात्रा। 
मणिपुर 
वर्ग ४ (इतिहास) 
ऐतिहासिक घटनाएँ, मेला, कुम्भ, राजा, महाराजा, पौराणिक कथाएँ, ऐतिहासिक यात्रा। 

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