कविता
ईसा और मैं
डॉ।किशोर काबरा, अहमदाबाद
क्रूस पर लटका
ड्राइंग रूम की शोभा बढाता
ईसा का खिलौना, बड़ा सलौना।
बच्चे आखिर बच्चे,
बच्चों ने ईसा को सूली से उतार दिया।
पूछा तो बोले-
सदियों से लटका है।
तकलीफ बड़ी होती थी।
भड़क उठा मैं-
ये क्या जानेंगे कल के छोकरे
बड़ों की इज्जत करना?
अरे! ईसा तकलीफ सहेगा, या न सहेगा,
पर यहाँ आकर कोई देखेगा तो क्या कहेगा?
और मैंने ईसा को फिर से सूली पर चढा दिया।
मेरा ड्राइंग रूम चमक उठा।
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दिव्य नर्मदा : हिंदी तथा अन्य भाषाओँ के मध्य साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक संपर्क हेतु रचना सेतु A plateform for literal, social, cultural and spiritual creative works. Bridges gap between HINDI and other languages, literature and other forms of expression.
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शुक्रवार, 20 मार्च 2009
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1 टिप्पणी:
सुन्दर रचना
अवनीश
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