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रविवार, 19 मई 2019

मुक्तिका

मुक्तिका 
कल्पना की अल्पना से द्वार दिल का जब सजाओ 
तब जरूरी देखना यह, द्वार अपना या पराया? 
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छाँह सर की, बाँह प्रिय की. छोड़ना नाहक कभी मत 
क्या हुआ जो भाव उसका, कुछ कभी मन को न भाया
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प्यार माता-पिता, भाई-भगिनी, बच्चों से किया जब
रागमय अनुराग में तब, दोष किंचित भी न पाया
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कौन क्या कहता? न इससे, मन तुम्हारा हो प्रभावित
आप अपनी राह चुन, मत करो वह जो मन न भाया
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जो गया वह बुरा तो क्यों याद कर तुम रो रहे हो?
आ रहा जो क्यों न उसके वास्ते दीपक जलाया?

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