सोमवार, 22 अप्रैल 2019

समीक्षा सकारात्मक सूक्तियाँ हीरो वाधवानी

विश्ववाणी हिंदी संस्थान
अभियान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१
salil.sanjiv@gmail.com, ७९९९५५९६१८, ९४२५१८३२४४
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कृति चर्चा:
सकारात्मक अर्थपूर्ण सूक्तियाँ : नवाशा का सूर्य उगाती कृति
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
[कृति परिचय: सकारात्मक अर्थपूर्ण सूक्तियाँ, सूक्ति संकलन, हीरो वाधवानी, प्रथम संस्करण, २०१७, आई एस बी एन ९७८९३८७६२२१११, आकार डिमाई, आवरण बहुरंगी, सजिल्द जैकेट सहित, पृष्ठ १६८, मूल्य ३००/-, अयन प्रकाशन दिल्ली, लेखक संपर्क- wadhwanihiro@yahoo.com ]
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साहित्य वही है जिसमें सबका हित समाहित हो। यदि पर अपना हर कार्य परखा जाए कोई विवाद, द्वेष, झगड़ा आदि ही न हो। सब विवादों का मूल कारन एक ही है कि हम चाहते की सब हमारे मनोनुकूल कार्य करें किन्तु हम खुद किसी अन्य के मन का कार्य नहीं करते। 'तू-तू मैं-मैं घर में हो या बाहर', उसकी जड़ एक ही होती है कि 'मैं' और 'तू' मिलकर 'हम' नहीं हो पाते। नीर-क्षीर की तरह मिलकर समरस हो सकें तो सब टकराव आरंभ होने के पूर्व ही अपने आप समाप्त हो।
'मैं'-'तू' यदि 'हम' हो सकें, 'तू-तू-मैं-मैं' छोड़।
'मैं'-'तू' 'तू'-'मैं' 'हम' बनें, नाहक करें न होड़।।

इस जीवन सूत्र को साकार करने के लिए भाई हीरो वाधवानी ने संक्षिप्त विचार-मणियों को माला रूप में गूंथते हुए यह पुस्तक तैयार की है। यह पुस्तक सांसारिक परिस्थितियों से तालमेल बैठा पाने में असमर्थ, खुद को किसी योग्य न समझ रहे दिग्भ्रमित मनुष्यों में नवशा का संचार कर सकने की क्षमता रखती है। निराशा के महासागर में डूबकर खुद को कुछ भी कर पाने में असमर्थ मनुष्यों को यह कृति अवश्य पढ़नी चाहिए। 'इंसान दिन में सौ बार से भी अधिक बार मुस्कुरा सकता है पर आँसू बीस बार भी नहीं बहा सकता।', 'दुःख का कारण? बुरे विचार और अभद्र कार्य।', 'मिल-जुलकर रहने वालों के घर में रोज त्यौहार होता है।', 'वाद्य यंत्रों को बजानेवाला उन्हें जीवित कर जुबान देता है।', 'समुद्र चाहे कितना भी बड़ा हो वह माता-पिता के प्यार और आशीर्वाद से बड़ा नहीं हो सकता। ' जैसी सूक्तियाँ सामान्य पाठक को नई जीवन दृष्टि दे सकती हैं।

आधुनिक जीवन शैली अधिकाधिक आरामतलब होने की प्रवृत्ति पैदा कर रहे हैं। फलत:, बच्चे और किशोर आलसी होकर अनेक रोगों के शिकार हो रहे हैं। हीरो जी कहते हैं- 'अधिक परिश्रम से शरीर मजबूत होता है, गलता, घिसता और टूटता नहीं।' एक अन्य सूक्ति है 'सप्ताह भर बाहर सवेरे उठने का मतलब है उपहार में एक दिन अधिक पाना।'

हम सब किसी न किसी आदत या लत के शिकार होते हैं- 'बुरी आदतें अपराधी की तरह होती हैं, नियम और कानून तोड़ती हैं।', 'आदतें शेर से गीदड़ जैसे कार्य करती हैं।' पढ़कर कुटैव से मुक्ति पाई जा सकती है।'

सूक्तियों का सरल, सहज और बोधगम्य हिंदी में होना उनकी उपयोगिता में वृद्धि करता है। हीरो वाधवानी जी के इस समाजोपयोगी कार्य की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। मेरा एक सुझाव है कि कृति को रोचक बनाने के लिए सूक्तियों को गद्य में रखने के साथ-साथ उनका पद्यान्तरण (दोहा, सोरठा आदि) भी साथ ही दिया जाए। इससे सूक्तियों की स्मरणीयता बढ़ेगी। ऐसी जीवन सूक्त विद्यालयों, सभागारों, उद्यानों, रास्तों के किनारे की दीवारों आदि पर लिखी जाएँ तो सामाजिक जीवन और मानवीय आचरण में सुधार ला सकती हैं।
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संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष ७९९९५५९६१८
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