सोमवार, 15 अप्रैल 2019

गीत तुम

चित्र पर रचना:
तुम



*
तुम हो या साकार है
बेला खुशबू मंद
आँख बोलती; देखती
जुबां; हो गयी बंद
*
अमलतास बिंदी मुई, चटक दहकती आग
भौंहें तनी कमान सी, अधर मौन गा फाग
हाथों में शतदल कमल 
राग-विरागी द्वन्द 
तुम हो या साकार है 
मद्धिम खुशबू मंद
*
कृष्ण घटाओं बीच में, बिजुरी जैसी माँग
अलस सुबह उल्लसित तुम, मन गदगद सुन बाँग
खनक-खनक कंगन कहें
मधुर अनसुने छंद
तुम हो या साकार है 
मनहर खुशबू मंद
*
पीताभित पुखराज सम, मृदुल गुलाब कपोल
जवा कुसुम से अधरद्वय, दिल जाता लख डोल 
हार कहें भुज हार दो
बनकर आनंदकंद
तुम हो या साकार है 
मन्मथ खुशबू मंद
*
संवस, १५.४.२०१९ 

कोई टिप्पणी नहीं: