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रविवार, 30 जनवरी 2022

सॉनेट

सॉनेट 
नव जतन हो
*
अब तो इस तालाब का पानी बदल दो। 
ये कमल के फूल मुरझाने लगे हैं। 
उठो, जागो देश को अब नई शकल दो।।
मूक कोयल, काग फरमाने लगे हैं।।

बंग भू ने अहं को धरती सुँघाई।
झुका सत्ता के न सम्मुख, जाट जीता। 
रौंद जन को कौन सत्ता टिकी भाई?
जो न बदला हो गया इतिहास बीता।। 

अंधभक्तों से न बातें अकल की कर। 
सच न सुनना, झूठ कहना ठानते वे।
सत्य के पर्याय पर लांछन लगाकर।। 
मार गोली अमर होंगे मानते वे।।

सत्य की जय हेतु फिर से नव जतन हो। 
मुदित धरती और हर्षित तब गगन हो।।
***
सॉनेट
वाक् बंद है
*
बकर-बकर बोलेंगे नेता।
सुन, जनता की वाक् बंद है।
यह वादे, वह जुमले देता।।
दल का दलदल, मची गंद है।।

अंधभक्त खुद को सराहता।
जातिवाद है तुरुपी इक्का।
कैसे भी हो, ताज चाहता।।
खोटा दलित दलों का सिक्का।।

जोड़-घटाने, गुणा-भाग में।
सबके सब हैं चतुर-सयाने।
तेल छिड़कते लगी आग में।।
बाज परिंदे लगे रिझाने।।

खैर न जनमत की है भैया!
घर फूँकें नच ता ता थैया।।
३०-१०२०२२
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सॉनेट
सुतवधु
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विनत सुशीला सुतवधु प्यारी।
हिलती-मिलती नीर-क्षीर सी।
नव नातों की गाथा न्यारी।।
गति-यति संगम धरा-धीर सी।।

तज निज जनक, श्वसुर गृह आई।
नयनों में अनगिनती सपने।
सासू माँ ने की पहुनाई।।
जो थे गैर, वही अब अपने।।

नव कुल, नव पहचान मिली है।
नई डगर नव मंज़िल पाना।
हृदय कली हो मुदित खिली है।।
नित्य सफलता-गीत सुनाना।।

शुभाशीष जो चाहो पाओ।
जग-जीवन को पूर्ण बनाओ।।
३०-१-२०२२

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