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बुधवार, 12 जनवरी 2022

सॉनेट सलिला

अनुक्रम १ सवेरा, २ मन की बात, ३ भोर भई, ४ कबीर, ५ वंदना, ६ जिंदगी के रंग, ७ अपनी कहे, ८ सैनिक, ९ संतोष, १० विसंगतियाँ, ११ काग गाएँ, १२ समय, १३ गृह प्रवेश , १४ प्रेम की भागीरथी, १५. नवांकुर, १६ हुक्मरां, १७ सरदार, १८ भक्ति की बीन, १९ वीणा की झंकार, २० गुरुआनी, २१ नमन, २२ सौदागर, २३ चित्रगुप्त, २४ अभियान, २५ शारदा, २६ पाखी, २७ नारी, २८ गणपति, २९ विवाह, ३० गणपति, ३१ भोर, ३२ चलते रहिए, ३३ बेबस सारा देश, ३४ सत्य की वाह, ३५-३६ जबलपुर , ३७ कोरोना, ३८ उपनिषद, ३९ चंपा, ४० गौरैया, ४१ शीत, ४२ ठंड, ४३ अलविदा, ४४ राग दरबारी, ४५ नया साल, ४६ जाड़ा आया है, ४७ सूरज , ४८ चित्रगुप्त, ४९

४८ सॉनेट 
चित्रगुप्त 
नाद अनाहद ब्रह्म परम् हे!
अक्षर अजर जन्मा-मरणा। 
मूल चराचर के अदृश्य हे!
तुम्हें सुमिर भवसागर तरणा।।

निराकार निर्गुण अविकारी। 
कौन नहीं जो उपजा तुमसे? 
चिदानंद आनंदविहारी।। 
कौन नाहने जा मिलता तुमसे? 

माया-मोह न छूटे जिनसे। 
वे जाकर फिर-फिर आते हैं। 
जो ध्याते वे छूटें भव से।।
चित्र गुप्त पा खो जाते हैं।।

कण-कण में भगवान तुम्हीं हो।।
लय-रस-गुण की खान तुम्हीं हो।।     

***
४७ सॉनेट 
सूरज 
*
सूरज प्यारा कभी न हारा। 
काम करे निष्काम भाव से। 
पल-पल बाँट रहा उजियारा।।
काम करे रह मौन चाव से।।

रजनी की आँखों का तारा। 
ऊषा बहिना बांधे राखी। 
किरण-सखा है रसिया न्यारा।।
वसुधा के सँग पढ़ता साखी।।

दोपहरी गृहणी पर रीझे। 
कर संध्या के करता पीले। 
शशि को सत्ता दे बिन खीझे।।
नील गगन झट उसको लीले।।

तारे चारण कीर्ति सुनाते। 
भुवन भास्कर पूजे जाते।।
*** 
४६ सॉनेट
जाड़ा आया है
*
ठिठुर रहे हैं मूल्य पुराने, जाड़ा आया है।
हाथ तापने आदर्शों को सुलगाया हमने।
स्वार्थ साधने सुविधाओं से फुसलाया हमने।।
जनमत क्रयकर अपना जयकारा लगवाया है।।

अंधभक्ति की ओढ़ रजाई, करते खाट खड़ी। 
सरहद पर संकट के बादल, संसद एक नहीं। 
जंगल पर्वत नदी मिटाते, आफत है तगड़ी।। 
उलटी-सीधी चालें चलते, नीयत नेक नहीं।।

नफरत के सौदागर निश-दिन, जन को बाँट रहे। 
मुर्दे गड़े उखाड़ रहे, कर ऐक्य भावना नष्ट।  
मिलकर चोर सिपाही को ही, नाहक डाँट रहे।। 
सत्ता पाकर ऐंठ रहे, जनगण को बेहद कष्ट।।

गलत आँकड़े, झूठे वादे, दावे मनमाने। 
महारोग में रैली-भाषण, करते दीवाने।।
*** 
४५ सॉनेट
नया साल
*
नया साल है, नया हाल है, चाल नई।
आशा-आक्रमणों का सफर नया हो अब।
अमरकंटकी नीर सदा, निर्मल हो अब।।
याद न कर जो बीत गई सो बीत गई।।

बना सके तो बना सृजन की रीत नई।
जैसा था वैसा ही है इंसां, जग, रब।
किया न अब साकार करेगा सपना कब?
पुरा-पुरातन हो प्रतीत अब प्रीत नई।।

नया-पुराना, चित-पट, दो पहलू जैसे।
करवट बदले समय न जानें हम कैसे?
नहीं बदलते रहते जैसे के तैसे।

जैसे भी हो पाना चाहें पद-पैसे।
समझ न पाते अकल बड़ी हैं या भैंसें?
जैसी चाह आओ बन जाएँ, हम वैसे।।
१-१-२०२२ 
***
४४ सॉनेट
राग दरबारी
*
मेघ आच्छादित गगन है, रवि न दिखता खोज लाएँ।
लॉकडाउन कर चुनावी भीड़ बन हम गर्व करते।
खोद कब्रें, हड्डियों को अस्थियाँ कह मार मरते।।
राग दरबारी निरंतर सुनाकर नव वर्ष लाएँ।।
आम्रपाली के पुजारी, आपका बंटी सिरजते।
एक था चंदर सुधा को विवाहे, फिर छोड़ जाए।
थाम सत्ता सुंदरी की बाँह, जाने किसे ध्याए?
अब न दिव्या रही भव्या, चित्रलेखा सँग थिरकते।।
लक्ष्य मुर्दे उखाड़ें परिधान पहना नाम बदलें।
दुश्मनों के हाथ खाकर मात, नव उपलब्धि कह लें।।
असहमत को खोज कुचलें, देख दिल अपनों के दहलें।।
प्रदूषित कर हर नदी, बन अंधश्रद्धा सुमन बह लें।।
जड़ें खोदें रात-दिन, जड़मति न बोलें, अनय सह लें।।
अधर क्या कहते न सुनकर, लाठियाँ को हाथ धर लें।।
***
४३ सॉनेट 
अलविदा
*
अलविदा उसको जो जाना चाहता है, तुरत जाए।
काम दुनिया का किसी के बिन कभी रुकता नहीं है?
साथ देना चाहता जो वो कभी थकता नहीं है।।
रुके बेमन से नहीं, अहसान मत नाहक जताए।।
कौन किसका साथ देगा?, कौन कब मुँह मोड़ लेगा?
बिना जाने भी निरंतर कर्म करते जो न हारें।
काम कर निष्काम,खुद को लक्ष्य पर वे सदा वारें।।
काम अपना कर चुका, आगे नहीं वह काम देगा।।
व्यर्थ माया, मोह मत कर, राह अपनी तू चला चल।
कोशिशों के नयन में सपने सदृश गुप-चुप पला चल।
ऊगना यदि भोर में तो साँझ में हँसकर ढला चल।
आज से कर बात, था क्या कल?, रहेगा क्या कहो कल?
कर्म जैसा जो करेगा, मिले वैसा ही उसे फल।।
मुश्किलों की छातियों पर मूँग तू बिन रुक सतत दल।।
३१-१२-२०२१
*
४२ सॉनेट
ठंड
*
ठंड ठिठुरती गर्म सियासत।
स्वार्थ-सिद्धि ही बनी रवायत।
ईश्वर की है बहुत इनायत।।
दंड न देता सुने शिकायत।।
पाँच साल को सत्ता पाकर।
ऐंठ रहे नफरत फैलाकर।
आपन मूँ अपना गुण गाकर।।
साधु असाधु कर्म अपनाकर।।
जला झोपड़ी आग तापते।
मुश्किल से डर दूर भागते।
सच सूली पर नित्य टाँगते।।
झूठ बोलकर वोट माँगते।।
मत मतदान कभी करना बिक।
सदा योग्य पर ही रहना टिक।।
३०-१२-२०२१
***
४१ सॉनेट
शीत
प्रीत शीत से कीजिए, गर्मदिली के संग।
रीत-नीत हँस निभाएँ, खूब सेंकिए धूप।
जनसंख्या मत बढ़ाएँ, उतरेगा झट रंग।।
मँहगाई छू रही है, नभ फीका कर रूप।।
सूरज बब्बा पीत पड़, छिपा रहे निज फेस।
बादल कोरोना करे, सब जनगण को त्रस्त।
ट्रस्ट न उस पर कीजिए, लगा रहा है रेस।।
मस्त रहे जो हो रहे, युवा-बाल भी पस्त।।
दिल जलता है अगर तो, जलने दे ले ताप।
द्वार बंद रख, चुनावी ठंड न पाए पैठ।
दिलवर कंबल भा रहा, प्रियतम मत दे शाप।।
मान दिलरुबा रजाई, पहलू में छिप बैठ।।
रैली-मीटिंग भूल जा, नेता हैं बेकाम।
ओमिक्रान यदि हो गया, कोई न आए काम।।
२९-१२-२०२१
***
४० सॉनेट
गौरैया
*
बैठ डाल गौरैया चहके, साँझ सवेरे।
हँसती अधिक न रोती ज्यादा, चुग्गा चुगती।
चूजे भूखे उन्हें चुगाती, कर सौ फेरे।।
तनिक न थकती, करे न शिकवा, कभी न रुकती।।

पुरवैया हो या हो पछुआ, करे न नागा।
जोड़ न धरती, लोभ न करती, संतोषी है।
नहीं पैर को जूती, सिर पर रखे न पागा।।
मंदिर-मस्जिद नहीं, प्रेम की यह भूखी है।।

गूँज रही आवाज दूर तक, जगो-उठो रे!
कनक सरीखी धूप, सूर्य ने बिखराई है।
हिल-मिल रहो न आपस में तुम कभी लड़ो रे!!
अँगुली मिल हो मुट्ठी, जीत तभी पाई है।।

सलिल-धार से सीखो कलकल गाकर बहना।
प्यास बुझाना सबकी, मन की पीर न कहना।।
२८-१२-२०२१
*
३९ सॉनेट
चंपा
*
गमक रहा है चंपा महक रहा है।
कलियाँ झूम रहीं मदमाती-गातीं।
अठखेली करती हैं, हाथ न आतीं।।
पंखुड़ियों पर यौवन दमक रहा है।।

फूल कह रहे चादर में रख पैर।
गौरैया कहती सब बंधन तोड़ो।
आसमान को नापो, देहरी छोड़ो।।
आवारा भँवरों की रहे न खैर।।

पर्ण भाई का मान न घटने देना।
अपने सपने कोशिश कर-कर सेना।
मन भटकाए भ्रमर नहीं सँग लेना।

अपने बूते नाव हमेशा खेना।।
शाख साथ रह खाकर चना-चबेना।।
खिलना अपने कदम न रुकने देना।।
२८-१२-२०२१
*
३८ सॉनेट
उपनिषद
*
आत्मानंद नर्मदा देती, नाद अनाहद कलकल में।
धूप-छाँव सह अविचल रहती, ऊँच-नीच से रुके न बहती।
जान गई सच्चिदानंद है, जीवन की गति निश्छल में।।
जो बीता सो रीता, होनी हो, न आज चिंता तहती।।

आओ! बैठ समीप ध्यान कर गुरु से जान-पूछ लो सत्य।
जिज्ञासा कर, शंका मत कर, फलदायक विश्वास सदा।
श्रद्धा-पथिक ज्ञान पाता है, हटता जाता दूर असत्य।।
काम करो निष्काम भाव से, होनी हो, जो लिखा-बदा ।।

आत्म और परमात्म एक हैं, पूर्ण-अंश का नाता है।
उसको जानो, उस सम हो लो, सबमें झलक दिखे उसकी।
जिसको उसका द्वैत मिटे, अद्वैत एक्य बन जाता है।।
काम करो निष्काम भाव से, होगा वह जो गति जिसकी।।

करो उपनिषद चर्चा सब मिल, चित्त शांत हो, भ्रांति मिटे।
क्रांति तभी जब स्वार्थ छोड़, सर्वार्थ राह चल, शांति मिले।।
२७-१२-२०२१
***
३७ सॉनेट
कोरोना
*
कोरोना है मायावी, रूप बदलता है, नेता वत छलता है।
रातों को लॉकडाउन, करती हैं सरकारें, रैली-चुनाव होते।
जनता की छाती को, दिन-रात भक्त बनकर, यह छलनी करता है।।
दागी हैं जनप्रतिनिधि, हत्यारे जनमत के, नित स्वार्थ बीज बोते।।

कंपनी दवाई की, निष्ठुर व्यापारी है, जन-धन ले लूट रहीं।
ये अस्पताल डॉक्टर, धनलोलुप जनद्रोही, बेरहम कसाई रे!
है खेल कमीशन का, मँहगा इलाज बेहद, हर आशा टूट रही।।
चौथा खंबा बोले, सरकारों की भाषा, सच बात छिपाई रे!!

सब क्रिया-कर्म छूटे, कंधा भी न दे पाए, कैसी निष्ठुर क्रीड़ा?
राजा के कर्मों का, फल जनता को मिलता, यह लोक जानता है।
ओ ओमेक्रान! सुनो, नेता-अफसर को हो, वे जानें जन-पीड़ा।।
गण सत्य अगर बोले, गन तंत्र तान लेता, जन विवश भागता है।।

हे दीनानाथ! सुनो, धनवान रहें रोगी, निर्धन निरोग रखना।
जो जैसा कर्म करे, वैसा फल दे तत्क्षण, निष्पक्ष सदा दिखना।।
२६-१२-२०२१
***
३५-३६  मिल्टनी सॉनेट
जबलपुर 
नित्य निनादित नर्मदा, कलकल सलिल प्रवाह। 
नंदिकेsश्वर पूजिए, बरगी बाँध निहार। 
क्रूज बुलाता घूमिए, करिए नदी विहार।। 
रम्य पायली की छटा, निरख कीजिए वाह।। 

सिद्धघाट जप-तप करें, रहें ध्यान में लीन। 
गौरीघाट सुदाह कर, नहा कीजिए ध्यान। 
खारीघाट विमुक्ति दे, पूजें शिव मतिमान।। 
साई के दीदार कर, नदी न करें मलीन।। 

घाट लम्हेटा देखिए, अगिन शिला चट्टान। 
कौआडोल शिला लखें, मदनमहल लें घूम। 
देवताल है ध्यान हित, पावन भावन भूम। 
एक्वाडक्ट न भूलिए, तिलवारा की शान।। 

छप् छपाक् झट कूदती, रेवा नर्तित घूम।। 
धुआँधार में शिलाएँ, भुजभर लेती चूम।। 
गौरीशंकर पूजिए, चौसठ योगिन संग। 
घाट सरस्वती नाव ले, बंदरकूदनी देख। 
भूलभुलैया खोजिए, दिखे नहीं जल-रेख।। 
भेड़ाघाट निहारिए, संगमरमरी रंग।। 

त्रिपुरसुंदरी के करें, दर्शन लें कर जोड़। 
धूसर लोहा फैक्ट्री, रचे सतत इतिहास। 
फैक्ट्री गन कैरिज करे उत्पादन नित खास।। 
आयुध निर्माणी करे हथियारों की होड़।। 

दुर्गावती अमर हुईं, किंतु न छोड़ी आन। 
त्रिपुरी वीर सुभाष की, कथा सुनाए खास। 
हुईं सुभद्रा-महीयसी, सखियाँ दो बेजोड़। 
ओशो और महर्षि से, हुए सिद्ध मतिमान।। 

संस्कारधानी कहें, संत विनोबा खास।। 
हिंदी पहला व्याकरण, गुरु ने दिया न तोड़।।
२५-१२-२०२१ 
***
३४ सॉनेट
सत्य की वाह
*
चित्रगुप्त मन में बसें, हों मस्तिष्क महेश।
शारद उमा रमा रहें, आस-श्वास- प्रश्वास।
नेह नर्मदा नयन में, जिह्वा पर विश्वास।।
रासबिहारी अधर पर, रहिए हृदय गणेश।।
पवन देव पग में भरें, शक्ति गगन लें नाप।
अग्नि देव रह उदर में, पचा सकें हर पाक।
वसुधा माँ आधार दे, वसन दिशाएँ पाक।।
हो आचार विमल सलिल, हरे पाप अरु ताप।।
रवि-शशि पक्के मीत हों, सखी चाँदनी-धूप।
ऋतुएँ हों भौजाई सी, नेह लुटाएँ खूब।
करतल हों करताल से, शुभ को सकें सराह।
तारक ग्रह उपग्रह विहँस मार्ग दिखाएँ अनूप।।
बहिना सदा जुड़ी रहे, अलग न हो ज्यों दूब।।
अशुभ दाह दे मनोबल, करे सत्य की वाह।।
२४-१२-२०२१
*
नव प्रयोग
३३ दोहा सॉनेट
बेबस सारा देश
*
दल के दलदल में फँसा, बेबस सारा देश।
दाल दल रहा लोक की, छाती पर दे क्लेश।
सत्ता मोह न छूटता, जनसेवा नहिं लेश।।
राजनीति रथ्या मुई, चाह-साध्य धन-एश।।

प्रजा प्रताड़ित तंत्र से, भ्रष्टाचार अशेष।
शुचिता को मिलता नहीं, किंचित् कभी प्रवेश।।
अफसर नेता सेठ मिल, साधें स्वार्थ विशेष।।
जनसेवक खूं चूसते, खुद को मान नरेश।।

प्रजा-लोक-गण पर हुआ, हावी शोषक तंत्र।
नफरत-शंका-स्वार्थ का, बाँट रहा है मंत्र।
मान रहा नागरिक को, यह अपना यंत्र।।
दूषित कर पर्यावरण, बढ़ा रहे संयंत्र।।

लोक करे जनजागरण, प्रजा करे बदलाव।
बनें अंगुलियाँ मुट्ठियाँ, मिटा सकें अलगाव।।
२४-१२-२०२१
***
३२ सॉनेट
चलते रहिए
*
अलग सोचना राह सही है, चलते रहिए।
जहाँ जरूरत वहाँ सहारा बेशक ले लें।
ठोकर लगे न रुकें, गिरें उठ बढ़ते रहिए।।
जीत-हार सम मान खेल को मिलकर खेलें।।

मूल्य सनातन शुचि हों, सारस्वत चिंतन हो।
जन की पीड़ा उपचारें, कुछ समाधान हो।
साहचर्य की दिशा सुझाएँ, भय भंजन हो।।
हो निशांत तम मिटे, उजाला ले विहान हो।।

बीज नवाशा का बोएँ नवगीत-ग़ज़ल मिल।
कोशिश हो लघुकथा, सफलता बने कहानी।
जवां हौसले हों निबंध, रस-भाव सकें खिल।।
नीर-क्षीर सम रहे समीक्षा, लिखें सुज्ञानी।।

मुदित सरस्वती सुमन-सलिल हँस अंगीकारें।
शशि-रवि कर अभिषेक, सृजन-पथ सजा-सँवारें।।
२३-१२-२०२१
***
३१ बाल सॉनेट
भोर
*
झाँक झरोखे से सूरज ने कहा जाग जाओ।
उषा किरण आ कर झकझोरे उठो न अब सोना।
बैठ मुँडेरे गौरैया बोले न समय खोना।।
बाँग दे रहा मुर्गा कर प्रभु नमन, मुस्कुराओ।।

धरती माँ को कर प्रणाम, पग धर नभ को देखो।
जड़ें जमीं में जमा खड़ा बरगद बब्बा दे छाँह।
है कमजोर लता, न गिरे थामे है उसकी बाँह।।
कितना ऊँचा उड़ सकते हो, मन ही मन लेखो।

दसों दिशाएँ स्वागत करतीं, बिना स्वार्थ सबका।
आलस तजकर काम करो अपने-सबके मनका।
कठिनाई से हार न मानो, फिर-फिर कोशिश कर।

बहे पसीना-धार तभी आशीष मिले रब का।।
मिले सफलता मत घमंड कर, मोह तजो छिन का।।
राधा-कान्हा सम मुस्काओ, सबको मोहित कर।।
२३-१२-२०२१
***
३०  सॉनेट
गणपति
*
जय जय गणपति!, ऋद्धि-सिद्धिपति, मंगलकर्ता, हे प्रथमेश।
भव बाधा हर, हे शब्देश्वर!, सदय रहो प्रभु जोड़ूँ हाथ।
जयति गजानन, जय मतिदाता, शिवा तनय जय, हे विघ्नेश।।
राह न भटकूँ, कहीं न अटकूँ, पैर न पटकूँ, बल दो नाथ।।

वंदन-चंदन, कर अभिनंदन, करूँ स्तवन नित, हे सर्वेश!
जगजननी-जगपिता की कृपा, हो हम पर ऐसा वर दो।
विधि-हरि, शारद-रमा कृपा पा, भज पाएँ हम तुम्हें हमेश।।
करें काम निष्काम भाव से, शांति निकेतन सा घर दो।।

सत्य सनातन कह पाएँ जो ऐसी रचनाएँ हो दैव।
समयसाsक्षी घटनाओं में देखें-दिखा प्रगति की रेख।
चित्र गुप्त हो हरदम उज्जवल, निर्मल हो आचार सदैव।।
सकल सृष्टि परिवार हमारा, प्रकृति मैया पाएँ लेख।।

जय जय दीनानाथ! दयामय, द्रुतलेखी जय जय कलमेश!
रहे नर्मदा जीवन यात्रा, हर लो सारे कष्ट-कलेश।।
***
२९ सॉनेट
विवाह
*
चट मँगनी पट माँग भराई।
दुलहा सूरज दुल्हन धूप है।
उषा निहारे खूब रूप है।।
सास धरा को बहू सुहाई।।
द्वार हरिद्रा-छाप लगाई।
छाप पाँव की शुभ अनूप है।
सुतवधु रानी, पुत्र भूप है।।
जोड़ी विधि ने भली मिलाई।।
भौजाई की कर पहुनाई।
ननदी कोयल है हर्षाई।
नाचे मिट्ठू, देवर झूमे।।
नववधू ही मन मुस्काई।
सबने सोचा है सँकुचाई।
नजर बजा सूरज वधु चूमे।।
२२-१२-२०२१
***
२८ सॉनेट
गणपति
*
जय जय गणपति!, ऋद्धि-सिद्धिपति, मंगलकर्ता, हे प्रथमेश।
भव बाधा हर, हे शब्देश्वर!, सदय रहो प्रभु जोड़ूँ हाथ।
जयति गजानन, जय मतिदाता, शिवा तनय जय, हे विघ्नेश।।
राह न भटकूँ, कहीं न अटकूँ, पैर न पटकूँ, बल दो नाथ।।

वंदन-चंदन, कर अभिनंदन, करूँ स्तवन नित, हे सर्वेश!
जगजननी-जगपिता की कृपा, हो हम पर ऐसा वर दो।
विधि-हरि, शारद-रमा कृपा पा, भज पाएँ हम तुम्हें हमेश।।
करें काम निष्काम भाव से, शांति निकेतन सा घर दो।।

सत्य सनातन कह पाएँ जो ऐसी रचनाएँ हो दैव।
समयसाsक्षी घटनाओं में देखें-दिखा प्रगति की रेख।
चित्र गुप्त हो हरदम उज्जवल, निर्मल हो आचार सदैव।।
सकल सृष्टि परिवार हमारा, प्रकृति मैया पाएँ लेख।।

जय जय दीनानाथ! दयामय, द्रुतलेखी जय जय कलमेश!
रहे नर्मदा जीवन यात्रा, हर लो सारे कष्ट-कलेश।।
२२-१२-२०२१
***
२७ सॉनेट
नारी
*
शारद-रमा-उमा की जय-जय, करती दुनिया सारी।
भ्रांति मिटाने साथ हाथ-पग बढ़ें तभी हो क्रांति।
एक नहीं दो-दो मात्राएँ, नर से भारी नारी।।
सफल साधना तभी रहे जब जीवन में सुख-शांति।।

जाया-माया, भोगी-भोग्या, चित-पट अनगिन रंग।
आशा पुष्पा दे बगिया को, सुषमा-किरण अनंत।
पूनम तब जब रहे ज्योत्सना, रजनीपति के संग।।
उषा-दुपहरी-संध्या सहचर दिनपति विभा दिगंत।।

शिक्षा-दीक्षा, रीति-नीति बिन सार्थक हुई न श्वासा।
क्षुधा-पिपासा-तृष्णा बिना हो, जग-जीवन बेरंग।
कीर्ति-प्रतिष्ठा, सज्जा-लज्जा से जीवन
मधुमासा।।
राधा धारा भक्ति-मुक्ति की, शुभ्रा-श्वेता संग।।

अमला विमला धवला सरला, सुख प्रदायिनी नारी।
मैया भगिनि भामिनि भाभी पुत्री सखी दुलारी।।
२२-१२-२०२१
***
२१ बाल सॉनेट
पाखी
*
पाखी नील गगन को नापे।
पका हुआ फल खा जाएगा।
बैठ मुँडेरे जहँ-तहँ झाँके।।
मधुर प्रभाती भी गाएगा।।

नीचे बिल्ली घात लगाए।
ऊपर बाज ताकता फिरता।
इसे न हो कुछ राम बचाए।।
हिम्मतवाला तनिक न डरता।।

चुग्गा-दाना चुन उड़ जाता।
जा चूजों का पेट भरेगा।
चलना-उड़ना भी सिखलाता।।
जो समर्थ हो वही बचेगा।।

श्रम-अनुशासन पाठ पढ़ाता।
पाखी बच्चों के मन भाता।।
२०-१२-२०२१
***
२५ सॉनेट
शारदा
*
शारदा माता नमन शत, चित्र गुप्त दिखाइए।
सात स्वर सोपान पर पग सात हमको दे चला।
नाद अनहद सुनाकर, भव सिंधु पार कराइए।।
बिंदु-रेखा-रंग से खेलें हमें लगता भला।।
अजर अक्षर कलम-मसि दे, पटल पर लिखवाइए।
शब्द-सलिला में सकें अवगाह, हों मतिमान हम।
भाव-रस-लय में विलय हों, सत्सृजन करवाइए।।
प्रकृति के अनुकूल जीवन जी सकें, हर सकें तम।।
अस्मिता हो आस मैया, सुष्मिता हो श्वास हर।
हों सकें हम विश्व मानव, राह वह दिखलाइए।
जीव हर संजीव, दे सुख, हों सुखी कम कष्ट कर।।
क्रोध-माया-मोह से माँ! मुक्त कर मुस्काइए।।
साधना हो सफल, आशा पूर्ण, हो संतोष दे।
शांति पाकर शांत हों, आशीष अक्षय कोष दे।।
१९-१२-२०२१
***
२४ सॉनेट
अभियान
*
सृजन सुख पा-दे सकें, सार्थक तभी अभियान है।
मैं व तुम हम हो सके, सार्थक तभी अभियान है।
हाथ खाली थे-रहेंगे, व्यर्थ ही अभिमान है।।
ज्यों की त्यों चादर रखें, सत्कर्म कर अभियान है।।
अरुण सम उजियार कर, हम तम हरें अभियान है।
सत्य-शिव-सुंदर रचें, मन-प्राण से अभियान है।
रहें हम जिज्ञासु हरदम, जग कहे मतिमान है।।
सत्-चित्-आनंद पाएँ, कर सृजन अभियान है।।
प्रीत सागर गीत गागर, तृप्ति दे अभियान है।
छंद नित नव रच सके, मन तृप्त हो अभियान है।
जगत्जननी-जगत्पितु की कृपा ही वरदान है।।
भारती की आरती ही, 'सलिल' गौरव गान है।।
रहे सरला बुद्धि, तरला मति सुखद अभियान है।
संत हो बसंत सा मन, नव सृजन अभियान है।।
१९-१२-२०२१
***
२३ सॉनेट
चित्रगुप्त
*
काया-स्थित ईश का चित्र गुप्त है मीत
अंश बसा हर जीव में आत्मा कर संजीव
चित्र-मूर्ति के बिना हम पूजा करते रीत
ध्यान करें आभास हो वह है करुणासींव
जिसका जैसा कर्म हो; वैसा दे परिणाम
सबल-बली; निर्धन-धनी सब हैं एक समान
जो उसको ध्याए, बनें उसके सारे काम
सही-गलत खुद जाँचिए; घटे न किंचित आन

व्रत पूजा या चढ़ावा; पा हो नहीं प्रसन्न
दंड गलत पाए; सही पुरस्कार का पात्र
जो न भेंट लाए; नहीं वह पछताए विपन्न
अवसर पाने के लिए साध्य योग्यता मात्र

आत्म-शुद्धि हित पूजिए, जाग्रत रखें विवेक
चित्रगुप्त होंगे सदय; काम करें यदि नेक
१८-१२-२०२१
***
२२ सॉनेट
सौदागर
*
भास्कर नित्य प्रकाश लुटाता, पंछी गाते गीत मधुर।
उषा जगा, धरा दे आँचल, गगन छाँह देता बिन मोल।
साथ हमेशा रहें दिशाएँ, पवन न दूर रहे पल भर।।
प्रक्षालन अभिषेक आचमन, करें सलिल मौन रस घोल।।

ज्ञान-कर्म इंद्रियाँ न तुझसे, तोल-मोल कुछ करतीं रे।
ममता, लाड़, आस्था, निष्ठा, मानवता का दाम नहीं।
ईश कृपा बिन माँगे सब पर, पल-पल रही बरसती रे।।
संवेदन, अनुभूति, समझ का, बाजारों में काम नहीं।।

क्षुधा-पिपासा हो जब जितनी, पशु-पक्षी उतना खाते।
कर क्रय-विक्रय कभी नहीं वे, सजवाते बाजार हैं।
शीघ्र तृप्त हो शेष और के लिए छोड़कर सुख पाते।।
हम मानव नित बेच-खरीदें, खुद से ही आजार हैं।।

पूछ रहा है ऊपर बैठे, ब्रह्मा नटवर अरु नटनागर।
शारद-रमा-उमा क्यों मानव!, शप्त हुआ बन सौदागर।।
१८-१२-२०२१
***
२१ सॉनेट
नमन
*
तूलिका को, रंग को, आकार को नमन ।
कल्पना की सृष्टि, दृष्टि ईश का वरदान।
शब्द करें कला-ओ-कलाकार को नमन।।
एक एक चित्र है रस-भावना की खान।।

रेखाओं की लय सरस सूर-पद सुगेय।
वर्तुलों में साखियाँ चित्रित कबीर की।
निराला संसार है प्रसाद शारदेय।।
भुज भेंटती नीराजना, दीपशिखा भी।।

ध्यान लगा, खोल नयन, निरख छवि बाँकी।
ऊँचाई-गहराई-विस्तार है अगम।
झरोखे से झाँक, है बाँकी नवल झाँकी।।
अधर पर मृदु हास ले, हैं कमल नयन नम।।

निशा-उषा-साँझ, घाट-बाट साथ-साथ।
सहेली शैली हरेक, सलिल नवा माथ।।
१७-१२-२०२१
***
२० सॉनेट
गुरुआनी
*
गुरुआनी गुरु के हृदय, अब भी रहीं विराज।
देख रहीं परलोक से, धीरज धरकर आप।
विधि-विधान से कर रहे, सारे अंतिम काज।।
गुरु जी उनको याद कर, पल-पल सुधियाँ व्याप।।

कवि-कविता-कविताइ का, कभी न छूटे साथ।
हुई नर्मदा की सुता, गंगा-तनया मीत।
सात जन्म बंधन रहे, लिए हाथ में हाथ।।
देही थी अब विदेही, हुई सनातन प्रीत।।

गुरुआनी जी थीं सरल, पति गौरव पर मुग्ध।
संस्कार संतान को, दिए सनातन शुद्ध।
व्रत-तप से हर अशुभ को, किया निरंतर दग्ध।।
संगत पाकर साँड़ भी, गुरु हो पूज्य प्रबुद्ध।।

दिव्यात्मा आशीष दे, रहे सुखी कुल वंश।
कविता पुष्पित-पल्लवित, हो बन सुधि का अंश।।
१६-१२-२०२१
***
१९ सॉनेट
वीणा की झंकार
*
आशा पुष्पाती रहे, किरण बिखेर उजास।
गगन सरोवर में खिले, पूनम शशि राजीव सम।
सुषमा हेरें नैन हो, मन में शांति हुलास।।
सुमिर कृष्ण को मौन, हो जाते हैं बैन नम।।

वीणा की झंकार सुन, वाणी होती मूक।
ज्ञान भूल कर ध्यान, सुमिर सुमिर ओंकार।
नेत्र मुँदें शारद दिखें, सुन अनहद की कूक।।
चित्र गुप्त झलके तभी, तर जा कर दीदार।।

सफल साधना सिद्धि पा, अहंकार मत पाल।
काम-कामना पालकर, व्यर्थ न तू होना दुखी।
ढाई आखर प्रेम के, कह हो मालामाल।
राग-द्वेष से दूर, लोभ भुला मन हो सुखी।।

दाना दाना फेरकर, नादां बन रह लीन।
कर करतल करताल, हँस बजा भक्ति की बीन।।
१६-१२-२०२१
***
१८ सॉनेट
भक्ति की बीन
आशा पुष्पाती रहे, किरण बिखेर उजास।
गगन सरोवर में खिले, पूनम शशि राजीव सम।
सुषमा हेरें नैन हो, मन में खुशी हुलास।।
सुमिर कृष्ण को मौन, हो जाते हैं बैन नम।।
वीणा की झंकार सुन, वाणी होती मूक।
ज्ञान भूल कर ध्यान, सुमिर सुमिर ओंकार।
नेत्र मुँदें शारद दिखें, सुन अनहद की कूक।।
चित्र गुप्त झलके तभी, तर जा कर दीदार।।
सफल साधना सिद्धि पा, अहंकार मत पाल।
काम-कामना पालकर, व्यर्थ न तू होना दुखी।
ढाई आखर प्रेम के, कह हो मालामाल।
राग-द्वेष से दूर, लोभ भुला मन हो सुखी।।
दाना दाना फेरकर, नादां बन रह लीन।
कर करतल करताल, हँस बजा भक्ति की बीन।।
१६-१२-२०२१
***
१७ सॉनेट 
सरदार 
*
शीश झुका मिल करो सरदार को नमन। 
शाश्वत विभूति नाम-काम -कीर्ति अमर है /
पुरुषार्थ से महका दिया है देश का चमन।।
मिट नहीं सकता जो पीढ़ियों पे असर है।  

खंड-खंड था; अखंड देश कर दिया।
सामना चुनौतियों का किया बिन डरे। 
श्रेय महत्कार्य का किंचित नहीं लिया।।
समय की कसौटियों पे थे सदा खरे।।

पीढ़ियों को प्रेरणा दे मौन हो गए। 
दूसरा सरदार कोई फिर नहीं हुआ।  
एकता के बीज-सूत्र अगिन बो गए।।
देश सुदृढ़ कर सकें हम; है यही दुआ।।

सरदार की जयकार कर न मुक्त होइए।।
देश हित मतभेद भुला; एक होइए।।
***    
१६ सॉनेट
हुक्मरां
*
सौ-सौ सवाल पूछिए, कोई नहीं जवाब।
है हुक्मरां की चुप्पियों से चुप्प भी हैरान।
कल तक थे आदमी मगर इस वक्त हैं जनाब।।
जो हर हुकुम बजाए वही हो सके दीवान।।

खुद को कहें फकीर, शान बादशाह सी।
जो हाँ में हाँ मिलाए नहीं, मिटा दें उसे।
जरा भी परवाह नहीं, हाय-आह की।।
हकीकत सिसक रही है एड़ियाँ घिसे।।

दर्द आम का न खास अहमियत रखे।
मौज खास कर सके, अवाम चुप रहे।
जंगल, पहाड़, खेत का नामो-निशां मिटे।।
मसान बने मुल्क भले दिल दहल दहे।।

सिक्के हों चाम के, कहे भिश्ती की सल्तनत।
इक्के हुए गुलाम, जोकरों की हुकूमत। ।
१५-१२-२०२१
***
१५ साॅनेट गीत ३१-३२
नवांकुर
*
नवांकुर को खाद-पानी दीजिए।

मोह-माटी में न उसको कैद करिए, जड़ जमीं में खुद जमाने दें।
सड़ा देगा लाड़ ज्यादा मानिए भी, धूप-बारिश सहे हो मजबूत।
गीत गाए आप अपने भाव के वह, मत उसे बासी तराने दें।।
दिखे कोमल वज्र सी है शक्ति उसमें, और है संकल्प शक्ति अकूत।।

रीझने हँसकर रिझाए, रीझिए
नवांकुर को खाद-पानी दीजिए।

देख बालारुण नहीं आभास होता, यही है मार्तण्ड सूर्य प्रचण्ड।
रश्मिरथ ले किरणपति बन सृष्टि को तम मुक्त कर, देगा नवल उजास।
शशि अमावस में कभी कब बता पाता, पूर्णिमा की रूप-राशि अखण्ड।।
बूँद जल की जलधि बन गर्जन करेगी, रोकने का मत करें प्रयास।।

भिगाए तो बाल-रस में भीगिए
नवांकुर को खाद-पानी दीजिए

हौसले ले नील नभ को नापना, चाहता तो नाप लेने दीजिए।
चढ़े गिरि पर गिरे तो उठ हो खड़ा, चोटियों पर चढ़े करतल ध्वनि करें।
दस दिशाएँ राह उसकी देखतीं, दिगंबर ओढ़े न राहें रोकिए।।
जां हथेली पर लिए दनु से भिड़े, हौसला दे, पुलक अभिनंदन करें।।

सफलता पय पिए, पीने दीजिए
नवांकुर को खाद-पानी दीजिए
१४-१२-२०२१
*
१४ सॉनेट
प्रेम की भागीरथी २६-२७
*
प्रेम की भागीरथी में, प्रेमपूर्वक स्नान कर।
तिलक ऊषा का करें, संजीव हो हर जीव तब।
मन रहे मिथिलेश सा, तन व्यर्थ मत अभिमान कर।।
कांति हीरा लाल सी दे, हमें रवि ईशान अब।।

संत बन संतोष कर, जीवन बसंत बहार हो।
अस्मिता रख छंद-लय की अर्चना कर गीत की।
प्रवीण होकर पा विजय, हर श्वास बंदनवार हो।। २७
दिति-अदिति का द्वैत मेटो, रच ऋचाएँ प्रीत की।।

घर स्वजन से घर; विजन महल ना हमको चाहिए।
भक्ति पूर्वक जिलहरी को, तिलहरी पूजे निहार। २७
बिलहरी अभियान कर, हरितिमा हो अब कम नहीं।।
मंजरी छाया ग्रहणकर, अनंतारा पर निसार।। २७

साधना हो सफल, आशा पूर्ण हो, हर सुख प्रखर।
अनिल भू नभ सलिल पावक, शुद्ध मन्वन्तर निखर।।
१३-१२-२०२१
***
१३ सॉनेट
गृह प्रवेश २४
*
गृह प्रवेश सोल्लास कर, रहिए सदा सचेष्ट।
ताजमहल सा भव्य, दर्शनीय न मकां बने।
आस-पास हों महकती, खुशियाँ नित्य यथेष्ट।।
स्वप्न करें साकार, हाथ रखें माटी सने।।

भँवरे खुश हों; सुरक्षित, रहें तितलियाँ मीत।
झूमे तरु पर बैठ, तोता पिंजरे में न हो।
नहीं बिल्लियों से रहे, गौरैया भयभीत।।
गीत-कहानी सत्य, लिखे कलम को भय न हो।।

कंकर-कंकर में सखे!, शंकर पाएँ देख।
कलरव सुनिए जाग, सूर्य-किरण आ जगाए।
माथे पर आए नहीं, चिंताओं की रेख।।
खूब पले अनुराग, मैं-तुम को हम सुहाए।।

गृह स्वामी गृह स्वामिनी, रहें न दो हों एक।
मन-बस; मन में हो बसा, आगंतुक सविवेक।।
१३-१२-२०२१
***
१२ सॉनेट
समय
*
समय चक्र को नमन कर, चलें समय के साथ।
समय मीत बनता सखे!, समयबद्धता से सदा।
समय साथ पल-पल चलें, रखकर ऊँचा माथ।।
समय न भूले भूलिए, तभी जगत होगा फिदा।।

समय फर्क करता नहीं, राजा हो या रंक।
समय न देखे राह, चलता अपनी चाल वह।
समय फूल देता नहीं, नहीं चुभाता डंक।।
समय न भरता आह, रात न सोकर जगे सुबह।।

समय समय की बात है, समय समय का फेर।
समय न सकें खरीद, समय कहीं बिकता नहीं।
समय देर करता नहीं, नहीं करे अंधेर।।
समय सुलभ यदि सत्य, सुनें समय का सब यहीं।।

समय अनाहद नाद है, जो सुन ले हो धन्य।
समय सच्चिदानंद, इस सम कहीं न अन्य।।
१२-१२-२०२१
***
११ सॉनेट
काग गाएँ
*
कह रहे नवगीत, लिख-लिख विसंगतियाँ।
शारदे! दे मति, सुसंगति देख पाएँ।
दिशा-भ्रम जिनको न उनकी रुचें बतियाँ।।
कोयलों को चुप कराकर काग गाएँ।।

समय साक्षी है कि जन-मन पर्व धर्मी।
अभावों में भी हँसे रह साथ मिलकर।
पंक में पंकज बने रहकर सुकर्मी।।
सकल जग को सुरभि दे दिन-रात खिलकर।।

मूल्य पारंपरिक माने सनातन कह।
त्याज्य कहते हैं प्रगति का नाम ले कुछ।
दिखा ठेंगा करे अनदेखी सतत यह।।
लोक सुनता ही नहीं, ईनाम दे कुछ।।

लिखो नवगीतों में अब तो राष्ट्र गौरव।
सत्य-शिव-सुंदर गुँजाओ गीत कलरव।।
११-१२-२०२१
***

१०. विसंगतियाँ
(चतुर्दश छंद)
*
कह रहे नवगीत, लिख-लिख विसंगतियाँ।
शारदे! दे मति, सुसंगति देख पाएँ।
दिशा-भ्रम जिनको न उनकी रुचें बतियाँ।।
कोयलों को चुप कराकर काग गाएँ।।

समय साक्षी है कि जन-मन पर्व धर्मी।
अभावों में भी हँसे रह साथ मिलकर।
पंक में पंकज बने रहकर सुकर्मी।।
सकल जग को सुरभि दे दिन-रात खिलकर।।

मूल्य पारंपरिक माने सनातन कह।
त्याज्य कहते हैं प्रगति का नाम ले कुछ।
दिखा ठेंगा करे अनदेखी सतत यह।।
लोक सुनता ही नहीं, ईनाम दे कुछ।।

लिखो नवगीतों में अब तो राष्ट्र गौरव।
सत्य-शिव-सुंदर गुँजाओ गीत कलरव।।
११-१२-२०२१
***
९ सॉनेट
संतोष
*
है संतोष कृपा शारद की बरस रही हम सबके ऊपर।
हो संतोष अगर कुछ सार्थक गह-कह पाएँ।।
जड़ें जमीं में जमा, उड़ें, आएँ नभ छूकर।
सत-शिव-सुंदर भाव तनिक तो हम तह पाएँ।।

मानव हैं माया-मद-मोह, न ममता छूटे।
इन्सां हैं ईश्वर के निकट तनिक हो पाएँ।
जोड़ें परोपकार की पूँजी, काल न लूटे।।
दीनबंधु बन नर में ही नारायण पाएँ।।

काया-माया-छाया नश्वर मगर सत्य भी।
राग और वैराग्य समन्वय शुभ कर गाएँ।
ईश्वर की करुणा, मनुष्य के हृदय बसेगी।
जब तब ही हम ज्यों की त्यों चादर धर पाएँ।।

सरला विमला मति दे शारद!, सफल साधना।
तभी जीव संजीव हो सके, साज साध ना।।
११-१२-२०२१
***
०८ सॉनेट - गीत
सैनिक
*
सैनिक कभी नहीं मरते हैं
*
जान हथेली पर ले जीते
चुनौतियों से टकराते हैं।
जैसे हों अपराजित चीते।।
देवोपम गरिमा पाते हैं।।

नित्य मौत से टकराते हैं।
जीते जी बनते उदाहरण।
मृत्युंजय बन जी जाते हैं।।
जूझ मौत का विहँस कर वरण।।

कीर्ति कथाएँ लोक सुनाता।
अपने दिल में करे प्रतिष्ठित।
उन्हें याद कर पुष्प चढ़ाता।।
श्रद्धा सुमन करे रो अर्पित।।

शत्रु नाम सुनकर डरते हैं।
सैनिक नहीं मरा करते हैं।।
*
सैनिक जिएँ तानकर सीना।
कठिन चुनौती हर स्वीकारें।
मार मौत को जानें जीना।।
नित आपद को अंगीकारें।।

अस्त्र-शस्त्र ले पग-पग बढ़ते।
ढाल थाम झट करते रक्षा।
लपक वक्ष पर अरि के चढ़ते।।
अरि माँगे प्राणों की भिक्षा।

हर बाधा से डटकर जूझें।
नहीं आपदाओं से डरते।
हर मुश्किल सवाल को बूझें।।
सदा देश का संकट हरते।।

होते अमर श्वास तजते हैं।
सैनिक नहीं मरा करते हैं।।
*
मत रोएँ संकल्प करें सब।
बच्चा-बच्चा बिपिन बनेगा।
मधूलिका हो हर बच्ची अब।।
हर मोर्चे पर समर ठनेगा।।

बने विरासत शौर्य-पराक्रम।
काम करें निष्काम भाव से।
याद करे दुश्मन बल-विक्रम।।
बच्चे सैनिक बनें चाव से।।

आँख आँख में डाल शत्रु की।
आँख निकाल लिया करते हैं।
जान बचाने देश-मित्र की।।
बाँह पसार दिया करते हैं।।

वीर-कथा गा कवि तरते हैं।
सैनिक नहीं मरा करते हैं।।
९-१२-२०२१
***
७ सॉनेट
अपनी कहे
*
अपनी कहे, न सुने और की।
कुर्सी बैठा अति का स्याना।
करुण कथा लिख रहा दौर की।।
घर-घर लाशें दे कोरोना।।

बौने कहते खुद को ऊँचा।
सागर को बतलाते मीठा।
गत पर थूक हो रहा नीचा।।
कुकुर चाटे दौना जूठा।।

गर्दभ बाघांबर धारण कर।
सीना ताने रेंक रहा है।
हर मुद्दे पर मुँह की खाकर।।
ऊँची-ऊँची फेंक रहा है।।

जिसने हाँ में हाँ न मिलाई।
उसकी समझो शामत आई।।
८-१२-२०२१
***
अभिनव प्रयोग
६ सॉनेट गीत
जिंदगी के रंग
*
जिंदगी के रंग कई रे!
*
शैशव-बचपन खेल बिताया।
हो किशोर देखे नव सपने।
तरुणाई तन-मन हुलसाया।।
सोचा बदलूँ जग के नपने।।

यौवन बसंत मन हर्षाया।
तज द्वैत वारा अद्वैत विहँस।
हो प्रौढ़ समझ कुछ सच आया।।
वार्धक्य उपेक्षित गया झुलस।।

अब अपने ही अपने न रहे।
जिसने देखा मुँह फेर लिया।
साथी अपने सपने न रहे।।
झट फूँक राख का ढेर किया।।

छाया तम न संग गयी रे!
जिंदगी के रंग कई रे!!
७-१२-२०२१
***
५ सॉनेट
वंदना
*
वंदन देव गजानन शत-शत।
करूँ प्रणाम शारदा माता।
कर्मविधाता चित्र गुप्त प्रभु।।
नमन जगत्जननी-जगत्राता।।
अंतरिक्ष नवगृह हिंदी माँ।
दसों दिशाएँ सदा सदय हों।
छंदों से आनंदित आत्मा।।
शब्द शक्ति पा भाव अजय हों।।
श्वास-श्वास रस बरसाओ प्रभु!
अलंकार हो आस हास में।
सत-शिव-सुंदर कह पाऊँ विभु।।
रखूँ भरोसा सत्प्रयास में।।
नाद ताल लिपि अक्षर वाणी।
निर्मल मति दे माँ कल्याणी।।
६-१२-२०२१
४ सॉनेट
कबीर
*
ज्यों की त्यों चादर धर भाई
जिसने दी वह आएगा।
क्यों तैंने मैली कर दी है?
पूछे; क्या बतलायेगा?

काँकर-पाथर जोड़ बनाई
मस्जिद चढ़कर बांग दे।
पाथर पूज ईश कब मिलता?
नाहक रचता स्वांग रे!

दो पाटन के बीच न बचता
कोई सोच मत हो दुखी।
कीली लगा न किंचित पिसता
सत्य सीखकर हो सुखी।

फेंक, जोड़ मत; तभी अमीर
सत्य बोलता सदा कबीर।।
५-१२-२०२१
***
३ सॉनेट
भोर भई
*
भोर भई जागो रे भाई!
उठो न आलस करना।
कलरव करती चिड़िया आई।।
ईश-नमन कर हँसना।

खिड़की खोल, हवा का झोंका।
कमरे में आकर यह बोले।
चल बाहर हम घूमें थोड़ा।।
दाँत साफकर हल्का हो ले।।

लौट नहा कर, गोरस पी ले।
फिर कर ले कुछ देर पढ़ाई।
जी भर नए दिवस को जी ले।।
बाँटे अरुण विहँस अरुणाई।।

कोरोना से बचकर रहना।
पहन मुखौटा जैसे गहना।।
***
२ सॉनेट
मन की बात
*
मन की बात कर रहे, जन की बात न जिनको भाए।
उनको चुनकर चूक हो गई, पछताए मतदाता।
सत्ता पाकर भूले सीढ़ी, चढ़कर तोड़ गिराए।।
अन्धभक्त जो नहीं, न फूटी आँखों तनिक सुहाता।।

जन आंदोलन दबा-कुचलता, शासन मनमानी कर।
याद न आता रह विरोध में, संसद खुद थी रोकी।
येन-केन सरकार बनाता, बेहद नादानी कर।।
अब न सुहाती है विरोध की, किंचित रोका-रोकी।।

पर उपदेश कुशल बहुतेरे, बैर पड़ोसी से कर।
पड़े अकेले लेकिन फिर भी फुला रहे हैं छाती।
चंद धनिक खुश; अगिन रो रहे रोजी-काम गँवाकर।।
जनप्रतिनिधि गण सेवा भूले, सजे बने बाराती।।

त्याग शहीदों का भूले हैं, बन किसान के दुश्मन।
लाश उगलती गंगा, ढाँकेँ; कहें न गंदी; पावन।।
५-१२-२०२१
***
१ सॉनेट
सवेरा
*
रश्मिरथी जब आते हैं
प्राची पर लाली छाती
पंछी शोर मचाते हैं
उषा नृत्य करती गाती

आँगन में आ गौरैया
उछल-कूदकर फुदक-फुदक
करती है ता ता थैया
झाँक-झाँककर, उचक-उचक

मुर्गा देता बाँग जगो
उठो तुरत शैया त्यागो
हे ईश्वर! सुख-शांति रहे
सबमें रब है अनुरागो

करो कलेवा दूध पियो
सौ बरसों तक विहँस जियो
***
३-१२-२०२१

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