बुधवार, 7 अगस्त 2019

लघुकथा : सूरज दुबारा डूब गया

लघुकथा :
सूरज दुबारा डूब गया
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'आज सूरज दुबारा डूब गया', बरबस ही बेटे के मुँह से निकला।
'पापा गलत कह रहे हो,' तुरंत पोती ने कहा।
'नहीं मैं ठीक कहा रहा हूँ। '
'ठीक नहीं कह रहे हो।'
पोती बहस करने पर उतारू दिखी तो बाप-बेटी की बहस में बेटी को डाँट न पड़ जाए यह सोच बहू बोली 'मुनिया, बहस मत कर, बड़ों की बातें तू क्या समझे?'
'ठीक है, मैं न समझूँ तो समझाओ, चुप मत कराओ।'
'बेटे ने मोबाइल पर एक चित्र दिखाते हुए कहा 'देखो इनके माथे पर सूरज चमक रहा है न?'
'हाँ, पूरा चेहरा सूरज की रौशनी से जगमगा रहा है।'
तब तक एक और चित्र दिखाकर बेटे ने कहा- 'देखो सूरज पहली बार डूब गया।'
पोती ने चित्र देख और उसके चेहरे पर उदासी पसर गयी।
अब बेटे ने तीसरा चित्र दिखाया और कहा 'देखो सूरज फिर से निकल आया न?'
यह चित्र देखते ही पोती चहकी 'हाँ, चहरे पर बिलकुल वैसी ही चमक।'
बेटा चौथा चित्र दिखा पाता उसके पहले ही पोती बोल पडी 'पापा! सच्ची सूरज दुबारा डूब गया।'
बेटा पोती को लेकर चला गया। मैंने प्रश्न वाचक दृष्टि से बहू को देखा जो पोती के पीछे खड़ी थी। पिता जी! पहला चित्र शास्त्री जी और ललिता जी एक था, दूसरा ताशकंद में शास्त्री जी को खोने के बाद ललिता जी का और तीसरा सुषमा स्वराज जी का।
मैं और बहू सहमत थे की सूरज दुबारा डूब गया।
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