सोमवार, 5 अगस्त 2019

मुक्तक

मुक्तक 

सखी-सहेली छाया धूप, जिसकी वह सूरज सा भूप
जो अरूप क्या जाने लोक, कब किसको कहता है रूप
कर्म कलश दे कीर्ति तुझे, व्यर्थ न बना महल-स्तूप
तृप्त नहीं प्यासा यदि, व्यर्थ 'सलिल' सलिला सर कूप
*

प्रार्थना है, वंदना है, अर्चना है बहुत सुन्दर
करें जब भी नव सृजन की साधना है बहुत सुंदर
कामना करिए वही जो काम आए संकटों में
सर्व हित की चाहना है, भावना है बहुत

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