रविवार, 4 अगस्त 2019

कृति चर्चा: ''पाखी खोले पंख'' श्रीधर प्रसाद द्विवेदी

कृति चर्चा: 
''पाखी खोले पंख'' : गुंजित दोहा शंख 
[कृति विवरण: पाखी खोले शंख, दोहा संकलन, श्रीधर प्रसाद द्विवेदी, प्रथम संस्करण, २०१७, आकार २२ से.मी. x १४ से.मी., पृष्ठ १०४, मूल्य ३००/-, आवरण सजिल्द बहुरंगी जैकेट सहित, प्रगतिशील प्रकाशन दिल्ली, दोहाकार संपर्क अमरावती। गायत्री मंदिर रोड, सुदना, पलामू, ८२२१०२ झारखंड, चलभाष ९४३१५५४४२८, ९९३९२३३९९३, ०७३५२९१८०४४, ईमेल sp.dwivedi7@gmail.com]
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दोहा चेतन छंद है, जीवन का पर्याय
दोहा में ही छिपा है, रसानंद-अध्याय 
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रस लय भाव प्रतीक हैं, दोहा के पुरुषार्थ 
अमिधा व्यंजन लक्षणा, प्रगट करें निहितार्थ 
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कत्था कथ्य समान है, चूना अर्थ सदृश्य  
शब्द सुपारी भाव है, पान मान सादृश्य 
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अलंकार-त्रै शक्तियाँ, इलायची-गुलकंद
जल गुलाब का बिम्ब है, रसानंद दे छंद 
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श्री-श्रीधर नित अधर धर, पान करें गुणगान 
चिंता हर हर जीव की, करते तुरत निदान 
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दोहा गति-यति संतुलन,  नर-नारी का मेल 
पंक्ति-चरण मग-पग सदृश, रचना विधि का खेल 
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कवि पाखी पर खोलकर, भरता भाव उड़ान 
पूर्व करे प्रभु वंदना, दोहा भजन समान  
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अन्तस् कलुष मिटाइए, हरिए तमस अशेष। 
उर भासित होता रहे, अक्षर ब्रम्ह विशेष।।                 पृष्ठ २१  
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दोहानुज है सोरठा, चित-पट सा संबंध 
विषम बने सम, सम-विषम, है अटूट अनुबंध 
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बरबस आते ध्यान, किया निमीलित नैन जब। 
हरि करते कल्याण, वापस आता श्वास तब।।           पृष्ठ २४ 
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दोहा पर दोहा रचे, परिभाषा दी ठीक  
उल्लाला-छप्पय  सिखा, भली बनाई लीक 
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उस प्रवाह में शब्द जो, आ जाएँ 'अनयास'।               पृष्ठ २७ 
शब्द विरूपित हो नहीं, तब ही सफल प्रयास 
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ऋतु-मौसम पर रचे हैं, दोहे सरस  विशेष      
रूप प्रकृति का समाहित, इनमें हुआ अशेष 
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शरद रुपहली चाँदनी, अवनि प्रफुल्लित गात। 
खिली कुमुदिनी ताल में, गगन मगन मुस्कात।।      पृष्ठ २९ 
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दिवा-निशा कर एक सा, आया शिशिर कमाल। 
बूढ़े-बच्चे, विहग, पशु, भये विकल बेहाल।।              पृष्ठ २१   
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मन फागुन फागुन हुआ, आँखें सावन मास।
नमक छिड़कते जले पर, कहें लोग मधुमास।।          पृष्ठ ३१

शरद-घाम का सम्मिलन, कुपित बनाता पित्त। 
झरते सुमन पलाश वन, सेमल व्याकुल चित्त।।       पृष्ठ ३३ 

बादल सूरज खेलते,  आँख-मिचौली खेल। 
पहुँची नहीं पड़ाव तक, आसमान की रेल।।               पृष्ठ ३५ 
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बरस रहा सावन सरस्, साजन भीगे द्वार। 
घर आगतपतिका सरस, भीतर छुटा फुहार।।            पृष्ठ ३६
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उपमा रूपक यमक की,  जहँ-तहँ छटा विशेष 
रसिक चित्त को मोहता, अनुप्रास अरु श्लेष 
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जेठ सुबह सूरज उगा, पूर्ण कला के साथ। 
ज्यों बारह आदित्य मिल, निकले नभ के माथ।।       पृष्ठ ३९    
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मटर 'मसुर' कटने लगे, रवि 'उष्मा' सा तप्त             पृष्ठ ४३ / ४५ 
शब्द विरूपित यदि न हों, अर्थ करें विज्ञप्त 
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कवि-कौशल है मुहावरे, बन दोहा का अंग 
वृद्धि करें चारुत्व की, अगिन बिखेरें रंग 
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उनकी दृष्टि कपोल पर, इनकी कंचुकि कोर। 
'नयन हुए दो-चार' जब, बँधे प्रेम की डोर।।                 पृष्ठ ४६ 

'आँखों-आँखों कट गई', करवट लेते रैन।
कान भोर से खा रही, कर्कश कोकिल बैन।।                पृष्ठ ४७  २४ 
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बना घुमौआ चटपटा, अद्भुत रहता स्वाद। 
'मुँह में पानी आ गया', जब भी आती याद।।               पृष्ठ ४९

दल का भेद रहा नहीं, लक्ष्य सभी का एक। 
'बहते जल में हाथ धो', 'अपनी रोटी सेंक'।।                पृष्ठ ५४ 
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बाबा व्यापारी हुए, बेचें आटा-तेल। 
कोतवाल सैंया बना, खूब जमेगा खेल।।                     पृष्ठ ७७ 

कई देश पर मर मिटे, हिन्दू-तुर्क न भेद। 
कई स्वदेशी खा यहाँ, पत्तल-करते छेद।।                  पृष्ठ ७४

अरे! पवन 'कहँ से मिला', यह सौरभ सौगात।             पृष्ठ ४७ 
शब्द लिंग के दोष दो, सहज मिट सकें भ्रात।। 
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'अरे पवन पाई कहाँ, यह सौरभ सौगात' 
कर त्रुटि कर लें दूर तो, बाधा कहीं न तात  
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झूमर कजरी की कहीं, सुनी न मीठी बोल।                  पृष्ठ ४८ 
लिंग दोष दृष्टव्य है, देखें किंचित झोल 
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'झूमर-कजरी का कहीं, सुना न मीठा बोल         
पता नहीं खोया कहाँ, शादीवाला ढोल 
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पर्यावरण बिगड़ गया, जीव हो गए लुप्त 
श्रीधर को चिंता बहुत, मनुज रहा क्यों सुप्त?
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पता नहीं किस राह से, गिद्ध गए सुर-धाम। 
बिगड़ा अब पर्यावरण, गौरैया गुमनाम।।                 पृष्ठ ५८  
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पौधा रोपें  तरु बना, रक्षा करिए मीत 
पंछी आ कलरव करें, सुनें मधुर संगीत
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आँगन में तुलसी लगा, बाहर पीपल-नीम। 
स्वच्छ वायु मिलती रहे, घर से दूर हकीम।।            पृष्ठ ५८ 
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देख विसंगति आज की, कवि कहता युग-सत्य
नाकाबिल अफसर बनें, काबिल बनते भृत्य 
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कौआ काजू चुग रहा, चना-चबेना हंस। 
टीका उसे नसीब हो, जो राजा का वंश।।                    पृष्ठ ६१ / ३६ 
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मानव बदले आचरण, स्वार्थ साध हो दूर 
कवि-मन आहत हो कहे, आँखें रहते सूर 
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खेला खाया साथ में, था लँगोटिया यार। 
अब दर्शन दुर्लभ हुआ, लेकर गया उधार।।               पृष्ठ ६४ 
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'पर सब कहाँ प्रत्यक्ष हैँ, मीडिया पैना दर्भ                 पृष्ठ ७०/६१ 
चौदह बारह कलाएँ, कहते हैं संदर्भ 
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अलंकार की छवि-छटा, करे चारुता-वृद्धि 
रूपक उपमा यमक से, हो सौंदर्य समृद्धि 
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पानी देने में हुई, बेपानी सरकार। 
बिन पानी होने लगे, जीव-जंतु लाचार।।                   पृष्ठ ७९ 
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चुन-चुन लाए शाख से, माली विविध प्रसून।              पृष्ठ ७७  
बहु अर्थी है श्लेष ज्यों, मोती मानुस चून 
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आँख खुले सब मिल करें, साथ विसंगति दूर   
कवि की इतनी चाह है, शीश न बैठे धूर 
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अमिधा कवि को प्रिय अधिक, सरस-सहज हो कथ्य  
पाठक-श्रोता समझ ले, अर्थ न चूके तथ्य 
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दर्शन दोहों में निहित, सहित लोक आचार 
पढ़ सुन समझे जो इन्हें, करे श्रेष्ठ व्यवहार 
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युग विसंगति-चित्र हैं, शब्द-शब्द साकार 
जैसे दर्पण में दिखे, सारा सच साकार 
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श्रेष्ठ-ज्येष्ठ श्रीधर लिखें, दोहे आत्म उड़ेल 
मिले साथ परमात्म  भी, डीप-ज्योति का खेल 
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चर्चाकार : आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
विश्व वाणी हिंदी संस्थान,  
४०१ विजय अपार्टमेंट नेपियर टाउन जबलपुर  ४८२००१ 
चलभाष: ९४२५१ ८३२४४। ईमेल salil.sanjiv@gmail.com

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