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सोमवार, 26 अगस्त 2013

prachin bastar: rajiv ranjan

                                   दुर्भाग्य! बस्तर से यह विरासत मिट जायेगी
    
[प्                                                   प्राचीन बस्तर/रामायण काल से उद्धरित वर्तमान का समाज शास्त्र]

                                             राजीव रंजन
दुर्भाग्य! बस्तर से यह विरासत मिट जायेगी
[प्राचीन बस्तर/रामायण काल से उद्धरित वर्तमान का समाज शास्त्र] 
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बस्तर पर जानकारी एकत्रीकरण के लिये आर्य-द्रविड अंतर्सम्बन्धों को बारीकी से समझना आवश्यक है। वस्तुत: हमारे पूर्वाग्रह गहरे हैं तथा हम अपनी-अपनी पहचान की मानसिकताओं के साथ इतने अधकचरे तरीके से जुडे हुए हैं कि यह मानते ही नहीं कि वह सब कुछ जो भारत भूमि से जुडा हुआ है, हमारा ही है; आर्य भी हम हैं और द्रविड भी हम। अपनी ही चार पीढी से उपर के पूर्वजों का नाम जानने में दिमाग पर बल लग जाते हैं फिर किस काम का वह छ्द्म गौरव जो हमारी मानसिकताओं को वर्ण और रक्त की श्रेष्ठताओं जैसी अनावश्यक बहसों में उलझाता है। रामधारी सिंह दिनकर की कृति “संस्कृति के चार अध्याय” एक उत्कृष्ट रचना है जो एसी सभी बहसों को अपने तार्कित उत्तर से संतुष्ट करती है। “मूल निवासी कौन?” इस झगडे का निबटारा तो शायद वह पहली कोषिका भी नहीं कर सकती जिसके विभाजन नें ही यह सम्पूर्ण जीवजगत पैदा किया है। जब यह धरती सबकी एक समान रही होगी तब हर रंग, हर रूप तथा हर नस्ल का मानव यहाँ यायावरी करता हुआ एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र भटकता रहा होगा। इस भूमि पर कई घूमंतू मानव प्रजातियों ने कदम रखे; जब द्रविड इस देश में आये यहाँ आग्नेय जाति (अनुमानित मूल स्थान - यूरोप के अग्निकोण) वालों की प्रधानता थी और कुछ नीग्रो जाति (अनुमानित मूल स्थान - अफ्रीका) के लोग भी विद्यमान थे। अत: अनुमान किया जा सकता है कि नीग्रो और आग्नेय लोगों की बहुत सी बातें पहले द्रविड सभ्यता (अनुमानित मूल स्थान पश्चिम एशिया) में आयीं और पीछे द्रविड-आर्य मिलन होने पर आर्य सभ्यता (अनुमानित मूल स्थान मध्य एशिया) में भी। वर्तमान भारत क्षेत्र में रहने वाले प्राचीन निवासियों के मूल स्थानों के लिये मैने इतिहास की कई पुस्तकों में भी झांका लेकिन अधिकांश में पूर्वाग्रह ही अधिक नजर आता है। अत: दिनकर की ही पुस्तक के उद्धरण मुझे उचित जान पडते हैं जो “अंडा पहले आया कि मुर्गी” वाली बहस को अधिक तूल न दे कर समरस्ता के मर्म की बात करते हैं। 

 प्राचीन बस्तर रामायणकाल में दक्षिणा पथ की बहुतायत गतिविधियों का केन्द्र रहा होगा तथा इस सब का प्रारंभ महर्षि अगस्त्य के विन्ध्य पर्वत पार करने की रोचक कथा के साथ होता है। कथा नें कविता तत्व की मोटी गिलाफ ओढी हुई है। कथा कहती है कि विन्ध्य अपना आकार निरंतर बढा रहा था जिस कारण सूर्य की रोशनी पृथ्वी पर पहुँचनी बन्द हो गई। इससे निजात पाने के लिये महर्षि ने विंध्याचल पर्वत से कहा कि उन्हें तप करने हेतु दक्षिण में जाना है अतः मार्ग दे। विंध्याचल महर्षि के चरणों में झुक गया। अगस्त्य ने कहा कि विन्ध्य उनके वापस आने तक झुका ही रहे तथा वे पर्वत को लाँघकर दक्षिण को चले गये। उसके पश्चात वहीं आश्रम बनाकर तप किया तथा रहने लगे। यह दक्षिण की महत्ता तथा विन्ध्य की दो संस्कृतियों के बीच दीवाल की तरह खडे होने की पुष्टि करती हुई कथा है। प्राचीन आश्रम संस्कृति तथा शिक्षा प्रणालियों का अध्ययन करने पर यह समझ विकसित होती है कि अगस्त्य एक पूरी संस्था की तरह कार्य कर रहे थे तथा वे उत्तर दक्षिण को एक सूत्र में बाँधने की प्रथम ज्ञात कडी हैं। हमनें उनका एक अध्यापक, एक उपदेशक, एक ज्ञानी, एक यायावर, एक दिव्यास्त्र निर्माता तथा योजनाकार का रूप तो जाना है लेकिन उनकी वास्तविक उपलब्धि कम ही लोग जानते हैं कि महर्षि अगस्त्य नें ही तमिल भाषा के आदि व्याकरण “अगस्त्यम” की रचना की है। यह रचना सिद्ध करती है कि अगस्त्य केवल दण्डकारण्य तक ही सीमित नहीं रहे अपितु सुदूर दक्षिण तक उन्होंने यात्रा की व वहाँ का जन जीवन यहाँ तक कि भाषा को भी एक व्यवस्था प्रदान करने का यत्न किया। 

दण्डकारण्य के प्राचीन समाजशास्त्र का आज भी महत्व विद्यमान है। दक्षिणापथ का उत्तरी भाग था दण्डकारण्य; यहाँ राक्षस जाति के निवास की जगह उनके आक्रमणों का ही विवरण अधिक मिलता है। प्राचीन विवरणों के आधार पर उन जनजातियों को जिन्हें राक्षस कहा गया है, उनका निवास दक्षिण के बस्तरेतर क्षेत्र अर्थात आन्ध्र व उस से लग कर सुदूर दक्षिण तक प्रतीत होते हैं। यह भी ज्ञात होता है कि लम्बे समय तक क्षेत्र में किसी समाजसेवी की तरह कार्य करते हुए अगस्त्य नें दण्डकारण्य क्षेत्र में निवासरत अनेक जनजातियों के मध्य समन्वय का वातावरण उत्पन्न कर लिया था। महर्षि अगस्त्य का आश्रम क्षेत्र वर्तमान बस्तर के भीतर ही था जो इस दिशा में किये गये श्री सूर्य कुमार वर्मा के 1906 में सरस्वति पत्रिका में प्रकाशित शोध आलेख द्वारा भली प्रकार सिद्ध किया गया है। राम के वनवास से पहले तक अगस्त्य मुनि का आश्रम ही दो संस्कृतियों का समंवय स्थल बन गया था जिसका स्थानीय जनजातियों के सहयोग और योगदान के बिना संचालित होना संभव प्रतीत नहीं होता। राम के वनागमन से पूर्व इस क्षेत्र में निवासरत जनजातियों पर राक्षसों के कुछ हमलों का जिक्र होता है; उदाहरण के लिये लंका को हस्तगत करने के बाद रावण दक्षिण विजय के लिये निकला जिसका कि उल्लेख वाल्मीकी रामायण में मिलता है – युद्धं मे दीयतामिति निर्जिता: स्मेति वा ब्रूत [वह दक्षिण में एक नगर से दूसरे नगर पहुँचता और चुनौती देता कि या तो मुझसे युद्ध करो या पराजय स्वीकार करो]। वानर जनजाति का नेतृत्व कर रहे बालि नें रावण को न केवल युद्ध में पराजित कर दिया अपितु बंदी भी बना लिया। इस प्रसंग का अंत होता है जब रावण-बालि संधि हो जाती है। रावण नें बालि के अलावा मांधाता (बस्तर का वर्तमान मंधोता ग्राम) के जनजातियों के सरदारों से भी समझौते कर लिये और लंका लौटने से पहले दण्डकारण्य क्षेत्र में अपने प्रतिनिधि खर-दूषण के रूप में किसी निगरानी चौकी या सत्ता प्रतीक की तरह छोड दिये थे। उल्लेख मिलता है कि उनके साथ चौदह हजार राक्षसों की एक टुकडी भी थी जिसका कार्य आतंक प्रसारित कर रावण की सत्ता का भय बनाये रखना था। यह कथा आगे बढती है जब राम का वनागमन होता है। पं केदारनाथ ठाकुर अपनी कृति बस्तर भूषण (1908) में उल्लेख करते हैं कि “राम पहले भारद्वाज आश्रम से होते हुए रत्नगिरि में आये। रत्नगिरि से चल कर बस्तर राज्य तथा कांकेर राज्य की पश्चिमी सीमा से होते हुए वे गोदावरी तक आये, वहाँ से गोदावरी के बहाव की ओर कुछ दिन घूमते रहे तत्पश्चात पर्णशाला में आ कर निवास किया। यहीं पर सीता हरण हुआ। रामचन्द्र जी सीता को गोदावरी नदी के पूर्व तथा इशान में ढूंढने लगे। यही पर उनकी शिवरी भीलनी (शबरी) से भेंट हुई। शिवरी नदी (शबरी नदी) के पूर्व तथा जैपुर राज्य में एक पर्वत है जिसे आज रामगिरि के नाम से जाना जाता है उसके चारो ओर असंख्य छोटी बडी पहाडियाँ हैं, इसी समूह में उत्तर की ओर रंफा पहाड है जिसे जैपुर स्टेट के लोग किष्किंधा पहाड़ कहते हैं। इन पहाडों पर वर्तमान समय में रेड्डी लोग वास करते हैं जो स्वयं को वानर का वंशज मानते हैं”।

बहुत अधिक कार्य अब तक इस दिशा में नहीं हुए हैं जो इतिहास प्रदत्त प्रमाणों का बारीकी से विश्लेषण करें। ब्रिटिश शासक ग्रिग्सन नें 1937 ई. में इस काल के प्रमाणों को एकत्र करने व दस्तावेजबद्ध करने के लिये कैप्टन गिब्सन को नियुक्त किया था। कहा जाता है कि गिब्सन नें बहुत सी जानकारियाँ एकत्रित भी कर ली थी। उसी समय द्वितीय विश्व युद्ध छिड गया। गिब्सन सारी एकत्र सामग्री व जानकारी को ले कर इंग्लैंण्ड चले गये व वहीं युद्ध में मारे गये। इसके बाद स्वतंत्र भारत के किसी शासक, नेता या जिलाधीश नें इस तरह का कार्य करने की जहमत नहीं उठायी। अगला प्रामाणिक कार्य उपलब्ध होता है डॉ. हीरालाल शुक्ल का जिनकी किताब “लंका की खोज” एवं “रामायण का पुरातत्व” अद्वितीय दस्तावेज हैं। डॉ. शुक्ल नें बस्तर क्षेत्र में उपस्थित रामायणकालीन जनजातियों की वर्तमान जनजातियों से तुलना व साम्यता को विस्तार से प्रस्तुत करने का यत्न किया है। उनके अनुसार रामायण युगीन वनेचर प्रजातियों में आग्नेय परिवार से सम्बद्ध जनजातियाँ हैं - निषाद, गृद्ध तथा शबर; अगर मध्यवर्ती द्रविड परिवार की बात की जाये तो उससे सम्बद्ध प्रजातियाँ हैं – वानर तथा राक्षस। 

रामायण में चिन्हित आग्नेय परिवार की जनजातियों नें आर्यों से शीघ्र निकटता तथा मैत्री कर ली थी। निषाद प्रजाति का उल्लेख मूल रूप से उत्तरप्रदेश के संदर्भों में प्राप्त होता है। राम को गंगा पार कराना एवं राम-निषाद मैत्री का बडा ही मर्मस्पर्शी वर्णन रामायण में प्राप्त होता है। बस्तर के ‘कुण्डुक’ स्वयं को निषाद वंश का मानते हैं तथा इस जनजाति का विश्वास है कि वे त्रेता युग में राम के साथ ही गंगातट से दण्डक तक आये। यह प्रजाति आज भी नाविक ही है एवं इनकी उपस्थिति चित्रकूट के निकटवर्ती क्षेत्रों में सीमित रह गयी है। रामायण में वर्णित दूसरी प्रजाती है गृद्ध। गोदावरी की पार्श्ववर्ती पर्वतमालाओं पर इनका निवास माना गया है। गिद्ध इन जनजातियों का प्रतीक रहा होगा। इनके प्रमुख नायक सम्पाति तथा जटायु का आर्य जनजातियों से तालमेल प्रतीत होता है। रामायण में पंख कटने के बाद जिस प्रस्त्रवण पर्वत (बैलाडिला) के निकट जटायु के दम तोडने का वर्णन है उस स्थल को आज गीदम के नाम से जाना जा रहा है। जगदलपुर के जाटम ग्राम में अब भी गदबा जनजाति के घर हैं जिनका सम्बन्ध गृद्ध प्रजाति से जोड कर देखा जाता है। बस्तर की गदबा प्रजाति प्रतीक पूजक है तथा गृद्ध आज भी इनके यहाँ “टोटेम” है। जिस प्रकार बस्तर में हल प्रतीक के वाहकों को हलबा कहा गया उसी प्रकार गृद्ध प्रतीक के वाहक गदबा कहलाने लगे। यह प्रजाति आज विलुप्ति पर पहुँच गयी है। लोग कृषक अथवा मजदूर हैं तथा अब इन्हें पहचानना कठिन होता जा रहा है। राम-शबरी मिलन और शबरी के प्रेम से खिलाये गये जूठे बेर एक महान प्रेरक प्रसंग है। इसी कथा नें शबर जनजाति की पहचान को उसकी प्राचीनता से जोडा है। ऐतरेय ब्राम्हण में शबरों को आर्य देश की सीमा पर स्थित बताया गया है अत: यह क्षेत्र निश्चित ही दण्डकारण्य है। साक्ष्यों के आधार पर एवं पुरा-भूगोल पर किये गये विश्लेषण के आधार पर यह सिद्ध हुआ है कि शबरी का आश्रम शबरी तथा गोदावरी नदी के संगम पर स्थित था। डब्ल्यु जी ग्रिफिथ नें मध्य भारत की कोल प्रजाति को शबर माना है (क़ोल ट्राईब्स ऑफ सेंट्रल इंडिया, 1946)। डॉ. हीरालाल शुक्ल भी इन्हें ओडिशा और बस्तर के सीमावर्ती क्षेत्रों में चिन्हित करते हैं। शबर जनजाति के लोग गोंड अथवा खोंड की तुलना में भिन्न होते हैं। इनकी स्त्रियाँ नासिका तथा हनु में गुदना करती हैं एवं कपोलों में भी गहरी रेखायें गुदवाती हैं। कर्ण-आभूषण दर्शनीय होते हैं व कान में चौदह तक छेद कराने का चलन पाया गया है। प्राचीन ग्रंथों के आधार पर शबरों के दो विभेद पाये गये हैं – पर्ण शबर तथ नग्न शबर। नग्न शबर प्रजाति आर्यों के निकट नहीं आ पायी थी व अपनी मूलावस्था में रहने के कारण यह नामांकरण हुआ है। बंडा परजा जनजाति ही नग्न शबर मानी जाती है। 

मध्यवर्ती द्रविड परिवार की वानर तथा राक्षस जातियाँ एक समय में ताकतवर तथा सक्रियतम रही हैं। यह तो पहचान ही लिया गया है कि काकिनाडु (पूर्वी गोदावरी) सहित कोरापुट व कालाहाँडी के आंशिक क्षेत्र किष्किन्धा जनपद के अंतर्गत आते थे। रामायण में किष्किन्धा के निवासियों के लिये वानर पहचान का प्रयोग है। वानरो की जो प्रजातिगत विशेषतायें कही जाती हैं उसके अनुसार वे भावुक, चपल, ताम्रवदना अथवा कनकप्रभ उल्लेखित होने के कारण सोने जैसे वर्ण के होते थे। आज भी खम्माम, बस्तर, कोरापुट तथा कालाहाण्डी की आदिम प्रजातियाँ (इन क्षेत्रों में निवास करने वाली कंध जनजातियों को विद्वानों नें वानर माना है) बालि का स्मरण करती हैं। बस्तर में बालिजात्रा धूमधाम से मनाया जाने वाला पर्व है। कंध प्रजाति का गोत्र चिन्ह वानर है तथा वंशों के नाम सुग्री, जाम्ब तथा हनु आदि मिलते हैं। नृत्य आदि अवसरों पर कंध लोग आज भी पूँछ धारण करते हैं। कन्ध के अन्य पर्यायवाची खोंड, कोडा, कुई तथा कुवि हैं जो इन्हें कोयतुर (गोंड) जनजातियों के निकट सिद्ध करते हैं। प्रकृति की दृष्टि से ये लोग दण्डामि माडिया के भी निकट नजर आते हैं। रामायण में जिसे राक्षस कहा गया है वैदिक साहित्य नें उन्हें दस्यु सम्बोधित किया है। यह जनजाति प्रखर योद्धा रही है तथा इन्होंने आर्यों की आधीनता को अस्वीकार कर सर्वदा युद्ध का मार्गानुसरण किया है। राक्षसों के लिये ऋग्वेद में क्रव्याद: अर्थात कच्चा मांसाहार करने वाले; मृघ्रवाच: अर्थात जिनकी भाषा न समझ आये; अदेवयु: अर्थात देवताओं को न मानने वाले; अनास अर्थात जिनकी नाक छोटी व उठी हुई हो; शिश्नदेवा: अर्थात लिंगोपासक कहा गया है। इनमें गर्धर्व विवाह का प्रचलन था तथा बलात् विवाह करने की वृत्ति को भी बाद में राक्षस विवाह नामांकरण से जाना गया। राक्षसों के भी तीन विभेद बताये गये हैं - विराध (असुर), दनु (दानव) तथा रक्ष (राक्षस)। ये तीनों सैद्धांतिक रूप से एक साथ रावण की सत्ता में प्रतीत होती हैं किंतु रावण के घायल होने पर विराध (असुर) शाखा का प्रसन्नता व्यक्त करना (वाल्मीकी रामायण 6.59.115-6) यह बताता है कि ये आपसी मतभेद के भी शिकार थे। विराध शाखा की उपस्थिति दण्डकारण्य के दक्षिणी अंचल में मानी जाती है। यह भी उल्लेख मिलता है कि रावण नें इन्द्रावती व गोदावरी के मध्य के अनेक दानवों (दनु शाखा) का वध किया था – हंतारं दानवेन्द्राणाम। राक्षसों (रक्ष शाखा) की मूल उपस्थिति को आन्ध्रप्रदेश से माना जा सकता है।

रामायण कालीन बस्तर के जटिल समाजशास्त्र को समझने के लिये उपरोक्त सभी विवरणों को एक साथ देखना होगा। दण्डकारण्य की अपनी ही तरह की संस्कृति थी जिसमें गंगाजमुनी सम्मिश्रण होने लगा तब भी उसनें इन्द्रावती का वेग और गोदावरी की विराटता को मजबूती से थामे रखा। यह दो संस्कृतियों के मध्य का क्षेत्र होने के कारण कई अनेकताओं का समागम स्थल है। यह ज्ञात होता है कि कई जनजातियाँ जैसी अवस्था में रामायण काल में रहती होंगी अब भी उनमें बहुत कुछ नहीं बदला है। यहाँ के समाजशास्त्र नें दक्षिण से उसकी पहचान अलग रखी व उत्तर से भी स्वयं को मिलने नहीं दिया। यहाँ से जुडे केवल आर्य-द्रविड युद्ध के ही प्रसंग नहीं हैं अपितु कई द्रविड प्रजातियों के आपसी संघर्ष का भी यह क्षेत्र रहा है जहाँ समय समय पर शक्तिशाली आर्य व रक्ष प्रजातियों ने कभी मैत्री तो कभी युद्ध द्वारा अपनी शक्ति व सत्ता के केन्द्र स्थापित किये। यह अनोखा स्थल है जहाँ आश्रम संस्कृति भी पूरे चरम पर थी तो उसका विरोध भी पूरी निर्ममता से होता रहा। मेरा मानना है कि प्राचीन ग्रंथों से मिल रहे सूत्रों को जब तक इतिहासकार बारीकी से नहीं पकडेंगे वे बस्तर के अतीत की न्यायपूर्ण व्याख्या नहीं कर सकेंगे। वर्तमान में दण्डकारण्य क्षेत्र पुन: युद्धभूमि बना हुआ है तथा आन्ध्र ओडिशा महाराष्ट्र से भीतर घुस कर खास विचारधारा के बुद्धिजीवियों नें इसे अपना उपनिवेश बना लिया है। युद्धरत दिखने वाले लोग बस्तर की वही जनजातियाँ हैं जिनमें से प्रत्येक अपनी पुरातन परम्पराओं की थाती सम्भाले अतीत का जीवत प्रमाण है। दुर्भाग्य!! बस्तर से यह विरासत मिट जायेगी। 
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[आलेख के साथ प्रस्तुत चित्र राकेश सिंह @[100002401140969:2048:Rakesh R. Singh] के कैमरे से]
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बस्तर पर जानकारी एकत्रीकरण के लिये आर्य-द्रविड अंतर्सम्बन्धों को बारीकी से समझना आवश्यक है। वस्तुत: हमारे पूर्वाग्रह गहरे हैं तथा हम अपनी-अपनी पहचान की मानसिकताओं के साथ इतने अधकचरे तरीके से जुडे हुए हैं कि यह मानते ही नहीं कि वह सब कुछ जो भारत भूमि से जुडा हुआ है, हमारा ही है; आर्य भी हम हैं और द्रविड भी हम। अपनी ही चार पीढी से उपर के पूर्वजों का नाम जानने में दिमाग पर बल लग जाते हैं फिर किस काम का वह छ्द्म गौरव जो हमारी मानसिकताओं को वर्ण और रक्त की श्रेष्ठताओं जैसी अनावश्यक बहसों में उलझाता है। रामधारी सिंह दिनकर की कृति “संस्कृति के चार अध्याय” एक उत्कृष्ट रचना है जो एसी सभी बहसों को अपने तार्कित उत्तर से संतुष्ट करती है। “मूल निवासी कौन?” इस झगडे का निबटारा तो शायद वह पहली कोषिका भी नहीं कर सकती जिसके विभाजन नें ही यह सम्पूर्ण जीवजगत पैदा किया है। जब यह धरती सबकी एक समान रही होगी तब हर रंग, हर रूप तथा हर नस्ल का मानव यहाँ यायावरी करता हुआ एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र भटकता रहा होगा। इस भूमि पर कई घूमंतू मानव प्रजातियों ने कदम रखे; जब द्रविड इस देश में आये यहाँ आग्नेय जाति (अनुमानित मूल स्थान - यूरोप के अग्निकोण) वालों की प्रधानता थी और कुछ नीग्रो जाति (अनुमानित मूल स्थान - अफ्रीका) के लोग भी विद्यमान थे। अत: अनुमान किया जा सकता है कि नीग्रो और आग्नेय लोगों की बहुत सी बातें पहले द्रविड सभ्यता (अनुमानित मूल स्थान पश्चिम एशिया) में आयीं और पीछे द्रविड-आर्य मिलन होने पर आर्य सभ्यता (अनुमानित मूल स्थान मध्य एशिया) में भी। वर्तमान भारत क्षेत्र में रहने वाले प्राचीन निवासियों के मूल स्थानों के लिये मैने इतिहास की कई पुस्तकों में भी झांका लेकिन अधिकांश में पूर्वाग्रह ही अधिक नजर आता है। अत: दिनकर की ही पुस्तक के उद्धरण मुझे उचित जान पडते हैं जो “अंडा पहले आया कि मुर्गी” वाली बहस को अधिक तूल न दे कर समरस्ता के मर्म की बात करते हैं।

प्राचीन बस्तर रामायणकाल में दक्षिणा पथ की बहुतायत गतिविधियों का केन्द्र रहा होगा तथा इस सब का प्रारंभ महर्षि अगस्त्य के विन्ध्य पर्वत पार करने की रोचक कथा के साथ होता है। कथा नें कविता तत्व की मोटी गिलाफ ओढी हुई है। कथा कहती है कि विन्ध्य अपना आकार निरंतर बढा रहा था जिस कारण सूर्य की रोशनी पृथ्वी पर पहुँचनी बन्द हो गई। इससे निजात पाने के लिये महर्षि ने विंध्याचल पर्वत से कहा कि उन्हें तप करने हेतु दक्षिण में जाना है अतः मार्ग दे। विंध्याचल महर्षि के चरणों में झुक गया। अगस्त्य ने कहा कि विन्ध्य उनके वापस आने तक झुका ही रहे तथा वे पर्वत को लाँघकर दक्षिण को चले गये। उसके पश्चात वहीं आश्रम बनाकर तप किया तथा रहने लगे। यह दक्षिण की महत्ता तथा विन्ध्य की दो संस्कृतियों के बीच दीवाल की तरह खडे होने की पुष्टि करती हुई कथा है। प्राचीन आश्रम संस्कृति तथा शिक्षा प्रणालियों का अध्ययन करने पर यह समझ विकसित होती है कि अगस्त्य एक पूरी संस्था की तरह कार्य कर रहे थे तथा वे उत्तर दक्षिण को एक सूत्र में बाँधने की प्रथम ज्ञात कडी हैं। हमनें उनका एक अध्यापक, एक उपदेशक, एक ज्ञानी, एक यायावर, एक दिव्यास्त्र निर्माता तथा योजनाकार का रूप तो जाना है लेकिन उनकी वास्तविक उपलब्धि कम ही लोग जानते हैं कि महर्षि अगस्त्य नें ही तमिल भाषा के आदि व्याकरण “अगस्त्यम” की रचना की है। यह रचना सिद्ध करती है कि अगस्त्य केवल दण्डकारण्य तक ही सीमित नहीं रहे अपितु सुदूर दक्षिण तक उन्होंने यात्रा की व वहाँ का जन जीवन यहाँ तक कि भाषा को भी एक व्यवस्था प्रदान करने का यत्न किया।


दण्डकारण्य के प्राचीन समाजशास्त्र का आज भी महत्व विद्यमान है। दक्षिणापथ का उत्तरी भाग था दण्डकारण्य; यहाँ राक्षस जाति के निवास की जगह उनके आक्रमणों का ही विवरण अधिक मिलता है। प्राचीन विवरणों के आधार पर उन जनजातियों को जिन्हें राक्षस कहा गया है, उनका निवास दक्षिण के बस्तरेतर क्षेत्र अर्थात आन्ध्र व उस से लग कर सुदूर दक्षिण तक प्रतीत होते हैं। यह भी ज्ञात होता है कि लम्बे समय तक क्षेत्र में किसी समाजसेवी की तरह कार्य करते हुए अगस्त्य नें दण्डकारण्य क्षेत्र में निवासरत अनेक जनजातियों के मध्य समन्वय का वातावरण उत्पन्न कर लिया था। महर्षि अगस्त्य का आश्रम क्षेत्र वर्तमान बस्तर के भीतर ही था जो इस दिशा में किये गये श्री सूर्य कुमार वर्मा के 1906 में सरस्वति पत्रिका में प्रकाशित शोध आलेख द्वारा भली प्रकार सिद्ध किया गया है। राम के वनवास से पहले तक अगस्त्य मुनि का आश्रम ही दो संस्कृतियों का समंवय स्थल बन गया था जिसका स्थानीय जनजातियों के सहयोग और योगदान के बिना संचालित होना संभव प्रतीत नहीं होता। राम के वनागमन से पूर्व इस क्षेत्र में निवासरत जनजातियों पर राक्षसों के कुछ हमलों का जिक्र होता है; उदाहरण के लिये लंका को हस्तगत करने के बाद रावण दक्षिण विजय के लिये निकला जिसका कि उल्लेख वाल्मीकी रामायण में मिलता है – युद्धं मे दीयतामिति निर्जिता: स्मेति वा ब्रूत [वह दक्षिण में एक नगर से दूसरे नगर पहुँचता और चुनौती देता कि या तो मुझसे युद्ध करो या पराजय स्वीकार करो]। वानर जनजाति का नेतृत्व कर रहे बालि नें रावण को न केवल युद्ध में पराजित कर दिया अपितु बंदी भी बना लिया। इस प्रसंग का अंत होता है जब रावण-बालि संधि हो जाती है। रावण नें बालि के अलावा मांधाता (बस्तर का वर्तमान मंधोता ग्राम) के जनजातियों के सरदारों से भी समझौते कर लिये और लंका लौटने से पहले दण्डकारण्य क्षेत्र में अपने प्रतिनिधि खर-दूषण के रूप में किसी निगरानी चौकी या सत्ता प्रतीक की तरह छोड दिये थे। उल्लेख मिलता है कि उनके साथ चौदह हजार राक्षसों की एक टुकडी भी थी जिसका कार्य आतंक प्रसारित कर रावण की सत्ता का भय बनाये रखना था। यह कथा आगे बढती है जब राम का वनागमन होता है। पं केदारनाथ ठाकुर अपनी कृति बस्तर भूषण (1908) में उल्लेख करते हैं कि “राम पहले भारद्वाज आश्रम से होते हुए रत्नगिरि में आये। रत्नगिरि से चल कर बस्तर राज्य तथा कांकेर राज्य की पश्चिमी सीमा से होते हुए वे गोदावरी तक आये, वहाँ से गोदावरी के बहाव की ओर कुछ दिन घूमते रहे तत्पश्चात पर्णशाला में आ कर निवास किया। यहीं पर सीता हरण हुआ। रामचन्द्र जी सीता को गोदावरी नदी के पूर्व तथा इशान में ढूंढने लगे। यही पर उनकी शिवरी भीलनी (शबरी) से भेंट हुई। शिवरी नदी (शबरी नदी) के पूर्व तथा जैपुर राज्य में एक पर्वत है जिसे आज रामगिरि के नाम से जाना जाता है उसके चारो ओर असंख्य छोटी बडी पहाडियाँ हैं, इसी समूह में उत्तर की ओर रंफा पहाड है जिसे जैपुर स्टेट के लोग किष्किंधा पहाड़ कहते हैं। इन पहाडों पर वर्तमान समय में रेड्डी लोग वास करते हैं जो स्वयं को वानर का वंशज मानते हैं”।

बहुत अधिक कार्य अब तक इस दिशा में नहीं हुए हैं जो इतिहास प्रदत्त प्रमाणों का बारीकी से विश्लेषण करें। ब्रिटिश शासक ग्रिग्सन नें 1937 ई. में इस काल के प्रमाणों को एकत्र करने व दस्तावेजबद्ध करने के लिये कैप्टन गिब्सन को नियुक्त किया था। कहा जाता है कि गिब्सन नें बहुत सी जानकारियाँ एकत्रित भी कर ली थी। उसी समय द्वितीय विश्व युद्ध छिड गया। गिब्सन सारी एकत्र सामग्री व जानकारी को ले कर इंग्लैंण्ड चले गये व वहीं युद्ध में मारे गये। इसके बाद स्वतंत्र भारत के किसी शासक, नेता या जिलाधीश नें इस तरह का कार्य करने की जहमत नहीं उठायी। अगला प्रामाणिक कार्य उपलब्ध होता है डॉ. हीरालाल शुक्ल का जिनकी किताब “लंका की खोज” एवं “रामायण का पुरातत्व” अद्वितीय दस्तावेज हैं। डॉ. शुक्ल नें बस्तर क्षेत्र में उपस्थित रामायणकालीन जनजातियों की वर्तमान जनजातियों से तुलना व साम्यता को विस्तार से प्रस्तुत करने का यत्न किया है। उनके अनुसार रामायण युगीन वनेचर प्रजातियों में आग्नेय परिवार से सम्बद्ध जनजातियाँ हैं - निषाद, गृद्ध तथा शबर; अगर मध्यवर्ती द्रविड परिवार की बात की जाये तो उससे सम्बद्ध प्रजातियाँ हैं – वानर तथा राक्षस। 

रामायण में चिन्हित आग्नेय परिवार की जनजातियों नें आर्यों से शीघ्र निकटता तथा मैत्री कर ली थी। निषाद प्रजाति का उल्लेख मूल रूप से उत्तरप्रदेश के संदर्भों में प्राप्त होता है। राम को गंगा पार कराना एवं राम-निषाद मैत्री का बडा ही मर्मस्पर्शी वर्णन रामायण में प्राप्त होता है। बस्तर के ‘कुण्डुक’ स्वयं को निषाद वंश का मानते हैं तथा इस जनजाति का विश्वास है कि वे त्रेता युग में राम के साथ ही गंगातट से दण्डक तक आये। यह प्रजाति आज भी नाविक ही है एवं इनकी उपस्थिति चित्रकूट के निकटवर्ती क्षेत्रों में सीमित रह गयी है। रामायण में वर्णित दूसरी प्रजाती है गृद्ध। गोदावरी की पार्श्ववर्ती पर्वतमालाओं पर इनका निवास माना गया है। गिद्ध इन जनजातियों का प्रतीक रहा होगा। इनके प्रमुख नायक सम्पाति तथा जटायु का आर्य जनजातियों से तालमेल प्रतीत होता है। रामायण में पंख कटने के बाद जिस प्रस्त्रवण पर्वत (बैलाडिला) के निकट जटायु के दम तोडने का वर्णन है उस स्थल को आज गीदम के नाम से जाना जा रहा है। जगदलपुर के जाटम ग्राम में अब भी गदबा जनजाति के घर हैं जिनका सम्बन्ध गृद्ध प्रजाति से जोड कर देखा जाता है। बस्तर की गदबा प्रजाति प्रतीक पूजक है तथा गृद्ध आज भी इनके यहाँ “टोटेम” है। जिस प्रकार बस्तर में हल प्रतीक के वाहकों को हलबा कहा गया उसी प्रकार गृद्ध प्रतीक के वाहक गदबा कहलाने लगे। यह प्रजाति आज विलुप्ति पर पहुँच गयी है। लोग कृषक अथवा मजदूर हैं तथा अब इन्हें पहचानना कठिन होता जा रहा है। राम-शबरी मिलन और शबरी के प्रेम से खिलाये गये जूठे बेर एक महान प्रेरक प्रसंग है। इसी कथा नें शबर जनजाति की पहचान को उसकी प्राचीनता से जोडा है। ऐतरेय ब्राम्हण में शबरों को आर्य देश की सीमा पर स्थित बताया गया है अत: यह क्षेत्र निश्चित ही दण्डकारण्य है। साक्ष्यों के आधार पर एवं पुरा-भूगोल पर किये गये विश्लेषण के आधार पर यह सिद्ध हुआ है कि शबरी का आश्रम शबरी तथा गोदावरी नदी के संगम पर स्थित था। डब्ल्यु जी ग्रिफिथ नें मध्य भारत की कोल प्रजाति को शबर माना है (क़ोल ट्राईब्स ऑफ सेंट्रल इंडिया, 1946)। डॉ. हीरालाल शुक्ल भी इन्हें ओडिशा और बस्तर के सीमावर्ती क्षेत्रों में चिन्हित करते हैं। शबर जनजाति के लोग गोंड अथवा खोंड की तुलना में भिन्न होते हैं। इनकी स्त्रियाँ नासिका तथा हनु में गुदना करती हैं एवं कपोलों में भी गहरी रेखायें गुदवाती हैं। कर्ण-आभूषण दर्शनीय होते हैं व कान में चौदह तक छेद कराने का चलन पाया गया है। प्राचीन ग्रंथों के आधार पर शबरों के दो विभेद पाये गये हैं – पर्ण शबर तथ नग्न शबर। नग्न शबर प्रजाति आर्यों के निकट नहीं आ पायी थी व अपनी मूलावस्था में रहने के कारण यह नामांकरण हुआ है। बंडा परजा जनजाति ही नग्न शबर मानी जाती है। 

मध्यवर्ती द्रविड परिवार की वानर तथा राक्षस जातियाँ एक समय में ताकतवर तथा सक्रियतम रही हैं। यह तो पहचान ही लिया गया है कि काकिनाडु (पूर्वी गोदावरी) सहित कोरापुट व कालाहाँडी के आंशिक क्षेत्र किष्किन्धा जनपद के अंतर्गत आते थे। रामायण में किष्किन्धा के निवासियों के लिये वानर पहचान का प्रयोग है। वानरो की जो प्रजातिगत विशेषतायें कही जाती हैं उसके अनुसार वे भावुक, चपल, ताम्रवदना अथवा कनकप्रभ उल्लेखित होने के कारण सोने जैसे वर्ण के होते थे। आज भी खम्माम, बस्तर, कोरापुट तथा कालाहाण्डी की आदिम प्रजातियाँ (इन क्षेत्रों में निवास करने वाली कंध जनजातियों को विद्वानों नें वानर माना है) बालि का स्मरण करती हैं। बस्तर में बालिजात्रा धूमधाम से मनाया जाने वाला पर्व है। कंध प्रजाति का गोत्र चिन्ह वानर है तथा वंशों के नाम सुग्री, जाम्ब तथा हनु आदि मिलते हैं। नृत्य आदि अवसरों पर कंध लोग आज भी पूँछ धारण करते हैं। कन्ध के अन्य पर्यायवाची खोंड, कोडा, कुई तथा कुवि हैं जो इन्हें कोयतुर (गोंड) जनजातियों के निकट सिद्ध करते हैं। प्रकृति की दृष्टि से ये लोग दण्डामि माडिया के भी निकट नजर आते हैं। रामायण में जिसे राक्षस कहा गया है वैदिक साहित्य नें उन्हें दस्यु सम्बोधित किया है। यह जनजाति प्रखर योद्धा रही है तथा इन्होंने आर्यों की आधीनता को अस्वीकार कर सर्वदा युद्ध का मार्गानुसरण किया है। राक्षसों के लिये ऋग्वेद में क्रव्याद: अर्थात कच्चा मांसाहार करने वाले; मृघ्रवाच: अर्थात जिनकी भाषा न समझ आये; अदेवयु: अर्थात देवताओं को न मानने वाले; अनास अर्थात जिनकी नाक छोटी व उठी हुई हो; शिश्नदेवा: अर्थात लिंगोपासक कहा गया है। इनमें गर्धर्व विवाह का प्रचलन था तथा बलात् विवाह करने की वृत्ति को भी बाद में राक्षस विवाह नामांकरण से जाना गया। राक्षसों के भी तीन विभेद बताये गये हैं - विराध (असुर), दनु (दानव) तथा रक्ष (राक्षस)। ये तीनों सैद्धांतिक रूप से एक साथ रावण की सत्ता में प्रतीत होती हैं किंतु रावण के घायल होने पर विराध (असुर) शाखा का प्रसन्नता व्यक्त करना (वाल्मीकी रामायण 6.59.115-6) यह बताता है कि ये आपसी मतभेद के भी शिकार थे। विराध शाखा की उपस्थिति दण्डकारण्य के दक्षिणी अंचल में मानी जाती है। यह भी उल्लेख मिलता है कि रावण नें इन्द्रावती व गोदावरी के मध्य के अनेक दानवों (दनु शाखा) का वध किया था – हंतारं दानवेन्द्राणाम। राक्षसों (रक्ष शाखा) की मूल उपस्थिति को आन्ध्रप्रदेश से माना जा सकता है।

रामायण कालीन बस्तर के जटिल समाजशास्त्र को समझने के लिये उपरोक्त सभी विवरणों को एक साथ देखना होगा। दण्डकारण्य की अपनी ही तरह की संस्कृति थी जिसमें गंगाजमुनी सम्मिश्रण होने लगा तब भी उसनें इन्द्रावती का वेग और गोदावरी की विराटता को मजबूती से थामे रखा। यह दो संस्कृतियों के मध्य का क्षेत्र होने के कारण कई अनेकताओं का समागम स्थल है। यह ज्ञात होता है कि कई जनजातियाँ जैसी अवस्था में रामायण काल में रहती होंगी अब भी उनमें बहुत कुछ नहीं बदला है। यहाँ के समाजशास्त्र नें दक्षिण से उसकी पहचान अलग रखी व उत्तर से भी स्वयं को मिलने नहीं दिया। यहाँ से जुडे केवल आर्य-द्रविड युद्ध के ही प्रसंग नहीं हैं अपितु कई द्रविड प्रजातियों के आपसी संघर्ष का भी यह क्षेत्र रहा है जहाँ समय समय पर शक्तिशाली आर्य व रक्ष प्रजातियों ने कभी मैत्री तो कभी युद्ध द्वारा अपनी शक्ति व सत्ता के केन्द्र स्थापित किये। यह अनोखा स्थल है जहाँ आश्रम संस्कृति भी पूरे चरम पर थी तो उसका विरोध भी पूरी निर्ममता से होता रहा। मेरा मानना है कि प्राचीन ग्रंथों से मिल रहे सूत्रों को जब तक इतिहासकार बारीकी से नहीं पकडेंगे वे बस्तर के अतीत की न्यायपूर्ण व्याख्या नहीं कर सकेंगे। वर्तमान में दण्डकारण्य क्षेत्र पुन: युद्धभूमि बना हुआ है तथा आन्ध्र ओडिशा महाराष्ट्र से भीतर घुस कर खास विचारधारा के बुद्धिजीवियों नें इसे अपना उपनिवेश बना लिया है। युद्धरत दिखने वाले लोग बस्तर की वही जनजातियाँ हैं जिनमें से प्रत्येक अपनी पुरातन परम्पराओं की थाती सम्भाले अतीत का जीवत प्रमाण है। दुर्भाग्य!! बस्तर से यह विरासत मिट जायेगी। 
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[आलेख के साथ प्रस्तुत चित्र राकेश सिंह Rakesh R. Singh के कैमरे से]

ateet salila: sanjiv

अतीत-सलिला:
संजीव
*
(श्री राजीव रंजन लिखित आलेख के सन्दर्भ में टिप्पणी)
श्री राम-श्री कृष्ण अथवा अन्य विषयों संबंधी चर्चा करते समय उस काल खंड की भौगोलिक परिस्थितियों को अवश्य ही ध्यान में रखा जाना चाहिए।
वाल्मीकि, अगस्त्य, परशुराम, अगस्त्य, शरभंग, सुतीक्ष्ण, रावण आदि राम से वरिष्ठ थे.
अगस्त्य धार्मिक संत अथवा सामाजिक सुधारक मात्र नहीं थे, वे शेष्ठ परमाणु वैज्ञानिक और दुर्घर्ष योद्धा भी थे. उत्तर-दक्षिण संपर्क में बाधक विंध्याचल की ऊँचाई कम कर उसमें से रास्ता बनाने के लिए जितनी शक्ति चाहिए थी वह उस अल्प समय में परमाणु विस्फोट के अलावा और किस माध्यम से प्राप्त हो सकती थी? परमाणु अस्त्रों को उनके प्रभाव के अनुसार ब्रम्हास्त्र, पर्जन्यास्त्र, वायवास्त्र, आग्नेयास्त्र आदि नाम दिए गए थे तथा इनका उपयोग सामान्य युद्धादि में वर्जित था, निर्माण विधि गोपनीय थी, शस्त्र संग्रह ऋषियों के आश्रम में होता था जिनसे संकट के समय नरेश प्राप्त कर युद्ध जीत कर पुनः ऋषियों को लौटाते थे. इसीलिए राक्षस आश्रमों पर आक्रमण करते थे की शस्त्र पा या नष्ट कर सकें। 
अगस्त्य के पूर्व शंकर द्वारा अमरकंटक की झील से मीठे जल की धार समुद्र तक प्रवाहित करने तथा त्रिपुर को नष्ट करने में परमाणु अस्त्रों का उपयोग किया जा चुका था. भागीरथ मानसरोवर से गंगा को प्रवाहित करने के लिए शिव से ही अस्त्र और सञ्चालन विधि सीखी।
राम के काल में टैथीज महासागर भर चुका था, जगह-जगह पर पथरीली-नमकीन पानी के पर्व युक्त जमीन थी जिस पर खेती संभव नहीं थी,  हल से जोता न जा सकने के कारण 'अहल्या' कहा गया, जबकि जिस जमीन को जोटा जा सका वह 'हल्या' कही गयी, अहल्या उद्धार बंजर अभिशप्त जमीन को कृषि योग्य बनाने का महान उपक्रम था जो राजकुमार राम के मार्ग दर्शन में राजकीय संसाधनों से पूर्ण किया गया होगा।
वर्तमान छतीसगढ़, उड़ीसा, झारखण्ड,बिहार नर्मदा घाटी आदि मिलकर कौसल राज्य था जिसके नरेश महाराजा कौसल तथा एकमात्र संतान राजकुमारी कौशल्या थीं. अयोध्या एक छोटा सा राज्य था जिसके नरेश दशरथ प्रतापी योद्धा थे. अमरकंटक तथा समूचे कौसल में वानरों, ऋक्षों, उलूकों, गृद्धों आदि जनजातियों का निवास था. दशरथ ने राज्य के लोभ में कौसल्या से विवाह तो किया किन्तु रूपसी न होने के कारण प्रेम नहीं कर सके। कश्मीर की रूपवती राजकुमारी कैकयी तथा सुमित्रा से विवाह के बाद कौसल्या उपेक्षित ही रहीं।
निर्वासन के बाद राम अपनी ननिहाल ही आये. इसके पूर्व राम-सीता-लक्षमण ने चित्रकूट में लम्बे प्रवास में ऋषियों के साथ बनी योजनानुसार जबलपुर के समीप नर्मदा के उत्तरी तट पर अगस्त्य आश्रम में अगस्त्य तथा लोपामुद्रा से परमाणु शास्त्र सञ्चालन की विधि तथा शस्त्र ग्रहण किये, अमरकंटक से महाराजा कौसल के विश्वस्त जाम्बवान, बाल मित्र हनुमान आदि के साथ उनके कबीलों का समर्थन लेकर शबरी से भेंट की. चन्द्रणखा (शूर्पणखा), खर-दूषण आदि रक्ष नायकों का वध कर राम दक्षिण की ओर बढ़े.
दिल्ले में वातानुकूलित कक्षों में विराजे अधिकारियों, नेताओं और उनके अनुगामी विद्वानों नव कांग्रेस और भा.ज़.पा. की अनुकूलता के अनुसार रान की वन यात्रा के दो पथों की घोषणा की जिन पर बड़ी धन राशि भी खर्च की गयी. ये दोनों पथ चित्रकूट से मालवा ओंकारेश्वर होकर हैं.
बुंदेलखंड-छतीसगढ़ जहाँ राम का वास्तविक यात्रा पथ है, वह नकारा जा रहा है. वाणासुर जिसने रावण को युद्ध में पराजित किया था को स्थान मंडला (जबलपुर के निकट गोंड राजधानी) को ओंकारेश्वर में बताया जा रहा है.
नर्मदा घाटी का उत्तर तट आर्यों तथा दक्षिण तट अनार्यों की साधना स्थली रहा है. जबकि यह समूची घाटी त्रिपुर के काल से कृष्ण के काल तक नागों, वानरों, ऋक्षों, उलूकों, गृद्धों आदो का मूल स्थान तथा उनकी अपनी सभ्यता का केंद्र रही. विविध संस्कृतियों के संघर्ष का केंद्र होकर परमाणु शस्त्रों के प्रयोगों से यह घटी भीषण वनों और पर्वतों से सम्पन्न तो हुई किन्तु नागरी जीवन शिली से वंचित भी रही.
कालांतर में सत्ता केंद्र गंगा तट पर जाने के बाद रचे गये पुराणों में अमरकंटक-नर्मदा और शिव को लेकर प्रचलित सभी कथाएँ, माहात्म्य आदि कैलाश मानसरोवर गंगा और शिव से जोड़ दी गयीं।
शिव को लेकर रचे गए तीन उपन्यासों मेहुला के मृत्युंजय आदि में मनीष त्रिपाठी ने शिव को कैलाश पर मन है किन्तु शिव के पूर्व रूप महादेव रूद्र का उल्लेख मात्र किया है. ये रूद्र ही अमरकंटक पर थे.
आपको इस कार्य हेतु पुनः बधाई।

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American Dollar v/s Indian Rupee --Sridharan Gopalan

Real story of American Dollar v/s Indian Rupee---

Sridharan Gopalan


Americans understood that Petrol is equally valuable as Gold so they made Agreement with all the Middle East countries to sell petrol in Dollars only. That is why Americans print their Dollar as legal tender for debts. This mean if you don't like their American Dollar and go to their Governor and ask for repayment in form of Gold, as in India they won't give you Gold.

You observe Indian Rupee, " I promise to pay the bearer..." is clearly printed along with the signature of Reserve Bank Governor. This mean, if you don't like Indian Rupee and ask for repayment, Reserve Bank of India will pay you back an equal value of gold.(Actually there may be minor differences in the Transaction dealing rules, but for easy comprehension I am explaining this)

Let us see an example. Indian petroleum minister goes to Middle East country to purchase petrol, the Middle East petrol bunk people will say that litre petrol is one Dollar. But Indians won't have dollars. They have Indian Rupees. So what to do now? So That Indian Minister will ask America to give Dollars. American Federal Reserve will take a white paper , print Dollars on it and give it to the Indian Minister. Like this we get dollars , pay it to petrol bunks and buy petrol.

But there is a fraud here. If you change your mind and want to give back the Dollars to America we can't demand them to pay Gold in return for the Dollars. They will say " Have we promised to return something back to you? Haven't you checked the Dollar ? We clearly printed on the Dollar that it is Debt" So, Americans don't need any Gold with them to print Dollars. They will print Dollars on white papers as they like.

But what will Americans give to the Middle East countries for selling petrol in Dollars only?

रविवार, 25 अगस्त 2013

geet: sanjiv



 चित्र पर गीत :
बाँसुरी मैं.….
संजीव 'सलिल'
*

बाँसुरी मैं ,
मैं तुम्हारी बाँसुरी की धुन.
तुम बजाओ,
लीन होकर मैं रही हूँ सुन…
*
कुछ कहे जग हमें क्या ?
हम तुम हुए जब एक.
एक दूजे का सहारा
तजें ना है टेक.
तुम कमल,
तुम भ्रमर,
तुम घनश्याम,
तुम पावस.
द्वैत तज, अद्वैत वर
मैं-तुम हुए हम गुन…
*
मूक है विधि, तो रहे
संसार सूर समान.
जो सबल उसका करे जग
निबल बनकर गान.
मैं नहीं मैं,
तुम नहीं तुम,
मिल हुए
हमदम. 
दूरियाँ वर निकटता का
स्वप्न सकते बुन…
*
मुझमें तुम हो,
तुम हो मुझमें.
तुम ह्रदय में,
तुम नयन में.
दीप्ति तुम,
तुम दीप.
तुम मुक्ता,
तुम्हीं हो सीप.
सलिल सलिला किसने
किसको कब लिया है चुन…
*

joke; 99 Rupees

 99 Rupees 

In Lok Sabha, a Congress MP during his speech told a story.....

"There was a father who gave 100 rupees to each of his 3 sons and asked them to buy things and fill up a room completely.

First son bought hay for Rs. 100 but couldn't fill the room entirely.

Second son bought cotton for Rs. 100 but couldn't fill the room entirely.

Third son bought a candle for Rs. 1 and lit it up and the room was filled with light completely."

The MP added "Our Prime Minister is like the third son. From the day he has taken charge of his office, our country is filled with the bright light of prosperity"

A voice from the backbench asked "Where are the remaining Rs. 99??"
:))))

chitr-chitr sandesh

Photo: :D..kya bolte ho bhiyaaaa.. sahi kaha naPhoto: =D

admin~ taku

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Photo: Kya khte ho Aap....?

AmiT
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muktak: sanjiv

मुक्तक सलिला :
संजीव 
*
श्री प्रकाश की दीप्ति तिमिर का अंत करेगी सत्य यही
अहम् न चिर स्थाई होता, कहती धरती महामही
हो सचेत कर रही गगन भू समुद गगन को एक सतत
बहती सलिल धार रह निर्मल, कही कुसुम ने कथा यही 
*
क्या होगा बदलाव, नाग जायें आयेंगे साँप
सोच-सोच कर सलिल-कलेजा बेबस जाता काँप
दल का तंत्र समाप्त बन सके राष्ट्रीय सरकार-
शायद तब ही लोकतंत्र की हो पाए जयकार 
*
करे असत की नित्य वकालत झूठ घोर अन्याय
चोरी-सीनाजोरी हर दिन लिखे नया अध्याय 
पहले मारे सैनिक फिर पारित निंदा प्रस्ताव-
पाकिस्तान बना रावण-दुर्योधन का पर्याय 
*
शिष्टाचार भूलकर करते अन्यों को आरोपित
संसद से सद्भाव-सत्य भी होते 'सलिल' विलोपित 
सेवा का ले नाम, पा रहे मेवा हँस अपराधी- 
अशालीन हो मूर्ख करें शालीनों को संबोधित 
*
हाय सियासत! किया देश का तूने बन्टाढार 
येन-केन हर कोई चाहता बना सके सरकार 
एक अंगुली औरों पर तीन तुझी पर उठतीं, देख-
सोच न क्या तुझको सुधार की है तत्क्षण दरकार 
*
अशालीन आक्रोश न घर खुद का रख सके सुरक्षित 
वही जिए जो सत-संयम पर खुद को करे परीक्षित 
'सलिल' शब्द है ब्रम्ह, पूजिए तब जब सच पहिचानें-
दम्भ विद्वता का कर दम्भी होता सदा उपेक्षित 
*
ऐसी जीत न देना ईश्वर, जिसमें सच की हार 
सत्य-विजय हित, हार करे नर-नाहर हँस स्वीकार 
कथ्य भाव रस बिम्ब छंद को आत्मार्पित कर धन्य-
'सलिल' हो सके, दैव! सदय मन-मन्दिर दे उजियार 
*
हे अनाम! मैं अंश तुम्हारा, जग देता है नाम 
सुख-संतोष न पाने देता, कहता है कर काम 
कोरी चादर पर डाले है पल-पल अनगिन रंग-
ज्यों की त्यों रख सका न तू ,कह यही करे बदनाम 
*


राजभाषा अधिनियम का उल्लंघन

राजभाषा अधिनियम का उल्लंघन

श्री एम एल शर्मा सूचना आयुक्त केन्द्रीय सूचना आयोग नई दिल्ली , द्वारा राजभाषा अधिनियम का उल्लंघन
 श्रीमान निदेशक ( शिकायत), राजभाषा विभाग , नई दिल्ली  
महोदय,
श्री   एम एल शर्मा सूचना आयुक्त केन्द्रीय सूचना आयोग  नई  दिल्ली , द्वारा राजभाषा अधिनियम का उल्लंघन 
                  उक्त प्रसंग में निवेदन है कि मैंने राजभाषा अधिनयम की भावना के अनुरूप विश्विद्यालय अनुदान आयोग से अपेक्षा की थी की वेबसाइट की सम्पूर्ण सूचना सामग्री का हिंदी अनुवाद जारी किया जाए और इसकी अनुपालना नहीं करने पर केन्द्रीय सूचना आयोग से इस आशय के आदेश हेतु निवेदन किया था| 4. यह है कि माननीय राष्ट्रपतिजी के आदेश को प्रसारित करते हुए राजभाषा विभाग के (राजपत्र में प्रकाशित) पत्रांक I/20012/07/2005-रा.भा.(नीति-1) दिनांक 02.07.2008 में संसदीय राजभाषा समिति की संस्तुति संख्या 44 में कहा गया है, “जब भी कोई मंत्रालय/विभाग या उसका कोई कार्यालय या उपक्रम अपनी वेबसाइट तैयार करे तो वह अनिवार्य रूप से द्विभाषी तैयार किया जाए| जिस कार्यालय का वेबसाइट केवल अंग्रेजी में है उसे द्विभाषी बनाए जाने की कार्यवाही की जाए|”  

 राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र द्वारा जनवरी 2009 में जारी भारत सरकार की वेबसाइटों के लिए दिशा निर्देशके अध्याय 5 पैरा 5.7 के अनुसार “At present, majority of  the content in Government websites is in English, except few which have content in  Hindi or one of the Regional Languages. Thus though Government websites are accessible, they are still not usable. Hence, there is a need to put the information in Regional Languages.” गत जनगणना समंकों के अनुसार देश में हिंदी भाषी लोग 43% हैं जबकि अंग्रेजी भाषी लोग मात्र 0.021% हैं अतेव सूचना तक आम नागरिक की वास्तविक पहुँच व  पारदर्शिता के लिए धारा 4(4) के अनुसरण में इन्टरनेट पर हिंदी भाषा में प्रसारण समीचीन है| यहाँ यह निवेदन करना भी प्रासंगिक होगा कि भारत में इन्टरनेट पर उपलब्ध अधिकाँश जानकारी स्थानीय अथवा हिंदी भाषा में नहीं होने के कारण इन्टरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या मात्र 8% है वहीँ अमेरिका में यह 80 %  है| जनता द्वारा समझे जाने  योग्य भाषा में सूचना प्रदानगी के बिना अनुच्छेद  19 में गारंटीकृत जानने का अधिकारअर्थहीन है|

उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग के मामले में निर्णय (27.03.2010) में कहा है,  “An information must be given to a citizen in the language, which he understands. It is the legislative mandate that “information” must be disseminated considering, inter alia, the “local language” of the area. Similar is the mandate of the Constitution of India which is given under Article 350 read with Article 345 of the Constitution of India.”

किन्तु उक्त अधिकारी ने, संघ सरकार की सेवा में होते हुए, प्रकरण संख्या CIC/RM/A/2012/000217/LS में दिनांक 31.05.2013 को राजभाषा अधिनयम की भावना के  विपरीत निर्णय  देते हुए अपने निर्णय में कहा है , He may also consider putting some of this material in Hindi on UGC website (not the entire material).   अत: आपसे निवेदन है कि उक्त अधिकारी को समुचित निर्देश जारी करें|

सादर  -
भवनिष्ठ                                                      संलग्न:1 
 मनीराम शर्मा                                      दिनांक : 07.07.13
नकुल निवास , रोडवेज डिपो के पीछे, सरदारशहर -331403 , जिला चुरू ( राज)
ईमेल  maniramsharma@gmail.com

CENTRAL INFORMATION COMMISSION
Room No. 308, B-Wing, August Kranti Bhawan, Bhikaji Cama Place, New Delhi-110066
File No.CIC/RM/A/2012/000217/LS

Appellant Shri Mani Ram Sharma
Public Authority University Grants Commission.
Dates of hearing 31.05.2013
Date of decision 31.05.2013

Facts :-
Heard today dated 31.05.2013. Appellant not present. The UGC is represented by
Shri R.C. Kandera, Deputy Secretary; Ms. Diksha Rajput, Publication Officer; Ms. Sarita
Makhija, Under Secretary and Ms. Ursula Minz, SO.

2. It is noticed that in the RTI application dated 5.1.2012, the appellant had raised an
important issue regarding implementation of section 4(1)(b) of the RTI Act. As per this
provision, every Public Authority is mandated to publish the following information either in
manual form or in electronic form :-

“(i) the particulars of its organisation, functions and duties;
(ii) the powers and duties of its officers and employees;
(iii) the procedure followed in the decision making process, including channels of
supervision and accountability;
(iv) the norms set by it for the discharge of its functions;
(v) the rules, regulations, instructions, manuals and records, held by it or under its
control or used by its employees for discharging its functions;
(vi) a statement of the categories of documents that are held by it or under its control;
(vii) the particulars of any arrangement that exists for consultation with, or
representation by, the members of the public in relation to the formulation of its policy or implementation thereof;
(viii) a statement of the boards, councils, committees and other bodies consisting of
two or more persons constituted as its part or for the purpose of its advice, and as to whether meetings of those boards, councils, committees and other bodies are open to the public, or the minutes of such meetings are accessible for public;
(ix) a directory of its officers and employees;
(x) the monthly remuneration received by each of its officers and employees, including the system of compensation as provided in its regulations;
(xi) the budget allocated to each of its agency, indicating the particulars of all plans, proposed expenditures and reports on disbursements made;
(xii) the manner of execution of subsidy programmes, including the amounts allocated and the details of beneficiaries of such programmes;
(xiii) particulars of recipients of concessions, permits or authorisations granted by it;
(xiv) details in respect of the information, available to or held by it, reduced in an
electronic form;
(xv) the particulars of facilities available to citizens for obtaining information, including the working hours of a library or reading room, if maintained for public use;
(xvi) the names, designations and other particulars of the Public Information Officers;
(xvii) such other information as may be prescribed and thereafter update these publications every year;”


3. I am informed that voluntary disclosure on some of the topics has already been made
but it is my impression that a lot more needs to be done. In view of the above, Dr. Akhilesh
Gupta, Secretary, UGC, is hereby desired to look into the matter personally and have the
provisions of section 4(1)(b) implemented to the extent practicable in next 03 months time.
He may also consider putting some of this material in Hindi on UGC website (not the entire
material) for the benefit of Hindi speaking people.

4. The matter is being disposed of accordingly.

Sd/-
( M.L. Sharma )
Information Commissioner

Authenticated true copy. Additional copies of orders shall be supplied against  application and payment of the charges, prescribed under the Act, to the CPIO of this Commission.
( K.L. Das )
Deputy Registrar

Address of parties :-
1. The CPIO, University Grants Commission,
Bahadur Shah Zafar Marg, New Delhi-110002.
2. Shri Mani Ram Sharma, Advocate,
Nakul Niwas, Behind Roadways Depot,
Churu, Sardarshahar-313403.
------------------

 I am in complete agreement with Sshriharsha Sharma. I have been writing letters to almost all Hindi news channel about excessive use of Urdu and of those words which are unwanted/unwarranted. I had given them examples of the words used on news channel in Urdu and their Hindi synonyms words. I see a huge conspiracy in polluting our Hindi. To give a few examples of the words often used on news channel are as under;

Saksh =  Vyakti  (person)
Tafdeesh = Chaanbeen (investigation)
Salaam = Pranam
Shukriya = Dhanyawad
Dua = Ashirwad

These are only few examples of the Urdu words most often used on our Hindi news channel. There has been no improvement and in the past six months or so a new trend is seen emerging that of using English words. Nesreaders/reporters who can neither speak English or Hindi are using Hinglish as the mode of communication and I see a grave danger in destroying our great language. 200 languages have been decimated in the past 20 yrs and Hindi will remain in the text books if we all don't rise to the occasion like China.  

China banned by a legislation use of Chinglish which is mixture of Chinese and English languages as Hinglish is mixture of Hindi and English. We have to everyting possible to save our national language which print and electronic media is out to destroy completely. You will be shocked to note that there are many Hindi newspapers in North India who have become 80% Hinglish. The words printed are in Hindi but written in English such as salary instead of Vetan etc. !

Subhash Jha, Mumbai

Shriharsha Sharma <drshsharma@gmail.com> wrote:

This is well known that Urdu played a significant role to motivate,  incite, excite for the division /partition and in braking up of India  in 1947.

Kindly do your own research  on this because I read many articles when  I was in college during 1971 war with Pakistan Which led to the  formation of Bangladesh.

East Pakistan could not tolerate Urdu being imposed on Bengali  Muslims and in this context the articles appeared and urdu was  also  responsible for the problem to greater or lesser extent.  Urdu  was  divisive for  united Hindusthan and even now Urdu news papers support terrorists and Pakistan which is against India but  Government of India due to policy of appeasement of Muslims does not  take any strong action which is unfortunate.

  I do not think you are acting wisely in advocating in favour of Urdu.

  I have read your article no. 1. but I am not convinced .   A WISE MAN NEVER PUTS HIS HAND TWUCE IN A SNAKE HOLE.

Urduwalas do not accept your argument and  so do not waste your breath  to convince  Urduwalas they would put dagger in the heart of Hindi.  Learn lessons from the past mistakes [own and peers].  I hope you would act in promotion, progress and development of Hindi and pure Hindi that will be the best service to Hindi.

Great  work is needed to have an encyclopaedia of Hindi  .

Jaya Hindi and Hindusthan

Sent: Friday, August 16, 2013 5:13 AM
Subject: An inapt title

Sir,


This refers to the ICCR's advertisement, " Jashn-e-Azaadi" published in The Telegraph of 13.08.2013.

  The text of this advertisement reads," Rabindranath Tagore Centre, ICCR, Kolkata presents in its Horizon Series, JASHN-E-AZAADI a musical tribute to India through a Hindustani Classical Vocal Recital by Kumar Mukherjee and his disciples on 16th August at the Satyajit Ray Auditorium, RTC, ICCR.

I take strong exception to this title which could have been " Swadinata Utsav". This glaringly shows UPA government's preference for Urdu and negligence of Hindi/Bengali.

Submitted for publication,
Yours truly,
SC Panda, 1/2 HIG BDA Colony, CSpur, Bhubaneswar 751016 Ph: 0674-2303555

THE CONSTITUTION OF INDIA
 
348. (1) Notwithstanding anything in the foregoing
provisions of this Part, until Parliament by law otherwise
provides—

(a) all proceedings in the Supreme Court and in every High Court, Official language or languages of a State. Official language for communication between one State and another or between a State and the Union. Language to be used in the Supreme Court and in the High Courts and for Acts, Bills, etc.
 
Special provision relating to language spoken by a section of the population of a State.  

(Part XVII.—Official Language.—Arts. 344—348.)
214

(b) the authoritative texts—
(i) of all Bills to be introduced or amendments thereto to be moved in either House of Parliament or in the House or either House of the Legislature of a State,
(ii) of all Acts passed by Parliament or the Legislature of a State and of all Ordinances promulgated by the President or the Governor 1*** of a State, and
(iii) of all orders, rules, regulations and bye-laws issued under this Constitution or under any law made by Parliament or the Legislature of a State, shall be in the English language.

निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल 
बिनु  निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिय को शूल । 
                                          भारतेन्दु हरिश्चंद्र 
              वर्तमान समय में इसका मर्म समझने और श्याम रुद्र पाठक का साथ देने की जरूरत है । प्रणाम है ऐसी शख्शियत (Vyakti) को । 

Many media people are trying to make proper Hindi words vanish or LUPT. Proper Hindi words are available still Hindi media people prefer to use Urdu or English words in Hindi. Some Examples are:

Wrong Word          Proper Hindi Word                                  Wrong Word          Proper Hindi Word
Mumkin                 Sambhav                                                Rubroo             Sammukh
Raishumaari          Jan Ganna                                             Nafrat            –    Grina
Kareeb                   Nikat                                                     Tabdili            –    Parivartan
Fisadi                      Partishat                                                Izaafa               Vridhi
Saksh                     Vyakti                                                     Maksad           Uddeshyaa
Muhaiyaa               Uplabdh                                                 Maddenazar  –    Dhristi
Janoon                    Nashaa                                                  Nizaat               Chutkaraa
Tarikaa              -       Dhang                                                    Surkhi               Sheershak
Nazaraa                  Drishyaa                                                Tabazzo             Dhayan
Jayaz                       Uchit                                                      Kabool          -      Swaikaar
Mukalfat                 Virodh                                                    Ilam                  Gyan
Kasam                     Saugand                                                Tassalibaksh     Santoshjanak
Majbbot                  Vivash                                                   Aagaaz             -    Aarambh 
Mutabla             -                                                                      Khair Makdam
Murabbat

There are several thousand Urdu words which are used in Hindi. Sad thing is that many saints and priests who are supposed to know proper Hindi use such Urdu words along with English words in Hindi. People who know proper Hindi should Telephone or send message by any means to media people that they should use proper Hindi words in Hindi.
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गीत:
किरण कब होती अकेली…
*
किरण कब होती अकेली?, नित उजाला बांटती है
जानती है सूर्य उगता और ढलता, उग सके फिर
सांध्य-बेला में न जगती भ्रमित होए तिमिर से घिर
चन्द्रमा की कलाई पर, मौन राखी बांधती है
चांदनी भेंटे नवेली
किरण कब होती अकेली…
*
मेघ आच्छादित गगन को देख रोता जब विवश मन
दीप को आ बाल देती, झोपड़ी भी झूम पाए
भाई की जब याद आती, सलिल से प्रक्षाल जाए
साश्रु नयनों को, करे पुनि निज दुखों का आचमन
वेदना हो प्रिय सहेली
किरण कब होती अकेली…
*
पञ्च तत्वों में समाये, पञ्च तत्वों को सुमिरती
तीन कालों तक प्रकाशित तीन लोकों को निहारे
भाईचारा ही सहारा, अधर शाश्वत सच पुकारे
गुमा जो आकार हो साकार, नभ को चुप निरखती
बुझती अनबुझ पहेली
किरण कब होती अकेली…
*
Sanjiv verma 'Salil'
salil.sanjiv@gmail.com
http://divyanarmada.blogspot.in
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