वास्तु विज्ञान की प्रासंगिकता- इं. संजीव वर्मा 'सलिल'* वास्तु विज्ञान मनुष्य द्वारा प्रकृति के साथ समन्वय स्थापित कर किए गए निर्माण का विज्ञान है। वास्तु विज्ञान किसी निर्माण को निर्जीव इमारत मात्र न मानकर उसे जीवंत संरचना मानता है। निर्माण को 'वास्तु पुरुष' की संज्ञा देकर उसका रूपांकन और इस तरह तरह किया जाता है जैसे वह कोई जीवित व्यक्ति हो और उसमें वे सब तत्व यथास्थान हों जिनसे जीवित व्यक्ति सुविधा अनुभव करता है। वास्तु में मनुष्य, प्रकृति, ब्रह्माण्ड और ब्रह्म का समन्वय सन्निहित होता है। वास्तु शब्द अपने आप में एक विराट दर्शन को समेटे है, न केवल स्थूल स्तर पर, अपितु सूक्ष्म चेतना तक। वास्तु शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत की धातु 'वस' से हुई है। इसका अर्थ है वास करना, बसना, रहना, आदि। वस धातु 'वसति' (मैं रहता हूँ), 'वसुमति' (वास योग्य पृथ्वी), 'वास' (इमार), 'निवास' (मकान), 'प्रवास' (घर से दूर रहना), 'निवासी' (रहने वाला), 'आदिवासी' (मूल निवासी)। अंनिवासी' (न रहने वाला) आदि शब्दों की जननी है। वस्तुत: वास्तु' इस समूचे भाव-जगत का मूर्त रूप एक ऐसा स्थान जहाँ केवल देह नहीं, आत्मा भी वास करती है।
वास्तु विज्ञान और पंच तत्व
अनिल अनल भू नभ सलिल, पंच तत्व मय सृष्टि। रखे समन्वय-संतुलन, वास्तु ज्ञान की दृष्टि।।
वास्तु अर्थात निर्माण पाँच तत्वों अग्नि, वायु, धरती, आकाश और जल से होता है। इन तत्वों के गुण-धर्म का ध्यान रखकर उनका उपयोग इस प्रकार किया जाता है कि वास्तु के उपयोगकर्ता पर उनका शुभ प्रभाव हो किंतु अशुभ प्रभाव न हो। अग्नि तत्व ताप व ऊर्जा देता है। ब्रह्मांड में ऊर्जा का अखंड स्तोत्र सूर्य है। वास्तु में ऊर्जा के प्रवेश हेतु सूर्य की ओर द्वार। वातायन एवं गवाक्ष रखे जाना वास्तु विज्ञान शुभ मानता है तो आधुनिक विज्ञान सूर्य प्रकाश को रोगाणु नाशक बता कर निर्माण में इसे आवश्यक बताता है। वायु जीवन दाई है। हम श्वास में वायु का सेवन करते हैं। वास्तु विज्ञान और सिविल इंजीनियरिंग दोनों घर के आस पास वृक्ष लगाए जाने को आवश्यक मानते हैं ताकि निवासियों को पर्याप्त प्राण वायु मिले और वे स्वस्थ्य रहें। गर्म-सर्द मौसम में वृक्ष तापमान पर नियंत्रण रखते हैं। धरती पर वास्तु का निर्माण होता है। वास्तु विज्ञान और स्थापत्य अभियांत्रिकी दोनों धरती अर्थात मिट्टी की गुणवत्ता और मजबूती को महत्व देते हैं। सॉइल मेकेनिक्स के परीक्षण मिट्टी के तत्व और गुण को यंत्र से परखते हैं, वास्तु निरीक्षण से। आकाश तत्व को वास्तु आध्यात्मिक दृष्टि से देखता है, वास्तु की ऊँचाई आकाश तत्व का निर्धारण करती है। निवास की तुलना में देवालय अधिक ऊँचा होता है। अंतिम तत्व पानी का जीवन और स्वास्थ्य दोनों के साथ अभिन्न संबंध है।
वास्तु और दिशा
दिशा-दशा के मध्य है, जो संबंध विचार। वास्तु ज्ञान कहता रखें, सदा उचित आचार।। कोई भी निर्माण 4 दिशाओं पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण एवं 4 उप दिशाओं ईशान, आग्नेय, नैऋत्य, वायव्य के बीच होता है। वास्तु विज्ञान दिशाओं को बहुत महत्व देता है और उनके प्रभाव के अनुसार वास्तु निर्माण को अनुशंसित करता है। तदनुसार पूर्व और पूर्वोत्तर (ईशान) दिशा में उपासना कक्ष अथवा ऐश्वर्य वर्धक सामान, कोष आदि रखे जा सकते हैं। यह दिशा सूर्योदय की जीवन वर्धक रश्मियों के कारण सकारात्मक ऊर्जा प्रवाह की कारक है। दक्षिण पश्चिम दिशा में अग्नि तत्व का प्राधान्य होने के करण यहाँ जीवन-मृत्यु का संगम है। इस दिशा में पाकशाला, पावर हाउस, बिजली का मीटर आदि होना चाहिए। दक्षिण दिशा यम अथवा मृत्यु की दिशा है। यहाँ शयन कक्ष का न हो। दक्षिण-पूर्व दिशाएँ में अशुभ तत्व के दमन हेतु भारी सामान या जीना हो सकता है। पश्चिम दिशा शुभ व समृद्धि दायक है। पश्चिमी उत्तर दिशा (वायव्य) में चंचलता/अस्थिरता होगी। इसलिए इस दिशा में अविवाहित पुत्री का कक्ष, शोरूम, अतिथि कक्ष आदि बनाएँ। उत्तर दिशा में सुख प्राप्ति का स्थान है। यहाँ गृह स्वामी का कक्षा हो सकता है। भूखंड के केंद्र ब्रह्म स्थान पर कोई निर्माण न किया जाए।
सिविल इंजीनियर की दृष्टि से बात करें तो पूर्व पूर्वोत्तर दिशाएँ सूर्य प्रकाश को घर में प्रवेश देती है जिससे स्वास्थ्यवर्धक वातावरण का निर्माण होता है, सूर्य की किरणों से रोगाणु नाश होता है। पृथ्वी एक चुंबक की तरह व्यवहार करती है उत्तर दिशा उत्तर ध्रुव की तरह उत्तर और दक्षिण दिशा दक्षिण ध्रुव की तरह व्यवहार करती है। सोते समय अगर हमारा सर जो उत्तर दिशा का प्रतीक है दक्षिण की दिशा में हो तो नींद गहरी आती है, स्वास्थ्यवर्धक होती है। इसके विपरीत दिशा में विपरीत प्रभाव देखे गए हैं। स्पष्ट है कि वास्तु विज्ञान प्रकृति और मनुष्य के बीच समन्वय सामंजस्य और साहचर्य पर आधारित है जबकि आधुनिक सिविल इंजीनियरिंग भौतिक पदार्थों के गुण दोष पर आधारित है।
वेद में वास्तु
वास्तु विज्ञान का जन्म वेदपूर्व काल में हुआ और उसका विकास वैदिक युग में अपने चरम पर पहुँचा। ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद में हमें जिन स्थापत्य अवधारणाओं के दर्शन होते हैं, वे आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर भी पूर्णतः खरे उतरते हैं। ऋग्वेद (2.41.5) में मित्र और वरुण के भव्य राजप्रासाद का उल्लेख है। मंत्र 5.62.6 में “सहस्त्रस्थूणम्” अर्थात वरुण के विशाल महल का संकेत है। ऋग्वेद 8.47.5 में 'त्रिधातु' और 'त्रिभूमिक' भवनों का यानि तीन मंजिलों वाले भवन का वर्णन है। “त्रिधातु यद् वरुथ्यम्” में तीन भौतिक तत्वों से बना भवन वर्णित है। यह लौह, पाषाण और काष्ठ के मिश्रित उपयोग का संकेत है। ऋग्वेद 4.30.20 में 'पत्थर के नगर' का वर्णन है। 2.20.8 में लौह दुर्ग सौंदर्य के साथ सुरक्षा वास्तु का एक मुख्य उद्देश्य रहा। भवन की विशेषता ‘भद्र’ (सुखद) और ‘अनातुरम्’ (रोग रहित) बताई गई है एक ऐसा निर्माण जो शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य को बढ़ावा दे।
आधुनिक भवन निर्माण कला के तत्व बायोफिलिक डिज़ाइन, हरित भवन, प्राकृतिक प्रकाश- वेंटिलेशन, एयर-कंडीशनिंग, इंटीरियर थर्मल कंडीशनिंग, ह्यूमन साइकोलॉजी आदि वैदिक वास्तु विज्ञान में सन्निहित रहे हैं, यजुर्वेद 17.5 और 17.7 में उसका बीज रूप मिलता है।
अथर्ववेद 9.3.1 में ब्रह्मा को भवन का मानचित्र बनानेवाला अभियंता कहा गया है। उस युग में वास्तुविद का दर्जा देवतुल्य था। 9.3.19 में भवन को नापकर बनाने की बात कही गई है। यह आधुनिक सर्वेक्षण अभियांत्रिकी का मूल है। 9.3.6 में मकान ऊँचाई (कुर्सी-प्लिंथ) पर बनाने का सूत्र है ताकि आर्द्रता से सुरक्षा हो। 9.3.21 में दो से दस कमरों की योजना यह स्पष्ट करती है कि परिवारिक आवश्यकता के अनुसार घर की योजना बनाई जाती थी। 9.3.8 में बड़े-बड़े दरवाज़े और खिड़कियों का उल्लेख है — जिससे प्रकाश और वायु का समुचित प्रवाह संभव हो। यही तो आज का 'पैसिव वेंटिलेशन' है।
वास्तु : केवल भवन नहीं, संस्कार भी
वास्तु शास्त्र केवल भवन-निर्माण की तकनीक नहीं है; यह एक संस्कार है, एक जीवन पद्धति। गृहप्रवेश पूजन में नींव रखते समय वेद-मंत्रों के साथ यज्ञ, पूजा, स्त्रोत पाठ दर्शाता है कि वास्तु केवल भौतिक ढांचा नहीं, आध्यात्मिक चेतना का केंद्र है। ‘गृहस्थ’ शब्द में जुड़ा ‘स्थ’ ठहराव/स्थिरता है। यह ठहराव संबंध और सुख-समृद्धि दोनों में होना चाहिए। आज जब हम ऊँची-ऊँची इमारतों में रहते हैं, वातानुकूलित जीवन जीते हैं, तब भी सुखी नहीं हैं। संबंध तार-तार हो रहे हैं। वास्तु विज्ञान वह प्रकाश-स्तंभ है, जो आधुनिक स्थापत्य को दिशा देता है। वास्तु विज्ञान समय की कसौटी पर खरा उतरा है।
आधुनिक काल में वास्तु विज्ञान की उपयोगिता
आधुनिक वास्तुकला भी वास्तु के सिद्धांतों का सदुपयोग कर भवनों को स्वास्थ्यप्रद और ऊर्जा-कुशल बनाने पर बल देती है। भवन में पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था कर न्यून ऊर्जा-खपत , वायु-परिवहन से अधिक कार्य क्षमता, जल बच व संरक्षण, सहज सुलभ मजबूत निर्माण सामग्री, संरचना के उपयोगअनुसार रूपांकन, हरित भवन आदि तत्व वास्तु विज्ञान से सिविल इंजीनियरिंग ने ग्रहण किए हैं। वास्तु विज्ञानके नियमों का पर्यावरणीय प्रभावों से सीधा कोई तार्किक संबंध न दिखाने पर भी विविध प्राकृतिक बलों (पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र, सूर्य-चंद्रमा की स्थिति इत्यादि) का आज की तकनीकी व्यवस्थाएँ (एयर कंडीशनिंग, आधुनिक निर्माण सामग्री, परिरक्षण प्रणालियाँ) विचार करती हैं। वास्तु विज्ञान गणितीय और ज्यामितीय सिद्धांतों के साथ पर्यावरण संरक्षण पर आधारित है।
इंजीनियरिंग के दृष्टिकोण से देखा जाए तो वास्तुशास्त्र में संरचनात्मक और भौतिक मापों का समावेश है। वास्तु योजना की गणना में इंजीनियरिंग ज्यामिति तथा मापन तकनीकें का उपयोग होता है। उदाहरण के लिए, किसी भवन के रेखांकनों में सही स्केल, कोणीय निर्देश (कम्पास आधारित पूर्व-दिशा निर्धारण) और दूरी मापन आवश्यक हैं। वास्तुयोजना के लिए आवश्यक मापदण्ड स्केल सेट करना, जमीन की लंबाई-चौड़ाई मापना, ध्रुवीय दिशाएँ (उत्तर-दक्षिण) पता करना आदि वास्तु और अभियांत्रिकी दोनों में हैं। दिशा गया करने के लिए प्राचीन काल की सूक्तिका आधुनिक युग में चुंबकीय कम्पास एवं जीआईएस तकनीक की पूर्वज है।
निष्कर्ष
वास्तु विज्ञान को अंध विश्वास से दूर कर आधुनिकअभियांत्रिकी में इसके मानकों और विधानों का परीक्षण और प्रयोग किया जाना आवश्यक है। आज की आवश्यकता प्रकृति के साथ समन्वय स्थापित कर विकास करना है। प्रकृति का शोषण और उपेक्षा विनाशकारी दुर्घटनाओं को जन्म दे रही है। वास्तु विज्ञान की सटीकता का प्रमाण भारत और अन्यत्र निर्मित सदियों पुराने कालजयी निर्माण हैं जिन पर समय का प्रभाव नहीं हुआ। शिव निर्मित 2 पुरातन जल प्रवाह पथ नर्मदा और गंगा, राम सेतु, सिंधु में डूब गया द्वारका नगर, पूरी तरह शुद्ध ज्योतिष गणनाएँ, सोमनाथ में बिना धरती को छुए दक्षिण ध्रुव का पथ इंगित करता तीर, कुतुब मीनार के निकट जंग मुक्त लोहे का स्तंभ, अनेक दुर्ग और मंदिर आदि अनेक निर्मितियाँ वास्तु विज्ञान की देन हैं। वर्तमान में पर्वतांचलों में हो रहे भूस्खलन, जल प्लावन, जंगलों की अग्नि, पिघलते ही खंड, ओज छिद्र, बढ़ता वायु और जल प्रदूषण आदि पर नियंत्रण करने में वास्तु विज्ञान के सिद्धांत और तकनीक बहुत प्रभावी हो सकती है।
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संदर्भ
1. vastu vidya -satish sharma।
2. संपूर्ण वास्तु शास्त्र - भोजराज द्विवेदी ।
3. वास्तु शास्त्र - ए. आर. तारखेडकर ।
4. भारतीय वास्तु एवं भवन निर्माण - जगदीश शर्मा ।
5. Hotwani, M. & Rastogi, P. “Vastu Shastra: A Vedic Approach To Architecture
6. वास्तुदीप स्मारिका- संपादक संजीव वर्मा 'सलिल' वास्तु विज्ञान संस्थान (भारत) जबलपुर ईकाई।
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