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बुधवार, 7 अगस्त 2013

Pratinidhi Doha Kosh 11 Dr. Shyam Gupta

ॐ  

प्रतिनिधि दोहा कोष :११ आचार्य संजीव

इस स्तम्भ के अंतर्गत आप पढ़ चुके हैं सर्व श्री/श्रीमती/सुश्री  नवीन सी. चतुर्वेदी, पूर्णिमा बर्मन तथा प्रणव भारती,  डॉ. राजकुमार तिवारी 'सुमित्र', अर्चना मलैया, सोहन परोहा 'सलिल', साज़ जबलपुरी, श्यामल सुमन, शशिकांत गीते तथा  वर्षा शर्मा 'रैनी' के दोहे। आज अवगाहन कीजिए  डा. श्याम गुप्त  रचित दोहा सलिला में :

*

दोहाकार ११: डा. श्याम गुप्त



*

मूल नाम: श्याम बाबू गुप्ता

जन्म: पश्चिमी  के  में  १० नवंबर १९४४, ग्राम मिढाकुर, जिला आगरा , उत्तर प्रदेश

आत्मज : स्व. श्रीमती राम भेजी देवी - स्व.जगन्नाथ प्रसाद गुप्त

 जीवन संगिनी : श्रीमती सुषमा गुप्ता , एम. ए.हिन्दी, कवियत्री -गायिका

शिक्षा: चिकित्सा शास्त्र में स्नातक, शल्य-क्रिया में स्नातकोत्तर उपाधि

सृजन विधा: हिन्दी अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में अगीत, ग़ज़ल, गीति विधा, कहानी आदि

 प्रकाशित कृति:कविता संग्रह:काव्य-दूत, काव्य-निर्झरिणी, काव्य-मुक्तामृत, अगीत महाकाव्य श्रृष्टि, प्रेम-काव्य, काव्य-उपन्यास शूर्पणखा, अगीत साहित्य दर्पण

संपर्क: डा श्याम गुप्त, सुश्यानिदी, के-३४८, आशियाना, लखनऊ २२६०१२,चलभाष: ९४१५१५६४६४।

ईमेल:  drgupta04@gmail.com 

डा श्याम गुप्त के दोहे....

आदि अभाव अकाम अज, अगुन अगोचर आप,
अमित अखंड अनाम भजि,श्याम मिटें त्रय-ताप |   

त्रिभुवन गुरु औ जगत गुरु, जो प्रत्यक्ष सुनाम,
जन्म मरण से मुक्ति दे, ईश्वर करूं  प्रणाम | 

हे माँ! ज्ञान प्रदायिनी,ते छवि निज उर धार,
सुमिरन कर दोहे रचूं, महिमा अपरम्पार |  

श्याम सदा मन में बसें, राधाश्री घनश्याम,
राधे  राधे नित जपें, ऐसे श्रीघनश्याम | 

अंतर ज्योति जलै प्रखर, होय ज्ञान आभास,
गुरु जब अंतर बसि करें,गोविंद नाम प्रकाश | 

शत शत वर्षों में नहीं, संभव निष्कृति मान,
करते जो संतान हित, मातु-पिता वलिदान |

धर्म हेतु करते रहें ,काव्य साधना कर्म,
जग को दिखलाते रहें, शुभ कर्मों का मर्म |  

श्याम जो सुत हो एक ही,पर हो साधु स्वभाव,
कुल आनंदित रहे ज्यों, चाँद-चांदनी भाव |    

नारी सम्मति हो जहां, आँगन पावन होय,
कार्य सकल निष्फल वहां, जहां न आदर सोय|  

हितकारी भोजन करें,खाएं जो ऋतु योग्य,
कम खाएं पैदल चलें, रहें स्वस्थ आरोग्य |   

अपने लिए कमाय औ, केवल खुद ही खाय,
श्याम पापमय अन्न है, जो न साधु को जाय |  

काव्य स्वयं का हो लिखा, माला निज गुंथ पाय,
चन्दन जो निज कर घिसा, अति ही शोभा पाय|  

आयु कर्म धन विद्वता, कुल शोभा अनुसार,
उचित वेश धारण करें, वाणी बुद्धि विचार |      
   
सबको निज में देखता, निज को सब में जान,
सोई रूप अभेद है, श्याम यही है ज्ञान |      

विद्या धर्म अकाम्यता, वेद-विहित सब कर्म,
ज्ञान-कर्म के योग में, निहित सनातन धर्म |   

कर्म के फल की कामना,माने उचित न कोय,
लेकिन पूर्ण अकाम्यता,श्याम न जग में होय |   

फल की जो इच्छा नहीं, धर्माधर्म अलिप्त,
राग द्वेष दुःख से परे, सोई जीवन्मुक्त |    

ज्ञाता ज्ञान औ ज्ञेय का, भेद रहे नहिं रूप,
वह तो स्वयं प्रकाश है, परमानंद स्वरुप |   

सींचे बिन मुरझा गयी, सदाचार की मूल,
श्याम कहाँ फूलें फलें, संस्कार के फूल | 

इस संसार असार में, श्याम प्रेम ही सार,
प्रेम करे दोनों मिलें, ज्ञान और संसार |  

तिर्यक भाव व कर्म को, चित लावे नहिं कोय,
मन लावै तो मन बसे, श्याम त्रिभंगी सोय |  

घिरी परिजनों से प्रिया, बैठे हैं मन मार,
पर चितवन से होरहा, नयनों का व्यापार |   

झूठहि  उठना बैठना, झूठ मान सम्मान,
अब है झूठ सा अवगुण, श्याम’ गुणों की खान |  

घर को सेवै सेविका, पत्नी सेवै अन्य,
छुट्टी लें तब मिल सकें, सो पति-पत्नी धन्य |  

श्याम सुखद दोउ भाव हैं, या सोने के रंग,
सोहे रजनी अंक, और सोहे सजनी अंग |    

पनघट ताल कुआ मिटे, मिटी नीम की छांह,
इस विकास के कारने, उजड़ा सारा गाँव |    

चन्द्र दरस को सुन्दरी, घूंघट लियो उघारि ,
चित चकोर चितबत चकित, दो दो चन्द्र निहारि|  

भ्रकुटि तानि बरजै सुमुखि, मन ही मन ललचाय,
पिचकारी ते श्याम की, तन मन सब रंगि जाय

अपनी लाज लुटा रही, द्रुपद-सुता बाज़ार,
इन चीरों का क्या करूँ, कृष्ण खड़े लाचार |  

ईश्वर अल्लाह कब मिले, हमें झगड़ते यार,
फिर मानव क्यों व्यर्थ ही करता है तकरार |  

सर्द पश्चिमी हवा में, ठिठुरा हिन्दुस्तान,
लिए पूर्वी धूप अब, उगें सूर्य भगवान |     

रविवार, 4 अगस्त 2013

bhasha vividha: sirayaki doha salila -sanjiv

भाषा विविधा:

दोहा सलिला सिरायकी :

संजीव

[सिरायकी (लहंदा, पश्चिमी पंजाबी, जटकी, हिन्दकी, मूल लिपि लिंडा): पंजाब - पाकिस्तान के कुछ क्षेत्रों की लोकभाषा, उद्गम पैशाची-प्राकृत-कैकई से, सह बोलियाँ मुल्तानी, बहावलपुरी तथा थली. सिरायकी में हिंदी के हर वर्ग का ३ रा व्यंजन (ग,ज,ड, द तथा ब) उच्च घोष में बोला तथा रेखांकित कर लिखा जाता है. उच्चारण में 'स' का 'ह', 'इ' का 'हि', 'न' का 'ण' हो जाता है. सिरायकी में दोहा लेखन में हुई त्रुटियाँ इंगित करने तथा सुधार हेतु सहायता का अनुरोध है.]

*

हब्बो इत्था मिलण हे, निज करमां डा फल।

रब्बा मैंनूँ मुकुति दे, आतम पाए कल।।

*

अगन कुंद हे पाप डा, राजनीति हे छल।

जद करणी भरणी तडी, फिर उगणे कूँ ढल।।

*

लुक्का-छिप्पी खेल कूँ, धूप-छाँव अनुमाण।

सुख-दुःख हे चित-पट 'सलिल', सूझ-बूझ वरदाण।।

*

खुदगर्जी तज जिंदगी, आपण हित दी सोच।

संबंधों डी जान हे, लाज-हया-संकोच।।

*

ह्ब्बो डी गलती करे, हँस-मुस्काकर माफ़।

कमजोरां कूँ पिआर ही, हे सुच्चा इन्साफ।।

*

                                         

meri pasand SHABD vijay nikore

मेरी पसंद:
शब्द 
-- विजय निकोर
*
कहे और अनकहे के बीच बिछे
अवशेष कुछ शब्द हैं केवल,
शब्द भी जैसे हैं नहीं,
ओस से टपकते शब्द
दिन चढ़ते ही प्रतिदिन
वाष्प बन उढ़ जाते हैं
और मैं सोचता हूँ... मैं
आज क्या कहूँगा तुमसे ?
 
अनगिनत भाव-शून्य शब्द
इस अनमोल रिश्ते की धरोहर, 
व्याकुल प्रश्न,  अर्थ भी व्याकुल,
मिथ्या शब्दों की मिथ्या अभिव्यक्ति,
एक   ही   पुराने   रिश्ते से   रिसता
रोज़- रोज़ का एक और नया दर्द
बहता नहीं है, बर्फ़-सा
जमा रह जाता है।
 
फिर   भी   कुछ   और   मासूम शब्द
जाने किस तलाश में चले आते हैं
उन शब्दों में ढूँढता हूँ   मैं तुमको
और वर्तमान को भूल जाता हूँ।
तुम्हारी उपस्थिति में हर बार
यह शब्द नि:शब्द हो जाते हैं
और मैं कुछ भी कह नहीं पाता
शब्द उदास लौट आते हैं।
 
तुम्हारी आकृति यूँ ही ख़्यालों में
हर बार, ठहर कर, खो जाती है,
और मैं भावहीन मूक खड़ा 
अपने शब्दों की संज्ञा में उलझा
ठिठुरता रह जाता हूँ।
ऐसे में यह मौन शब्द 
 
असंख्य असंगतियों से घिरे 
मुझको संभ्रमित छोड़ जाते हैं।
 
इन उदासीन, असमर्थ, व्याकुल
शब्दों की व्यथा
भीतर उतर आती है,
सिमट रहा कुछ और अँधेरा
बाकी रात में घुल जाता है,
और उसमें तुम्हारी आकृति की
एक और असाध्य खोज में
यह शब्द छटपटाते हैं ...
तुमसे कुछ कहने को, वह 
जो मैं आज तक कह सका।
 
हाँ, तुमसे कुछ सुनने की
कुछ कहने की जिज्ञासा
अभी भी उसी पुल पर
हर रोज़ इंतजार करती है।
             -------
                                            

navgeet: kaurav kul -Omprakash Tiwari

नवगीत:

कौरव कुल

- ओमप्रकाश तिवारी 

------------
कौन कह रहा
द्वापर में ही
कौरव कुल का नाश हुआ ।

वही पिताश्री
बिन आँखों के
माताश्री
पट्टी बाँधे,
ढो-ढो
पुत्रमोह की थाती
दुखते दोनों
के काँधे ;

उधर न्याय की
आस लगाये
अर्जुन सदा निराश हुआ ।

नकुल और
सहदेव सरीखे
भाई के भी
भाव गिरे,
दुर्योधन जी
राजमहल में
दुस्साशन से
रहें घिरे ;

जिसमें जितने
दुर्गुण ज्यादा
वह राजा का ख़ास हुआ ।

चालें वही
शकुनि की दिखतीं
चौपड़ के
नकली पाशे,
नहीं मयस्सर
चना-चबेना
दूध - मलाई
के झांसे ;

चंडालों की
मजलिस  में जा
सदा युधिष्ठिर दास हुआ ।

भीष्म - द्रोण
सत्ता के साथी
अपने-अपने
कारण हैं,
रक्षाकवच
नीति के सबने
किये बख़ूबी
धारण हैं ;

सच कहने पर
चचा विदुर को
दिखे आज वनवास हुआ ।
--
Om Prakash Tiwari
Chief of Mumbai Bureau
Dainik Jagran
41, Mittal Chambers, Nariman Point,
 Mumbai- 400021

Tel : 022 30234900 /30234913/39413000
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Resi.- 07, Gypsy , Main Street ,
Hiranandani Gardens, Powai , Mumbai-76
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शनिवार, 3 अगस्त 2013

DOHA in SIRAYAKI : SANJIV

भाषा विविधा:

दोहा सलिला सिरायकी :

संजीव

[सिरायकी पाकिस्तान और पंजाब के कुछ क्षेत्रों में बोले जानेवाली लोकभाषा है. सिरायकी का उद्गम पैशाची-प्राकृत-कैकई से हुआ है. इसे लहंदा, पश्चिमी पंजाबी, जटकी, हिन्दकी आदि भी कहा गया है. सिरायकी की मूल लिपि लिंडा है. मुल्तानी, बहावलपुरी तथा थली इससे मिलती-जुलती बोलियाँ हैं. सिरायकी में दोहा छंद अब तक मेरे देखने में नहीं आया है. मेरे इस प्रथम प्रयास में त्रुटियाँ होना स्वाभाविक है. जानकार पाठकों से त्रुटियाँ इंगित करने तथा सुधार हेतु सहायता का अनुरोध है.]

*

बुरी आदतां दुखों कूँ, नष्ट करेंदे ईश।  

साडे स्वामी तुवाडे, बख्तें वे आशीष।।

*

रोज़ करन्दे हन दुआ, तेडा-मेडा भूल 

अज सुणी ई हे दुआं,त्रया-पंज दा भूल।।

*

दुक्खां कूँ कर दूर प्रभु, जग दे रचनाकार।  

डेवणवाले देवता, रण जोग करतार।। 

*

कोई करे तां क्या करे, हे बलाव असूल।   

कायम हे उम्मीद पे, दुनिया कर के भूल

*

शर्त मुहाणां जीत ग्या, नदी-किनारा हार।  

लेणें कू धिक्कार हे, देणे कूँ जैकार।।

*

शहंशाह हे रियाया, सपणें हुण साकार  

राजा ते हे बणेंदी, नता ते हुंकार।।

*

गिरगिट वां मिन्ट विच, मणुदा रंग  

डूरंगी हे रवायत, ज्यूं लोहे नूँ जंग।।

*

हब्बो जी सफल हे, घटगा गर अलगा। 

खुली हवा आजाद हे, देश- न हो भटकाव।।

*

सिद्धे-सुच्चे मिलण दे, जीवन-पथ आसान।  

खुदगर्जी दी भावणा, त्याग सुधर इंसान ।।

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virasat : rathwan -sw. narendra sharma

https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgIT4IwYcPHjyoa2Y2i6pU9R-CObz3ebcePTwExv__h6RgLMAI9nfGY6pC6gyFWnGMKEn61DVifJyYufRI1xZ1QCQs95bkkLZ7tIeH9z102S5M1WdImNWBh81EH90V6fIAuHHVc6NS8wac/s1600/2.jpghttps://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiH1WBFrLztC4bZ8UnfZaJN-pldSGjbwzvKpGFqPjHnvc2nrLqEzRnHZQqrHNI-0JR9bn9Itud_qCyZch1QZ3L-OYQgEUKGP6fhaJMRX1pEAqrEzwBzNLu6qRuVvu3y1S3WDQ5OaaYAvQw/s1600/Lavanya-shah.jpg*विरासत:
रथवान  
स्व. नरेन्द्र शर्मा
साभार : लावण्या शाह 

*
हम रथवान, ब्याहली रथ में,
रोको मत पथ में
हमें तुम, रोको मत पथ में।

माना, हम साथी जीवन के,
पर तुम तन के हो, हम मन के।
हरि समरथ में नहीं, तुम्हारी गति हैं मन्मथ में।
हमें तुम, रोको मत पथ में।


हम हरि के धन के रथ-वाहक,
तुम तस्कर, पर-धन के गाहक 
हम हैं, परमारथ-पथ-गामी, तुम रत स्वारथ में।
हमें तुम, रोको मत पथ में।

दूर पिया, अति आतुर दुलहन,
हमसे मत उलझो तुम इस क्षण।
अरथ न कुछ भी हाथ लगेगा, ऐसे अनरथ में।
हमें तुम, रोको मत पथ में।

अनधिकार कर जतन थके तुम,
छाया भी पर छू न सके तुम!
सदा-स्वरूपा एक सदृश वह पथ के इति-अथ में!
हमें तुम, रोको मत पथ में।

शशिमुख पर घूँघट पट झीना
चितवन दिव्य-स्वप्न-लवलीना,
दरस-आस में बिन्धा हुआ मन-मोती है नथ में।
हमें तुम, रोको मत पथ में। 

हम रथवान ब्याहली रथ में,
हमें तुम, रोको मत पथ में।

***

Pratinidhi Doha Kosh : 10 Varsha Sharma 'Rainy'

ॐ  

प्रतिनिधि दोहा कोष :१० आचार्य संजीव

प्रतिनिधि दोहा कोष :१० आचार्य संजीव

 इस स्तम्भ के अंतर्गत आप पढ़ चुके हैं सर्व श्री/श्रीमती/सुश्री  नवीन सी. चतुर्वेदी, पूर्णिमा बर्मन तथा प्रणव भारती,  डॉ. राजकुमार तिवारी 'सुमित्र', अर्चना मलैया, सोहन परोहा 'सलिल', साज़ जबलपुरी, श्यामल सुमन तथा शशिकांत गीते के दोहे। आज अवगाहन कीजिए वर्षा शर्मा 'रैनी' रचित दोहा सलिला में : 

*

दोहाकार १० : वर्षा शर्मा 'रैनी'

https://mail-attachment.googleusercontent.com/attachment/u/0/?ui=2&ik=dad2fa7c6e&view=att&th=140d410ec7fd2772&attid=0.1&disp=inline&realattid=f_hkzjdyac0&safe=1&zw&saduie=AG9B_P8iolpeP3f4iPAHowfQMMHF&sadet=1377987529675&sads=2Jnyg5HiMTGW5jDitTyjEnr5Jk0
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वर्षा शर्मा 'रैनी' : 

जन्म: १६ - ३ - १९८५, गाडरवारा, नरसिंहपुर मध्य प्रदेश।

आत्मजा : श्रीमती रेखा - श्री प्रकाश शर्मा।

शिक्षा: एम. ए. इतिहास, 'स्वामी विवेकानंद के पत्रों और व्याख्यानों में राष्ट्रीय और सामाजिक चिन्तन ' पर शोधरत।

सृजन विधा: गीत, गजल, मुक्तक, भजन, लघु कथा आदि

 प्रकाशित कृति: मन ही मन (गजल, गीत, भजन संग्रह)

संपर्क: सुभाष वार्ड, गाडरवारा, नरसिंहपुर मध्य प्रदेश। चलभाष: ९५७५९०६६६४ 

ईमेल: rsrainysharma@gmail.com

 इस स्तम्भ के अंतर्गत आप पढ़ चुके हैं सर्व श्री/श्रीमती/सुश्री  नवीन सी. चतुर्वेदी, पूर्णिमा बर्मन तथा प्रणव भारती,  डॉ. राजकुमार तिवारी 'सुमित्र', अर्चना मलैया, सोहन परोहा 'सलिल', साज़ जबलपुरी, श्यामल सुमन तथा शशिकांत गीते के दोहे। आज अवगाहन कीजिए वर्षा शर्मा 'रैनी' रचित दोहा सलिला में :

शुक्रवार, 2 अगस्त 2013

pratinidhi doha kosh 9 - shashikant geete, khandwa


ॐ  

प्रतिनिधि दोहा कोष :9 आचार्य संजीव

 इस स्तम्भ के अंतर्गत आप पढ़ चुके हैं सर्व श्री/श्रीमती/सुश्री  नवीन सी. चतुर्वेदी, पूर्णिमा बर्मन, प्रणव भारती,  डॉ. राजकुमार तिवारी 'सुमित्र', अर्चना मलैया, सोहन परोहा 'सलिल', साज़ जबलपुरी तथा श्यामल सुमन के दोहे। आज अवगाहन कीजिए श्री शशिकांत गीते रचित दोहा सलिला में : 

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दोहाकार ९ : शशिकांत गीते 

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जन्म: मध्य प्रदेश।

आत्मजा : गीते।

शिक्षा: एम. ए. ।

सृजन विधा: गीत, गजल, दोहा आदि।

 प्रकाशित कृति:

संपर्क:  मध्य प्रदेश। चलभाष:

ईमेल: