सलिल सृजन मार्च २१
०
छंद शाला
शे'र-ग़ज़ल
०
फिर से एक बार उजड़ जाते है
चल तेरे इश्क़ में पड़ जाते हैं - संजीवनी चंद्रा
मिले संजीवनी जो चंदा से
प्राण पत्थर में भी पड़ जाते हैं
नर्मदा नेह की नहाए गर
खुद-ब-खुद होंठ मुस्कुराते हैं
नैन से नैन मिल झुके उठ लड़
रोज कविता दिवस मनाते हैं
नेह-नाते मरुस्थलों में भी
आस की रास हँस रचाते हैं
०००
छंद शाला
दोहा-रोला-कुंडलिया
०
सपरिवार मङ्गलमयी, सुखमय हो नव वर्ष।
उन्नत हो उत्कर्ष नित,अवनत हो अपकर्ष।। -अशोक व्यग्र
अवनत हो अपकर्ष, कीर्ति-यश अक्षय पाएँ।
सुख-समृद् मिल-बाँट, सुहृदं को गले लगाएँ।।
अपने सपने पूर्ण, औरों के भी साकार।
करिए मिलकर साथ, करें सदैव सपरिवार।।
०००
नयन खुले नव वर्ष के, लेकर नवल विहान।
पतन-गर्त से वर्ष भर, करने नव उत्थान।। -अशोक व्यग्र
करने नव उत्थान, नवल आशा संचारे।
कार्य न कोई करे, शुभ-अशुभ सोचे-विचारे।।
कहे सलिल कविराय, व्यग्र नहिं हो अंतर्मन।
सँभलें ठोकर पूर्व, कदम नित साथ दें नयन।।
२१.३.२०२६
०००
ग़जलिका
पानी
०
किसी आँख से बहे न पानी
सूखे नहीं आँख का पानी
.
बिन पानी सूनी सब दुनिया
पानी बहा न कर नादानी
.
मानव मोती मृदा चून की
पानी ने कीमत पहचानी
.
'पानी पत राखो गिरधारी'
करे प्रार्थना मीरा स्यानी
.
पानी गंदा करें नराधम
बिन पानी दुनिया बेगानी
.
सलिल नीर जल वाटर निर्मल
बचा रखो न्यामत लासानी
२१.३.२०२५
०००
सॉनेट
अँजुरी
•
हरि मैं हारा, अँजुरी खाली।
नीर लिया अभिषेक करूँगा।
बूँद बूँद बह गया मुरारी।।
नत शिर, पीछे पग न धरूँगा।।
पवन न अँजुरी में टिक पाया।
गगर विशाल न मैं पाया गह।
पावक दायक दारुण पाया।।
भू का भार नहीं पाया सह।।
पंच तत्व से परे मिले क्या?
भक्ति भाव आता नहीं मन में।
काम क्रोध मद लोभ न छोड़ें।।
भरे लबालब नाहक तन में।।
देह अंजुरी में विकार सब
लाया हरि हर लो,मैं हारा।।
२१-३-२०२३
●
सॉनेट
रंग
•
रंगरहित बेरंग न कोई।
श्याम जन्मता सदा श्वेत को।
प्रगटाए पाषाण रेत को।।
रंगों ने नव आशा बोई।।
रंगोत्सव सब झूम मनाते।
रंग लगाना बस अपनों को।
छोड़ न देते क्यों नपनों को?
राग-रागिनी, गीत गुँजाते।।
रंग बिखेरें सूरज-चंदा।
नहीं बटोरें घर-घर चंदा।
यश न कभी भी होता मंदा।।
रंगों को बदरंग मत करो।
श्वेत-श्याम को संग नित वरो।
नवरंगों को हृदय में धरो।।
०००
देवी गीत
*
मैया पधारी दुआरे
रे भैया! झूम-झूम गावा
*
घर-घर बिराजी मतारी हैं मैंया!
माँ, भू, गौ, भाषा प्यारी हैं मैया!
अब लौं न पैयाँ पखारे रे हमने
काहे रहा मन भुलावा
रे भैया! झूम-झूम गावा
*
आसा है, श्वासा भतारी है मैया!
अँगना-रसोई, किवारी है मैया!
बिरथा पड़ोसन खों ताकत रहत ते,
भटका हुआ लौट आवा
रे भैया! झूम-झूम गावा
*
राखी है, बहिना दुलारी रे मैया!
ममता बिखरे गुहारी रे भैया!
कूटे ला-ला भटकटाई -
सवनवा बहुतै सुहावा
रे भैया! झूम-झूम गावा
*
बहुतै लड़ैती पिआरी रे मैया!
बिटिया हो दुनिया उजारी रे मैया!
'बज्जी चलो' बैठ काँधे कहत रे!
चिज्जी ले ठेंगा दिखावा
रे भैया! झूम-झूम गावा
*
तोहरे लिए भए भिखारी रे मैया!
सूनी थी बखरी, उजारी रे मैया!
तार दये दो-दो कुल तैंने
घर भर खों सुरग बनावा
रे भैया! झूम-झूम गावा
•••
ॐ
ऐतरेयोपनिषद
हिंदी पद्यानुवाद
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
शांति पाठ
वाणी मन में; मन वाणी में, वास करें प्रभु! वे अभिन्न हो।
हो प्रकाश-रूप प्रगटो प्रभु!, वेद-ज्ञान मन-वाणी ला दो।।
सुना ज्ञान जो; मुझे न भूले, निश-दिन चिंतन-पठन कर सकूँ-
सत्य-श्रेष्ठ-शुभ ही बोलूँ मैं, रक्षा करिए मेरी; गुरु की।
मुझको-गुरुको प्रभु! बचाइए, विघ्न अध्ययन में न तनिक हो।।
।। ॐ शांति: शांति: शांति: ।।
।। अध्याय १, खंड १।।
ॐ जगत प्रगटन के पहले, एकमात्र परमात्मा ही था।
अन्य न चेष्टा करनेवाला, लोक रचूँ उसने यह सोचा।१।
उसने लोकों की रचना की, अंभ-मरीचि-मृत्यु-जल सृजकर।
मह-जन-तप-सत्; अंभ-मरिचि-भव, नर-भू-जल-पाताल बनाए।२।
उसने सोचा- लोक रचे; अब, लोकपाल भी रचना होंगे।
सलिल-पद्मनाल से उसने, पुरुष हिरण्यमयी प्रगटाया।३।
तपकर मुख-वागाग्नि-नासिका, प्राण-वायु फिर चक्षु बनाए।
तब रवि कान दिशा व त्वचा रच, लोम दवा तरु पौध उगाए।
हृद मन शशि फिर अपानवायु, मृत्यु लिंग रेतस जल आए।४।
।। अध्याय १, खंड २।।
इस विधि उपजे सब देवों को, भूख-प्यास भी दे दी प्रभु ने।
सृष्टि-सिंधु पड़ प्रभु से बोले, 'जहाँ मिले आहार-जगह दें'।१।
गौ-तन बना दिया तब प्रभु ने, 'यह पर्याप्त नहीं' सुर बोले।
अश्व शरीर रचा तब प्रभु ने, 'है पर्याप्त न' कहा सुरों ने।२।
तब प्रभु ने नर-देह बनाई, 'अति सुंदर है' सुर बोले झट।
कहा ईश ने 'उचित लगे जो, जगह वहीं हो प्रविष्ट जाओ'।३।
अग्नि वाक् बन बैठे मुख में, वायु प्राण बन गए नाक में।
सूर्य दृष्टि बन नयन में बसे, दिशा देव हो श्रवण कान में।
देव दवा के लोम-त्वचा में, चंद्र हुआ मन पैठा हृद में।
यम अपान बन नाभि बस गया, वरुण वीर्य बन लिंग में बसे।४।
भूख-प्यास तब बोलीं प्रभु से, 'जगह हमें भी कहीं दीजिए'।
प्रभु बोले इन देवों का ही, भागीदार बनाता तुमको'।
लें हवि देवों-हित इंद्रिय जब, भूख-प्यास भी हिस्सा पाएँ।५।
।। अध्याय १, खंड ३।।
उस प्रभु ने फिर सोचा 'ये सब, लोकपाल लोकों के हैं जो।
इनके लिए बनाना है अब, अन्न- तृप्ति ये पाएँ जिससे।१।
उसने पंच महाभूतों को, तपा तुरत आकार दे दिया।
हो साकार सूक्ष्म भूतों से, अन्न; भोग्य जो है देवों का।२।
'भक्षक मेरा नाश करेगा', सोच अन्न भागा; मुँह फेरा।
जीवात्मा ने वाणी द्वारा, चाहा पकड़ूँ; पकड़ न पाया।३।
(वाक् पकड़ पाता यदि उसको, बोले 'अन्न' तृप्ति हो जाती।)
तब प्राणों ने चाहा पकड़े, हाथ न अन्न प्राण के आया।
सकता पकड़ अन्न तो उसको, सूँघ अन्न मन सुतृप्ति पाता।४।
अब आँखों ने चाहा पकड़े, लेकिन अन्न न हाथ लग सका।
अगर पातीं आँखें तो, अन्न देखकर मन भर जाता।५।
कोशिश कानों ने की पकड़ें, अन्न; न लेकिन पकड़ सके वे।
अगर पकड़ लेते तो सुनकर, अन्न तृप्ति मन को मिल सकती।६।
अन्न पकड़ लूँ चाह चर्म ने, कोशिश की पर पकड़ न पाया।
होता सफल अगर तो छूकर, अन्न तृप्ति मनु को मिल पाती।७।
मन ने चाहा; पकड़ न पाया, अगर पकड़ लेता तो नर को।
मात्र सोचकर भूख-प्यास से, अन्न ग्रहण सम तृप्ति सुहाती।८।
अन्न पकड़ लूँ सोच पुरुष ने, शिश्न माध्यम से कोशिश की।
विफल हुआ; यदि गह सकता तो, तजकर अन्न तृप्त हो पाता।९।
ग्रहण अपानवायु के द्वारा, मुख में अन्न कर सका जब नर।
जीवन-रक्षा करे अन्न के द्वारा, मात्र अपान वायु ही।१०।
परमपिता ने सोचा 'मुझ बिन, कैसे जीव रह सकेगा यह?
बोल वाक् से; सूँघ नाक से, श्वसन प्राण से; देख नेत्र से।
सुन कानों से; स्पर्श त्वचा से, मन से सोचे; खा अपान से।
वीर्य शिश्न से तजे; खुदी तो, मेरा क्या उपयोग रह गया?
मुझ बिन रह न सके; पद-मस्तक, किस पथ से मैं इसमें जाऊँ?११।
चीर जीव तन; विदृति द्वार से, तन में किया प्रवेश ईश ने।
तीन स्वप्न त्रै धाम ईश के, हृदय-गगन-ब्रह्माण्ड समूचा।१२।
(तीन अवस्था तीन स्वप्न हैं, स्थूल-सूक्ष्म अरु कारण रूपी।)
मनुज देह में प्रगट पुरुष ने, पंच भूत को सब दिश देखा।
कौन दूसरा व्याप्त?; देख प्रभु, हर्षा 'मैंने प्रभु को देखा।'१३।
नाम 'इदन्द्र' 'इसे देखा' है, लोग 'इंद्र' कहकर पुकारते।
उसको प्रिय है छिपकर रहना, ईश न सम्मुख रहें चाहते।१४।
***
।। अध्याय २।।
जीव प्रथमत: पुरुष देह में, वीर्य बने होता सुपुष्ट भी।
सिंचन नारी गर्भाशय में, करता पुरुष जन्म यह पहला।१।
नारी गहती आत्मभाव से, अपने अंग सदृश ही उसको।
पीर न होती; भार न लगता, आत्मावत करती पालन वह।२।
पालन-पोषण कर जन्मे माँ, संस्कार दे पिता ज्ञान भी।
संतति में खुद उन्नत होता, यह जातक का जन्म दूसरा।३।
वह आत्मा है इस आत्मा का, प्रतिनिधि; यह कर्तव्य पूर्ण कर।
आयु पूर्ण कर; पुन: जन्म ले, यह जातक का जन्म तीसरा।४।
विस्मय सत्य गर्भ में जाना, देवों के अनेक जन्मों को।
लौह आवरण तोड़ बाज सम, वामदेव ने कहा गर्भ में।५।
जन्म रहस्य जान, उठ ऋषि वह, तन मिटने पर स्वर्ग को गया।
सर्व कामनामुक्त आप्त हो, जन्म-मृत्यु से मुक्त हो गया। ६।
***
।। अध्याय २।।
किस आत्मा को हम उपासते, देख सुनें सूँघें चख बोलें।
जिससे वह या जिसने इनको, प्रगटाया है पुरुष देह में।१।
हृद ही मन; संज्ञान ले सके, दे आज्ञा; विज्ञान है यही।
प्रज्ञा; मेधा; दृष्टि; धैर्य; मति, मनन शक्ति; गति-स्मृति भी यह।
संकल्प; मनोरथ; प्राण शक्ति, कामादि उसी के सत्ता-बोधक।
इनसे हो प्रतीति उस प्रभु की, जिसने इनको रचा-बनाया।२।
ब्रह्मा इंद्र प्रजापति सब सुर, धरा गगन नभ सलिल तेज भी।
पंच भूत; लघु प्राणी; अंडज, जेरज; स्वेदज; उद्भिज; घोड़े।
गौ; गज; मनुज; परिंदे; जंगम, अचल जीव सब उससे पाते।
प्रज्ञा-प्रज्ञानेत्र; ज्ञान भी, वह प्रज्ञानी परम् ब्रह्म है।३।
जो जाने उठ धरा लोक से, स्वर्गलोक में ब्रह्म के सहित।
सब भोगों को भोग अमर हो, जन्म-मृत्यु से मुक्त हुआ वह।४।
*
शांति पाठ
वाणी मन में; मन वाणी में, वास करें प्रभु! वे अभिन्न हो।
हो प्रकाश-रूप प्रगटो प्रभु!, वेद-ज्ञान मन-वाणी ला दो।।
सुना ज्ञान जो; मुझे न भूले, निश-दिन चिंतन-पठन कर सकूँ-
सत्य-श्रेष्ठ-शुभ ही बोलूँ मैं, रक्षा करिए मेरी; गुरु की।
मुझको-गुरुको प्रभु! बचाइए, विघ्न अध्ययन में न तनिक हो।।
।। ॐ शांति: शांति: शांति: ।।
२१.३.२०२२
***
शारद विनय
*
सरसुति सुरसति सब सुख दैनी,
हंस चढ़त लटकावति बैनी।
बीना थामे सुर गुंजाँय-
कर किरपा कुछ मातु सुनैनी।।
*
सरन तुमाई आय हम, ठुकराओ न मैया!
सिर पै कर धर आसिस, बरसाओ न मैया!
हैं संतान तिहारी सच बिसर गओ जब
भव बाधा ने घेरो सुख बिखर गओ सब
दर पर आ टेर लगाई, अपनाओ न मैया!
सरन तुमाई आय हम, ठुकराओ न मैया!
*
अपढ़-अनाड़ी ठैरे, आ दरसन देओ
इत-उत भटके, ईसें सेवा में लेओ
उबर सके संकट सें ऊ जिसे उबारो
एक आसरो तुमरो, ऐ माँ न बिसारो
ओ माँ! औसर देओ, अंबे अ: मैया!
सरन तुमाई आय हम, ठुकराओ न मैया!
*
आखर सबद न सरगम, जाने सिखला दो
नाद अनाहद तन्नक मैया! सुनवा दो
कलकल-कलरव ब्यापी माँ बीनापानी
भवसागर सें तारो हमखों कल्यानी
चरन सरन स्वीकारो ठुकराओ न दैया!
सरन तुमाई आय हम, ठुकराओ न मैया!
***
दोहा
हिंदू मरते हों मरें, नहीं कहीं भी जिक्र।
काँटा चुभे न अन्य को, नेताजी को फ़िक्र।।
***
मुक्तक कविता दिवस पर
कवि जी! मत बोलिये 'कविता से प्यार है'
भूले से भी मत कहें 'इस पे जां निसार है'
जिद्द अब न कीजिए मुश्किल में जान है
कविता का बाप बहुत सख्त थानेदार है
२१-३-२०२१
***
एक रचना
*
विश्व में कविता समाहित
या कविता में विश्व?
देखें कंकर में शंकर
या शंकर में प्रलयंकर
नाद ताल ध्वनि लय रस मिश्रित
शक्ति-भक्ति अभ्यंकर
अक्षर क्षर का गान करे जब
हँसें उषा सँग सविता
तभी जन्म ले कविता
शब्द अशब्द निशब्द हुए जब
अलंकार साकार हुए सब
बिंब प्रतीक मिथक मिल नर्तित
अर्चित चर्चित कविता हो तब
सत्-शिव का प्रतिमान रचे जब
मन मंदिर की सुषमा
शिव-सुंदर हो कविता
मन ही मन में मन की कहती
पीर मौन रह मन में तहती
नेह नर्मदा कलकल-कलरव
छप्-छपाक् लहरित हो बहती
गिरि-शिखरों से कूद-फलाँगे
उद्धारे जग-पतिता
युग वंदित हो कविता
***
इब्नबतूता
*
इब्नबतूता भूल के जूता
कोरोना से डर भागा
नहीं किसी को शकल दिखाता
घर के अंदर बंद हुआ है
राम राम करता दूरी से
ज्यों पिंजरे में कोई सुआ है
गले मत मिला, हाथ मत मिलो
कुरता सिलता बिन धागा
इब्नबतूता भूल के जूता
कोरोना से डर भागा
सगा न कोई रहा किसी का
हाय न कोई गैर है
सबको पड़े जान के लाले
नहीं किसी की खैर है
सोना चाहे; नींद न आए
आँख न खुलती पर जागा
इब्नबतूता भूल के जूता
कोरोना से डर भागा
***
नवगीत
क्या होएगा?
*
इब्नबतूता
पूछे: 'कूता?
क्या होएगा?'
.
काय को रोना?
मूँ ढँक सोना
खुली आँख भी
सपने बोना
आयसोलेशन
परखे पैशन
दुनिया कमरे का है कोना
येन-केन जो
जोड़ धरा है
सब खोएगा
.
मेहनतकश जो
तन के पक्के
रहे इरादे
जिनके सच्चे
व्यर्थ न भटकें
घर के बाहर
जिनके मन निर्मल
ज्यों बच्चे
बाल नहीं
बाँका होएगा
.
भगता क्योंहै?
डरता क्यों है?
बिन मारे ही
मरता क्यों है?
पैनिक मत कर
हाथ साफ रख
हाथ साफ कर अब मत प्यारे!
वह पाएगा
जो बोएगा
२१-३-२०२०
***
हाइकु गीत
*
आया वसंत
इन्द्रधनुषी हुए
दिशा-दिगंत..
शोभा अनंत
हुए मोहित,
सुर-मानव संत..
*
प्रीत के गीत
गुनगुनाती धूप
बनालो मीत.
जलाते दिए
एक-दूजे के लिए
कामिनी-कंत..
*
पीताभी पर्ण
संभावित जननी
जैसे विवर्ण..
हो हरियाली
मिलेगी खुशहाली
होगे श्रीमंत..
*
चूमता कली
मधुकर गुंजार
लजाती लली..
सूरज हुआ
उषा पर निसार
लाली अनंत..
*
प्रीत की रीत
जानकर न जाने
नीत-अनीत.
क्यों कन्यादान?
'सलिल' वरदान
दें एकदंत..
***
कुण्डलिया
*
कुंडल पहना कान में, कुंडलिनी ने आज
कान न देती, कान पर कुण्डलिनी लट साज
कुण्डलिनी लट साज, राज करती कुंडल पर
मौन कमंडल बैठ, भेजता हाथी को घर
पंजा-साइकिल सर धुनते, गिरते जा दलदल
खिला कमल हँस पड़ा, फन लो तीनों कुंडल
*
रूठी राधा से कहें, इठलाकर घनश्याम
मैंने अपना दिल किया, गोपी तेरे नाम
गोपी तेरे नाम, राधिका बोली जा-जा
काला दिल ले श्याम, निकट मेरे मत आ, जा
झूठा है तू ग्वाल, प्रीत भी तेरी झूठी
ठेंगा दिखा न भाग, खिजाती राधा रूठी
२१-३-२०१७
***
विमर्श : कुछ सवाल-
१. मिथुनरत नर क्रौंच के वध पश्चात क्रौंची के आर्तनाद को सुनकर विश्व की पहली कविता कही गयी। क्या कविता में केवल विलाप और कारुण्य हो, शेष रसों या अनुभूतियाँ के लिये कोई जगह न हो?
२. यदि विलाप से उत्पन्न कविता में आनंद का स्थान हो सकता है तो अभाव और विसंगति प्रधान नवगीत में पर्वजनित अनुभूतियाँ क्यों नहीं हो सकतीं?
३. यदि नवगीत केवल और केवल पीड़ा, दर्द, अभाव की अभिव्यक्ति हेतु है तो क्यों ने उसे शोक गीत कहा जाए?
४. क्या इसका अर्थ यह है कि नवगीत में दर्द के अलावा अन्य अनुभूतियों के लिये कोई स्थान नहीं और उन्हें केंद्र में रखकर रची गयी गीति रचनाओं के लिये कोई नया नाम खोज जाए?
५. यदि नवगीत सिर्फ और सिर्फ दलित और दरिद्र वर्ग की विधा है तो उसमें उस वर्ग में प्रचलित गीति विधाओं कबीरा, ढिमरयाई, आल्हा, बटोही, कजरी, फाग, रास आदि तथा उस वर्ग विशेष में प्रचलित शब्दावली का स्थान क्यों नहीं है?
६. क्या समीक्षा करने का एकाधिकार विचारधारा विशेष के समीक्षकों का है?
७. समीक्षा व्यक्तिगत विचारधारा और आग्रहों के अनुसार हो या रचना के गुण-धर्म पर? क्या समीक्षक अपनी व्यक्तिगत विचारधारा से विपरीत विचारधारा की श्रेष्ठ कृति को सराहे या उसकी निंदा करे?
८. रचनाकार समीक्षक और समीक्षक रचनाकार हो सकता है या नहीं?
९. साहित्य समग्र समाज के कल्याण हेतु है या केवल सर्वहारा वर्ग के अधिकारों का घोषणापत्र है?
***
त्रिभंगी छंद:
*
ऋतु फागुन आये, मस्ती लाये, हर मन भाये, यह मौसम।
अमुआ बौराये, महुआ भाये, टेसू गाये, को मो सम।।
होलिका जलायें, फागें गायें, विधि-हर शारद-रमा मगन-
बौरा सँग गौरा, भूँजें होरा, डमरू बाजे, डिम डिम डम।।
२१-३-२०१३
***
मुक्तिका:
हुई होली, हो रही, होगी हमेशा प्राण-मन की
*
भाल पर सूरज चमकता, नयन आशा से भरे हैं.
मौन अधरों का कहे, हम प्रणयधर्मी पर खरे हैं..
श्वास ने की रास, अनकहनी कहे नथ कुछ कहे बिन.
लालिमा गालों की दहती, फागुनी किंशुक झरे हैं..
चिबुक पर तिल, दिल किसी दिलजले का कुर्बां हुआ है.
भौंह-धनु के नयन-बाणों से न हम आशिक डरे हैं?.
बाजुओं के बंधनों में कसो, जीवन दान दे दो.
केश वल्लरियों में गूथें कुसुम, भँवरे बावरे हैं..
सुर्ख लाल गाल, कुंतल श्याम, चितवन है गुलाबी.
नयन में डोरे नशीले, नयन-बाँके साँवरे हैं..
हुआ इंगित कुछ कहीं से, वर्जना तुमने करी है.
वह न माने लाज-बादल सिंदूरी फिर-फिर घिरे हैं..
पीत होती देह कम्पित, द्वैत पर अद्वैत की जय.
काम था निष्काम, रति की सुरती के पल माहुरे हैं..
हुई होली, हो रही, होगी हमेशा प्राण-मन की.
विदेहित हो देह ने, रंग-बिरंगे सपने करे हैं..
समर्पण की साधना दुष्कर, 'सलिल' होती सहज भी-
अबीरी-अँजुरी करे अर्पण बिना, हम कब टरे हैं..
२१-३-२०११
***
हाइकु मुक्तिका
*
आया वसंत, / इन्द्रधनुषी हुए / दिशा-दिगंत..
शोभा अनंत / हुए मोहित, सुर / मानव संत..
*
प्रीत के गीत / गुनगुनाती धूप / बनालो मीत.
जलाते दिए / एक-दूजे के लिए / कामिनी-कंत..
*
पीताभी पर्ण / संभावित जननी / जैसे विवर्ण..
हो हरियाली / मिलेगी खुशहाली / होगे श्रीमंत..
*
चूमता कली / मधुकर गुंजार / लजाती लली..
सूरज हुआ / उषा पर निसार / लाली अनंत..
*
प्रीत की रीत / जानकार न जाने / नीत-अनीत.
क्यों कन्यादान? / 'सलिल' वरदान / दें एकदंत..
***
मुक्तिका
*
खर्चे अधिक आय है कम.
दिल रोता आँखें हैं नम..
पाला शौक तमाखू का.
बना मौत का फंदा यम्..
जो करता जग उजियारा
उस दीपक के नीचे तम..
सीमाओं की फ़िक्र नहीं.
ठोंक रहे संसद में ख़म..
जब पाया तो खुश न हुए.
खोया तो करते क्यों गम?
टन-टन रुचे न मन्दिर की.
रुचती कोठे की छम-छम..
वीर भोग्या वसुंधरा
'सलिल' रखो हाथों में दम..
***
मुक्तक
मौन वह कहता जिसे आवाज कह पाती नहीं.
क्या क्षितिज से उषा-संध्या मौन हो गाती नहीं.
शोरगुल से शीघ्र ही मन ऊब जाता है 'सलिल'-
निशा जो स्तब्ध हो तो क्या तुम्हें भाती नहीं?
२१-३-२०१०
*
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