ओशो और भारतीय रेल
यह बात वर्ष 1960 की है। ओशो इटारसी (म.प्र.) के एक महाविद्यालय में व्याख्यान देने आये थे। व्याख्यान के तुरंत बाद उन्हें ट्रेन से जबलपुर के लिये रवाना होना था। स्टेशन आते समय रास्ते में किसी कारण थोड़ी देर हो गई। कुछ मित्र उन्हें विदा करने रेलवे स्टेशन आये थे। इटारसी बड़ा रेलवे जंक्शन हैं जिसमें कई प्लेटफॉर्म्स हैं, जिनमें फुट ओवरब्रिज से जाना होता है। अभी ओशो फुट ओवरब्रिज पर ही थे, देखा कि उन्हें जिस ट्रेन से जाना था वह चलना शुरू हो गयी है। मित्रों ने कहा भी कि अब नीचे जाने का कोई फ़ायदा नहीं है, जब तक हम नीचे पहुँचेंगे तब तक ट्रेन निकल चुकी होगी। चलिए वापस चलते हैं।
ओशो मुस्कुराए, बोले नहीं, नीचे चल कर देखते हैं। उन्होंने कोई जल्दबाज़ी नहीं दिखाई, अपनी सामान्य चाल से चलते हुए आराम से सीढ़ियाँ उतर कर प्लेटफार्म पर पहुँचे। न चाहते हुए भी मित्र उनके साथ नीचे आये। देखा गाड़ी प्लेटफार्म के बाहर निकल कर अचानक रुक गई और वापस पीछे आने लगी। जिस डिब्बे में ओशो का आरक्षण था वह ठीक वहीं आकर रुका जहां वे खड़े हुए थे। कंडक्टर बाहर आया और बोला, आइये आचार्य जी। मित्रों से विदा ले ओशो गाड़ी में सवार हुए और गाड़ी चल दी। आश्चर्यचकित मित्र देखते ही रह गये।
बाद में इस बारे में किसी ने ओशो से पूछा भी तो उन्होंने हँस कर टाल दिया। कहा कि शायद कुछ ज़रूरी सामान लोड होने से रह गया होगा जिसे लोड करने गाड़ी को पीछे लौटना पड़ा और यह मात्र एक संयोग था कि डिब्बा ठीक मेरे सामने आकर रुका।
दूसरी घटना भी रेलयात्रा से ही संबंधित है।
उन दिनों, 1960 के दशक में सूचनाओं का आदान-प्रदान मुख्यतः पत्राचार द्वारा ही हुआ करता था। भारतीय डाक सेवा भी अपनी श्रेष्ठ कार्यक्षमता के लिए जानी जाती थी। भारत के किसी भी कोने में पत्र केवल ३-४ दिन में पहुँच जाता था।
ओशो के प्रवचन एवम ध्यान के कार्यक्रम देश के विभिन्न हिस्सों में आयोजित हुआ करते थे। ओशो 1-2 सप्ताह पूर्व ही आयोजकों को पत्र द्वारा सूचित कर दिया करते थे कि वे किस ट्रेन से किस समय वहाँ पहुँचेंगे। गुजरात में एक ध्यान शिविर आयोजित था। ओशो ने सप्ताह पूर्व ही आयोजकों को पत्र लिख कर ट्रेन और उसके वहाँ पहुँचने का समय सूचित कर दिया।
आयोजक मित्रों को पत्र पढ़ कर हैरानी हुईं, ओशो ने जिस ट्रेन का नाम लिखा था और उसके पहुँचने का जो समय लिखा था वह उस ट्रेन के नियत समय से मेल नहीं खाता था। ख़ैर, नियत दिन पर आयोजक मित्र उस ट्रेन के नियत समय पर उन्हें लेने स्टेशन पहुँचे। स्टेशन पहुँच कर पता चला कि ट्रेन कुछ देर से चल रही हैं। बाद में घोषणा हुई कि और लेट हो गई हैं। मित्रों के विस्मय का तब ठिकाना न रहा जब ट्रेन ठीक उसी समय पहुँची जो ओशो ने अपने पत्र में लिखा था। ओशो के ट्रेन से उतरते ही मित्रों का पहला प्रश्न यही था कि आपको कैसे पता था कि आज ट्रेन इस समय यहाँ पहुँचेगी?
ओशो हँसने लगे और बोले मुझे कुछ पता नहीं था वह गलती से लिख दिया होगा। भूल तो सभी से हो जाती है।
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