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शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

शिशु गीत सलिला : 7 संजीव 'सलिल'

शिशु गीत सलिला : 7
संजीव 'सलिल'
*

 61. फल
 



मेहनत का मिलता है फल,
कोशिश होती सदा सफल।
पौधा कली पुष्प मिलते-
तब ही मिलता उनको फल।।
काम आज का आज करो,
किसने देखा बोलो कल?

'सलिल' निरंतर बहता है 
झरना नदिया बन कलकल।।

*
62. नदी 




नदी न रुकती, बहती है,
हर मौसम चुप सहती है।
पानी मत गंदा करना-
सुनो तुम्हीं से कहती है।।
बारिश में उफनाती है,

माटी गिरती, ढहती है।
वृक्ष लगाओ किनारे पर-
स्वच्छ-शांत तब रहती है।।
*
63. तालाब


 

सभी का मन लुभाता है,
भरा तालाब में पानी।
कमल के फूल मन मोहें-
न पाटो, है ये नादानी।।

नहीं गहराई में जाना,
किनारे ही नहाना है।
बने हों घाट पर मंदिर-
वहीं सर को झुकाना है।।
*
64. झरना



धीरे-धीरे आता है,
फिर यह चाल बढ़ाता है।
कूद शिखर से गड्ढे में-
हँसता है, मस्ताता है।
लहरों-भँवरों को संग ले
पत्थर से टकराता है।
बैठ किनारे मौन सुनो-
गीत प्रीत के गाता है।।
*
65. सागर
 



सारी दुनिया की गागर,
यह विशाल नीला सागर।
किसने रंग दिया नीला?
यह लहरों का जलसा घर?


मछली, मगरमच्छ रहते,
नहीं किसी से कुछ कहते।
तूफानों को लेते झेल-
हर  कठिनाई मिल सहते।
*
66. मछली 




मछली पानी में भाती,
हाथ लगाओ डर जाती।
पानी को करती है साफ़-
बाहर निकले मर जाती।
*
67. बंदर
 



बंदर खेल दिखाता है,
सबको खूब रिझाता है।
दिख जाए फल अगर इसे-
खाने को ललचाता है।।
*
68. बंदरिया
 



पहने लाल घघरिया है,
नाची खूब बंदरिया है।
बच्चे बजा रहे ताली-
बंदर बना सँवरिया है।।
*
69. मुर्गा
 



सूरज जब उग आता है,
मुर्गा झट जग जाता है।
प्यारे बच्चों जग जाओ-
जमकर बांग लगता है।।
*
70. तितली
 



बगिया में जब खिली कली,
झूम-नाच खेले तितली।
भँवरे चाचा थाम रहे-
सम्हली, फिसली फिर सम्हली।।
*


चिंतन कण: विवेकानंद वाणी

चिंतन कण: विवेकानंद वाणी




 





गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

divyanarmada.blogspot.in: विमर्श: नारी प्रताड़ना का दंड? संजीव 'सलिल'

divyanarmada.blogspot.in: विमर्श: नारी प्रताड़ना का दंड? संजीव 'सलिल': विचार-विमर्श नारी प्रताड़ना का दंड? संजीव 'सलिल' * दिल्ली ही नहीं अन्यत्र भी भारत हो या अन्य विकसित, विकासशील या पिछड़े देश, भा...

विमर्श: नारी प्रताड़ना का दंड? संजीव 'सलिल'

विचार-विमर्श नारी प्रताड़ना का दंड? संजीव 'सलिल'

*
दिल्ली ही नहीं अन्यत्र भी भारत हो या अन्य विकसित, विकासशील या पिछड़े देश, भाषा-भूषा, धर्म, मजहब, आर्थिक स्तर, शैक्षणिक स्तर, वैज्ञानिक उन्नति या अवनति सभी जगह नारी उत्पीडन एक सा है. कहीं चर्चा में आता है, कहीं नहीं किन्तु इस समस्या से मुक्त कोई देश या समाज नहीं है.

फतवा हो या धर्मादेश अथवा कानून नारी से अपेक्षाएं और उस पर प्रतिबन्ध नर की तुलना में अधिक है. एक दृष्टिकोण 'जवान हो या बुढ़िया या नन्हीं सी गुडिया, कुछ भी हो औरत ज़हर की है पुड़िया' कहकर भड़ास निकलता है तो दूसरा नारी संबंधों को लेकर गाली देता है.

यही समाज नारी को देवी कहकर पूजता है यही उसे भोगना अपना अधिकार मानता है.  

'नारी ने जनम दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाज़ार दिया' यदि मात्र यही सच है तो 'एक नहीं दो-दो मात्राएँ नर से भारी नारी' कहनेवाला पुरुष आजीवन माँ, बहन, भाभी, बीबी या कन्या के स्नेहानुशासन में इतना क्यों बंध जाता है 'जोरू का गुलाम कहलाने लगता है.

स्त्री-पीड़ित पुरुषों की व्यथा-कथा भी विचारणीय है.

घर में स्त्री को सम्मान की दृष्टि से देखनेवाला युअव अकेली स्त्री को देखते ही भोगने के लिए लालायित क्यों हो जाता है?

ऐसे घटनाओं के अपराधी को दंड क्या और कैसे दिया जाए. इन बिन्दुओं पर विचार-विमर्श आवश्यक प्रतीत होता है. आपका स्वागत है.

बुधवार, 19 दिसंबर 2012

ग़ज़ल धर्मेन्द्र कुमार सिंह ‘सज्जन’

ग़ज़ल
धर्मेन्द्र कुमार सिंह ‘सज्जन’
*
बरगदों से जियादा घना कौन है?
किंतु इनके तले उग सका कौन है?

मीन का तड़फड़ाना सभी देखते
झील का काँपना देखता कौन है?

घर के बदले मिले खूबसूरत मकाँ
छोड़ता फिर जहाँ में भला कौन है?

लाख हारा हूँ तब दिल की बेगम मिली
आओ देखूँ के अब हारता कौन है?

प्रश्न इतना हसीं हो अगर सामने
तो फिर उत्तर में नो कर सका कौन है?
***

गीत : रंग जितने फ़िसल तूलिका से गिरे राकेश खंडेलवाल

गीत :

रंग जितने फ़िसल तूलिका से गिरे

राकेश खंडेलवाल 
 
*
स्वप्न की वीथियों में उगे फूल बन
रंग जितने फ़िसल तूलिका से गिरे
फिर अवनिका-पटल चित्र करने लगा
बिम्ब बनते हुये जब गगन से झरे
 

कोई सूरजमुखी में बदल रह गया
कोई करने लगा भोर पीताम्बरी
पोर पर आ कोई हल्दिया बन गया
कोई पुरबाईयाँ कर गया केसरी
हँस पड़ा कोई भुजपाश ले गुलमुहर 
कोई कचनार सा खिलखिलाने लगा
और थामे हुये रश्मियाँ धूप की
कोई आ झील पर झिलमिलाने लगा
 

बाँह  मौसम ने फ़ैलाई जितनी अधिक
दृश्य आ आके उतने ही उनमें भरे
 

वाखरों पर नयन की खड़े ओढ़ ला
मौसमों की गली से नये आवरण
सावनी एक मल्हार पहने हुये
फिर कली पर बुने कुछ नये आभरण
तीर नदिया के जलते हुये दीप की
वर्तिका की तरह नृत्य करते हुये
झोलियों में संजोये हुये बिम्ब को
चित्र दहलीज पर कर के रखते हुये
 

नभ सलिल से जो रजताभ कण चुन लिये
वाटिकाओं की ला वीथियों में धरे
 

वेणियों पर उतर आ गये रूप की
मोतियों में गुँथे,मोगरे से सजे
और हथफूल को केन्द्र करते हुये
कंगनों को पकड़ घुँघरुओं से बजे
टेसुई आभ होकर अलक्तक बने
फिर हिना से हथेली रचाने लगे
पांखुरी पांखुरी हो बिछे सेज पर
और फ़िर कामनायें सजाने लगे


हो गए शिल्प नूतन पुन: आस की
चेतना में घुली कल्पना के परे 
__._,_.___

नवगीत: अब तो अपना भाल उठा... संजीव 'सलिल'


नवगीत:
अब तो अपना भाल उठा...
संजीव 'सलिल'
*
बहुत झुकाया अब तक तूने 
अब तो अपना भाल उठा...
*
समय श्रमिक!
मत थकना-रुकना.
बाधा के सम्मुख
मत झुकना.
जब तक मंजिल
कदम न चूमे-
माँ की सौं
तब तक
मत चुकना.

अनदेखी करदे छालों की
गेंती और कुदाल उठा...
*
काल किसान!
आस की फसलें.
बोने खातिर
एड़ी घिस ले.
खरपतवार 
सियासत भू में-
जमी- उखाड़
न न मन-बल फिसले.
पूँछ दबा शासक-व्यालों की
पोंछ पसीना भाल उठा...
*
ओ रे वारिस
नए बरस के.
कोशिश कर
क्यों घुटे तरस के?
भाषा-भूषा भुला
न अपनी-
गा बम्बुलिया
उछल हरष के.
प्रथा मिटा साकी-प्यालों की
बजा मंजीरा ताल उठा...
*

गजल ये रात लगती लुटी लुटी सी मैत्रेयी अनुरूपा


गजल 

ये रात लगती लुटी लुटी सी 
मैत्रेयी अनुरूपा
*
ये चांदनी के उदास गेसू
ये रोशनी कुछ बुझी बुझी सी
ये
लड़खड़ाती खमोशियां हैं
ये रात लगती लुटी लुटी सी
 
जो
बाद मुद्दत के तेरे लब पे
है आई मंजूरियत मगर क्यों
मुझे है लगता कही है तुमने
बस इक इबारत रटी रटी सी
 
वो
इत्र भीगे रुमाल से भी
हसीन मुझको लगी है नेमत
जो तुमने लब से छुआ के फ़ैकी
वो एक धज्जी कटी फ़टी सी
 
ये
पेच नजरों मे बस गये हैं
उसी का शायद असर है ऐसा
जो सामने है मुजस्समे सी
वो शै भी लगती बँटी बँटी सी
______________________
maitreyee anuroopa <maitreyi_anuroopa@yahoo.com>
_____________._,_.___

मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

चित्र पर कविता: विश्राम

चित्र पर कविता:
विश्राम  

इस स्तम्भ की अभूतपूर्व सफलता के लिये आप सबको बहुत-बहुत बधाई. एक से बढ़कर एक रचनाएँ अब तक प्रकाशित चित्रों में अन्तर्निहित भाव सौन्दर्य के विविध आयामों को हम तक तक पहुँचाने में सफल रहीं हैं. संभवतः हममें से कोई भी किसी चित्र के उतने पहलुओं पर नहीं लिख पाता जितने पहलुओं पर हमने रचनाएँ पढ़ीं. 

चित्र और कविता की कड़ी में संवाद, स्वल्पाहार,
दिल-दौलत, प्रकृति, ममता,  पद-चिन्ह, जागरण,  परिश्रम, स्मरण, उमंग, सद्भाव, रसपान आदि के पश्चात् प्रस्तुत है नया चित्र  विश्राम . ध्यान से देखिये यह नया चित्र और रच दीजिये एक अनमोल कविता.

Photo: bhool gaye is chaar paai ka maza aur  neem ki chhanv 

चिर - विश्राम
एस. एन. शर्मा कमल 

वीराने में पडी हुई जाने कब से एकाकी खाट
कभी न आने वाले की शायद जोह रही है बाट

सुधियों की कितनी गाँठे अंतस में लिए हुए है
सुख दुःख की कितनी घरिओं के आंसू पिए हुए है

इसके बोझिल ताने बाने में कितनी पीर समाई है
कितने सपने कितने निश्वासों की लिए गवाही है

झेल रही है बियाबान में अब सूनेपन का अभिशाप
किसी परित्यकता दमयंती सी मूर्र्छित तरुतले खाट

_________________________________________

खटिया माई 

प्रणव भारती 


       कुछ सहमी  हो,कुछ झुंझलाई ,
       चुप -चुप सी हो खटिया माई ।
       खबर मुझे है चढकर तुम पर, 
       बच्चों ने की हाथापाई ।
                 तुम भी हल्ला मचा रही थीं,
                  चीख और चिल्ला रहींथी।
                  झूठ न बोलो खटिया रानी ,
                  उन्हें डांट  तुम पिला रही थीं । 
        फिर उनके जाने पर हो चुप ,
        गुमसुम सी हो,हो तुम गुपचुप।
        कल सब बच्चे फिर आयेंगे,
        हँसेंगे और तुम्हें हँसायेंगे । 
                  घने वृक्ष की इस छाया में ,
                  तुम भी ज़रा करो विश्राम,
                  जब तक बच्चे फिर आ करके,
                  न करदें तुमको हैरान।।

________________________________
 संतोष भाऊवाला
 
खेत में बिछी एक अकेली खटिया,
कर रही श्रमिक से मन की बतिया
 
माथे पर तेरे चिलक रहे श्रम कण
पड़ रही सूरज की तिरछी किरण 
 
भोर की पहली किरण संग जाग 
किया पुरे दिन तूने अथक परिश्रम 
 
अब वटवृक्ष की घनी छाँव तले 
घडी भर ले ले तनिक विश्राम
 
होगा तुझमे नव् ऊर्जा का  संचार 
मै भी इतरा लूंगी निज भाग्य पर 
 __________________________
   

पढ़िये... गढ़िए... आगे बढ़िए...

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कहो गर्व से हिन्दू हैं-- सचिन श्रीवास्तव

कहो गर्व से हिन्दू हैं--
सचिन श्रीवास्तव 

अक्सर हम हिन्दू लोगों को बरगलाने के लिए..... हमें यह सिखाया जाता है कि.... "हिन्दू" शब्द..... हमें.... मुस्लिमों या फिर कहा जाए तो.... अरब वासियों  ने दिया  है...!

दरअसल... ऐसी बातें करने के पीछे कुछ स्वार्थी तत्वों का मकसद यह रहा होगा कि..... हिन्दू ..... अपने लिए "हिन्दू" शब्द  सुनकर..... खुद में ही अपमानित  महसूस करें..... और, हिन्दुओं में आत्मविश्वास नहीं आ पाए..... फिर.... हिन्दुओं को खुद पर गर्व करने या ..... दुश्मनों के विरोध की क्षमता जाती रहेगी ...!

और, बहुत दुखद है कि..... समुचित ज्ञान के अभाव में.... बहुत सारे हिन्दू भी... उसकी ऐसी ... बिना सर-पैर कि बातों को सच मान बैठे हैं..... और, खुद को हिन्दू कहलाना पसंद नहीं करते हैं..... जबकि, सच्चाई इसके बिल्कुल ही उलट है...!

हिन्दू शब्द.... हमारे लिए... अपमान का नहीं बल्कि ... गौरव की बात है...... और, हमारे प्राचीन ग्रंथों एक बार नहीं.... बल्कि, बार-बार "हिन्दू शब्द" गौरव के साथ  प्रयोग हुआ हुआ है....!

वेदों और पुराणों में हिन्दू शब्द का सीधे -सीधे उल्लेख इसीलिए नहीं पाया जाता है कि.... वे बेहद प्राचीन ग्रन्थ हैं.... और, उस समय हिन्दू सनातन धर्म के अलावा और कोई भी धर्म नहीं था...... जिस कारण.... उन ग्रंथों में .. सीधे -सीधे ... हिन्दू शब्द का उपयोग बेमानी था..!

साथ ही.... वेद .. पुराण जैसे ग्रन्थ.... मानव कल्याण के लिए हैं.... हिन्दू-मुस्लिम-ईसाई ... जैसे क्षुद्र सोच उस समय नहीं थे.... इसीलिए ... उन ग्रंथों में .... हिन्दू शब्द पर ज्यादा दवाब  नहीं दिया है... लेकिन प्रसंगवश .. हिन्दू और हिन्दुस्थान शब्द का उल्लेख वेदों में भी है..!

@@@@  ऋग्वेद  में एक ऋषि का नाम "सैन्धव" था जो बाद में "हैन्दाव/ हिन्दव" नाम से प्रचलित हुए... जो बाद में अपभ्रंश   होकर ""हिन्दू"" बन गया..!

@@@@  साथ ही.... ऋग्वेद के ही ब्रहस्पति अग्यम में हिन्दू शब्द इस प्रकार आया है...
हिमालयं समारभ्य यावत इन्दुसरोवरं ।
तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते ।।
( अर्थात....हिमालय से इंदु सरोवर तक देव निर्मित देश को हिन्दुस्थान कहते हैं )

@@@@  सिर्फ वेद ही नहीं ... बल्कि..  मेरु तंत्र ( शैव ग्रन्थ) में हिन्दू शब्द का उल्लेख इस प्रकार किया गया है....
'हीनं च दूष्यत्येव हिन्दुरित्युच्च ते प्रिये'
( अर्थात... जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं)

@@@@  इतना ही नहीं.... लगभग यही मंत्र यही मन्त्र शब्द कल्पद्रुम में भी दोहराई गयी है.....
'हीनं दूषयति इति हिन्दू '
( अर्थात... जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं)

@@@@  पारिजात हरण में"हिन्दू" को कुछ इस प्रकार कहा गया है |
हिनस्ति तपसा पापां दैहिकां दुष्टम
हेतिभिः शत्रुवर्गं च स हिंदुरभिधियते ।।

@@@@  माधव दिग्विजय में हिन्दू शब्द इस प्रकार उल्लेखित है ....
ओंकारमंत्रमूलाढ ्य पुनर्जन्म दृढाशयः ।
गोभक्तो भारतगुरूर्हिन्द ुर्हिंसनदूषकः ॥
( अर्थात ... वो जो ओमकार को ईश्वरीय ध्वनि  माने... कर्मो पर विश्वास  करे, गौ पालक रहे... तथा .... बुराइयों को दूर रखे.... वो हिन्दू है )

@@@ और तो और.... हमारे ऋग्वेद (८:२:४१) में 'विवहिंदु' नाम के
राजा का वर्णन है.... जिसने 46000 गाएँ  दान में दी थी..... विवहिंदु बहुत पराक्रमी और दानी राजा था..... और,  ऋग वेद मंडल 8  में भी उसका वर्णन है|

#### सिर्फ इतना ही नहीं.... हमारे धार्मिक ग्रंथों के अलावा भी अनेक जगह पर हिन्दू शब्द उल्लेखित है....

*** (656 -661  ) इस्लाम के चतुर्थ खलीफ़ा अली बिन अबी तालिब लिखते हैं कि ....... वह भूमि जहां पुस्तकें सर्वप्रथम लिखी गईं, और जहां से विवेक तथा ज्ञान की‌ नदियां प्रवाहित हुईं, वह भूमि हिन्दुस्तान है। (स्रोत : 'हिन्दू मुस्लिम कल्चरल अवार्ड ' - सैयद मोहमुद. बाम्बे 1949.)

***  नौवीं सदी  के मुस्लिम इतिहासकार अल जहीज़ लिखते हैं..... "हिन्दू ज्योतिष शास्त्र में, गणित, औषधि विज्ञान, तथा विभिन्न विज्ञानों में श्रेष्ठ हैं।
मूर्ति कला, चित्रकला और वास्तुकला का उऩ्होंने पूर्णता तक विकास किया है।
उनके पास कविताओं, दर्शन, साहित्य और नीति विज्ञान के संग्रह हैं।

भारत से हमने कलीलाह वा दिम्नाह नामक पुस्तक प्राप्त की है।

इन लोगों में निर्णायक शक्ति है, ये बहादुर हैं। उनमें शुचिता, एवं शुद्धता के सद्गुण हैं।

मनन वहीं से शुरु हुआ है।

@@@@ इस तरह हम देखते हैं कि.... इस्लाम के जन्म से हजारों-लाखों साल पूर्व से हिन्दू शब्द प्रचलन में था.... और, हिन्दू तथा हिन्दुस्थान शब्द ... पूरी दुनिया में आदर सूचक एवं सम्मानीय शब्द था...!

साथ ही इन प्रमाणों से बिल्कुल ही  स्पष्ट है कि.... हिन्दू शब्द ना सिर्फ हमारे प्राचीन ग्रंथों में उल्लेखित है ... बल्कि... हिन्दू  धर्म और संस्कृति  हर क्षेत्र में उन्नत था.... साथ ही , हमारे पूर्वज काफी बहादुर थे और उनमे निर्णायक शक्ति थी... जिस कारण विधर्मियों की..... हिन्दू और हमारे हिंदुस्तान के नाम से ही फट जाती थी..... जिस कारण उन्होंने ये अरब वाली कहानी फैला रखी है...!

इसीलिए मित्रों..... सेकुलरों और धर्मभ्रष्ट अवं पथभ्रष्ट लोगों कि नौटंकियों पर ना जाएँ..... और " गर्व से कहो, हम हिन्दू हैं " ।

जय महाकाल...!!!

(स्रोत : हिन्दू ग्रन्थ एवं द विज़न आफ़ इंडिया - पेज 226  )

हम हिन्दू लोगों को बरगलाने के लिए सिखाया जाता है कि "हिन्दू" शब्द हमें मुस्लिमों या अरबवासियों ने दिया है. इसके पीछे कुछ स्वार्थी तत्वों का मकसद यह रहा होगा कि हिन्दू अपने लिए "हिन्दू" शब्द सुनकर खुद में ही अपमानित महसूस करें और हिन्दुओं में आत्मविश्वास नहीं आ पाए  फिर  हिन्दुओं को खुद पर गर्व करने या दुश्मनों के विरोध की क्षमता जाती रहेगी. बहुत दुखद है कि समुचित ज्ञान के अभाव में बहुत सारे हिन्दू ऐसी बिना सर-पैर कि बातों को सच मान बैठे हैं  और खुद को हिन्दू कहलाना पसंद नहीं करते जबकि, सच्चाई इसके बिल्कुल ही उलट है.

हिन्दू शब्द हमारे लिए अपमान का नहीं बल्कि गौरव की बात है और हमारे प्राचीन ग्रंथों एक बार नहीं  बल्कि, बार-बार "हिन्दू शब्द" गौरव के साथ प्रयोग हुआ हुआ है. वेदों-पुराणों में हिन्दू शब्द का सीधे-सीधे उल्लेख इसीलिए नहीं पाया जाता है कि वे बेहद प्राचीन ग्रन्थ हैं, उस समय हिन्दू सनातन धर्म के अलावा और कोई भी धर्म नहीं था जिस कारण उन ग्रंथों में हिन्दू शब्द का उपयोग बेमानी था. वेद-पुराण जैसे ग्रन्थ मानव कल्याण के लिए हैं, हिन्दू-मुस्लिम-ईसाई जैसी क्षुद्र सोच उस समय नहीं थी इसलिए उन ग्रंथों में हिन्दू शब्द पर ज्यादा दवाब नहीं दिया है लेकिन प्रसंगवश हिन्दू और हिन्दुस्थान शब्द का उल्लेख वेदों में भी है!

-- ऋग्वेद में एक ऋषि का नाम "सैन्धव" था जो बाद में "हैन्दाव/ हिन्दव" नाम से प्रचलित हुए जो बाद में अपभ्रंश होकर ""हिन्दू"" बन गया..!

--ऋग्वेद के ही ब्रहस्पति अग्यम में हिन्दू शब्द इस प्रकार आया है...
हिमालयं समारभ्य यावत इन्दुसरोवरं ।
तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते ।।
( अर्थात हिमालय से इंदु सरोवर तक देव निर्मित देश को हिन्दुस्थान कहते हैं )

-- मेरु तंत्र ( शैव ग्रन्थ) के अनुसार 'हीनं च दूष्यत्येव हिन्दुरित्युच्च ते प्रिये'- जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं.

-- शब्द कल्पद्रुम में 'हीनं दूषयति इति हिन्दू ' जो अज्ञानता-हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहा गया है.

-- पारिजात हरण में"हिन्दू" को कुछ इस प्रकार कहा गया है-
हिनस्ति तपसा पापां दैहिकां दुष्टम
हेतिभिः शत्रुवर्गं च स हिंदुरभिधियते ।।

-- माधव दिग्विजय में हिन्दू शब्द इस प्रकार उल्लेखित है ....
ओंकारमंत्रमूलाढ ्य पुनर्जन्म दृढाशयः ।
गोभक्तो भारतगुरूर्हिन्द ुर्हिंसनदूषकः ॥
अर्थात जो ओमकार को ईश्वरीय ध्वनि माने, कर्मो पर विश्वास करे, गौ पालक हो, बुराइयाँ दूर रखे, हिन्दू है.

-- ऋग्वेद (८:२:४१) में 'विवहिंदु' नाम के राजा का वर्णन है जिसने 46000 गाएँ दान में दी थी विवहिंदु बहुत पराक्रमी और दानी राजा था और, ऋगवेद मंडल 8 में भी उसका वर्णन है|

-- धार्मिक ग्रंथों के अलावा भी अनेक जगह पर हिन्दू शब्द उल्लेखित है....

*** (656 -661 ) इस्लाम के चतुर्थ खलीफ़ा अली बिन अबी तालिब लिखते हैं वह भूमि जहां पुस्तकें सर्वप्रथम लिखी गईं, और जहां से विवेक तथा ज्ञान की‌ नदियां प्रवाहित हुईं, वह भूमि हिन्दुस्तान है। (स्रोत : 'हिन्दू मुस्लिम कल्चरल अवार्ड ' - सैयद मोहमुद. बाम्बे 1949.)

*** नौवीं सदी के मुस्लिम इतिहासकार अल जहीज़ लिखते हैं..... "हिन्दू ज्योतिष शास्त्र  गणित, औषधि विज्ञान, तथा विभिन्न विज्ञानों में श्रेष्ठ हैं।मूर्ति कला, चित्रकला और वास्तुकला का उऩ्होंने पूर्णता तक विकास किया है। उनके पास कविताओं, दर्शन, साहित्य और नीति विज्ञान के संग्रह हैं। भारत से हमने कलीलाह वा दिम्नाह नामक पुस्तक प्राप्त की है। इन लोगों में निर्णायक शक्ति है, ये बहादुर हैं। उनमें शुचिता, एवं शुद्धता के सद्गुण हैं। मनन वहीं से शुरु हुआ है।

-- इस्लाम के जन्म से हजारों-लाखों साल पूर्व से हिन्दू शब्द प्रचलन में था और हिन्दू तथा हिन्दुस्थान शब्द पूरी दुनिया में आदर सूचक एवं सम्मानीय शब्द थे.

(स्रोत : हिन्दू ग्रन्थ एवं द विज़न आफ़ इंडिया - पेज 226 )

वेद: महान आविष्कारों के स्त्रोत- दिव्य प्रकाश श्रीवास्तव

वेद: महान आविष्कारों के स्त्रोत-1 (Great Inventions of Vedic India)

दिव्य प्रकाश श्रीवास्तव 

We owe a lot to the Indians, who taught us how to count, without which no worthwhile scientific discovery could have been made.
-Albert Einstein
हम भारतियों के प्रति हमेशा कृतज्ञ रहेंगे जिन्होंने हमें गणना करना सिखायाउसके बिना किसी वैज्ञानिक आविष्कार का होना संभव नहीं था।
-अलबर्ट आइन्स्टीन 
If there is one place on the face of earth where all dreams of living men have found a home from the very earliest days when man began the dream of existence, it is India.
-French scholar Romain Rolland
अगर दुनिया में ऐसा कोई स्थान हैजिसे मानव के उन सारे सपनों का घर कहा जाये,जो सपने मानव बहुत शुरुआत से अस्तित्व के लिए देखा करता थातो वो स्थान है भारत।
-फ़्रांसीसी विद्वान् रोमेन रोलां
हड़प्पा-मोहनजोदारो सभ्यता के साथ इतिहास में जिस सभ्यता का वर्णन आता है वो है आर्य-सभ्यता। आर्य मूल भारतीय थे या फिर मध्य एशिया से आये थेये अभी भी शोध का विषय बना हुआ है। लेकिन आर्यों की मौलिकता के बारे में महर्षि दयानंद सरस्वती के द्वारा प्रस्तुत किये गए तथ्य काफी तर्कसंगत लगते हैं। ये वो समय था जब यूरोपीय देशों के लोग जंगलों में घुमन्तु की जिन्दगी जी रहे थेपूरी दुनिया अज्ञानता के अँधेरे में सोयी हुयी थीउस समय भारत के लोग ऐसी कार्यशालाओं का व्यापार (Trade of workshops) चला रहे थे जिसमें धातु-निष्कर्षण (Mettalurgy), वस्त्र रंजन (Dyeing of Fabric), औषधि-निर्माण (Drugs Formation), शल्य-चिकित्सा (Surgery) जैसे काम हुआ करते थे।
आर्यों के जीवन का मूल आधार थे 'वेद'.



वेदों को सिर्फ किसी धर्म के धर्म-ग्रन्थ मान लेना बहुत बड़ी गलती होगी।
वेदों की रचना उस समय हुयी थी जब विभिन्न सम्प्रदाय हुआ ही नहीं करते थे।
उस समय केवल एक धर्म था सनातन-मानवता का धर्म।
वेद किसी संप्रदाय-विशेष को आध्यात्मिक ज्ञान देने मात्र के ग्रन्थ नहीं हैं।
वेदों में Physics, Chemistry, Mathematics, Cosmology, Biology आदि के विषयों पर अथाह सिद्धांत लिखे हुए हैं।
सवाल ये उठता है की अगर वेदों में इतना ज्ञान है तो ये जग जाहिर क्यों नहीं होता। इसका कारण है वेदों की अत्यंत जटिल भाषा। वेदों में लिखे टेक्स्ट्स को decode करना कितना मुश्लिक काम है ये बात दैनिक भाष्कर की 2012 की इस खबर से साफ़ हो जाता है-Pre-Vedic India knew about DNA: Indore scholar . आज वेदों को decode  करने के लिए कई संस्थाएं काम कर रही हैं , उनमें से इन्दौर के एक विद्वान् ने वेदों में DNA के वर्णन को सफलतापूर्वक decode करने का दावा किया है। लेकिन वैदिक भारत के कई विद्वानों ने वेदों के बहुत से श्लोकों को समझ कर उन पर न सिर्फ अपनी भाषा में संहितायें लिखी बल्कि उनको व्यावहारिकता में भी लाया।
यहाँ पर मैं वैदिक भारत द्वारा किये गए महान वैज्ञानिक आविष्कारों और उनके आविष्कारकों में से कुछ का वर्णन कर रहा हूँ।

600 ईसा पूर्व (600 BC) कनद ऋषि ने परमाणु(Atom) का सिद्धांत दिया था। कणद का कथन है कि-
"सभी वस्तुएं परमाणु(Atoms) से बनी हुयी हैं, विभिन्न परमाणु आपस में जुड़ कर अणु(Molecule) का निर्माण करते हैं"
उन्होंने ये कथन John Dalton से 2500 वर्ष पहले दिया था।
इसके आगे कणद परमाणुओं की Dimensions, गतियों और आपस में रासायनिक अभिक्रियाओं(Chemical Reactions)  का वर्णन करते हैं।

Acharya Kanad: Atomic Theory was given in 600 BC

गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत (Law of Gravity):

400-500 ईसा पूर्व भाष्कराचार्य ने अपनी किताब सूर्य-सिद्धांत में ये कथन लिखा था-
" वस्तुयों का पृथ्वी पे गिरने का कारण, पृथ्वी द्वारा उन पे लगने वाला आकर्षण बल है। पृथ्वी में ये क्षमता उसके अत्यधिक गुरुत्व (Mass) के कारण आती है।"
उन्होंने ये कथन Sir Issac Newton से लगभग 1200 वर्ष पहले दिया था।
सूर्य सिद्धांत में भाष्कराचार्य लिखते हैं-
"पृथ्वी, ग्रह, चंद्रमा, सूर्य आदि इस गुरुत्वाकर्षण के कारण अपने कक्षक में बने रहते हैं"

Bhashkaracharya: Law of Gravitation was given in 500 BC

10वीं सदी में नागार्जुन ने अपनी किताब रसरत्नाकर Rasaratnanakara में बहुत से धातुकर्म विधियों के बारे में लिखा है जैसे:
  • विभिन्न धातुओं जैसे सोना,चांदी,तम्बा और टिन का उनके अयस्कों (Ores) से निष्कर्षण।
  • द्रवीकरण(liquefaction),आसवन(distillation),उर्ध्वपातन(sublimation) आदि विधियों का वर्णन।
  • विभिन्न रस (Liquid Metal) जैसे पारा (Mercury) का निर्माण।
धातुकर्म के क्षेत्र में भारत 5000 वर्षों से अधिक समय तक विश्व-गुरु रहा है।
सोने के आभूषण 3000 BC से पहले उपलब्ध थे।कांसे और पीतल के मिले बर्तनों का अनुमान 1300 BC  लगाया गया है।
जस्ता (जिंक) को इसके अयस्क (Ore) से आसवन विधि द्वारा निकालना भारत में 400 BC में ज्ञात था, European William Campion से 2000 वर्ष पहले।
ताम्बे की मुर्तियों की आयु का अनुमान 500 BC लगाया गया है।
दिल्ली में एक लौह स्तम्भ है जो 400 BC पुराना है और उस पर आज तक जंग या क्षय का कोई निशान नहीं है।

Nagarjuna: Invention of Mettalurgy

Bouddhayan: Great mathematician of 600 BC

पाइथागोरस प्रमेय या बौद्धायन प्रमेय (Pythagorean Theorem or Baudhayana Theorem):

ईसा से 6 सदी पूर्व बौद्धायन ने अपनी किताब बौद्धायन सुल्ब सूत्र में Baudhayana Sulba Sutra में ये कथन लिखा है:
dīrghasyākṣaṇayā rajjuḥ pārśvamānī, tiryaḍam mānī,
किसी समकोण त्रिभुज में दीर्घ-अक्ष(Hypotenuse) का वर्ग, रज्जू(Base) और पार्श्ववमिनी(Hight) के वर्ग के योग के बराबर होता है।

पाई π का मान (The Value of Pi π):

बौद्धायन ने वृत की परिधि और व्यास का अनुपात 3 बताया था।लेकिन उनके बाद 499 AD में आर्यभट्ट ने π के मान की गणना दशमलव के 4 स्थान तक की (3.1416).
825 AD में एक अरबी गणितज्ञ मुहम्मद इब्ना मूसा ने ये कहा कि ये मान भारतियों के द्वारा दिया गया है।

शून्य की अवधारणा (The Concept of 'Zero'):

Zero की अवधारणा शुरूआती संस्कृत लेखों में 'शून्य' के रूप में आती है और पिंडाला के 'चंदा: सूत्र' (200 AD) में भी समझायी गयी है। भ्रह्मगुप्त के 'ब्रह्म फुता सिद्धांत' (400 AD) में शून्य को विस्तार से समझाया गया है। भारतीय गणितज्ञ भाष्कराचार्य ने सिद्ध किया की X को 0 से विभाजित करने पर अनंत (Infinty) आता है जिसको फिर कितना ही विभाजित करें अनंत ही रहता है।
लेकिन शून्य के महत्व के आविष्कार का श्रेय आर्यभट्ट को जाता है।
Aryabhatt: Great Mathemeticial, who has given Concept of Decimal and Zero

दशमलव प्रणाली (Decimal System):


दशमलव के आविष्कार का भी मुख्य श्रेय आर्यभट्ट को दिया जाता है। उन्होने हर गणना का आधार  10 को बनाया जिस से बड़ी से बड़ी संख्या भी 10 की घात के रूप में आसानी से व्यक्त की जाने लगीं।
अंग्रेजी का शब्द Geometry संस्कृत के शब्द 'ज्यामिति' से आया हुआ है।जिसका अर्थ होता है 'पृथ्वी का मापन'.
इसी तरह से अंग्रेजी का शब्द 'Trignometry' भी संस्कृत के शब्द 'त्रिकोणमिति' से बना है।
युक्लिड का निर्माण 300 BC में Geometry के अविष्कार के बाद हुआ जबकि भारत में ज्यामिति का उद्भव 1000 BC में ही आग वेदियों (fire altars) के निर्माण से हो गया था  "चतुर्भुज में वर्ग का निर्माण".
सूर्य सिद्धांत में त्रिकोणमिति का प्रखर वर्णन किया है, जो कि 1200 साल बाद यूरोप में 1600 इसवी में Briggs द्वारा दिया गया।
भाष्कराचार्य ने 1150 AD में अपनी प्रसिद्ध किताब 'सिद्धांता-सिरोमनलिखी,जिसके चार भाग हैं:
  • लीलावती(Arithmetic)
  • गोलाध्याय (Celestial Glob)
  • बीजगणित (Treatise of Algebra)
  • ग्रहगणित (Mathematics of Planets)
भारत से ही sinƟ funtion 8वीं सदी में अरब में पहुँचा। भारत में sinƟ को 'ज्या' कहते थे जो कि अरब में Jiba / Jyb में अनुवादित हो गया। अरबी में Jaib शब्द का मतलब होता है महिला-पोशाक का गले के पास से खुला होना, Jaib शब्द का लैटिन में अनुवाद हुआ Sinus, जिसका अर्थ होता है पोशाक में तह या Curve. और इस प्रकार अंत में Sine (sinƟ) शब्द बना।

10 की घात 53 की गणना (Raising 10 to the Power of 53!):

 आज की गणित में 10 की अधिकतम घात के लिए उपसर्ग (Prefix) है- 'D' दस की घात 30 (from Greek Deca).
जबकि 100 BC  पहेल भारतियों ने 10 की घात 53 तक के लिए सटीक नामों का आविष्कार कर लिया था।
1= एकं =1, 10 था दशकं , 100 था  शतं  (10 to the power of 10), 1000 tha सहस्रं  (10 power of 3), 10000 था  दशासहस्रम  (10 power of 4), 100000 था  लक्शः  (10 power of 5), 1000000 था दशालक्शः (10 power of 6), 10000000 था कोटिः  (10 power of 7)……विभुतान्गामा  (10 power of 51), तल्लाक्षनाम  (10 power of 53).

word-numeral system, अंक को 10 के गुणांक के रूप में लिखते हुए आगे बढ़ता है। जैसे संख्या 60799 को संस्कृत में इस तरह लिखते हैं-
"सस्टीम सहस्र सप्त सतानी नवाटीम नवा"
(sastim (60), shsara (thousand), sapta (seven) satani (hundred), navatim (nine ten times) and nava (nine))
इस system के नियम इस प्रकार है:
1.शुरू के नौ अंकों के नाम-eka, dvi, tri, catur, pancha, sat, sapta, asta, nava
2.अगले नौ अंको का समूहउपर्युक्त प्रत्येक अंक को 10 से गुना करके प्राप्त होता है-dasa, vimsat, trimsat, catvarimsat, panchasat, sasti, saptati, astiti, navati
3. इसी प्रकार अगला समूह 10 के अगले गुणांक के रूप में प्राप्त होता है-satam sagasara, ayut, niyuta, prayuta, arbuda, nyarbuda, samudra, Madhya, anta, parardha….
प्राचीन भारतीय वो पहले लोग थे जिन्होंने सूर्य के Heliocentric System का सुझाव दिया.
उन्होंने  प्रकाश का वेग 1,85,016 miles/sec  परिकलित किया.
उन्होंने पृथ्वी का चन्द्रमा के बीच की दूरी भी परिकलित की- चन्द्रमा के व्यास का 108  गुना.
पृथ्वी और सूर्य के मध्य दूरी का अनुमान लगाया- पृथ्वी के व्यास का 108 गुना.
ये सब बातें महान वैज्ञानिक गैलिलिओ से हजारों साल पहले की हैं.
                   

पृथ्वी को सूर्य-कक्षा में लगाने वाला समय (Time taken for Earth to orbit Sun):

भारतीय गणितग्य भाष्कराचार्य ने अपने निबंध सूर्य-सिद्धांत मेंपृथ्वी द्वारा सूर्य के चारों ओर  एक  चक्कर पूरा करने में लगने वाले समय का दशमलव के नौंवें स्थान तक सही मान बताया (365.258756484 दिन).
भाष्कराचार्य के सैकड़ों वर्ष बाद 5वीं में astronomer Smart ने इसी मान की गणना की।
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हाइकु: ममता शर्मा

हाइकु:
ममता शर्मा
*
मस्त पवन 
मिल खिल  भागी तो 
भीगी सबके रंग 
*
बादल झुका
बातों ही बात बोला 
आना मेरे घर भी 
*
चांदनी खिली 
श्वेत पटल दिखा 
चित्र उकेर सखि
*
सूखी नदिया 
चित्र बने हर सूँ 
दुखी चितेरा 
*
घूमता घन 
क्यों चित्र मिटाता 
हवा रंगीली 
*
सूरज उगता है 
मलती धरती आँखें लाल 
चन्दा  तुम यहाँ 
*
गिरते पीले पात 
मौन की भाषा सुन 
नीरव नीड सुनाता 
*
बादल झुका 
बातों ही बात बोला 
आना मेरे घर भी 
*
गागर भरी 
प्रतिबिम्ब दिखा ज्यूं 
लगी आग चन्दा से 
*
बटोही सुन 
भेज बादल यहाँ 
नाव चले इत भी 
*
दावानल  से 
आशियाने बिखरे 
बरसा बादल तब 
*