जबलपुर में नाटक
डार्केस्ट आवर में चर्चिल के हिन्दी संवाद को विश्वसनीय बनाने वाले
दिव्येन्दु गांगुली की उतार चढ़ाव वाली यात्रा इतनी आसान नहीं रही
नेटफ्लिक्स में इन दिनों एक फिल्म डार्केस्ट आवर (Darkest Hour) देखने वालों की संख्या में अचानक इज़ाफा हो गया है। इसका कारण यह फिल्म अब हिन्दी में डब हो गई। Darkest Hour में गैरी ओल्डमैन ने विंस्टन चर्चिल का किरदार निभाया है, जिसमें मई 1940 में यूके के प्रधानमंत्री के तौर पर उनके शुरुआती अहम दिनों पर फोकस किया गया है, जब उन्हें यह तय करना था कि हिटलर के साथ शांति के लिए बातचीत करें या लड़ें। और आखिर में उन्होंने प्रेरणादायक भाषणों से देश को एकजुट किया, जिसमें मशहूर "हम समुद्र तटों पर लड़ेंगे" वाली लाइन भी शामिल है, जो ब्रिटेन के "सबसे मुश्किल समय" के दौरान उनके पक्के इरादे को दिखाती है। इस रोल के लिए ओल्डमैन को बेस्ट एक्टर का एकेडमी अवॉर्ड मिला, और फिल्म में भारी दबाव के बावजूद उनके साहसी नेतृत्व को दिखाया गया है।
Darkest Hour में चर्चिल की भूमिका के मुख्य पहलू के तौर पर संकट में नेतृत्व, संसद में दिए गए भाषण और फिल्म के अंत में संसद में दिया गया साहसी भाषण महत्वपूर्ण है। गैरी ओल्डमैन ने शानदार परफॉर्मेंस, जिसमें मेकअप और प्रोस्थेटिक्स शामिल हैं, ने उन्हें काफी तारीफ और ऑस्कर दिलाया। हिन्दी में इसका डब संस्करण लोकप्रिय हो रहा है। चर्चिल के हिन्दी संवाद इतने विश्वसनीय लगते हैं जैसे वे स्वयं या गैरी ओल्डमैन बोल रहे हों। गैरी ओल्डमैन को हिन्दी में डब जबलपुर के दिव्येन्दु गांगुली (दिनपाल गांगुली) ने किया है। दिव्येन्दु गांगुली की लिप-सिंकिंग (lip-syncing) इतनी शानदार है कि महसूस व अनुभव होता है कि हम मूल भाषा में डार्केस्ट आवर को को देख रहे हैं।
दिव्येन्दु गांगुली की जबलपुर से मुंबई तक की यात्रा इतनी आसान नहीं रही। उनका जीवन औपन्यासिक है।
जबलपुर में स्वतंत्रता के बाद से आठवें दशक तक रंगकर्म की दो दुनिया थी। शहर में मुख्य धारा में मराठी व हिन्दी का रंगकर्म उफान भरता था तो शहर के पूर्वी हिस्से में घमापुर से रक्षा संस्थानों तक बंगला रंगकर्म का दबदबा था। यह भी सत्य है कि हिन्दी रंगकर्म पर बंगला रंगकर्म का ज्यादा असर था। हिन्दी नाटकों के निर्देशक श्याम खत्री मराठी व बंगला के मूल नाटकों से प्रभावित थे लेकिन उन्होंने कल्पनाशीलता दिखाते हुए हिन्दी नाटकों को स्थापित कर रहे थे। शहर के पूर्वी हिस्से में रामलीला के साथ जात्रा का मंचन समान रूप से होता था। रामलीला के कलाकार जात्रा से रंगकर्म की बारीकियां सीख रहे थे। रामलीला के कलाकार धीरे धीरे जात्रा में भी भाग लेने लगे। दरअसल उस समय बंगाल से कई परिवार जबलपुर आजीविका की तलाश में यहां आए। यहां उन्होंने सुरक्षा संस्थानों के साथ रेलवे और बर्न कंपनी में नौकरी करना शुरू कर दी। इन बंगला परिवार के साथ वहां की संस्कृति जबलपुर पहुंची। बंगाल से आए अधिकांश परिवार ने नौकरी करने वाले संस्थानों के निकट ही अपना बसेरा बनाया। जबलपुर में घमापुर से डिफेंस संस्थानों के बीच के क्षेत्र बाई का बगीचा, शीतलामाई, कांचघर, सतपुला, व्हीकल फेक्टरी, गन केरिज फेक्टरी, रांझी, आर्डनेंस फेक्टरी व खमरिया में बंगला के साथ पूर्वी उत्तरप्रदेश व बिहार के परिवार रहवासी बने। उत्तर प्रदेश व बिहार के परिवार पर बंगला संस्कृति का प्रभाव था।
कुछ इसी तरह व्योमकेश गांगुली ने ढाका से देशांतर गमन करते हुए जबलपुर पहुंचे। वे बी. एससी (टेक) पास थे और ढाका की ढाकेश्वरी कपड़ा मिल में काम किया करते थे। उनकी डिग्री इंजीनियरिंग के समकक्ष थी। बंगला समाज में इस डिग्री को बड़े सम्मान से देखा जाता था। व्योमकेश गांगुली एक अच्छे अभिनेता होने के साथ उत्कृष्ट गायक भी थे। ढाका में नौकरी के साथ शौकिया रूप से नाटकों में काम करने लगे। लोगों के कहने पर वे कलकत्ता की फिल्म इंडस्ट्री पहुंच कर अभिनय के मौके तलाश करने लगे। उनके पिता उस समय जबलपुर की सेंट्रल जेल में डिप्टी जेलर थे। अंग्रेजों के समय जेलर थे और परिवार व कुल की चिंता उनके लिए सर्वोच्च थी। जब उन्हें बेटे व्योमकेश की फिल्म लाइन में जाने की बात की जानकारी हुई तो वे खफ़ा हुए। पिता ने पुत्र को फटकार हुए कहा कि वे पिता व कुल का नाम डुबा रहे हैं। पुत्र को जबर्दस्ती जबलपुर बुलवा कर विवाह के बंधन में बांध दिया। जबलपुर आ कर व्योमकेश इंजीनियर से क्लर्क बन गए। जबलपुर की बिजली वितरण कंपनी मार्टिन एन्ड बर्न कंपनी में बाबू बन कर उनकी उनकी दिनचर्या सुबह से शाम तक ऑफिस में ही सिमट गई।
जबलपुर के कांचघर क्षेत्र में रहने वाले व्योमकेश गांगुली के दिल में नाटक हिलोरे भरता रहता था। समय मिलने पर वे घर में नाटक करते थे। मोहल्ले में साथियों के साथ बंगला नाटकों को मंचित करते थे। दुर्गोत्सव में उनका नाटकों का मंचन करने का उत्साह देखते ही बनता था। उस समय तक उनके बड़े पुत्र दिव्येन्दु की प्राथमिक शिक्षा रेलवे सराय स्कूल में शुरू हो चुकी थी। घर में प्यार से दिव्येन्दु को टूटु पुकारा जाता था। टूटु को अपने पिता को नाटक करते देखना अच्छा लगता था। पुत्र पिता के चरणों में चलने लगा। पिता के दोस्त आईटीसी में कार्यरत रवीन्द्र भट्टाचार्य थे। लोग उन्हें प्यार से काकू कहा करते थे। पिता के साथ दिव्येन्दु को रवीन्द्र भट्टाचार्य के रूप में एक गुरू भी मिल गया। दिव्येन्दु को जब भी मौका मिलता वे अपने गुरू से अभिनय से ले कर संवाद अदायगी तक सब कुछ जानने के लिए उत्कंठित रहते। मिडिल स्कूल की पढ़ाई के लिए दिव्येन्दु का दाखिला सेंट थामस में करा दिया गया। उस समय तक दिव्येन्दु फैंसी ड्रेस में भाग लेने लगे, लेकिन उनकी इच्छा तो नाटक में अभिनय करने की थी। उसी समय दुर्गोत्सव में उनहोंने मोहल्ले में एक बाल नाटक में अभिनय करने का मौका मिल ही गया। पिता ने जब उनको नाटक में अभिनय करते देखा तो वे बहुत खुश हुए। छोटे बच्चों के एक समूह ने उस समय ‘स्वप्न खुड़ो’ नाम के एक नाटक को मंचित किया। दिव्येन्दु ने नाटक की रिहर्सल से ले कर मंचन तक हर क्षण का आनंद उठाया। जब उनका मेकअप किया जा रहा था तब तो वे इतने आनंदित थे और उस समय उनको देखने वाले हर व्यक्ति को महसूस हो रहा था कि जैसे दिव्येन्दु को पूरी जिंदगी की खुशी ही मिल गई हो। दुर्गोत्सव में बंगला नाटक के साथ हिन्दी नाटकों के मंचन की परम्परा शुरू हुई। नवमी के दिन हिन्दी नाटकों का मंचन किया जाने लगा। ये हिन्दी नाटक मूल बंगला नाटकों के हिन्दी रूपांतरण हुआ करते थे।
दिव्येन्दु गांगुली ने हायर सेकेंडरी की पढ़ाई पूरी करने के बाद राबर्टसन कॉलेज में एडमिशन ले लिया। उसी समय उनकी मित्रता गौरीशंकर यादव से हुई। गौरीशंकर उनके मोहल्ले में ही रहा करते थे। दोनों नाटकों से जुड़ा रहना चाहते थे। उनको दुर्गोत्सव में होने वाले और साल में एक बार होने वाले नाटकों के मंचन से संतुष्टि नहीं मिलती थी। दिव्येन्दु ने दुर्गोत्सव में बंगला नाटकों को हिन्दी में अनुवाद कर उनको मंचित करना शुरू कर दिया था। वे चाहते थे कि हिन्दी में भी बंगला नाटकों की तरह नाटक मंचित होने चाहिए। उस समय हिन्दी स्क्रिप्ट मिलने की समस्या थी। दिव्येन्दु ने सोचा कि बेहतर है कि बंगला नाटकों का हिन्दी में अनुवाद किया जाए और उन्हें ही मंचित किया जाए। दिव्येन्दु व गौरीशंकर यादव नाटकों में ही आगे बढ़ना चाहते थे। कई बार गौरीशंकर यादव दिव्येन्दु से कहते थे कि डगर कठिन है लेकिन हम लोग हौंसला नहीं खोएंगे। दोनों को आगे की राह दिखाने वाले के रूप में धर्मराज जायसवाल मिल गए। धर्मराज जायसवाल का प्रतिभा कला मंदिर परिवार नियोजन और अन्य सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए मध्यप्रदेश के गांव गांव में घूम घूम कर नाटकों का मंचन करता था। धर्मराज जायसवाल के साथ मनोहर महाजन जैसे कई नवयुवक व कॉलेज विद्यार्थी जुड़े हुए थे। नाटकों को मंचित करते हुए घूमना और खाने पीने की चिंता से मुक्त हो जाने की मुहिम में दिव्येन्दु व गौरीशंकर यादव भी जुड़ गए। दोनों का विचार यह भी था कि इस तरह वे नाटकों की मुख्य धारा में भी जुड़ जाएंगे।
दिव्येन्दु गांगुली की इसी दौरान जबलपुर की प्लाजा टॉकीज के निकट रहने वाले सुशील बंदोपाध्याय के साथ जुड़ाव की शुरूआत हुई। सुशील बंदोपाध्याय की ख्याति एक अच्छे ज्योतिष के रूप में थी, लेकिन नाटकों का मंचन करने में वे सबसे आगे रहते थे। जबलपुर के करमचंद चौक पर स्थित सिटी बंगाली क्लब में बंगला नाटकों का मंचन सक्रियता से होता था। यहां दिव्येन्दु को गुरू रवीन्द्र भट्टाचार्य व सुशील बंदोपाध्याय ने पूरा सहयोग दिया। सुशील बंदोपाध्याय ने बंगला से बाहर जा कर हिन्दी में भी नाटक किए। उस समय श्याम खत्री हिन्दी रंगमंच के सबसे सक्रिय निर्देशक के रूप में खूब नाटकों का मंचन कर रहे थे। दिव्येन्दु गांगुली की ख्वाहिश थी कि वे भी श्याम खत्री निर्देशित किसी नाटक में अभिनय करें। दिव्येन्दु को श्याम खत्री के नाटकों की डिजाइनिंग, सेट, स्वाभाविक संवाद और निर्देशन आकर्षित करता था। आखिरकार श्याम खत्री ने दिव्येन्दु को अपने ‘विषपायी’ में एक भूमिका सौंप दी। यह नाटक उस समय जबलपुर का सबसे हिट नाटक रहा। विषपायी के कई शो हाउसफुल गए। दिव्येन्दु का तब तक एक सुदर्शन व्यक्तित्व निखर चुका था। ऐसा माना जाता है कि वे जबलपुर रंगमंच के सर्वकालिक सुदर्शन अभिनेता रहे। दिव्येन्दु की एक खासियत उनकी गहराई ली हुई दमदार आवाज़ भी थी।
श्याम खत्री के नौकरी के सिलसिले में जबलपुर से बाहर जाने पर उनके कलाकारों ने सत्तर के दशक में कचनार संस्था गठित कर नाटकों का मंचन शुरू किया। कचनार का गठन इस वायदे के साथ किया गया था कि प्रत्येक माह एक नए नाटक का मंचन किया जाएगा। उस दौरान कचनार संस्था ने अपनी सक्रियता से जबलपुर में हलचल मचा दी। यही वह समय था जब दिव्येन्दु गांगुली नाटकों के अनुवाद के प्रति आकर्षित हुए। उन्होंने बंगला के नाटकों का हिन्दी अनुवाद शुरू किया। उस समय उनकी उम्र महज 21 या 22 वर्ष थी। बंगला नाटक इराव मानुष का हिन्दी में 'ये भी इंसान है' और उत्ताल तरंग का हिन्दी में 'ज्वार भाटा' नाम से रूपांतरण किया। इन दोनों नाटकों में दिव्येन्दु गांगुली ने अभिनय भी किया। नाटकों में उनके साथ उस समय के मशहूर अभिनेता कुमार किशोर भी अभिनय करते थे। कुमार किशोर की विशेषता यह थी कि वे किसी भी बंगला नाटक को देख कर पूरी रात भर में उसकी हिन्दी स्क्रिप्ट तैयार कर लेते थे। कुमार किशोर ने रमेन दत्ता निर्देशित बंगला नाटक रक्ते सआ धान को देख कर हिन्दी में ‘खून में बोई धान’ की स्क्रिप्ट एक रात भर में लिखी थी। दिव्येन्दु बंगला नाटकों के हिन्दी रूपांतरण को मिल रही सफलता से उत्साहित हुए। उन्होंने शैलेश गुहा नियोगी के शताब्दी गान का हिन्दी रूपांतरण किया। इसके बाद वे अजितेश बंदोपाध्याय के बंगला नाटकों के प्रति आकर्षित हुए। अजितेश बंदोपाध्याय ने चेखव के Swan Song का बंगला में अनुवाद किया था। इस बंगला अनुवाद को दिव्येन्दु गांगुली ने हिन्दी में 'वो दिन रंग बिरंगे' नाम से रूपांतरित किया। यह हिन्दी रूपांतरण इतना लोकप्रिय हुआ कि इसकी स्क्रिप्ट अभी तक नाट्य समूह के बीच मंचन के लिए घूमती रहती है। इसे रेडियो नाटक के रूप में भी खूब प्रस्तुत किया गया। जबलपुर में लक्ष्मेन्द्र चोपड़ा इसको प्रोड्यूस करते थे। दिव्येन्दु गांगुली ने अजितेश बंदोपाध्याय के एक बंगला नाटक का 'तम्बाकू के दुष्परिणाम' नाम से रूपांतरण किया था, जो कि रेडियो नाटक के रूप में लोकप्रिय हुआ। उन्होंने बंगला नाटक ‘तृतीय कंठ’ का हिन्दी अनुवाद किया। इस नाटक को जबलपुर के रंगमंच में सफलता के साथ प्रस्तुत किया गया। इस नाटक में मुख्य भूमिका कुमार किशोर ने निभाई थी और कंठ के रूप में कामता मिश्रा व दिव्येन्दु गांगुली की आवाज़ें थीं। यह एक प्रायोगिक नाटक था।
दिव्येन्दु गांगुली का बंगला नाटकों के हिन्दी रूपांतरण के साथ मंच पर अभिनय की सक्रियता भी बनी रही। उन्होंने अपने नाट्य गुरू रवीन्द्र भट्टाचार्य से नाटकों को एडिट करना सीखा। डा. शंकर शेष के नाटक फंदी को दिव्येन्दु ने एडिट कर के प्रस्तुत किया। वर्ष 1974 में दिव्येन्दु गांगुली और प्रभात मित्रा ने मिलकर जबलपुर में एक नाट्य संस्था 'अनुराग' बनाई। उसी समय दिव्येन्दु गांगुली, कामता मिश्रा, गौरीशंकर यादव, कुमार किशोर, प्रभात मित्रा, आर. खान व सुरेश बाथरे के विचार में जबलपुर नाट्य संघ के गठन की बात आई। जबलपुर में नाट्य गतिविधि जोरों पर थीं। मिलन संस्था त्रिभाषीय लघु नाट्य प्रतियोगिता का आयोजन करता था, जिसमें हिन्दी, बंगला व मराठी भाषा के नाटकों का मंचन होता था। इस प्रतियोगिता की अवधारणा इलाहाबाद नाट्य प्रतियोगिता की ही तरह की थी। 8 व 9 फरवरी 1975 को जबलपुर जिला नाट्य संघ द्वारा प्रथम नाट्य महोत्सव का आयोजन महाराष्ट्र हाई स्कूल के मनोहर प्रेक्षागृह के हर्षें रंगमंच पर किया गया। दिव्येन्दु गांगुली ने 'अनुराग' संस्था की ओर से इस नाट्य महोत्सव में 'वो दिन रंग बिरंगे' की प्रस्तुति दी।
दिव्येन्दु गांगुली ‘वो दिन रंग बिरंगे’ की प्रस्तुति को ले कर काफ़ी उत्तेजित थे। वे स्वयं रजनी चटर्जी और प्रभात मित्रा कालीनाथ की भूमिका में थे। रवीन्द्र भट्टाचार्य ने निर्देशन में पूरी जान लगा दी थी। नाटक का पूरा ऑडियो आधुनिकतम माने जाने वाले कैरव्ज स्टूडियो में तैयार किया गया। मन्नूलाल पुजारी जैसे जबलपुर के निर्देशक मेकअप करने को तैयार हो गए थे। बैक स्टेज में संगीतज्ञ बसंत तिमोथी, सोहन पांडे राजेश तिवारी, आकाशवाणी में उद्घोषक रहे जितेन्द्र महाजन, सुभाष पात्रो जैसे गुणी लोग थे। अलखनंदन जैसे निर्देशक बैक स्टेज में थे। ‘अनुराग’ की पूरी टीम नाटक के मंचन को ले कर उतावली थी। उसी समय जबलपुर रंगमंच के दो बड़े कलाकार राजेन्द्र दुबे व मिर्जा अजहर बेग का असामयिक निधन हो गया। जबलपुर की रंग संस्थाएं व रंगकर्मी ऐसे समय में नाट्य महोत्सव का आयोजन करने से हिचक रहे थे। आम राय बन रही थी कि नाट्य महोत्सव को स्थगित कर दिया जाए। नाट्य महोत्सव के स्थगित होने की जानकारी से दिव्येन्दु गांगुली लगभग निराश हो गए। उन्हें महसूस हुआ कि नाट्य मंचन को ले कर जो रफ़्तार बनी थी वह भविष्य में रह पाएगी कि नहीं। काफ़ी जद्दोजहद के बाद अंत में सब ने यह समाधान निकाला कि नाट्य महोत्सव को राजेन्द्र दुबे व मिर्जा अजहर बेग को समर्पित कर नाटकों का मंचन किया जाए।
वो दिन रंग बिरंगे का मंचन हुआ। दर्शकों को रजनी चटर्जी की भूमिका में दिव्येन्दु गांगुली का अभिनय और नाटक का कथ्य दोनों बहुत पसंद आया। सत्तर के दशक के हिसाब से नाटक की विषयवस्तु बिल्कुल नई थी। एक कलाकार जीवन संध्या में अपने अतीत को याद करता है। नाटक के माध्यम से कलाकार ने समाज से कई सवाल उठाए थे। इस नाट्य महोत्सव में दिव्येन्दु गांगुली ने विश्वभावन देवलिया निर्देशित ‘हयवदन’ में भागवत की भूमिका निभाई थी। नाटक में उस समय जबलपुर रंगमंच के बड़े कलाकार गोविंद मिश्रा, कुमार किशोर, कामता मिश्रा, गौरीशंकर यादव, प्रभात मित्रा, सिंधु गडकरी, पुष्पा श्रीवास्तव ने अभिनय किया था। बाल कलाकारों में मधुसूदन नागराज, अरूणा काले, निधि द्विवेदी थीं। हयवदन की विशिष्टता सतीश तिवारी का संगीत था। नाटक में आभा तिवारी ने सितार, तेजराज मावजी ने सेक्साफोन क्लारीनेट, रत्नाकर कुंडले ने वायलिन और अल्हाद पंडित ने तबले पर ऐसा संगीत रचा था जिसकी नाट्य प्रस्तुतियों में कल्पना नहीं की जा सकती। श्याम श्रीवास्तव ने बन आई सोन चिरैया, उजले से घोड़े पे होके सवार, चंदन डुलिया बैठी रे दुल्हनियां व तन मन को बांधे क्यों सिर्फ एक देह के साथ जैसे गीत नाटक के लिख दिए। हयवदन में दिव्येन्दु गांगुली ने आंगिक, वाचिक, सात्विक और आहार्य अभिनय के सिद्धांतों को मंच पर प्रस्तुत किया। जबलपुर का रंगकर्म कितना आगे था यह इससे पता चलता है कि 1973 में 20 व 21 अक्टूबर को कचनार संस्था ने मध्यप्रदेश में पहली बार ‘हयवदन’ का मंचन किया था। नाटक का ब्रोशर चौबीस पृष्ठ का था।
उस समय जबलपुर में साहित्य, कला, सांस्कृतिक वातावरण जबर्दस्त था। कलाकारों में अभिनय की होड़ थी तो नाटकों को अन्य भारतीय भाषाओं से हिन्दी में रूपांतरित करने की प्रतिस्पर्धा भी। ज्ञानरंजन के संपादन में पहल का प्रकाशन शुरू हो चुका था। रंगकर्मी रात में एक स्थान पर एकत्रित हो कर पहल में छपी कहानियों या विचारोत्तेजक लेखों का पाठ करते थे और उसे रंगकर्मी शांति से बैठ कर सुन कर उन पर लंबी-लंबी बहसें किया करते थे। ऐसी कई बैठकों का दिव्येन्दु अभिन्न हिस्सा हुआ करते थे। उस दौरान उन्होंने रेडियो नाटक में काम किया। उस समय जबलपुर के सीनियर रेलवे इंस्टीट्यूट में एक रेडियो नाटक को लाउड स्पीकर के जरिए लोगों को सुनाया गया। उस समय जबलपुर आकाशवाणी से रेडियो नाटकों का खूब प्रसारण हुआ।
दिव्येन्दु गांगुली को कॉलेज की पढ़ाई के बाद डिफेंस अकाउंट में नौकरी मिल गई। उस समय डिफेंस अकाउंट में जबलपुर के रंगकर्मी मनोहर कुंभोजकर, अलखनंदन, तपन बैनर्जी, रूद्रदत्त दुबे, हिमांशु राय भी नौकरी किया करते थे। दिव्येन्दु गांगुली ने नौकरी के बाद मिले समय का उपयोग हिन्दी अनुवाद व रूपांतरण में करने लगे। उन्होंने इन कामों में शोध के जरिए विषयवस्तु तो वही रखी लेकिन भाषा को सहज बनाया। इस दौरान दिव्येन्दु ने अलखनंदन लिखित शीर्षकहीन नाटक में भूमिका निभाते हुए उसे निर्देशित भी किया। जबलपुर में आधुनिक नाटकों के मंचन की शुरूआत हो चुकी थी ऐसे समय उन्होंने 1982 में अपना तबादला बंबई करवा लिया। वे पेशेवर तरीके से थिएटर करना चाहते थे। बंबई में वे इप्टा से जुड़ गए। फिल्मों में कुछ अनुभव अच्छे नहीं रहे। टीवी सीरियल राग दरबारी में उन्होंने भूमिका निभाई। बंबई में उनकी मुलाकात जबलपुर के ही मनोहर महाजन से हुई। मनोहर महाजन रेडियो सिलोन से जुड़ कर लोकप्रियता हासिल कर रहे थे। दिव्येन्दु की वॉयसिंग में रूचि थी। मनोहर महाजन ने इस क्षेत्र में उनकी मदद व मार्गदर्शन किया। दिव्येन्दु फिल्म डिवीजन में कमेन्ट्री करने लगे। बंबई में भी उन्होंने बंगला से हिन्दी व अंग्रेजी में रचनात्मक अनुवाद व रूपांतरण किया। विज्ञापन की दुनिया में वॉयसिंग में काम किया। कई फिल्मों में डबिंग की। सुदर्शन व्यक्तित्व के कारण उन्होंने मॉडलिंग भी की। एक डॉक्यूमेंट्री में दिव्येन्दु ने विंस्टल चर्चिल का वॉयस ओवर किया। ब्रुक बांड चाय का कुंभ मेले के दौरान बनाए गए एक विज्ञापन में दादा जी के चरित्र में उनकी आवाज़ के उतार चढ़ाव को विज्ञापन जगत के साथ उस विज्ञापन को देखने वालों ने भी बहुत सराहा।
दिव्येन्दु का अब नाम दिनपाल गांगुली हो चुका है। मुंबई की दुनिया में वे इसी नाम से विख्यात हैं। नाम बदलने की एक कहानी है। बंबई में दिव्येन्दु का नाम हर समय गलत ढंग से लिखा जाता था। नाम गलत लिखने या बोलने से वे परेशान हो गए। दिव्येन्दु का अर्थ चंद्रमा होता है। उन्होंने सोचा कि दिव्येन्दु से वे अपना नाम सूरज के पर्यायवाची दिनपाल में परिवर्तित कर लेते हैं। तब से वे दिव्येन्दु से दिनपाल गांगुली बन गए।
दिव्येन्दु गांगुली ने श्याम बेनेगल द्वारा राज्यसभा टीवी के लिए निर्देशित संविधान फिल्म में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कुछ साल पहले केड्बरि के बंगला संस्करण के विज्ञापन में दिव्येन्दु की आवाज़ का उपयोग एक वृद्ध चरित्र दामोदर के लिए किया गया। वे अभी भी विज्ञापनों की दुनिया, डबिंग, वॉयस ओवर, अभिनय में सक्रिय हैं। इस दुनिया में उनकी बहुत प्रतिष्ठा है। दिव्येन्दु की बेटी सुमिता भी पिता की तरह मनोरंजन इंडस्ट्री में हैं। वे डिस्नेस्टार और कई इस तरह के प्लेटफार्म के लिए अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद व ट्रांसस्क्रिप्ट का काम लगातार कर रही हैं। दामाद फिल्म एडीटर हैं।
व्योमकेश गांगुली की तीसरी पीढ़ी उनके बताए रास्ते पर चल रही है। व्योमकेश गांगुली जब कलकत्ता में एक अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती थे, तब एक उनके एक दर्शक ने देख कर कहा था-‘’अरे यह तो एक्टर व्योमकेश बाबू हैं।‘’ शायद उस समय यह क्षण उनके पिता के लिए कष्ट वाला रहा होगा लेकिन उस वक्त उनके चेहरे पर यह संतुष्टि का भाव था कि मृत्यु के समय उन्हें एक अभिनेता के रूप में पहचाना गया।
आज भी टूटु या दिव्येन्दु या दिनपाल के दिल में जबलपुर धड़कता है। उन्हें याद आता है कि वे कैसे झुंड में घंटों खड़े हो कर दोस्तों व रंगकर्मियों के साथ मालवीय चौक, श्याम टॉकीज, शहीद स्मारक में अपना समण् बिताते थे। वे लोग देर रात कैसे नाटकों और पात्रों को ले कर बहस किया करते थे। जबलपुर उनको अपनी ओर खींचता रहता है। वे गुरू पूर्णिमा के दिन अपने गुरू रवीन्द्र भट्टाचार्य और जबलपुर को याद करते हैं। जब मौका मिलता है दिव्येन्दु मुंबई से जबलपुर दौड़ कर चले आते हैं। वे कोई मौका चूकना नहीं चाहते।

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