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सोमवार, 12 जनवरी 2026

चित्रगुप्त, कायस्थ, दूज, कलम, दवात, चित्रांश, भजन, रहस्य, आरती, कथा

चित्रगुप्त जी और कायस्थ

शारदा  माता नमन शत
*
शारदा माता नमन शत, चित्र गुप्त दिखाइए।
सात स्वर सोपान पर पग सात हमको दे चला।
नाद अनहद सुनाकर, भव सिंधु पार कराइए।।
बिंदु-रेखा-रंग से, खेलें हमें लगता भला।।

अजर अक्षर कलम-मसि दे, पटल पर लिखवाइए।
शब्द-सलिला में सकें अवगाह, हों मतिमान हम।
भाव-रस-लय में विलय हों, सत्सृजन करवाइए।।
प्रकृति के अनुकूल जीवन जी सकें, हर सकें तम।।

जग सुखी हो आस मैया, जग सकें हम श्वास हर।
हों सकें हम विश्व मानव, राह वह दिखलाइए।
जीव हर संजीव हो कर साधना परमार्थ कर।।
क्रोध-माया-मोह से माँ! मुक्त कर मुस्काइए।।

साधना हो सफल, आशा पूर्ण, हो संतोष दे।
शांति पाकर शांत हों, आशीष अक्षय कोष दे।।
(सॉनेट शेक्सपीयरी शैली)
१९-१२-२०२१
***
मातृ वंदना
*
ममतामयी माँ नंदिनी, करुणामयी माँ इरावती.
सन्तान तेरी मिल उतारें, भाव-भक्ति से आरती...
*
लीला तुम्हारी हम न जानें, भ्रमित होकर हैं दुखी.
सत्पथ दिखाओ माँ, बनें संतान सब तेरी सुखी..
निर्मल ह्रदय के भाव हों, किंचित न कहीं अभाव हों-
सात्विक रहें आचार, पाएँ अंत में हम सद्गति...
*
कुछ काम जग के आ सकें, महिमा तुम्हारी गा सकें.
सत्कर्म कर आशीष मैया!, सुत-सुताएँ पा सकें..
निष्काम रह, निस्वार्थ रह, सब मोक्ष पाएँ अंत में-
निर्मल रहें मन-प्राण, रखना माँ! सदा निश्छल मति...
*
चित्रेश प्रभु की कृपा मैया!, आप ही दिलवाइए.
जैसा भी है परिवार तेरा, अब नहीं ठुकराइए..
आशीष दो माता! 'सलिल', कंकर से शंकर बन सके-
कर सफल साधना माँ!, पद-पद्म में होवे रति...
*** 
चित्रगुप्त घनाक्षरी
चित्रगुप्त प्रभु कर्म नियंता, कर्मदेव को पुलक मना मन, निश-दिन साँझ-सकारे।
मात-तात प्रभु धर्म नियंता, धर्म देव को हुलस मना मन, पल-पल क्यों न पुकारे।।
ब्रह्म-विष्णु-हर कर्म करें जो, जन्म दे रहे कर जग पालन, तन घर संग भुला रे।
स्वामि मात्र प्रभु आत्म नियंता, मर्म सृष्टि का समझ बता मन, प्रभु महिमा नित गा रे।।
विधान :
१. प्रति पद - वर्ण ३२, यति ११-१२-९ ।
२. प्रतिपद - मात्रा - ४४, यति १६-१६-१२।
३. गणसूत्र - र न भ म ज भ स न न भ ग ग ।
*
गुरु घनाक्षरी :
गरज-गरज घन, बरस-बरस कर, प्रमुदित-पुलकित, कर गुरु वंदन।
गुरुकुल चल मन, गुरु पग धर मन, गुरु सम गुरु कर, कर यश गायन।
धरणि गगन सह, अनिल अनल मिल, सलिल लहर सह, शतदल चंदन।
अठ अठ अठ सत, यति गति लय रस, गुरु वर जल-लभ, सरस समापन।
विधान :
१. प्रति पद - वर्ण ३१, यति ८-८-८-७।
२. प्रतिपद - मात्रा - २८, यति ८-८-८-८।
३. गणसूत्र - ९ नगण + जगण + लघु या ९ नगण + लघु + भगण।
*
***

।। ॐ परात्पर परब्रह्म श्री चित्रगुप्त चालीसा ।। 

दोहा
सुमिर परात्पर ब्रह्म को, विधि-हरि-हर के संग
मातृ त्रयी करिए कृपा, वश में रहे अनंग।०१।
ॐ अनाहद नाद को, श्वास-श्वास उच्चार।
आजीवन सुन सकें हम, मधुकर ध्वनि गुंजार।०२।
सदय वाग्देवी रहें, करें कृपा विघ्नेश। 
ऋद्धि-सिद्धि वरदान दें, हों प्रसन्न कर्मेश।०३।
हों कृपालु अवतार सब, गृह-नक्षत्र सुसंत। 
भू-गौ-भाषा-नर्मदा, छंद-व्याकरण-कंत।०४।
मानव के कल्याण हित, करें काम निष्काम। 
वेद-उपनिषद हृदय रख, पहुँचें प्रभु के धाम।०५।
चौपाई  
जयति-जय निराकार-साकार। तुम्हारी महिमा अपरंपार।०१।
हो अनंत अविनाशी भगवन। संत ॐ कह करते सुमिरन।०२।    
श्यामल अंतरिक्ष में व्याप्त। थे एकाकी ईश्वर आप्त।०३। 
सत न असत, नहिं जन्म-मरण था। तम ने तम का किया वरण था ।०४। 
की इच्छा तब प्रभु ने मन में। गुप्त प्रगट हों मरें न जनमें।०५। 
एक रहा, होना अनेक है। अनहद नादित मात्र एक है ।०६। 
कण-कण चित्रगुप्त अनुप्राणित। निराकार साकार सुभावित ।०७। 
चित्रगुप्त की आदि शक्तियाँ। परा व अपरा दिव्य पत्नियाँ।०८।  
इरावती-नंदिनी कहे जग। जन्म-मरण पथ पर रखकर पग।०९।     
ग्रह-उपग्रह, ब्रह्मांड बनाए। जड़-चेतन प्रभु ने उपजाए।१०।
तीन अंश तब निज प्रगटाए। विधि-हरि-हर त्रय देव कहाए।११।
शारद-उमा-रमा जब पाएँ। जनमें-पालें-नाश कराएँ। १२। 
देव त्रयी के कर्म सुनिश्चित। भूल-चूक हो तो हों शापित।१३।             
लें अवतार धर्म-पालन कर। जाते हैं निज लोक समय पर।१४।
नाद तरंगें अनगिन घूमें। मिलें-अलग हो टकरा झूमें।१५। 
बनतीं कण निर्भार न दिखतीं। मिले भार तब आप विकसतीं।१६।
कण-से कण जुड़ पंचतत्व हों, अंतर्निहित अनंत सत्व हों।१७। 
ऊर्जस्वित मायापति पल-पल। माया-मोह सुमन में परिमल।१८।   
अक्षय अजर अमर अविनाशी। ईश घोर तम दैव प्रकाशी।१९।  
चित्त-वृत्ति सुख-दुख की कारक। निराकार-साकार निवारक।२०। 
लय-गति-नाद तरंग-लहर-रस। कर निर्जीव सजीव रहें बस।२१।
सुप्त चेतना जाग्रत करते। गुप्त चित्त में 'चित्र' विचरते।२२।
अनिल अनल भू गगन सलिल मिल। लोक बनाए सृष्टि सके खिल।२३।
सूक्ष्म जीव फिर 'मत्स्य' हुए प्रभु। 'कच्छप' अरु 'वाराह' हुए विभु।२४।    
पाँच खंड में बाँटी धरती। बीच समुद में लगे तैरती।२५। 
ले 'नरसिंह'-'वामन' अवतार। हरा 'परशु' ने भू का भार।२६।
हुआ सृष्टि विस्तार अनवरत। ब्रह्म नहीं कर सके व्यवस्थित।२७।  
अंकपात तप कर फल पाया। असि-मसि, अक्षर-अंक सुहाया।२८।
बारह मास सदृश बारह सुत। बारह सुतवधु राशि धर्म युत।२९।     
सतयुग में सुखमय संसार। अपना कर वैदिक आचार।३०।
त्रेता सुर-नर्-असुर बढ़े जब। मनमानी की ओर बढ़े तब।३१। 
कर्म-दंड की नीति बनाई। जो बोए सो काटे भाई।३२।
लोभी नृप सौदास कुचाली। चरण-शरण आ शुभ गति पा ली।३३।
पूजन कर श्री राम अवध में। पूर्णकाम हो थके न मग में।३४। 
कान्हा अंकपात में आए। कायथ-धर्म सुशिक्षा पाए।३५।      
काम अकाम करे प्रभु अर्पण। मिले न फल, फिर हो नहिं तर्पण।३६।
काम सकाम भोगती काया। मर जनमे भोगे फल पाया।३७।
कर्म कुशलता योग प्रणेता। गुण-कर्मों से वर्ण विजेता।३८।
हो परमात्म आत्म काया बस। हो 'कायस्थ' जगत गाए जस।३९।    
कर पितु-माँ द्वय कृपा तारिए। भक्ति-मुक्ति दे भ्रम निवारिए।४०।
दोहा 
चित्रगुप्त जी की कृपा, सुर-नर-किन्नर चाह। 
कर्म कुशल हों जगत में, मिले सफलता वाह।०६। 
श्यामल-मनहर छवि-छटा, जहाँ वहीं हैं आप। 
गौर दिव्य ममतामयी, माँ हरतीं संताप।०७।
विष अणु को अमृत करें, हरि-शिव होकर नित्य।
अनल अनिल नभ भू 'सलिल', बसते इष्ट अनित्य।०८। 
चित्रगुप्त प्रभु हों सदय, दें निश-दिन आशीष। 
शीश उठा हम जी सकें, हो मतिमान मनीष।०९।
कर्म-धर्म को जानकर, करें सत्य स्वीकार। 
न्याय-नीति पथ पर चलें, पा-दें ममता-प्यार।१०।
कायथ कुल गौरव कथा, कहे सकल संसार। 
ज्ञान-परिश्रम-त्याग वर, हो भव से उद्धार।।  
।। इति श्री आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' रचित चित्रगुप्त चालीसा संपूर्ण ।। 
०००
चित्रगुप्त भजन सलिला:
००० 
१. शरणागत हम

शरणागत हम चित्रगुप्त प्रभु!
हाथ पसारे आए

अनहद; अक्षय; अजर; अमर हे!
अभय; अमित; अविजित; अविनाशी
निराकार-साकार तुम्हीं हो
निर्गुण-सगुण देव आकाशी
पथ-पग; लक्ष्य-विजय-यश तुम हो
तुम मत-मतदाता-प्रत्याशी
तिमिर मिटाने अरुणागत हम
द्वार तिहारे आए

वर्ण; जात; भू; भाषा; सागर
अनिल;अनल; दिश; नभ; नद ; गागर
तांडवरत नटराज ब्रह्म तुम
तुम ही बृज रज के नटनागर
पैगंबर ईसा गुरु तुम ही
तारो अंश सृष्टि हे भास्वर!
आत्म जगा दो; चरणागत हम
झलक निहारें आए

आदि-अंत; क्षय-क्षर विहीन हे!
असि-मसि-कलम-तूलिका हो तुम
गैर न कोई सब अपने हैं
काया में हैं आत्म सभी हम
जन्म-मरण; यश-अपयश चक्रित
छाया-माया; सुख-दुःख सम हो
द्वेष भुला दो; करुणाकर हे!
'सलिल' पुकारे, आए

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२. चित्रगुप्त का ध्यान धरे जो...

चित्रगुप्त का ध्यान धरे जो
भवसागर तर जाए रे...

जा एकांत भुवन में बैठे,
आसन भूमि बिछाए रे.
चिंता छोड़े, त्रिकुटि महल में
गुपचुप सुरति जमाए रे.
चित्रगुप्त का ध्यान धरे जो
निश-दिन धुनि रमाए रे...

रवि शशि तारे बिजली चमके,
देव तेज दरसाए रे.
कोटि भानु सम झिलमिल-झिलमिल-
गगन ज्योति दमकाए रे.
चित्रगुप्त का ध्यान धरे तो
मोह-जाल कट जाए रे.

धर्म-कर्म का बंध छुड़ाए,
मर्म समझ में आए रे.
घटे पूर्ण से पूर्ण, शेष रह-
पूर्ण, अपूर्ण भुलाए रे.
चित्रगुप्त का ध्यान धरे तो
चित्रगुप्त हो जाए रे...

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३. प्रभु चित्रगुप्त नमस्कार...

प्रभु चित्रगुप्त! नमस्कार
बार-बार है...

कैसे रची है सृष्टि प्रभु!
कुछ बताइए.
आये कहाँ से?, जाएँ कहाँ??
मत छिपाइए.
जो गूढ़ सच न जान सके-
वह दिखाइए.
सृष्टि का सकल रहस्य
प्रभु सुनाइए.
नष्ट कर ही दीजिए-
जो भी विकार है
प्रभु चित्रगुप्त! नमस्कार
बार-बार है...

भाग्य हम सभी का प्रभु!
अब जगाइए.
जयी तम पर उजाले को
विधि! बनाइए.
कंकर-कंकर को कर शंकर
हरि! पुजाइए.
अमिय सम विष पी सकें-
'हर' शक्ति लाइए.
'चित्र' सकल सृष्टि
'गुप्त' चित्रकार है
प्रभु चित्रगुप्त! नमस्कार
बार-बार है...

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४. चित्रगुप्त प्रभु जी की छवि मनोहारी है

चित्रगुप्त प्रभु जी की छवि मनोहारी है, छवि मनोहारी है
सुर, नर, मुनियों ने आरती उतारी है, आरती उतारी है

देवा की जै-जै गुंजाने, मिलकर आज चले हैं
मन-मंदिर में प्रभु को बसाने, घर से हम निकले हैं
पाप-पुण्य के स्वामी, सारी सृष्टि पुजारी है
चित्रगुप्त प्रभु जी की छवि मनोहारी है, छवि मनोहारी है
सुर, नर, मुनियों ने आरती उतारी है, आरती उतारी है

कर में कलम-किताब सुशोभित, गल बैजंती माला
उन्नत ग्रीव, सुदीर्घ बाहु, स्कंध सुदृढ़ सुविशाला
वर्ण व्यवस्था सृजी, सभ्यता देव सँवारी है
चित्रगुप्त प्रभु जी की छवि मनोहारी है, छवि मनोहारी है
सुर, नर, मुनियों ने आरती उतारी है, आरती उतारी है

लिपि-लेखनी से युग-परिवर्तन, मानवता को देन
न्याय, नीति, विधि, कुशल प्रशासन, फैलाया सुख-चैन
हे देवों के देव! सुत 'सलिल' तुम पे बलिहारी है
चित्रगुप्त प्रभु जी की छवि मनोहारी है, छवि मनोहारी है
सुर, नर, मुनियों ने आरती उतारी है, आरती उतारी है

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५. प्रभु चित्रगुप्त को सिर झुकाएँ रे!
० 
प्रभु चित्रगुप्त को सिर झुकाएँ रे!
सिर झुकाएँ, जीवन सफल बनाएँ रे!!
प्रभु चित्रगुप्त को सिर झुकाएँ रे!

प्रभु परमेश्वर की महिमा सुहानी, 
महिमा सुहानी न जाए बखानी
महिमा सुहानी सुन पुण्य पाएँ रे!
प्रभु चित्रगुप्त को सिर झुकाएँ रे!

प्रभु परमेश्वर हैं भाग्य-विधाता, 
भाग्य-विधाता हैं मोक्ष-प्रदाता
भाग्य-विधाता को नित मनाएँ रे!
प्रभु चित्रगुप्त को सिर झुकाएँ रे!

प्रभु कर्मेश्वर हैं पाप-पुण्य लेखक, 
पाप-पुण्य लेखक, माँ अंबे के सेवक
पाप-पुण्य लेखक का जस गुँजाएँ रे!
प्रभु चित्रगुप्त को सिर झुकाएँ रे!

प्रभु गुप्तेश्वर हैं दीनों के बंधु, 
दीनों के बंधु, कृपा के सिंधु
'सलिल' भव सागर से पार पाएँ रे!
प्रभु चित्रगुप्त को सिर झुकाए रे!

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६. तुम हो तारणहार

तुम हो तारणहार,
परम प्रभु! तुम हो तारणहार...

निराकार तुम, चित्र गुप्त है,
निर्विकार गुण-दोष लुप्त है।
काया-माया-छाया स्वामी-
तुम बिन सारी सृष्टि सुप्त है।।
हे अनाथ के नाथ!सदय हो
तम से जग उजियार
तुम हो तारणहार,
परम प्रभु! तुम हो तारणहार...

अनहद नाद तुम्हीं हो गुंजित,
रचते सकल सृष्टि जग-वंदित।
काया स्थित आत्म तुम्हीं हो-
ध्वनि-तरंग, वर्तुल सुतरंगित।।
प्रगट शून्य को कर प्रगटित हो
तुम ही कण साकार
तुम हो तारणहार,
परम प्रभु! तुम हो तारणहार...

बिंदु-बिंदु से सिन्धु बनाते,
कंकर से शंकर उपजाते।
वायु-नीर बनकर प्रवहित हो-
जल-थल-नभ जीवन उपजाते।।
विधि-हरि-हर जग कर्म नियंता-
करो विनय स्वीकार...

पाप-पुण्य के परिभाषक तुम,
कर्मदंड के संचालक तुम।
सत-शिव-सुन्दर के हितचिंतक-
सत-चित-आनंद अभिभाषक तुम।।
निबल 'सलिल' को भव से तारो
कर लो अंगीकार
तुम हो तारणहार,
परम प्रभु! तुम हो तारणहार...

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७. समय महाबलवान...

समय महा बलवान
लगाये जड़-चेतन का भोग...

देव-दैत्य दोनों को मारा,
बाकी रहा न कोई पसारा.
पल में वह सब मिटा दिया जो-
सदियों में था सृजा-सँवारा.
कौन बताये घटा कहाँ-क्या?
कहाँ हुआ क्या योग?
समय महा बलवान
लगाये जड़-चेतन का भोग...

श्वास -आस की रास न छूटे,
मन के धन को कोई न लूटे.
शेष सभी टूटे जुड़ जाएँ-
जुड़े न लेकिन दिल यदि टूटे.
फूटे भाग उसी के जिसको-
लगा भोग का रोग
समय महा बलवान
लगाये जड़-चेतन का भोग...

गुप्त चित्त में चित्र तुम्हारा,
कितना किसने उसे सँवारा?
समय बिगाड़े बना बनाया-
बिगड़ा 'सलिल' सुधार-सँवारा.
इसीलिये तो महाकाल के
सम्मुख है नत लोग
समय महा बलवान
लगाये जड़-चेतन का भोग...

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तुमखों सुमिरूँ चित्रगुप्त प्रभु

तुमखों सुमिरूँ चित्रगुप्त प्रभु, भव सागर सें पार करो।
डगमग डगमग नैया डोले, झटपट आ उद्धार करो।।

तुमईं बिरंचि सृष्टि रच दी, हरि हो खें पालन करते हो।
हर हो हर को चरन सरन दे, सबकी झोली भरते हो।।
ध्यान धरम कछू आउत नइयां, तुमई हमाओ ध्यान धरो।
तुमखों सुमिरूँ चित्रगुप्त प्रभु, भव सागर सें पार करो।।

जैंसी करनी तैंसी भरनी, न्याओ तुमाओ है सच्चो।
कैसें महिमा जानौं तुमरी, ज्ञान हमाओ है कच्चो।।
मैया नंदिनी-इरावती सें, बिनती सिर पर हाथ धरो।
तुमखों सुमिरूँ चित्रगुप्त प्रभु, भव सागर सें पार करो।।

सादर मैया किरपा करके, मोरी मत निरमल कर दें।
काम क्रोध मद मोह लोभ हर, भगति भाव जी भर, भर दें।
कान खैंच लो भले पर पिता, बाँहों में भर प्यार करो।
तुमखों सुमिरूँ चित्रगुप्त प्रभु, भव सागर सें पार करो।।

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९. कहाँ खोजता मूरख प्राणी!...

कहाँ खोजता मूरख प्राणी!
प्रभु हैं तेरे पास में?...

तन तो धोता रोज
न करता मन को क्यों तू साफ़ रे.
जो तेरा अपराधी है
हँस उसको कर दे माफ़ रे.
प्रभु को देख दोस्त-दुश्मन में
तम में और उजास में
कहाँ खोजता मूरख प्राणी!
प्रभु हैं तेरे पास में?...

चित्रगुप्त प्रभु सदा चित्त में
गुप्त, झलक तू देख ले.
आँख मूँदकर मन दर्पण में
कर्मों की लिपि लेख ले.
आया तो जाने के पहले
प्रभु को सुमिर प्रवास में
कहाँ खोजता मूरख प्राणी!
प्रभु हैं तेरे पास में?...

मंदिर मस्जिद काशी-काबा,
मिथ्या माया-जाल है.
वह घाट-घाट कण-कणवासी है,
बीज फूल फल दाल है.
हर्ष-दर्द उसका प्रसाद
कडुवाहट मधुर मिठास में
कहाँ खोजता मूरख प्राणी!
प्रभु हैं तेरे पास में?...

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१०. प्रभु तेरी महिमा अपरंपार

प्रभु तेरी महिमा अपरंपार...

तू सर्वज्ञ व्याप्त कण-कण में,
कोई न तुझको जाने.
अनजाने ही सारी दुनिया
इष्ट तुम्हें ही माने.
तेरी दया-दृष्टि का पाया
कोई न पारावार
प्रभु तेरी महिमा अपरंपार...

हर दीपक में ज्योति तिहारी,
हरती है अँधियारा.
हर परवाना जल जी जाता,
पा तेरा उजियारा.
आये कहाँ से?, जाएँ कहाँ हम??
कैसे हो उद्धार?
प्रभु तेरी महिमा अपरंपार...

कण-कण में है बिंब तुम्हारा,
गुप्त चित्र अनदेखा.
चित्रगुप्त कहती है दुनिया
चित्र-गुप्त अनलेखा.
निराकार हो तुम, लेकिन हम
पूज रहे साकार
प्रभु तेरी महिमा अपरंपार...

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११. प्रभु हैं तेरे पास में...

कहाँ खोजता मूरख प्राणी?, प्रभु हैं तेरे पास में...

तन तो धोता रोज न करता, मन को क्यों तू साफ रे!
जो तेरा अपराधी है, उसको कर दे हँस माफ़ रे..
प्रभु को देख दोस्त-दुश्मन में, तम में और प्रकाश में.
कहाँ खोजता मूरख प्राणी?, प्रभु हैं तेरे पास में...

चित्र-गुप्त प्रभु सदा चित्त में, गुप्त झलक नित देख ले.
आँख मूँदकर कर्मों की गति, मन-दर्पण में लेख ले..
आया तो जाने से पहले, प्रभु को सुमिर प्रवास में.
कहाँ खोजता मूरख प्राणी?, प्रभु हैं तेरे पास में...

मंदिर-मस्जिद, काशी-काबा मिथ्या माया-जाल है.
वह घट-घट कण-कणवासी है, बीज फूल-फल डाल है..
हर्ष-दर्द उसका प्रसाद, कडुवाहट-मधुर मिठास में.
कहाँ खोजता मूरख प्राणी?, प्रभु हैं तेरे पास में...

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१२ जग असार सार हरि सुमिरन...

जग असार सार हरि सुमिरन ,
डूब भजन में ओ नादां मन...

निराकार काया में स्थित, 
हो कायस्थ कहाते हैं.
रख नाना आकार दिखाते, 
झलक तुरत छिप जाते हैं..
प्रभु दर्शन बिन मन हो उन्मन,
प्रभु दर्शन कर परम शांत मन.
जग असार सार हरि सुमिरन, 
डूब भजन में ओ नादां मन...

कोई न अपना सभी पराये, 
कोई न गैर सभी अपने हैं.
धूप-छाँव, जागरण-निद्रा, 
दिवस-निशा प्रभु के नपने हैं..
पंचतत्व प्रभु माटी-कंचन,
कर मद-मोह-गर्व का भंजन.
जग असार सार हरि सुमिरन ,
डूब भजन में ओ नादां मन...

नभ पर्वत भू सलिल लहर प्रभु, 
पवन अग्नि रवि शशि तारे हैं.
कोई न प्रभु का, हर जन प्रभु का, 
जो आए द्वारे तारे हैं..
नेह नर्मदा में कर मज्जन,
प्रभु-अर्पण करदे निज जीवन.
जग असार सार हरि सुमिरन ,
डूब भजन में ओ नादां मन...

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१३. चित्रगुप्त भगवान करूँ गुणगान
चित्रगुप्त भगवान करूँ गुणगान 
दया प्रभु कीजै, विनती मोरी सुन लीजै
.   
जन्म-जन्म से भटक रहे हम 
चमक-दमक में अटक रहे हम 
भवसागर में आन पड़े  
उद्धार हमारा कीजै, विनती मोरी सुन लीजै 
हम हैं याचक तुम हो दाता 
भक्ति अटल दो कर्म विधाता 
मुक्ति पा सकें जन्म चक्र से 
युक्ति बता वह दीजै, विनती मोरी सुन लीजै 
लिपि लेखनी के आविष्कारक 
वर्ण व्यवस्था के उद्धारक  
हे जन गण मन के अधिनायक! 
सब जग तुम पर रीझै, विनती मोरी सुन लीजै 
ब्रह्मा विष्णु महेश तुम्हीं हो 
भक्त तुम ही भक्तेश तुम्हीं हो 
शब्द ब्रह्ममय तन-मन हो प्रभु! 
चरण शरण प्रभु दीजै, विनती मोरी सुन लीजै
.  
विधि-हरि-हर त्रय रहें दयालु 
लक्ष्मी-शारद-उमा  कृपालु 
'सलिल' शरण है जन्म-जन्म से, 
भव से मुक्ति दीजै, विनती मोरी सुन लीजै 

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१४. श्रद्धा सहित प्रणाम करें
श्री चित्रगुप्त के श्री चरणों में 
श्रद्धा सहित प्रणाम करें 
तृष्णा-माया-मोह त्याग कर, 
परमपिता का ध्यान धरें 
लिपि-लेखनी  के आविष्कर्ता 
मानव मन के पीड़ा हर्ता  
कर्म प्रमुख जग, कर्मवीर प्रभु 
नित गुणगान करें
श्री चित्रगुप्त के श्री चरणों में 
श्रद्धा सहित प्रणाम करें  
किए वर्ण स्थापित चार  
हुआ व्यवस्थित सब संसार 
जैसी करनी वैसी भरनी 
मत अभिमान करें 
श्री चित्रगुप्त के श्री चरणों में 
श्रद्धा सहित प्रणाम करें 
है दहेज दानव विकराल 
आरक्षण बन बैठा काल 
दास नहीं, हम सब स्वामी बनकर 
श्रम का मान करें
श्री चित्रगुप्त के श्री चरणों में 
श्रद्धा सहित प्रणाम करें  
हे देवों के देव दयालु 
सदा सलिल पर रहो कृपालु 
पूरी हो हर आस श्वास की  
कर्म महान करें
श्री चित्रगुप्त के श्री चरणों में 
श्रद्धा सहित प्रणाम करें 

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१५. शत-शत वंदन चित्रगुप्त प्रभु
  
शत-शत वंदन चित्रगुप्त प्रभु सादर शीश नवाएँ  हम 
धन्य करें यह जन्म मनुज का कीर्ति तुम्हारी गाएँ हम  
पूर्व जन्म के पुण्य फले तब कायस्थ कुल में जन्म मिला 
कर्म प्रधान विश्व में प्रभु जी पुरुषार्थ बन कमल खिला 
निरासक्त हो क्रम करें हम, मर्म धर्म का जान सकें  
ऐसा दो वरदान राष्ट्र पर जीवन विहँस लुटाएँ हम 
शत-शत वंदन चित्रगुप्त प्रभु सादर शीश नवाएँ  हम  
ऊँच-नीच मिथ्या भ्रम फैला मानव मानव एक समान 
जाति-धर्म पर जो बलि जाए होता जीवन वही महान 
करें लेखनी की उपासना शब्द शक्ति पर दो अधिकार 
ज्ञान दान के पथ पर पग धर जान ब्रह्म को पाएँ हम 
शत-शत बंधन चित्रगुप्त प्रभु 
है दहेज दानव ताकतवर मिलकर इसका अंत करें 
तजें नौकरी बनाकर स्वामी उद्योगों का वरण करें 
बदल रहा है देश काल दो शक्ति हमें हम भी बदलें 
लगन परिश्रम से मंजिल पा जीवन सफल बनाएँ हम 
शत-शत वंदन चित्रगुप्त प्रभु सादर शीश नवाएँ  हम 
बुद्धि विमल हो, भक्ति अटल हो, तव चरणों में ध्यान रहे 
हों  प्रभु! कर्म हमारे ऐसे सदा जगत में मान रहे 
श्रद्धा-सलिल समर्पित कर नित सफल साधना कर पाएँ 
ऐसा दें  वरदान मातृद्वय! काम सभी के आएँ हम 
शत-शत वंदन चित्रगुप्त प्रभु सादर शीश नवाएँ  हम 

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१६. आरती चित्रगुप्त की कीजै 

आरती चित्रगुप्त की कीजै , 
मनवांछित फल प्रभु जी दीजै  
पाप विनाशक कलि-मल-हंता सकल सृष्टि के भाग्य नियंता 
जो आए तेरे चरणों में, मिटे पाप-दुख पीड़ा-चिंता 
धन्य वही जो प्रभु पर रीझै, आरती चित्रगुप्त की कीजै  
लेखनी-लिपि के आदि प्रणेता, तन पर मन के दिव्य विजेता 
भक्ति सहित जो करे स्मरण, पुण्य अमित अर्जित कर लेता 
माया-मोह अहं तज दीजै, आरती चित्रगुप्त की कीजै  
जैसा कर्म वर्ण हो वैसा, जैसा बोओ काटो वैसा 
पाप-पुण्य निष्पक्ष न्याय है, चलता नहीं कपट-बल-पैसा 
सत्कर्मों का घड़ा न छीजै , आरती चित्रगुप्त की कीजै  
धन धरती प्रिय साथ न जाए, माया मोह यहीं रह जाए 
दया-धर्म-उपकार साथ दें, कीर्ति ध्वजा फर फर फहराए  
भक्ति-भाव सलिला में भीजै, आरती चित्रगुप्त कीजै  
जय-जय महिमा न्यारी देव तुम्हारी, दिव्य छटा सुंदर छवि प्यारी 
तुम बिन कहाँ शरण हम पाएँ, विपद सलिल की हर लो सारी 
प्रभु महिमा का अमृत पीजै,आरती चित्रगुप्त की कीजै 

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१७. चरित चित्रगुप्त को 

चरित चित्रगुप्त को सबसे सुहानो, वेदन-पुरानन ने बहुविध बखानो 
श्यामल बरन दयामय आँखें, चंदन तिलक सुशोभित माथे 
मंजुल मूरत लख जगत लुभानो,  वेदन-पुरानन ने बहुविध बखानो  
भुज विशाल, दृढ़ चौड़ी छाती, शांत मनस्वी छवि मन-भाती 
ब्रह्मा लख रह गए ठगानो,  वेदन-पुरानन ने बहुविध बखानो  
हाथ शंख वैजंती माला, धर्मराज बन लोक सँभाला 
पाप-पुण्य सब सच अनुमानो, वेदन-पुरानन ने बहुविध बखानो  
कर्मों की पोथी है प्रभु जी के हाथे, कुछ भी न बनता किसी से छुपाते 
दश दिश में न्याय ध्वजा फहरानो,  वेदन-पुरानन ने बहुविध बखानो  
जो जैसा करता है फल वैसा पाता, तुझको जो पूजे भवसागर तर जाता 
'सलिल शरण नित प्रभु गुन गानो,  वेदन-पुरानन ने बहुविध बखानो 

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१८. शंख-मँजीरा बाजे 
 
शंख-मँजीरा बाजे, चित्रेश विराजे, 
असि-मसि-लिपि त्रय साजे कर्मेश विराजे 
कौन लाए जमदूत पकड़ के?
काहे को लाए जकड़ के, चित्रेश विराजे 
नृप सौदास को लाए पकड़ के, 
पापी को लाए जकड़ के, चित्रेश विराजे 
अत्याचार किए जनगण पर 
खुले नरक के द्वारे, चित्रेश विराजे 
भूल सुधार करी प्रभु पूजा 
पछता, कर्म सुधारे, चित्रेश विराजे
दयानिधान मोक्ष तब दीनो 
तीनों लोक निहारे, चित्रेश विराजे 
भीष्म पितामह हत, क्षत-विक्षत, 
निकरे न प्राण निकारे, चित्रेश विराजे 
करी याद चित्रेश प्रभु की, 
खुले मुक्ति के द्वारे, चित्रेश विराजे  
इच्छा मृत्यु विहँस प्रभु दीनी, 
अंतिम गति सुधारे, चित्रेश विराजे 
'सलिल' शरण नित जय जय गाए  
संझा-दिवस-सकारे, चित्रेश विराजे 

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१९. धन-धन भाग हमारे

धन-धन भाग हमारे, प्रभु द्वारे पधारे 
शरणागत खों तारे, प्रभु द्वारे पधारे 
माटी तन, चंचल अंतर्मन, 
पारस हो प्रभु! कर दो कंचन 
जन-गण नित्य पुकारे, प्रभु द्वारे पधारे 
प्रीत की रीत हमेशा निभाई, 
लाज भगत की सदा बचाई 
कबहुँ न मनुआ बिसारे, प्रभु द्वारे पधारे 
मिथ्या जग की तृष्णा-माया, 
अक्षय प्रभु की अमृत छाया 
'सलिल' प्रभु की जय गा रे, प्रभु द्वार पधारे 

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२०. चित्रगुप्त देव हमारे
पाप हरन खों आए हैं चित्रगुप्त देव हमारे 
पुण्य करन खों आए हैं चित्रगुप्त देव हमारे 
मानव मन में प्रभु का बसेरा
प्रभु का बसेरा अंतर्मन में डेरा 
बिगड़े काज सँवारे, चित्रगुप्त देव हमारे
तो से प्रभु मोरे कछु न छिपत है
कछु न छिपत, हर करम दिखत है 
पतितों खों उद्धारें चित्रगुप्त देव हमारे 
करुना सागर, गुनों के आगर
गुनों के आगर, दया की गागर  
दुष्ट जनों खों मारें चित्रगुप्त देव हमारे
सकल जगत के करम लिखत हैं
करम लिखत हैं, मरम कहत हैं 
भवसागर से तारें चित्रगुप्त देव हमारे
ब्रह्म किए घनघोर तपस्या, 
घोर तपस्या मिटी समस्या
करें कृपा उपकारें चित्रगुप्त देव हमारे
बरन धरम मसि-लिपि सुव्यवस्थित, 
लिपि सुव्यवस्थित सृष्टि व्यवस्थित 
जीवन-जगर सँवारें चित्रगुप्त देव हमारे
'सलिल' तुमाओ ध्यान धरत है 
ध्यान धरत, गुनगान करत है 
सरनागत उद्धारें चित्रगुप्त देव हमारे  

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२१. प्रभु जी के चरणों में
प्रभु जी के चरणों में निश-दिन शीश नवाना 
प्रभु जी की सेवा से भवसागर तर जाना 
प्रभु कर्मेश विमल निर्मल निश्छल दया के सागर 
ब्रह्मा विष्णु महेश तुम्हीं हो, राम तुम्हीं नटनगर 
सचराचर में प्रभु दर्शन से जीवन सफल बनाना 
दीनबंधु प्रभु कृपा के सिंधु, दुष्टों के हैं हंता 
पाप-पुण्य शुभ-अशुभ परखने वाले भाग्य नियंता 
सच्चे मन से जो माँगोगे प्रभु से वह पा जाना 
सत्कर्मों से हो प्रसन्न प्रभु चित्रगुप्त वर देंगे 
सफल साधना हो संतति की,  संकट दूर करेंगे 
खाली झोली हाथ पसारो, झोली भर ले जाना 

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२२. प्रभु! मो पे कृपा करोगे कब

प्रभु! मो पे कृपा करोगे कब 
प्रभु! मोरे मन में बसोगे कब 
मनवा मोरा दर्पण तोरा 
सुंदर छटा दिखा दो 
प्रभु! मन की पीर मिटा दो
प्रभु! मोरी पीर हरोगे कब 
प्यासे नैना नाहीं चैना
श्वास को आस बँधा दो 
प्रभु! जीवन सफल बना दो 
प्रभु! पूरी आस करोगे कब 
अहंकार अज्ञान अहं से 
मुझको मुक्ति दिला दो 
प्रभु! सपना सफल बना दो 
प्रभु! भाव-पार करोगे कब 
कछू न मेरा, जो है तेरा 
तुम ही इसको संभालो 
प्रभु! नैया पार लगा दो 
प्रभु! उपकार करोगे कब

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२३. प्रभु आएँगे आएँगे
प्रभु के दुआरे सच्चे मन से पुकारे 
 प्रभु आएँगे, आएँगे, रूप दिखाएँगे 
प्रभु है कृपालु कृपा करेंगे 
तन की, मन की पीर हरेंगे 
प्रभु के दुआरे चलो हाथ पसारे 
प्रभु आएँगे, आएँगे, झोली भर जाएँगे 
प्रभु को निश-दिन नमन करेंगे 
सुख-दुख जो दें सहन करेंगे 
प्रभु के सहारे चल प्रभु को बुला रे! 
प्रभु आएँगे, आएँगे, आशीष दे जाएँगे 
प्रभु हैं पिता हम नन्हे बच्चे 
नादां-मूरख अकाल के कच्चे 
प्रभु को गुहारें,  पिता राह दिखा रे! 
प्रभु आएँगे, आएँगे, भव पर कराएँगे 

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२४. चित्रगुप्त जी की करें आरती 
चित्रगुप्त जी की करें आरती, तारती 
चित्रगुप्त जी की करें आरती 
चित्रगुप्त जी की कथा है निराली 
कलि में मन वांछित फल देने वाली 
पाप-नाशिनी पुण्य की गंगा 
काटे भवसागर के कर्मों का फंदा
बिगड़े काज सँवारती आरती
चित्रगुप्त जी की करें आरती 
ब्रह्मा जी ने सृष्टि बनाई 
सृष्टि बढ़ी प्रकृति चकराई 
श्रुति-स्मृति से हुई न व्यवस्था 
अनियंत्रित हो गई अवस्था 
नियति विवश हो गुवारती, आरती
चित्रगुप्त जी की करें आरती 
.  
करी तपस्या ब्रह्मा जी ने 
हुए अवतरित प्रभु आकृति ले 
श्यामल रंग मनोहर काया 
मन से तन प्रभु ने उपजाया 
शक्ति अरूप, रूप धारती आरती 
चित्रगुप्त जी की करें आरती 
.  
अवंतिका में करी तपस्या 
ज्ञान मिला हल हुई समस्या 
मर्म धर्म का कर्म योग है 
श्रम से अधिक न भोग भोग्य है 
पूजा मनुष्य को तारती, आरती  
चित्रगुप्त जी की करें आरती 
हरषे देव किया तव पूजन 
नंदिनी-इरावती कर दीं अर्पण 
बारह सुत विद्वान यशस्वी 
वीर धीर गंभीर मनस्वी 
साधना 'सलिल' मनुहारती, आरती 
चित्रगुप्त जी की करें आरती 
लिपि लेखनी से राह बनाई 
कर्म धर्म की महिमा गाई 
जैसा कर्म मिले फल वैसा 
मनुज समान हो न्याय एक सा 
स्वर्ग बनी भू भारती, आरती  
चित्रगुप्त जी की करें आरती 
जन्म नहीं सच्ची पहचान 
बने कर्म  से मनुज महान 
जैसा बोए वैसा काटे 
कोई किसी का प्राप्य न बाँटे  
करनी जन्म सुधारती, आरती  
चित्रगुप्त जी की करें आरती 

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२५. प्रभु चित्रगुप्त की संतानों! 

प्रभु चित्रगुप्त की संतानों! 
कायस्थ कुल के दीपक हो तुम 
वसुधा की आशा हो, सूरज हो तुम
जो भी चाहोगे पाओगे तुम 
सवेरा सुनहरा उगाओगे तुम 
है बुद्धि अधिक सबसे तुममें 
कम नहीं किसी से अनुमानो
परमेश्वर जनक हमारे हैं 
कुल सूर्य-नाग द्वय तारे हैं 
नंदिनी-इरावती माता के 
हम आँखों के उजियारे हैं 
बारह भाई मिल एक बनें  
मंजिल पग चूमे यदि ठानों
खुद को कहो क्यों भूले हो तुम 
झूठे अहं में फूले हो तुम 
सेवा छोड़ो, व्यवसाय करो 
सपनों में नाहक ही भूले हो तुम 
मारो दानव दहेज मिलकर 
ध्वज अपना अग जग पर तानो

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२६. कुलदेव हमारे चित्रगुप्त

कुलदेव हमारे चित्रगुप्त 
भगवान हमारे चित्रगुप्त 
सुंदरतम रूप निराला है 
फैलाया दिव्य उजाला है 
सब सृष्टि का भार सम्हाला है 
है गुप्त चित्र, प्रभु चित्रगुप्त 
अग-जग से न्यारे चित्रगुप्त 
सुर-नर-मुनि चरणों में आए 
तव कृपा आप कोर पा मुस्काए 
सच्चे मन से आरती गाएँ  
तर जाएँ तारें चित्रगुप्त 
भव पार उतारें चित्रगुप्त 
.
सत्कर्म-धर्म निर्माता हैं 
जन-गण के भाग्य विधाता हैं 
मात-पिता-सखा भ्राता हैं 
त्राता संकट से चित्रगुप्त 
शरणागति दाता चित्रगुप्त 
नंदिनी-इरावती के स्वामी 
परब्रह्म दिव्य अंतर्यामी 
हम सब सुत तेरे अनुगामी 
हों नामी वर दो चित्रगुप्त 
सब संकट हर लो चित्रगुप्त 
सत-असत भेद हम कर पाएँ
सत-चित-आनंद हर पल पाएँ 
तज पाप, पुण्य-पथ अपनाएँ  
तव जय गाएँ प्रभु चित्रगुप्त 
भू  स्वर्ग बनाएँ चित्रगुप्त 
.
हे! ज्ञान-बुद्धि-अक्षरदाता 
हे! न्याय धर्म के उद्गाता  
हे! ब्रह्म-जीव अक्षर नाता 
हे! कर्म विधाता चित्रगुप्त 
लिपि-लेखनी दाता चित्रगुप्त 
मनवांछित फल देनेवाले 
हर संकट हर लेनेवाले 
सत्कर्मों से प्रभु को पाले 
जय गा ले 'सलिल' जय चित्रगुप्त 
जय चित्रगुप्त! जय चित्रगुप्त!! 

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२७. आरती कीजै चित्रगुप्त की

आरती कीजै चित्रगुप्त की 
इरावती-नंदिनी युक्त की 
ब्रह्मा तनय सरस्वती नंदन 
ज्ञान पुरुष अज्ञान निकंदन 
अर्पित अक्षत कुमकुम चंदन 
मसि लेखनी लिपि शब्द शक्ति की 
आरती कीजै चित्रगुप्त की 
निर्गुण-सगुण अरूप-रूपनिधि 
सकल लोक वंदित विभिन्न विधि 
हरण शोक-भय, दायक सब सिधि 
निरासक्त-निष्काम भक्ति की 
आरती कीजै चित्रगुप्त की 
पाप पुण्य के दिव्य नियामक
शाश्वत धर्माधर्म विचारक 
शांति-न्याय-सुख मोक्ष प्रदायक 
दीजै सद्गति राह  मुक्ति की 
आरती कीजै चित्रगुप्त की 
अपरा-परा शक्ति के स्वामी 
इड़ा-पिंगला तव अनुगामी 
तरे शरण आ पापी-कामी 
सदाचरण सद्वृति लुप्त की 
आरती कीजै चित्रगुप्त की 
शरणागत वत्सल व्रत धारी 
सत-चित-आनंद ज्ञान विहारी  
सुंदर छवि नित 'सलि'ल निहारी 
सतत साधना शक्ति सुप्त की
आरती कीजै चित्रगुप्त की 

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२८. जयति जय चित्रगुप्त भगवान

जयति जय चित्रगुप्त भगवान 
तुम्हें शत बारंबार प्रणाम 
वर दो तव संतानों का यश 
गूँजे चारों धाम 
जयति जय चित्रगुप्त भगवान
निजा हित गौड़, प्रमुख सबका हित 
त्याग भाव विकसे  
लोभ-मोह माया-मत्सर से 
मुक्त होंय निष्काम 
जयति जय चित्रगुप्त भगवान
परखें धर्माधर्म, सुमति दो 
नीर-क्षीर निर्मल 
दें प्रकाश जीवन जी पाएँ 
हो निस्पृह निष्काम
जयति जय चित्रगुप्त भगवान
लड़ें बुराई से समाज की 
विजयी हों बल दो 
साथ शक्ति के भक्ति हमें दो
स्वर्ग बने भू धाम 
जयति जय चित्रगुप्त भगवान
राह बनाएँ तज दहेज हम 
कर आदर्श विवाह 
कुलवधु लाने को न करें 
अब कुलदीपक नीलाम
जयति जय चित्रगुप्त भगवान
बारह भाई एक बनें हम 
धीर-वीर अरु नेक  
हर लें हर संकट समाज का 
जीवन बने ललाम 
जयति जय चित्रगुप्त भगवान
पाप-पुण्य के निर्णायक 
प्रभु चित्रगुप्त हैं इष्ट  
चित्रगुप्त ही राम, कृष्ण 
शंकर, गणेश, हनुमान
जयति जय चित्रगुप्त भगवान
सुबह-साँझ आरती उतारें  
नित स्तुति गाएँ  
श्रद्धा-भक्ति समेत करें 
सब प्रभु को नित्य प्रणाम 
जयति जय चित्रगुप्त भगवान
अपव्यय रहित विवाह 
दिखाएँगे समाज को राह  
रूप-रंग-धन गौड़  
प्रमुख गुण वर-वधु हों अभिराम 
जयति जय चित्रगुप्त भगवान
चित्रालय हों शिक्षालय 
शुभ संस्कार जागे 
हर चित्रांशी में देखें हम 
इष्ट देव का नाम 
जयति जय चित्रगुप्त भगवान
जो सेवक समाज के सच्चे 
उनको दें  सम्मान 
नमन उन्हें जो राह दिखाकर 
आज हुए गुमनाम 
जयति जय चित्रगुप्त भगवान
सेवा तज व्यवसाय करें 
बन अग-जग के स्वामी 
वीर भोग्या वसुंधरा 
भोगें फिर हो प्रस्थान 
जयति जय चित्रगुप्त भगवान
पुरुषार्थों को परमार्थों के 
साथ मिला यश पाएँ  
तन मिट जाए 'सलिल' 
युगों तक रहें किए जो काम 
जयति जय चित्रगुप्त भगवान

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२८. चित्रगुप्त चित्रेश 

जयति जय चित्रगुप्त चित्रेश
तुम्हें जग नमन करें न्यायेश 
श्यामल वर्ण चतुर्भुज धारी 
ज्ञान शिल्प विज्ञान विहारी  
पाप-पुण्य के अधिनायक तुम 
जय जय जय कर्मेश
जयति जय चित्रगुप्त चित्रेश
 
आदि शक्ति के आराधक 
निष्काम कर्म योग साधक 
बाधक पापी-दुष्टों के 
निष्पक्ष देव धर्मेश
जयति जय चित्रगुप्त चित्रेश
.  
जिसने पूजन किया तुम्हारा 
उसने बिगड़ा जन्म सँवारा  
भटका नृप सौदास पंथ पा 
प्रणत हुआ प्राणेश 
जयति जय चित्रगुप्त चित्रेश
टीवी स्तुति देवों ने गाई 
इच्छा मृत्यु भीष्म ने पाई 
धर्म कर्म का मर्म बता 
दो मुक्ति हमें दिव्येश  
जयति जय चित्रगुप्त चित्रेश
अंतर्मन ने नाथ पुकारा  
निबल-अधम हम, बनो सहारा  
तारा हर शरणागत हम पर 
कृपा करो करुणेश  
जयति जय चित्रगुप्त चित्रेश
ज्योतिपुंज हर लो अँधियारा  
मन्वन्तर कर दो उजियारा 
तुहिनावत निर्मल निश्छल हों  
वर दो हे पद्मेश 
जयति जय चित्रगुप्त चित्रेश
जब तक श्वासा, तब तक आशा 
कभी ना व्यापे तनिक निराशा 
राज बहादुर करें सहायक 
सत्य रहे सत्येश 
जयति जय चित्रगुप्त चित्रेश
.  
सकल सृष्टि परिवार हमारा 
स्नेह समन्वय मंत्र उचारा  
शांति-साधना सलिला जग में 
बहने दो  सलिलेश 
जयति जय चित्रगुप्त चित्रेश
 
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२९. जय-जयकार करो चित्रगुप्त की
जय-जयकार करो चित्रगुप्त की 
आओ शरण नवाकर माथ  
एक साथ इंसान सभी मिल 
पूजा करो जोड़कर हाथ 
वैदिक संस्कृति के संस्थापक 
दीन-हीन के भाग्य सुधारक 
कर्म देव कर्मेश नमन शत 
पीडि़त मानव के उद्धारक  
नव सर्जन से नव अर्चन कर 
राष्ट्र सुधारें मिलकर साथ
जय-जयकार करो चित्रगुप्त की 
आओ शरण नवाकर माथ 
.  
नंदिनी-इरावती के भर्ता  
पाप-ताप पीड़ा-दुख हर्ता  
शाश्वत शुचि सत्कर्म दयामय 
सचराचार के सद्गति कर्ता  
तव यश गाए 'सलिल' तार दो  
हे श्रम-कौशल-मति के नाथ 
.  
असि-मसि भाषा वर्ण व्यवस्था 
सुधरी बिगड़ी हुई अवस्था 
स्वर्ग बनाया भूमंडल को 
वंदित हुए सकल कायस्था  
यश-समृद्धि सुख-वैभव दो प्रभु 
माँगे 'सलिल' कृपा दिन रात

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३०. नाम जपो नाम  

नाम जपो भोर-साँझ नाम जपो नाम 
देव चित्रगुप्त का नाम जपो नाम 
भक्तों को प्राणों से भी प्यारा तेरा नाम 
डूबतों का आखरी सहारा तेरा नाम 
धरा-गगन चर-अचर समाया तेरा नाम 
तीन लोक,  दस दिशा में पाया तेरा नाम 
ऐसी कोई जगह नहीं जहाँ नहीं नाम 
नाम जपो भोर-साँझ नाम जपो नाम
कण-कण में, तृण-तृण में छिपा तेरा नाम 
हर मन में, हर तन में मिला तेरा नाम 
अपनों में, सपनों में छाया तेरा नाम 
माया-काया नहीं है पराया तेरा नाम 
प्रार्थना सबद अजान प्रेयर तेरा नाम
नाम जपो भोर-साँझ नाम जपो नाम
.  
गीतों में, गजलों में गाया तेरा नाम 
श्वास-आस, दूर-पास पाया तेरा नाम 
सरगम में, साजों में बजा तेरा नाम 
कंठों में, घंटों में पाया तेरा नाम 
आन भी है नाम 'सलिल' शान भी है नाम
नाम जपो भोर-साँझ नाम जपो नाम

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३१. महिमा तुम्हारी अपरंपार है 

महिमा तुम्हारी अपरंपार है श्री चित्रगुप्त 
कलयुग में मानव का आधार है श्री चित्रगुप्त 
चंदा-सूरज सितारे, तुमसे ही हैं उजियारे 
तुमने सिरजा सारा संसार है श्री चित्रगुप्त 
महिमा तुम्हारी अपरंपार है श्री चित्रगुप्त 
कण-कण भगवान प्रभु हैं, रस-गुण  की खान प्रभु हैं 
कला का शिल्प का भंडार हैं श्री चित्रगुप्त 
महिमा तुम्हारी अपरंपार है श्री चित्रगुप्त 
शब्द शक्ति के स्वामी, प्रभु जी हैं अंतर्यामी 
लेखनी लिपि अक्षर सिरजनहार हैं चित्रगुप्त 
महिमा तुम्हारी अपरंपार है श्री चित्रगुप्त 
श्वास-प्रश्वास प्रभु हैं, मानव की आस प्रभु हैं  
इतना विश्वास तारणहार हैं श्री चित्रगुप्त 
महिमा तुम्हारी अपरंपार है श्री चित्रगुप्त 
शबरी के राम प्रभु हैं, राधा के श्याम प्रभु हैं 
भक्तों का करते नित उद्धार हैं श्री चित्रगुप्त 
महिमा तुम्हारी अपरंपार है श्री चित्रगुप्त 
प्रभु ही हैं अक्षत-चंदन, प्रभु ही पूजन शुचि वंदन 
नमन सलिल का बारंबार है श्री चित्रगुप्त 
महिमा तुम्हारी अपरंपार है श्री चित्रगुप्त 

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३२. श्री चित्रगुप्त चरणारविंद

श्री चित्रगुप्त चरणारविंद मधु-पान करो सानंद 
नंदिनी इरावती पद-पद्मों के बनो मधुर मकरंद
.  
हे परमेश्वर! हे धर्मेश्वर! हे कर्मेश्वर सुखधाम 
पाप-पुण्य के निर्णायक आदित्य सतेज अमंद
.   
हे जगत-प्राण, हे जग पावन, हे जगज्जयी  जगजीवन 
अज्ञान तिमिर भयनाशक हे, सत-चित स्वरूप सुखकंद
.  
कलिकाल गाल उद्धारक हे, भवसागर तारक देव 
शब्द ब्रम्ह श्री चरणों में नत, नाद-ताल रस-छंद 
प्रज्ञाsलोक मिले हमको प्रभु!, भटके पग पथ पाएँ 
सार्थक करिए जनम हमारा, कटें काल के फंद
हे कर्मदेव! आनंद कुंज! कर कृपा 'सलिल' को तारो 
यश गाए युग-युग तक पल-पल भू-नभ भास्कर-चंद 

●●●

३३. चित्रगुप्त प्रभु उतरे भू पर 
चित्रगुप्त प्रभु उतरे भू पर, करने मानव का कल्याण 
पीड़ित-शोषित मानवता का, पाप-ताप से करने त्राण
श्रुति-स्मृति की विस्मृति से जब, न्याय सूर्य को लगा ग्रहण 
असि-मसि अक्षर-कलम पटल से, किया व्यवस्थित कर विचरण 
अन्यायों का शमन लिया प्रभु!, हरषे हर जन-जन के प्राण 
चित्रगुप्त प्रभु उतरे भू पर, करने मानव का कल्याण 
.      
इड़ा-पिगला ऋद्धि-सिद्ध सम, मातृ शक्ति द्वय महिमा वान 
द्वादश पुत्रों के माध्यम से किया व्यवस्थित सकल जहान  
निरासक्त हो कर्म करो सब होगा तब ही परिनिर्वाण 
चित्रगुप्त प्रभु उतरे भू पर, करने मानव का कल्याण 
जो जैसा बोए काटेगा, जैसी करनी फल पाएगा 
खुद जलकर भी दे प्रकाश जो भुवन भास्कर कहलाएगा
आत्मोन्नति से स्वर्ग बने भू,  सलिल सतत कर नवनिर्माण
चित्रगुप्त प्रभु उतरे भू पर, करने मानव का कल्याण 
.  
●●●

३४ . कलम के देव

हे कलम के देव!, 
कर्म के प्रभु!, सदय हो 
हमें दो आशीष 
सत की निज विजय हो। 
काल की चुनौतियाँ  
पग रोक मानव का खड़ी हैं, 
हटा उनको रख सकें पग  
प्रगति पथ पर हम अभय हो।
.   
विगत की यादें सुनहरी 
आज को दिन नव उजाला ,
भविष्य हो फिर भव्य उज्जवल 
विमल जल-थल नभ-मलय हो।
कर सकें साकार सपने 
वर सकें सब लक्ष्य अपने 
सत्य शिव सुंदर जगत यह 
सत-चित-आनंदमय हो। 
.  
सृजें कंकर से भी शंकर 
हर हृदय में हो शिवाला 
काम हों निष्काम सारे 
शांति, अनय  या प्रलय हो।  
दीप मन का जला पाएँ 
अहं मिथ्या मिटा पाएँ  
गरल पीकर अमृत बाँटें  
शून्य में फिर सलिल लय हो।   

●●●

३५. सगरो जै-जैकार (भोजपुरी)
*
सगरो जै-जैकार करत बा, चित्रगुप्त महराज।  
करब कृपा दोउन मैया सँग, सिर पर सोहे ताज।  
केहू नइखे हे जगवा में, तोहरे बिना सहाई
तोहरो छोड़ चरनिया बारह भाई कहाँ हम जाई।
दूनो माई कृपा करल बा, दिनवा फेर हमार 
सर पर हाथ धरल महतारी, किरपा दृष्टि निहार।
असि-मसि, शिल्प-कला सीखल बा, दिनवा फेर हमार 
 रउआ निस-दिन नाम जपल बा, काहे न सुनल पुकार। 
श्री फल, कदली फल, पुंगी फल, चूनर लाल चढ़ाइल 
हलुआ-खीर-मिठाई मैया, भक्ति-भाव बर लाइल। 
कथा-आरती भजन-कीर्तन, निश-दिन नाम जपल बा। 
सर पर हाथ धरल दोऊ माई, प्रभु के कृपा चहत बा
मति-विद्या बल-श्रम-समृद्धि बर, नत सिर आइल द्वार। 
जै-जैकार गुँजाइल जस गा, भव से देव उबार।।     

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३६.  चित्रगुप्त-रहस्य
*
चित्रगुप्त पर ब्रम्ह हैं, ॐ अनाहद नाद
योगी पल-पल ध्यानकर, कर पाते संवाद
निराकार पर ब्रम्ह का, बिन आकार न चित्र
चित्र गुप्त कहते इन्हें, सकल जीव के मित्र
चित्र गुप्त जिसका वही, लेता जब आकार
ब्रम्हा-विष्णु-महेश तब, होते हैं साकार
नाद तरंगें संघनित, मिलें आप से आप
सूक्ष्म कणों का रूप ले, सकें शून्य में व्याप
कण जब गहते भार तो, नाम मिले बोसॉन
प्रभु! पदार्थ निर्माण कर, डालें उसमें जान
काया रच निज अंश से, करते प्रभु संप्राण
कहलाते कायस्थ- कर, अंध तिमिर से त्राण
परम आत्म ही आत्म है, कण-कण में जो व्याप्त
परम सत्य सब जानते, वेद वचन यह आप्त
कंकर कंकर में बसे, शंकर कहता लोक
चित्रगुप्त फल कर्म के, दें बिन हर्ष, न शोक
मन मंदिर में रहें प्रभु!, सत्य देव! वे एक
सृष्टि रचें पालें मिटा, सकें अनेकानेक
अगणित हैं ब्रम्हांड, है हर का ब्रम्हा भिन्न
विष्णु पाल शिव नाश कर, होते सदा अभिन्न
चित्रगुप्त के रूप हैं, तीनों- करें न भेद
भिन्न उन्हें जो देखता, तिमिर न सकता भेद
पुत्र पिता का पिता है, सत्य लोक की बात
इसी अर्थ में देव का, रूप हुआ विख्यात
मुख से उपजे विप्र का, आशय उपजा ज्ञान
कहकर देते अन्य को, सदा मनुज विद्वान
भुजा बचाये देह को, जो क्षत्रिय का काम
क्षत्रिय उपजे भुजा से, कहते ग्रन्थ तमाम
उदर पालने के लिये, करे लोक व्यापार
वैश्य उदर से जन्मते, का यह सच्चा सार
पैर वहाँ करते रहे, सकल देह का भार
सेवक उपजे पैर से, कहे सहज संसार
दीन-हीन होता नहीं, तन का कोई भाग
हर हिस्से से कीजिये, 'सलिल' नेह-अनुराग
सकल सृष्टि कायस्थ है, परम सत्य लें जान
चित्रगुप्त का अंश तज, तत्क्षण हो बेजान
आत्म मिले परमात्म से, तभी मिल सके मुक्ति
भोग कर्म-फल मुक्त हों, कैसे खोजें युक्ति?
सत्कर्मों की संहिता, धर्म- अधर्म अकर्म
सदाचार में मुक्ति है, यही धर्म का मर्म
नारायण ही सत्य हैं, माया सृष्टि असत्य
तज असत्य भज सत्य को, धर्म कहे कर कृत्य
किसी रूप में भी भजे, हैं अरूप भगवान्
चित्र गुप्त है सभी का, भ्रमित न हों मतिमान

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३७.  सार हरि सुमिरन

जग असार सार हरि सुमिरन ,
डूब भजन में ओ नादां मन...

निराकार काया में स्थित, हो कायस्थ कहाते हैं.
रख नाना आकार दिखाते, झलक तुरत छिप जाते हैं..
प्रभु दर्शन बिन मन हो उन्मन,
प्रभु दर्शन कर परम शांत मन.
जग असार सार हरि सुमिरन ,
डूब भजन में ओ नादां मन...

कोई न अपना सभी पराये, कोई न गैर सभी अपने हैं.
धूप-छाँव, जागरण-निद्रा, दिवस-निशा प्रभु के नपने हैं..
पंचतत्व प्रभु माटी-कंचन,
कर मद-मोह-गर्व का भंजन.
जग असार सार हरि सुमिरन ,
डूब भजन में ओ नादां मन...

नभ पर्वत भू सलिल लहर प्रभु, पवन अग्नि रवि शशि तारे हैं.
कोई न प्रभु का, हर जन प्रभु का, जो आए द्वारे तारे हैं..
नेह नर्मदा में कर मज्जन,
प्रभु-अर्पण करदे निज जीवन.
जग असार सार हरि सुमिरन ,
डूब भजन में ओ नादां मन...

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३८. 
मुक्तकांजलि:

सत्य-शिव-सुंदर का अनुसन्धान है कायस्थ.
सत-चित-आनंद का अनुगान है कायस्थ..
प्रकृति-पर्यावरण के अनुकूल जीवन 'सलिल'-
मनुजता को समर्पित विज्ञान है कायस्थ..

धर्म, राष्ट्र, विश्व पर अभिमान है कायस्थ.
प्रार्थना, प्रेयर सबद, अजान है कायस्थ..
धर्म का है मर्म निरासक्त कर्म 'सलिल'-
निष्काम निष्ठा लगन का सम्मान है कायस्थ..

पुरुषार्थ को परमार्थ की पहचान है कायस्थ.
आँख में पलता हसीं अरमान है कायस्थ..
आन-बान-शान से जीवन जियें 'सलिल'-
असत पर शुभ सत्य का जयगान है कायस्थ..

निस्वार्थ सेवा का सतत अभियान है कायस्थ.
तृषित अधरों की मधुर मुस्कान है कायस्थ..
तराश कर कंकर को शंकर बनाते 'सलिल'-
वही सृजन शक्तिमय इंसान हैं कायस्थ..

सर्व सुख के लिये निज बलिदान है कायस्थ.
आस्था, विश्वास है, ईमान है कायस्थ..
तूफ़ान में जो अँधेरे से जीतता 'सलिल'-
दीप तारे चंद्र रवि भगवान है कायस्थ..

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३९. माहिया (पंजाबी छंद) 

चल कायथ बन जाएँ
धरती माँ बल दे
अँधियारा पी पाएँ

वसुधा सबकी माता
करें सफाई मिल
हमसब कायथ भ्राता

रजनीश गले मिलता
रश्मि हाथ फैला
कायथ भूक भरता

अरविंद पंक में खिल
सलिल तरंगों सँग
कायथ हो पुजता

माटी का दीप उठा
स्नेह स्नेह का भर
कायथ ज्योति जला

संजीव सृष्टि कण-कण
सबमें प्रभु बसता
कायथ ही समरसता

तम नष्ट नहीं होता
भेज दिए-नीचे 
कायथ उजास बोता

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४०.


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४१.
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४२ .


 सॉनेट
कौन?

कौन है तू?, कौन जाने?
किसी ने तुझको न देखा।
कहीं तेरा नहीं लेखा।।
जो सुने जग सत्य माने।।

देह में है कौन रहता?
ज्ञात है क्या कुछ किसी को?
ईश कहते क्या इसी को?
श्वास में क्या वही बहता?

कौन है जो कुछ न बोले
उड़ सके पर बिना खोले
जगद्गुरु है आप भोले।।

कौन जो हर चित्र में है?
गुप्त वह हर मित्र में है।
बन सुरभि हर इत्र में है।।
१७-४-२०२२

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गुजराती अनुवाद
વન્દના
શરણાગત અમે
શરણાગત અમે
ચિત્રગુપ્ત પ્રભુ
હાથ પસારી આવ્યા .
અમાપ ,અખુંટા ,અજર ,અમર છે
અમિત ,અભય, અવિજયી, અવિનાશી,
નિરાકાર, સાકાર તમે છો
નિર્ગુણ ,સગુણ દેવ આકાશી
પથ -પગ લક્ષ્ય વિજય,યશ તમે છો
તમેજ મત -મતદાતા ,પ્રત્યાશી
અંધકાર મટાવા
સૂર્ય સમક્ષ અમે
દ્વાર તમારે આવ્યા .
વર્ણ ,જાત , ભૂ, ભાષા ,સાગર
અનિલ, અગ્નિ ,ખૂણો ,નભ, નદી ,ગાગર
તાંડવકરનાર નટરાજ બ્રહ્મ તમે
તમેજ બૃજ -રજ ના નટનાગર
પૈગમ્બર,ઈસા, ગુરુ બનીને
તારાજ અંશ શ્રુષ્ટિ છે ભાસ્વર
આત્મા જગાડવાને
ચરણાગત અમે
ઝલક નિહારવાને આવ્યા.
આદિ -અંત ,ક્ષય -ક્ષર વિહીન છે
કટાર-અંજન , કલમ તૂલિકા તમે છો
પારકા નથી કોઈ બધાંજ તમે છો
કાયા માં છે પોતાના બધા અમે
જન્મ -મરણ , યશ-અપયશ ચક્રીત
છાયા-માયા ,સુખ -દુઃખ સર્વ સરખા
દ્વેષ ભુલાવો
કરુણાકર છો
સાંભળો પોકારવાને આવ્યા .
મૂળ રચના :આચાર્ય સંજીવ વર્મા "સલિલ"
ભાવાનુવાદ :કલ્પના ભટ્ટ
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अजर अमर अक्षर अमित, अजित असित अवनीश
अपराजित अनुपम अतुल, अभिनन्दन अमरीश
*
अंबर अवनि अनिल अनल, अम्बु अनाहद नाद
अम्बरीश अद्भुत अगम, अविनाशी आबाद
*
अथक अनवरत अपरिमित, अचल अटल अनुराग
अहिवातिन अंतर्मुखी, अन्तर्मन में आग
*
आलिंगन कर अवनि का, अरुण रश्मियाँ आप्त
आत्मिकता अध्याय रच, हैं अंतर में व्याप्त
***




नवगीत:
चित्रगुप्त को
पूज रहे हैं
गुप्त चित्र
आकार नहीं
होता है
साकार वही
कथा कही
आधार नहीं
बुद्धिपूर्ण
आचार नहीं
बिन समझे
हल बूझ रहे हैं
कलम उठाये
उलटा हाथ
भू पर वे हैं
जिनका नाथ
खुद को प्रभु के
जोड़ा साथ
फल यह कोई
नवाए न माथ
खुद से खुद ही
जूझ रहे हैं
पड़ी समय की
बेहद मार
फिर भी
आया नहीं सुधार
अकल अजीर्ण
हुए बेज़ार
नव पीढ़ी का
बंटाधार
हल न कहीं भी
सूझ रहे हैं।


***
लघुकथा
चित्रगुप्त पूजन
*
अच्छे अच्छों का दीवाला निकालकर निकल गई दीपावली और आ गयी दूज...
सकल सृष्टि के कर्म देवता, पाप-पुण्य नियामक निराकार परात्पर परमब्रम्ह चित्रगुप्त जी और कलम का पूजन कर ध्यान लगा तो मनस-चक्षुओं ने देखा अद्भुत दृश्य.
निराकार अनहद नाद... ध्वनि के वर्तुल... अनादि-अनंत-असंख्य. वर्तुलों का आकर्षण-विकर्षण... घोर नाद से कण का निर्माण... निराकार का क्रमशः सृष्टि के प्रागट्य, पालन और नाश हेतु अपनी शक्तियों को तीन अदृश्य कायाओं में स्थित करना...
महाकाल के कराल पाश में जाते-आते जीवों की अनंत असंख्य संख्या ने त्रिदेवों और त्रिदेवियों की नाम में दम कर दिया. सब निराकार के ध्यान में लीन हुए तो हर चित्त में गुप्त प्रभु की वाणी आकाश से गुंजित हुई:
__ "इस समस्या के कारण और निवारण तुम तीनों ही हो. अपनी पूजा, अर्चना, वंदना, प्रार्थना से रीझकर तुम ही वरदान देते हो औरउनका दुरूपयोग होने पर परेशान होते हो. करुणासागर बनने के चक्कर में तुम निष्पक्ष, निर्मम तथा तटस्थ होना बिसर गये हो."
-- तीनों ने सोच:' बुरे फँसे, क्या करें कि परमपिता से डांट पड़ना बंद हो?'.
एक ने प्रारंभ कर दिया परमपिता का पूजन, दूसरे ने उच्च स्वर में स्तुति गायन तथा तीसरे ने प्रसाद अर्पण करना.
विवश होकर परमपिता को धारण करना पड़ा मौन.
तीनों ने विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका पर कब्जा किया और भक्तों पर करुणा करने का दस्तूर और अधिक बढ़ा दिया.
***
🪷
वेदों-पुराणों में चित्रगुप्त वर्णन
१. - ऋगवेद अध्याय १ -
"इन्द्रा याहिचित्रभानौ सुता इमे त्वायव: आण्वीभिष्तना:  पूतास:।"
 हे अंतर्यामी भगवान चित्रगुप्त! आप समस्त सृष्टि के कण कण में व्याप्त हो। इस सृष्टि के समस्त पदार्थ (जीव) आप ही कि पूजा के लिए निर्मित हैं ।
२- ऋगवेद अध्याय १  -
"त्वां चित्रश्रवस्तम हवन्ते विक्षु जन्तव:। शोचिष्केशं पुरुप्रियाग्ने हव्याय वोहृवे।"
जो भी प्राणी भगवान चित्रगुप्त की पूजा करते हैं वे ऐश्वर्य, ज्ञान, धन, शुद्ध मन आदि से परिपूर्ण हो जाते हैं ।
३- ऋगवेद अध्याय ४ 
"भूमिश्विद्द्यासि तूतुजुजिराचित्र, चित्रिणीष्वा ! चित्रम् कणोष्यूतये।"
समस्त सृष्टि में व्याप्त सभी प्रणियों को धन , ज्ञान , ऐश्वर्य देने वाले भगवान चित्रगुप्त ही हैं ।

🚩 भगवान श्री चित्रगुप्त मंत्र-
 मसिभाजनसंयुक्तं ध्यायेत्तं च महाबलम्।
 लेखिनीपट्टिकाहस्तं चित्रगुप्तं नमाम्यहम्।। 
🚩
चित्रगुप्त ! नमस्तुभ्यं लेखकाक्षरदयकम् !
कायस्थजातिमासाद्य चित्रगुप्त ! नमोऽस्तुते।।

🙏🏻स्कन्द-पुराण🚩
विद्यावाच्श्यशुचिर्धीरो दाता परोपकराक:|
राजसेवी क्षमा शीला: कायस्थ सप्तलक्ष्ण:||

🙏🏻नारद पुराण🚩
रिजु तपस्वी संतोषी
क्षमाशीलौ जितेन्द्रिय: |
दाता सूर दयालुश्र्च
कायस्थों नवभिर्गुणै: ||

नारद पुराण 1/12/83
इतयुक्ते चित्रगुप्तेन समाज्ञप्तो भया नृप|
विमानन धर्मसंज्ञं तु आरोढू बुद्धीसागर:||

नारद पुराण 1/23/67
अस्य कालिश्रश्च चित्रगुप्त माहुएदम भाषत|
अस्य शिक्षाविधानं च तथा बन्धुतव पंडित||

नारद पुराण 1/23/68
एक मुक्तश्चित्रगुप्तो धर्मराजेन सप्तम|
चित्रं विचारयामास पुनचश्रेच्दम भाषेद||

नारद पुराण 1/23/72
एक मुक्तो धर्मेराजश्चिचित्रगुप्तेन धीमता|
धनवान दंडबद्धोमो ममाग्रे सोऽनुकंपिता:||

नारद पुराण 1/31/52
कांदिशिके च वीरे च समवर्ती:यम:स्मृत:|
चित्रगुप्तेरितं वक्यं श्रुत्वा ते पापिनस्तदा||

नारद पुराण 1/119/60
ओदुमबरश्च दघृश्चदो नीलपर्मेष्ठिनौ|
वृकोदरश्चचित्रश्च चित्रगुप्त श्चतुदर्श||

🚩 श्री चित्रगुप्त गायत्रीमंत्र
ॐ भूर्भुवः स्वः
तत्पुरुषाय विेदमहे , चित्रगुप्ताय: धीमहि
तन्नो चित्रगुप्त : प्रचोदयात् ।|

🚩 श्री चित्रगुप्त मंत्र जप
ॐ नमो विचित्राय धर्मलेखाकाय
यमवाहिकादिकारणी मृत्यु- जन्म सयुत्प्रलयम कथय कथय स्वाहा ||

🚩 श्री चित्रगुप्त आरोग्य मंत्र
ॐ नमः चित्रगुप्ताय शान्ताय सर्व रोग विनाशने 
आयु आरोग्यं एश्यर्यं देहि देवं जगत्पतये|
🪷

१४ मई २०२१ योगेश श्रीवास्तव- चित्रगुप्त जयंती मनाने का क्या कारण है? इस सम्बन्ध में भी कोई प्रसंग है?
*
चित्रगुप्त जी हमारी-आपकी तरह इस धरती पर किसी नर-नारी के सम्भोग से उत्पन्न नहीं हुए, न किसी नगर निगम में उनका जन्म प्रमाण पत्र है। कायस्थों से द्वेष रखनेवाले ब्राम्हणों ने एक पौराणिक कथा में उन्हें ब्रम्हा से उत्पन्न बताया। ब्रम्हा पुरुष तत्व है जिससे किसी की उत्पत्ति नहीं हो सकती। नव उत्पत्ति प्रकृति तत्व से होती है।
'चित्र' का निर्माण आकार से होता है। जिसका आकार ही न हो उसका चित्र नहीं बनाया जा सकता। जैसे हवा का चित्र नहीं होता। चित्र गुप्त होना अर्थात चित्र न होना यह दर्शाता है कि यह शक्ति निराकार है। हम निराकार शक्तियों को प्रतीकों से दर्शाते हैं।जैसे ध्वनि को अर्ध वृत्तीय रेखाओं से या हवा का आभास देने के लिये पेड़ों की पत्तियों या अन्य वस्तुओं को हिलता हुआ या एक दिशा में झुका हुआ दिखाते हैं।
कायस्थ परिवारों में आदि काल से चित्रगुप्त पूजन में दूज पर एक कोरा कागज़ लेकर उस पर 'ॐ' अंकितकर पूजने की परंपरा है। 'ॐ' परात्पर परम ब्रम्ह का प्रतीक है। सनातन धर्म के अनुसार परात्पर परमब्रम्ह निराकार विराट शक्तिपुंज हैं जिनकी अनुभूति सिद्ध जनों को 'अनहद नाद' (कानों में निरंतर गूंजनेवाली भ्रमर की गुंजार) केरूप में होती है और वे इसी में लीन रहे आते हैं। यही शक्ति सकल सृष्टि की रचयिता और कण-कण की भाग्य विधाता या कर्म विधान की नियामक है।सृष्टि में कोटि-कोटि ब्रम्हांड हैं। हर ब्रम्हांड का रचयिता ब्रम्हा,पालक विष्णु और नाशक शंकर हैं किन्तु चित्रगुप्त कोटि-कोटि नहीं हैं, वे एकमात्र हैं। वे ही ब्रम्हा, विष्णु, महेश के मूल हैं। आप चाहें तो 'चाइल्ड इज द फादर ऑफ़ मैन' की तर्ज़ पर उन्हें ब्रम्हा का आत्मज कह सकते हैं।
वैदिक काल से कायस्थ जन हर देवी-देवता, हर पंथ और हर उपासना पद्धति का अनुसरण करते रहे हैं चूँकि वे जानते और मानते रहे हैं कि सभी में मूलतः वही परात्पर परमब्रम्ह (चित्रगुप्त) व्याप्त है। यहाँ तक कि अल्लाह और ईसा में भी, इसलिए कायस्थों का सभी के साथ हमेशा ताल-मेल रहा। कायस्थों ने कभी ब्राम्हणों की तरह इन्हें या अन्य किसी को अस्पर्श्य या विधर्मी मान कर उसका बहिष्कार नहीं किया, न खुद को शेष से श्रेष्ठ कहकर उनका अपमान किया।
निराकार चित्रगुप्त जी का कोई मंदिर, कोई चित्र, कोई प्रतिमा, कोई मूर्ति, कोई प्रतीक, कोई पर्व,कोई जयंती,कोई उपवास, कोई व्रत, कोई चालीसा, कोई स्तुति, कोई आरती, कोई पुराण, कोई वेद हमारे मूल पूर्वजों ने नहीं बनाया चूँकि उनका दृढ़ मत था कि जिस भी रूप में जिस भी देवता की पूजा, आरती, व्रत या अन्य अनुष्ठान होते हैं सब चित्रगुप्त जी के एक विशिष्ट रूप के लिये हैं। उदाहरण खाने में आप हर पदार्थ का स्वाद बताते हैं पर सबमें व्याप्त जल (जिसके बिना कोई व्यंजन नहीं बनता) का स्वाद अलग से नहीं बताते। यही भाव था। कालांतर में मूर्ति पूजा का प्रचलन बढ़ने और विविध पूजा-पाठों, यज्ञों, व्रतों से सामाजिक शक्ति प्रदर्शित की जाने लगी तो कायस्थों ने भी चित्रगुप्त जी का चित्र व मूर्ति गढ़कर जयंती मानना शुरू कर दिया। यह सब विगत ३०० वर्षों के बीच हुआ जबकि कायस्थों का अस्तित्व वैदिक काल से है।
वर्तमान में ब्रम्हा की काया से चित्रगुप्त के प्रगट होने की अवैज्ञानिक, काल्पनिक और भ्रामक कथा लोक में मान्य है जबकि चित्रगुप्त जी अनादि, अनंत, अजन्मा, अमरणा, अवर्णनीय हैं। यह सत्य सभी को जानना और नयी पीढ़ी को बताना चाहिए।
***
चित्रगुप्त आख्यान
॥ ॐ यमाय धर्मराजाय श्री चित्रगुप्ताय वै नमः ॥
- गरुड़ पुराण में कहा गया है कि चित्रगुप्त का राज्य सिंहासन यमपुरी में है और वो अपने न्यायालय में जीवों के कर्मों के अनुसार उनका न्याय करते हैं तथा उनके कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं -
‘धर्मराज चित्रगुप्त: श्रवणों भास्करादय:
कायस्थ तत्र पश्यनित पाप पुण्यं च सर्वश:’
चित्रगुप्तम्, प्रणम्यादावात्मानं सर्वदेहीनाम।
कायस्थ जन्म यथार्थान्वेष्णे नोच्यते मया।।
(सब देहधारियों में आत्मा के रूप में विद्यमान चित्रगुप्त को प्रणाम। कायस्थ का जन्म यथार्थ के अन्वेषण (सत्य की खोज ) हेतु ही हुआ है।
- यजुर्वेद आपस्तम्ब शाखा चतुर्थ खंड यम विचार प्रकरण से ज्ञात होता है कि महाराज चित्रगुप्त के वंशज चित्ररथ ( चैत्ररथ ) चित्रकोट के महाराजाधिराज थे और गौतम ऋषि के शिष्य थे ।
बहौश्य क्षत्रिय जाता कायस्थ अगतितवे।
चित्रगुप्त: स्थिति: स्वर्गे चित्रोहिभूमण्डले।।
चैत्ररथ: सुतस्तस्य यशस्वी कुल दीपक:।
ऋषि वंशे समुद्गतो गौतमो नामस्तम:।।
तस्य शिष्यो महाप्राज्ञश्चित्रकूटा चलाधिप:।।
“प्राचीन काल में क्षत्रियों में कायस्थ इस जगत में हुए उनके पूर्वज चित्रगुप्त स्वर्ग में निवास करते हैं तथा उनके पुत्र चित्र इस भूमण्डल में सिथत है उसका पुत्र (वंसज ) चैत्रस्थ अत्यन्त यशस्वी और कुलदीपक है जो ऋषि-वंश के महान ऋषि गौतम का शिष्य है वह अत्यन्त महाज्ञानी परम प्रतापी चित्रकूट का राजा है।”
- विष्णु धर्म सूत्र विष्णु स्मृति ग्रंथ के प्रथम परिहास के प्रथम श्लोक में तो कायस्थ को परमेश्वर कहा गया है।
येनेदं स्वैच्छया, सर्वं, माययाम्मोहितं जगत।
स जयत्यजित: श्रीमान कायस्थ: परमेश्वर:।।
यमांश्चैके-यमायधर्मराजाय मृत्यवे चान्तकाय च।
वैवस्वताय, कालाय, सर्वभूत क्षयाय च।।
औदुम्बराय, दघ्नाय नीलाय परमेषिठने।
वृकोदराय, चित्रायत्र चित्रगुप्ताय त नम:।।
एकैकस्य-त्रीसित्रजन दधज्जला´जलीन।
यावज्जन्मकृतम पापम, तत्क्षणा देव नश्यति।।
यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्वत, काल, सर्वभूतों का क्षय करने वाले, औदुम्बर, चित्र, चित्रगुप्त, एकमेव, आजन्म किये पापों को तत्क्षण नष्ट कर सकने में सक्षम, नील वर्ण आदि विशेषण चित्रगुप्त के परमप्रतापी स्वरूप का बखान करते हैं। पुणयात्मों के लिए वे कल्याणकारी और पापियों के लिए कालस्वरूप हैं।
***
चित्रगुप्त पूजन क्यों?
*
चित्रगुप्त जी हमारी-आपकी तरह इस धरती पर किसी नर-नारी के सम्भोग से उत्पन्न नहीं हुए, न किसी नगर निगम में उनका जन्म प्रमाण पत्र है। कायस्थों से द्वेष रखनेवाले ब्राम्हणों ने एक पौराणिक कथा में उन्हें ब्रम्हा से उत्पन्न बताया। ब्रम्हा पुरुष तत्व है जिससे किसी की उत्पत्ति नहीं हो सकती। नव उत्पत्ति प्रकृति तत्व से होती है।
'चित्र' का निर्माण आकार से होता है। जिसका आकार ही न हो उसका चित्र नहीं बनाया जा सकता। जैसे हवा का चित्र नहीं होता। चित्र गुप्त होना अर्थात चित्र न होना यह दर्शाता है कि यह शक्ति निराकार है। हम निराकार शक्तियों को प्रतीकों से दर्शाते हैं।जैसे ध्वनि को अर्ध वृत्तीय रेखाओं से या हवा का आभास देने के लिये पेड़ों की पत्तियों या अन्य वस्तुओं को हिलता हुआ या एक दिशा में झुका हुआ दिखाते हैं।
कायस्थ परिवारों में आदि काल से चित्रगुप्त पूजन में दूज पर एक कोरा कागज़ लेकर उस पर 'ॐ' अंकितकर पूजने की परंपरा है। 'ॐ' परात्पर परम ब्रम्ह का प्रतीक है। सनातन धर्म के अनुसार परात्पर परमब्रम्ह निराकार विराट शक्तिपुंज हैं जिनकी अनुभूति सिद्ध जनों को 'अनहद नाद' (कानों में निरंतर गूंजनेवाली भ्रमर की गुंजार) केरूप में होती है और वे इसी में लीन रहे आते हैं। यही शक्ति सकल सृष्टि की रचयिता और कण-कण की भाग्य विधाता या कर्म विधान की नियामक है।सृष्टि में कोटि-कोटि ब्रम्हांड हैं। हर ब्रम्हांड का रचयिता ब्रम्हा,पालक विष्णु और नाशक शंकर हैं किन्तु चित्रगुप्त कोटि-कोटि नहीं हैं, वे एकमात्र हैं। वे ही ब्रम्हा, विष्णु, महेश के मूल हैं। आप चाहें तो 'चाइल्ड इज द फादर ऑफ़ मैन' की तर्ज़ पर उन्हें ब्रम्हा का आत्मज कह सकते हैं।
वैदिक काल से कायस्थ जन हर देवी-देवता, हर पंथ और हर उपासना पद्धति का अनुसरण करते रहे हैं चूँकि वे जानते और मानते रहे हैं कि सभी में मूलतः वही परात्पर परमब्रम्ह (चित्रगुप्त) व्याप्त है। यहाँ तक कि अल्लाह और ईसा में भी, इसलिए कायस्थों का सभी के साथ हमेशा ताल-मेल रहा। कायस्थों ने कभी ब्राम्हणों की तरह इन्हें या अन्य किसी को अस्पर्श्य या विधर्मी मान कर उसका बहिष्कार नहीं किया, न खुद को शेष से श्रेष्ठ कहकर उनका अपमान किया।
निराकार चित्रगुप्त जी का कोई मंदिर, कोई चित्र, कोई प्रतिमा, कोई मूर्ति, कोई प्रतीक, कोई पर्व,कोई जयंती,कोई उपवास, कोई व्रत, कोई चालीसा, कोई स्तुति, कोई आरती, कोई पुराण, कोई वेद हमारे मूल पूर्वजों ने नहीं बनाया चूँकि उनका दृढ़ मत था कि जिस भी रूप में जिस भी देवता की पूजा, आरती, व्रत या अन्य अनुष्ठान होते हैं सब चित्रगुप्त जी के एक विशिष्ट रूप के लिये हैं। उदाहरण खाने में आप हर पदार्थ का स्वाद बताते हैं पर सबमें व्याप्त जल (जिसके बिना कोई व्यंजन नहीं बनता) का स्वाद अलग से नहीं बताते। यही भाव था। कालांतर में मूर्ति पूजा का प्रचलन बढ़ने और विविध पूजा-पाठों, यज्ञों, व्रतों से सामाजिक शक्ति प्रदर्शित की जाने लगी तो कायस्थों ने भी चित्रगुप्त जी का चित्र व मूर्ति गढ़कर जयंती मानना शुरू कर दिया। यह सब विगत ३०० वर्षों के बीच हुआ जबकि कायस्थों का अस्तित्व वैदिक काल से है।
वर्तमान में ब्रम्हा की काया से चित्रगुप्त के प्रगट होने की अवैज्ञानिक, काल्पनिक और भ्रामक कथा लोक में मान्य है जबकि चित्रगुप्त जी अनादि, अनंत, अजन्मा, अमरणा, अवर्णनीय हैं। यह सत्य सभी को जानना और नयी पीढ़ी को बताना चाहिए।
***
लेख :




चित्रगुप्त रहस्य:
आचार्य संजीव 'सलिल'
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चित्रगुप्त सर्वप्रथम प्रणम्य हैं:
परात्पर परमब्रम्ह श्री चित्रगुप्त जी सकल सृष्टि के कर्मदेवता हैं, केवल कायस्थों के नहीं। उनके अतिरिक्त किसी अन्य कर्म देवता का उल्लेख किसी भी धर्म में नहीं है, न ही कोई धर्म उनके कर्म देव होने पर आपत्ति करता है। अतः, निस्संदेह उनकी सत्ता सकल सृष्टि के समस्त जड़-चेतनों तक है। पुराणकार कहता है: '
''चित्रगुप्त प्रणम्यादौ वात्मानाम सर्व देहिनाम.''
अर्थात श्री चित्रगुप्त सर्वप्रथम प्रणम्य हैं जो आत्मा के रूप में सर्व देहधारियों में स्थित हैं।
आत्मा क्या है?
सभी जानते और मानते हैं कि 'आत्मा सो परमात्मा' अर्थात परमात्मा का अंश ही आत्मा है। स्पष्ट है कि श्री चित्रगुप्त जी ही आत्मा के रूप में समस्त सृष्टि के कण-कण में विराजमान हैं। इसलिए वे सबके पूज्य हैं सिर्फ कायस्थों के नहीं।
चित्रगुप्त निर्गुण परमात्मा हैं:
सभी जानते हैं कि परमात्मा और उनका अंश आत्मा निराकार है। आकार के बिना चित्र नहीं बनाया जा सकता। चित्र न होने को चित्र गुप्त होना कहा जाना पूरी तरह सही है। आत्मा ही नहीं आत्मा का मूल परमात्मा भी मूलतः निराकार है इसलिए उन्हें 'चित्रगुप्त' कहा जाना स्वाभाविक है। निराकार परमात्मा अनादि (आरंभहीन) तथा (अंतहीन) तथा निर्गुण (राग, द्वेष आदि से परे) हैं।
चित्रगुप्त पूर्ण हैं:
अनादि-अनंत वही हो सकता है जो पूर्ण हो। अपूर्णता का लक्षण आरम्भ तथा अंत से युक्त होना है। पूर्ण वह है जिसका क्षय (ह्रास या घटाव) नहीं होता। पूर्ण में से पूर्ण को निकल देने पर भी पूर्ण ही शेष बचता है, पूर्ण में पूर्ण मिला देने पर भी पूर्ण ही रहता है। इसे 'ॐ' से व्यक्त किया जाता है। दूज पूजन के समय कोरे कागज़ पर चन्दन, केसर, हल्दी, रोली तथा जल से ॐ लिखकर अक्षत (जिसका क्षय न हुआ हो आम भाषा में साबित चांवल)से चित्रगुप्त जी पूजन कायस्थ जन करते हैं।
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात पूर्णमुदच्यते पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते
पूर्ण है यह, पूर्ण है वह, पूर्ण कण-कण सृष्टि सब
पूर्ण में पूर्ण को यदि दें निकाल, पूर्ण तब भी शेष रहता है सदा।
चित्रगुप्त निर्गुण तथा सगुण दोनों हैं:
चित्रगुप्त निराकार-निर्गुण ही नहीं साकार-सगुण भी है। वे अजर, अमर, अक्षय, अनादि तथा अनंत हैं। परमेश्वर के इस स्वरूप की अनुभूति सिद्ध ही कर सकते हैं इसलिए सामान्य मनुष्यों के लिये वे साकार-सगुण रूप में प्रगट हुए वर्णित किये गए हैं। सकल सृष्टि का मूल होने के कारण उनके माता-पिता नहीं हो सकते। इसलिए उन्हें ब्रम्हा की काया से ध्यान पश्चात उत्पन्न बताया गया है. आरम्भ में वैदिक काल में ईश्वर को निराकार और निर्गुण मानकर उनकी उपस्थिति हवा, अग्नि (सूर्य), धरती, आकाश तथा पानी में अनुभूत की गयी क्योंकि इनके बिना जीवन संभव नहीं है। इन पञ्च तत्वों को जीवन का उद्गम और अंत कहा गया। काया की उत्पत्ति पञ्चतत्वों से होना और मृत्यु पश्चात् आत्मा का परमात्मा में तथा काया का पञ्च तत्वों में विलीन होने का सत्य सभी मानते हैं।
अनिल अनल भू नभ सलिल, पञ्च तत्वमय देह.
परमात्मा का अंश है, आत्मा निस्संदेह।।
परमब्रम्ह के अंश- कर, कर्म भोग परिणाम
जा मिलते परमात्म से, अगर कर्म निष्काम।।
कर्म ही वर्ण का आधार श्रीमद्भगवद्गीता में श्री कृष्ण कहते हैं: 'चातुर्वर्ण्यमयासृष्टं गुणकर्म विभागशः'
अर्थात गुण-कर्मों के अनुसार चारों वर्ण मेरे द्वारा ही बनाये गये हैं।
स्पष्ट है कि वर्ण जन्म पर आधारित नहीं था। वह कर्म पर आधारित था। कर्म जन्म के बाद ही किया जा सकता है, पहले नहीं। अतः, किसी जातक या व्यक्ति में बुद्धि, शक्ति, व्यवसाय या सेवा वृत्ति की प्रधानता तथा योग्यता के आधार पर ही उसे क्रमशः ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र वर्ग में रखा जा सकता था। एक पिता की चार संतानें चार वर्णों में हो सकती थीं। मूलतः कोई वर्ण किसी अन्य वर्ण से हीन या अछूत नहीं था। सभी वर्ण समान सम्मान, अवसरों तथा रोटी-बेटी सम्बन्ध के लिये मान्य थे। सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक, आर्थिक अथवा शैक्षणिक स्तर पर कोई भेदभाव मान्य नहीं था। कालांतर में यह स्थिति पूरी तरह बदल कर वर्ण को जन्म पर आधारित मान लिया गया।
चित्रगुप्त पूजन क्यों और कैसे?
श्री चित्रगुप्त का पूजन कायस्थों में प्रतिदिन प्रातः-संध्या में तथा विशेषकर यम द्वितीया को किया जाता है। कायस्थ उदार प्रवृत्ति के सनातन (जो सदा था, है और रहेगा) धर्मी हैं। उनकी विशेषता सत्य की खोज करना है इसलिए सत्य की तलाश में वे हर धर्म और पंथ में मिल जाते हैं। कायस्थ यह जानता और मानता है कि परमात्मा निराकार-निर्गुण है इसलिए उसका कोई चित्र या मूर्ति नहीं है, उसका चित्र गुप्त है। वह हर चित्त में गुप्त है अर्थात हर देहधारी में उसका अंश होने पर भी वह अदृश्य है। जिस तरह खाने की थाली में पानी न होने पर भी हर खाद्यान्न में पानी होता है उसी तरह समस्त देहधारियों में चित्रगुप्त अपने अंश आत्मा रूप में विराजमान होते हैं।
चित्रगुप्त ही सकल सृष्टि के मूल तथा निर्माणकर्ता हैं
सृष्टि में ब्रम्हांड के निर्माण, पालन तथा विनाश हेतु उनके अंश ब्रम्हा-महासरस्वती, विष्णु-महालक्ष्मी तथा शिव-महाशक्ति के रूप में सक्रिय होते हैं। सर्वाधिक चेतन जीव मनुष्य की आत्मा परमात्मा का ही अंश है। मनुष्य जीवन का उद्देश्य परम सत्य परमात्मा की प्राप्ति कर उसमें विलीन हो जाना है। अपनी इस चितन धारा के अनुरूप ही कायस्थजन यम द्वितीय पर चित्रगुप्त पूजन करते हैं। सृष्टि निर्माण और विकास का रहस्य: आध्यात्म के अनुसार सृष्टिकर्ता की उपस्थिति अनहद नाद से जानी जाती है। यह अनहद नाद सिद्ध योगियों के कानों में प्रति पल भँवरे की गुनगुन की तरह गूँजता हुआ कहा जाता है। इसे 'ॐ' से अभिव्यक्त किया जाता है। विज्ञान सम्मत बिग बैंग थ्योरी के अनुसार ब्रम्हांड का निर्माण एक विशाल विस्फोट से हुआ जिसका मूल यही अनहद नाद है। इससे उत्पन्न ध्वनि तरंगें संघनित होकर कण (बोसान पार्टिकल) तथा क्रमश: शेष ब्रम्हांड बना।
यम द्वितीया पर कायस्थ एक कोरा सफ़ेद कागज़ लेकर उस पर चन्दन, हल्दी, रोली, केसर के तरल 'ॐ' अंकित करते हैं। यह अंतरिक्ष में परमात्मा चित्रगुप्त की उपस्थिति दर्शाता है। 'ॐ' परमात्मा का निराकार रूप है। निराकार के साकार होने की क्रिया को इंगित करने के लिये 'ॐ' को सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ काया मानव का रूप देने के लिये उसमें हाथ, पैर, नेत्र आदि बनाये जाते हैं। तत्पश्चात ज्ञान की प्रतीक शिखा मस्तक से जोड़ी जाती है। शिखा का मुक्त छोर ऊर्ध्वमुखी (ऊपर की ओर उठा) रखा जाता है जिसका आशय यह है कि हमें ज्ञान प्राप्त कर परमात्मा में विलीन (मुक्त) होना है।
बहुदेववाद की परंपरा:
इसके नीचे श्री के साथ देवी-देवताओं के नाम लिखे जाते हैं, फिर दो पंक्तियों में ९ अंक इस प्रकार लिखे जाते हैं कि उनका योग ९ बार ९ (९९,९९,९९,९९९) हो। परिवार के सभी सदस्य अपने हस्ताक्षर करते हैं और इस कागज़ के साथ कलम रखकर उसका पूजन कर दण्डवत प्रणाम करते हैं। पूजन के पश्चात् उस दिन कलम नहीं उठायी जाती। इस पूजन विधि का अर्थ समझें। प्रथम चरण में निराकार निर्गुण परमब्रम्ह चित्रगुप्त के साकार होकर सृष्टि निर्माण करने के सत्य को अभिव्यक्त करने के पश्चात् दूसरे चरण में निराकार प्रभु द्वारा सृष्टि के कल्याण के लिये विविध देवी-देवताओं का रूप धारण कर जीव मात्र का ज्ञान के माध्यम से कल्याण करने के प्रति आभार, विविध देवी-देवताओं के नाम लिखकर व्यक्त किया जाता है। ये देवी शक्तियां ज्ञान के विविध शाखाओं के प्रमुख हैं. ज्ञान का शुद्धतम रूप गणित है।
सृष्टि में जन्म-मरण के आवागमन का परिणाम मुक्ति के रूप में मिले तो और क्या चाहिए? यह भाव पहले देवी-देवताओं के नाम लिखकर फिर दो पंक्तियों में आठ-आठ अंक इस प्रकार लिखकर अभिव्यक्त किया जाता है कि योगफल नौ बार नौ आये व्यक्त किया जाता है। पूर्णता प्राप्ति का उद्देश्य निर्गुण निराकार प्रभु चित्रगुप्त द्वारा अनहद नाद से साकार सृष्टि के निर्माण, पालन तथा नाश हेतु देव-देवी त्रयी तथा ज्ञान प्रदाय हेतु अन्य देवियों-देवताओं की उत्पत्ति, ज्ञान प्राप्त कर पूर्णता पाने की कामना तथा मुक्त होकर पुनः परमात्मा में विलीन होने का समुच गूढ़ जीवन दर्शन यम द्वितीया को परम्परगत रूप से किये जाते चित्रगुप्त पूजन में अन्तर्निहित है। इससे बड़ा सत्य कलम व्यक्त नहीं कर सकती तथा इस सत्य की अभिव्यक्ति कर कलम भी पूज्य हो जाती है इसलिए कलम को देव के समीप रखकर उसकी पूजा की जाती है। इस गूढ़ धार्मिक तथा वैज्ञानिक रहस्य को जानने तथा मानने के प्रमाण स्वरूप परिवार के सभी स्त्री-पुरुष, बच्चे-बच्चियाँ अपने हस्ताक्षर करते हैं, जो बच्चे लिख नहीं पाते उनके अंगूठे का निशान लगाया जाता है। उस दिन कोई सांसारिक कार्य (व्यवसायिक, मैथुन आदि) न कर आध्यात्मिक चिंतन में लीन रहने की परम्परा है।
'ॐ' की ही अभिव्यक्ति अल्लाह और ईसा में भी होती है। सिख पंथ इसी 'ॐ' की रक्षा हेतु स्थापित किया गया। 'ॐ' की अग्नि आर्य समाज और पारसियों द्वारा पूजित है। सूर्य पूजन का विधान 'ॐ' की ऊर्जा से ही प्रचलित हुआ है। उदारता तथा समरसता की विरासत यम द्वितीया पर चित्रगुप्त पूजन की आध्यात्मिक-वैज्ञानिक पूजन विधि ने कायस्थों को एक अभिनव संस्कृति से संपन्न किया है। सभी देवताओं की उत्पत्ति चित्रगुप्त जी से होने का सत्य ज्ञात होने के कारण कायस्थ किसी धर्म, पंथ या सम्प्रदाय से द्वेष नहीं करते। वे सभी देवताओं, महापुरुषों के प्रति आदर भाव रखते हैं। वे धार्मिक कर्म कांड पर ज्ञान प्राप्ति को वरीयता देते हैं। इसलिए उन्हें औरों से अधिक बुद्धिमान कहा गया है. चित्रगुप्त जी के कर्म विधान के प्रति विश्वास के कारण कायस्थ अपने देश, समाज और कर्त्तव्य के प्रति समर्पित होते हैं। मानव सभ्यता में कायस्थों का योगदान अप्रतिम है। कायस्थ ब्रम्ह के निर्गुण-सगुण दोनों रूपों की उपासना करते हैं। कायस्थ परिवारों में शैव, वैष्णव, गाणपत्य, शाक्त, राम, कृष्ण, सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा आदि देवी-देवताओं के साथ समाज सुधारकों दयानंद सरस्वती, आचार्य श्री राम शर्मा, सत्य साइ बाबा, आचार्य महेश योगी आदि का पूजन-अनुकरण किया जाता है। कायस्थ मानवता, विश्व तथा देश कल्याण के हर कार्य में योगदान करते मिलते हैं।_____________________________

चित्रगुप्त ( संस्कृत : चित्रगुप्त , रोमनकृत :  चित्रगुप्त , 'रहस्यों से समृद्ध' या 'छिपी हुई तस्वीर') एक हिंदू देवता हैं जो मृतकों के रजिस्ट्रार के रूप में कार्य करते हैं। वह अग्रसंधानी नामक रजिस्टर में मनुष्यों के कार्यों का रिकॉर्ड बनाए रखने के लिए जिम्मेदार हैं ।  मनुष्य की मृत्यु और यमलोक पहुंचने पर , चित्रगुप्त उनके कर्मों को पढ़ते हैं, जिससे मृत्यु के देवता यम को यह तय करने की अनुमति मिलती है कि वे पृथ्वी पर अपने कार्यों के आधार पर स्वर्ग या नरक (स्वर्ग या नरक) जाएंगे या नहीं । उन्हें डेटा के हिंदू देवता के रूप में जाना जाता है और वह ब्रह्मा के सत्रहवें मानसपुत्र हैं । [ 4 ऐसा माना जाता है कि उन्हें ब्रह्मा की आत्मा और मन (चित) से बनाया गया था

साहित्य

गरुड़ पुराण

यम का दरबार और नरक। नीली आकृति यम, यमी और चित्रगुप्त की है। 17वीं सदी की पेंटिंग

गरुड़ पुराण के अनुसार [ 5 ] मोक्ष प्राप्त न करने वाली मानव आत्माएँ अपने पापों और पुण्यों के अनुसार पुरस्कार और दंड प्राप्त करती हैं । मृत्यु के बाद, मनुष्यों की आत्माएँ यमलोक जाती हैं, जहाँ यमदूत नामक देवता निवास करते हैं , जो मनुष्यों के कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं और तदनुसार उन्हें उनका फल देते हैं। यमलोक के प्रमुख देवता यम हैं - यमलोक के शासक और नियमों के राजा।

गरुड़ पुराण में यमलोक में चित्रगुप्त के शाही सिंहासन का वर्णन है, जो अपना दरबार लगाते थे और मनुष्यों के कर्मों के अनुसार न्याय करते थे, साथ ही उनका लेखा-जोखा भी रखते थे।

यम संहिता

एक बड़े केंद्रीय फलक पर मृत्यु के देवता यम (जिन्हें अक्सर धर्म कहा जाता है) सिंहासन पर विराजमान हैं; बाईं ओर एक राक्षस खड़ा है। यम के दाईं ओर चित्रगुप्त विराजमान हैं, जिन्हें प्रत्येक मनुष्य का विस्तृत विवरण रखने और उनकी मृत्यु के बाद उनके पूर्व कर्मों के आधार पर यह तय करने का कार्य सौंपा गया है कि उनका पुनर्जन्म कैसे होगा।

यम संहिता, हिंदू धर्म की एक कृति, अहिल्या कामधेनु के 9वें अध्याय का एक अंश है, जिसमें कहा गया है कि धर्मराज ने ब्रह्मा से मनुष्यों के कर्मों का लेखा-जोखा रखने और उनके साथ न्याय करने के अपने सबसे ज़िम्मेदार कर्तव्यों को निभाने में अपनी कठिनाइयों के बारे में शिकायत की। ब्रह्मा ध्यान में लीन हो गए। चित्रगुप्त उनके शरीर से प्रकट हुए और एक दवात और एक कलम लेकर उनके सामने खड़े हो गए। भगवान ब्रह्मा (सृष्टिकर्ता) ने कहा: "चूँकि तुम मेरे शरीर (कया) से उत्पन्न हुए हो, इसलिए तुम्हें कायस्थ कहा जाएगा और चूँकि तुम मेरे शरीर में अदृश्य रूप से विद्यमान थे, इसलिए मैं तुम्हें चित्रगुप्त नाम देता हूँ। तुम और तुम्हारी संतान क्षत्रिय धर्म का पालन करें।" इसके बाद उन्होंने यमपुरी का कार्यभार संभाला। यम ने अपनी पुत्री इरावती का विवाह चित्रगुप्त के साथ तय किया। सूर्य के पुत्र श्राद्धदेव मनु ने अपनी पुत्री नंदिनी का विवाह चित्रगुप्त के साथ तय किया। उद्धरण वांछित ]

पद्म पुराण

पद्म पुराण के अनुसार , "चित्रगुप्त को सभी प्राणियों के अच्छे और बुरे कार्यों को दर्ज करने के लिए यम के पास रखा गया था, वे अलौकिक ज्ञान से संपन्न थे और देवताओं और अग्नि को अर्पित किए गए बलिदानों में भागी बने। यही कारण है कि द्विज हमेशा उन्हें अपने भोजन से आहुति देते हैं। ब्रह्मा के शरीर से उत्पन्न होने के कारण उन्हें पृथ्वी पर अनेक गोत्रों का कायस्थ कहा गया।"

भविष्य पुराण

भविष्य पुराण में कहा गया है कि सृष्टिकर्ता भगवान ने चित्रगुप्त का नाम और कर्तव्य इस प्रकार बताए: "चूँकि तुम मेरे शरीर से उत्पन्न हुए हो, इसलिए तुम कायस्थ कहलाओगे और संसार में चित्रगुप्त के नाम से प्रसिद्ध होगे। हे पुत्र, मनुष्यों के पाप-पुण्य का निर्णय करने के लिए तुम्हारा निवास सदैव न्याय के देवता के लोक में रहे।"

महाभारत

महाभारत (अनुशासन पर्व, अध्याय 130) में चित्रगुप्त की शिक्षा का उल्लेख है जिसमें मनुष्यों को पुण्य और दान-पुण्य के कार्य करने तथा यज्ञ करने की आवश्यकता बताई गई है, तथा कहा गया है कि मनुष्यों को उनके अच्छे या बुरे कर्मों के अनुसार पुरस्कृत या दंडित किया जाता है।

दंतकथा

चित्रगुप्त का जन्म तब हुआ जब सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने चार वर्णों - ब्राह्मण (विद्वान), क्षत्रिय (योद्धा), वैश्य (व्यापारी और किसान) और शूद्र (मजदूर) की स्थापना की और यम को पृथ्वी पर, ऊपर स्वर्ग में और नीचे की दुनिया में जन्मे और आने वाले सभी जीवों के अच्छे और बुरे कर्मों का लेखा-जोखा रखने का आदेश दिया। यम ने शिकायत की, "हे प्रभु, मैं अकेला तीनों लोकों में 84 लाख योनियों (84,00,000 जीव-रूपों) में जन्म लेने वाले प्राणियों के कर्मों का लेखा-जोखा कैसे रख सकता हूँ?"

ब्रह्मा 11,000 वर्षों तक ध्यान में लीन रहे और जब उन्होंने अपनी आँखें खोलीं, तो उन्होंने एक व्यक्ति को देखा जिसके हाथों में कलम और दवात थी और कमर में तलवार बंधी थी। ब्रह्मा बोले:

तुम मेरे शरीर (काया) से उत्पन्न हुए हो, इसलिए तुम्हारी संतान कायस्थ कहलाएगी। तुम मेरे मन (चित्त या चित्रा) में और गुप्त रूप से (गुप्त) गर्भाधान हुए हो, इसलिए तुम्हारा नाम भी चित्रगुप्त होगा। तुम और तुम्हारी संतान कायस्थ की भूमिका का पालन करें।

तब ब्रह्मा ने उन्हें न्याय करने और धर्म का उल्लंघन करने वालों को दंडित करने का आदेश दिया।

गरुड़ पुराण में, चित्रगुप्त को "अक्षरों के दाता" कहा गया है ( चित्रगुप्त नमस्तुभ्यं वेदाक्षरादत्रे )। चित्रगुप्त की कथाओं के साथ-साथ वेदों में भी, उन्हें सबसे महान राजा कहा गया है, जबकि बाकी सभी राजा, राजक या छोटे राजा हैं।

चित्र इद राजा राजका इदन्यके यके सरस्वतीमनु।
पर्ञ्जिन्य इव तत्तनद धी वर्षत्या सहस्रम्युत ददत्॥
ऋग्वेद पुस्तक 8/ भजन 21/ श्लोक 18) [ 6 ]

मंदिरों

चित्रगुप्त को समर्पित अनेक मंदिर हैं। उल्लेखनीय उदाहरणों में शामिल हैं:

  • श्री चित्रगुप्त प्राकट्य तीर्थ, उज्जैन, मध्य प्रदेश ऐसा माना जाता है कि भगवान ब्रह्मा के शरीर से प्रत्यक्ष प्रकट हुई दिव्य देवी भगवान श्री चित्रगुप्त जी, प्राचीन नगरी अवंतिका, जिसे आज उज्जैन (मध्य प्रदेश) के नाम से जाना जाता है, में श्री कृष्ण विद्या स्थली (सांदीपनि आश्रम) के पीछे स्थित श्री चित्रगुप्त प्राकट्य तीर्थ नामक पवित्र स्थल पर प्रकट हुए थे। इस पवित्र भूमि को प्राचीन काल से ही अत्यधिक पूजनीय स्थल माना जाता रहा है और पद्म पुराण एवं इस्कंद पुराण में इसकी महिमा का वर्णन है। प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण यह स्थान प्रकृति की गोद में बसा है, जहाँ दिव्य शांति और आध्यात्मिक पवित्रता विराजमान है। यहाँ भगवान ब्रह्मा का दूसरा मंदिर है, जो विशिष्ट रूप से प्रथम तल पर स्थित है—जो दुनिया में एक असाधारण दुर्लभ घटना है। इस प्रकार, यह पूजनीय स्थान लंबे समय से धर्म, स्मृति और न्याय के दिव्य देवता भगवान चित्रगुप्त की पूजा के लिए एक केंद्रीय केंद्र के रूप में कार्य करता रहा है, जो युगों से सनातन संस्कृति की गौरवशाली परंपराओं को कायम रखता है।
चित्रगुप्त मंदिर, कांचीपुरम

संदर्भ

  1.  फिलिप, नील; विल्किंसन, फिलिप (2008-04-01)। पौराणिक कथाएँ । डोरलिंग किंडरस्ले लिमिटेड। पृष्ठ 340। आईएसबीएन 978-1-4053-3475-4.
  2.  क्लोस्टरमेयर, क्लॉस के. (2014-10-01)। हिंदू धर्म का एक संक्षिप्त विश्वकोश । साइमन और शुस्टर. पी। 53. आईएसबीएन 978-1-78074-672-2.
  3.  दलाल, रोशन (2014-04-18). हिंदू धर्म: एक वर्णमाला गाइड . पेंगुइन यूके. पृष्ठ 1393. आईएसबीएन 978-81-8475-277-9.
  4.  1 सितंबर, वरदराज रमन द्वारा निबंध, 2011, धर्म, भारतीय (2011-09-01)। "भूतकाल के दर्शन में भविष्य का विज्ञान" । मेटानेक्सस । 2024-08-31 को पुनःप्राप्त ।
  5.  "गरुड़ पुराण, अध्याय 14".
  6.  ब्रायंट, एडविन; पैटन, लॉरी एल. (2005). इंडो-आर्यन विवाद: भारतीय इतिहास में साक्ष्य और अनुमान . साइकोलॉजी प्रेस. आईएसबीएन 9780700714636.
  7. "चित्रगुप्त मंदिर" । द हिंदू । 18 अप्रैल 2003। मूल से 27 जून 2003 को संग्रहीत । 2012-06-12 को लिया गया ।
  8.  हर्षानंद, स्वामी (2012). हिंदू तीर्थस्थल केंद्र (द्वितीय संस्करण). बैंगलोर: रामकृष्ण मठ. पृष्ठ 61. आईएसबीएन 978-81-7907-053-6.
  9. "हैदराबाद में चित्रगुप्त मंदिर | उप्पुगुडा हैदराबाद" . wiki.meramaal.com . 2018-03-17 . 2022-04-12 को पुनःप्राप्त .
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चित्रगुप्तवंशी कायस्थ, जिन्हें उत्तर-भारतीय कायस्थ भी कहा जाता है , कायस्थ समुदाय के हिंदुओं का एक उपसमूह है जो मुख्य रूप से उत्तर भारत के हिंदी बेल्ट में केंद्रित है ।

हिंदू ग्रंथों और परंपराओं में , उन्हें हिंदू भगवान चित्रगुप्त का वंशज बताया गया है [ 2 [ 3 [ 4 ] जिन्हें आमतौर पर "एक बहती हुई नोटबुक, एक कलम और एक स्याही की बोतल" ले जाते हुए दिखाया जाता है जो मानव कर्मों को लिखने में लगे होते हैं। [ 5 ] उन्हें आगे बारह § उपसमूहों में विभाजित किया गया है , जिनमें से प्रत्येक को चित्रगुप्त की दो पत्नियों की संतान होने का दावा किया जाता है। [ 6 [ 7 ]

इन समूहों का सबसे पुराना दर्ज इतिहास भारतीय इतिहास के प्रारंभिक मध्यकाल का है [ 8 ] जबकि " कायस्थ " शब्द स्वयं तीसरी शताब्दी ईस्वी का है। [ 9 ] उत्तर भारतीय कायस्थ उच्च नौकरशाही के शक्तिशाली घटक थे और हिंदू राजाओं के अधीन अत्यधिक प्रभावशाली शहरी अभिजात वर्ग थे । [ 10 ] उनका उल्लेख कई संस्कृत साहित्यिक, धार्मिक और अभिलेखीय ग्रंथों में मिलता है। [ 11 ]

भारत पर इस्लामी आक्रमणों के बाद , वे नियमित रूप से फ़ारसी सीखने वाले पहले भारतीय समूहों में से कुछ बन गए [ 12 ] और अंततः एक इंडो-मुस्लिम शासक समुदाय में एकीकृत हो गए [ 13 ] और क़ानूनगो ( अनुवाद  "रजिस्ट्रार" ) के पद पर वंशानुगत नियंत्रण प्राप्त किया [ 14 ] लेकिन शायद ही कभी इस्लाम में परिवर्तित हुए । [ 15 ]

औपनिवेशिक शासन के तहत, कई कायस्थ परिवार उपमहाद्वीप में ब्रिटिश सत्ता और सफलता के शुरुआती लाभार्थी बन गए। [ 16 ] 1919 में, कायस्थ उत्तर भारत में सभी भारतीय सरकारी कानून सदस्यों के दो-तिहाई के लिए जिम्मेदार थे, जिनमें से अधिकांश संयुक्त प्रांत में थे । [ 17 ]

शब्द-साधन

मेरियम-वेबस्टर के अनुसार , कायस्थ शब्द संभवतः संस्कृत के काय (शरीर) और प्रत्यय -स्थ (खड़ा होना, अंदर होना) से बना है। [ 18 ] प्रत्यय वंशी संस्कृत के शब्द वंश (वंश) से लिया गया है जिसका अनुवाद किसी विशेष परिवार राजवंश से संबंधित होता है। [ 19 ]

इतिहास

प्रारंभिक उत्तर भारत

(ऊपर): प्रयागराज के गढ़वा किला परिसर में एक मंदिर जिसका निर्माण 1142 ई. में एक वस्तव्य-कायस्थ ठाकुर द्वारा करवाया गया था। (नीचे): जेजाकभुक्ति के चंदेलों का अजयगढ़ शिलालेख , जिसमें वस्तव्य-कायस्थ परिवार की वंशावली दर्ज है जो उनके राज्य में प्रशासक के रूप में कार्य करते थे।

ग्यारहवीं शताब्दी के बाद से, अभिलेखीय ग्रंथों में कायस्थों की उत्तर भारतीय शाखा से संबंधित विभिन्न क्षेत्रीय वंशों का उल्लेख है, [ 8 [ 11 ] जिनकी पहचान उनके सामान्य व्यावसायिक विशेषज्ञता से की गई थी [ 20 ] और जिनके सदस्य मध्यकालीन राज्यों के प्रशासन में विशेष रूप से प्रभावशाली हो गए थे। [ 21 ] कुछ कायस्थों को सामंती दर्जा भी प्राप्त था; कुछ को उनके व्यापक ज्ञान के लिए पंडित की उपाधि मिली थी , जबकि अन्य, जो आर्थिक रूप से संपन्न थे, ने मंदिरों का निर्माण करवाया था। [ 22 ] चित्रगुप्त का चित्रगुप्तवंशी कायस्थों के साथ कोई संबंध होने का सबसे पहला अभिलेखीय उल्लेख उसी अवधि के आसपास एक शाही चार्टर ( 1115 ईस्वी ) से दिखाई देता है [ 23 [ 24 ] इसी तरह के अभिलेखों में उदयसिंह के माथुर सामंत [ 25 ] और अन्य कायस्थ शाखाओं के सदस्यों का उल्लेख है जो विभिन्न मध्ययुगीन राज्यों के तहत महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर थे। [ 26 ]

रोमिला थापर के अनुसार, कायस्थ "उच्च नौकरशाही का एक शक्तिशाली घटक" बन गए थे और कभी-कभी "राजकीय जीवनीकारों" और शिलालेखों के रचनाकारों के रूप में अत्यधिक सम्मानित होते थे। उन्हें पेशेवर लेखकों के रूप में आमंत्रित करना एक स्थापित साम्राज्य का सूचक माना जाता था। [ 27 ] थापर यह भी लिखते हैं कि "पद प्राप्त करने वाले और भूमि अनुदान धारक, ब्राह्मण , कायस्थ और श्रेष्ठिन (धनी व्यापारी)" एक सांस्कृतिक समूह में शामिल हो रहे थे जिसने "एक संस्कृत संस्कृति को फैलाने का प्रयास किया" [ 28 ]

चित्ररेखा गुप्ता के अनुसार, कायस्थ "राजा-निर्माता और सबसे प्रभावशाली शहरी अभिजात वर्ग" बन गए। [ 10 ]

इंडो-इस्लामिक युग

मुंशी हरगोपाल तफ्ता (मृत्यु 1879) - मिर्ज़ा ग़ालिब के प्रमुख शागिर्द (शिष्य) भटनागर कायस्थ परिवार से थे ।

सोलहवीं शताब्दी के बाद तैमूरी राजनीतिक शक्ति के उदय का प्रभाव कायस्थों के लिए नई भूमिकाओं को खोलने का था । [ 29 ] उत्तर-भारतीय कायस्थ कुछ पहले समूह थे जिन्होंने फारसी को नियमित रूप से सीखा, इससे पहले कि यह अदालत की भाषा बन जाए। [ 12 ] कायस्थ मकतबों (प्राथमिक विद्यालय के समकक्ष) में एक प्रमुख जनसांख्यिकीय ब्लॉक थे जहां उन्होंने नकल और लेखन के कौशल हासिल किए, जो विभिन्न मुगल विभागों में काम करने के लिए आवश्यक थे। [ 30 ] इस प्रकार, कायस्थ व्यापक फारसी-अरबी राजकोषीय शब्दावली के साथ परिचित और साक्षर हो गए [ 31 ] और उन्होंने क़ानूनगो ( अनुवाद  "रजिस्ट्रार" ) और पटवारी ( अनुवाद  "लेखाकार" ) के रूप में मुगल प्रशासन की आवश्यकताओं को पूरा करना शुरू कर दिया । [ 32 ] इरफान हबीब के अनुसार , कायस्थ मुगल भारत में राजस्व प्रबंधन की "दूसरी परत" थे, जो राजस्व संग्रह, भूमि अभिलेखों और कागज प्रबंधन की बुनियादी बातों से निपटते थे, जहाँ उनकी बुनियादी फ़ारसी साक्षरता और नकल कौशल का उपयोग किया जाता था। [ 33 ]

अठारहवीं शताब्दी तक, क़ानूनगो पद पर कायस्थों का नियंत्रण अनिवार्य रूप से वंशानुगत हो गया था। [ 14 ]

कुछ कायस्थों को उच्च रैंकिंग पदों पर पदोन्नत किया गया था, जैसे रघुनाथ रे कायस्थ (डी. 1664) - मुगल साम्राज्य के "कार्यवाहक वज़ीर " ( अनुवाद  "प्रधान मंत्री" ) और वित्त मंत्री, जिन्हें सम्राट औरंगज़ेब ने अब तक का सबसे महान प्रशासक माना था, और चंदर भान ब्राह्मण को "हिंदुस्तान के कलम के पुरुषों की पुस्तक में अग्रभाग" के रूप में संदर्भित किया गया था। [ 34 ] सम्राट अकबर के वित्त मंत्री, राजा टोडर मल ( सीतापुर, उत्तर प्रदेश में पैदा हुए ), को अक्सर कायस्थ के रूप में संदर्भित किया जाता है। [ 35 ] वास्तव में, यह अकबर के शासनकाल और टोडर मल के प्रोत्साहन के तहत था कि अधिकांश कायस्थों ने फ़ारसी सीखी और उन्हें पहले स्थान पर क़ानूनगो के रूप में नियुक्त किया गया । [ 36 ]

जैसे-जैसे इंडो-फ़ारसी सांस्कृतिक रूपों में उनकी भागीदारी बढ़ी, वैसे-वैसे मुसलमानों के साथ उनकी बातचीत भी बढ़ी और कायस्थ धीरे-धीरे एक इंडो-मुस्लिम शासक समुदाय में शिथिल रूप से एकीकृत हो गए। [ 13 ] उत्तर भारतीय कायस्थ, सीकेपी और बंगाली कायस्थों के विपरीत , एक इंडो-मुस्लिम जीवन शैली को अपनाने के लिए जाने जाते थे, जो उनके पहनावे, तौर-तरीकों और मुस्लिम अभिजात वर्ग के साथ शराब के लिए एक सामान्य आत्मीयता में परिलक्षित होता था । 37 सेवा और साक्षरता के इंडो-मुस्लिम सर्कल को नेविगेट करने के लिए, कई ने फ़ारसी-अरबी उपनाम अपनाए । [  13 ]

तालिका 1. उत्तर भारतीय कायस्थों द्वारा अपनाए गए कुछ फ़ारसी-अरबी उपनाम और उपाधियाँ
नामअर्थ
रायजादाराजा (रईस) का पुत्र, या बॉस
मलिकअध्यक्ष
बख्शीकेशियर
इनामदारपुरस्कृत व्यक्ति
क़ानूनगोकानून/सीमा शुल्क/रजिस्ट्रार का
दफ्तरीकार्यालय-कर्मी
दौलतज़ादाअधिकार का पुत्र
उम्मीदआशा
गुलाबगुलाब जल
दौलतसंपत्ति
फतेहविजय
फरहदख़ुशी

दूसरी ओर, उलेमा, मुस्लिम अभिजात वर्ग और फ़ारसी कवि, कायस्थों को उनके प्रभावशाली व्यवहार के लिए नीची नज़र से देखते थे और उन्हें "विश्वासघाती, क्रूर, धोखेबाज़ और लुटेरे" करार देते थे। आयशा जलाल के अनुसार जब तक कि यह पूर्ण धर्मांतरण न हो, कुछ मुसलमान हिंदुओं से 'लाक्षणिक और शाब्दिक रूप से दूरी' बनाए रखते थे। एक मुस्लिम टिप्पणीकार ने लिखा कि फ़ारसी बोलने वाला हिंदू लेखक एक 'नव-मुस्लिम था, लेकिन उसके दिल में अभी भी कुफ्र और कलह की गंध बनी हुई थी'। [ 38 ] मुस्लिम सुधारक शाह वलीउल्लाह ने एक बार शिकायत की थी कि 'भारत के सभी लेखाकार और क्लर्क हिंदू हैं...वे देश की संपत्ति को नियंत्रित करते हैं'। कायस्थों को मुसलमानों को यह समझाने की कोशिश करनी पड़ी कि वे इस्लाम में बेवफाई का प्रतिनिधित्व नहीं करते, जैसा कि उलेमा दावा करते थे। [ 39 ] जब सम्राट औरंगजेब ने दरबार में इसे पहनना गैरकानूनी घोषित कर दिया तो कई कायस्थों ने अपना पवित्र धागा ( सूता ) घर पर ही छोड़ दिया। [ 40 ]

अधिकांश कायस्थ अपने फ़ारसी भाषा कौशल के प्रति व्यावहारिक और व्यावसायिक रूप से उन्मुख रहे, [ 41 ] संभवतः मुंशी हरगोपाल तुफ्ता (मृत्यु 1879) के अपवाद के साथ , जो मिर्ज़ा ग़ालिब के मुख्य शागिर्द ( अनुवाद  "शिष्य" ) थे । [ 42 [ 43 ] वे भी बड़े पैमाने पर अनिच्छुक रहे और शायद ही कभी इस्लाम में परिवर्तित हुए , जिसने, एच. बेलेनोइट के अनुसार, उनके "प्रशासनिक मूल्य" को सीमित कर दिया। [ 15 ] जिन्होंने धर्म परिवर्तन किया, उन्होंने लेखाशास्त्र और कागज-प्रबंधन की परंपराओं को बनाए रखा, और उन्हें मुस्लिम कायस्थ के रूप में जाना जाता है , जो उत्तरी भारत का संख्यात्मक रूप से छोटा समुदाय है। [ 44 ]

अवध के नवाबों के अधीन

महाराजा टिकैत राय , अवध के कायस्थ दीवान (मृत्यु 1801)

कायस्थों का नवाबों के साथ जुड़ाव इटावा के एक सक्सेना कायस्थ , नवल राय (मृत्यु 1750) के साथ शुरू हुआ । 1748 में, सफ़दरजंग ने उन्हें इलाहाबाद का उप-राज्यपाल नियुक्त किया और उन्हें पहले राजा और फिर महाराजा की उपाधि दी गई । नवल की मृत्यु सफ़दरजंग की ओर से पठानों के विरुद्ध युद्ध के मैदान में हुई [ 45 [ 46 ]

आसफ़-उद-दौला के शासनकाल में , कायस्थ राजा टिकैत राय , जो दीवान ( अनुवाद  "वित्त मंत्री" ) के रूप में कार्यरत थे, क्षेत्र के प्रशासन में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति बन गए। [ 47 [ 48 ] उनके बाद कई कायस्थ प्रशासकों जैसे राजा झाऊ लाल, राजा गुलाब राय, मुंशी हरदयाल, त्रिलोक चंद बख्शी, राजा जिया लाल और कई अन्य ने अवध के प्रशासन और सांस्कृतिक गतिविधियों में महत्वपूर्ण योगदान दिया। [ 49 ]

कुछ क्षेत्रों में, कायस्थ लगभग इस्लामी आध्यात्मिक रुझान के बाहरी संकेतों को अपनाने के लिए ज़्यादा इच्छुक थे । कई लोग सूफ़ी दरगाहों के सक्रिय सदस्य थे और मुहर्रम और आशूरा के शिया आध्यात्मिक महीनों में अक्सर वहाँ जाते थे । [ 50 ] 1780 के दशक में लखनऊ में , हज़ारों कायस्थ सुलेखक के रूप में काम करते थे, जिन्हें हाफ़िज़ और सादी की फ़ारसी रचनाओं में महारत हासिल थी । [ 51 ]

अवध के कायस्थ शिव दास 'लखनवी' ने फ़ारसी में अपनी स्मारकीय कृति शाहनामा मुनव्वर कलाम लिखी, जो सम्राट फर्रुखसियर (1712 ई. ) के समय से सम्राट मुहम्मद शाह के चौथे शासनकाल (1723 ई. ) तक की घटनाओं, राजनीतिक उथल-पुथल और गुटीय संघर्षों का विवरण प्रदान करती है। [ 52 [ 53 [ 54 ]

भक्ति आंदोलन

कायस्थ भी उत्तर भारत में बड़े भक्ति आंदोलन का हिस्सा बन गए।

ध्रुवदास (मृत्यु 1643), देवबंद (उत्तर प्रदेश) के एक कायस्थ , जिनका परिवार सरकारी कर्मचारी था, राधावल्लभ संप्रदाय के अग्रणी कवियों में से एक माने जाते हैं। [ 55 ] एक अन्य कायस्थ घनानंद (मृत्यु 1739), जिन्होंने मुगल सम्राट मुहम्मद शाह के मीर मुंशी ( अनुवाद  "मुख्य लेखक" ) के रूप में कार्य किया, ने अपना सांसारिक जीवन त्याग दिया और अहमद शाह अब्दाली के सैनिकों द्वारा मारे जाने तक वृंदावन में रहे। उन्हें ब्रजभाषा के सर्वश्रेष्ठ कवियों में से एक माना जाता है। [ 56 ] सबसे महत्वपूर्ण योगदान लालाच कवि का था, जो रायबरेली के एक कायस्थ थे , जिन्होंने 1530 ई. में संस्कृत ग्रंथ भागवत पुराण के "दशम स्कंध" का पहला हिंदी स्थानीय भाषा में रूपांतरण लिखा था। [ 57 ]

ब्रिटिश राज

1820 के दशक तक, ईस्ट इंडिया कंपनी का कृषि कराधान कागज-प्रबंधकों के एक नेटवर्क पर आधारित हो गया था जो मुगल काल के अंत तक पहुँच गया था। रजिस्ट्रार और एकाउंटेंट "किराए, आकलन और किराया दरों पर बातचीत के तरीकों" पर महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते थे। [ 58 ] 1856 में अवध के विलय से उपजे महान विद्रोह में , लखनऊ और फैजाबाद में कई पुराने नवाबी राजकोषीय रिकॉर्ड नष्ट कर दिए गए थे । कायस्थ कानूनगो और मुंशी राजकोषीय समेकन और क्षेत्र के उत्तर भारतीय प्रशासन में एकीकरण को प्राप्त करने में बहुत मददगार साबित हुए। [ 59 ] और इस अर्थ में, कायस्थ औपनिवेशिक नौकरशाही में प्रसिद्ध हो गए और यह देखा गया कि:

इस कर्तव्य के लिए क्युत [कायस्थ] जाति के हिंदुओं को हमेशा प्राथमिकता दी जाती है... आम तौर पर कहा जाए तो [वे] सम्मानित, अच्छे कपड़े पहने और बुद्धिमान होते हैं, और एक गाँव में प्रवेश करते समय उनके साथ बहुत अधिक वजन होता है, वे बहुत महत्व रखते हैं, और गाँव के अधिकारियों को बहुत अधिक परेड और शो के साथ उपस्थित होने के लिए बुलाते हैं... वे कभी भी अपने सिर पर चट्टा (छाता) लिए हुए वाहक के बिना नहीं आते हैं। [ ​​60 ]

इस प्रकार, प्रारंभिक औपनिवेशिक प्रशासन प्रभावशाली कायस्थ परिवारों द्वारा आकार लिया गया, जो ब्रिटिश सत्ता और सफलता के शुरुआती लाभार्थी बने। 1919 में, कांग्रेस द्वारा सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत के समय, उत्तर भारत में भारतीय सरकार के सभी विधि सदस्यों में से दो-तिहाई कायस्थ थे, जिनमें से अधिकांश संयुक्त प्रांत में थे । [ 17 ] एक प्रसिद्ध गौड़ कायस्थ, बृज भुखन लाल, अवध में न्यायिक रजिस्ट्रार का पद धारण करने वाले पहले भारतीय बने । [ 61 ]

कायस्थ समाचार

मुंशी काली प्रसाद, जिन्होंने कायस्थ पाठशाला की भी स्थापना की, ने एक उर्दू पत्रिका - कायस्थ समाचार का प्रकाशन शुरू किया । इसे भारतीय पत्रिकाओं में मान्यता मिली और 1903 में इसे दिल्ली दरबार में आमंत्रित किया गया । बाद में इसकी भाषा बदलकर अंग्रेज़ी कर दी गई और इसका नाम बदलकर हिंदुस्तान रिव्यू और कायस्थ समाचार और बाद में हिंदुस्तान रिव्यू कर दिया गया । [ 62 ] 1904 तक, हिंदुस्तान रिव्यू और कायस्थ समाचार का प्रसार किसी भी भारतीय मासिक पत्रिका से सबसे ज़्यादा था। [ 63 ]

विवादों

1880 के दशक में, एलन ऑक्टेवियन ह्यूम ने औपनिवेशिक सरकार से आह्वान किया [ 16 ] :

उन कायस्थों पर कर लगाओ... जो कलम के बल पर अमीर बनते हुए, अपने से बेहतर लोगों को उनकी पैतृक सम्पत्ति से बेदखल कर देते हैं, और फिर इतने बड़े कायर हो जाते हैं कि अपनी अर्जित सम्पत्ति की रक्षा के लिए या अपनी सफलता को बढ़ावा देने वाली सरकार की सहायता के लिए तलवार नहीं चलाते।

अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की रणनीति के तहत , 1901 में, क्वींस कॉलेज के प्रिंसिपल को बनारस के कमिश्नर और उसके ज़िला कलेक्टर से निर्देश मिला कि कलेक्टर के पद के लिए उम्मीदवार " कायस्थों के अलावा अन्य जातियों से होने चाहिए ।" इस प्रकार, ब्राह्मणों और अन्य जातियों के लिए जगह बनाई गई । [ 64 ]

भारत की जनगणना (1931)

1931 की भारतीय जनगणना के अनुसार, चित्रगुप्तवंशी कायस्थ संयुक्त प्रांत आगरा और अवध में सबसे साक्षर जाति समूह थे । 7 वर्ष और उससे अधिक आयु के लगभग 70% कायस्थ पुरुष और 19% महिलाएँ साक्षर थीं। [ 65 [ 66 ]

तालिका 2. ब्रिटिश भारत के संयुक्त प्रांत में 1931 की भारत की जनगणना के अनुसार विभिन्न जाति समूहों की अनुमानित साक्षरता दरें । [ 65 ]
जातिपुरुष साक्षरता (%)महिला साक्षरता (%)
कायस्थ7019
वैश्य386
सैयद389
भूमिहार313
ब्राह्मण293
मुगल265
पठान152

आधुनिक भारत

आधुनिक विद्वान उन्हें भारतीय समुदायों में वर्गीकृत करते हैं जिन्हें पारंपरिक रूप से "शहरी-उन्मुख", "उच्च जाति" और "सुशिक्षित" अखिल भारतीय अभिजात वर्ग का हिस्सा बताया गया है, साथ ही खत्री , कश्मीरी पंडित , पारसी , गुजरात के नागर ब्राह्मण , दक्षिण भारतीय ब्राह्मण , देशस्थ ब्राह्मण , चितपावन ब्राह्मण , प्रभु कायस्थ , भद्रलोक बंगाली और मुस्लिम और ईसाई समुदायों के उच्च वर्ग जो 1947 में भारतीय स्वतंत्रता के समय मध्यम वर्ग का गठन करते थे । [ 67 [ 68 [ 69 ]

वर्ण स्थिति

कायस्थों की कार्यक्षमता, जो स्वयं को "चित्रगुप्त और कागज़-आधारित सेवा" से जोड़ते थे, 1870 के दशक से पहले अधिक महत्वपूर्ण थी, और ऐतिहासिक रूप से, उनकी जातिगत स्थिति अस्पष्ट रही है। [ 70 [ 71 ] उत्तर भारत के कायस्थ स्वयं को एक वास्तविक वर्ण मानते हैं जो अपने से पहले आए चार वर्णों का लेखा-जोखा रखने के लिए उत्पन्न हुआ था । उनसे जुड़ी परंपराएँ और व्यवसाय, तथा उनके पूर्वज चित्रगुप्त को सौंपी गई पौराणिक भूमिकाओं में उनका विश्वास , आंशिक रूप से इस दावे का समर्थन करते हैं। [ 72 [ 73 [ 74 ]

सामाजिक स्थिति

1900 तक, कायस्थ एक 'सेवा जाति' के रूप में इतने प्रभावशाली हो गए कि "उत्तर भारत के शासन को आकार देने की उनकी क्षमता के कारण ब्रिटिश अधिकारियों ने उनकी संख्या कम करने के लिए कई बार आह्वान किया"। [ 75 ] उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध के नृवंशविज्ञानियों और पर्यवेक्षकों ने हिंदू समाज में कायस्थों की उच्च सामाजिक स्थिति पर सर्वसम्मति से सहमति व्यक्त की। [ 76 ]

उन्हें अगड़ी जाति के रूप में मान्यता प्राप्त है, क्योंकि वे अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों को आवंटित किसी भी आरक्षण लाभ के लिए योग्य नहीं हैं जो भारत सरकार द्वारा प्रशासित हैं । [ 77 ]

समाज और संस्कृति

चित्रगुप्तवंशी कायस्थ मुख्यतः बारह उपसमूहों में विभाजित हैं। इन उपसमूहों ने पारंपरिक रूप से अपने उपसमूह के भीतर अंतर्विवाह प्रथा का पालन किया है। एच. बेलेनॉइट ने दर्शाया है कि ये उपसमूह हिंदुस्तान के कुछ भौगोलिक क्षेत्रों में निवास करते थे 

उपसमूहों

 चित्रगुप्त
पूर्वज
 
  
 नंदिनी
पत्नी
 शोभावती
पत्नी
  
            
भानु
श्रीवास्तव
विभानु
सूर्यध्वज
विश्वभानु
निगम
वीर्यवान
कुलश्रेष्ठ
चारु
माथुर
चित्रचारु
कर्ण
चित्राक्षा
भटनागर
सुचारू
गौर
चारुस्ता
अष्ठाना
हिमवान
अम्बष्ठ
मतिमान
सक्सेना
अतीन्दया
वाल्मीक

लेखन प्रणाली

ऊपर : शेरशाह सूरी के सिक्कों पर कैथी लिपि (बाएं तरफ सबसे नीचे की रेखा) ; नीचे : चित्रगुप्त पूजा अनुष्ठान जिसमें कलम और कागज की पूजा शामिल है।

कैथी एक ऐतिहासिक ब्राह्मी लिपि है जिसका प्रयोग उत्तरी भारत के कुछ हिस्सों, विशेषकर अवध और बिहार में व्यापक रूप से किया जाता था । इस लिपि का नाम "कायस्थ" शब्द से लिया गया है। [ 78 ] कैथी के दस्तावेज़ कम से कम 16वीं शताब्दी के हैं। मुगल काल में इस लिपि का व्यापक रूप से प्रयोग किया जाता था।

ब्रिटिश राज में , कुछ प्रांतों में लिपि को अदालतों की आधिकारिक लिपि के रूप में मान्यता दी गई थी। अवध में जॉन नेसफील्ड , बिहार में जॉर्ज कैंपबेल और बंगाल में एक समिति ने शिक्षा में लिपि के इस्तेमाल की वकालत की। [ 79 ]

औरत

परंपरागत रूप से, उत्तर भारतीय कायस्थ महिलाओं को स्कूल जाने और शिक्षा प्राप्त करने की अनुमति थी, लेकिन औपनिवेशिक युग की जनगणना रिपोर्ट के अनुसार, उन्हें " राजपूत महिलाओं की तुलना में कहीं अधिक एकांत में" रखा जाता था। [ 80 ] ऐसा प्रतीत होता है कि जाति के कुछ मुखिया भी रखैलें रखते थे। [ 81 [ 82 ]

2015 में एक ज़िला न्यायालय में किए गए एक सर्वेक्षण से पता चला कि कायस्थ जाति ने कुल मिलाकर सबसे ज़्यादा महिला वकील पैदा की हैं। भारतीय समाज की अधिकांश अन्य जातियों के विपरीत, कायस्थ जाति आमतौर पर ज़मीन के बजाय रोज़गार पर निर्भर रहती है, इसलिए इस जाति के पुरुष और महिलाएँ दोनों ही पेशेवर योग्यता प्राप्त करने के बाद विवाह करते हैं। इसलिए, कायस्थ महिलाएँ औसत से ज़्यादा उम्र में विवाह करती हैं। [ 83 ]

समारोह

सभी प्रमुख हिंदू त्योहारों को मनाने के अलावा, कायस्थ दिवाली के त्यौहार के आसपास चित्रगुप्त पूजा भी मनाते हैं । [ 84 [ 85 ] यह अनुष्ठान कलम, कागज, स्याही-पात्र और चित्रगुप्त के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है जिन्हें कायस्थ विरासत का अनिवार्य हिस्सा माना जाता है। [ 86 ]

आहार और व्यंजन

कायस्थ भोजन मांस पर बहुत अधिक ध्यान केंद्रित करता है - वास्तव में, कायस्थ मेनू में अधिकांश सब्जियां मांस के समान ही तैयार की जाती हैं। [ 87 ] फिर भी पारंपरिक रूप से मांस खाना अक्सर सार्वजनिक क्षेत्र तक ही सीमित होता है क्योंकि कायस्थ घर पर शाकाहारी भोजन का सेवन करते हैं। [ 88 ]

शिक्षा और साक्षरता

भारत की अंतिम पूर्ण जनगणना 1931 के अनुसार, चित्रगुप्तवंशी कायस्थ संयुक्त प्रांत आगरा और अवध में सबसे साक्षर जाति समूह थे । 7 वर्ष और उससे अधिक आयु के लगभग 70% कायस्थ पुरुष और 19% महिलाएँ साक्षर थीं। [ 65 [ 89 ]

तालिका 2. ब्रिटिश भारत के संयुक्त प्रांत में 1931 की भारत की जनगणना के अनुसार विभिन्न जाति समूहों की अनुमानित साक्षरता दरें । [ 65 ]
जातिपुरुष साक्षरता (%)महिला साक्षरता (%)
कायस्थ7019
वैश्य386
सैयद389
भूमिहार313
ब्राह्मण293
मुगल265
पठान152

कुलीन लोग

राजनेता और क्रांतिकारी

साहित्य

विज्ञान और प्रौद्योगिकी

अभिनेता और कलाकार

०००

करण कायस्थ कायस्थों का एक समुदाय है जो ओडिशा और मिथिला क्षेत्र में निवास करता है, जो अब भारत और नेपाल के बीच विभाजित क्षेत्र है । [ 1 ]

मूल

मनु , एक हिंदू धर्मग्रंथ के अनुसार , करण को ब्रात्य (पतित) क्षत्रिय माना जाता है । [ 2 ] [ स्पष्टीकरण आवश्यक ]

संस्कृति और पेशा

पुरातत्ववेत्ता बी.पी. सिन्हा कहते हैं कि करणों का कर्तव्य राजसेवा और दुर्गंतपुररक्षा था। [ 1 ] [ पृष्ठ आवश्यक ] स्पष्टीकरण आवश्यक ]

पुरालेखशास्त्री दिनेशचंद्र सरकार का उल्लेख है कि संबंधित भौगोलिक स्थानों में कई ऐतिहासिक शिलालेख और अभिलेख पाए गए हैं जो दर्शाते हैं कि करण, करणिन, करणीक, करणका और करणीगर शब्दों का प्रयोग क्लर्कों से लेकर मंत्रियों तक के नौकरशाही वर्ग को दर्शाने के लिए किया जाता था। इनमें लघु शिलालेख संख्या II, लोकविग्रह के कनास पट्ट, समाचारदेव का घुग्रहती ताम्रपत्र और लोकनाथ का टिपर ताम्रपत्र आदि प्रमुख हैं। [ 3 ] [ पृष्ठ आवश्यक ]

मिथिला के कर्ण

कर्ण कायस्थों को मैथिल ब्राह्मणों के साथ मिथिला संस्कृति के प्राचीन अवतार के रूप में देखा जाता है। वे चार वर्ण व्यवस्था में फिट नहीं बैठते, फिर भी इस क्षेत्र की एक प्रमुख जाति बन गए। [ 4 ] [ पृष्ठ आवश्यक ]

बंगाल के करण

करण जाति समूह को मध्यकालीन युग ( बंगाली कायस्थ ) से बंगाल क्षेत्र में भी पाया जा सकता है। करण का पद एक पेशेवर पदनाम हुआ करता था जो साक्षर लोगों द्वारा धारण किया जाता था। [ 5 ] वे विशेष रूप से सत्तारूढ़ शक्तियों के मंत्री, सलाहकार, राज्यपाल, सैन्य कमांडर, लेखाकार, रिकॉर्ड रखने वाले और दीवान के रूप में सेवा करते थे। [ 6 [ 7 [ 8 ] पृष्ठ आवश्यक ] इतिहासकार रमेश चंद्र मजूमदार के अनुसार करण ने खुद को कायस्थ जाति में मिला लिया, जिन्होंने वही पेशा किया। [ 9 ]

उल्लेखनीय लोग

ओडिशा का करण

ओडिशा में करण को लेखक जाति समुदाय के सदस्यों के रूप में संदर्भित किया जाता है, वे ओडिशा के एक समृद्ध और प्रभावशाली समुदाय हैं और सामाजिक पदानुक्रम में ब्राह्मणों के बाद दूसरे स्थान पर हैं। [ 10 ] करण को मध्यकालीन काल में भूमि अनुदान प्राप्त हुआ और ओडिशा में सामंती दर्जा प्राप्त था। [ 11 ] करण ने मध्यकालीन काल में सरकार में उच्च पद भी संभाले थे। [ 12 ] सिरकार के अनुसार भजस शिलालेख में भूमि अभिलेखों में शामिल व्यक्तियों की एक सूची का उल्लेख है और इसमें एक वाक्यांश 'ब्राह्मण-करण-पुरोगा-निवासी' शामिल है जो उनकी सामाजिक स्थिति का एक अच्छा संकेत है। [ 3 ] इतिहासकार आरएस शर्मा ने यह भी उल्लेख किया है कि लोकनाथ, एक करण को भी शिलालेखों में ब्राह्मण के रूप में संदर्भित किया गया था, यहां तक ​​​​कि वर्तमान परिदृश्य में भी वे हाल के वर्षों में कई मुख्यमंत्रियों सहित ओडिशा में अच्छी राजनीतिक शक्ति रखते हैं। [ 13 ] [ पृष्ठ आवश्यक ] करण खुद को कायस्थों से अलग एक अलग समूह मानते हैं। [ 14 ] करण ने ओडिशा में दस्तावेज़ लिखने के लिए अपने समुदाय के नाम पर अपनी अनूठी " करणी " लिपि भी विकसित की थी। [ 15 [ 16 [ 17 ] इसके अतिरिक्त करण का उल्लेख गंगा और गजपति अभिलेखों में "ग्राम करण" और "मंडला करण" के रूप में भी किया गया है , जिनके पास बड़ी संख्या में गांवों पर अधिकार था, इसी तरह गजपति काल के "चामू करण" और "देउला करण" क्रमशः राजा के निजी सचिव और जगन्नाथ मंदिर के मुख्य प्रशासक थे। [ 18 ] करण पूर्वी गंगा राजवंश में एक महत्वपूर्ण सामाजिक समूह के रूप में उभरे , जैसा कि शुरुआती गंगा अभिलेखों से स्पष्ट है, उन्होंने गंगा प्रशासन में विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर कब्जा कर लिया, [ 19 ] गंगा वंश के नरसिंह देव 4 के अधीन एक महत्वपूर्ण अधिकारी जिसका नाम “श्रीकरण पटनायक विश्वनाथ महासेनापति” था, पूर्वी गंगा राजवंश में चार दंडपाटों या क्षेत्रों का गवर्नर और सेनापति था, वह पूर्वी गंगा राजवंश का “ चतुर्दिक दंड परिखा” या उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम चारों दिशाओं का “गवर्नर जनरल” के रूप में जाना जाता था जैसा कि गंगा शिलालेखों से स्पष्ट है। [ 20 [ 21 ] अथगड़ा पटना का श्रीकरण पटनायक नामक एक सैन्य जनरलकहा जाता है कि शासक गोविंदचंद्र के अधीन गंजम जिले के राज्य ने भांजा शासक के खिलाफ एक सफल अभियान का नेतृत्व किया और उसे हराया, उनके नेतृत्व में विजयी सेना ने काकरसाली के भांजा किले पर कब्जा कर लिया और मंदरागढ़ नामक एक नया किला बनाया, श्रीकरण पटनायक ने कब्जे वाले किले की रक्षा के लिए 300 सैनिक रखे थे। [ 22 ] इसी तरह रामानंद रे और उनके भाई गोपीनाथ बडजेना गजपति साम्राज्य में गवर्नर थे । [ 23 [ 24 ] करण क्षत्रियों के समुदाय से उभरे । [ 25 ] करण ओडिशा के प्रमुख भूमिधारक थे, हालांकि 1866 के उड़ीसा अकाल के बाद , कुछ करण जमींदारों के लिए भूमि जोत का प्रतिशत घट गया। [ 26 ] करण समुदाय के त्रिलोचन पटनायक नामक एक अधिकारी, जो ओडिशा के मराठा शासन के दौरान राजस्व संग्रह के प्रभारी थे, ने 1775 में बड़ी मात्रा में नज़राना (धन) देकर मराठों से “कोटदेश” की ज़मींदारी हासिल करने में कामयाबी हासिल की थी, त्रिलोचन पटनायक ने अपनी बुद्धिमत्ता और कौशल से मराठा प्रशासन में अपनी पहचान बनाई थी, वे ओडिशा की सबसे बड़ी ज़मींदारी सम्पदाओं में से एक के संस्थापक बने। 1792 में त्रिलोचन पटनायक के बाद उनके बेटे नारायण चोटराय ने गद्दी संभाली, नारायण चोटराय ओडिशा पर ब्रिटिश विजय के दौरान कोटदेश के ज़मींदार थे, ब्रिटिश विजय के समय “कोटदेश” ओडिशा की 7 बड़ी ज़मींदारियों में से एक थी 

उल्लेखनीय लोग

आंध्र और तेलंगाना का करणम या सिस्ताकर्णम

करणम ( तेलुगु : కరణం) या कर्णम भारतीय राज्यों आंध्र प्रदेश और तेलंगाना का एक कार्यालय और उपाधि थी । परंपरागत रूप से, करणम एक अधिकारी होता था जो गाँवों के खातों और अभिलेखों का रखरखाव करता था और कर एकत्र करता था। [ 29 [ 30 ] सिरकार का उल्लेख है कि वे मुख्यतः लेखा, नौकरशाही, शिक्षण आदि से संबंधित कार्य करते थे। [ 3 ]

तमिलनाडु और केरल के करुनीगर

संदर्भ

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००० 

 

कायस्थलघु URL

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कायस्थ
"कलकत्ता के कायस्थ", 19वीं शताब्दी में प्रकाशित एक पुस्तक से
धर्म हिन्दू धर्म
भाषाबंगाली , हिंदी , पंजाबी , मराठी , उड़िया , असमिया , मैथिली और उर्दू
आबादी वाला क्षेत्रअसम , पंजाब , उत्तर प्रदेश , राजस्थान , उत्तराखंड , दिल्ली , बिहार , झारखंड , पश्चिम बंगाल , ओडिशा , मध्य प्रदेश , छत्तीसगढ़ , महाराष्ट्र , भारत और नेपाल
उपविभाग12 मुख्य समूह

कायस्थ हिंदुओं की एक जाति है । बंगाली कायस्थ एक बंगाली हिंदू है जो कायस्थ संप्रदाय का सदस्य है। पूरे भारत में कायस्थों की ऐतिहासिक जाति मुंशी, प्रशासक, मंत्री, ज़मींदार और रिकॉर्ड रखने वालों की थी; [ 1 ] बंगाल के कायस्थों को ऐतिहासिक रूप से ब्राह्मणों और वैद्यों के साथ तीन 'उच्च जातियों' में से एक माना जाता है । [ 2 [ 3 ] सेन काल के दौरान, विशेष रूप से 11वीं शताब्दी के आसपास, कायस्थ एक बड़े समुदाय के रूप में उभरे। [ 4 ] औपनिवेशिक काल के दौरान, यदि विशेष रूप से नहीं, तो बंगाल के कुलीन वर्ग का एक बड़ा हिस्सा इस जाति से उभरा, जिसने पश्चिम बंगाल में एक सामूहिक आधिपत्य बनाए रखा। [ 5 [ 6 [ 7 ]

इतिहास

भारतीय इतिहासकार तेज राम शर्मा के अनुसार, बंगाल में कायस्थ कार्यालय गुप्त काल (लगभग 320 से 550 ई.) से पहले स्थापित हो चुका था, हालाँकि उस समय कायस्थ जाति का कोई उल्लेख नहीं मिलता। वे लिखते हैं,

हमारे अभिलेखों में पाए जाने वाले ब्राह्मणों के नाम कभी-कभी गैर-ब्राह्मण उपनामों जैसे भट्ट, दत्त और कुंड आदि पर समाप्त होते हैं, जो बंगाली अभिलेखों में पाए जाते हैं। दत्त, दाम, पालित, पाल, कुंड (कुंडू), दास, नाग और नंदिन जैसे उपनाम अब बंगाल के कायस्थों तक ही सीमित हैं, ब्राह्मणों तक नहीं। बंगाल में खोजे गए कई प्रारंभिक अभिलेखों में आधुनिक बंगाली कायस्थ पहचान वाले बड़ी संख्या में ब्राह्मण नामों को देखते हुए, कुछ विद्वानों ने सुझाव दिया है कि बंगाल के वर्तमान कायस्थ समुदाय में पर्याप्त ब्राह्मण तत्व मौजूद हैं। मूल रूप से कायस्थ (लेखक) और वैद्य (चिकित्सक) के पेशे प्रतिबंधित नहीं थे और ब्राह्मणों सहित विभिन्न जातियों के लोग उनका पालन कर सकते थे। इसलिए यह संभावना है कि ब्राह्मणों ने अन्य जातियों के सदस्यों के साथ मिलकर बंगाल के वर्तमान कायस्थ और वैद्य समुदायों का गठन किया।

शर्मा ने यह भी लिखा है कि इतिहासकार भंडारकर ने उल्लेख किया है कि नागर ब्राह्मणों द्वारा समान उपाधियों का उपयोग किया जाता था। [ 8 ] कुछ मध्ययुगीन साहित्य का हवाला देते हुए, रवींद्रनाथ चक्रवर्ती ने लिखा है कि, ऐसे मध्ययुगीन ग्रंथों के अनुसार, "कायस्थ नागर ब्राह्मणों के वंशज थे, जिनकी 8वीं शताब्दी ईस्वी में बंगाल में एक बड़ी बस्ती थी"। [ 9 ]

एक अन्य इतिहासकार, आंद्रे विंक के अनुसार, इस जाति का उल्लेख पहली बार 5वीं-6वीं शताब्दी ईस्वी के आसपास मिलता है, और सेन राजवंश (11वीं-12वीं शताब्दी) के दौरान यह एक पूर्ण जाति बन गई। इस अवधि के दौरान, इस वर्ग में अधिकारियों या शास्त्रियों के बीच "सत्तावादी" क्षत्रिय और ब्राह्मणों का बड़ा बहुमत शामिल था, जिन्होंने अपनी जातिगत पहचान बनाए रखी या बौद्ध बन गए। दक्षिण भारत की तरह, बंगाल में भी स्पष्ट रूप से परिभाषित क्षत्रिय जाति का अभाव था। पाल, सेन, चंद्र और वर्मन राजवंश और उनके वंशज, जिन्होंने क्षत्रिय का दर्जा प्राप्त करने का दावा किया, कायस्थ जाति में विलीन हो गए, हालाँकि उन्हें भी "शूद्र माना जाता था"। रिचर्ड एम. ईटन का मानना ​​है कि, इस राजवंश के अवशेषों के शामिल होने के बाद, कायस्थ "क्षेत्र का वैकल्पिक क्षत्रिय या योद्धा वर्ग" बन गए। [ 10 [ 11 ]

शेखर बनर्जी भी मानते हैं कि गुप्त काल के बाद कायस्थ एक जाति के रूप में उभरे। बंगाल में वर्ग और जाति के बीच संबंध को देखते हुए, बनर्जी लिखते हैं कि कायस्थ, ब्राह्मणों और वैद्यों के साथ, भूमि पर नियंत्रण रखते थे, हालाँकि वे शारीरिक श्रम से दूर रहते थे, और इस प्रकार "बंगाल की तीन पारंपरिक उच्च जातियों" का प्रतिनिधित्व करते थे। [ 3 ] ईटन लिखते हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप पर मुस्लिम विजय के बाद भी, कायस्थ "प्रमुख भूस्वामी समुदाय" या ज़मींदार बने रहे, और इसमें उस क्षेत्र के पुराने हिंदू शासकों के वंशज भी शामिल थे। [ 11 ]

प्राचीन अभिलेखों और अभिलेखों में राजसी अधिकारियों, लेखकों या लेखाकारों के एक वर्ग का उल्लेख मिलता है, जिन्हें करण या कायस्थ के रूप में पहचाना जाता है। कोशकार वैजयंती (11वीं शताब्दी ई.) ने कायस्थ और करण को समानार्थी माना और उन्हें लेखकों के रूप में चित्रित किया। बंगाल के दो मध्यकालीन धार्मिक ग्रंथों में भी करण नामक एक जातीय समूह का उल्लेख है। कुछ विशेषज्ञ करण और कायस्थ जातियों को एक समान या समतुल्य मानते हैं। अन्य विशेषज्ञों का दावा है कि करण और कायस्थ जातियाँ अंततः बंगाल में, भारत के अन्य भागों की तरह, एक ही जाति में विलीन हो गईं। [ 12 [ 13 [ 14 [ 15 ]

1931 की जनगणना के अनुसार, केवल 12.7% कायस्थ पारंपरिक लिपिकीय कार्य में लगे हुए थे। [ 16 ] चूँकि बंगाल में कृषि मुख्य व्यवसाय था, इसलिए 37.6% कायस्थ कृषि में लगे हुए थे। [ 17 ] वैद्यों और ब्राह्मणों के बाद कायस्थ देश का तीसरा सबसे साक्षर समुदाय था। [ 18 [ 19 ] वे बंगाल की अन्य 'उच्च जातियों' की तुलना में व्यापार और प्रशासन में बहुत अधिक शामिल थे, लेकिन उनके बीच बेरोजगारों की संख्या लगभग बराबर थी। [ 20 ]

जातिगत स्थिति

बंगाल का हिंदू समुदाय चार जातियों में विभाजित था: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र।

औपनिवेशिक युग

भारतीय लेखकों और पर्यवेक्षकों के एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि कायस्थों से परिचित कई लोग उन्हें द्विज या द्विजातीय मानते थे। बेलनोइट के अनुसार, रवींद्रनाथ टैगोर ने क्षत्रिय वंश के दावे का समर्थन उनके "प्रशासन में सम्मान और प्रमुखता और साक्षरता की समग्र दर" के कारण किया था। अब्दुल शरर, जो उनसे अच्छी तरह परिचित थे, ने भी द्विज मूल के दावे का समर्थन किया, उनकी उच्च शैक्षिक दर का हवाला देते हुए जिसे एक शूद्र जाति हासिल नहीं कर सकती थी। हालांकि, बंगाली कायस्थों के द्विज दर्जे के दावे का भारतीय पर्यवेक्षक योगेंद्र नाथ भट्टाचार्य ने समर्थन नहीं किया, जिन्होंने उनके दावे का खंडन करने के लिए उनके अनुष्ठानों का हवाला दिया। 21 ] 1931 की बंगाल की जनगणना में बताया गया कि ' उच्च रैंकिंग' वाले कायस्थ समुदाय ने क्षत्रिय का दर्जा

आधुनिक युग

प्रोफेसर जूलियस जे. लिपनर ने लिखा है कि बंगाली कायस्थों की जातिगत स्थिति विवादित है और कुछ विशेषज्ञ उन्हें "द्विज समूह से संबंधित नहीं, बल्कि शूद्रों में उच्च स्थान पर मानते हैं; अन्य विशेषज्ञों के लिए वे क्षत्रियों के बराबर हैं और उन्हें द्विज का दर्जा दिया गया है।" [ 23 ] जॉन हेनरी हटन के अनुसार, कायस्थ बंगाल में एक महत्वपूर्ण जाति है, इस जाति को अब "आम तौर पर द्विज माना जाता है और वे क्षत्रिय होने का दावा करते हैं, हालांकि सौ साल पहले उन्हें शायद सत शूद्र माना जाता था"। [ 2 ] सान्याल ने लिखा है कि बंगाल में वैश्य और क्षत्रिय वर्गों की कमी के कारण, बंगाल में सभी गैर-ब्राह्मण जातियों को, तथाकथित "उच्च जातियों" सहित, शूद्र माना जाता था; बंगाली कायस्थों को उनकी उच्च सामाजिक स्थिति के कारण तीन उच्च जातियों में माना जाता है। [ 24 ] लॉयड रूडोल्फ और सुज़ैन रूडोल्फ ने नोट किया कि रोनाल्ड इंडेन (मानवविज्ञानी) ने 1964-65 का कुछ समय बंगाल में बिताने के बाद, कायस्थों के अपने अध्ययन में पाया कि शहरी शिक्षित "दोहरी जातियों" - कायस्थ, वैद्य और ब्राह्मणों के बीच अंतर्जातीय विवाह बढ़ रहे थे। [ 25 ]

जनजाति

कुलीन कायस्थ और मूल कायस्थ

इंडेन के अनुसार, "भारत की कई उच्च जातियाँ ऐतिहासिक रूप से वर्गों या कुलों में संगठित रही हैं"। [ 26 ] 1500 ई. के आसपास बंगाली कायस्थ छोटी उपजातियों और यहां तक ​​कि छोटे कुलों (कुलों) में संगठित हो गए थे । [ 27 ] चार मुख्य जनजातियाँ दक्षिणा-राधी, बंगजा, उत्तरा-राधी और वरेंद्र थीं। दक्षिणा-राधी और बंगजा जनजातियों को कुलिन (उच्च कुल रैंक) और मौलिक, निचली जाति रैंक में विभाजित किया गया था। मौलिक के चार और विभाग थे। उत्तरा-राधी और वरेंद्र ने अपने आदिवासी विभाजन को परिभाषित करने के लिए 'सिद्ध', 'साध्य', 'कास्ता' और 'अमूलजा' शब्दों का इस्तेमाल किया। [ 28 ]

मूल कथा

बेलनोइट कहते हैं कि बंगाली कायस्थों को "मुख्य उत्तर भारतीय कायस्थों की एक शाखा के रूप में देखा जाता है, जो हिंदू राजाओं (900 ईस्वी) के अनुरोध पर ग्रामीण इलाकों में बसने के लिए प्राचीन राजधानी कन्नौज से बंगाल की ओर पलायन करने के कारण अपने वंश का दावा करते हैं। घोष, मित्रा और दत्ता के प्रसिद्ध नामों पर। समय के साथ उन्होंने खुद को एक बड़े कायस्थ समूह के गौड़ विभाग के रूप में स्थापित किया, जिन्होंने उत्तर भारतीय मूल का दावा किया"। [ 29 ]

बंगाली कायस्थों की एक उप-जनजाति, कुलीन कायस्थों की एक संबंधित कथा, पाँच कायस्थों के बारे में बताती है जो कन्नौज से ब्राह्मणों के साथ आए थे, जिन्हें पौराणिक राजा आदिसुर ने बंगाल आमंत्रित किया था। इस कथा के कई संस्करण मौजूद हैं, जिनमें से सभी को इतिहासकार मिथक या लोककथा मानते हैं जिनकी कोई ऐतिहासिक वैधता नहीं है। [ 30 ] स्वरूप गुप्ता के अनुसार, यह कथा

... बंगाल की एक अर्ध-ऐतिहासिक, समाजशास्त्रीय कथा के रूप में स्थापित है और उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी के प्रारंभ में जाति और उपजाति की उत्पत्ति और संबंधों की वास्तविकता को समझाने के लिए तैयार है। [ 31 ]

इस किंवदंती के अनुसार, पाँच मूल कायस्थ वंश देव, बसु, घोष, मित्र, गुहा और दत्त थे, [ 32 ] जिनमें से पहले चार वंश कुलीन कायस्थ थे। [ 33 [ 34 ]

उल्लेखनीय व्यक्तित्व

आध्यात्मिक

लेखक, कवि और साहित्यकार

वैज्ञानिक और आविष्कारक

राजनीतिज्ञ, कार्यकर्ता और क्रांतिकारी

सांस्कृतिक व्यक्ति

.बीरेंद्र कृष्ण भद्र

  • सोनू निगम
  • मन्ना डे
  • सुबीर नंदी
  • प्रबीर मित्रा
  • सलिल चौधरी
  • सत्यजीत रे
  • गिरीश घोष
  • पुष्टि करना
  • बिमल कर

संदर्भ

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  21. हेडन जे. बेलेनोइट (2017). भारत में औपनिवेशिक राज्य का गठन: लेखक, कागज़ और कर 1760-1860 . टेलर एंड फ्रांसिस. पृष्ठ  178,176. आईएसबीएन 978-113449429319 अप्रैल 2021 को लिया गया .
  22. जवाहर सरकार (2016). मध्यकालीन पश्चिमी बंगाल में हिंदू पहचान का निर्माण. विकास अध्ययन संस्थान, कोलकाता. पृ. 68
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  24. मैल्कम मैकलीन (1998). देवी को समर्पित: रामप्रसाद का जीवन और कार्य . सनी प्रेस. पृ.  163–. आईएसबीएन 978-1-4384-1258-0.
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  26. इंडेन (1976) , पृष्ठ  1
  27. इंडेन (1976) , पृ.  1–2
  28. इंडेन (1976) , पृष्ठ  34
  29. हेडन जे. बेलेनोइट (17 फ़रवरी 2017)। भारत में औपनिवेशिक राज्य का गठन: लेखक, कागज़ और कर, 1760-1860 । टेलर एंड फ्रांसिस। पृष्ठ  34। आईएसबीएन 978-1-134-49429-310 जून 2018 को लिया गया .
  30. सेनगुप्ता (2001) , पृष्ठ  25
  31. गुप्ता (2009) , पृ.  103–104
  32. "दत्ता चौधरी वंश" । 14 फरवरी 2021।
  33. इंडेन (1976) , पृ.  55–56
  34. हॉपकिंस (1989) , पृ.  35–36कोई नहीं

उद्धरण

    ग्रन्थसूची


    'चित्रगुप्त ' और 'कायस्थ' क्या हैं ?
    विजय राज बली माथुर
    विजय माथुर पुत्र स्वर्गीय ताज राजबली माथुर,मूल रूप से दरियाबाद (बाराबंकी) के रहनेवाले हैं.१९६१ तक लखनऊ में थे . पिता जी के ट्रांसफर के कारण बरेली, शाहजहांपुर,सिलीगुड़ी,शाहजहांपुर,मेरठ,आगरा ( १९७८ में अपना मकान बना कर बस गए) अब अक्टूबर २००९ से पुनः लखनऊ में बस गए हैं. १९७३ से मेरठ में स्थानीय साप्ताहिक पत्र में मेरे लेख छपने प्रारंभ हुए.आगरा में भी साप्ताहिक पत्रों,त्रैमासिक मैगजीन और फिर यहाँ लखनऊ के भी एक साप्ताहिक पत्र में आपके लेख छप चुके है.अब 'क्रन्तिस्वर' एवं 'विद्रोही स्व-स्वर में' दो ब्लाग लिख रहे हैं तथा 'कलम और कुदाल' ब्लाग में पुराने छपे लेखों की स्कैन कापियां दे
    रहे हैं .ज्योतिष आपका व्यवसाय है और लेखन तथा राजनीति शौक है.
    *
    प्रतिवर्ष विभिन्न कायस्थ समाजों की ओर से देश भर मे भाई-दोज के अवसर पर कायस्थों के उत्पत्तिकारक के रूप मे 'चित्रगुप्त जयंती'मनाई जाती है।कायस्थ बंधु' बड़े गर्व से पुरोहितवादी/ब्राह्मणवादी कहानी को कह व सुना तथा लिख -दोहरा कर प्रसन्न होते हैं परंतु सच्चाई को न कोई समझना चाह रहा है न कोई बताना चाह रहा है। आर्यसमाज,कमला नगर-बलकेशवर,आगरा मे दीपावली पर्व के प्रवचनों में स्वामी स्वरूपानन्द जी ने बहुत स्पष्ट रूप से समझाया था, उनसे पूर्व प्राचार्य उमेश चंद्र कुलश्रेष्ठ ने सहमति व्यक्त की थी। आज उनके शब्द आपको भेंट करता हूँ।
    प्रत्येक प्राणी के शरीर में 'आत्मा' के साथ 'कारण शरीर' व 'सूक्ष्म शरीर' भी रहते हैं। यह भौतिक शरीर तो मृत्यु होने पर नष्ट हो जाता है किन्तु 'कारण शरीर' और 'सूक्ष्म शरीर' आत्मा के साथ-साथ तब तक चलते हैं जब तक कि,'आत्मा' को मोक्ष न मिल जाये। इस सूक्ष्म शरीर में 'चित्त'(मन) पर 'गुप्त'रूप से समस्त कर्मों-सदकर्म,दुष्कर्म एवं अकर्म अंकित होते रहते हैं। इसी प्रणाली को 'चित्रगुप्त' कहा जाता है। इन कर्मों के अनुसार मृत्यु के बाद पुनः दूसरा शरीर और लिंग इस 'चित्रगुप्त' में अंकन के आधार पर ही मिलता है। अतः, यह पर्व 'मन'अर्थात 'चित्त' को शुद्ध व सतर्क रखने के उद्देश्य से मनाया जाता था। इस हेतु विशेष आहुतियाँ हवन में दी जाती थीं। आज कोई ऐसा नहीं करता है। बाजारवाद के जमाने में भव्यता-प्रदर्शन दूसरों को हेय समझना ही ध्येय रह गया है। यह विकृति और अप-संस्कृति है। काश लोग अपने अतीत को जान सकें और समस्त मानवता के कल्याण -मार्ग को पुनः अपना सकें। हमने तो लोक-दुनिया के प्रचलन से हट कर मात्र हवन की पद्धति को ही अपना लिया है। इस पर्व को एक जाति-वर्ग विशेष तक सीमित कर दिया गया है।
    पौराणिक पोंगापंथी ब्राह्मणवादी व्यवस्था में जो छेड़-छाड़ विभिन्न वैज्ञानिक आख्याओं के साथ की गई है उससे 'कायस्थ' शब्द भी अछूता नहीं रहा है।
    'कायस्थ'=क+अ+इ+स्थ
    क=काया या ब्रह्मा ;
    अ=अहर्निश;इ=रहने वाला;
    स्थ=स्थित।
    'कायस्थ' का अर्थ है ब्रह्म में अहर्निश स्थित रहने वाला सर्व-शक्तिमान व्यक्ति। आज से दस लाख वर्ष पूर्व मानव अपने वर्तमान स्वरूप में आया तो ज्ञान-विज्ञान का विकास भी किया। वेदों मे वर्णित मानव-कल्याण की भावना के अनुरूप शिक्षण- प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई। जो लोग इस कार्य को सम्पन्न करते थे उन्हे 'कायस्थ' कहा गया। ये मानव की सम्पूर्ण 'काया' से संबन्धित शिक्षा देते थे अतः इन्हे 'कायस्थ' कहा गया। किसी भी अस्पताल में आज भी जनरल मेडिसिनविभाग का हिन्दी रूपातंरण आपको 'काय चिकित्सा विभाग' ही मिलेगा। उस समय आबादी अधिक न थी और एक ही व्यक्ति सम्पूर्ण काया से संबन्धित सम्पूर्ण ज्ञान-जानकारी देने मे सक्षम था। किन्तु जैसे-जैसे आबादी बढ़ती गई शिक्षा देने हेतु अधिक लोगों की आवश्यकता पड़ती गई। 'श्रम-विभाजन' के आधार पर शिक्षा भी दी जाने लगी। शिक्षा को चार वर्णों मे बांटा गया-
    1. जो लोग ब्रह्मांड से संबन्धित शिक्षा देते थे उनको 'ब्राह्मण' कहा गया और उनकेद्वारा प्रशिक्षित विद्यार्थी शिक्षा पूर्ण करने के उपरांत जो उपाधि धारण करता थावह 'ब्राह्मण' कहलाती थी और उसी के अनुरूप वह ब्रह्मांड से संबन्धित शिक्षा देनेके योग्य माना जाता था।
    2- जो लोग शासन-प्रशासन-सत्ता-रक्षा आदि से संबन्धित शिक्षा देते थे उनको'क्षत्रिय'कहा गया और वे ऐसी ही शिक्षा देते थे तथा इस विषय मे पारंगत विद्यार्थीको 'क्षत्रिय' की उपाधि से विभूषित किया जाता था जो शासन-प्रशासन-सत्ता-रक्षा से संबन्धित कार्य करने व शिक्षा देने के योग्य माना जाता था।
    3-जो लोग विभिन व्यापार-व्यवसाय आदि से संबन्धित शिक्षा प्रदान करते थे उनको 'वैश्य' कहा जाता था। इस विषय मे पारंगत विद्यार्थी 'वैश्य' की उपाधि से विभूषित किये जाते थे जो व्यापार-व्यवसाय करने और इसकी शिक्षा देने के योग्य मान्य थे ।
    4-जो लोग विभिन्न सूक्ष्म -सेवाओं से संबन्धित शिक्षा देते थे उनको 'क्षुद्र' कहा जाता था और इन विषयों मे पारंगत विद्यार्थी को 'क्षुद्र' की उपाधि से विभूषित किया जाता था जो विभिन्न सेवाओं मे कार्य करने व इनकी शिक्षा प्रदान करने के योग्य मान्य थे। ध्यान देने योग्य महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य और क्षुद्र सभी योग्यता आधारित उपाधियाँ थी। ये सभी कार्य श्रम-विभाजन पर आधारित थे । अपनी योग्यता और उपाधि के आधार पर एक पिता के अलग-अलग पुत्र-पुत्रियाँ ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य और क्षुद्र हो सकते थे उनमे किसी प्रकार का भेद-भाव न था।'कायस्थ' चारों वर्णों से ऊपर होता था और सभी प्रकार की शिक्षा -व्यवस्था के लिए उत्तरदाई था।
    ब्रह्मांड की बारह राशियों के आधार पर कायस्थ को भी बारह वर्गों मे विभाजित किया गया था। जिस प्रकार ब्रह्मांड चक्राकार रूप मे परिभ्रमण करने के कारण सभी राशियाँ समान महत्व की होती हैं उसी प्रकार बारहों प्रकार के कायस्थ भी समान ही थे। कालांतर मे व्यापार-व्यवसाय से संबन्धित वर्ग ने दुरभि-संधि करके शासन-सत्ता और पुरोहित वर्ग से मिल कर 'ब्राह्मण' को श्रेष्ठ तथा योग्यता आधारित उपाधि -वर्ण व्यवस्था को जन्मगत जाति-व्यवस्था मे परिणत कर दिया जिससे कि बहुसंख्यक 'क्षुद्र' सेवा-दाताओं को सदा-सर्वदा के लिए शोषण-उत्पीड़न का सामना करना पड़ा उनको शिक्षा से वंचित करके उनका विकास-मार्ग अवरुद्ध कर दिया गया।'कायस्थ' पर ब्राह्मण ने अतिक्रमण करके उसे भी दास बना लिया और 'कल्पित' कहानी गढ़ कर चित्रगुप्त को ब्रह्मा की काया से उत्पन्न बता कर कायस्थों मे भी उच्च-निम्न का वर्गीकरण कर दिया।
    खेद एवं दुर्भाग्य की बात है कि आज कायस्थ-वर्ग खुद ब्राह्मणों के बुने कुचक्र को ही मान्यता दे रहा है और अपने मूल चरित्र को भूल चुका है। कहीं कायस्थ खुद को 'वैश्य' वर्ण का अंग बता रहा है तो कहीं 'क्षुद्र' वर्ण का बता कर अपने लिए आरक्षण की मांग कर रहा है। यह जन्मगत जाति-व्यवस्था शोषण मूलक है और मूल भारतीय अवधारणा के प्रतिकूल है। आज आवश्यकता है योग्यता मूलक वर्ण-व्यवस्था बहाली की एवं उत्पीड़क जाति-व्यवस्था के निर्मूलन की।'कायस्थ' वर्ग को अपनी मूल भूमिका का निर्वहन करते हुए भ्रष्ट ब्राह्मणवादी -जातिवादी -जन्मगत व्यवस्था को ध्वस्त करके 'योग्यता आधारित' मूल वर्ण व्यवस्था को बहाल करने की पहल करनी चाहिए।
    ***
    सभी कायस्थों से विशेष आग्रह--"नागपंचमी" पे सभी कायस्थ अपने कुल पूर्वज "नागों"की पूजा अवश्य करे,,,-पद्म पुराण के अनुसार,चित्रगुप्त जी के बारह पुत्रों का विवाह नागराज वासुकी की बारह कन्याओं से सम्पन्न हुआ। इसी कारण कायस्थों की ननिहाल नागवंश मानी जाती है और नागपंचमी के दिन नाग पूजा की जाती है।इसलिए आप सभी जिस प्रकार भगवान चित्रगुप्त जी का अवतरण दिवस धूमधाम से मनाते है,उसी प्रकार ये भी अवश्य मनाए-जय चित्रगुप्त-जय चित्रांश-- भगवान चित्रगुप्त के 12 पुत्रों का विवाह और उनका विवरण इस प्रकार है--
    इन बारह पुत्रों के दंश के अनुसार कायस्थ कुल में १२ शाखाएं हैं जो - श्रीवास्तव, सूर्यध्वज, वाल्मीक, अष्ठाना, माथुर, गौड़, भटनागर, सक्सेना, अम्बष्ठ, निगम, कर्ण, कुलश्रेष्ठ नामों से चलती हैं।[6] अहिल्या, कामधेनु, धर्मशास्त्र एवं पुराणों के अनुसार इन बारह पुत्रों का विवरण इस प्रकार से है:
    नंदिनी-पुत्र
    1-भानु
    प्रथम पुत्र भानु कहलाये जिनका राशि नाम धर्मध्वज था| चित्रगुप्त जी ने श्रीभानु को श्रीवास (श्रीनगर) और कान्धार क्षेत्रों में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था| उनका विवाह नागराज वासुकी की पुत्री पद्मिनी से हुआ था एवं देवदत्त और घनश्याम नामक दो पुत्रों हुए। देवदत्त को कश्मीर एवं घनश्याम को सिन्धु नदी के तट का राज्य मिला। श्रीवास्तव २ वर्गों में विभाजित हैं - खर एवं दूसर। इनके वंशज आगे चलकर कुछ विभागों में विभाजित हुए जिन्हें अल कहा जाता है। श्रीवास्तवों की अल इस प्रकार हैं - वर्मा, सिन्हा, अघोरी, पडे, पांडिया,रायजादा, कानूनगो, जगधारी, प्रधान, बोहर, रजा सुरजपुरा,तनद्वा, वैद्य, बरवारिया, चौधरी, रजा संडीला, देवगन, इत्यादि।[6]
    2-विभानू
    द्वितीय पुत्र विभानु हुए जिनका राशि नाम श्यामसुंदर था। इनका विवाह मालती से हुआ। चित्रगुप्त जी ने विभानु को काश्मीर के उत्तर क्षेत्रों में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा। इन्होंने अपने नाना सूर्यदेव के नाम से अपने वंशजों के लिये सूर्यदेव का चिन्ह अपनी पताका पर लगाने का अधिकार एवं सूर्यध्वज नाम दिया। अंततः वह मगध में आकर बसे।[6]
    3-विश्वभानू
    तृतीय पुत्र विश्वभानु हुए जिनका राशि नाम दीनदयाल था और ये देवी शाकम्भरी की आराधना करते थे। चित्रगुप्त जी ने उनको चित्रकूट और नर्मदा के समीप वाल्मीकि क्षेत्र में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था। इनका विवाह नागकन्या देवी बिम्ववती से हुआ एवं इन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा भाग नर्मदा नदी के तट पर तपस्या करते हुए बिताया जहां तपस्या करते हुए उनका पूर्ण शरीर वाल्मीकि नामक लता से ढंक गया था, अतः इनके वंशज वाल्मीकि नाम से जाने गए और वल्लभपंथी बने। इनके पुत्र श्री चंद्रकांत गुजरात जाकर बसे तथा अन्य पुत्र अपने परिवारों के साथ उत्तर भारत में गंगा और हिमालय के समीप प्रवासित हुए। वर्तमान में इनके वंशज गुजरात और महाराष्ट्र में पाए जाते हैं , उनको "वल्लभी कायस्थ" भी कहा जाता है।[6]
    4-वीर्यभानू
    चौथे पुत्र वीर्यभानु का राशि नाम माधवराव था और इनका विवाह देवी सिंघध्वनि से हुआ था। ये देवी शाकम्भरी की पूजा किया करते थे। चित्रगुप्त जी ने वीर्यभानु को आदिस्थान (आधिस्थान या आधिष्ठान) क्षेत्र में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा। इनके वंशजों ने आधिष्ठान नाम से अष्ठाना नाम लिया एवं रामनगर (वाराणसी) के महाराज ने उन्हें अपने आठ रत्नों में स्थान दिया। वर्तमान में अष्ठाना उत्तर प्रदेश के कई जिले और बिहार के सारन, सिवान , चंपारण, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी,दरभंगा और भागलपुर क्षेत्रों में रहते हैं। मध्य प्रदेश में भी उनकी संख्या है। ये ५ अल में विभाजित हैं |[
    ऐरावती-पुत्र
    5-चारु
    ऐरावती के प्रथम पुत्र का नाम चारु था एवं ये गुरु मथुरे के शिष्य थे तथा इनका राशि नाम धुरंधर था। इनका विवाह नागपुत्री पंकजाक्षी से हुआ एवं ये दुर्गा के भक्त थे। चित्रगुप्त जी ने चारू को मथुरा क्षेत्र में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था अतः इनके वंशज माथुर नाम से जाने गये। तत्कालीन मथुरा राक्षसों के अधीन था और वे वेदों को नहीं मानते थे। चारु ने उनको हराकर मथुरा में राज्य स्थापित किया। तत्पश्चात् इन्होंने आर्यावर्त के अन्य भागों में भी अपने राज्य का विस्तार किया। माथुरों ने मथुरा पर राज्य करने वाले सूर्यवंशी राजाओं जैसे इक्ष्वाकु, रघु, दशरथ और राम के दरबार में भी कई महत्त्वपूर्ण पद ग्रहण किये। वर्तमान माथुर ३ वर्गों में विभाजित हैं -देहलवी,खचौली एवं गुजरात के कच्छी एवं इनकी ८४ अल हैं। कुछ अल इस प्रकार हैं- कटारिया, सहरिया, ककरानिया, दवारिया,दिल्वारिया, तावाकले, राजौरिया, नाग, गलगोटिया, सर्वारिया,रानोरिया इत्यादि। एक मान्यता अनुसार माथुरों ने पांड्या राज्य की स्थापना की जो की वर्तमान में मदुरै, त्रिनिवेल्ली जैसे क्षेत्रों में फैला था।[7] माथुरों के दूत रोम के ऑगस्टस कैसर के दरबार में भी गए थे।[6]
    6-सुचारु
    द्वितीय पुत्र सुचारु गुरु वशिष्ठ के शिष्य थे और उनका राशि नाम धर्मदत्त था। ये देवी शाकम्बरी की आराधना करते थे। चित्रगुप्त जी ने सुचारू को गौड़ देश में राज्य स्थापित करने भेजा था एवं इनका विवाह नागराज वासुकी की पुत्री देवी मंधिया से हुआ।[6] इनके वंशज गौड़ कहलाये एवं ये ५ वर्गों में विभाजित हैं: - खरे, दुसरे, बंगाली, देहलवी, वदनयुनि। गौड़ कायस्थों को ३२ अल में बांटा गया है। गौड़ कायस्थों में महाभारत के भगदत्त और कलिंग के रुद्रदत्त राजा हुए थे।
    7-चित्र
    तृतीय पुत्र चित्र हुए जिन्हें चित्राख्य भी कहा जाता है, गुरू भट के शिष्य थे, अतः भटनागर कहलाये। इनका विवाह देवी भद्रकालिनी से हुआ था तथा ये देवी जयंती की अराधना करते थे। चित्रगुप्त जी ने चित्राक्ष को भट देश और मालवा में भट नदी के तट पर राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था। इन क्ष्त्रों के नाम भी इन्हिं के नाम पर पड़े हैं। इन्होंने चित्तौड़ एवं चित्रकूट की स्थापना की और वहीं बस गए।[6] इनके वंशज भटनागर के नाम से जाने गए एवं ८४ अल में विभाजित हैं, इनकी कुछ अल इस प्रकार हैं- डसानिया, टकसालिया, भतनिया, कुचानिया, गुजरिया,बहलिवाल, महिवाल, सम्भाल्वेद, बरसानिया, कन्मौजिया इत्यादि| भटनागर उत्तर भारत में कायस्थों के बीच एक आम उपनाम है।
    8-मतिभान
    चतुर्थ पुत्र मतिमान हुए जिन्हें हस्तीवर्ण भी कहा जाता है। इनका विवाह देवी कोकलेश में हुआ एवं ये देवी शाकम्भरी की पूजा करते थे। चित्रगुप्त जी ने मतिमान को शक् इलाके में राज्य स्थापित करने भेजा। उनके पुत्र महान योद्धा थे और उन्होंने आधुनिक काल के कान्धार और यूरेशिया भूखंडों पर अपना राज्य स्थापित किया। ये शक् थे और शक् साम्राज्य से थे तथा उनकी मित्रता सेन साम्राज्य से थी, तो उनके वंशज शकसेन या सक्सेना कहलाये। आधुनिक इरान का एक भाग उनके राज्य का हिस्सा था।[6] वर्तमान में ये कन्नौज, पीलीभीत, बदायूं, फर्रुखाबाद, इटाह,इटावा, मैनपुरी, और अलीगढ में पाए जाते हैं| सक्सेना लोग खरे और दूसर में विभाजित हैं और इस समुदाय में १०६ अल हैं, जिनमें से कुछ अल इस प्रकार हैं- जोहरी, हजेला, अधोलिया, रायजादा, कोदेसिया, कानूनगो, बरतरिया, बिसारिया, प्रधान, कम्थानिया, दरबारी, रावत, सहरिया,दलेला, सोंरेक्षा, कमोजिया, अगोचिया, सिन्हा, मोरिया, इत्यादि|
    9-हिमवान
    पांचवें पुत्र हिमवान हुए जिनका राशि नाम सरंधर था उनका विवाह भुजंगाक्षी से हुआ। ये अम्बा माता की अराधना करते थे तथा चित्रगुप्त जी के अनुसार गिरनार और काठियवार के अम्बा-स्थान नामक क्षेत्र में बसने के कारण उनका नाम अम्बष्ट पड़ा। हिमवान के पांच पुत्र हुए: नागसेन, गयासेन, गयादत्त, रतनमूल और देवधर। ये पाँचों पुत्र विभिन्न स्थानों में जाकर बसे और इन स्थानों पर अपने वंश को आगे बढ़ाया। इनमें नागसेन के २४ अल, गयासेन के ३५ अल, गयादत्त के ८५ अल, रतनमूल के २५ अल तथा देवधर के २१ अल हैं। कालाम्तर में ये पंजाब में जाकर बसे जहाँ उनकी पराजय सिकंदर के सेनापति और उसके बाद चन्द्रगुप्त मौर्य के हाथों हुई। मान्यता अनुसार अम्बष्ट कायस्थ बिजातीय विवाह की परंपरा का पालन करते हैं और इसके लिए "खास घर" प्रणाली का उपयोग करते हैं। इन घरों के नाम उपनाम के रूप में भी प्रयोग किये जाते हैं। ये "खास घर" वे हैं जिनसे मगध राज्य के उन गाँवों का नाम पता चलता है जहाँ मौर्यकाल में तक्षशिला से विस्थापित होने के उपरान्त अम्बष्ट आकर बसे थे। इनमें से कुछ घरों के नाम हैं- भीलवार, दुमरवे, बधियार, भरथुआर, निमइयार, जमुआर,कतरयार पर्वतियार, मंदिलवार, मैजोरवार, रुखइयार, मलदहियार,नंदकुलियार, गहिलवार, गयावार, बरियार, बरतियार, राजगृहार,देढ़गवे, कोचगवे, चारगवे, विरनवे, संदवार, पंचबरे, सकलदिहार,करपट्ने, पनपट्ने, हरघवे, महथा, जयपुरियार, आदि|[6]
    10-चित्रचारु
    छठवें पुत्र का नाम चित्रचारु था जिनका राशि नाम सुमंत था और उनका विवाह अशगंधमति से हुआ। ये देवी दुर्गा की अराधना करते थे। चित्रगुप्त जी ने चित्रचारू को महाकोशल और निगम क्षेत्र (सरयू नदी के तट पर) में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा। उनके वंशज वेदों और शास्त्रों की विधियों में पारंगत थे जिससे उनका नाम निगम पड़ा। वर्तमान में ये कानपुर, फतेहपुर, हमीरपुर, बंदा, जलाओं,महोबा में रहते हैं एवं ४३ अल में विभाजित हैं। कुछ अल इस प्रकार हैं- कानूनगो, अकबरपुर, अकबराबादी, घताम्पुरी,चौधरी, कानूनगो बाधा, कानूनगो जयपुर, मुंशी इत्यादि।
    11-चित्रचरण
    सातवें पुत्र चित्रचरण थे जिनका राशि नाम दामोदर था एवं उनका विवाह देवी कोकलसुता से हुआ। ये देवी लक्ष्मी की आराधना करते थे और वैष्णव थे। चित्रगुप्त जी ने चित्रचरण को कर्ण क्षेत्र (वर्तमाआन कर्नाटक) में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था। इनके वंशज कालांतर में उत्तरी राज्यों में प्रवासित हुए और वर्तमान में नेपाल, उड़ीसा एवं बिहार में पाए जाते हैं। ये बिहार में दो भागों में विभाजित है: गयावाल कर्ण – गया में बसे एवं मैथिल कर्ण जो मिथिला में जाकर बसे। इनमें दास, दत्त, देव, कण्ठ, निधि,मल्लिक, लाभ, चौधरी, रंग आदि पदवी प्रचलित हैं। मैथिल कर्ण कायस्थों की एक विशेषता उनकी पंजी पद्धति है, जो वंशावली अंकन की एक प्रणाली है। कर्ण ३६० अल में विभाजित हैं। इस विशाल संख्या का कारण वह कर्ण परिवार हैं जिन्होंने कई चरणों में दक्षिण भारत से उत्तर की ओर प्रवास किया। यह ध्यानयोग्य है कि इस समुदाय का महाभारत के कर्ण से कोई सम्बन्ध नहीं है।
    12--चारुण
    अंतिम या आठवें पुत्र चारुण थे जो अतिन्द्रिय भी कहलाते थे। इनका राशि नाम सदानंद है और उन्होंने देवी मंजुभाषिणी से विवाह किया। ये देवी लक्ष्मी की आराधना करते थे। चित्रगुप्त जी ने अतिन्द्रिय को कन्नौज क्षेत्र में राज्य स्थापित करने भेजा था। अतियेंद्रिय चित्रगुप्त जी की बारह संतानों में से सर्वाधिक धर्मनिष्ठ और सन्यासी प्रवृत्ति वाले थे। इन्हें 'धर्मात्मा' और 'पंडित' नाम से भी जाना गया और स्वभाव से धुनी थे। इनके वंशज कुलश्रेष्ठ नाम से जाने गए तथा आधुनिक काल में ये मथुरा, आगरा, फर्रूखाबाद, एटा, इटावा और मैनपुरी में पाए जाते हैं | कुछ कुलश्रेष्ठ जो की माता नंदिनी के वंश से हैं, नंदीगांव - बंगाल में पाए जाते हैं |
    ०००
    ॥ ॐ यमाय धर्मराजाय श्री चित्रगुप्ताय वै नमः ॥
    कायस्थ - धर्मराज चित्रगुप्त के वंसज
    वर्ण / जति - द्विज -क्षत्रिय ( राजन्य कायस्थ )
    गरुड़ पुराण में कहा गया है कि चित्रगुप्त का राज्य सिंहासन यमपुरी में है और वो अपने न्यायालय में मनुष्यों के कर्मों के अनुसार उनका न्याय करते हैं तथा उनके कर्मों का लेखा जोखा रखते हैं, जो कि निम्नवत स्पष्ट हैं :-
    ‘धर्मराज चित्रगुप्त: श्रवणों भास्करादय: कायस्थ तत्र पश्यनित पाप पुण्यं च सर्वश:’
    चित्रगुप्तम, प्रणम्यादावात्मानं सर्वदेहीनाम। कायस्थ जन्म यथाथ्र्यान्वेष्णे नोच्यते मया।।
    ☻ भवन्तौ क्षत्रवर्णस्थौ द्विजन्मनौ महाशयी । कृतोप वितीनो स्थान वेद शस्त्रधिकारिणी ॥ (पद्म पुराण )
    " चित्रगुप्त को क्षत्रिय वर्ण का बताते हुए कहा गया है की वेदो को समझने व् ज्ञान रखने के वजह से आप यज्ञोपवीत के अधिकारी हैं जिन्हे द्विज -क्षत्रिय कहा जाता है । "
    कमलाकरभट्ट क्रित वृहत्ब्रहम्खण्ड् में लिखा है-
    भवान क्षत्रिय वर्णश्च समस्थान समुद्भवात्। कायस्थ्: क्षत्रिय: ख्यातो भवान भुवि विराजते॥
    ☻चित्र वचो मयागुप्तम् चित्रगुप्त स्मृत बुधै । सः गत्वा कोट नगरे चंडी भजन तत्परः ॥ (पद्म पुराण )
    " आपका निवास संयम नगरी में है जो नगरकोट में है और आप चंडी के उपाशक हो । "
    विष्णु धर्म सूत्र (विष्णु स्मृति ग्रंथ के प्रथम परिहास के प्रथम श्लोक में तो कायस्थ को परमेश्वर का रुप कहा गया है।
    येनेदम स्वैच्छया, सर्वम, माययाम्मोहितम जगत। स जयत्यजित: श्रीमान कायस्थ: परमेश्वर:।।
    स्कंद पुराण में कायस्थ के सात लक्षणों को बताया गया है ।
    " विद्या वाश्च्य शुचि; धीरो , दाता परोप्कराकः ! राज्य सेवी , क्षमाशील; कायस्थ सप्त लक्षणा ; !!
    यजुर्वेद आपस्तम्ब शाखा चतुर्थ खंड यम विचार प्रकरण से ज्ञात होता है कि महाराज चित्रगुप्त के वंसज चित्ररथ ( चैत्ररथ ) जो चित्रकुट के महाराजाधिराज थे और गौतम ऋषि के शिष्य थे ।
    बहौश्य क्षत्रिय जाता कायस्थ अगतितवे। चित्रगुप्त: सिथति: स्वर्गे चित्रोहिभूमण्डले।।
    चैत्ररथ: सुतस्तस्य यशस्वी कुल दीपक:। ऋषि वंशे समुदगतो गौतमो नाम सतम:।।
    तस्य शिष्यो महाप्रशिचत्रकूटा चलाधिप:।।
    “प्राचीन काल में क्षत्रियों में कायस्थ इस जगत में हुये उनके पूर्वज चित्रगुप्त स्वर्ग में निवास करते हैं तथा उनके पुत्र चित्र इस भूमण्डल में सिथत है उसका पुत्र (वंसज ) चैत्रस्थ अत्यन्त यशस्वी और कुलदीपक है जो ऋषि-वंश के महान ऋषि गौतम का शिष्य है वह अत्यन्त महाज्ञानी परम प्रतापी चित्रकूट का राजा है।”
    यमांश्चैके-यमायधर्मराजाय मृतयवे चान्तकाय च। वैवस्वताय, कालाय, सर्वभूत क्षयाय च।।
    औदुम्बराय, दघ्नाय नीलाय परमेषिठने। वृकोदराय, चित्रायत्र चित्रगुप्ताय त नम:।।
    एकैकस्य-त्रीसित्रजन दधज्जला´जलीन। यावज्जन्मकृतम पापम, तत्क्षणा देव नश्यति।।
    यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्वत, काल, सर्वभूतों का क्षय करने वाले, औदुम्बर, चित्र, चित्रगुप्त, एकमेव, आजन्म किये पापों को तत्क्षण नष्ट कर सकने में सक्षम, नील वर्ण आदि विशेषण चित्रगुप्त के परमप्रतापी स्वरूप का बखान करते हैं। पुणयात्मों के लिए वे कल्याणकारी और पापियों के लिए कालस्वरूप है।
    ☻द्विज - हिन्दू रीती रिवाज के अनुसार जनेऊ ( यज्ञोपवीत ) कराने के बाद दूसरा जन्म मानते हैं जो जातियां इन्हे करती हैं द्विज कहलाती है ।
    ☻द्विज -क्षत्रिय :- प्राचीन वेद ज्ञान परंपरा के अनुसार ब्राहमणो के सामान वेद ज्ञानी क्षत्रिय को द्विज क्षत्रिय कहा गया है ।

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    कायस्थ सिर्फ जाति नहीं बल्कि पांचवा वर्ण है!


    कायस्थ समाज की जाति व्यवस्था पर एस ए अस्थाना ने एक अध्ययन किया है. अपने अध्ययन की भूमिका में वे लिखते हैं कि “स्मरण करो एक समय था जब आधे से अधिक भारत पर कायस्थों का शासन था। कश्मीर में दुर्लभ बर्धन कायस्थ वंश, काबुल और पंजाब में जयपाल कायस्थ वंश, गुजरात में बल्लभी कायस्थ राजवंश, दक्षिण में चालुक्य कायस्थ राजवंश, उत्तर भारत में देवपाल गौड़ कायस्थ राजवंश


    तथा मध्य भारत में सतवाहन और परिहार कायस्थ राजवंश सत्ता में रहे हैं। अतः हम सब उन राजवंशों की संतानें हैं, हम बाबू नने के लिए नहीं, हिन्दुस्तान पर प्रेम, ज्ञान और शौर्य से परिपूर्ण उस हिन्दू संस्कृति की स्थापना के लिए पैदा हुए हैं जिन्होंने हमें जन्म दिया है।”
    एक घटना का जिक्र करते हुए अस्थाना अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि एक बार स्वामी विवेकानन्द से भी एक सभा में उनसे उनकी जाति पूछी गयी थी. अपनी जाति अथवा वर्ण के बारे में बोलते हुए विवेकानंद ने कहा था “मैं उस महापुरुष का वंशधर हूँ, जिनके चरण कमलों पर प्रत्येक ब्राह्मण ‘‘यमाय धर्मराजाय चित्रगुप्ताय वै नमः’’ का उच्चारण करते हुए पुष्पांजलि प्रदान करता है और जिनके वंशज विशुद्ध रूप से क्षत्रिय हैं। यदि अपनें पुराणों पर विश्वास हो तो, इन समाज सुधारको को जान लेना चाहिए कि मेरी जाति ने पुराने जमानें में अन्य सेवाओं के अतिरिक्त कई शताब्दियों तक आधे भारत पर शासन किया था। यदि मेरी जाति की गणना छोड़ दी जाये, तो भारत की वर्तमान सभ्यता का शेष क्या रहेगा ? अकेले बंगाल में ही मेरी जाति में सबसे बड़े कवि, सबसे बड़े इतिहास वेत्ता, सबसे बड़े दार्शनिक, सबसे बड़े लेखक और सबसे बड़े धर्म प्रचारक हुए हैं। मेरी ही जाति ने वर्तमान समय के सबसे बड़े वैज्ञानिक से भारत वर्ष को विभूषित किया है।’’
    वर्ण व्यवस्था में कायस्थों के स्थान के बारे में विवरण देते हुए वे खुद स्पष्टीकरण देते हुए लिखते हैं कि “अक्सर यह प्रश्न उठता रहता है कि चार वर्णों में क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र में कायस्थ किस वर्ण से संबंधित है। स्पष्ट है कि उपरोक्त चारों वर्णों के खाँचे में, कायस्थ कहीं भी फिट नहीं बैठता है। अतः इस पर तरह-तरह की किंवदंतियां उछलती चली आ रही है। उपरोक्त यक्ष प्रश्न “किस वर्ण के कायस्थ” का माकूल जबाब देने का आज समय आ गया है कि सभी चित्रांश बन्धुओं को अपने समाज के बारे में सोचने का अपनी वास्तविक पहचान का ज्ञान होना परम आवश्यक है।”
    शिव आसरे अस्थाना ने इस संबंध में जो तथ्य जुटाएं है और अध्ययन किया है वे महत्वपूर्ण हैं. अहिल्या कामधेनु संहिता और पद्मपुराण पाताल खण्ड के श्लोकों और साक्ष्यों से वे साबित करते हैं कि कायस्थ सिर्फ जाति नहीं बल्कि पांचवा वर्ण है. नीचे दिये गये उदाहरण देखिए-


    ब्राहस्य मुख मसीद बाहु राजन्यः कृतः।
    उरुतदस्य वैश्य, पद्यायागू शूद्रो अजायतः।। (अहिल्या कामधेनु संहिता)
    अर्थात् नव निर्मित सृष्टि के उचित प्रबन्ध तथा समाज की सुव्यवस्था के लिए श्री ब्रह्मा जी ने अपनें मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, उदर से वैश्य तथा चरणों से शूद्र उत्पन्न कर वर्ण ‘‘चतुष्टय’’ (चार वर्णों) की स्थापना की। सम्पूर्ण प्राणियों के शुभ-अशुभ कार्यों का लेखा-जोखा रखनें व पाप-पुण्य के अनुसार उनके लिये दण्ड या पुरस्कार निश्चित करने का दायित्ंव श्री ब्रह्मा जी ने श्री धर्मराज को सौंपा। कुछ समय उपरान्त श्री धर्मराज जी ने देखा कि प्रजापति के द्वारा निर्मित विश्व के समस्त प्राणियों का लेखा-जोखा रखना अकेले उनके द्वारा सम्भव नहीं है। अतः धर्मराज जी ने श्री ब्रह्मा जी से निवेदन किया कि ‘हे देव! आपके द्वारा उत्पन्न प्राणियों का विस्तार दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। अतः मुझे एक सहायक की आवश्यकता है। जिसे प्रदान करनें की कृपा करें।


    ‘‘अधिकारेषु लोका नां, नियुक्तोहत्व प्रभो।
    सहयेन बिना तंत्र स्याम, शक्तः कथत्वहम्।।’’ (अहिल्या कामधेनु संहिता)
    श्री धर्मराज जी के निवेदन पर विचार हेतु श्री ब्रह्मा जी पुनः ध्यानस्त हो गये। श्री ब्रह्मा जी एक कल्प तक ध्यान मुद्रा में रहे, योगनिद्रा के अवसान पर कार्तिक शुल्क द्वितीया के शुभ क्षणों में श्री ब्रह्मा जी ने अपने सन्मुख एक श्याम वर्ण, कमल नयन एक पुरूष को देखा, जिसके दाहिने हाथ में लेखनी व पट्टिका तथा बायें हाथ में दवात थी। यही था श्री चित्रगुप्त जी का अवतरण।


    ‘‘सन्निधौ पुरुषं दृष्टवा, श्याम कमल लोचनम्।
    लेखनी पट्टिका हस्त, मसी भाजन संयुक्तम्।।’’ (पद्मपुराण-पाताल खण्ड)
    इस दिव्य पुरूष का श्याम वर्णी काया, रत्न जटित मुकुटधारी, चमकीले कमल नयन, तीखी भृकुटी, सिर के पीछे तेजोमय प्रभामंडल, घुघराले बाल, प्रशस्त भाल, चन्द्रमा सदृश्य आभा, शंखाकार ग्रीवा, विशाल भुजाएं व उभरी जांघे तथा व्यक्तित्व में अदम्य साहस व पौरूष झलक रहा था। इस तेजस्वी पुरूष को अपने सन्मुख देख ब्रह्मा जी ने पूछा कि आप कौन है? दिव्य पुरूष ने विनम्रतापूर्वक करबद्ध प्रणाम कर कहा कि आपने समाधि में ध्यानस्त होकर मेरा आह्नवान चिन्तन किया, अतः मैं प्रकट हो गया हूँ। मैं आपका ही मानस पुत्र हूँ। आप स्वयं ही बताये कि मैं कौन हूँ ? कृपया मेरा वर्ण- निरूपण करें तथा स्पष्ट करें कि किस कार्य हेतु आपने मेरा स्मरण किया। इस प्रकार ब्रह्माजी अपने मानस पुत्र को देख कर बहुत हर्षित हुये और कहा कि हे तात! मानव समाज के चारों वर्णों की उत्पत्ति मेरे शरीर के पृथक-पृथक भागों से हुई है, परन्तु तुम्हारी उत्पत्ति मेरी समस्त काया से हुई है इस कारण तुम्हारी जाति ‘‘कायस्थ’’ होगी।


    मम् कायात्स मुत्पन्न, स्थितौ कायोऽभवत्त।
    कायस्थ इति तस्याथ, नाम चक्रे पितामहा।। (पद्म पुराण पाताल खण्ड)


    काया से प्रकट होनें का तात्पर्य यह है कि समस्त ब्रह्म-सृष्टि में श्री चित्रगुप्त जी की अभिव्यक्ति। अपनें कुशल दिव्य कर्मों से तुम ‘‘कायस्थ वंश’’ के संस्थापक होंगे। तुम्हें समस्त प्राणि मात्र की देह में अर्न्तयामी रूप से स्थित रहना होगा। जिससे उनकी आंतरिक मनोभावनाएं, विचार व कर्म को समझने में सुविधा हो।
    ‘‘कायेषु तिष्ठतति-कायेषु सर्वभूत शरीरेषु।
    अन्तर्यामी यथा निष्ठतीत।।’’ (पद्य पुराण पाताल खण्ड)


    ब्रह्माजी ने नवजात पुत्र को यह भी स्पष्ट किया कि ‘‘आप की उत्पत्ति हेतु मैने अपने चित्त को एकाग्र कर पूर्ण ध्यान में गुप्त किया था अतः आपका नाम ‘‘चित्रगुप्त’’ ही उपयुक्त होगा। आपका वास नगर कोट में रहेगा और आप चण्डी के उपासक होंगे।
    ‘‘चित्रं वचो मायागत्यं, चित्रगुप्त स्मृतो गुरूवेः।
    सगत्वा कोट नगर, चण्डी भजन तत्परः।।’’ (पद्य पुराण पाताल खण्ड)
    अपने इन उदाहरणों के जरिए वे साबित करते हैं कि कायस्थ पांचवा वर्ण है. अगर यह सच है तो कम से कम यह किताब भारत की वर्ण व्यवस्था को बड़ी चुनौती देती है. अभी तक की स्थापित मान्यताओं के उलट यह एक पांचवे वर्ण को सामने लाती है जिसका उल्लेख खुद स्वामी विवेकानन्द ने भी किया है. शिव आसरे अस्थाना मानते हैं कि वे खुद जाति व्यवस्था में विश्वास नहीं करते हैं लेकिन इसकी उपस्थिति और प्रभाव को खारिज नहीं किया जा सकता.
    लेकिन उनके इस अध्ययन से वह सवाल और जटिल हो जाता है जो वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था में घालमेल करता है. कायस्थ वर्ण का अस्तित्व कोई आज का नहीं है. यह हजारों साल पुराना है. उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार से लेकर कश्मीर तक किसी न किसी काल में कायस्थ राजा रहे हैं. ऐसा भी कहा जाता है कि अयोध्या में रघुवंश से पहले कायस्थों का ही शासन था. अगर पुरातन भारत में इस जाति/वर्ण का स्वर्णिम इतिहास रहा है तो आधुनिक भारत में डॉ राजेन्द्र प्रसाद, लाल बहादुर शास्त्री, सुभाष चंद्र बोस और विवेकानंद इसी वर्ण या जाति व्यवस्था से आते हैं. लेकिन यहां सवाल इन महापुरुषों का जाति निर्धारण करना नहीं है बल्कि उस चुनौती को समझना है जो जाति और वर्ण का घालमेल करता है. जाति के नाम पर नाक भौं सिकोड़नेवाले लोग भले ही तात्विक विवेचन से पहले ही अपना निर्णय कर लें लेकिन शिव आसरे अस्थाना का यह काम निश्चित रूप से भारतीय जाति व्यवस्था को समझने के लिए लिहाज से एक बेहतरीन प्रयास है....

    चित्रगुप्त और कायस्थ कौन हैं?? 
    *
                परात्पर परब्रह्म निराकार हैं। जो निराकार हो उसका चित्र नहीं बनाया जा सकता अर्थात उसका चित्र प्रगट न होकर गुप्त रहता है। कायस्थों के इष्ट यही चित्रगुप्त (परब्रह्म) हैं जो सृष्टि के निर्माता और समस्त जीवों के शुभ-अशुभ कर्मों का फल देते हैं। पुराणों में सृष्टि का वर्णन करते समय कोटि-कोटि ब्रह्मांड बताए गए हैं उनमें से हर एक का ब्रह्मा-विष्णु-महेश उसका निर्माण-पालन और नाश करता है अर्थात कर्म करता है। पुराणों में इन तीनों देवों को समय-समय पर शाप मिलने, भोगने और मुक्त होने की कथाएँ भी हैं। इन तीनों के कार्यों का विवेचन कर फल देनेवाला इनसे उच्चतर ही हो सकता है। इन तीनों के आकार वर्णित हैं, उच्चतर शक्ति ही निराकार हो सकती है। इसका अर्थ यह है कि देवाधिदेव चित्रगुप्त निराकार है त्रिदेवों सहित सृष्टि के सभी जीवों-जातकों के कर्म फल दाता हैं। 

                 कायस्थ की परिभाषा 'काया स्थित: स: कायस्थ' अर्थात 'जो काया में रहता है, वह कायस्थ है। इसके अनुसार सृष्टि के सभी अमूर्त-मूर्त, सूक्ष्म-विराट जीव/जातक कायस्थ हैं। 

                काया (शरीर) में कौन रहता है जिसके न रहने पर काया को मिट्टी कहा जाता है? उत्तर है आत्मा, शरीर में आत्मा न रहे तो उसे 'मिट्टी' कहा जाता है। आध्यात्म में सारी सृष्टि को भी मिट्टी कहा गया है। 

                आत्मा क्या है? आत्मा सो परमात्मा अर्थात आत्मा ही परमात्मा है। सार यह कि जब परमात्मा का अंश किसी काया का निर्माण कर आत्मा रूप में उसमें रहता है तब उसे 'कायस्थ' कहा जाता है। जैसे ही आत्मा शरीर छोड़ता है शरीर मिट्टी (नाशवान) हो जाता है, आत्मा अमर है। इस अर्थ में सकल सृष्टि और उसके सब जीव/जातक कण-कण, तरुण-तरुण, जीव-जन्तु, पेड़-पौधे, चर-अचर, स्थूल-सूक्ष्म, पशु-पक्षी, सुर-नर-असुर आदि कायस्थ हैं। 

    कायस्थ और वर्ण 

                मानव कायस्थों का उनकी योग्यता और कर्म के आधार चार वर्णों में विभाजन किया गया है। गीता में श्री कृष्ण कहते हैं- ''चातुर्वण्य मया सृष्टं गुण-कर्म विभागश: अर्थात चारों वर्ण गुण-और कर्म के अनुसार मेरे द्वारा बनाए गए हैं। इसका अर्थ यह है कि कायस्थ ही अपनी बुद्धि, पराक्रम, व्यवहार बुद्धि और समर्पण के आधार पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण में  विभाजित किए गए हैं। इसलिए वे चारों वर्णों में विवाह संबंध स्थापित कर सकते हैं। पुराणों के अनुसार चित्रगुप्त जी के दो विवाह देव कन्या नंदिनी और नाग कन्या इरावती से होना भी यही दर्शाता है कि वे और उनके वंशज वर्ण व्यवस्था से परे, वर्ण व्यवस्था के नियामक हैं। एक बुंदेली कहावत है 'कायथ घर भोजन करे बचे न एकहु जात' इसका अर्थ यही है कि कायस्थ के घर भोजन करने का सौभाग्य मिलने का अर्थ है समस्त जातियों के घर भोजन करने का सम्मान मिल गया। जैसे देव नदी गंगा में नहाने से सं नदियों में नहाने का पुण्य मिलने की जनश्रुति गंगा को सब नदियों से श्रेष्ठ बताती है, वैसे ही यह कहावत 'कायस्थ' को सब वर्णों और जातियों से श्रेष्ठ बताती है। 

    जाति 

                बुंदेली कहावत 'जात का बता गया' का अर्थ है कि संबंधित व्यक्ति स्वांग अच्छाई का कर था था किंतु उसके किसी कार्य से उसकी असलियत सामने आ गई। यहाँ जात का अर्थ व्यक्ति का असली गुण या चरित्र है। एक जैसे गुण या कर्म करने वाले व्यक्तियों का समूह 'जाति' कहलाता है। कायस्थ चारों वर्णों के नियत कार्य निपुणता से करने की सामर्थ्य रखने के कारण सभी जातियों में होते हैं। इसीलिए कायस्थों के गोत्र, अल्ल, कुलनाम, वंश नाम चारों वर्णों में मिलते हैं। 

    कुलनाम और अल्ल 

                प्रभु चित्रगुप्त जी के १२ पुत्र बताए गए हैं। उनके वंशजों ने अपनी अलग पहचान के लिए अपने-अपने मूल पुरुष के नाम को कुलनाम की तरह अपने नाम के साथ संयुक्त किया। तदनुसार कायस्थों के १२ कुल चारु, सुचारु, चित्र, मतिमान, हिमवान, चित्रचारु अरुण,अतीन्द्रिय,भानु, विभानु, विश्वभानु और वीर्यवान हुए। ये कुलनाम संबंधित जातक की विशेषताएँ बताते हैं। नाम चारु = सुंदर, सुचारु = सुदर्शन, चित्र = मनोहर, मतिमान = बुद्धिमान, हिमवान = समृद्ध, चित्रचारु = दर्शनीय, अरुण = प्रतापी, अतीन्द्रिय = ध्यानी, भानु = तेजस्वी, विभानु = यश का प्रकाश फैलानेवाले, विश्वभानु = विश्व में सूर्य की तरह जगमगानेवाले तथा वीर्यवान = सबल, पराक्रमी, बहु संततिवान।

    गोत्र 

                चित्रगुप्त जी के १२ पुत्र १२ महाविद्याओं का अध्ययन करने के लिए १२ गुरुओं के शिष्य हुई। गुरु का नाम शिष्यों का गोत्र तथा गुरु की इष्ट शक्ति (देव-देवी) शिष्यों की आराध्या शक्ति हुई। आरंभ में एक गोत्र के जातकों में विवाह संबंध वर्जित था किंतु कालांतर में कायस्थों के स्थान परिवर्तन करने पर स्थानीय समाज की वर-कन्या न मिलने पर विवशता वश एक गोत्र में अथवा अहिन्दुओं से विवाह करने तथा फारसी/उर्दू सीखकर शासन सूत्र संहलने के कारण कायस्थों को 'आधा मुसलमान' कहा गया। अंग्रेज शासन होने पर कायस्थों ने अंग्रेजी सीखकर शासन-प्रशासन में स्थान बनाया तो उन्हें 'आधा अंग्रेज' कहा गया।  

    अल्ल 

                किसी कुल में हुए पराक्रमी व्यक्ति, मूल निवास स्थान, गुरु अथवा आराध्य देव के नाम अथवा उनसे संबंधित किसी गुप्त शब्द को अपनाने वाले समूह के सदस्य उसे अपनी 'अल्ल' (पहचान चिन्ह) कहते हैं। यह एक महापरिवार के सदस्यों का कूट शब्द (कोड वर्ड) है जिससे वे एक दूसरे को पहचान सकें। गहोई वैश्यों में इसे 'आँकने' कहा जाता है। एक अल्ल के दो जातक आपस में विवाह वर्जित है। वर्तमान में नई पीढ़ी अपने इतिहास, गोत्र, अल्ल आदि से अनभिज्ञ होने के कारण वर्जनाओं का पालन नहीं कार पा रही। एक अल्ल या गोत्र में विवाह वैज्ञानिक दृष्टि से भावी पीढ़ी में आनुवंशिक रोगों की संभावना बढ़ाता है। इससे बचने का उपाय अन्य जाति, धर्म या देश में विवाह करना है।     
        
    कायस्थों के कुलनाम (सरनेम), अल्ल (वंश नाम)  और उनके अर्थ 

                कायस्थों को बुद्धिजीवी, मसिजीवी, कलम का सिपाही आदि विशेषण दिए जाते रहे हैं। भारत के धर्म-अध्यात्म, शासन-प्रशासन, शिक्षा-समाज हर क्षेत्र में कायस्थों का योगदान सर्वोच्च और अविस्मरणीय है। कायस्थों के कुलनाम व उपनाम उनके कार्य से जुड़े रहे हैं। पुराण कथाओं में भगवान चित्रगुप्त के १२ पुत्र चारु, सुचारु, चित्र, मतिमान, हिमवान, चित्रचारु अरुण,अतीन्द्रिय,भानु, विभानु, विश्वभानु और वीर्यवान कहे गए हैं। ये सब  

                गुणाधारित उपनाम विविध विविध जातियों के गुणवानों द्वारा प्रयोग किए जाने के कारण अग्निहोत्री व फड़नवीस ब्राह्मणों, वर्मा जाटों, माथुर वैश्यों, सिंह बहादुर आदि राजपूतों में भी प्रयोग किए जाते हैं। कायस्थ यह सत्य जानने के कारण अन्तर्जातीय विवाह से परहेज नहीं करते। समय के साथ चलते हुए ज्ञान-विज्ञान, शासन-प्रशासन के यंग होते हैं। इसीलिए वे आधे मुसलमान और आधे अंग्रेज भी कहे गए। लोकोक्ति 'कायथ घर भोजन करे बचे न एकहु जात' का भावार्थ यही है कि कायस्थ के संबंधी हर जाति में होते हैं, कायस्थ के घर खाया तो उसके सब संबंधियों के घर भी खा लिया। 

                कायस्थों के अवदान को देखते हुए उन्हें समय-समय पर उपनाम या उपाधियाँ दी गईं। कुछ कुलनाम और उनके अर्थ निम्न हैं-

    अंबष्ट/हिमवान- अंबा (दुर्गा) को इष्ट (आराध्य) माननेवाले, हिम/बर्फ वाले हिमालय (पार्वती का जन्मस्थल) में जन्मे पार्वती भक्त । 
    अग्निहोत्री- नित्य अग्निहोत्र करनेवाले। 
    अष्ठाना/अस्थाना- बाहुबल से स्थान (क्षेत्र) जीतकर राज्य स्थापित करनेवाले। 
    आडवाणी- सिन्धी कायस्थ। 
    करंजीकर- करंज क्षेत्र निवासी, जिनके हाथ में उच्च अधिकार होता था।  कायस्थ/ब्राह्मण  उच्च शिक्षित थे, वे कर (हाथ) की कलम से फैसले करते थे। वे उपनाम के अंत में 'कर' लगाते थे।  
    कर्ण/चारुण- महाभारत काल में राजा कर्ण के विश्वासपात्र तथा उनके प्रतिनिधि के नाते शासन करनेवाले।
    कानूनगो- कानूनों का ज्ञान रखनेवाले, कानून बनानेवाले।
    कुलश्रेष्ठ/अतीन्द्रिय- इंद्रियों पर विजय पाकर उच्च/कुलीन वंशवाले।
    कुलीन- बंगाल-उड़ीसा निवासी उच्च कुल के कायस्थ।  
    खरे- खरा (शुद्ध) आचार-व्यवहार रखनेवाले।
    गौर- हर काम पर गौर (ध्यान) पूर्वक करनेवाले। 
    घोष- श्रेष्ठ कार्यों हेतु जिनका  जयघोष किया जाता रहा।
    चंद्रसेनी- महाराष्ट्र-गुजरात निवासी चंद्रवंशी कायस्थ।  
    चिटनवीस- उच्च अधिकार प्राप्त जन जिनकी लिखी चिट (कागज की पर्ची) का पालन राजाज्ञा के तरह होता था। ये अधिकतर कायस्थ व ब्राह्मण होते थे। 
    ठाकरे/ठक्कर/ठाकुर/ठकराल- ठाकुर जी (साकार ईश्वर) को इष्ट माननेवाले, उदड़हों के करण देश के अलग-अलग हिस्सों में बस गए और नाम भेद हो गया। 
    दत्त- ईश्वर द्वारा दिया गया, प्रभु कृपया से प्राप्त।    
    दयाल- दूसरों के प्रति दया भाव से युक्त।
    दास- ईश्वर भक्त, सेवा वृत्ति (नौकरी) करनेवाले।
    नारायण- विष्णु भक्त। 
    निगम/चित्रचारु- आगम-निगम ग्रंथों के जानकार, उच्च आध्यात्मिक वृत्ति के करण गम (दुख) न करनेवाले। सुंदर काया वाले।  
    प्रसाद- ईश्वरीय कृपया से प्राप्त, पवित्र, श्रेष्ठ।। 
    फड़नवीस- फड़ = सपाट सतह, नवीस = बनानेवाला, राज्य की समस्याएँ हल कार राजा का काम आसान बनाते थे । ये अधिकतर कायस्थ व ब्राह्मण होते थे। 
    बख्शी- जिन्हें बहुमूल्य योगदान के फलस्वरूप शासकों द्वारा जागीरें बख्शीश (ईनाम) के रूप में दी गईं।
    ब्योहार- सद व्यवहार वृत्ति से युक्त।
    बसु/बोस- बसु की उत्पत्ति वसु अर्थात समृद्ध व तेजस्वी होने से है। 
    बहादुर- पराक्रमी।
    बिसारिया- यह सक्सेना (शक/संदेहों की सेना/समूह का नाश करनेवाले) मूल नाम (मतिमान = बुद्धिमान) कायस्थों की एक अल्ल (वंशनाम) है। एक बुंदेली कहावत है 'बीती ताहि बिसार दे' अर्थात अतीत के सुख-दुख पर गर्वीय शोक न कर पर्यटन कार आगे बढ़ना चाहिए। जिन्होंने इस नीति वाक्य पर अमल किया उन्हें 'बिसारिया' कहा गया।  
    भटनागर/चित्र- सभ्य सुंदर जुझारु योद्धा, देश-समाज के लिए युद्ध करनेवाले। 
    महालनोबीस- महाल = महल, नौविस/नौबिस = लेखा-जोखा खने वाला, राजमहल के नियंत्रक लेखाधिकारी। 
    माथुर/चारु- मथुरा निवासी, गौरवर्णी सुंदर।
    मित्र- विश्वामित्र गोत्रीय कायस्थ जो निष्ठावान मित्र होते हैं। 
    मौलिक- बंगाल/उड़ीसावासी कायस्थ जो अपनी मिसाल आप (श्रेष्ठ) थे। 
    रंजन - कला निष्णात।
    राय- शासकों को राय-मशविरा देनेवाले।
    राढ़ी- राढ़ी नदी पार कर बंगाल-उड़ीसा आदि में शासन व्यवस्था स्थापित करनेवाले।
    रायजादा- शासकों को बुद्धिमत्तापूर्णराय देनेवाले।
    वर्मा- अपने देश-समाज की रक्षा करनेवाले।
    वाल्मीकि- महर्षि वाल्मीकि के शिष्य। वाल्मीकि (वल्मीकि, वाल्मीकि) = चींटी/दीमक की बाँबी भावार्थ दीमक की तरह शत्रु का नाश तथा चीटी की तरह एक साथ मिलकर सफल होनेवाले। 
    श्रीवास्तव/भानु- वास्तव में श्री (लक्ष्मी) सम्पन्न, सूर्य की तरह ऐश्वर्यवान।
    सक्सेना (मतिमान = बुद्धिमान)- शक आक्रमणकारियों की सेनाओं को परास्त करनेवाले पराक्रमी, शक (संदेहों) क सेना/समूह का समाधान कर नाश करने वाले बुद्धिमान।
    सहाय- सबकी सहायता हेतु तत्पर रहने वाले।
    सारंग- समर्पित प्रेमी, सारंग पक्षी अपने साथी का निधन होने पर खुद भी जान दे देता है।
    सूर्यध्वज/विभानु- सूर्यभक्त राजा जिनके ध्वज पर सूर्य अंकित होता था। सूर्य की तरह अँधेरा दूर करनेवाले।  
    सेन/सैन- संत अर्थात आध्यात्मिक तथा सैन्य अर्थात शौर्य की पृष्ठभूमिवाले। आन-बयान-शान की तरह नैन-बैन-सैन का प्रयोग होता है।  
    शाह/साहा- राजसत्ता युक्त।
    ***
    दोस्त दोस्त की आँख हो, दोस्त दोस्त का कान।
    दोस्त नहीं कहता मगर, बसे दोस्त में जान।
    २१.९.२०२५ 
    ***

    उपनिषद कहते हैं-
    यक्ष प्रश्न १. चित्रगुप्त जी केवल कायस्थों के देवता कैसे हैं?
    'काया स्थिते स: कायस्थ:' अर्थात जब वह (निराकार परमात्मा) काया में (आत्मा रूप में) स्थित होता है तो कायस्थ कहलाता है।
    यक्ष प्रश्न २. चित्रगुप्त जी सभी जातियों के देवता क्यों नहीं हैं?
    चित्रगुप्त प्रणम्यादौ वात्मानम सर्व देहिनाम' अर्थात सभी देहधारियों में आत्मा रूप में बसे चित्रगुप्त (चित्र आकार से बनता है, चित्र गुप्त है अर्थात नहीं है क्योंकि परमात्मा निराकार है) को सबसे पहले प्रणाम।
    इसीलिए सशक्त और समृद्ध होने पर भी वैदिक काल से १०० वर्ष पूर्व तक चित्रगुप्त जी के मंदिर, मूर्ति, पुराण, कथा, आरती, भजन, व्रत आदि नहीं बनाये गए। स्वयं को चित्रगुप्त का वारिस माननेवाला समुदाय गणेश, शिव, शक्ति, विष्णु, बुद्ध, महावीर, आर्य समाज, युगनिर्माण योजना, साई बाबा आदि का अनुयायी होता रहा। कण-कण में भगवान् और कंकर कंकर में शंकर के आदि सत्य को स्वीकार कर देश और समाज के प्रति समर्पित रहा। अब अन्यों की नकल पर ये भी मंदिर, मूर्ति और जन्मना जातीयता के शिकार क्यों हो रहे हैं?
    यक्ष प्रश्न ३. जात का अर्थ क्या है?
    जब कोई भद्र दिखनेवाला मनुष्य गिरी हुई हरकत करे तो कहते हैं 'जात दिखा गया। बुंदेली कहावत 'जात दिखा गया' का अर्थ है अपनी सचाई (असलियत) दिखा गया।
    जात कर्म अर्थात जन्म देने कई क्रिया (गर्भ में छिपी सचाई सामने आना), जातक जन्म लेनेवाला शिशु, जाया जन्म दिया, जच्चा जन्मदात्री, जाना बच्चा देना, जगतजननी का एक नाम 'जाया' (जिसने सबको जन्म दिया) भी है।
    यक्ष प्रश्न ४. क्या जात और जाति समानार्थी हैं?
    जाति अर्थात एक जैसे गुण-धर्म के लोग, जिनमें समानता हो ऐसा समूह। जाट और जाति का अर्थ लगभग समान है।
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    चिंतन:
    जाति, विवाह और कर्मकांड
    *
    जात कर्म = जन्म देने की क्रिया, जातक = नज्म हुआ बच्चा, जातक कथा = विविध योनियों में अवतार लिए बुद्ध की कथाएं.
    विविध योनियों में बुद्ध कौन थे यह पहचान उनकी जाति से हुई. जाति = गुण-धर्म.
    'जन्मना जायते शूद्रो' के अनुसार हर जातक जन्मा शूद्र होता है.
    कर्म के अनुसार वर्ण होता है. 'चातुर्वण्य मया सृष्टम गुण कर्म विभागश:' कृष्ण गीता में.
    सनातन धर्म में एक गोत्र, एक कुल, पिता की सात पीढ़ी और माँ की सात पीढ़ी में, एक गुरु के शिष्यों में, एक स्थान के निवासियों में विवाह वर्जित है. यह 'जेनेटिक मिक्सिंग' का भारतीय रूप ही है.
    इनमें से हर आधार के पीछे एक वैज्ञानिक कारण है.
    जो अव्यक्त है, वह निराकार है. जो निराकार है उसका चित्र नहीं बनाया जा सकता अर्थात चित्र गुप्त है. यह चित्रगुप्त कौन है?
    चित्रगुप्त प्रणम्यादौ वात्मानं सर्वदेहिनाम' चित्रगुप्त सर्व प्रथम प्रणाम के योग्य हैं जो सर्व देहधारियों में आत्मा के रूप में विराजमान हैं'
    'कायास्थिते स: कायस्थ:' वह (चित्रगुप्त या परमात्मा) जब किसी काया का निर्माण कर उसमें स्थित (आत्मा रूप में) होता है तो कायस्थ कहलाता है.
    जैसे कुँए में जल, बाल्टी में निकाला तो जल, लोटे में भरा तो जल, चुल्लू से पिया तो जल, उसी प्रकार परमात्मा का अंश हर आत्मा भी काया धारण कर कायस्थ है.इसीलिये कायस्थ किसी एक वर्ण में नहीं है.
    तात्पर्य यह कि सनातन चिंतन में वह है ही नहीं जो समाज में प्रचलन में है. आवश्यकता चिंतन को छोड़ने की नहीं सामाजिक आचार को बदलने की है. जो परिवर्तन की दिशा में सबसे आगे चले वह अग्रवाल, जिसके पास वास्तव में श्री हो वह श्रीवास्तव. जब दोनों का मेल हो तो सत्य और श्रेष्ठ ही बढ़ेगा.
    विवाह दो जातकों का होता है, उनके रिश्तेदारों, परिवारों, प्रतिष्ठा या व्यवसाय का नहीं होता. पारस्परिक ताल-मेल, समायोजन, सहिष्णुता और संवेदनशीलता हो तो विवाह करना चाहिए अन्यथा विग्रह होना ही है.
    पंडा, पुजारी, मुल्ला, मौलवी, ग्रंथी, पादरी होना धंधा है. जब कोई दूकानदार, कोई मिल मालिक हमें नियंत्रित नहीं करता करे तो हम स्वीकारेंगे नहीं तो कर्मकांड का व्यवसाय करनेवालों की दखलंदाजी हम क्यों मानते हैं? कमजोरी हमारी है, दूर भी हमें ही करना है.
    २५-५-२०१७
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    विरासत
    कायस्थों की लिपि 'कैथी'
    *



    कैथी एक ऐतिहासिक लिपि है जिसे मध्यकालीन भारत में प्रमुख रूप से उत्तर-पूर्व और उत्तर भारत में काफी बृहत रूप से प्रयोग किया जाता था। खासकर आज के उत्तर प्रदेश एवं बिहार के क्षेत्रों में इस लिपि में वैधानिक एवं प्रशासनिक कार्य किये जाने के भी प्रमाण पाये जाते हैं।
    कैथी एक पुरानी लिपि है जिसका प्रयोग कम से कम 16 वी सदी मे धड़ल्ले से होता था। मुगल सल्तनत के दौरान इसका प्रयोग काफी व्यापक था। 1880 के दशक में ब्रिटिश राज के दौरान इसे प्राचीन बिहार के न्यायलयों में आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया था। इसे खगड़िया जिले के न्यायालय में वैधानिक लिपि का दर्ज़ा दिया गया था।


    गुप्त वंश के उत्थान के दौरान अस्तित्व में आयी कैथी भाषा वर्ष १८८० तक जनमानस की भाषा बन चुकी थी । न्यायालयों में, बही खाते में तथा यत्र तत्र इनके प्रयोग की पराकाष्ठा थी । परन्तु एक किताब ("कल्चर एंड पावर ऑफ़ बनारस ") के अध्ययन के दौरान मुझे ज्ञात हुआ कि किस तरह से इस भाषा के साथ अन्याय हुआ. इस किताब के पृष्ठ संख्या १९० पर ब्रज भाषा के अवसान की व्याख्या के दौरान इस भाषा के अवसान का भी जिक्र है... हुआ कुछ यूँ था की ब्रज भाषा और हिंदी देवनागरी की भाषा को लेकर एक विवाद हुआ था.. हिंदी भाषा के एक बहुत बड़े विद्वान या यूँ कहें कि चैंपियन श्री श्रीधर पाठक और एक सज्जन थे श्री राधा चरण गोस्वामी जी .. ये दोनो हिंदी भाषा को कवियों कि भाषा बनाये जाने पर जोर दे रहे थे, और १९१० के पहले हिंदी साहित्य सम्मलेन में ब्रज भाषा को कोई स्थान नहीं दिया गया जबकि ब्रज भाषा उस वक्त के लेखकों या यूँ कहें कि कवियों की आधिकारिक भाषा बन गयी थी... सोने पे सुहागा तो तब हुआ जब एक साल के बाद हिंदी साहित्य के दूसरे सम्मेलन में श्री बद्री नाथ भट्ट जी ने ब्रज भाषा के लिए अपशब्द का प्रयोग किया.. सिलसिला यही से शुरू होता है... १९१४ में पांचवें हिंदी साहित्य सम्मेलन के दौरान प्रख्यात कवि, जो श्री महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के आश्रित थे , उन्होंने ब्रज भाषा का साथ देने वालों को राष्ट्र भाषा हिंदी का दुश्मन करार दे दिया और यहीं से ब्रज भाषा के साथ साथ अन्य लिपियों का भी समापन होने लगा..
    बात शुरू हुई थी कैथी पर, तो वापस आते हैं कि कैथी कैसे समाप्त हुई .. एक बंगाली शिक्षाविद थे , और उस दौरान भी लाल सलाम जोरों पर था । उन्होंने देखा कि बिहार में जो किताबें आती हैं वो बनारस से छप कर आती हैं... और यही एक बात थी जो बिहार के कायस्थों को उत्तर प्रदेश के कायस्थों से जोड़ती थी.. (शिक्षा आयोग की रिपोर्ट १८८४ पैराग्राफ ३३४). उन्होंने शिक्षा आयोग को पत्र लिखकर ये बात बताई कि कैथी बिहारी हिन्दुओं की धार्मिक पहचान बनती जा रही है, जो कि हिंदी भाषा के लिए खतरनाक हो सकती है , इसलिए आनन् फानन में हिंदी साहित्य सम्मेलन की नौवीं बैठक बुलाई गयी और काफी विवेचना के बाद ये प्रस्ताव पारित किया ...
    "सभा के अनुसार नागरी से अति उत्कृष्ट कोई भाषा नहीं है, और नागरी शब्द ही भारत के लिए उपयुक्त है . इसी कारण से सभा कैथी भाषा के उन्नयन के लिए कोई उत्साह और सहयोग ना करने का निर्णय लेती है ।"
    इसे यन. पी. यस. की वार्षिक रिपोर्ट १९२३ के पैराग्राफ १३ और १४ से देखा जा सकता है ..और इस प्रकार कैथी को दरकिनार कर उर्दू को कोर्ट की भाषा बना दी गयी , क्यूंकि उस वक्त की रिपोर्ट के अनुसार अंग्रेजो ने एक सर्वे में पाया कि धनी वर्ग के ज्यादातर लोग हिंदी या उर्दू का इस्तेमाल करते है तो उन्होंने इसे ही आधिकारिक भाषा बना दी .. और लार्ड मैकाले ने अंग्रेजी को बाद में अनिवार्य कर दिया...इस प्रकार कायस्थों की प्रचलित भाषा कैथी का अंत हो गया।
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    लेख :
    नाग को नमन :
    *
    नागपंचमी आई और गई... वन विभागकर्मियों और पुलिसवालोंने वन्य जीव रक्षाके नामपर सपेरों को पकड़ा, आजीविका कमाने से वंचित किया और जम कर वसूली वसूले बिना नहीं छोड़ा, जो न दे सके वे बंदी। खाकी की चाँदी हो गई, सावन में दीवाली मन गई। यह कोई नई बात नहीं है, किसी न किसी बहाने हर हफ्ते-पखवाड़े में दिवाली मनाना इनका जन्म सिद्ध अधिकार है।
    पारम्परिक पेशे से वंचित किये गए ये सपेरे अब आजीविका कहाँ से कमाएँगे? वे शिक्षित-प्रशिक्षित तो हैं नहीं, खेती या उद्योग के मालिक भी नहीं हैं. अतः, उन्हें अपराध करने की राह पर ला खड़ा करनेका कार्य शासन-प्रशासन और तथाकथित जीवरक्षण के पक्षधरताओं ने किया है।
    जिस देश में पूज्य गाय, उपयोगी बैल, भैंस, बकरी आदिका निर्दयतापूर्वक कत्ल कर उनका मांस लटकाने, बेचने और खाने पर प्रतिबंध नहीं है, वहाँ जहरीले और प्रतिवर्ष लगभग ५०,००० मृत्युओं का कारण बननेवाले साँपों को मात्र एक दिन पूजने पर दुग्धपान से साँपों की मृत्यु की बात, तिल को ताड़ बनाकर लाखों सपेरों को आजीविका से वंचित करने का पराक्रम प्रशासन नई किया और चारण पत्रकारों ने जय-जयकार कर कृपा दृष्टि प्राप्त की।
    दूरदर्शनी चैनलों पर विशेषज्ञ और पत्रकार टी.आर.पी. के चक्करमें तथाकथित विशेषज्ञों और पंडितों के साथ बैठकर घंटों निरर्थक बहसें करते रहे। इस चर्चाओं में सर्प पूजा के मूल में अन्तर्निहित आर्य और अनार्य (नाग आदि) सभ्यताओं के सामाजिक सम्मिलन, सहकार, समझ और सहिष्णुता की कोई बात नहीं की गई। आदिवासियों और शहरवासियों के बीच सांस्कृतिक सेतु के रूप में नाग और नाग पंचमी जैसे लोक पर्वों की भूमिका, अरबों रुपयों की फसलें और खाद्यान्न चाट करते चूहों के विनाश में नाग की उपयोगिता, जन-मन से नाग के प्रति भय कम कर नाग को बचाने में नागपंचमी जैसे पर्वों की उपयोगिता को एकतरफा नकार दिया गया। हो भी क्यों न? आजकल राजनैतिक चूहों द्वारा लोकतंत्रीय संविधान सम्मत निर्वाचित सरकारों को कुतरकर गिराने में व्यस्त महामहिमों को मूषक आराध्य ही प्रतीत हो रहे होंगे। उअन्के वश चले तो वे मूषक जयन्ती धून धाम से मनाने लगें।
    संयोगवश दूरदर्शन पर महाभारत श्रृंखला में पांडवों द्वारा खांडवप्रस्थ में नागों को निकलने तक का समय न देकर जिन्दा जलाने का अद्भुत पराक्रम करने वाले अर्जुन की द्वारा उनकी बस्तियों को खाक करने और भूमि छीनने, फलतः नागों द्वारा विद्रोह करने, नागराजा द्वारा अर्जुन से बदला लेने के लिए कर्ण के बाण पर बैठकर अर्जुन की हत्या का प्रस्ताव, जैसे प्रसंग दिखाए भी गए किन्तु इन तथाकथित विद्वानों और पत्रकारों ने नागपंचमी, नागप्रजाजनों (सपेरों - आदिवासियों) के साथ विकास के नाम पर अब तक हुए अत्याचार की ओर ध्यान नहीं दिया। मूल वनवासियों के हिट संरक्षण की बात करने पर कोई कोटा, पुरस्कार या अवसर तो मिलना नहीं है, तो उसके प्रतिकार की बात कैसे करें?
    इस प्रसंग में एक दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष यह भी है कि इस देशमें बुद्धिजीवी माने जानेवाले कायस्थ समाज ने भी यह भुला दिया कि नागराजा वासुकि की कन्या इरावती (दक्षिणा) उनके मूलपुरुष चित्रगुप्त जी की धर्मपत्नी हैं तथा चित्रगुप्त जी के १२ पुत्रों में से ८ का जन्म इन्हीं मातुश्री से हुआ है। यह भी कि चित्रगुप्त जी के बारह पुत्रों को कोई देव/ब्राह्मण कन्या नहीं विवहि गई, सभी १२ भाइयों के विवाह नाग कन्याओं से हुए जिनसे वर्तमान कायस्थ उत्पन्न हुए। अपने मूल पुखों और ननिहाल पक्ष की उपेक्षा के कारण कायस्थों का पराभव होता गया। मातृ ऋण से उऋण न होने के कारण जहाँ वे सम्राट, महामंत्री, राजवैद्य आदि थे, वहीं पटवारी और कोटवार बनने के लिए विवश हो गए।
    पद्म पुराण में वर्णित इस पौराणिक कथा का वर्ष में कई बार पाठ करने के बाद भी कायस्थ आदिवासी समाज से अपने ननिहाल होने के संबंध को याद नहीं रख सके, निभाने की बात तो दूर है। फलतः, खुद राजसत्ता गँवाकर आमजन हो गए। यदि कायस्थ अपने ननिहाल पक्ष के साथ प्राण-प्राण से जुड़े होते, उनके साथ रोटी-बेटी संबंध में बंधे होते तो आज न केवल उनके नाती-नातिनें आरक्षण का लाभ पाते, वे लोकतंत्र में बहुमत पाकर सत्तासीन भी होते।
    स्वस्थ्य दृष्टि से देखें तो नागपंचमी वनवासियों के साथ नगरवासी कायस्थ समाज का भी महापर्व है और नाग पूजन उनकी अपनी परंपरा है जहाँ विष को भी अमृत में बदलकर, उपयोगी बनाने की सामर्थ्य पैदा की जाती है। विष को कण्ठ में धारणकर अनार्य देवता निन्गादेव (बड़ादेव, महादेव) नीलकंठ बनकर अमरकंटक और धूपगढ़ (पचमढ़ी) से काशी और कैलाश पहुँचकर आर्यों के भी पूज्य हो जाते हैं। विधि की विडंबना है कि शिवभक्तों और शैव संतों को भी नागपंचमी पर्व की कोई धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक उपयोगिता नज़र नहीं आई।
    लोकपर्व नागपंचमी पर्व मल्ल विद्या साधकों का महापर्व है लेकिन तमाम अखाड़े मौन हैं। बावजूद इस सत्य के कि विश्व स्तरीय क्रीड़ा प्रतियोगिताओं में मल्लों की दम पर ही भारत सर उठाकर खड़ा हो पाता है। कॉमनवेल्थ खेलों में भारत पहलवानों की डीएम पर ही पदक सूची में खड़ा और बढ़ा है। वैलेंटाइन जैसे विदेशी पर्व के समर्थक इससे दूर हैं यह तो समझा जा सकता है किन्तु वेलेंटाइन का विरोध करनेवाले समूह कहाँ हैं? वे नागपंचमी को युवा शौर्य-पराक्रम का महापर्व क्यों नहीं बना देते जबकि उन्हीं के समर्थक राजनैतिक दल राज्यों और केंद्र में सत्ता पर काबिज हैं?
    महाराष्ट्र से अन्य राज्यवासियों को बाहर करने के प्रति उत्सुक नेता और दल नागपंचमी को महाराष्ट्र की मल्लखम्ब विधा का महापर्व क्यों कहीं बनाते? क्यों नहीं यह खेल भी विश्व प्रतियोगिताओं में शामिल कराया जाए और भारत के खाते में कुछ और पदक आएँ?
    अंत में सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह कि जिन सपेरों को अनावश्यक और अपराधी कहा जा रहा है, उनके नागरिक अधिकार की रक्षाकर उन्हें पारम्परिक पेशे से वंचित करने के स्थान पर उनके ज्ञान और सामर्थ्य का उपयोग कर सर्प संरक्षण केंद्र खोले जाएँ जहाँ सर्प पालन कर औषधि निर्माण हेतु सर्प विष का व्यावसायिक उत्पादन हो। सपेरों को यहाँ रोजगार मिले, वे दर-दर भटकने के बजाय सम्मानित नागरिक का जीवन जी सकें। सर्प विष से बचाव के उनके पारम्परिक ज्ञान मन्त्रों और जड़ी-बूटियों पर शोध हो।
    क्या विश्व नायक माननीय महामहिम जी अपने देश के ग्रामीणों में सर्वाधिक विपन्न और मरणासन्न सँपेरे समाज की ओर कृपा दृष्टि करेंगे?
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    चित्रगुप्त साहित्य
    : कृतिचर्चा :
    चित्रगुप्त मीमांसा : श्रृष्टि-श्रृष्टा की तलाश में सार्थक सृजन यात्रा
    चर्चाकार: आचार्य संजीव 'सलिल'
    (कृति विवरण: नाम: चित्रगुप्त मीमांसा, विधा: गद्य, कृतिकार: रवीन्द्र नाथ, आकार: डिमाई, पृष्ठ: ९३, मूल्य: ७५/-,आवरण: पेपरबैक, अजिल्द-एकरंगी, प्रकाशक: जैनेन्द्र नाथ, सी १८४/३५१ तुर्कमानपुर, गोरखपुर २७३००५ )
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    श्रृष्टि के सृजन के पश्चात से अब तक विकास के विविध चरणों की खोज आदिकाल से मनुष्य का साध्य रही है। 'अथातो धर्म जिज्ञासा' और 'कोहं' जैसे प्रश्न हर देश-कल-समय में पूछे और बूझे जाते रहे हैं। समीक्ष्य कृति में श्री रविन्द्र नाथ ने इन चिर-अनुत्तरित प्रश्नों का उत्तर अपनी मौलिक विवेचना से देने का प्रयास किया है। पुस्तक का विवेच्य विषय जटिल तथा गूढ़ होने पर भी कृतिकार उसे सरल, सहज, बोधगम्य, रोचक, प्रसादगुण संपन्न भाषा में अभिव्यक्त करने में सफल हुआ है। अपने मत के समर्थन में लेखक ने विविध ग्रंथों का उल्लेख कर पुष्ट-प्रामाणिक पीठिका तैयार की है। गायत्री तथा अग्नि पूजन के विधान को चित्रगुप्त से सम्बद्ध करना, चित्रगुप्त को परात्पर ब्रम्ह तथा ब्रम्हा-विष्णु-महेश का मूल मानने की जो अवधारणा अखिल कायस्थ महासभा के हैदराबाद अधिवेशन के बाद से मेरे द्वारा लगातार प्रस्तुत की जाती रही है, उसे इस कृति में लेखक ने न केवल स्वीकार किया है अपितु उसके समर्थन में पुष्ट प्रमाण भी प्रस्तुत किए हैं।


    चित्रगुप्त, कायस्थ, नारायण, ब्रम्हा, विष्णु, महेश, सरस्वती, इहलोक, परलोक आदि अबूझ प्रश्नों को तर्क के निकष पर बूझते हुए श्री रवींद्र नाथ ने इस कृति में चित्रगुप्त की अवधारणा का उदय, सामाजिक संरचना और चित्रगुप्त, सांस्कृतिक विकास और चित्रगुप्त, चित्रगुप्त पूजा और साक्षरता, पारलौकिक न्याय और चित्रगुप्त, लौकिक प्रशासन और चित्रगुप्त तथा जगत में चित्रगुप्त का निवास शीर्षक सात अध्यायों में अपनी अवधारणा प्रस्तुत की है। विस्मय यह कि इस कृति में चित्रगुप्त के वैवाहिक संबंधों (प्रचलित धारणाओं के अनुसार २ या ३ विवाह), १२ पुत्रों तथा वंश परंपरा का कोई उल्लेख नहीं है। यम-यमी संवाद व यम द्वितीया, मनु, सत्य-नारायण, आदि लगभग अज्ञात प्रसंगों पर लेखक ने यथा संभव तर्क सम्मत मौलिक चिंतन कर विचार मंथन से प्राप्त अमृत जिज्ञासु पाठकों के लिए प्रस्तुत किया है। यह सत्य है कि मेरी तथा लेखक की भेंट कभी नहीं हुई तथा हम दोनों लगभग एक समय एक से विचार तथा निष्कर्ष से जुड़े किन्तु परात्पर परम्ब्रम्ह की परम सत्ता की एक समय में एक साथ, एक सी अनुभूति अनेक ब्रम्हांश करें तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं। 'को जानत, वहि देत जनाई'... सत्य-शिव-सुंदर की सनातन सत्ता की अनुभूति श्री मुरली मनोहर श्रीवास्तव, बालाघाट को भी हुई और उनहोंने 'चित्रगुप्त मानस' महाकाव्य की रचना की है, जिस पर हम बाद में चर्चा करेंगे।


    'इल' द्वारा इलाहाबाद तथा 'गय' द्वारा गया की स्थापना सम्बन्धी तथ्य मेरे लिए नए हैं. कायस्थी लिपि के बिहार से काठियावाड तक प्रसार तथा ब्राम्ही लिपि से अंतर्संबंध पर अधिक अन्वेषण आवश्यक है। मेरी जानकारी के अनुसार इस लिपि को 'कैथी' कहते हैं तथा इसकी वर्णमाला भी उपलब्ध है. संभवतः यह लिपि संस्कृत के प्रचलन से पहले प्रबुद्ध तथा वणिक वर्ग की भाषा थी। लेखक की अन्य १४ कृतियों में पौराणिक हिरन्यपुर साम्राज्य, सागर मंथन- एक महायज्ञ, विदुर का राजनैतिक चिंतन आदि कृतियाँ इस जटिल विषय पर लेखन का सत्पात्र प्रमाणित करती हैं। इस शुष्ठु कृति के सृजन हेतु लेखक साधुवाद का पात्र है ।
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