बचपन के दिन : संस्मरण संग्रह
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संजीव वर्मा 'सलिल'
संपादक
***
०१.अंजली बजाज, नैरोबी, केन्या
०२. अमरेन्द्र नारायण, जबलपुर, मध्य प्रदेश
०२. अरविन्द श्रीवास्तव 'असीम' झाँसी, उत्तर प्रदेश
०३. अरुणा पांडे, सिहोरा, मध्य प्रदेश
०४. अर्जुन चव्हाण, कोल्हापुर, महाराष्ट्र
०५. अवधेश सक्सेना, नोएडा, उत्तर प्रदेश
०६. अस्मिता शैली, जबलपुर, मध्य प्रदेश
०७. उमा जोशी, चिलियानौला अल्मोड़ा, उत्तराखंड
०८. उर्मिला सिंह, राँची, झारखंड
०९. कमलेश शुक्ल, दमोह, मध्य प्रदेश
१०. खंजन सिन्हा,भोपाल मध्य प्रदेश
११. चंद्रशेखर लोहुमी, पुणे, महाराष्ट्र
१२. जहांआरा 'गुल', लखनऊ, उत्तर प्रदेश
१३. नवनीता चौरसिया, जावरा, रतलाम, मध्य प्रदेश
१४. निर्मला कर्ण, चेन्नई
१५. नीलिमा रंजन, भोपाल मध्य प्रदेश
१६. पुष्पा वर्मा, हैदराबाद, तेलंगाना
१७. प्रतिमा अखिलेश, जबलपुर मध्य प्रदेश
१८. भगवत प्रसाद तिवारी, जबलपुर मध्य प्रदेश
१९. भावना मयूर पुरोहित, हैदराबाद तेलंगाना
२०. मधुमिता साहा, राँची, झारखंड
२१. मनीषा सहाय, राँची, झारखंड
२२. मनोरमा जैन 'पाखी', भिंड मध्य प्रदेश
२३. मीनाक्षी आनंद, अलीगढ़ उत्तर प्रदेश
२४. मीनू पांडे, भोपाल, मध्य प्रदेश
२५. मुकुल तिवारी, जबलपुर मध्य प्रदेश
२६. रेखा श्रीवास्तव, अमेठी, उत्तर प्रदेश
२७. वसुधा वर्मा, मुंबई महाराष्ट्र
२८. विद्या श्रीवास्तव, भोपाल, मध्य प्रदेश
२९. विनोद जैन 'वाग्वर', सागवाड़ा, डूंगरपुर, राजस्थान
३० . शशि त्यागी, अमरोहा, उत्तर प्रदेश
३१. शिप्रा सेन, जबलपुर, मध्य प्रदेश
३२. संगीता भारद्वाज "मैत्री", भोपाल मध्य प्रदेश
३३. संजीव वर्मा 'सलिल', जबलपुर, मध्य प्रदेश
३४. संतोष शुक्ला, नवसारी गुजरात
३५. सरला वर्मा 'शील', भोपाल मध्य प्रदेश
३६. सरिता सोनी, भोपाल मध्य प्रदेश
३७. सुरेन्द्र पवार, जबलपुर मध्य प्रदेश
३८. सोनी वर्मा, राँची, झारखंड
०००
स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी सन् 1863 (विद्वानों के अनुसार मकर संक्रान्ति संवत् 1920 को कलकत्ता में एक कुलीन कायस्थ परिवार में हुआ था। उनका औपचारिक नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था। पर प्यार से बिले बुलाते थे | पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाईकोर्ट के एक प्रसिद्ध वकील थे।श्री दुर्गाचरण दत्ता, (नरेंद्र के दादा) संस्कृत और फ़ारसी के विद्वान थे उन्होंने अपने परिवार को २५ वर्ष की आयु में छोड़ दिया और एक साधु बन गए। उनकी माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक विचारों की महिला थीं।उनका अधिकांश समय भगवान शिव की पूजा-अर्चना में व्यतीत होता था। नरेन्द्र के पिता और उनकी माँ के धार्मिक, प्रगतिशील व तर्कसंगत रवैया ने उनकी सोच और व्यक्तित्व को आकार देने में सहायता की।
बचपन में गोल मटोल लड्डू जैसे बिलेको सभी खूब प्यार करते और छोटी सी सफेद रंग की धोती पहन के इधर-उधर गोल-गोल घुमा करते थे जैसे ही कोई साधु या भिखारी या कोई परिब्राज़क उनके घर के सामने आते,तो वह तुरंत भागते और घर के अंदर जो कुछ भी खाने की सामग्री रहती वह सारा लाकर उन लोगों के झोली में डाल देते| माँ तो बहुत परेशान, एक दिन माँ ने भंडार घर को ताला लगा दिया अब एक भिखारी आया और जैसी वह खड़ा हुआ, बिले ने देखा कि कुछ भी तो नहीं है भिखारी को देने को,अब खाली हाथ तो वह भिखारी को जाने नहीं देंगे छोटी सी सफेद धोती जो उन्होंने पहनी थी उन्होंने वहीं उतारी और भिखारी को दे दी, भिखारी मुस्कुराया और उस धोती से उसने सिर पर पगड़ी बांध ली,नंगा पुंगा बिले दौड़ता हुआ माँ के पास आया मां बोली यह क्या इशारे से समझाया कि मैंने धोती भिखारी को दे दिया |
बचपन से नेतृत्व की ऊर्जा थी उनमे,एक बार दोस्तों के साथ मिलकर वह ध्यान ध्यान खेल रहे कि एक नाग उनपर चढ़ गया दोस्तों ने देखा तो माँ को खबर किया, माँ ने डांटा तो मित्रो पर गुस्सा हुए ध्यान ध्यान खेल में आँख क्यूँ खोला? एक बार गंगा दशहरा में खूब मधुर गंगा आरती गाते हुए छोटे छोटे झंडे बना कर कलश यात्रा निकाला था, और गंगा पूजन किया|
एक बार बच्चों के साथ चंपा के पेड़ पर खेलने के लिए चढ़े, तो एक बुजुर्ग व्यक्ति ने सोचा कच्ची डाल टूटने से बालकों को चोट लग सकती हैँ, उन्होंने डराने के लिए कहा इस पेड़ पर ब्रम्हाराक्षस रहता हैँ बच्चों को खा जाता हैँ, सारे बच्चे डर कर भाग गए पर बिले रात के अँधेरे में भी डाली पर बैठा रहा, फिर उतर कर उन बुजुर्ग के पास जाकर बोले, बच्चों को डरा कर नहीं, कारण समझा कर बोलना चाहिए|
बचपन से ही नरेन्द्र अत्यन्त कुशाग्र बुद्धि के तो थे ही नटखट भी थे। अपने साथी बच्चों के साथ वे खूब शरारत करते और मौका मिलने पर अपने अध्यापकों के साथ भी शरारत करने से नहीं चूकते थे|
उनके घर में नियमपूर्वक रोज पूजा-पाठ होता था धार्मिक प्रवृत्ति की होने के कारण माता भुवनेश्वरी देवी को पुराण,रामायण, महाभारत आदि की कथा सुनने का बहुत शौक था, इसकारण कथावाचक बराबर इनके घर आते रहते थे। नियमित रूप से भजन-कीर्तन भी होता रहता था। परिवार के धार्मिक एवं आध्यात्मिक वातावरण के प्रभाव से बालक नरेन्द्र के मन में बचपन से ही धर्म एवं अध्यात्म के संस्कार गहरे होते गये। माता-पिता के संस्कारों और धार्मिक वातावरण के कारण बालक के मन में बचपन से ही ईश्वर को जानने और उसे प्राप्त करने की लालसा दिखायी देने लगी थी। ईश्वर के बारे में जानने की उत्सुकता में कभी-कभी वे ऐसे प्रश्न पूछ बैठते थे कि इनके माता-पिता और कथावाचक पण्डित तक चक्कर में पड़ जाते थे।
ऐसे ऊर्जावान् बचपन कि कहानियाँ ऐसे प्रेरक व्यक्तित्व को इतने वर्षों के बाद भी सुनकर रोमांचकारी अनुभूति होती हैँ ||
संकलन- शिप्रा सेन।
सुभद्रा कुमारी चौहान जी
बचपन के दिन
०००
बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी।
गया, ले गया तू जीवन की सबसे मस्त ख़ुशी मेरी॥
चिंता रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छंद।
कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद॥
ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं था, छुआछूत किसने जानी?
बनी हुई थी वहाँ झोंपड़ी और चीथड़ों में रानी॥
किए दूध के कुल्ले मैंने चूस अँगूठा सुधा पिया।
किलकारी किल्लोल मचा कर सूना घर आबाद किया॥
रोना और मचल जाना भी क्या आनंद दिलाते थे।
बड़े-बड़े मोती से आँसू जयमाला पहनाते थे॥
मैं रोई माँ काम छोड़कर आई, मुझको उठा लिया।
झाड़-पोंछ कर चूम-चूम गीले गालों को सुखा दिया॥
दादा ने चंदा दिखलाया नेत्र नीर-युत दमक उठे।
धुली हुई मुस्कान देखकर सबके चहरे चमक उठे॥
वह सुख का साम्राज्य छोड़ कर मैं मतवाली बड़ी हुई।
लुटी हुई, कुछ ठगी हुई-सी दौड़ द्वार पर खड़ी हुई ॥
लाज भरी आँखें थी मेरी, मन में उमँग रंगीली थी।
तान रसीली थी कानों में मैं चंचल छैल-छबीली थी॥
दिल में एक चुभन-सी थी, यह दुनिया अलबेली थी।
मन में एक पहेली थी, मैं सबके बीच अकेली थी॥
मिला, खोजती थी जिसको हे बचपन! ठगा दिया तूने।
अरे! जवानी के फँदे में मुझको फँसा दिया तूने॥
सब गलियाँ उसकी भी देखी उसकी ख़ुशी न्यारी है।
प्यारी, प्रीतम की रंग-रलियों की स्मृतियाँ भी प्यारी हैं॥
माना मैंने युवा काल का जीवन ख़ूब निराला है।
आकाँक्षा, पुरुषार्थ-ज्ञान का उदय मोहने वाला है॥
लेकिन यह झंझट है भारी युद्ध-क्षेत्र संसार बना।
चिंता के चक्कर में पड़कर जीवन भी है भार बना॥
आ जा बचपन! एक बार फिर दे दे अपनी निर्मल शान्ति।
व्याकुल व्यथा मिटानेवाली यह अपनी प्राकृत विश्रांति॥
वह भोली -सी मधुर सरलता, वह प्यारा जीवन निष्पाप।
क्या आकर फिर मिटा सकेगा तू मेरे मन का संताप?
मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी ।
नंदन वन-सी फूल उठी वह छोटी-सी कुटिया मेरी ॥
'माँ ओ!' कह कर बुला रही थी मिट्टी खाकर आई थी।
कुछ मुँह में कुछ लिए हाथ में लिये, मुझे खिलाने आई थी ॥
पुलक रहे थे अंग, दृगों में कौतूहल था छलक रहा।
मुँह पर थी आह्लाद-लालिमा, विजय गर्व था झलक रहा॥
मैंने पूछा, 'यह क्या लाई?' बोल उठी ,'माँ काओ!'
हुआ प्रफुल्लित हृदय खुशी से, मैंने कहा, 'तुम्ही खाओ!'॥
पाया मैंने बचपन फिर से बचपन बेटी बन आया।
उसकी मंजुल मूर्ति देखकर मुझमें नवजीवन आया॥
मैं भी उसके साथ खेलती-खाती हूँ, तुतलाती हूँ।
मिलकर उसके साथ स्वयं मैं भी बच्ची बन जाती हूँ॥
जिसे खोजती थी बरसों से अब जाकर उसको पाया।
भाग गया था मुझे छोड़कर वह बचपन फिर से आया॥
०००
०१.अंजली बजाज, नैरोबी, केन्या
०२. अरविन्द श्रीवास्तव 'असीम' झाँसी, उत्तर प्रदेश
०३. अरुणा पांडे, सिहोरा, मध्य प्रदेश
०४. अर्जुन चव्हाण, कोल्हापुर, महाराष्ट्र
०५. अवधेश सक्सेना, नोएडा, उत्तर प्रदेश
०६. अस्मिता शैली, जबलपुर, मध्य प्रदेश
०७. उमा जोशी, चिलियानौला अल्मोड़ा, उत्तराखंड
०८. उर्मिला सिंह, राँची, झारखंड
०९. कमलेश शुक्ल, दमोह, मध्य प्रदेश
१०. खंजन सिन्हा,भोपाल मध्य प्रदेश
११. जहांआरा 'गुल', लखनऊ, उत्तर प्रदेश
१२. नीलिमा रंजन, भोपाल मध्य प्रदेश
१३. पुष्पा वर्मा, हैदराबाद, तेलंगाना
१४. भगवत प्रसाद तिवारी, जबलपुर मध्य प्रदेश
१५. भावना मयूर पुरोहित, हैदराबाद तेलंगाना
१६. मधुमिता साहा, राँची, झारखंड
१७. मनीषा सहाय, राँची, झारखंड
१८. मनोरमा जैन 'पाखी', भिंड मध्य प्रदेश
१९. मीनाक्षी आनंद, अलीगढ़ उत्तर प्रदेश
२०. वसुधा वर्मा, मुंबई महाराष्ट्र
२१. विद्या श्रीवास्तव, भोपाल मध्य प्रदेश
२२. विनोद जैन 'वाग्वर', सागवाड़ा, डूंगरपुर राजस्थान
२३. संगीता भारद्वाज "मैत्री", भोपाल मध्य प्रदेश
२४. संजीव वर्मा 'सलिल', जबलपुर, मध्य प्रदेश
२५. संतोष शुक्ला, नवसारी गुजरात
२६. सरला वर्मा 'शील', भोपाल मध्य प्रदेश
२७. सरिता सोनी, भोपाल मध्य प्रदेश
२८. सुरेन्द्र पवार, जबलपुर मध्य प्रदेश
२९. सोनी वर्मा, राँची, झारखंड
०१. अंजली मेहरोत्रा बजाज, नैरोबी
[परिचय: जन्म- ३० जून १९७८, आत्मजा- श्रीमती रमा मेहरोत्रा-श्री अनिल कुमार मेहरोत्रा, शिक्षा: बी.एस-सी., बी. पी. टी. एम.पी.टी., पी-एच.डी. न्यूरो साइंस और स्पोर्ट्स इंजुरीज, प्राणिक हीलर, पति- श्री प्रवीण बजाज, उपलब्धियाँ- भारत को जाने तंजानिया प्रोजेक्ट भौगोलिक सँरचना पर २४८ गीत गायन, केन्या केनभरती एसोसिएशन द्वारा प्रस्तुत सुर संग्राम २०१९ बेस्ट सिंगर अवार्ड, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देशभक्ति गीत गायन, हेल्थ टॉक वर्कशॉप, संपर्क- डॉ. अंजली मेहरोत्रा बजाज, +254745327772 (केन्या), anjalibajaj13@gmail.com, भारतश्री अनिल कुमार मेहरोत्रा, ९ साहित्य विहार, सामने वर्धमान कॉलेज, बिजनौर उ.प्र. ४६७०१ +919837778439 (भारत)]
०००
वो बचपन कहाँ चला गया?
०
वो बचपन कहाँ चला गया?
वो बचपन कहाँ खो गया??
जब परिवार-पड़ोस का ही आग़ाज़ था,
परिवा रसिर्फ माँ-बाप से नहीं,
पड़ोसियों को मिलाकर बनता था॥
पड़ोस के चाचा, नुक्कड़वाले ताऊ,
हमारे सगे ही हुआ करते थे।
विमला-कमला 'आंटी' नहीं
हमारी काकी, मौसी या चाची होती थी।
अब्दुल चाचा और सलीम भाई की क्या बात होती थी ॥
होली-दीवाली,ईद या रोजा
सबकी रौनक हम सबके साथ होती थी ॥
दूध वाले बिमो मामा,
कूड़े वाली कल्लो मौसी की क्या बात होती थी ॥
लगता था हर रोज़
परिवार के संग ही मुलाक़ात होती थी ॥
वो बचपन वो पल कहाँ चला गया?
वो परिवार कहाँ अब सिमट गया,
सिसकियाँ लेती हूँ तब-तब
जब-जब उनकी याद सताए,
वो प्रेम, वो साथ, वो अपनापन अब कहाँ से लाएँ?
वो पल था जब हाथ में लोगों का हाथ था,
क्या प्यार, क्या संग हरदम मेरे पास था,
हाथ में न कोई मोबाइल,
न ही कोई इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस साथ था ।
पड़ोस की चाची के अचारों का क्या स्वाद था।
विमला काकी के आम के पेड़ पर लटके
झूले पे पेग लेने का अलग ही एहसास था ॥
वो बचपन था,सच वो ही बचपन था,
वो पल अब कहाँ चला गया?
वो प्यार कहाँ अब चला गया?
ढूँढते हैं आज परिवार को हर कक्ष, हर कोने में।
इक बैठा इस कोने तो दूजा बैठा दूर कहीं कोने में॥
परिवार पड़ोस साथ न उनके,
इलेक्ट्रॉनिक गेजट साथ है उनके।
अकेले बैठे मुस्कुराते हैं,
अजीब से चेहरे बनाते हैं॥
गर्दन ऊपर किये बग़ैर
माँ को 'मॉम', पापा को 'पाप' बुलाते हैं।
हाय-हैलो में दिनचर्या पूरी कर
अपना डिसीप्लीन दिखाते हैं॥
वो बचपन कहाँ गया हमारा,
जिसको याद कर हम आज भी भर आते हैं॥
गली में खेलते थे हम पिट्टू, पाटिका, गिट्टी का खेल।
कहीं घुमाते लुटिया तो कहीं कंचों का खेल॥
गुल्ली लिये गाड़ते थे निशाने तो कहीं,
गुलेल से तोड़ते थे आम, अमरूद और बेर।
वो बचपन कहाँ चला गया,
वो पल कहाँ चला गया॥
गुड्डे-गुड़िया की शादी में
मेहमान बन जाते सब काकी-ताई।
फँसा जहाज़ पास के ताऊ की छत पर,
तो उनके घर की कुंडी बार-बार खटखटाई।
ताई ने आवाज़ लगाई-
बेटा! ठंडाई बनी है, थोड़ी पीकर जाना भाई॥
वाह क्या प्यार था उनका,
जो अब मिले कहीं ना भाई।
वो बचपन कहाँ चला गया?
वो पल अब कहाँ चला गया भाई?
बारिश का अलग ही मजा था।
भीगने का अलग ही नशा था॥
बजाते थे पीपा लकड़ी से।
छपछपाके मारते थे इक-दूजे पे॥
पापा-मम्मी बनाते थे नाव काग़ज़ की
जिसको प्यार से बहाते थे हम सभी॥
वो बचपन कहाँ चला गया,
वो पल अब कहाँ चला गया भाई?
शाम को जब बाबा करते थे
पाइप से पानी का छिड़काव।
मिटृटी की सोंधी ख़ुशबू में,
बिछाते थे हम खाट वहीं॥
सब पड़ोसी साथ हो जाते,
चाय शक्करपारा साथ में खाते।
एक रूपए की चाचा चौधरी-चंपक
मिल-बाँट बारी-बारी से किराए पर लाते॥
वो ही बचपन था, सच वो ही क्या बचपन था।
जहाँ इलेक्ट्रॉनिक यन्त्र साथ में ना था,
जहाँ सिर्फ़ इलेक्ट्रॉनिक रिलेशन हाथ में था॥
बिजली का जाना तो लगा हो छत पर मेला।
एक छत से दूसरी छत पर
कूद-कूद कर धमाल मचाते थे ,
मम्मी-पापा और आस-पड़ोस
गपशप कर शोर मचाते थे ,
वो ही बचपन था सच वो ही क्या बचपन था॥
साथ रहने से इक फ़ायदा था,
रिश्तों से घर ही नहीं,
बल्कि पूरा मुहल्ला अपना लगता था।
मान-सम्मान इज़्ज़त सिर्फ़ माँ-बाप की ही नहीं,
पड़ोस के चाचा-ताऊ की भी रखते थे।
गली के मोटी मूँछ वाले काका से
हम सब डरा करते थे॥
कोई लेट नाइट, डीजे, कैसीनो
ड्रग्स पार्टी नहीं होती थी।
बिस्तर बिछा नानी-दादी से
घंटों कहानियाँ सुनते थे।
गर समय मिलता था तो राजा-वजीर,
अंत्याक्षरी भी खेला करते थे।
वो ही बचपन था, सच में वो ही बचपन था॥
अब समय बदल गया,
बचपन हाय! कहाँ चला गया?
पापा-मम्मी को टाइम नहीं,
पापा-मम्मी का सम्मान नहीं॥
पड़ोस की कुछ ख़बर नहीं,
कोई काकी-चाची नहीं।
लेट-नाइट आते हैं,
बाप के संग जाम टकराते हैं।
माँ-बाप ने भी सोच लिया
रॉयल परिवार असली में पूर्ण हुआ॥
असल में तो बर्बाद हुआ,
बचपन तो खिसक गया।
न वो बचपन, न वो प्यार, न वो चाहत,
न ही संग साथ सम्मान रहा॥
हाय बचपन कहाँ चला गया?
हाय बचपन कहाँ चला गया??
***
०२. अमरेन्द्र नारायण, जबलपुर मध्य प्रदेश
सृजन संसार: काव्य संग्रह- सिर्फ एक लालटेन जलती है, अनुभूति, थोड़ी बारिश दो, तुम्हारा भी,मेरा भी, श्री हनुमत् श्रद्धा सुमन पाठकों द्वारा प्रशंसित किये गये हैं। चम्पारण सत्याग्रह और फीजी में प्रवासी भारतीयों की स्थिति पर आधारित उनके उपन्यास ''संघर्ष'' का तीसरा संस्करण प्रकाशित हो चुका उनकी पुस्तकें''एकता और शक्ति'' तथा ''Unity and Strength'' लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल के यशस्वी जीवन से प्रेरित हैं। प्रधान मंत्री माननीय श्री नरेन्द्र मोदी और अन्य कई गणमान्य व्यक्तियों ने इन पुस्तकों की प्रशंसा की है। लगभग दो वर्षों के गहन शोध के बाद उन्होंने देशरत्न डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद के बहुआयामी व्यक्तित्व पर आधारित ''पावन चरित'' शीर्षक पुस्तक लिखी है। इस पुस्तक का और उनके काव्य संकलन ''उत्साह, तुम्हारा अभिनंदन'' (दूसरा संस्करण अगस्त २०२४) तथा तकनीक के माध्यम से ग्रामीण विकास पर आधारित उनका उपन्यास ''सम्मान पथ'' का प्रकाशन बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा किया गया है।
०००
शरारत से गंभीरता की मजबूरी
घर में समाचार पत्र और साहित्यिक पुस्तकें एवं पत्रिकायें डाक से आती थीं। हम भाई-बहन उन में प्रकाशित रचनाओं के विषय में चर्चा करते थे। घर की महिलायें परिवार से सम्बंधित व्यक्तियों और घटनाओं के विषय में बतलाती थीं।
देश को स्वतंत्र हुए चार-पाँच वर्ष बीते थे। हमारे घर की पूज्य महिलायें स्वतंत्रता आंदोलन में हमारे परिवार के लोगों की भागीदारी के विषय में हमें जानकारी देती थीं। उन्होंने बताया था कि जब मेरे छोटे दादा जी पहली बार सत्याग्रह में जेल गये थे तब परिवार की महिलाओं ने दादी जी को सांत्वना देने के लिए उनसे कहा-''अम्मा! आप चिंतित मत हों। बाबूजी की अनुपस्थिति में हम आपका पूरा ध्यान रखेंगी।“
दादीजी ने कहा- “तुम नई-नई लड़कियाँ मुझे अक्ल सिखाने आई हो? तुम्हारे बाबूजी देश के काम में जेल गए है तो इसमें दुखी होने की क्या बात है? मुझे भी सरकार जेल ले जाती तो और अच्छा होता। जाओ, चरखा चलाओ।”
दादीजी ने कहा- “तुम नई-नई लड़कियाँ मुझे अक्ल सिखाने आई हो? तुम्हारे बाबूजी देश के काम में जेल गए है तो इसमें दुखी होने की क्या बात है? मुझे भी सरकार जेल ले जाती तो और अच्छा होता। जाओ, चरखा चलाओ।”
दादाजी तो सत्याग्रही थे,पर चाचाजी ने, अपने पिताजी का अनुसरण करने की अपेक्षा क्रांति का पथ चुना और सन १९४२ के आन्दोलन में उत्साह से भाग लिया। मेरी बहनें बताती थीं कि जब पुलिस उन्हें पकड़ने आती थी तब वे साड़ी पहन कर मक्के के खेत में छुप जाते थे। उन्हें गिरफ्तार करने के लिए सरकार द्वारा पुलिस के उच्च अधिकारियों पर दबाव डाला जा रहा था। चाचाजी अपना ठिकाना बदलते रहते थे।
एक बार चाचा जी अपने एक मित्र के यहाँ छुपे थे। पुलिस विभाग में कार्यरत इन दोनों के एक मित्र ने, पदोन्नति के लोभ में, चाचा जी के गुप्त वास की सूचना अपने अधिकारी को दे दी। चाचा जी पकड़ लिए गए। जब वे मित्र अपने अधिकारी के पास पदोन्नति का आवेदन लेकर गए तब उनके अधिकारी ने कहा- “मैं कभी भी तुम्हारी पदोन्नति के लिए अनुशंसा नहीं करूंगा। जब तुम अपने प्रिय दोस्त के साथ विश्वासघात कर सकते हो, तब तुम पर कौन भरोसा करेगा?”
हमारे घर में कई पत्रिकाएँ आती थीं। मुझे बचपन में बताया गया कि चाँद पत्रिका के फांसी अंक को मटके में डालकर जमीन के अन्दर छुपा दिया गया था। हमारे गाँव के घर में समाचार पत्र एक दिन बाद, डाक से आता था। मुझे सरदार पटेल का निधन होने का समाचार याद है, मेरी उम्र उस समय लगभग ५ वर्ष थी। मेरे बड़े पिताजी, पिताजी और परिवार के अन्य लोग बहुत दुखी थे।
मुझे स्वतंत्र भारत के पहले आम चुनाव में लोगों के उत्साह की याद आती है। मैं भी पिताजी के साथ गाँव के स्कूल में गया था, जहाँ पोलिंग बूथ बना था।
घर पर बड़े पिताजी से प्रारम्भिक शिक्षा पाने के बाद हमारे भाई-बहन स्कूल में पढ़ने के लिए पटना आ जाते थे। परिवार की परम्परा के अनुसार मैं भी पटना आ गया। मेरे पिता जी, माता जी भी पटना आ गये। जब मैं आठ वर्ष का हुआ तब चौथी कक्षा में मेरा नाम लिखवाया गया। पटना में भी हम कई भाई-बहन साथ थे इसलिए मन लगता था। स्कूल में पढ़ाई के बाद शाम का समय मित्रों के साथ गाँधी मैदान में खेलने और बातें करने में व्यतीत होता था।
घर पर बड़े पिताजी से प्रारम्भिक शिक्षा पाने के बाद हमारे भाई-बहन स्कूल में पढ़ने के लिए पटना आ जाते थे। परिवार की परम्परा के अनुसार मैं भी पटना आ गया। मेरे पिता जी, माता जी भी पटना आ गये। जब मैं आठ वर्ष का हुआ तब चौथी कक्षा में मेरा नाम लिखवाया गया। पटना में भी हम कई भाई-बहन साथ थे इसलिए मन लगता था। स्कूल में पढ़ाई के बाद शाम का समय मित्रों के साथ गाँधी मैदान में खेलने और बातें करने में व्यतीत होता था।
हम लोग प्रायः हिंदी साहित्य सम्मेलन भी जाया करते थे। आचार्य शिवपूजन सहाय जी, आचार्य नलिन विलोचन शर्मा जी एवं अन्य कई सम्माननीय साहित्यकार मेरे पिताजी के मित्र थे या उनसे परिचित थे। मेरे बहनोई प्रो.उमाकांत वर्मा हिंदी, भोजपुरी एवं बज्जिका के प्रतिष्ठित साहित्यकार थे। उनसे परिचित साहित्यकार हमारे घर प्रायः आते थे। हमारे आग्रह पर वे हमें अपने गीत, कविताएँ, संस्मरण आदि सुनाया करते थे। बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के कार्यक्रमों में हमें अपने देश के कई प्रख्यात साहित्यकारों को देखने और सुनने के अवसर मिले। मुझे याद है वहीं मैंने श्री रामधारी सिंह दिनकर जी से 'नीलकुसुम' कविता सुनी थी।
दुर्गापूजा के समय देश के कई प्रसिद्ध गायक,संगीतकार,नृत्य कला प्रवीण कलाकार पटना आते थे। हम लोग देर रात तक उनकी प्रस्तुतियाँ सुना और देखा करते थे। उन तीन-चार दिनों देर रात घर लौटने पर भी डाँट नहीं पड़ती थी। देखते -देखते चौदह वर्ष निकल गए। अगले वर्ष हाई स्कूल की परीक्षा में अच्छा परिणाम लाने की चुनौती थी जिसके लिए घर और विद्यालय में, जी-जान से परिश्रम करने की सलाह मिला करती थी।
चौदह वर्षों की शरारत और खेल कूद करने की छूट अब समाप्त होने ही वाली थी । अब बचपन की शरारतों की जगह चुनौतियों की गंभीरता आहट दे रही थी! मुझे सुभद्रा कुमारी चौहान जी की पंक्तियाँ याद आती हैं-
वे मधुर दिन अब कहाँ लौटेंगे?
बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी।
गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी॥
चिंता-रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छंद।
कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद?
वे मधुर दिन अब कहाँ लौटेंगे?
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०२. अरविन्द श्रीवास्तव 'असीम' झाँसी / दतिया
भविष्यदर्शी वैद्य
यह बात उस समय की है जब मेरी आयु लगभग ८-९ माह की थी। यह घटना मेरी माता जी व नानी जी ने मुझे किसी समय सुनाई थी। मेरा जन्म ग्राम अमरा में हुआ था, जो कि झाँसी (उ0प्र0) से लगभग ४५ किलोमीटर की दूरी पर है। मेरा किसी कारण पेट फूल गया था अथवा पेट पर सूजन सी आ गई थी और इस कारण घर में सभी चिन्तित थे। मम्मी और नानी मुझे लेकर झाँसी के एक प्रसिद्ध आयुर्वेदिक चिकित्सक एवं माता दुर्गा के प्रबल साधक श्री वनवारीलाल शुक्ल जी के अस्पताल में लेकर आईं। जैसे ही वे अस्पताल पहुँची तो अस्पताल बन्द होने का समय हो चुका था और वैद्य जी अपनी कार में बैठकर अपने घर की ओर जा रहे थे। यह देखकर माता जी और नानी बहुत दुःखी हुईं और वैद्य जी का घर का पता लगाकर उनके घर पर पहुँच गईं। वैद्य जी का निवास प्रथम मंजिल पर था और जैसे ही मम्मी ने नीचे से काॅल बेल बजाई तो कुछ देर में वैद्य जी ने खिड़की से झाँककर हम सबको देखा। मम्मी ने नीचे से ही वैद्य जी को सारी समस्या बताई तो उन्होंने कुछ देर सोचकर यह कहा कि चिन्ता न करो, तुम्हारे बालक को कुछ नहीं होगा। यह जीवन में बहुत सी कलाओं तथा विद्याओं का जानकार होगा और यह कहकर वहीं से एक अनार नींचे फेका तथा यह भी कहा कि आज केवल इसी अनार का रस इसे पिलाना है। अगले दिन इसे लेकर अस्पताल आ जाना और मैं दवाई दे दूँगा।
साथी था संकोच
मैं बचपन में बहुत सीधा तथा संकोची स्वभाव का था। शायद ही मैंने कभी कोई शैतानी किसी के साथ की हो। मुझे अपनी शैतानी की कोई घटना याद नहीं आती है। मम्मी और नानी लड़कियों के सरकारी स्कूल में शिक्षिका थीं और इस कारण मैं भी लड़कियों के स्कूल में ही उनके साथ पढ़ लेता था। शायद बचपन में बहुत सीधा या सरल रहने का यह भी कारण रहा है। कक्षा ५ की परीक्षा के पश्चात् सभी छात्रों को अध्यापकों के समक्ष कोई कविता, श्लोक या दोहा सुनाना था। सभी छात्र एक-एक कर, कुछ न कुछ सुना रहे थे। मेरा भी नम्बर आने वाला था। मेरे हाथ-पैर बुरी तरह काँप रहे थे। गले से आवाज नहीं निकल रही थी। मुझे सभी लोग कुछ न कुछ सुनाने के लिये प्रोत्साहित कर रहे थे, लेकिन मेरी स्थिति ऐसी थी कि गले से एक शब्द भी नहीं निकल रहा था। प्रधानाध्यापक मेरे फूफा जी थे और उन्होंने मुझे परीक्षा में फेल करने की भी धमकी दी लेकिन मैं फिर भी कुछ नहीं सुना पाया। आज भी यह घटना सोचकर मैं समझ नहीं पाता हूँ कि ऐसा क्यों हुआ था? बाद के जीवन में कई विश्व स्तर के आयोजन या रामकथा के माध्यम से सफलतापूर्वक अपने विचार रख सका।
४-५ वर्ष की अवस्था तक मेरे साथ एक समस्या और भी जुड़ी हुई थी कि बच्चों के साथ खेलते हुये जब कभी मैं दौड़ता था तो मुझे बेहोशी आ जाती थी। बाद में कक्षा ८-९ में पढ़ते हुये मैं दौड़ आदि में सबसे अन्तिम नम्बर पर ही आता था। बाद के जीवन में एथलेटिक्स की विभिन्न प्रतियोगिताओं में जिला, प्रदेश तथा राष्ट्रीय स्तर पर कई पदक प्राप्त किए।
१२-१३ वर्ष की उम्र में एक घटना कई बार विद्यालय में भी हुई। संस्कृत के एक अध्यापक जो कि छात्रों की पिटाई के लिये बहुत मशहूर थे। गलत उत्तर देने पर छात्रों को बहुत बुरी तरह पीटते थे, लेकिन मेरा सीधापन तथा मासूमियत देखते हुए, कभी-कभी मेरे कारण पूरी कक्षा पिटाई से बच जाती थी। पता नहीं क्यों वह मेरे सीधेपन व सरलता के कारण पूरी कक्षा की पिटाई गलत उत्तर देने पर नहीं करते थे। शायद मैं उनका प्रिय विद्यार्थी था।
डटना सीखा भाग-भागकर
बाल्यकाल में परिवार के लोगों के प्रोत्साहन के कारण मैंने एक बार किसी राष्ट्रीय पर्व के अवसर पर ५ बाल कवियों की गोष्ठी में भाग लेने की हिम्मत दिखाई। मुझे ओज के कवि श्री श्यामनारायण पाण्डे जी की कविता पाठ करना था। मैंने इसका अभ्यास भी किया था लेकिन कार्यक्रम में शिक्षकों तथा छात्रों की भीड़ देखकर मैं सहम गया। काव्यपाठ का मेरा नम्बर आने वाला था और मेरी धड़कनें बढ़तीं जा रहीं थीं। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं अपनी जान कैसे छुड़ाऊँ। जब मेरा क्रम आया तो एक या दो पंक्तियाँ किसी तरह मुँह से निकली और शेष कविता भूल गया। कार्यक्रम के समाप्त होते ही मैं विद्यालय से घर की ओर इतनी तेजी से भागा कि पता ही नहीं चला और घर पहुँच गया। असल में मुझे डर था कि कार्यक्रम के आयोजक श्री वर्मा जी मुझे दण्डित न करें फिर डर के मारे कुछ दिन विद्यालय ही नहीं गया। बाद के जीवन में आकाशवाणी, दूरदर्शन, देश के प्रमुख मंचों एवं विश्व के १५ देशों में काव्य पाठ बहुत सफलतापूर्वक किया।
जाने कहाँ गए वे दिन
बाल्यकाल में पढ़ाई-लिखाई के क्षेत्र में सदैव सामान्य अथवा मध्यम स्थिति ही रही, लेकिन जीवन में एक ऐसा दौर आया कि कक्षा ५ में छोटे भाई सुनील श्रीवास्तव ने जिला में प्रथम स्थान प्राप्त किया और उन्हें छात्रवृत्ति मिलना भी प्रारम्भ हुई। गाँव में तथा घर में सभी लोग उसी की प्रशंसा करते थे और मुझे कभी किसी प्रशंसा को पाने का अवसर ही नहीं मिलता था। इस कारण मेरे मन में छोटे भाई के प्रति ईर्ष्या व द्वेष का भाव उत्पन्न हो गया था जो कई वर्षों तक बना रहा। यद्यपि मैंने कभी प्रकट नहीं किया। उसकी प्रशंसा सुनकर मुझे कुछ कर दिखाने का भाव तो बनता था लेकिन उस दौर में कभी कुछ कर नहीं पाया। बाद के जीवन में इतनी शिक्षा हासिल की तथा इतनी शैक्षणिक व अन्य क्षेत्रों में उपलब्धियाँ हासिल की तथा स्वयं १२० से अधिक पुस्तकें लिखीं कि मैं स्पर्धा में मीलों आगे निकल गया।
खतरों के खेल
बचपन में कुआं, नहर आदि में मुझे गाँव के अन्य बालकों की तरह कूदने की आदत थी। ऐसा करने में २ या ३ बार डूबकर मरने की स्थिति भी पैदा हो गई थी। समझ आने के बाद पानी के खतरे को देखते हुए ऐसी जगहों पर जाना ही बंद कर दिया। बचपन में क्रिकेट खेलने के दिन कबड्डी या बाॅलीबाॅल के मैच देखने के दिन आज भी याद आते हैं। वे दिन इतने सुनहरे थे कि आज भी उन दिनों को याद करके मन फिर वहीं लौट जाने के लिये करता है।
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०३. अरुणा पाण्डे, सिहोरा / जबलपुर
"बचपन की कितनी यादें कितनी बातें"
बचपन की कुछ यादें साझा कर रही हूँ। चलिए शुरुआत करती हूँ पहले दिन शाला जाने से, तब हम पाँच साल के थे। हमारी किताब-कॉपी, स्लेट-बत्ती, पैन, पेंसिल, कम्पास आदि की दुकान थी, बड़ी बुआ के नाम पर उसका नाम था "कमला जनरल स्टोर्स"। भले ही हमारी शालेय यात्रा प्रारंभ होने में एक साल बाकी था पर घर पर मम्मी स्व. श्रीमती हृदयेश्वरी पाण्डे ने गिनती, अक्षर, शब्द,पहाड़े, सवाल, सब पढ़ाना शुरू कर दिया थे। हम पापा स्व. श्री सुशील कुमार पाण्डे के साथ दुकान भी जाते थे, किताबें जमाने में पापा की मदद करने। एक दिन सुबह हम दुकान पर थे घर से हमारे दादा जी स्व. श्री अम्बिका प्रसाद पाण्डे आए और बोले अरुण स्कूल चलोगी? हमारे दादा जी बीमा एजेंट थे | उसी सिलसिले में उन्हें मिश्रा सर से मिलना था। हमने कहा हमारे पास बस्ता नहीं है। पापा ने एक स्लेट देकर कहा- ''ये ले जाओ।'' शासकीय प्राथमिक शाला खितौला बाजार सिहोरा दुकान के पास ही थी। हम एक हाथ में स्लेट और दूसरे में दादा जी का छाता पकड़कर दादा जी के साथ स्कूल पहुँच गए। जिस कक्षा में दादा जी गए वो लड़कों की तीसरी कक्षा थी। मिश्रा जी ने दादा जी को बड़े सम्मान से अंदर बुलाकर कुर्सी पर बिठाया। हम दादा जी के पीछे-पीछे, तभी आवाज आई- ''अरे उन्ना आई है।'' देखा तो वह हमारे बड़े भाई (बड़े पिताजी के बेटे) बब्बू भैया याने श्री सतीश पाण्डे थे। दादा जी और मिश्रा जी ने हमें भैया के पास जाकर बैठने को कहा। भैया ने स्लेट देखकर कहा इस पर कुछ लिखो।हमने कहा हमारे पास बत्ती (आजकल सब पेंसिल कहते हैं) नहीं है तो उनके किसी मित्र ने बिल्कुल छोटी सी बत्ती दी। हम लिखते रहे। सर से बात करके जब दादा जी घर जाने लगे तो पूछा- ''अरुण! घर चलोगी कि पढ़ोगी? हमने कहा हम पढ़ेंगे।'' फिर क्या, यह तो प्रतिदिन का काम हो गया भैया कहते उन्ना स्कूल चलोगी? हम हाँ कहते और अपना बस्ता लेकर चल देते, यह सिलसिला बहुत दिन चला। जब हमारा प्रवेश पहली कक्षा में हुआ तब पहले दिन स्कूल जाने पर हमने खूब पढ़ाया गिनती, पहाड़े, अक्षर सब और घर आकर कहा कि हम तो पढ़ाने लगे, अब हमें तनख्वाह मिलेगी। उस समय घर में बुआजी स्व. शैल तिवारी की शिक्षक के रूप में नियुक्ति और तनख्वाह की बात होती थी शायद वही मन पर बैठी थी। उसी दिन शाम को शाला के प्रधान- अध्यापक स्व. श्री बाजपेयी जी ने पापा से कहा कि सुशील तुम्हारी बिटिया को तो पहली कक्षा का सब आता है। हाँ, जब महाविद्यालय में नियुक्ति के बाद पहली तनख्वाह घर लेकर आई तो मम्मी ने कहा- ''अरुणा तुम तनख्वाह तो पढ़ाने की ही लाईं। ''
एक बार हमारे एक पड़ोसी चाचा ने पापा से कहा था कि सुशील अरुणा तो रास्ते के कागज उठाकर पढ़ती है। इस आदत से जुड़ी एक और मजेदार बात है। हम जब तीसरी कक्षा में थे तब पापा की नियुक्ति नवीन विद्या भवन जबलपुर में भाषा के शिक्षक के रूप में हुई। हम लोग सिहोरा में थे। पापा ने जबलपुर में श्री भवानी प्रसाद तिवारी जी के बंगले के बगल में सराफ जी के यहाँ घर किराये से लिया था। हमें तो पापा चौथी कक्षा में जबलपुर लाए पर एक साल तक पापा हर शनिवार को रात सिहोरा पहुँचते और सोमवार को सुबह जबलपुर आ जाते। सिहोरा के घर में रविवार को जो बड़े-बड़े कमरे थे, वहाँ मम्मी झाड़ू लगाती थीं और दो छोटे-छोटे कमरों और उनके बीच के छोटे से आँगन में झाड़ू लगाने का काम हमारा था जो हम कई घंटों में करते,जिन लिफाफों (अखबार के कागज के पुड़ों) में सामान आता था, हम उन सबको खोलकर सीधा करते और पढ़ते, पत्रिकाओं के पन्नों पर पान लिपटकर आते, हम उन्हें पढ़ते। एक बार पापा ने मम्मी से कहा कि अरुणा को झाड़ू लगाने में बहुत देर लगती है तो मम्मी ने बतलाया कि वो एक-एक कागज पढ़ती है। इसी के चलते दीपावली के पहले हमें एक कागज मिला जिसमें पापा ने हिसाब लिखा था बाकी से हमें मतलब नहीं था पर आँख अटक गयी ३:५० के पटाखे। आज सोचती हूँ कि सन् १९६५ में तीन रुपये पचास पैसे में टोकरी भर पटाखे आ जाते थे। हम सब भाई-बहनों को पर्याप्त संख्या में मिलते थे। उस समय दोनों बड़े पिताजी के तीन बेटे दो बेटियाँ हम और हमसे छोटा गुड्डू याने चार बेटे और तीन बेटियों को पटाखे बँट जाते थे। बड़े पिताजी लोगों के द्वारा लाए गए पटाखे मिलाकर तो इतने पटाखे हो जाते कि बड़ी एकादसी (गन्ना ग्यारस) तक कमी नहीं होती थी।
बातें तो कितनी हैं पर एक और बात कह अभी बात समाप्त करूँगी। बचपन से ही काम करने में कभीहीला-हवाली नहीं की थी। मम्मी सामान की सूची नहीं बनाती थीं। हमें सामान बतलातीं, फिर सुनतीं कि क्या-क्या बतलाया है। |हम कुछ भूल जाते तो दुबारा बतलातीं। हम दुकान पहुँचकर पापा को बतलाते, पापा सामान ला देते,तब के बाजार छोटे, जरूरी आवश्यकताओं की पूर्ति आराम से करते। सामान घर ले जाने से पहले पापा हमें दुकान के बगल में पाण्डे लॉज या सामने लक्ष्मीनारायण मिष्ठान प्रतिष्ठान से एक गुलाब जामुन लाकर देते। आज वो सब यादें मन और आँखें भिगा देती हैं। एक बार पापा के मित्र रफीक चाचा ने पापा को बतलाया कि अरुणा रास्ते भर सामान को दोहराती याने याद करती चलती । बचपन की ऐसी सहजता बड़े होते ही पता नहीं कहाँ चली जाती है?
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०४. अर्जुन चव्हाण, कोल्हापुर, महाराष्ट्र
प्रो. डॉ. अर्जुन चव्हाण, कोल्हापुर
बचपन के दिन : खट्टे-मीठे, तीखे और नमकीन
अगर परमपिता परमात्मा साक्षात अवतीर्ण हो और कहे कि बोल मैं प्रसन्न हूँ, तेरे बचपन के दिन लौटने को तैयार हूँ तुरंत जवाब दे, तब हममें से कितने तुरंत 'हाँ' या 'ना' कहेंगे? किसी के लिए सोचने की बात होगी, किसी के लिए चिंतन की बात होगी तो किसी के लिए चिंता की भी मगर ईमानदारी से कहूँ तो मेरे लिए चेतना की, अटकने से ज्यादा ठिठकने की, जोश-होश और बेहोश होने से अधिक पशोपेश की इसलिए कि इसके साथ खट्टा-मीठा, तीखा-कड़वा, कसैला और नमकीन सब लौट आएगा। वह बचपन जिसे हम में से हर एक ने जी तो लिया है मगर क्या उसे फिर एक बार जीने को तैयार हैं, सारी अच्छाइयों-बुराइयों के साथ, भावों और प्रभावों के साथ, खुशियों और आँसुओं के साथ, पिटाईयों- मिठाइयों और ढिठाइयों के साथ और गिनि-चुनी आज़ादियों और ढेर सारी पाबंदियों के साथ जीने के लिए फिर एक बार कितने तैयार होंगे कहना मुश्किल है। माता-पिता का प्यार और फटकार भी, दादा का दुलार और दादागिरी भी, दीदी के स्नेह का दमन और दीदी गिरी भी, साथियों और खुराफातियों का राग-विराग भी। इन सबकी देखा-देखी में बचपन 'अथ' से शुरू करने की कामना पूरी करनेवाले परमपिता परमात्मा को हर कोई सोचकर ही जवाब देगा, इसमें कोई संदेह नहीं।
उस समय के बालक और आज के इन पंक्तियों के लेखक का बचपन संयुक्त परिवार में बीता। दादा-दादी, चाचा-चाची, बुआ, भाई- बहन, सगे और चचेरे कुल मिलाकर २०-२५ सदस्यों का किसान परिवार, खेती जीविका का प्रधान साधन, किसानी के साथ में गाय-बैल, भैंस- बकरियाँ और मुर्गियों आदि का पालन करने में सब का जीवन अनुस्यूत। सुबह से शाम तक सब अपनी खेती में काम करते, पिताजी और सारे चाचा तड़के से खेती के काम में जुट जाते, मेरी माँ, ताई, चाचियाँ सब खाना लेकर खेत में जातीं, सिर्फ दादी घर में रहती और हम बच्चे। दादी का काम था दूध गर्म करना, दही जमाना-मथना-मक्खन निकालना और छाछ बनाना आदि, बड़ी मटकी में तपाए गए दूध की मलाई निकालना मटकी में चिपकी हुई मलाई की खुरचकर निकालना और उसे हम बच्चों को खाने के लिए देना दादी का दैनिक काम-काज था। उस समय चम्मच नहीं थे, खुरचन निकालने के लिए नदी की रेत से सीपी खोजकर हम बच्चे दादी को लाकर देते, वह भी खुश होती, पोते-पोतियों को मलाई खिलाने में उसे परमानंद मिलता। गाँव की अनेक महिलाएँ लोटा या मटकी लेकर दादी के पास कभी छाछ, कभी दूध माँगने आतीं, दादी उन्हें भी खुश कर देती थी मगर उसने कभी किसी से पैसे लिए दूध-दही-छाछ बेचकर इसे हमने कभी देखा नहीं।
महाराष्ट्र के एक पिछड़े मराठवाड़ा इलाके में 'धाराशिव' (तब का उस्मानाबाद) जिले के परांदा तहसील में स्थित करीब चार-पाँच सौ की आबादी वाला पारेवाड़ी नामक गाँवमें मेरा जन्म हुआ, सही जन्म तिथि का मुझे आज भी पता नहीं, जो भी मेरे नाम के साथ जुड़ गई वह पाठशाला के अध्यापक की देन है क्योंकि उस समय गाँव में न तो ग्राम पंचायत का अस्तित्व था न ही जन्म-मृत्यु दर्ज करने वाला दफ्तर। यह आजादी के प्रारंभिक पहले दशक का समय था, यहाँ करीबन १९६५ से ग्राम पंचायत अस्तित्व में आई, वह भी संयुक्त रूप में, पारेवाड़ी, मुगांव और कार्ला इन तीन गाँवों में एक ग्राम पंचायत, मेरे मझले चाचा सरपंच थे मगर बिना किसी चुनाव के, सर्व सम्मति से। इसके प्रमुख दो आधार थे, इसका मुझे बहुत बाद में पता चला एक इस परिवार की सदस्य संख्या और दूसरा इन सबकी नेकी। यही चाचा अपनी बेटी शारदा और मुझे पाठशाला में भर्ती कराने के लिए ले गए थे। हमें पहली कक्षा में प्रवेश मिला। उस समय आँगनबाड़ी, प्ले ग्रुप, जूनियर केजी, सीनियर केजी जैसी न कोई सुविधा थी, न ही कोई शर्त या प्रावधान। जिस पाठशाला में मुझे भर्ती किया गया उसकी कोई इमारत नहीं थी, हरे-भरे नीम के पेड़ के नीचे, कभी ग्राम दैवत हनुमान मंदिर में तो कभी गाँव में मिट्टी के बने चौपाल के आधे हिस्से में हमें बिठाकर पढ़ाया जाता, शेष आधे हिस्से में ग्राम पंचायत का कामकाज चलता। चौथी कक्षा तक सारे विषय पढ़ाने के लिए एक ही शिक्षक जोजी-जान से पढ़ाते। सब उनको 'गुरु जी' कहते माने गुरुजी। उस समय महाराष्ट्र में साने गुरुजी 'श्यामची आई' (शाम की मां बाल मन को संस्कारित करनेवाले बहुचर्चित उपन्यास के लेखक) अत्यंत चर्चित थे। हमें पढ़ानेवाले माने गुरुजी थे मगर छात्र 'मा' का 'सा' बनाते और इस तरह हमारे गुरु जी का साने गुरुजी होने का मजा लेते, छात्रों की यह शरारतगुरु जी को भी सुखद लगती।
हमारे परिवार में एक खुशी की घटना थी कि कच्ची माटी का मगर नया घर बनाया गया था इस अवसर पर पूजा कर सबको खाना खिलाने का रिवाज था। उस दिन गुरु जी को भी खाना खाने के लिए बुलाया गया। उन दिनों घर में अध्यापक का आना सम्मानजनक मानते थे। खाना खाने के बाद गुरुजी हमारे परिवारवालों के सामने एक प्रस्ताव रखा कि अर्जुन अब दूसरी कक्षा में जाएगा, मैं चाहता हूँ उसे सीधे तीसरी कक्षा में डाल दें, उसकी पढ़ाई की गति अच्छी है। दादी और चाचा जी ने या प्रस्ताव माना नहीं। माँ ने कहा कि वह छोटा है, चौथी के बाद यहाँ से दूसरे गाँव में आना-जाना पड़ेगा। गुरु जी का कहना था मैं अपने अधिकार में कर सकता हूँ और अर्जुन पढ़ाई में तेज है। उसे २ से लेकर ३० तक के पहाड़ी कंठस्थ हैं और गाने और खेलने में पूरी पाठशाला में अच्छा है। फिर भी तय हुआ कि दूसरी के बाद ही उसे तीसरी-चौथी में जाने दें। पाठशाला का वातावरण आकर्षक, आनंदित, सरस, सुंदर, जानदार और शानदार था, भले ही चारों कक्षाएँ एक साथ पेड़ के नीचे हनुमान मंदिर और कभी नई चौपाल में होती। चौपाल की लिपाई छोटी छात्राएँ करतीं और हम छात्र गाँव के बाहर के तालाब से पानी, गाय का गोबर आदि लाकर देते। यह काम शनिचर के दिन होता। जब मैं दूसरी कक्षा में था तभी मुझे तीसरी, चौथी कक्षा के पाठों संबंधी पूछे गए प्रश्नों के उत्तर आते थे क्योंकि एक ही कमरे में एक ही पेड़ के नीचे या एक ही मंदिर में चारों कक्षाओं के छात्रों को एक साथ बिठाया जाता, सिर्फ चार कक्षाओं की चार कतारें होतीं। जब गुरुजी तीसरी या चौथी कक्षा को पढ़ाते तब मैं ध्यान से सुनता। इसका लाभ यह हुआ कि मुझे पढ़ाई में सदा आगे रहने का अवसर मिला।
बचपन का यादगार दिवस बताना चाहूंगा कि घरवाले गुरुजी को पिटाई की पूरी अनुमति देते थे वैसे में बिना अनुमति के भी छात्रों को सुधार और अनुशासन के लिए पीटते थे इसका नतीजा जो बच्चे पढ़ने लिखने में कमजोर होते वह सजा के डर के मारे स्कूल आना ही छोड़ देते थे इस अनुभव से मैं खुद गुजरा हूं एक दिन गुरु जी किसी काम से बाहर थे जब लौटे उन्हें काफी शोरगुल सुनाई दिया फिर उन्होंने सब की धुनाई शुरू की छड़ी से कपड़ों से दूसरों से भी मुस्ताक भी आए मेरे कान को पकड़ लिया और अपने अंगूठे आंखों से इस कदर में रोड उसे खून बहने लगा मैं रोने लगा खून का बहाना रुक नहीं रहा था फिर गुरु जी ने अपने पास लिया कुछ कर मुझे चुप करने की कोशिश की गुरुजी भी गंभीर नजर आए प्यार से बोले मैं दवा ले आता हूं रोना मत असल में मेरी कोई गलती नहीं थी फिर भी मुझे सजा दी गई इसका दर्द ज्यादा था नाखून दबाकर मरोड़ा जाने से कान मेंछेड़ हुआ था ौ वह निशानी आज भी है वह निशानी आज भी हल्की सी मेरे कान पर मौजूद है मगर इस घटना से गुरु जी को बहुत बुरा लगा जिसे देखकर मैं खुद भी दुखी हुआ था इसके बाद गलती की छानबीन किए बिना गुरु जी ने कभी किसी को सजा नहीं दी मुझे तो कतई नहीं पढ़ाई के अलावा गीत गाने और खेलने का नित्य काम था प्रतिदिन पहाड़ी कंठस्थ करने के लिए स्कूल छूटने से 1 घंटे पहले का समय कैसा सारे बच्चे खड़े होते उनमें से दो आगे रहते और सभी बच्चे उनके पीछे आगे कहने वालों में दूसरी कक्षा का में और चौथी कक्षा का दास बालगुडे हम दो थे पढ़ाई के दौरान प्रश्न उत्तर प्रणाली अध्यापन का सबसे बेहतरीन तरीका लगता था इससे ग्रह पाठ और स्वयं अध्ययन करने वाले छात्र आगे रहते और न करने वाले की पोल खुल जाती इसमें गुरुजी एक-एक को कतर से सवाल पूछते छात्र जवाब देते जाते मगर तो जवाब नहीं दे पाता उसे खड़ा किया जाता और जिसने जवाब दिया उसे उसकी नाक पकड़वाकर उसके मुंह पर थप्पड़ लगाने को कहा जाता और एक दिन इसी क्रम में गुरु जी के कहने पर स्वयं मैं मधुकर को थप्पड़ मारा जो मेरा की चेहरा भाई था मुझे 2 साल बाद लेकिन पढ़ाई में ढीला और कमजोर भाई होने के नाते मैं हल्का सा ही चांटा मारा था लेकिन दूसरे दिन सुबह मेरी मां के पास मेरी टाइम शिकायत की मां ने मुझे डांटा मगर हकीकत बता दी तब कहीं मामला सुलझा किया एक दिन सुबह-सुबह मां को मैंने अपने बड़े भाई की पिटाई करते देखा वह उसे कई के घर तक खींच कर ले गई और कई को कद्दू देते हुए बोली यह आपका है आपके खेत से मेरा सुरेश चुरा कर लाया है इसके लिए मैं माफी मांगती हूं आगे से यह ऐसा नहीं करेगा ताकि वह ब्राह्मण महिला थी जिसका खेत हमारे खेत के पास था बीच में सिर्फ मेरे साथ सारा गांव उनका आदर से काफी कहता था उनके पति बापू राव पॉल गुजर चुके थे वह गांव के बच्चों को अपने घर बुलाकर वर्णमाला पढ़ते थे पता चला कि मेरे पिताजी भी उन्हीं से साक्षर हुए थे फिर भजन पूजन करने लगे उन्हें की संगति से वारकरी संप्रदाय में दीक्षित होकर विट्ठल भक्त बने पंढरपुर में स्थित विट्ठल की बड़ी उपासना की एक पारंपरिक प्रणाली और परिपाटी के लिए हर महीने की एकादशी को जाते थे याद है कि उसे समय कई ने वह कद्दू नहीं लिया मेरी मां को वापस करते हुए कहा कि सीता तू इसे लेकर जा तेरी ईमानदारी ही काफी है मां घर लौटी मगर हम बच्चों के बीच यह घटना नेकी के कुछ ऐसे भी हो गई की जिंदगी की पूंजी संबाद होती गई संयुक्त परिवार में मेरे पिता के पांचो भाइयों की शादियां हुई थी बच्चे भी आए थे तब हमारे परिवार ने दादा दादी के कहने पर मिट्टी और लकड़ी के दो बड़े बना लिए एक बारे में दो और दूसरे में तीन भाइयों के लिए निवास की सुविधा कर दी गई सबको अलग-अलग घर बनाने का यह सिलसिला करीब 2 साल तक चलता रहा परिवार के सारे स्त्री पुरुष दिन भर खेती में काम करते शाम होते ही पहले महिलाएं घर जाकर चौहान पर खाना बनाती जब पुरुष आते तब रात का खाना साथ होता मन जब खाना बनाती तब तक पिताजी डिग्री को पास लेकर उसकी रोशनी में हरिपाठ संत तुकाराम एकनाथ के अभंग शानी महात्मा गीता और समस्त रामदास का दासबोध जैसे धार्मिक तथा पौराणिक ग्रंथ पढ़ते रहते मेरा बाल मन ध्यान से सुनने को सदा उत्सुक रहता मैं पास में बैठकर सुनता रहता आगे जब पढ़ने के लिए मुझे स्कूल भेजा गया तब गुरु जी के पास ध्यान से सुनने में यह आदत काफी उपयोगी सिद्ध हुई लेकिन जब धीरे-धीरे किताब पढ़ने आने लगा तब पिताजी उनके ग्रंथ मेरे हाथ में थमा देते मुझे पटवा लेते और खुद छोटा बनाकर सुनते लेकिन जब किसी शब्द का उच्चारण गलत होता तो फिर से पढ़ने को कहते जब तक की सही नहीं होता अभ्यास अभंग और गुरुजी उन्हें में से कुछ ऐसे शब्द हैं जिनके बारे में हमें सुनाया था कि इन्हें अभ्यास अभंग और गुरु जी कहना बोलना चाहिए इस तरह रोज खाना खाने बनने तक परसेंट का अभ्यास होता और उसके बाद खाना एक दिन हम सब रात का खाना खा रहे थे और एक खौफनाक घटना घटित हुई इतनी तत्काल के उसके स्मरण से आज भी रोंगटे खड़े होते हैं अचानक तेजी से रहते हुए एक सांप वही आया जहां हम सब खाना खा रहे थे सब डर गए और सबको देखकर शायद शांति ोओ शायद सांप भी और सबको देखकर इसलिए वह माटी की दीवार के कोने में एक क्षेत्र में घुस गया लेकिन उसकी पुछ थोड़ी बाहर रही पिताजी इधर-उधर लकड़ी आदि मिलती है क्या अच्छी रहे थे कि इतने में मां झट से उठी और अपनी पहनी हुई नौवारी साड़ी का नीचे का हिस्सा ऊपर डालकर उसको खींचने लगी काश करके खींचना से पूछ टूट कर मन के हाथ में आई और सांप अंदर बिल में भाग गया कुछ दिनों बाद पता चला कि जख्मी सांप को चीटियां लग गई और वह मर गया लेकिन सब ने इस हरकत पर मां को डांटा या कहकर कि यदि वह पलट जाता तो तब उनका एक ही कहना था कि मेरे बच्चे छोटे हैं यदि उनको खुश हो जाता तो मेरी मां पढ़ी-लिखी नहीं थी मगर वह पढ़ने जानती थी उसका बचपन सोलापुर शहर के पास वाले नमक छोटे से गांव में बीता था हमने सुना था कि हमारे नाना जी ने हमारी मां को यह कहते हुए वर्णमाला पढ़ने के लिए प्रेरित किया था इतना सीखोगी तेरा कल्याण होगा इससे प्रेरित होकर वह वर्णमाला सीख गई जिसका लाभ आगे शायद हम बच्चों को होना था तो हुआ ज्यादातर स्वयं मुझे हम दो भाई और एक छोटी बहन कल तीन संताने थे अपने मां-बाप की अपने माता-पिता की बड़े भाई और मुझ में करीब 8 साल का अंतर उसकी पढ़ाई के समय उसे तीसरी कक्षा के बाद पढ़ाई के लिए दूसरे गांव में जाना पड़ता बीच में एक नदी थी उसके साथ गांव के और दो सहपाठी से भैया के बारे में मैं पिताजी से सुना था कि तीनों मिलकर जाते नदी में दिन भर मछलियां पकड़ते खाना खाकर शाम होते ही लौटते घर में पता चला तो दादा जी ने मेरे भैया से पूछा सुरेश तुझे पढ़ाई करनी है कि अपने गए बकरियों की चरवाही भैया ने तुरंत दूसरा विकल्प चुना बोल दिया चरवाही पिताजी से मैंने यह भी कई बार सुना कि तेरा भाई तुझसे ज्यादा होशियार था लेकिन उसके साथियों के कारण उसकी पढ़ाई नहीं हो पाई शिवाजी विश्वविद्यालय कोल्हापुर में हिंदी विभाग के प्रोफेसर अध्यक्ष बनने के बाद भी पिताजी से कई बार मुझे अपने भाई के बारे में यही सुनने को मिला पिताजी के इस कथन से अक्षर मैं बड़े बेटे के अनपढ़ रहने का दर्द महसूस किया परिवारी गांव ऐसा गांव था जहां करीब सभी लोग खेती और मजदूरी करने वाले थे हर दिन रात के भजन के बाद हनुमान मंदिर में भजन होता सावन महीने में रामायण महाभारत जैसे धार्मिक ग्रंथो के पारायण होते गांव के अधिकतर स्त्री पुरुष सुनने के लिए आते इसमें हमारे पिताजी चाचा तो आगे रहते थे पिताजी को संत तुकाराम और एकनाथ के अभंग इतने कंठ से की एकादशी की रात को भजन और जागरण का कार्यक्रम होता तो वह सारी रात गेट सोताओं में दादी और माफी होती थी जाने अनजाने में बचपन से मुझे भी यह सब सुनने गाने की लत लग गई मेरा बचपन जी गांव में बिता उसका दुख की तरह है इसे मैं भूल नहीं सकता यह वह गांव था जिसकी अर्चना और अभाव के सारे अवतार मैंने देखे और भोगे हैं जब कभी पीछे मुड़कर देखता हूं तो विश्वास नहीं कर पाता यहां से मैं आगे बढ़ा यहां से मेरे जीवन की शुरुआत हुई जहां एक भी दवा खाना ना हो एक भी बैंक ना हो दिन भर में एक भी सेंट या कोई बसा आती हो डाकघर ना हो दुनिया का कोई भी अखबार ना आता हो एक साइकिल तक किसी के पास ना हो और जहां बाजार के लिए लोगों को 10 किलोमीटर पैदल दूसरे गांव जाना पड़ता हो वहां सुधार शिक्षा तरक्की सरकारी नौकरी आदि की बातें बहुत बात की थी अगर सच कहूं तो इस 21वीं साड़ी का पाव शतक बिताने के बाद भी इस गांव में कामुवेश यह सारे के सारे अभाव आज भी बने हुए हैं आज भी बने हुए देखने को मिलेंगे कुछ लोगों के पास आज टू व्हीलर आ गया है मोदी जी की मेहरबानी से कुछ घरों में शौचालय भी बने हैं बाकी सारे अभाव मुख्य अवतार धारी के धरे मिलेंगे एक बड़ी घटना भूल नहीं सकता मेरी उम्र तीन-चार साल की रही होगी मुझे अपने मन से 3 दिन से मिलने से रोका गया उसकी हालत इतनी बिगड़ गई थी कि अंदर के कमरे से सिर्फ उसका चिकन सुनाई देता था दादी और कुछ बुद्धि औरतें ही उससे मिलने जाते-जाते दिखाई देती चौथे दिन सुबह जब नींद से जागा तो घर के बाहर रास्ते में कई लोग इकट्ठा होकर मेरे पिताजी से पूछ रहे थे अब कैसी है वह तब ठीक है कल उसे बैलगाड़ी से बना ले जाकर सरकारी दवा खाने में भर्ती कराया वहां जाते ही डॉक्टर ने इलाजशुरू किया और बेटी आई है और प्रस्तुति हो गई बेटी आई है पिताजी के मुंह से सुनते ही मैं उनसे चिपक गया मां कहां है मेरी मेरे इस सवाल का जवाब उन्होंने लोगों को दिया बोले यदि उसको कुछ होता तो मैं इस बच्चे को क्या जवाब देता हकीकत का पता बाद में चला की मां कसम पीड़ा से तीन दिन तक परेशान थी और जब उसके मुंह से करना बंद हुआ बेहोश हो गई तब खुद पिताजी ने निर्णय लिया वह खेत में जाकर बैलगाड़ी ले आए गांव में कोई दवा खाना नहीं था सारे घरेलू उपचारित उपाय चल रहे थे पर कोई कारगर इलाज नहीं करीब 10 किलोमीटर की दूरी पर एनाला नामक गांव में सरकारी दवाखाना था मेरी बेहोश मां को बैलगाड़ी से वहां ले गए थे वहां जाने पर सब ठीक-ठाक हुआ वरना में बचपन में ही मन की छात्रशय से वंचित हो जाता क्योंकि सब भगवान भरोसे था आगे जब जब भी प्रेमचंद की कफन कहानी पढ़ना पड़ता रहा मैं बुढ़िया की पीड़ा को सबसे अच्छी तरह समझता और समझता रहा प्रेमचंद का हर गांव और उनके पत्रों के जीवन का भाव मुझे अपना लगता महादेवी वर्मा के पात्र पशु पत्र परिवेश और राम पक्ष मैनपुरी का गांव समझने में भी मुझे देर नहीं लगती गांव में चौथी कक्षा तक की पढ़ाई पूरी हो गई अब आगे की पढ़ाई के लिएदो बजे नमक गांव जाना था रोज 5 किलोमीटर जाना और आना जन्म गांव परिवारी की पढ़ाई कब खत्म हुई पता ही नहीं चला गुरुजी ने किसी हाथों में दिया और कहा कैसे संभाल कर रखना और अगले स्कूल में देना पड़ेगा तभी से हमें टच का महत्व मालूम हुआ मगर इसे हाथों में जीते समय गुरुजी भावुक हुए 26 जनवरी और 15 अगस्त के दिन स्कूल के बच्चों के साथ ग्राम प्रोडक्शन के समय देशभक्ति के गीत गाना हो राष्ट्र भक्तों की जय के नारे लगते हो स्कूल में पहाड़ी कहाँ हो सबसे आगे खाने बोलने और चलने वाला छात्र अर्जुन अपने स्कूल से आज जा रहा था आगे की पढ़ाई के लिए इसलिए गुरुजी कुछ गमगीन थे मेरी मां भी दुखी थी मगर उसके दुख का कारण अलग था क्या मेरे छोटे बेटे अर्जुन को हर दिन 10 किलोमीटर पैदल आना जाना पड़ेगा आखिर में एक दिन ो ढूंढ के गांव के स्कूल में पांचवी कक्षा में प्रवेश ले ही लिया यह जरा बड़ा गांव था दिन में एक बार एसटी बस आती थी एक सरकारी दवाखाना भी था यहां पांचवी से सातवीं कक्षा तक की पढ़ाई की सुविधा थी गांव के दो-तीन साथी और से सब पैदल आते जाते यह स्कूल भी जिला परिषद का सरकारी था अब पांच पांचवी कक्षा से ौ अंग्रेजी और हिंदी विषय भी नए-नए पढ़ते थे यहां 3 साल तक पैदल आना-जाना चला रहा गर्मी बारिश धूप के चलते बिना लोग स्कूल जाया करते बीच में नदी बिछी बाढ़ आने पर स्कूल जाना बंद होता लेकिन स्कूल के अध्यापक बड़े लग्न वाले पढ़ने में रुचि आनंद लेने वाले कर्तव्य दक्षिण अनुशासन प्रिय से हर विषय को पढ़ने के लिए अलग-अलग अध्यापक थे स्वाध्याय पाठ कॉन्टैक्ट करने पर खास ध्यान दिया जाता पांचवी कक्षा का एक यादगार प्रसंग है इस स्कूल में हम नए-नए आए थे अंग्रेजी पढ़ने वाले सावंत गुरु जी कक्षा में आ गए उन्होंने कल अंग्रेजी शब्दों के स्पेलिंग और अर्थ कॉन्टैक्ट करके आने को कहा था आज एक-एक छात्रा को खड़ा करके उन्होंने पूछना शुरू किया जिन्हें बताना नहीं आता उनको खड़े रहने को कहा और जो बता देते उनको बैठने कोजब पूछते पूछते मुस्ताक आते तब मैं सही-सही बताता जाता कुछ छाए बॉय गर्ल बुक जैसे आसान और छोटे-छोटे शब्दों की स्पेलिंग और अर्थ बताते मगर लंबे-लंबे शब्दों की स्पेलिंग और अर्थ बताना संभव नहीं होता जैसे कन्वर्सेशन एयरप्लेन एलिफेंटा आदि लेकिन जब बताने की मेरी बारी आती मैं सही बता देता क्योंकि आदतन रोज रात मिट्टी के तेल के डिग्री की रोशनी में पिताजी के साथ-साथ स्वाध्याय करता रहता हर दिन का ग्रह पाठ उसी रात पूरा करता लेकिन उसे दिन पूरी कक्षा में छात्र खड़े हुए और मैं अकेला बैठा हुआ मगर अकेले बैठे रहने पर मुझे बेचैनी हुई सारे साथी खड़े हुए और मैं बैठा हुआ कुछ अपराध गुस्सा भी लगा लेकिन इस दिन के इस प्रश्न की चर्चा सावंत गुरुजी के कारण स्कूल के सारे अध्यापकों में हुई पारिवारिक अर्जुन नाम का लड़का शिक्षक का लड़का होगा पढ़ाई में तेज है सुनकर मुझे अच्छा लगा मगर हंसी भी आई क्योंकि रोज-रोज खेती में जाकर खाद बीज की मात्रा देखना जरा सा पूर्वज चलाना फसल को पानी देना वह आई निकोनी कटाई गाय बैल बकरियां और उनके चारे का प्रबंध जैसे कृषि कार्यों से आजीवन जुड़े मेरे माता-पिता के नसीब में शिक्षक पैसा कहां एक दिन मैंने अपनी मां से पूछा मेरा नाम अर्जुन कृष्ण रखा और क्यों तब उसने मेरी और बुआ जी दोनों ने मुझे बताया कि तेरी दादी ने पता यह भी चला की दादी महाभारत पर आधारित पांडव प्रताप ग्रंथ रोज सुनते मंदिर जाती उसे पांडवों में से सबसे पिछड़ित अर्जुन का लगता इस दौरान मेरा जन्म हुआ तो उसने मेरा नाम अर्जुन रखा उसकी सोच थी कि मेरा पोता पांडवों के अर्जुन की तरह पराक्रमी निकलेगा यह वह पीढ़ी थी जो विश्वास करती थी कि नाम का प्रबंध व्यक्तित्व को प्रभावित करता है फिल्मी दुनिया के नाम का अनुकरण का फैशन और उसका बोलबाला उसे समय नहीं था वह तो बहुत बाद में चला मगर भारतीय समाज व्यवस्था में जो सदियों से चला आया नामकरण संस्कार था नाम रखने की परिपाटी थी उसके नीचे ही दांत देनी पड़ेगी इन दोनों की बात छोड़ दें मगर जाने क्यों उसे समय भी मुझे लगता था कि नाम का प्रभाव व्यक्तित्व को निश्चित ही सार्थकता प्रदान करने में सहयोग देता हैमेरा बचपन मेरे एबकों के कंधों पर काम मेरे अपने कदमों पर ज्यादा था बचपन में ही 6 सालों तक 10-20 किलोमीटर पढ़ाई के लिए पैदल आना जाना पड़ा था सातवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा का केंद्र एनाला में था हम सब छात्रों को बैलगाड़ी से वहां ले जाया गया कुछ अध्यापक साथ में थे परीक्षा के पूर्व संध्या पर वहां पहुंचे थे खाने के बाद मुझे तेज बुखार आया रात भर नींद नहीं अन्य साथियों से पता चला कि बुखार में मैं कुछ बढ़ता रहा खबर घर तक गई पिताजी मिलने आए तब तक दवा दी गई थी मुझे पूछा गया कि घर चलोगे की परीक्षा दोगे परीक्षा दूंगा मेरा कहना था अध्यापकों ने भी मेरी बात मानी उन्होंने हम ध्यान देंगे का कर मेरे पिताजी को आश्वस्त किया वह लौट गए मुझे वीकनेस ने कर दिया खाना नहीं खाया जाता था बीमार हालत में पेपर लिखे तीन दिन बाद परीक्षा खत्म हुई कुछ दिनों बाद रिजल्ट आया मध्य प्रदेश श्रेणी में सातवीं बोर्ड परीक्षा उत्तीर्ण हुआ उत्तीर्ण होने की खुशी गांव में चूरमा बांटा गया मगर यह खुशी ज्यादा दिन तक टिक नहीं पाई वह चिंता में बदल गई कि अब ढूंढने की पढ़ाई खत्म आगे कहां जाएं परांदा तहसील के आसपास के दो-तीन गांव में ही हाई स्कूल तक के पढ़ाई की सुविधा थी उसमें सोनारी नामक गांव हमारे गांव से अन्यों की तुलना में नजदीक था भैरोबा नमक देवता का मंदिर साप्ताहिक बाजार और बंदरों के गांव के रूप में यह प्रसिद्ध था वहीं पर पढ़ाई के लिए आठवीं कक्षा में मेरा नाम दाखिल किया यह सरकारी हाई स्कूल था जिला परिषद का हाई स्कूल यहांआठवीं से दसवीं यहां आठवीं से दसवीं तक की शिक्षाओं की सुविधा उपलब्धि थी हमारे गांव से 10 किलोमीटर दूर यात्रा का कोई साधन नहीं था पैदल ही आना जाना था इसकी आदत पांचवी से साथ में तक की पढ़ाई में थी ही मगर वह अंतर 5 किलोमीटर सांवरिया 10 हाथ पर पड़ी हुई 810 किताबों की थैली क्योंकि उसे समय आज तक जैसे की अवस्था गांव में पहुंचे ही नहीं थे उसमें एक कंपास पेटी पुराने कपड़े में तय करके बंद कर दी गई जवाहर की रोटी क्योंकि उसे समय टिफिन था उन्हें इसकी संकल्पना जिसमें सूखी सब्जी या तेल चटनी प्याज और आम के अचार की फाग खाकी फुल पैंट में इंकिया सफेद शर्ट बस इसी होलिया में हाई स्कूल चले हम मगर नंगे पैर क्योंकि गांव के लड़कों के लिए प्राय जूतियां खरीदी नहीं जाती थी अगर खरीदी जाती तो अर्थ आसानी के स्लीपर चप्पल खरीद भी लेते मगर वह ढाई तीन महीने में ही फट जाती क्योंकि रोज पैदल आना जाना 20 किलोमीटर होता वही प्रतिनिधि से क्योंकि सड़क से भी कच्ची सड़क भी नहीं थी हां एक बन गई थी मगर वह पारिवारिक गांव से होते हुए सोनारी जाती जिससे अंतर और भी बढ़ जाता इस तरह पगडंडी से ही हम नंगे पैर सोनारी आते जाते दास बालगुडे गोकुल बड़े और मैं अर्जुन चौहान मारवाड़ी गांव के लिए तीन लड़के थे जो हाई स्कूल पढ़ाई करने वाले पहली पीढ़ी के थे और एक दिन आठवीं कक्षा के में तरकर गुरुजी ने मुझे बुरी तरह से पिता यह पढ़ रहे थे हम पीछे बैठे थे क्योंकि दूर से पैदल आने के कारण आगे की बेंच पर बैठने के लिए अक्सर जगह नहीं मिलती थी गुरु जी ने छात्रों के बीच हुए मेरे कंधों तक उन्होंने मुझे खड़ा किया और लगातार थप्पड़ों की बौछार में हटा कटा था राय नहीं मगर बहुत बुरा लगा इसीलिए की बिना किसी गलती के मुझे पीटा गया शोर मचाने वालों को छोड़कर दूसरे को पीटना अच्छा नहीं लगा तब से हर संभव मेरी कोशिश होती कि आगे बैठो गुरुजी पढ़ते अच्छा था मुझे स्वाध्याय की आदत थी अध्यापन के दौरान प्रश्न उत्तर अध्यापन प्रणाली में गुरुजी को समझ में आया कि अर्जुन स्वाध्याय करने वाला एक संवेदनशील छात्र है उसके बाद उन्होंने या किसी भी अध्यापक ने मुझ पर हाथ उठाया हो मुझे याद नहीं एक बार घर वालों ने मेरे लिए साइकिल लेने की स्थल कोशिश हुई की असफल इसलिए इसका सौदा ₹20 के कारण टूट गया सोनारी के प्रसिद्ध पहलवान लहू गाड़ी ने वहां की साइकिल दुकानदार से बात कर मुझे साइकिल खरीद लेने की सलाह दी आज रवि किया मैं घर में पूछा उनके कहने पर मैं साइकिल घर लेकर आया तीन-चार दिन गांव में चलता रहा दुकानदार ने डेढ़ सौ कीमत बताई पर हमारे पिताजी ने कहा 120 देंगे दुकानदार में अंत में कहा कि 140 में दंगा पिताजी ने कहा सौदा टूट किया साइकिल वापस लौटा दी गई मुझे बहुत बुरा लगा मैं सपनों में उड़ान भर रहा था क्या मैं साइकिल से हाई स्कूल जाऊंगा की स्थिति का अनुभव पहली बार हुआ लेकिन फिर एक हफ्ते के बाद दुकानदार साइकिल देने को राजी हुआ मेरा सपना फिर उड़ान भरने लगा दौड़ते दौड़ते घर आया रात में पिताजी मां बड़े भैया को साइकिल देने को दुकानदार राजी होने की बात बताई मगर मुझे बताया गया कि कल ही ढाई एकड़ जमीन खरीद लेने का सौदा हुआ है अंतिम राशि भी दे दी गई है अब साइकिल खरीदना संभव नहीं सपना दफना दिया गया 26 जनवरी को सुबह 8:00 बजे हाजिर होना अनिवार्य होता था उसे दिन 26 जनवरी थी तैयार होकर निकलने में 720 हुए थे रनिंग करते-करते ठीक 7:55 को हाई स्कूल पहुंच गया सिर्फ 35 मिनट में ध्वजा बंधन समझ में हाजिरी लेकिन अब जब कभी इस घटना को याद करता हूं ताकि होता है अपने बच्चों को बताता हूं तो सुनकर दंग होते हैं किसी किसी को विश्वास नहीं होता संजोग से मेरा स्वास्थ्य बेहतरीन था घर में गाय की बकरियां थी बड़े भैया खुद डबल पेट थे लेकिन मेरे लिए रोज सुबह लोटा पर दूध दो कर रखते बकरी का दूध तब तक मैं दंड पलने का व्यायाम कर आता धरोश दूध पिता और पढ़ाई के लिए निकल पड़ता हाई स्कूल से लौटने पर मैं अखाड़े में जाता कुश्ती खेलते गांव जानता मैं मुझसे बड़े पहलवान को तंग घटना धोबी प्रसाद जैसे गांव में से किसी भी दावों पर आसमान दिखता कुश्ती मेरा फेवरेट खेल बन गया सोनरी गांव अखाड़े के लिए बड़ा मशहूर थानारायण हूंगी और लहू गाड़ी यहां के बड़े पहलवान थे यहां के माहौल ने भी मुझे इस खेल के प्रति आकर्षित किया था रोज सुबह नियमित व्यायाम करना भैया की चढ़ाई हुई बकरियों का दूध पीना 20 किलोमीटर हाई स्कूल के लिए पैदल आना जाना शाम को अखाड़े में जाना और रात खाने के बाद स्वाध्याय पूरा करना लगभग यही मेरी दिनचर्या थी बचपन में इस सच का मुझे बार-बार एहसास हुआ कि मेरे पढ़ाई के प्रति किसी को रुचि नहीं है अलावा मां के क्योंकि हमारा परिवार संयुक्त था सब अपने-अपने कामों में व्यस्त रहते दूसरी बात की घर परिवार और गांव में शिक्षा के कोई विरासत नहीं थी इसलिए शिक्षा के बारे में चेतना जागृति थी और ना ही रुचि लेकिन मेरी मां इसके लिए अपवाद थी उसने मेरी पढ़ाई का बीड़ा उठाया था मेरी पढ़ाई किसी को बोचने लगे इसका प्रबंध उसने अच्छे से किया था उसने मुर्गियां पालन शुरू किया घर के एक कोने में एक गोलाकार गड्ढा खोदकर उसकी अच्छी सी रीवा पोती की एक दर्जन अंडे लिए उसको मुर्गी डाली और ऊपर टोकरी रख दी मुर्गी को रोज सुबह-शाम दाना पानी के लिए बाहर निकाला जाता फिर उसके गड्ढे में डाला जाता ऊपर टोकरी रखी जाती करीब 3 हफ्ते के बाद शिव शिव की आवाज आने लगी एंड से बहुत छोटे-छोटे चीजों के चोंच बाहर निकले हुए दिखाई दिए साजन का यह मंजर मेरे बचपन का सबसे खूबसूरत नजारा था इन छोटे-छोटे चीजों को रोज दाना पानी डालकर उनके हिफाजत कर बड़ी-बड़ी मुर्गियां और मुर्गे बने हुए मैंने अपनी आंखों से देखे हैं यह सिलसिला कमलेश हर साल चलता रहा अंडों से मुर्गी बनाने का तरीका मेहनत का मगर आनंददायक भी था मन मुर्गियों के अंडे बेचती चवन्नी के चार अश्वनी के आठ और ₹1 मतलब 16 आने के इस तरह मेरी मां ने मेरी पढ़ाई के खर्चे की व्यवस्था करके रखी थी ऊपर से अंडा आमले कभी अंडा करीबी बनाकर खिलाता जब-जाट जरूरत पड़ती मां मेरे स्कूल के खर्चे के लिए पैसे दे दी हाई स्कूल के आने जाने के रास्ते में एक नल था उसका नाम था हिरण नाल कभी यहां हिरना का निवास होता था इसलिए यह नाम पड़ा था बारिश के दिनों में उसे बाढ़ आई तब स्कूल नहीं जा पता था गर्मी सर्दियों बारिश इन सबके प्रकोप का वाकई में मुक्त हो गई हूं मगर 3 साल कैसे बीते पता ही नहीं चला दसवीं में आया था हमारी कक्षा की ओर से स्कूल डे मनाया गया मतलब इस दिन सारे अध्यापकों को छुट्टी और दसवीं के छात्र ही इतने अध्यापक बनाकर अध्यापन और हम बनाकर प्रशासन का कार्यकाल संभालते आज भी याद है कि मैं कक्षा को पढ़ाया था अध्यापन अच्छा करने की रिपोर्ट भी छात्रों की ओर से हम तक गई जिन्होंने मेरा अभिनंदन भी किया इसके मुख्य दो कारण से मैं स्वाध्याय नियमित करता था और हमारे गांव में चल रहे संत एकनाथ भावार्थ रामायण के पारायण के समय एक व्यक्ति पतंग करता था और दूसरा उसका अर्थ कथन करता था यह कथन का कार्य में आठवीं कक्षा से करता आया था गांव में इसके तीन परिणाम हुए थे एक पारण करीब 1 साल भर चलता मैं दसवीं में आया था तब तक तीसरा पारण पूरा हुआ था इस तरह मुझे बड़े-बड़े समुदाय के सामने बोलने का अभ्यास था स्टेज डेरिंग इसी से आया था इसका लाभ हुआ कि आगे बढ़कर प्रतियोगिता में अव्वल आने लगा और एक दिन दसवीं अर्थात एसएससी बोर्ड परीक्षा का नतीजा हमारे सुंदरी के हाई स्कूल में आ ही गयासिर्फ चार छात्रों की 36 में से चार छात्रों तीन दिन में पहला अर्जुन गणपति चौहान दूसरा दास सनातन बानगुडे तीसरा अर्जुन उपभोक शिंदे और चौथा एकनाथ थोड़ी हमारे गांव के तीसरे सहपाठी गोकुल विट्ठल वीडियो को अंग्रेजी में धोखा दिया सुबह फेल हुआ लेकिन हमने उसके फेल होने की खबर किसी को बताई नहीं पर यह बात अलग की शक्ल देखकर गांव के लोगों ने को अनुमान से धीरे-धीरे इसका पता चल ही गया गांव के लोगों के मनोविज्ञान के दांत देना पड़ेगी मैं घर में घुसी गया था कि गोविंद बालगुडे जिन्हें लोग नाना कहते और जो पंसारी की छोटी सी दुकान चलाते ने बाहर खड़े मेरे भैया से पूछ लिया क्या अर्जुन पास हुआ आज रिजल्ट था उसका भैया ने कहा मुझे पता नहीं वह अभी-अभी आया है मैंने उसे पूछा नहीं लेकिन इन दोनों के बीच का अगला सवाल जवाब में अंदर से सुन रहा था शकल कैसी थी उसकी खुश दिखाई दिया एक और मजेदार बात जब भी गांव के लोगों ने रिजल्ट के बारे में मुझे पूछा तो मैं छुट्टी श्रेणी में उत्तीर्ण होने की बात बता आई मगर मुझे फिर से पूछा गया क्या तू पास नहीं हुआ क्योंकि मेरे गांव के लोग सिर्फ दो ही श्रेणियां जानते थे एक पास और दूसरी ना पास इसलिए मुझे बताना पड़ा कि मैं पास हुआ ना पास नहीं 10वीं परीक्षा पास होने वाला में अपने गांव का पहला लड़का था खुशी इतनी हुई थी कि जैसे आसमान में पहुंच गया हमारी दसवीं की बोर्ड की परीक्षा सोनारी में नहीं परांदा में हुई थी वह हमारा तहसील का स्थान था एक हफ्ते पर वहां जाकर रहना पड़ा था कोई परिचितों कोई दूर के रिश्तेदारों के यहां जाकर रहे थे परीक्षा केंद्र में नल का परिचय लिखने वालों की आबादी कुछ ज्यादा थीमगर मेरा मगर मेरा अध्ययन हुआ था सो मैं पेपर अपने मन से लिखना कोई नकल के लिए चिट्ठी द भी तुम्हें लेट नहीं था लेकिन परंडा शहर के लड़के यदि गवार मानकर हंसते भी थे अपने मन से पेपर लिखना मन उनके निगाह से पिछला हुआ था जब परांदा से परीक्षा देकर मैं अपने गांव आया और सुबह सो के लिए लोटा लेकर मैदान जाते समय लोगों ने मुझे देखा तो कई लोग हंसने लगे क्योंकि गांव का कोई व्यक्ति लूट लेकर मैदान नहीं जाता था मराठवाड़ा के अधिकतर गांवों में टट्टी होने के बाद धोने के लिए पानी के बदले पत्थर का प्रयोग करते थे कुछ सट्टा की स्थिति कहीं-कहीं आज भी देखने को मिलेगी एसएससी बोर्ड परीक्षा पास होने की खुशी की उम्र चंद्र दोनों के ही साबित हुई क्योंकि आगे की पढ़ाई मेरी बंद हुई अब मुझे पढ़ाई के लिए सोलापुर जिले के बरसी शहर जाना जरूरी था गांव का कोई साथी साथ में आने वाला नहीं था जो एक साथी उत्तीर्ण हुआ था उसकी आर्थिक दशा में यह परिवार से विदाई नहीं थी इसलिए उसे घर वालों ने खेती के काम में ले लिया दूसरा साथी अंग्रेजी के धोखे का शिकार हुआ रहा मैं अकेला जो पढ़ना चाहता था लेकिन घर वालों ने केला है कहां जाएगा रहेगा खाएगा करके मुझे पढ़ाई के लिए कहीं नहीं भेजा और तीन होकर भी कोई उपयोग नहीं इसलिए मैं अंदर ही अंदर बहुत दुखी हुआ घर वाले चाहते थे कि मैं भी खेती के काम में उनका हाथ बंटू मदद करूं सहयोग करूं लेकिन ऐसा नहीं हुआ पढ़ाई की डरता नहीं इच्छा नहीं मुझ में सहयोग के चेतना जागृत कि मैं गांधी जी जैसा असहयोग आंदोलन शुरू किया मगर उनका अंग्रेजों के खिलाफ था लेकिन मेरा अपने ही घर वालों के खिलाफ मैं घर वालों के साथ खेत में काम पर जाना नहीं माना सुबह जल्दी उठना दंड पलना व्यायाम करना भैया के द्वारा खरीदी बकरियों का दोहा हुआ एक बड़ा लूटा था और उसने दूध पीना दिन भर जाकर गांव के अखाड़े में ठहरना शाम को कुश्ती खेलने घर जाकर खाकर सो जाना यही मेरा दिन काम था लगभग 1 साल भर यही सिलसिला चला खेती के कामकाज के लिए बिल्कुल नहीं है एक दिन घर वालों ने मुझे सबके सामने बुलाकर मीटिंग ले ली मुझसे पूछा गया कि तू चाहता क्या है उसके पहले हुआ यह था कि हमारे ताऊजी ने अपने भाई मेरे पिताजी को बताया था की अर्जुन फौज में भर्ती होने वाला है उन्हें पता चला था कि मैं फौजी की भर्ती में तैयारी में हूं और कुछ दिनों में उसमें सफल हो जाऊंगा यह वह समय था कि हाल ही में दो बार पाकिस्तान से और एक बार चीन से हमारे देश का युद्ध हुआ था उसकी पृष्ठभूमि में फौज में भर्ती होने का मतलब हाथों में बंदूक लेकर सरहद में सीधे दुश्मन के सामने खड़े होना ही माना जाता था इसलिए घर वालों ने मुझसे पूछा कि तू क्या चाहता है मैं उनके सामने अपने दो कामना रखें एक तो मैं आगे पढ़ना चाहता हूं नहीं तो फौज में जाना बस उन्होंने उसे समय के संदर्भ में युद्ध जन्म परिस्थितियों में डर के मारे मेरे पहला विकल्प मान्य किया मुझे पढ़ाई के लिए परांदा भेजना चाहिए हुआ वह दिन मेरे बचपन के विदा होने का ही नहीं बल्कि जिंदगी का सबसे ज्यादा खुशी का था ऐसा ना होता तो हमारे परिवार में एक और किस में वृद्धि हो जाती या एक फौजी देश सेवा कर आज निवृत हो अपनी जिंदगी गुजर रहा होता मगर एक साहित्य जगत 6070 से अधिक ग से वंचित रह जाता 60 से अधिक एचडी एमफिल के साथ अनुसंधान कार्य में शुभ निर्देशक को अपने से वंचित रह जाती देश के नामांकित विश्वविद्यालय में प्रोफेसर सिर के रूप में सेवा करने से मुझे वंचित रहना पड़ता देश-विदेश के 500 से अधिक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में बी भाषा अध्यक्ष मुख्य अतिथि साधन व्यक्ति के रूप में नहीं जा पाता हिंदी साहित्य अकादमी से दो-दो बार बार पुरस्कारों से वंचित रहता देश के कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई जी के कार्यक्रमों में अपनी किताब के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित होने का मौका मेरे जन्म में कहां से का सकता हैअत्यंत विनम्रता से स्वीकार करना चाहता हूं कि मेरे बचपन के खट्टे-मीठे दिखे और नमकीन आंखों के दिनों में रेगिस्तान में भटूरे वालों ने कभी मजबूरन घर वालों से ही किया विनम्र सहयोग ने पढ़ाई के प्रति रखे दृढ़ निष्ठा ने जो सार्थक जीवन प्रदान किया उसके प्रति नतमस्तक होने के अलावा मुझ में और क्या भाव हो सकता है अभाव से प्रभाव और शून्य से शिखर की यात्रा और क्या हो सकती है एक अति साधारण एक अति जनसाधारण प्रवेश चरित्र बालक भी अपने परिवार गांव समाज राष्ट्र विश्व के लिए न्यू मॉडल लगे या बने तो जीवन में और क्या चाहिए आने वाली पीढ़ी के लिए अगर कुछ पद चिन्ह मिले तो वह भटकने से बचेगी निश्चित रूप से समृद्ध होगी इसमें संदेह नहीं बचपन के दिनों के बड़े उपलब्धि में उसे मानता हूं कि जिन राशि ना समझे नादानी ना कामयाबी और कभी ना उम्मीद की ना बात जाए तो अपना बचपन याद आना चाहिए क्योंकि उठाना गिरना फिर उठना और चलते रहने का तरीका बचपन नहीं सब कुछ खाया है कि चलते रहने का प्रयास जारी रखें आज जीवन चलते रहना जैसे चरण व्यक्तिचेहरे व्यक्ति
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०५. अवधेश सक्सेना, नोएडा उत्तर प्रदेश
पिता का महाप्रस्थान
मैं ५ वर्ष १० माह का बच्चा था, मैं उस रात अपनी माँ की गोद में लेटा था, माँ की आँखों में आँसू थे, पास ही मेरे १४ वर्षीय बड़े भाई भी बैठे थे, कमरे में आस-पड़ोस के कई लोग मौजूद थे, एक खटिया पर मेरे पिता लेटे थे जिनकी निगाह हम बच्चों की तरफ ही थी, उन्हें पत्नी और बच्चों के भविष्य की चिंता थी पर वे ध्यान से गीता सुन रहे थे, उनके एक मित्र पास में बैठे गीता सुना रहे थे। दिन में ही अस्पताल से उन्हें घर भेज दिया गया था, डॉक्टर्स ने असमर्थता बता दी थी, घर में पलीं २ गाय लाली और श्यामा भी उनका हाथ लगवाकर ब्राह्मण को दान कर दीं गयीं थीं । इन गायों का दूध, दही और माखन हमारी माँ हमको नियमित देतीं थीं। चूल्हे के लिए लकड़ियाँ लेकर आने वाली सहरिया जन जाति की महिला को लकड़ी के पैसों के साथ छाछ भी हमारी माँ दिया करती थीं, कई बार साड़ी, कपड़े, खाद्य पदार्थ देते हुए भी माँ को मैंने देखा था। मैं उस काली रात को कभी भुला नहीं सकता, गीता के १८ अध्याय सुनने के बाद ४ बजे मेरे पिता परलोक गमन कर गए।
जीवन संघर्ष
माँ और हम दो बेटे लंबे जीवन संघर्ष के लिए तैयार थे, मकान के २ कमरे किराए पर देने पड़े, हमने माँ के साथ बचपन से ही जिम्मेदारी लेना शुरू कर दिया, आठवीं कक्षा में पढ़ रहे बड़े भाई ने प्रिंटिंग प्रेस पर काम किया, टाइपिंग सीखी और मेहनत के साथ कई छोटे--छोटे काम कर गुजर-बसर लायक पैसे कमाना शुरू किए। मैं भी माँ के हर काम में हाथ बँटाने लगा, कुएँ से पानी भरना, ईंधन के लिए गोबर के कंडे थापने के लिए चरनोईं से गोबर के तसले भर कर सिर पर रखकर लाना, दीवालों और फर्श की लिपाई-पुताई के लिए मिट्टी लाना, दुकान पर बैठना, कागज के लिफाफे बनाकर बेचना जैसे कई काम किये। मेरी उम्र जब लगभग १३ वर्ष थी तब घर से लगभग १ किलोमीटर दूरी पर एक शक्कर कारखाना खुला। उसमें काम करने के लिए मजदूरों की जरूरत थी, मोहल्ले के कई युवा फेक्ट्री में काम पर जाने लगे, घर की मुश्किलों को दूर करने के लिए मैंने भी फेक्ट्री की नाईट शिफ्ट में काम करने का निश्चय किया, दिन में स्कूल और दूसरे काम भी जरूरी थे। कारखाने के मुख्य द्वार मजदूरों की कतार लगती थी। एक मेट या मैनेजर टाइप का व्यक्ति मजदूरों को देखकर चुनता या खारिज कर रहा था। मेरी उम्र के कई बच्चों को रिजेक्ट कर दिया गया था, कतार में लगा मैं भगवान से प्रार्थना कर रहा था कि मुझे चुन लिया जाए, पैसों के अभाव में कई तरह की परेशानियों का सामना करते हुए परिवार को कुछ तो सहायता मिलेगी। अपने क्रम की प्रतीक्षा करते हुए मेरे मन में न जाने क्या-क्या विचार आ रहे थे? रिजेक्ट होने की शंका थी, लेकिन भगवान से जो प्रार्थना कर रहा था उस पर भरोसा था। जब बुलाया गया तो चुननेवाले ने मुझे देखा और रिजेक्ट करने की मुद्रा बनाई लेकिन फिर अचानक कुछ सोचते हुए मुझे सिलेक्ट कर लिया। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था। मुझे रात में ट्रक से गन्ने उतारकर सिर पर रखकर फेक्ट्री के अंदर गन्ने का रस निकालने वाली मशीन तक ले जाना जैसा कड़ी मेहनत का काम करना पड़ा। घर की जरूरतों को पूरा करने के लिए मैं हर मुश्किल काम करने के लिए हमेशा तैयार था। माँ की कठिन तपस्या, संघर्ष और हर पल भगवान की प्रार्थना में लगे रहते हुए काम करते रहने का सुखद परिणाम हुआ कि आगे चलकर बड़े भाई बैंक में मैनेजर और मैं इंजीनियर के पद पर पहुँचा।
तैरने की चाह
मैं उस समय ९ वर्ष का बालक था, एक दिन घर से लगभग ४०० मीटर दूर सिद्धेश्वर मंदिर परिसर में बने हुए चोपड़ा में तैरना सीखने के अपने हम उम्र दोस्तों के साथ गया। उस दिन पहला ही दिन था, मेरे दोस्तों में से २-३ दोस्त पहले ही तैरना सीख चुके थे, मैं जब चोपड़ा में दूसरे बच्चों को तैरते हुए देखता था तो मेरी भी इच्छा होती थी कि मैं भी तैरना सीखूँ। मैंने दोस्तों के साथ तैरना सीखने के लिए जाना उचित समझा। घर में माँ काम में लगीं रहतीं थीं, बड़े भाई किसी काम के लिए निकल जाते थे, पिता के परलोकगामी होने के बाद केवल माँ और भाई ही थे जिनका थोड़ा डर रहता था, लेकिन दोस्तों के साथ खेलने के बहाने घर से निकल कर बच्चे कहाँ जा रहे हैं ये घर वाले नहीं समझ पाते थे।चोपड़ा जैसा कि नाम से स्पष्ट है एक चौकोर आकार का मानव निर्मित पानी का ताल, सरोवर या स्रोत होता है, जिसमें भूजल भरा रहता है। मंदिर में एक कुँआ भी है, इसलिए चोपड़ा को उस समय केवल नहाने के लिए ही उपयोग किया जाता था। मोहल्ले के बड़े-बड़े बच्चे इसमें तैरते रहते थे। चारों ओर सीढ़ियाँ बनीं थीं जिनमें उतरते हुए कम गहराई से अधिक गहराई में पहुँच जाते थे, एक सीढ़ी उतरना यानि एक फुट उतरना ५ सीढ़ी उतरने पर बड़े बच्चे भी डूब जाएँ इतनी गहराई थी और सीढ़ियों के बाद बीच में हाथी डूबने जितनी गहराई थी। मुझे पानी की गहराई और गहराई के डर की पूरी जानकारी थी। एक तरफ की सीढ़ियों के बाद एक दालान बनी थी उस दालान का फ़र्श लेबल ऐसा था कि उस पर बस २-३ फ़ीट पानी ही रहता था, बच्चे इसी दालान में तैरना सीखते थे, लेकिन दालान तक पहुँचने के लिए किसी की सहायता लेनी पड़ती थी, दालान और पहली सीढ़ी के बीच की दूरी इतनी थी कि छोटे बच्चे सीधे दालान में नहीं पहुँच सकते थे । मेरे साथी दालान में पहुँच गए और तैरने के लिए दालान के कम पानी में इधर-उधर हाथ पैर चलाते हुए तैरना सीखने में लग गए।
जा पर कृपा राम की होई
मैंने कपड़े उतारकर एक तरफ रखे और अति उत्साह में दालान तक पहुँचने के लिए बिना किसी की मदद लिए सीढ़ियों पर उतरना शुरू कर दिया, पहली सीढ़ी, दूसरी और तीसरी सीढ़ी तक पानी गले तक आ गया तो मैंने सोचा कि अब थोड़ा आगे बढ़कर दालान तक पहुँच जाऊँगा लेकिन अचानक जैसे ही पैर उठे मैं पानी में डूबने लगा, पानी मुँह से अंदर जाने लगा और मुझे लगा कि अब बचना मुश्किल है, माँ और भगवान राम याद आ गए, इतने में ही किसी ने पकड़ कर जोर से ऊपर उठा लिया और पानी के बाहर कर दिया और डाँट लगाई, देखा तो वो मोहल्ले के ही मुझसे उम्र में ६-७ साल बड़े लड़के थे, चोपड़ा में घण्टों तैरना उनका शौक था, उन्होंने बताया कि उनकी नज़र अचानक मुझ पर पड़ी, वे तत्क्षण तेजी से तैरते हुए आए और मुझे पानी में से ऊपर उठा लिया। उसके बाद उन्होंने मुझे दालान तक पहुँचा दिया और मैंने उसी दिन तैरना सीख लिया। इसके बाद शहर के बड़े-बड़े तालाबों में कूदना, तैरना, गोता मारना मेरी दिनचर्या में शामिल हो गया। एक बार एक साधु को एक तालाब में पानी की सतह पर आराम से लेटे देखा तो मैंने भी अभ्यास किया और ये कला भी सीख ली, मैं अभी भी कितने भी गहरे पानी की सतह पर बिना हाथ पैर चलाए घण्टों तक या जब तक चाहे सुखासन या पद्मासन में लेटे रह सकता हूँ। मैं आज भी उन देवदूत को याद रखता हूँ और हृदय से आदर और सम्मान देता है जिनकी वजह से मेरा जीवन बच गया था। तुलसीदास जी ने सच ही लिखा है- ''जा पर कृपा राम की होई। ता पर कृपा करहिं सब कोई।।''
ट्रक ड्राइवर की डाँट
मेरी उम्र उस समय लगभग १० साल थी, अपने दोस्तों के साथ खेलता था। दोस्तों के नए-नए कपड़े और कई तरह की नई-नई चीजें देखकर मैं अपनी गरीबी के बारे में सोचकर मन मसोस कर रह जाता था। मेरा सबसे खास दोस्त जिसके साथ मेरा ज्यादातर समय खेलकूद में निकलता था, संपन्न परिवार का था। उस दोस्त के पिताजी ने दोस्त को एक नई साइकल दिलवाई जिसे ये दोस्त बहुत जल्दी चलाना सीख गया और एक दिन मुझे भी सायकल के डंडे पर बिठाकर बाजार ले गया। मुझे भी नई सायकल पर बैठने में बहुत मजा आ रहा था। हम दोनों दोस्त बाजार से जब लौटटे समय जैसे ही सँकरे रास्ते पर एक पुलिया के पास पहुँचे तो सामने से एक ट्रक आ गया, पुलिया की पैरापिट वॉल और ट्रक के बीच लगभग २ फीट जगह थी जिसमें हमारी सायकल आगे बढ़ रही थी, मेरे दोस्त का संतुलन बिगड़ा और सायकल ट्रक के नीचे आ गयी, सायकल चला रहा मेरा दोस्त तो पैरापिट वॉल पकड़ कर खड़ा रह गया लेकिन डंडे पर बैठा मैं सायकल के साथ नीचे गिर गया, सायकल ट्रक के अगले पहिये के आगे निकलने के बाद गिरी थी और पिछला पहिया सायकल और मुझ तक जैसे ही आया, मुझे भगवान याद आ गए, ट्रक रुक चुका था, ट्रक ड्राइवर ने साइड ग्लास में सायकल गिरते देख ली थी। ट्रक रुकने पर मैं भी जल्दी से उठ खड़ा हुआ और सायकल उठाकर हम दोनों दोस्त अत्यंत घबराए हुए वहाँ से आगे बढ़े तो ट्रक ड्राइवर की डाँट भी खानी पड़ी। अब हम दोनों दोस्तों का डर के मारे बुरा हाल था।मेरे सायकल वाले दोस्त को बहुत डर लग रहा था कि मैं घर पर बता दूँगा तो उसे बहुत डाँट पड़ेगी। उसने मुझ से घर पर न बताने को कहा। मैं दोस्ती निभाने के लिए हर बात मानने को तैयार था। कई दिनों तक घटना की भयावहता के बारे में दिमाग में विचार आते रहे लेकिन मैंने घटना के बारे में किसी को नहीं बताया। मैंने सायकल चलाना सीखने के लिए घर की पुरानी सायकल निकाली जिसकी सीट पर बैठना संभव नहीं था लेकिन कैंची बनाकर एक हाथ से हेंडिल और दूसरे से सीट पकड़कर एक पैर अंदर डालकर पैडल पर रखा और दूसरा पैर जमीन से टिकाते हुए ढालू सड़क पर चल दिया और बिना किसी सहायता के अपने आप पहले ही दिन सायकल चलाना सीख गया, उसके बाद तो दोस्तों के साथ उनकी नई सायकलों के बीच मैं अपनी पुरानी सायकल चलाते हुए आनंदित होता था।
माँ को जब भी कहीं जाना होता था, मुझे साथ ले जाती थीं। पिता के देहांत के बाद हम दो भाईयों की परवरिश में माँ दिन-रात मेहनत करती थीं। उस दिन माँ को घर के लिए कुछ जरूरी सामान बाजार से लाना था, माँ और मैं बाज़ार गए थे। बड़े भाई अपने काम पर निकल गए थे। घर सूना था लेकिन हम लोगों को घर की कोई चिंता नहीं रहती थी क्योंकि मोहल्ले में कभी चोरी या लूटपाट जैसी घटनाएँ तब नहीं होती थीं। हम माँ बेटे सामान लेकर घर लौट रहे थे, करीब ३-४ किलोमीटर पैदल चले थे तो घर पहुँचने की जल्दी थी, मुझे भूख भी लगी थी, उस समय मेरी उम्र लगभग १० साल थी। घर पहुँचने ही वाले थे कि घर के बाहर भीड़ नजर आयी, थोड़ा और पास पहुँचे तो घर में से आग की लपटें और धुँआ देखकर चीख निकल गयी। माँ कलप रही थी- 'हे भगवान! ये क्या हो गया?' कुछ लोग पानी की बल्टियाँ घर पर डाल रहे थे। हम घर के अंदर की अपनी चीजों को बचाना चाहते थे, घर के अंदर जाने की कोशिश की, मगर लोगों ने रोक लिया। घर के बिल्कुल पास में ही एक अच्छा कुँआ है जिसमें बारह महीने पानी रहता है, पूरा मोहल्ला अपनी रस्सी बाल्टियाँ लेकर कुँए पर मौजूद था, कुछ लोग पानी खींच रहे थे तो कुछ लोग बाल्टियों से पानी आग पर डाल रहे थे। माँ मुझे हिम्मत बँधा रही थीं। मैं माँ के लिए परेशान था। लगभग एक-डेढ़ घण्टे के प्रयास से लोगों ने आग बुझा दी। आग बुझानेवाले आसपास रहने वाले हमारे अधिकांश मुस्लिम भाई थे। सर्व धर्म समभाव की शिक्षा मुझे बचपन से ही मिली है क्योंकि घर के पास मस्जिद और जैन मंदिर थे तो थोड़ी दूरी पर हिन्दू मंदिर भी थे। घर के पास रहनेवालों में सभी मुस्लिम, जबकि मोहल्ले में हिन्दू, जैन, सिख और ईसाई परिवार भी रहते थे, मेरे बचपन के दोस्तों में मुस्लिम, सिख, ईसाई और जैन भी शामिल हैं। आग बुझ गयी थी लेकिन सामान कुछ नहीं बचा था, ईश्वर की कृपा थी कि हम तीनों सुरक्षित थे। दीवालों के ऊपर लकड़ी की म्यार और म्यार के ऊपर लकड़ियाँ, लकड़ियों के ऊपर पत्थर के पाट रखकर पटोर बनती है, पटोर के पाट और लकड़ियाँ सब जल चुके थे। जो औरत अपने पति के जाने का दुख भुगत चुकी हो, जिन बेटों ने अपने पिता का साया उठने का दुख सह लिया हो, उन्हें अन्य कोई मुसीबत क्या परेशान करेगी? माँ और दोनों बेटे जुट गए अपने घर को बनाने में और कुछ ही दिनों के परिश्रम से घर को फिर से रहने के लिए तैयार कर लिया। वो घर, वो कुँआ, वो पड़ोसी हमेशा याद रहते हैं। अब ईश्वर की कृपा से हम भी दूसरों की मदद के लिए हाथ बढ़ा पाते हैं और हमें असली खुशी मिलती रहती है।
बचपन की कविताएँ
मुझे बचपन से ही तुकबंदी करने में रुचि रही है। बच्चों के लिए लिखी गई कुछ पंक्तियों का आनंद लीजिए-
पूर्व प्राथमिक
घर पर रह कर मत कर गड़बड़।
चल उठ जल भर मत कर बड़बड़।
०
आजा अब ताजा खा खाना।
पढ़ कर गा अच्छा सा गाना।
०
दिन-दिन भर खिल-खिल कर हिल-मिल।
निशि घर आकर कर फ़िर झिल-मिल।
०
खील बताशा खाती नानी।
खाकर फ़िर वह पीती पानी।
0
गुस्सा बिल्कुल भी मत करना।
कुत्ते से भी तुम मत डरना।
0
झूठी-मूठी रूठा-राठी।
टूटी-फूटी लठिया काठी।
०
खेल-कूद के नियम निराले ।
खेले कूदे गोरे काले ।
०
छैनू छुटकू छैल छबीला ।
खाता है वह आम रसीला ।
०
जो कोई तोले फ़िर बोले ।
मोहक मीठे रस वो घोले ।
०
लौट-लौट कर आता भालू ।
और मख़ौल उड़ाता कालू ।
०
कक्षा १
संग-संग खेलो चंदा के।
अंग भी रंग दो बंदा के।
०
पाँव-पाँव गाँव-गाँव जाना।
धूप निकले तो छाँव लाना।
०
दुःख से कभी मत घबराना।
ॐ नमः शिवाय दोहराना।
०
ऋषि मुनियों से शिक्षा लेना।
नहीं किसी से भिक्षा लेना।
०
मित्र बनाओ सोच समझकर।
शत्रुता से रहो तुम बचकर।
०
हम बच्चे अब याद करेंगे
खेल-खेल में पाठ पढ़ेंगे।
०
नव सृजित कविता 'अवधेश' की।
दीर्घ प्रेरक नव संदेश की।
०००
०६. अस्मिता शैली, जबलपुर
ब बचपन,भ भोले पन/मन का
"रेलगाड़ी.... कू.... कू... छुक, छुक,छुक,छुक... बीच वाला टेशन बोला, रुक,रुक,रुक,रुक ... नीना की नानी की नाव चली...मोर भी आया , कौआ भी आया,तोता भी आया,बंदर भी... खा के पी के, मोटे हो के चोर बैठे रेल में... चुन्नू छबीले,मुन्नू रंगीले, लालू बटाटा, लाली टमाटा... चॉकलेट, बिस्कुट, टॉफी खाते और पीते दुधू... और दुनिया कहती... हैप्पी बड्डे टू.... हम भी अगर बच्चे होते..."
मित्रो! इन गीतों को गुनगुनाकर किसके चेहरे पर हँसी नहीं फैलेगी?? वो दाँतों की खिड़की दिखाता नादान, अबोध, उड़ता फिरता तितली सा बचपन किसे याद न आएगा?? उपरोक्त चुलबुले, शरारत और भोलेपन से भरे गीतों को लिखते हमारे देश के फिल्म संसार के उत्कृष्ट गीतकार/ कवि भी अपने बचपन की गलियों में खो गए होंगे, जो ऐसी सरल-सुबोध, मनोरंजक शब्दावली उनकी लेखनी से उभरी और अमर हो गई । बाल सुलभ मन तो सारे संसार में एक जैसा ही पाया जाता है, ये कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि उस वय के भय, तय होते हैं और एक लय में मय होकर आते हैं। कभी दहाड़ मार के रोना, ज़िद पर अड़ना, रूठना, मान जाना, कभी एकदम खिल के खुश हो जाना आदि आपने हमने सबने बचपन के दौर में समान रूप से जिया ही है। यही पुनरावृत्ति अपने घर के बच्चों में भी होती देखी, परम आनंदित भी हुए। आज हम अपने जीवन की किताब के वो अबोध, नादान किस्से सँजोते, कच्ची इबारतों से गुदे पन्ने साझा कर रहे हैं, जहाँ अ अनार, से लेकर ज्ञ ज्ञानी तक, नटखट घर चल, खटपट मत कर" जैसे ककहरे गूँजते हैं, स्लेट पर लिखती, मिटाती नन्हीं उँगलियाँ हैं, माँ का शीतल आँचल, पिता की सुरक्षित छाँव, दादाजी-दादी माँ का असीम लाड़-प्यार, दोनों जीजी, दोनों दादाभाई सहित चाचा-चाची, बुआ, मामा-मामी, हमउम्र भाई-बहनों के प्रेम पगे रिश्ते हैं। अनगिनत गुदगुदाती यादें नटखट बच्चों की कक्षा के समान यूँ शोर मचा रही हैं जैसे उनकी प्रिय शिक्षिका ने पाठ पढ़ने बोला हो तो 'पहले हम... (मैम या दीदीजी, बहन जी) पहले हम...' कह के हाथ एकदम ऊँचा कर रही हैं या फिर किसी आसान प्रश्न का उत्तर देने की होड़ में....'हम बताएँ ?? दीदी जी! हम बताएँ...? कह रही हों...' तो ऐसे में शिक्षिका जी ने सबको चुप करा कर अपनी-अपनी बारी आने पर बोलने को कहा है और बिल्कुल चुप! मुँह पर उँगली रखो सब। अब ये चुलबुली यादें मुँह पर उँगली रख के भी चुपके-चुपके आपस में खुसफुसा रही हैं, चुप बैठो! दीदी जी बारी बारी से बुलाएँगी, कितनी भोली, कितनी आज्ञाकारी न....
घर प्यारा-न्यारा
सबसे पहले बारी है ५ से ६ वर्ष उम्र की सन् १९८१-८२ की नरसिंहपुर शहर की बहुत प्यारी, भोली यादों की उसके श्री मुख से जब हम जैन मंदिर ट्रस्ट के घर में रहते थे, बन्नक कुछ इस प्रकार थी कि घर आने के लिए पहले कुछ सीढ़ियाँ, चबूतरा, फिर लगातार तीन कमरे, फिर चूल्हे वाली रसोई, एक कुठरिया (जहाँ सब बिस्तर, पेटियाँ आदि रखते थे,और वहीं एक अलमारी में जीजी, दादाभाई लोग के भगवान की व्यवस्था जमी रहती) फिर आँगन, एक सपरना (स्नानागार), लकड़ी रखने की कमरेनुमा जगह, आँगन में किनारे एक और कमरा था, विशेष रूप से पूजन और अच्छा सामान, बर्तन आदि रखने का कमरा, जब नया गैस चूल्हा आया, यहीं रखा गया था। आँगन से छत की ओर सीढ़ियाँ जाती थीं, वहाँ एक पाताली नल और पीतल का टोंटीदार नल भी लगे थे। वहीं पीछे का एक दरवाज़ा जो पिछवाड़े की गली में खुलता था, यहीं से आ-जाकर हम लोगों के कई काम गुपचुप हो जाते थे। अपने घर के भौतिक स्वरूप से भी हम सबका गहरा लगाव होता है, इसलिए हमें इसकी बनावट आप सभी मित्रों से साझा करने की सूझी।
दादी का लाड़
हमारे आदरणीय पापा जी प्रो.जवाहरलाल चौरसिया 'तरुण' शासकीय पी. जी. कॉलेज, नरसिंहपुर में हिंदी के प्रोफेसर थे। उनको हमारी बाल बुद्धि ने हमेशा लिखते-पढ़ते, साइकल से भाग दौड़ करते, उनके मित्रों से घिरा देखा। कॉलेज वाले मित्रों में श्री ओम प्रकाश त्रिवेदी, श्री माधव प्रसाद तिवारी, श्री विपिन चंद्र शाह थे तो मोहल्ले में श्री शकरगाए, वीरसेन जैन, अग्रवाल जी, सोनकिया जी, तामिया जी ,पुरोहितजी
और विशेष मित्रों में डॉ. देवेंद्र वर्मा जी, श्री मेहता जी मुख्य थे। इन दोनों विभूतियों के अत्यंत सुदर्शन, गौर वर्ण, दमकते चेहरे, चुंबकीय व्यक्तित्व आँखों से कभी ओझल नहीं हुए ।इन सभी से पापाजी का जुड़ाव बना रहा, हास-परिहास हो या सहयोग की ज़रूरत सबमें आपस में बहुत घनिष्ठता थी। मोहल्ले में आस-पड़ोस के बच्चे दिन-दिन भर एक-दूसरे के घरों में घुसे रहते, कोई भेद-भाव नहीं था, सब घरों में चाचियाँ, दादियाँ, बड़ी दीदी, भैया बड़े प्यार से बच्चों को खेलने देते । नरसिंहपुर के घर में हमारे आदरणीय नारायण दादाजी हमेशा आगे के कमरे के दरवाज़े पर बैठे सब आने जाने वालों से राम-रहीम करते रहते और 'नंदन' पढ़ते। तब बच्चों की कहानियों की सबसे लोकप्रिय पत्रिका नंदन आज भी हमारे पास रखीं हैं। इतनी रोचक कहानियाँकहीं नहीं पढ़ीं जो हमने नंदन में पढ़ीं हैं। वो हमें 'ईश्वरी' कह के बुलाते थे। हमारी आदरणीया दादी राजरानी (भौजी) और मम्मी रसोई, घर गृहस्थी के कार्य सम्पन्न करतीं, चूल्हे पर रखने के बर्तनों पर छुई का लेपन, लकड़ी के बुरादे से सिगड़ी तैयार करना, कभी स्टोव का बारी-बारी से उपयोग करतीं। उन दोनों के बीच सामंजस्य हमने बाद तक देखा। ममतामयी दादी हम सब बच्चों के लिए मलीदा के (रोटी मीड़ कर घी, शक्कर और दूध मिलाकर) लड्डू बनातीं। बहुत स्वादिष्ट और पौष्टिक आहार उनकी लाल हो चुकी हथेलियों से, उनके उदार हृदय से निकलता हम सबको उनके लाड़ में सराबोर करता।
रेडियो और बिनाका गीतमाला
घर में सबसे छोटी बालिका होने के नाते मेरी देखभाल में मेरे दोनों दादा भाई बड़े अंशुमान, छोटे अनुराग और मेरी दोनों जीजी संगीता और नवनीता का विशेष स्थान रहा है। बड़ी जीजी संगीता हमें खाना खिलाने के लिए छत पर ले जाती। वहाँ की पट्टी पर बैठकर हम पीछे की गली , तामिया जी का बगीचा, फिर दूर फैले खेत और छुक छुक करती, धुआँ छोड़ती, सीटी बजाती ट्रेन जाते देखते, खुश होकर ताली बजाते और झटपट खाना खा लेते। आज यह सोचकर बड़ा आश्चर्य होता है कि इतने मनमोहक दृश्य घर से ही उपलब्ध थे ,कहीं दूर जाने की आवश्यकता ही नहीं थी, कितना हरा-भरा, शुद्ध वातावरण था आस-पास। छोटी जीजी नवनीता हमको सब विषय पढ़ाती, शंकु, आयत, बेलनाकार के भेद समझातीऔर नंदन से कहानियाँ सुनातीं ।हम उनकी फ्रॉक पकड़ कर टॉफी लेने सुरेन्द्र भैया की बड़ी सुंदर, सजीली दुकान जाते। दीदी बड़ी संजीदगी और सोच समझ कर सौदा खरीदती, उस समय पंजी-दस्सी (५-१० पैसों के सिक्के) भी बहुत मायने रखती थी। मेरे दोनों दादा भाई खूब पढ़ाई के साथ-साथ बाहर के कार्य, दादा-भौजी की देख-रेख करते, उनके संग बने रहते। बड़े दादाभाई को वर्जिश का शौक था, वैसा शरीर शौष्ठव उनका बना भी और छोटे दादा भाई पापाजी के घर पधारे मित्रों के साथ कैरम,चैस खेलते, बिन आलस के हर काम और रेडियो पर हर वक्त कुछ ना कुछ सुनते रहते थे जिसमें सुबह से रामायण, समाचार, चित्रपट संगीत, रात में बिनाका गीतमाला,( बहनो-भाइयो ! संबोधन से बड़ी बेस वाली आवाज़ में अमीन सयानी जी उस दौर के हिट गानों की फेहरिस्त बताते, किस पायदान पर कौन से गीत ने जगह बनाई है ), के अलावा क्रिकेट कमेंट्री, समाचार, नाटक,आदि शामिल थे, हमारे घर में मनोरंजन का एकमात्र साधन मर्फी कम्पनी का बड़ा वाला रेडियो सैट था, कभी-कभी हम भी रेडियो पर कोई स्टेशन सैट करते, धीमे, तेज, झूलती आवाजों में रेडियो सीलोन या कुछ और पहचान सुनने में आतीं। बहुत छोटे होने के कारण हमारा सिनेमाघर जाना आसानी से नहीं हो पाता था, तो रेडियो कौतूहल का डब्बा था, हम पीछे देखते, खोलकर देखते कि अंदर बैठ कर कौन बोलता है? बाल सुलभ बुद्धि को विज्ञान, तकनीक, तरंग आदि समझ न आती। कालांतर में जब स्वयं आकाशवाणी उद्घोषिका बने,तब इसकी कार्य प्रणाली समझ आई।
नरसिंह मंदिर
हमारे घर के ठीक सामने जैन मंदिर के दरवाज़े हमेशा खुले रहते और हम दौड़कर मंदिर के बड़े-बड़े कक्ष और हॉल में जाकर भगवान आदिनाथ, महावीर स्वामी की ध्यानमग्न मूर्तियाँ देखते उनका शिल्प, कीमती पत्थर में तराशा गया आकार हमें सुंदर लगता। वहाँ व्याप्त शांति में ताली या कोई आवाज़ करके हम उसकी प्रतिध्वनि सुनते, टंटू माली (चौकीदार) हमको हड़काता कि मंदिर की शांति भंग न हो, हम दौड़कर घर आटे फिर मंदिर जाते, दिन भर यही क्रम दोहराते। हमारे घर से कुछ ही दूरी पर पीछे नरसिंह भगवान जी का प्राचीन मंदिर था। हम जीजी या मम्मी के साथ मंदिर दर्शन करने जाते, बहुत भव्य मंदिर, भगवान नरसिंह की मुद्रा हमें थोड़ा भयाक्रांत करती। उस मंदिर में दो मंजिल नीचे तलघर, उसमें रखी कीमती आभूषणों की पेटियाँ, उसकी रखवाली करते मूँछों वाले साँप-बिच्छू के किस्से हमें जितना डराते उतनी ही सच जानने की जिज्ञासा तीव्र होती कि कभी तलघर खुले तो?.... यह रहस्य तो आज तक बना हुआ है। बड्डू पंडित जी को तो सब मालूम होगा यक़ीनन। ये दोनों मंदिर आज भी बहुत अच्छी स्थिति में हैं। नरसिंह मंदिर की वजह से ही शहर का नाम नरसिंहपुर हुआ है।
इसी दूधिया उम्र का एक वाकया है, एक बार हम पड़ोस की हमसे कुछ बड़ी सहेली निशा कौर के साथ शहर के बीच में सींगरी नदी तक चले गए पैदल ही... ऊपर पुल... वाहनों की आवाजाही और नीचे बहती सींगरी नदी, एकदम पिकनिक स्थल जैसा दृश्य शहर के मध्य। पुल के नीचे हरे-भरे पेड़ पौधे, छोटे-बड़े पत्थर और पत्थरों से छिड़ता कल-कल करता सींगरी नदी का स्वच्छ जल.... हम अपनी फ्रॉक को गीला होने से बचाए, पानी में पैर डाले, पत्थर पर बैठे खेलते रहे फिर जब देर हुई, घर की याद आई तो हम ज़ोर से रोने लगे, तब निशा हमें घर वापस लाई। यहाँ सबने उसे अकेले इतनी दूर जाने की लिए डाँट लगाई, समझाया भी क्योंकि वो भी बच्ची ही थी, तब भी हमको गोद में उठाकर चुप कराया, हम सिसक कर रो रहे थे। उस वक्त पहली बार अपना घर, अपने बड़ों की छाँव और राहत के अर्थ का भान हुआ। आज 4 दशक बाद जब इतने वाहन, प्रदूषण, आबादी बढ़ चुकी है तो सींगरी नदी की आज क्या स्थिति होगी... आप सभी समझ सकते हैं। नरसिंहपुर की मेरी ये विविध वर्णी यादें इतना गुदगुदाती हैं कि मुस्कान के साथ साथ, नयन झिलमिल हो उठते हैं। अत्यंत भाग्यशाली हूँ कि मुझे अपने बड़ों से इतना स्नेह सिंचित,संस्कारित वातावरण मिला।
जबलपुर में महफिलें
भगवान नरसिंह की नगरी से भावभीनी बिदाई लेकर, सन् १९८३ में पापा जी तथा हम सभी को माँ नर्मदा के अंचल में बसे, महर्षि जाबालि की तपोभूमि जबलपुर ने पुकारा। पापा जी का स्थानांतरण शासकीय महिला महाविद्यालय, रांझी हो गया और हमारा घर 'नीराजन' भी उनके अथक परिश्रम से तैयार हो चुका था। नया परिवेश धीरे-धीरे अपना लगने लगा। यहाँ हमारे बाबूजीबाई (दादा श्री मानिक लाल चौरसिया 'मुसाफ़िर' दादी श्रीमती जनक दुलारी), चाचा (श्री कृष्ण कुमार पथिक , इंजी. गोपाल कृष्ण 'मधुर', श्री राजेंद्र), बड़ी बुआ कमलेश, छोटी बुआ शकुन्तला और अन्य सभी सगे-संबंधियों के घर इस नए शहर से जुड़ने में बहुत महत्वपूर्ण रहे। मम्मी -पापा जी बहुत सामाजिक थे, हमको, दोनों जीजी-भैया को बारी-बारी से सबके घर ले जाते, इस तरह सबसे घुलना-मिलना भी हुआ और शहर के रास्ते, गलियों से हम बहुत अच्छी तरह परिचित हो गए। कक्षा तीसरी-चौथी तक आते हमें अपने घर के सांगीतिक, साहित्यिक पठन-पाठन, अभिरुचियों का वातावरण समझ आने लगा था। हमारे बाबूजी स्वयं बहुत सुरीले गायक थे और कंठ संगीत के शिक्षक थे, उनका बीना रीड का बाजा ( हारमोनियम) उन्हें बहुत प्रिय था और इस पर ही वह अपनी संगीत की तान छेड़ते, स्वरचित भजन, लोकगीत, कभी पुराने फिल्मी गीत सुनाते। हमारे चाचा जी, पापाजी की पीढ़ी गायन में, फिल्मी गीतों के चयन में उत्कृष्ट थी, उसके साथ-साथ जो ताल देकर गाने गाना, बहुत उम्दा हुआ करता था.... कहीं दरवाजे पर, कहीं मेज़ पर तो कहीं अपनी किताब पर ही.. उँगलियों-हाथों से तबले समान जुगलबंदी करते, हमने उन सबको मौज-मस्ती में उनके दौर के गीत गाते सुना। हमारी बड़ी बुआ और छोटे चाचा जी (मधुर जी) ढोलक बजाने में माहिर थे, उनकी संगति में जो गम्मत सजती थी, वह आज भी पुराने समय के लोग याद करते हैं। संगीत के साथ ही सबका कविता लेखन,साहित्य साधना हमने शुरू से देखी, किसी विषय पर तुरंत चार पंक्तियाँ बनाकर बोलना, सबमें आशुकवि प्रतिभा भी थी। आज इन मधुर स्मृतियों को कलमबद्ध करना बहुत ही आनंदित करने के साथ भावुक भी कर रहा है। यह पूरी पीढ़ी अपनी धरोहर हम सभी को सौंप कर संसार से बिदा ले चुकी है।
सरस्वती शिशु मंदिर के संस्कार
जबलपुर आकर दोनों दादा भाई, जीजी संगीता कॉलेज जाने लगे, नवनीता जीजी ग्यारहवीं में और हम सरस्वती शिशु मंदिर, गलगला के कक्षा दूसरी के विद्यार्थी।पहली कक्षा नरसिंहपुर के सरस्वती शिशु मंदिर में पढ़ी, बिना रोए शाला गए। हमने कभी कोई ज़िद नहीं की, एकदम शांत, संकोची स्वभाव की बालिका थे। अपनी पुस्तकों, कॉपियों का रख-रखाव, उत्तम गृहकार्य करना, चित्र बनाना यानि चुप रहकर करने वाले कार्यों में रुचि थी। जबलपुर में छोटे दादा भाई अनुराग (शिरीष) अपनी साइकल के डंडे पर बिठा कर स्कूल ले जाते, और हमको रास्ता भी याद कराते, दुकानों के नाम, बोर्ड से निशानी बनाना सिखाते कि यहाँ से मुड़ना है, फिर सीधे जाना ताकि कभी हम खुद से पैदल भी जा सकें। कक्षा चौथी तक हम अकेले जाना सीख भी गए, जो मित्रगण जबलपुर वासी हैं, उनको तिलक भूमि तलैया के बाद नरघईया रोड अवश्य पता होगी, यहीं से होकर आगे गलगला हम अपने शिशु मंदिर तक पहुँच जाते थे। नरघईया से आगे दाएँ मुड़कर एक दुकान पर "हवाबाण हरडे" पाचन गोलियों का बड़ा ही मजेदार चित्र हम रोज़ देखते थे,जिसमें बड़ी तोंदवाला व्यक्ति लड्डूओं से भरे थाल से लड्डू खाते हुए बना था, यही मुख्य निशानी थी, गलगला की ओर जाने की। यहाँ हमारी प्राथमिक शिक्षा की नींव पड़ी। सरस्वती शिशु मंदिर सनातन धर्म,संस्कृति/ शिक्षा का सर्वोत्तम संस्थान रहा है। यहाँ हमने जो शिक्षाएँ ग्रहण कीं, वह आज ४ दशकों बाद भी इतनी पक्की हैं कि कभी विस्मृत न होने पाईं। हम हर दिन 'हे हंसवाहिनी ज्ञानदायिनी अंब विमल मति दे' प्रार्थना गाया करते थे। बहुत बाद में पता चला कि यह हमारे जबलपुर नगर के वरिष्ठ कवि संजीव वर्मा 'सलिल' (इस संकलन के संपादक) द्वारा लिखी गई है। हमारे शिशु मंदिर में कक्षा वर्गों के नाम ऋषि-मुनियों और पौराणिक पात्रों पर आधारित होते। जैसे वर्ग विश्वामित्र, वर्ग ध्रुव, वर्ग कुश आदि। हम वर्ग-वाल्मीकि में कक्षा ५ तक पढ़े। हमारे विद्या मंदिर में आचार्य जी लोगों को सफेद धोती-कुर्ता या कुर्ता-पाएजामा पहनना अनिवार्य था, पेंट-शर्ट नहीं और दीदी लाल बॉर्डर वाली सफेद साड़ी पहनती थीं, बिल्कुल माँ सरस्वती की वेशभूषा के समान। शाला की नियमित प्रार्थनाओं में कई श्लोक भी सम्मिलित रहते। 'भोजन मंत्र' भोजन की छुट्टी से पहले और पूरी छुट्टी के पहले 'विसर्जन मंत्र' बोलकर आचार्य जी/ दीदी जी को अभिवादन कर हम लोग वापस आते। हमारी शाला से 'देवपुत्र' नामक पत्रिका निकाली जाती थी, जिसमें पहली बार 'चार कबूतर' पर एक हमारी लिखी छोटी-सी कविता लिख छपी थी। ।
निज भाषा उन्नति अहै
सरस्वती शिशु मंदिर सदैव सह-शिक्षा के केंद्र रहे हैं। सभी विषयों की शिक्षा हेतु हमारे शिक्षक गण बहुत मेहनत करते थे और 'आंग्ल भाषा बोध' किताब से हम बच्चों को अंग्रेज़ी भाषा का परिचय भी दिया जाता था, परन्तु अंग्रेज़ी न बनने या इसमें अंक कम आने पर हीन भावना कभी नहीं आती थी, क्योंकि ये तो विदेशी भाषा सीखने की सिर्फ़ प्रारंभिक प्रक्रिया थी, हम सबका असल माध्यम तो हिंदी और संस्कृत भाषा थी अंक, पहाड़े, भिन्न, समुच्चय, धन-ऋण, रेखा गणित जैसे अनेक शब्द और भूगोल, विज्ञान की हिंदी शब्दावली नक्शा, पठार, मृदा, अपरदन, परखनली, कोशिका, तंतु आदि हमारे अभिन्न अंग हो गए। प्रगति-पुस्तिका हिंदी में होति थी। प्रत्येक परीक्षा के बाद इसमें अभिभावक की प्रतिक्रिया लिखवाना अनिवार्य था। यहाँ हम सब बच्चे आपस में अपने नाम के पहले भैया या बहन लगाकर बात करते थे (बहन अस्मिता, भैया अभिषेक आदि) बालक-बालिकाओं के कच्चे मन में आपस में भाई-बहन जैसे रिश्ते की ही समझ विकसित हो, यह दूरदर्शी सोच इन संबोधनों को सिखाने का उद्देश्य थी। हम सब बच्चों को बहुत सारे देशभक्ति गीत सिखाए जाते थे, हम लोग समवेत स्वर में बहुत आनंद से यह सभी गीत सीखते, जो उनके प्रबंधन के खुद के लिखे हुए होते। इसके अलावा खेल-कूद की गतिविधियों में बालकों को डंबल, बालिकाओं को लेझिम सिखाया जाता। हमारे विद्या मंदिर का रिक्शा नारंगी रंग से पेंट हुआ करता था, जिस पर 'सिंह के दाँत गिनते हुए बालक भरत का प्रतीक चिन्ह सरस्वती शिशु मंदिर की पहचान बनी होती थी, रिक्शे में बैठनेवाले बच्चों को रास्ते भर देश भक्ति गीत गाने की हिदायत दी जाती थी, ताकि शहर के लोगों को पता चले कि यह कौन से शाला के बच्चे जा रहे हैं। आज के विशुद्ध तकनीकी, वैज्ञानिक दौर में यह शिक्षा कहाँ तक प्रासंगिक है? आज ये शिक्षण संस्थान कितने सफल हैं? यह एक बहुत लंबी चर्चा का विषय है, परंतु लगभग ४० वर्षों बाद आज भी अपने सरस्वती शिशु मंदिर की शिक्षा के प्रति हमारा मन सदैव नतमस्तक हो जाता है।
खेल और कॉमिक्स की दुनिया
माँ नर्मदा के तट पर बसी, आदिवासी अंचल की सुंदरता समेटी मंडला नगरी से हमें विशेष लगाव रहा है, अपने ग्रीष्मावकाश हमने अक्सर यहीं बिताए। मोदी मोहल्ला में हमारा ननिहाल था। हमारे मामाजी के बड़े घर में हम अपने हमउम्र भाई-बहनों के साथ तरह-तरह के खेल खेलते, या कभी कोई क्राफ्ट बनाते जीजी लोगों के साथ। खेलों में टीप-रे स(लुका-छिपी), नगीना, शहंशाह वगैरह फिल्मों के दृश्यों की नकल और कौड़ियों या इमली के बीजों से सात घर का अट्ठू (अष्टा-चंगा) खेलना हम सबको पसंद था। सामने की परछी (एकदम खुली बैठक) में छोटे मामाजी ने ज़मीन पर खुदवा दिया था, ताकि बच्चों को बार बार बनाने-मिटाने से छुट्टी मिले। जिसके दाम अच्छे पड़े, उसकी गोटी पक गई यानि वो जीत के बाकी के तीन को मार्गदर्शन देता कि इस गोटी को बढ़ाओ, अब दूसरी... किसी ने कौड़ी चुपके से उल्टा-पलटा कर दाम चित किए (बदल दिए) तो उसे इस 'रौनठाई' ( बेइमानी) की सज़ा मिलती कि अब पहले घर से खेलो। ऐसे में वो 'रौंठा' पूरा खेल बिगाड़ के तुनक के भाग जाता। यह वो समय था जब बच्चे, बड़े, महिलाएँ सब अपने-अपने समूह में एक साथ बैठते थे, अकेले किसी काम की, मन बहलाव की बात सोचते भी नहीं थे। उस दौर में घर पर टी. वी. नहीं हुआ करती थी, बल्कि बिल्कुल स्वस्थ मनोरंजन और हिल-मिल कर खेलनेवाले खेलों में लंबी दुपहरी बीत जाती थी। इसी बीच हम घर के सामने वाले जीवन मामाजी के घर ढेर सारी चित्रकथा और कॉमिक्स पढ़ने चले जाते, उनके घर एक कार्टन भर के चित्र कथा की किताबें थीं, शायद भैया ने इनकी दुकान की योजना बनाई थी, (उस समय कॉमिक्स किराए पर ले जाने का भी खूब चलन था) उनके ऊपर के कमरे में लकड़ी की जाली लगी हुई थी, बाहर से बंदरों की टीम ऊधम मचाती,(मंडला में बंदरों का बहुत आतंक था) अंदर हम अमर चित्रकथा, मनोज चित्रकथा के राजा-रानियों में या नागराज, मृत्युजंय या फिर डायमंड पॉकेट कॉमिक्स की बिल्लू, पिंकी, चाचा चौधरी, रमन जैसे किरदारों में डूबे रहते। घंटों हमारा पता न चलता, फिर मामाजी या भैया-बहन हमें खोजते हुए आते। वह हमारी इस तरह पढ़ने में रुचि देखकर बड़े खुश होते। बच्चों में कथाएँ पढ़ने की अभिरुचि कितनी विधाओं का विकास करती है, यह बाद में समझ आया, शब्दों-वर्तनी की जानकारी, कथ्य में निहित बात, चित्रों से भाव समझना, संवाद पढ़ना, रेखांकन, अपनी भाषा के निकट पहुँचना और वो एकाग्रता, स्थिरता जो अब की अधुनातन पीढ़ी में बिल्कुल नदारद है।
नर्मदा में तैराकी
सुबह जल्दी उठकर मामी जी आदि के साथ हम सब बच्चे पैदल पैदल नर्मदा घाट जाते, जो हमारे मामाजी के घर से बहुत दूर नहीं था। जबलपुर में तो नर्मदा जी बहुत दूर थीं पर मंडला में घाट बहुत पास था। घाट से थोड़ी ही दूरी रह जाने पर पानी की खुशबू आने लगती और घाट का शोर-गुल, नदी में छलाँग लगाने की धपाक्-छपाक् की आवाज़ों से रोमांच होने लगता, गर्मी के दिनों में जल का इतना शीतल स्वच्छ स्रोत कि घर में स्नान करने और कपड़े धोने की आवश्यकता ही नहीं थी, सब वहीं सम्पन्न हो जाता। हमसे तो तैरना आता नहीं था तो हम किनारे सीढ़ी पर बैठे ही छप्-छप् करके खेलते, लोटे से स्नान करते, मम्मी थीं नर्मदा-कन्या, खूब तैरतीं, फूली न समातीं, उनकी खुशी हमको साफ़ दिखती, एक तो मैया नर्मदा की गोद, दूजे पीहर की मौज। हमारे ममेरे भाई-बहन पीठ में डालडे का टिन बाँधकर पानी में कूद जाते, और उतराते रहते, मज़े से और बड़े भैया, बाकी सब भी क्रमशः पहले, दूसरे, तीसरे चांदे (नदी में कूदने के लिए बना गोलाकार चबूतरा) से ऊँची-ऊँची छलाँग लगाकर मामियों के पास कूदते और उनकी फटकार खाते, लाड़-प्यार की ढिठाई करके उन लोगों को बड़ा मज़ा आता और ये सब देखकर हम भी मज़े लेते। हमारे सब ममेरे भैया गजब के तैराक और मंडला की हमारी सभी दीदी तैरना जानती थीं। वे सब खूब तैरतीं, हमारी मम्मी, यानि उनकी बुआ और भतीजियों में होड़ लगती,नदी के बीच से किनारे पहले पहुँचने की। हार होती या जीत...उन सबके तन-मन को स्फूर्ति से भर देती। स्नान के बाद घर आकर, भोजन की व्यवस्था मामी, मम्मी, जीजी लोग मिलकर करतीं और हम सब छोटी वय के बच्चे अपनी उछल-कूद में लग जाते। भोजन के लिए मामी जी टेर लगातीं तो हम सब सीधे पंगत लगाकर गरमागरम सुस्वादु भोजन पाते। वाह! क्या बेफिक्री का बचपन था......"कितनी प्यारी होती थी ये छोटी सी उमर... न नौकरी की चिंता न रोटी की फिकर...।"
कहानी और भूत
बचपन में जहाँ भी मैं गई, सब जगह बड़े-बड़े मकान मिले, नरसिंहपुर, जबलपुर, ननिहाल मण्डला या चाचा जी का घर, खूब जगह मिली खेलने-छुपने की। मंडला के घर का एक मज़ेदार पर कुछ भयानुभूति का वाकया हम भुलाए नहीं भूलते। मामा जी के घर की छत के पीछे एक उजड़ा बगीचा और सूखा कुआँ दिखता था, कुछ खंडहर जैसा भी। दिन में उसे देख हम वापस नीचे आ गएऔर भूल भी गए। रात में हम सब बच्चे, बड़े भैया, मामाजी, मामी जी, दीदी लोग इकट्ठे लाइन से सोते और टेबल फैन के अपनी तरफ घूमने का इंतज़ार करते नींद आ जाती। सोने से पहले छोटे मामा जी हम लोग को कहानियाँ सुनाते कभी परियों की, जादुई शक्तियों की, कभी राजाओं की तो कभी भूत/प्रेतों की भी। एक रात उन्होने अपना सत्य अनुभव बताया कि घर के पीछे जो सूखा बगीचा है, उसके कुएँ में पड़ोस की किसी दिवंगत स्त्री की भटकती आत्मा चुड़ैल बन के रहती है, जो नकसुरी आवाज में कभी-कभी बड़े मामा अमृतलाल को बुलाती है "ऐं...अं..मं..रिं..त....!!' तो बिल्कुल जवाब न देना रे! जवाब से ओहे सक्ति मिल जाहै, भीतर घुसवे " यह सुनकर हमारी तो सुट्टी-पिट्टी गुम हो गई। बाकी तो वहीं रहते थे, उनको इस किस्से की आदत थी पर हमने पहली बार सुना, वह जगह घर के पीछे ही थी। यदि बाथरूम जाना हो तो पीछे से ही जाना था। बड़ी फजीहत,हम उस रात डर के मारे मम्मी की साड़ी ओढ़कर दुबके पड़े रहे। सुबह हमने मामी जी को बताया तो उन्होंने मामा जी को उलाहना दी कि इतनी छोटी भांजी कितना डर गई, आपने ऐसी कहानी सुनाई ही क्यों? पर हमारे छोटे मामाजी तो ऐसे किस्से- कहानियों के बड़े उस्ताद थे, वो कहाँ सुनने लगे ये? बोले 'आज एक और सत्य घटना सुनाएँगे रात में '। सब बच्चे रात के इंतज़ार में लग गए पर हम तो उसी दिन बस में बैठकर वापस भाग आए जीजी के साथ पर मम्मी कुछ दिन और रुकीं। आज इन किस्सों को याद कर बहुत हँसी आती है कि कैसे डर गए थे? मामा जी ने सच्ची घटना बताई थी या झूठ-मूठ में डराया? यह तो मामा जी ने आज तक स्पष्ट नहीं किया हँसकर कहते हैं 'हमारी शैली का डर कायम रहे!' उस उजड़े बगीचे के स्थान पर अब अट्टालिका तन गई है। कहानियाँ मानव मन को सदैव लुभाती आईं हैं। आज हमने भी अपने बचपन की बहुत सी कहानियां आप सभी से साझा की हैं। सचमुच कितनी प्यारी रातें थी, जब सारे बड़े, मँझले, सँझले, छोटे भाई-बहन एक साथ बैठते थे, ठहाके लगाते थे, गुदगुदी छोड़ते थे, कंधे पर बैठ जाते थे, प्राइवेसी या निजता की चाह नहीं थी, वरन रिश्तों में अधिकार, अपनत्व बहुत हुआ करता था। दो-तीन जोड़ी कपड़ों में, एक जोड़ी सैंडल या स्लीपर में कितनी खुशी और संतुष्टि रहती थी, कोई कमी महसूस नहीं होती थी। यही हमारे अबोध, नादान बचपन की सच्ची यादें हैं,जो आज स्वयं अनायास ही साझा होने चली आईं हैं। हमने पूरे मन से उन्हें पुचकारा,गले लगाया,आप सबसे मिलवाया ।अब अगली और भी अनगिनत गुदगुदाती यादें पंक्तिबद्ध होकर प्रतीक्षारत हैं,उनको भी आना है ,तब तक विराम लेते हैं और आइए गुनगुनाते हैं...
"उमर में कच्चे, ये छोटे बच्चे,
हैं भोले भाले, हैं सीधे सच्चे,
ठानेंगे जो भी,करके रहेंगे,
ये अपनी धुन के हैं पूरे पक्के ,
कोई न समझे इनको अनाड़ी....."
जय बचपन....! जय भोलापन...!
***
०७. उमा जोशी, चिलियानौला अल्मोड़ा, उत्तराखंड
गाँव में बचपन
पाँच साल में पाठशाला
तख्ती और कमेट कलम,
खड़िया से लिखा अ आ
उसे भरने का खूब प्रयास
फिर से घर तख्ती को,
काला कर, घोंटा लगा
चमका चमकाकर
रुल खींचकर,
कच्चा एक, पक्का एक
फिर कापी कलम बाँस की
पाँच पैसे की स्याही की टिक्की,
एक काँच की शीशी में घोल,
घर आने तक हाथ मुँह कपड़े
सब स्याह रंग में रंग गए,
हाथ धोने को साबुन नहीं,
राख और मिट्टी से रगड़ना
अहा! वो बचपन के दिन,
जहाँ जाओ, जैसे खाओ
खेलो कूदो, सारा गाँव घूमो,
शाम की रोटी खा
दूर चलकर स्कूल जा,
घर आकर खाना खा,
फिर रामलीला की तालीम
😄
रामलीला देखने को भी
एक बोरा बिछाकर,
आगे की जगह हथियाना
रावण दरबार की सखी बनना
लंका के राजा-महाराजा,
दिन-रात बजे रण का बाजा,
मांस-मदिरा सदा जिनका खाना,
है जहाँ में जिनकी धूम,
तुम हो आला, विषधर काला,
शेर बब्बर हो, उससे भी जब्बर हो .....
दूसरे दिन सीता की सखी बन गाना ,
''चलो सखी गौरी को पूजन जाएँ,
बेला चमेली तोड़े,
कुछ दिन बाद हम सखियाँ
अशोक वाटिका में सीता की रखवाली करतीं,
''सपने बानर लंका जारी''
बैलगाड़ी की सवारी
दमड़क,दमड़क की आवाज,
मेले की तैयारी, चवन्नी और अठन्नी लेकर खुश,
थोड़ी मूफली अम्मा के लिए,
एक पिपरी अपने लिए,
पी पी बजाते घर ,
नंगे पैर स्कूल,वा वा भई
न सर्दी न जुकाम,
बारिश में बन्धारे का पानी भरना,
कागज की नाव बना ,
कितनी कितनी दूर चलते,
हंसते खिलखिलाते पानी फेंकते
मेरी सहेली मंजू सुबह मुझे उठाती,
उठ उठ पानी लेने चल
मैं दे लात घूंसे ,ही ही ही
आज भी जो मुझे उठाता
वही मार खाता
फिर भी मंजू कभी नाराज़ न होती
स्कूल जाने में भी मुझे ही देर होती,
पर वो मेरे बिना न जाती
जुराब की बाल बना सेवन टाइम खेलते
कभी बैट बाल खेलते
कभी गिट्टी तो कभी दांणीं,
पढ़ना तो स्कूल में ही ठैरा
घर में भी पढ़ते हैं ये क्या पता
बस ईजा जो पढ़ाती
कोयले से लिखकर
अद्धा, पौना ,डेड़ो ढाम,
एक अद्धा अद्धा ,दो अद्धा एक, तीन अद्धा डेढ़
ऐसे और फिर रात में
खाना खाने के बाद
मट्ठा बनाते देखना कि थोड़ा गर्मागर्म मक्खन मिलेगा,
फिर और सोने से पहले
कथा सुनना , यही दिनचर्या
एकदम सरल,सहज , बेखौफ बचपन
सब अपने, किसी भी पेड़ से आम तोड़ खा
फ़िक्र और चिंता थी तो एक पेटभर खाने की
बाकी सब तो मां पिताजी सोचते,
गाड़ी की तो बस बातें सुनकर खुश,, देखने को कहां मिलती,
कभी हवाई जहाज आसमान में आता तो
दौड़े - दौड़े देखने जाते बाहर ,
ओ रे देखो ,ओ रे देखो
हवाई जहाज ,
फिर ऊपर को हाथ उठाकर कहते रुको रुको,
जैसे हमारी आवाज वो सुन रहे हों
फिर अम्मा एक किस्सा सुनाती ... कि एक गांव की गरीब मां का बेटा हवाई जहाज चलाता,
अब वो घर तो आ नहीं पाया, अपनी मां को पैसे की पोटली उसने ऊपर से सीधे अपने घर पर ही फेंकी , तब वो समझ गई कि मेरे बेटे ने पैसे दिये हैं
आज भी वो स्मृति वही है मेरे लिए, और सच भी लगता है,
अम्मा ईजा खेत में जाते,
मुझे घर अकेले डर लगता
अंधेरा होते ही मुझे कोई भी सामान भूत जैसे लगता,
मैं बहुत डरती, रोती
फिर मेरे बड़े भाई मुझे और डराते,
ईजा बाबूजी को चिट्ठी लिखती, मेरा मन रखती,
दीपू और हेमन्त को समझाना, गुड़िया को बहुत परेशान करते हैं, मैं खुश होती, अब तो दोनों को डांट पड़ेगी,
कक्षा एक में दो में तीन में प्रथम पास होती , हर वर्ष पास होने पर कंगन मिलते,
पांच में बोर्ड, पास हो गई, उसी साल सड़क बनने का काम , रोलर , बुलडोजर सब देखें , मजा आ गया
कल्पना में खो गई, सड़क बनेगी गांव में, गाडियां चलेंगी, फिर मामू के घर फटाफट पहुंच जाएंगे,
मामू फ्राक बनायेंगे।
हमारे बचपन में खाना कम, संस्कार ज्यादा खिलायें जाते,
ईजा (मां) सुलेख लिखाती
अहिंसा परमो धर्म।
परोपकाराय पुण्याय परपीडनम् ।
चरित्र की रक्षा यत्नपूर्वक करनी चाहिए
बस ये वाक्य पत्थर की लकीर हो गई
एक बार स्कूल में इंजेक्शन लगाने वाले आयें
हवा फैल गयी कि हुई लगाने वाले आ रहे हैं
फिर क्या था डर से हम भागने लगे, मंदिर के अंदर छिप गये। पर पता चल ही गया,
पकड़ पकड़ कर ले गए,
मार भी पड़ी,
लाइन में खड़ा किया, अब ... क्या करें
मन मारीच की तरह डरा ,इधर से रावण डर है तेरा ,उधर से रघुवर के बाण हैं दोनों तरफ से आई कजा
बहाना ढूंढ़ते मिल गया, डेढ़ दो सौ बच्चों के बीच से कराहते हुए निकली , बांह में उंगली रखकर,कि जैसे दर्द हो रहा हुई से,
आराम से बिना हुई लगाये बाहर , अरे मजा ही आ गया,कि मैं बहुत चालाक हूं।
घर जाकर जब पता चला कि मैं ऐसे भागी सुई नहीं लगाई , हाथ में निशान नहीं
सन्न रह गई।
जो मार पड़ी, हे भगवान आज के बाद कभी ऐसे झूठ और बहाने नहीं बनाउंगी।
अब शायद बचपन जा रहा है, गणित और विज्ञान में लगने लगा है।
ओहो! ये तो बचपन की
अनगिनत मोतियों की माला
द्रौपदी के चीर की तरह
बढ़ती ही रहेगी ,
बहुत बाक़ी है अभी
लेकिन अभी इतना ही
बाकी फिर कभी और।
०००
०८. उर्मिला सिन्हा, राँची, झारखंड
हिन्दी विभागाध्यक्ष (अवकाश प्राप्त) महेंद्र प्रसाद महिला महाविद्यालय रांची झरखण्ड
प्रकाशित पुस्तकें --
1--प्रेमचंद के उपन्यासों में व्यंग्य बोध --उपन्यास
2--प्रथम कहानी संग्रह --एक जोड़ी आंखें
3--द्वितीय कहानी संग्रह --यादों की पोटली
मूर्तिकार चाचा
विशाल पोखरा के किनारे अवस्थित गाँव के स्कूल में घंटी बजते प्रार्थना शुरू होती- "अगम अखिलेश हे स्वामी! सदा तुम याद आते हो"। हम सभी बच्चे शिक्षक हाथ जोड़कर सस्वर यह प्रार्थना गाते, ककहरा, गिनती, ए बी सी डी पढ़ते लेकिन मुख्य आकर्षण था पोखरा किनारे मूर्तिकार चाचा का झोपड़ा।
वे चाचा तन्मयतापूर्वक माटी के लोंदों से तरह-तरह के खिलौने, चाक पर गढ़ते। हाथी, घोड़ा, ग्वालिन, दूल्हा-दुल्हन, श्री गणेश आदि बनाते, कई दिनों तक धूप में सुखाकर आग के भट्ठी में तपाते...जब आग की सुनहरी रौशनी काका के साँवले मुखड़े पर पड़ती तब उनका मुख तांबई हो जाता और आँखें लाल-लाल चमकने लगतीं। पता नहीं क्यों हमें उनका वह मेहनतकश रूप मुझे बहुत भाता।
फिर खिलौने ठंडा होने पर काका और उनके परिवार के अन्य सदस्य गेरुआ और अन्य लाल-पीले, हरे-नारंगी रंग से खिलौनों को रँगते, काले रंग से बाल बनाते। मूर्तिकार चाचा धरती के शिल्पकार थे। देखते-देखते मिट्टी में जान डाल देते। फिर काकी उन खिलौनों को बाँस की टोकरी में सजाकर माथे पर रखकर ऊँचे स्वरों में गीत गा गाकर खरीदिरों को आकर्षित कर बेचतीं-
''ले लो खिलौना माटी का
रंग-बिरंगा पुतला ले लो
देवी-देवता का मूरत ले लो
आशीष से झोली भर लो''
सस्वर पाठ कानों में पड़ते ही बच्चे-बूढ़े उनके आस-पास जमा हो जाते। कोई खरीदता, कोई आँखों से देखकर निगाहें फेर लेता, कोई हाथों से टटोलकर शगूफा छोड़ता- " मँहगे हैं, गिरते ही टूट जाएँगे"।
चाची हँसकर बोलतीं- "दुनिया में कुछ भी अजर-अमर नहीं है" और टोकरी उठाकर चल देतीं।''
हम बच्चे पीछे पीछे चल पड़ते। आज न मूर्तिकार चाचा हैं, न चाची लेकिन माटी के खिलौने उनकी अपने कार्य के प्रति तन्मयता, समर्पण और उनकी गूढ़ बातें आज भी हृदय में जीवित हैं।
०००
०९. कमलेश शुक्ला, दमोह
मेरे बचपन की स्मृतियाँ
मेरा जन्म मध्य प्रदेश के कटनी नगर में हुआ। मेरे पिता रजिस्ट्रार थे और माता मैट्रिक उत्तीर्ण, एक सरल, सिलाई, कढ़ाई ,बुनाई में दक्ष, संस्कारवान गृहिणी थीं। हम चार बहनें और दो भाई — कुल छह भाई-बहन — माँ के स्नेह, अनुशासन और संस्कारों की छाँव में पले-बढ़े।
दो बहनें और दो भाई मुझसे बड़े थे। मेरी सबसे छोटी बहन मंजू और मैं — मानो झगड़े के बिना हमारा दिन ही अधूरा रहता था। परंतु एक पल भी हम एक-दूसरे के बिना नहीं रह पाते थे। पिताजी का स्थानांतरण प्रायः होता रहता था। जब किसी शहर में मित्र बनते, तभी आदेश आ जाता और हमें नए नगर की ओर चलना पड़ता। इस प्रकार अनेक नगरों में हमारा बचपन बीता। मंडला जिले की पुत्रीशाला से मैंने चौथी और पाँचवीं कक्षा की शिक्षा ग्रहण की। पिताजी के कार्यालय का एक चपरासी हमारी कॉपियों पर जिल्द चढ़ाया करता था- वह इस कार्य में अत्यंत निपुण था। हम सबकी कॉपियाँ उसी के स्पर्श से सजी रहतीं।
टॉकीज़ में जब भी नई पिक्चर आती, पूरा परिवार उसे देखने अवश्य जाता। रविवार को पार्क की सैर होती, और अधिकारी के बच्चों की तरह हमारा बचपन बड़ी ठाठ-बाट से बीता।
बचपन की एक घटना
चौथी कक्षा में मेरी एक सहेली थी सुधा। उसकी माता का स्वर्गवास हो चुका था, पिता पंडित थे। सुधा बहुत चंचल, निर्भीक और नटखट स्वभाव की थी। डाँट, मार या झगड़े से उसे भय नहीं था — बल्कि वह हर परिस्थिति में डट जाना जानती थी। शनिवार के दिन, दोपहर के भोजन के पश्चात विद्यालय में सबको दूध पाउडर का दूध दिया जाता था। एक दिन सुधा ने मुझसे कहा- “सुनो, आज हम दोनों सबकी नज़रों से बचकर स्टोर रूम में घुसेंगे और वहाँ का सूखा दूध पाउडर खाएँगे। बड़ा स्वादिष्ट होता है!”
पहले तो मैं बहुत डर गई, पर उसकी बातों में आ ही गई। जब सब बच्चों को दूध बाँट दिया गया, तो हम चौकीदार की नज़र बचाकर स्टोर रूम में जा पहुँचे। वहाँ बोरियों के ढेर लगे थे। सुधा अपने साथ ब्लेड लाई थी, उसने बोरी काटी, और हमने पुरानी पुस्तकों के पन्नों पर पाउडर रखकर खाना शुरू किया।
थोड़ी देर बाद मैंने कहा- “चलो, अब निकल चलते हैं” पर वह बोली- “अरे, थोड़ी देर और!”
मैंने धीरे से दरवाज़ा खोला, चौकीदार नहीं था। मैं कक्षा में लौट आई, पर सुधा वहीं रह गई। शाम को विद्यालय की छुट्टी हुई, मैं घर चली आई। रात को माँ ने मुझे नींद से जगाया- “सुधा के पिताजी आए हैं,” माँ बोलीं- “कह रहे हैं कि सुधा घर नहीं पहुँची।” उनके साथ में एक पुलिसवाला भी था। मैं डर गई- कहीं मुझे चोरी के नाम पर पकड़ न लें, झूठ कह दिया कि सुधा तो आई थी, पर पता नहीं कहाँ चली गई। माँ बहुत दुखी हुईं। उनकी आँखों में आँसू थे- “बेचारी माँ-विहीन बच्ची… कहाँ होगी? हे ईश्वर, उसकी रक्षा करना।”
अब मेरा मन घबराने लगा। रात के दो बजे मैंने माँ को जगाया और कहा, “आप वचन दें कि डाँटेंगी नहीं, तो कुछ बताऊँ।” माँ ने वचन दिया। तब मैंने सब सच कह सुनाया। माँ-पिताजी रात में ही पुलिस को लेकर विद्यालय पहुँचे। कमरा खुलवाया गया तो सुधा अंदर, अँधेरे में, खाली बोरी पर सोई मिली। उसे सुरक्षित घर पहुँचाया गया। सोमवार की सुबह मैं काँपते मन से विद्यालय पहुँची। सोचा- अब तो सब पता चल गया होगा पर प्रार्थना सभा में प्रधानाचार्या ने मुझे मंच पर बुलाया और कहा- “कमलेश ने समय रहते सूचना दी, जिससे सुधा को सुरक्षित निकाला जा सका। सभी बच्चे ताली बजाएँ उसके लिए।”
मैंने सुधा की ओर देखा- उसकी शरारती मुस्कान ने सब कुछ कह दिया। पता नहीं, उसने क्या बहाना बनाया होगा । दंड की जगह प्रशंसा मिली पर माँ ने मुझे दो वचन दिलाए-
1. कभी झूठ मत बोलना, चाहे परिस्थिति कितनी ही कठिन क्यों न हो।
2. कभी चोरी मत करना, चाहे वस्तु कितनी ही छोटी क्यों न हो।
इन दोनों वचनों का पालन मैं आज भी करती हूँ।
दूसरी स्मृति
मंडला में बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए तीन दिवसीय सांस्कृतिक संध्या आयोजित की जा रही थी। सभी विद्यालयों से छात्राएँ भाग ले रही थीं। हमारी शाला से पाँच छात्राओं को नृत्य के लिए चुना गया था, पर अंतिम रिहर्सल में मुझे बाहर कर दिया गया। मैं घर आकर रोने लगी। उसी समय मेरी बड़ी बहन सुषमा, जो रानी रामगढ़ स्कूल में दसवीं कक्षा में थीं, मुझसे बोलीं —
“रो मत, हमारे नाटक ‘दीपदान’ में तुझे दीप नृत्य में ले लेंगे।”
और यूँ, दसवीं की चार बड़ी छात्राओं के बीच पाँचवीं की एक नन्ही सी बच्ची, दोनों हाथों में दीपक लिए, मंच पर नृत्य कर रही थी। दर्शकों की तालियों से सभागार गूँज उठा। अगले दिन जब विद्यालय पहुँची, तो वही शिक्षिका जिन्होंने मुझे अस्वीकार किया था, मेरे नृत्य से अभिभूत थीं। उन्होंने मुझे पुनः नृत्य दल में सम्मिलित कर लिया
नया ठिकाना- नयी सीख
सातवीं कक्षा में मेरे पिताजी का तबादला जांजगीर हो गया था, जो आजकल छत्तीसगढ़ में है। जब मैं वहाँ के विद्यालय पहुँची, तो बैल-बॉटम पैंट पहने थी और बस्ते की जगह एक सुंदर, चमचमाती पेटी लेकर गई थी। कक्षा में पहुँचते ही सभी बच्चियाँ ठहाके लगाने लगीं- “अरे, पजामा वाली लड़की आ गई!”
“देखो-देखो, स्टेशन से पेटी लेकर आई है!”
उन्हें क्या पता था कि मैं एक बड़े शहर से आई हूँ, और मेरे लिए यह सब सामान्य था। पर वहाँ किसी ने भी यह समझने की कोशिश नहीं की। वे न तो मुझे अपने साथ बैठातीं, न ही मेरे साथ भोजन करतीं। मैं भीतर से बहुत व्याकुल रहने लगी। एक दिन घर पर मैंने अपनी छोटी बहन मंजू से पूछा- “तुम्हें अपने स्कूल में कोई परेशानी नहीं होती क्या?”
उसका दाख़िला पिताजी के कार्यालय के चपरासी ने उसी विद्यालय में करा दिया था, जहाँ उसका बेटा पढ़ता था। मंजू हँसते हुए बोली-
“दीदी, तुम यह पेटी लेकर क्यों जाती हो? इतने महँगे कपड़े क्यों पहनती हो?
देखो मुझे, मैं घर की पुरानी फ़्रॉक पहनती हूँ, जूतों की जगह चप्पल डालती हूँ, और पेटी की जगह सब्ज़ी वाला थैला लेकर जाती हूँ। उसमें अपनी कॉपियाँ रख लेती हूँ। और हाँ, अंग्रेज़ी बोलना बिल्कुल छोड़ दिया है। अब तो मैं उनकी भाषा — छत्तीसगढ़ी — में ही बात करती हूँ।
धीरे-धीरे मैं भी उनके जैसी ‘गुठियाना’ बोलना सीख गई हूँ।”
उसकी निश्छल हँसी देखकर मेरे भीतर कुछ बदल गया। मैं समझ गई कि इस नई दुनिया में अपनापन पाना है, तो पहले मुझे खुद को थोड़ा बदलना होगा अगर मैं अधिकारी की बेटी बनकर अकड़ दिखाऊँगी, तो अकेली पड़ जाऊँगी। मैंने अपने भीतर थोड़ा परिवर्तन किया। पेटी की जगह साधारण बस्ता ले लिया।
जब कोई मुझे “पजामा वाली” कहकर चिढ़ाता, तो मुस्कुराकर कह देती —
“मेरे पास फ्रॉक भी है, कल वही पहनूँगी।”
धीरे-धीरे मैंने उनकी भाषा, उनका अंदाज़ अपनाना शुरू किया और कुछ ही दिनों में, मैं सबकी चहेती बन गई।
मेरी बड़ी बहन सुष्मा दी ने एक दिन कहा था- “यदि तुम सचमुच बहुत होशियार बन जाओगी, तो कोई भी तुम्हारा मज़ाक उड़ाने की हिम्मत नहीं करेगा।” उनकी यह बात मेरे मन में गहराई तक उतर गई।
उस विद्यालय की शिक्षिका सिंग़ मैडम आज भी याद हैं- वे बहुत सख़्त थीं, पर उनके पढ़ाने का तरीका अद्भुत था। वे बीजगणित को इस तरह समझाती थीं कि जैसे संख्याएँ बोलने लगी हों। शायद इसीलिए आज भी बीजगणित मेरा प्रिय विषय है। उन दिनों की याद आज भी मेरे हृदय में रची बसी है। जांजगीर का वह अध्याय, जहाँ मैंने सीखा था कि अपनापन पाने के लिए घुलना जरूरी है और आत्मसम्मान बचाने के लिए सीखना अनिवार्य ।
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१०. खंजन सिन्हा, भोपाल, मध्य प्रदेश
सखी! आज मन की कलम से लिख रही हूँ। सखी बचपन बहुत याद आ रहा है, इसलिए पुरानी बातें मन में हिलोर रही है तो सोचा चलो, बचपन के गलियारे में घूमकर आते हैं जब हम तुम कक्षा चौथी में पढ़ते थे। याद है वे दिन सन् १९५९ की बात होगी, हम ९ वर्ष के होंगे। राइट टाउन में रहते थे। हमारा तुम्हारा घर आजू-बाजू में था। तुम्हारे बाबा श्री राय साहब हमारे बाबा श्री कन्हैया लाल खरे आपस में दोस्त थे। हमारे बाबा रेल्वे में गार्ड थे, ५५ वर्ष में रिटायर हो गये थे। तब उन्होंने हमारे स्वर्गीय पिता श्री इन्द्र बहादुर खरे जी के नाम से एक जनरल स्टोर खोला था। उस स्टोर का नाम इन्द्र स्टोर रखा था। याद है तुमको वो स्टोर?, हम घर के स्टोर से पेन, पैन्सिल, रबर आदि लेते हुए स्कूल जाते थे।
सितारोंवाली फ्रॉक
सखी शोभना! हम-तुम दोनों घर से एक साथ स्कूल जाते थे। मढा़ताल पुत्री शाला में पढ़ते थे। रास्ते भर वो नई फ्राक जिसमें सितारे जड़े थे।हमारी माँ ने खुद अपने हाथों से सिली थी, सितारे भी उन्हीं ने टाँके थे। सितारे रात की रोशनी में खूब जगमगाते थे। फ्राक की बात करते-करते कब स्कूल पहुँच जाते थे, पता ही न चलता था। स्कूल की बहिनजी बुलाकर फ्राक देखती थी। रास्ते में भी लोग बुला-बुलाकर हमारी फ्राक की तारीफ करती थीं, साथ में माँ की बहुत तारीफ करते थे कि कितनी सुन्दर फ्राक सिली है तुम्हारी माँ ने।
बचपन का सावन
अब तो सावन का महीना चल ही रहा है। रह-रहकर बचपन के दिन याद आ गए। वो बचपन की शैतानियाँ जब स्कूल से लौटते समय जान-बूझकर बारिश में भीगते थे, बस्ते को फ्राक में छुपाकर रखते थे कि कहीं कापी-किताबें न भीग जाए। घर और स्कूल के बीच रास्ते में सावन का मेला भरा रहता था। उसमें कुछ चीजें जैसे लाख के कड़े, लाख के चपेटे सुंदर-सुंदर रंगों से सजे रहते थे। कान की बाली, झुमके और न जाने क्या क्या चीजें मन मोह लेती थी।
मटरू की चाट
उस समय घर के लोग पैसे कम ही देते थे या कहो पैसे देने का कोई रिवाज नहीं था। यदि किसी दिन दोपट्टी (दो पैसे का रुपहला सिक्का), इकन्नी (चार पैसे का सिक्का) सोने से पीली और चाँदी सी सफेद रंग में मिलती थी तो उन पैसों से कुछ खरीद लेते थे। स्कूल के गेट के बाहर मटरू कक्का अपनी चाट का ठेला लगाए रहते थे, नाम के अनुरूप मटर की चाट बेचते थे, पीले उबले मटर जिस पर लाल कुटी मिर्च चटनी डाल कर हरे पत्ते के दोने में देते थे। कभी आम का अमावट (आम पापड़) खाते थे। जैसे ही डेढ़ बजे की आधी छुट्टी होती, कुछ बच्चे उनको घेरकर चाट जल्दी बनाने को बोलते थे कि अभी छुट्टी खतम हो जाऐगी, जल्दी दो मटरू कक्का। वैसे घर से खाने का डिब्बा लेकर जाते थे पर कभी-कभी खरीद भी लेते थे। स्कूल के गेट के दूसरी तरफ रेवा ठेला लगाता था हरे-हरे पत्ते पर उबले बेर, जिस पर बिरचुन नमक डालकर देते थे, याद करो तो अभी भी मुँह में पानी आ जाता है। बिरचुन ( सूखे बेर कूटकर चूर्ण) भी खूब खाते थे। देशी चीजें खाकर बड़े हुए हैं। शाम को पूरी छुट्टी के बाद जब घर की ओर रुख करते थे। स्कूल और घर के बीच सावन का मेला लगा रहता था, मढ़ाताल में सतना क्वार्टर के सामनेवाली सड़क पर यह मेला लगा रहता था, इसी के बाजू में हमारा स्कूल था।
मन भावन सावन
वह सावन आज फिर यादों में हिलोर मार रहा है। लगा हम उसी मेले में घूम रहे हैं, खैर सावन का मेला घूमते घर आते थे। घर आकर माँ (विद्यावती) और दादी अम्मा (मानकुँअर) को मेले के बारे में बताते थे। तब वे लोग हम लोगों को फिर से मेला दिखाकर मन पसंद चीजें दिलवाती थीं। कम पैसों में भी बहुत सारी छोटी-छोटी चीजों से हमको खुश करती थीं। क्या दिन थे वो भी? वह सावन अब लौटकर नहीं आता है। केवल यादों में समाया रहता है। काश! वो दिन फिर लौटते? हम-तुम दोनों सखी एक ही शहर में रहते हुए भी व्यस्तता के कारण नहीं मिल पाए। खैर! चलो सखी फिर मिलते हैं उस बचपन के सावन को जीवंत करते हैं-
आओ सखी!
जीवन की साँझ बेला में
कब कहाँ मिलना है
किसी पार्क के झूले पर बैठकर
कजरी गाते हुए ,
किसी मेले में या माॅल में
हम तुम्हारा इंतज़ार करेंगे
मेहंदी से सजे हाथों में
खनकती चूड़ियों के साथ
रुनझुन पायल के साथ
हम तब तक इंतजार करेंगे
जब तक कि तुम
इन आवाजों के साथ
बचपन की यादों को लेकर
मेरी बाँहों में न आओगी।
तुम्हारी सखी
खंजन
गर्मी का गरम कोट
बचपन बीता जबलपुर के राइट टाउन के घर में। हमारी प्रायमरी शिक्षा जबलपुर की ही मढा़ताल पुत्री शाला जो कि श्याम टाकीज के बाजू वाली सड़क पर थी, में हुई थी।अब वह टाकीज नहीं है, उसे तोड़कर एक माल और दुकानें बना दी गई हैं। बात सन् १९५७ अप्रेल के महीने की होगी। गर्मी अच्छी पड़ने लगी थी। हम मढा़ताल पुत्री शाला में और हमारे बड़े भाई अमिय रंजन खरे जार्ज टाऊन स्कूल में पढ़ते थे। दोनों के स्कूल का मैदान एक ही था। छोटा भाई मलय रंजन स्कूल नहीं जाता थे पर बीच-बीच में हम लोगों के पीछे चला आता थे। उस समय इतने नियम-कानून नहीं थे। मलय हमारी कक्षा में बैठ भी जाता। हम कक्षा दूसरी में और बड़े भाई कक्षा चौथी में पढ़ते थे।
माता के टीके
अप्रेल के महीने में हमको माता (चेचक) का टीका लगा था। यह टीका हाथ में कलाई और कुहनी के बीच लगता था। तीन टीके एक साथ लगे थे। हमको उस टीके के कारण बुखार आ गया, हम तीन दिन तक स्कूल नहीं गए। स्कूल की गैर हाजिरी के कारण डर लग रहा था कि बहिन जी डाँटेगी। उस समय माँ पढ़ाने के लिए अपने स्कूल निकल गई थीं यह कहकर कि आज तुम स्कूल जरूर जाना तुम्हारा बुखार ठीक हो गया है। उनके आदेश का भी पालन करना जरूरी था। माँ नियम की बहुत सख़्त थी कोई बहाना नहीं सुनती थी। तब हमारे बड़े भाई अमिय ने कहा कि स्कूल जरूर चलो। हमारा गरम कोट पहन लेना, जबकि गर्मी अच्छी खासी थी । हमने भी उनकी बात मान ली। हम भाई-बहिन स्कूल की तरफ चले, रास्ते में कुछ लोग देख भी रहे थे कि गरमी में कोट पर वह उम्र ऐसी थी कि किसी की परवाह नहीं रहती। अब भाई ने रास्ते में ही हमको समझाया कि जैसे ही बहिन जी हाथ आगे करने को बोलेंगी, रूल से तुमको हथेली पर मारेंगी कि स्कूल क्यों नहीं आई? रूल उठाते ही तुम अपने पहने हुए कोट की बाँहें ऊपर की ओर खिसका लेना, यह देखकर कर तुमको मार नहीं पड़ेगी। हाथ में जो टीके लगे थे वे पककर पीले थे। ऐसा हाथ देखकर तुम मार खाने से बच जाओगी। फिर ऐसा हमको सही लगा तो हमने कहा कि हाँ, ठीक है। जब स्कूल पहुँचे तो डाँट नहीं पड़ी, बहिन जी को पता था कि हमको टीका लगा है। डाँट खाने से बच गए हम।
डर कर गया घर
याद करो तो अब बहुत हँसी आती है पर डर बहिन जी से लगता ही था। अभी भी किसी बड़ी हस्ती से डर लगता है, पता नहीं बचपन में कभी-कभी कुछ नकारात्मक विचारों से उबर नहीं पाते, जीवन पर्यंत घर कर जाते हैं। शायद पिताश्री का अल्प आयु में निधन होना ही दिमाग में घर कर बैठा होगा। वो बचपन याद करो तो लगता है कि कितने मूर्ख थे जिसने जैसा बोला वैसा ही कर लेते थे, अपनी बुद्धि नहीं लगाते थे। यही बात जब भाई-बहिन बैठते तो ज़रूर बोलते थे कि भाई इतनी गर्मी में तुमने हमको अपना गरम कोट पहनाकर स्कूल ले गये थे। बाद में हम लोग बोल बोलकर हँसी का ठहाका लगाया करते थे। हमारी यादों के पिटारे से निकली एक याद यह भी है।
श्रीमती खंजन सिन्हा: जन्म- २४ सितम्बर जबलपुर म.प्र.
पिता -
आत्मजा - स्व.श्रीमती विद्यावती खरे,व्याख्याता-स्व.प्रो.कवि इन्द्र बहादुर खरे, शिक्षा- बी.एस-सी., पति -स्व.श्री कृष्ण कुमार सिन्हा, इंजीनियर, प्रकाशित पुस्तक- समर्पित भावनाएँ, चित्रकारी, संपर्क- एम ३०३ गौतम नगर, चेतक ब्रिज के पास, भोपाल म. प्र. ४६२०२३
चलभाष- ९१६५४७१११४ ईमेल- sinhakhanjan@360gmail.com
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११. जहांआरा 'गुल' लखनऊ उत्तर प्रदेश
आज मैं कागज पर कुछ लिखने बैठी। मुझे मेरा प्यारा बचपन याद आने लगा। बचपन से सेवा की भावना दिल में रहीं। मैं डॉक्टर डॉक्टर का खेल खेला करती। इसलिए विज्ञान विषय को लिया। इसमें केन्द्र बिन्दु मेरी अभिलाषा हो रही और मैं उसके चारों और घूमती रही। जिस प्रकार हवाएँ जल को समुद्र से उड़ा कर ले जाती है लेकिन उसको जल के रूप में परिवर्तित कर बरसाने का काम गिरिमाला ही करती है। विचार एक ऐसी नदी है जिसकी गति अनन्त है । गर्मी की छुट्टीयो में गाज़ीपुर अपने चाचा के घर जाती थी। उनका घर बहुत बड़ा था। हैंड-पाइप बोरिंग भी थी लेकिन सीढ़ियाँ पत्थर की बहुत ऊँची-ऊँची थीं इसलिए.भिश्ती पीने का पानी मिट्टी के कुन्डे में भरता था। हमारे लिए यह बहुत नई बात थी उसके मशकिज़े को देखा करती थी जो अपनी पीठ पर लादे रहता था। घर के सामने टाउन हाल पार्क था जिसमें प्रदर्शनी लगती थी। तीसरी मंजिल से साफ दिखाई देता था, बाँस की सीढ़ी थी, उस पर जाने के लिए मेरे चाचा की लड़कियाँ, मेरी बहनें झट चढ़ गईं, मुझे खींच कर चढ़ाया गया, मैं सबसे छोटी थी। कुछ देर बाद सब लोग नीचे आ गए, मैं वहीं अटकी रही, उतर नहीं पा रही थी। तब बड़े अब्बा अपनी गोद में लेकर मुझे नीचे लाए।
घर के मैदान में कुल्फ़ी मलाई आवाज़ आते ही हम सब दौड़ पड़ते थे। कुल्फी वाला पत्ते का दोना बनाकर उसमें कुल्फ़ी मलाई देता था, हम मज़े लेकर खाते थे। मैं और मेरा छोटा भाई एक साथ बचपन में. आईस-पाईस, ऊँच-नीच, पतंग उड़ाना, गिल्ली-डंडा, सेविन टाईम्स जैसे खेल एक साथ खेला करते थे। पतंग उड़ाने में बहुत मज़ा आता था। कटी पतंग लूटने की होड़ होती थी। बिजली जाते ही बहनें, छोटा भाई, भतीजियाँ और मैं अन्ताक्षरी खेलने बैठ जाते थे। अंत्याक्षरी कभी फिल्मी गाने, फिल्मों के नाम या कविताओं पर होती थी। गर्मी आते ही बाग से आम आ जाते और बाल्टी में भिगा दिए जाते, हम सब मिलकर सारे आम खा जाते, बच्चों में जो ज़्यादा खाता, वह जीत जाता। |किसने अधिक आम खाए इसका पता गुठलियाँ गिनकर करते। गुड़िया-गुड्डे की शादी करते, मैं छोटी होने के कारण हमेशा गुड्डा लेती। मैं ने कक्षा ४ में गुड़िया के लिए पहली बार कीचह पंक्तियाँ लिखीं-
बेबी आपा की है गुड़िया।
सबसे प्यारी, सबसे न्यारी।
गुड़िया ब्याहने गुड्डा आया
थोड़ा लंबा, थोड़ा मोटा।।
मेरा लेखन कार्य कक्षा ४ से आरम्भ हो गया था। मेरे घर पर कवियों की नशिस्त (बैठकें) होती थीं। मैं उल्टा-सीधा लिखती, फिर उन्हीं लोगो से इस्लाह (सुधार) करवाती थी। यह लेखन कार्य लगातार चलता रहा, कभी धीमा हो गया कभी तेज। मुझे आज भी सिस्टर फ्लेरिना याद हैं जो कक्षा ५ में अंग्रेज़ी पढ़ती थीं, मैम कमलावती हिंदी पढ़ाती थीं। अरसे बाद मैं उनसे मिलने गई तो भी पहचान गईं।
कक्षा ७ की आर्ट प्रतियोगिता की याद दिल को बेहद खुशी दे जाती है। मेरा नाम स्कूल के नोटिस बोर्ड पर प्रथम स्थान पर लिखा था। साथी दोस्तों ने चारों तरफ से घेर लिया। मुझे इनाम और सर्टीफिकेट शहर के डी.एम. के हाथों मिला। मैं कक्षा में हमेशा प्रथम आती थी, एक बार द्वितीय श्रेणी में आ गई तो घर आकर रोना शुरु कर दिया। मेरे बड़े भाई ने कहा- ''तुम्हें फर्स्ट क्लास एक बॉडीगार्ड के सात मिला, दो बॉडीगार्ड होते तो और अच्छा था। मुझे अपनी प्राचार्य सिस्टर सैलीज़जा कभी नहीं भूलेगी। मेरी अम्मी की बाईं आँख का ऑपरेशन हुआ तो वे चेपल छोड़कर मेरी अम्मी को देखने आई। बचपन के दिन भी क्या दिन थे मैं उसके बारे में किखती चली जाऊँगी काग़ज़ कम पड़ जायेंगे। मैं अपनी लेखनी को यहीं विराम देती हूँ।
एक था बचपन हर चीज से बेगाना
जिसमे था खुशियों का खजाना
जिन्दगी थी जीने की पूरी कहानी
सुबह और शाम का नहीं था ठिकाना
अम्मा की दिलचस्प कहानियाँ थीं
कोई नहीं था किसी का फ़साना
बारिश में नाव बनाने की तैयारी
पानी में खूब भीगना और नहाना
गुड़िया की शादी धूमधाम से रचाना
सबसे शादी के तोहफे वसूल करना
छोटी-छोटी शरारतें करके उलझाना
हमेशा माँ-बाप से दुआएँ ही पाना
एक था बचपन हर चीज से बेगाना
जिसमें था खुशियों का खजाना
याद आते हैं बचपन के सुनहरे दिन।
प्यारे-प्यारे मौज-मस्ती वाले दिन ।।
तितलियों के पीछे-पीछे दौड़ लगाना
उनके रंग-बिरंगे पंखों को देखना
पल मे आँखों से ओझल हो जाना
एक एक फूल पर मँडराते रहना
याद आते हैं बचपन के सुनहरे दिन।
प्यारे-प्यारे मौज-मस्ती वाले दिन।।
पेड़-पौधे बनते छात्र, मैं टीचर होती
एक-एक कापी सबको देकर आती
खुद ही करती सबको पास और फेल
सपनों के स्कूल को धरती पर लाती
याद आते हैं बचपन के सुनहरे दिन ।
प्यारे-प्यारे मौज मस्ती वाले दिन ।।
०००
नवनीता चौरसिया
मैं, मेरा परिवार : सुधि फिर घिर-घिर घनी हुई है
यादें है उसकी ज्यों दुर्लभ नीलकमल।
वह प्यारा बचपन जो था अनघ अमल।
वैसे तो जीवन के हर कालखंड का अपना मजा है पर यदि किसी से उसके जीवन के स्वर्णिम काल की बात करें तो सभी एक स्वर में बचपन का ही नाम लेंगे।
ऐसे ही एक दिन जब आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' जी ने 'बचपन के दिन' नाम से संस्मरण को लिपिबद्ध करने का आदेश दिया तो मेरी स्मृतियों की गाड़ी सरर् से रिवर्स गियर में पहुंँच गई।
इन स्मृतियों का अरण्य इतना सघन है कि इसमें विचरते- विचरते 'क्या भूलूंँ क्या याद करूंँ' की स्थिति बन गई।
मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि और विरासत साहित्यिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है। यह मेरे लिए अत्यंत हर्ष और गर्व का विषय है।
मेरा पारिवारिक वातावरण पूर्णतया संस्कारित, गरिमामय था। बचपन दादा-दादी के प्यार, दुलार, डर और बड़े भाई बहनों के साथ अत्यंत निश्चिन्तता पूर्ण बीता। बड़े भाई बहनों के संरक्षण में खेलकूद के साथ-साथ पढ़ाई में भी मार्गदर्शन मिला। मैं एक मेधावी छात्रा के रूप में जानी जाती रही और शाला ही नहीं जिले में भी स्थान पाती रही।
मेरे दादाजी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय माणिक लाल जी 'मुसाफिर' न केवल जबलपुर परिक्षेत्र के अत्यंत सक्रिय और कर्मठ सेनानी थे वरन वे एक बहुत अच्छे कवि और मधुर, ओजस्वी गायक भी थे। वे कभी तबला हारमोनियम लेकर संगीत सभा सजाते तो कभी हमें स्वतंत्रता के लिए संघर्ष और अंग्रेजी जेल में यात्रा और यातना के किस्से सुनाते। हम सभी सुनकर बड़े रोमांचित होते और हमारे बाल मन में राष्ट्र प्रेम की अजस्र धारा प्रवाहित होने लगती। बड़े भैया मुट्ठी दिखाकर कहते- "अंग्रेजों को मारूंँगा।"
दादा जी को हम लोग बाबूजी कहते थे। बाबूजी संगीत सभा में स्वरचित देश भक्ति गीतों के साथ-साथ फिल्मी गाने भी सुमधुर स्वर में गाते। बड़े चाचा कृष्ण कुमार 'पथिक' भी स्वरचित गीत सुनाते और छोटे चाचा इं. गोपाल कृष्ण 'मधुर' भी अपने हँसोड़ स्वभाव से हमें हंँसाते हैं और स्वयं भी स्वरचित गीत सुनाते।
कभी-कभी बड़ी बुआ कमलेश और पापा जी जवाहरलाल 'तरुण' युगल स्वरों में लता मुकेश और लता मोहम्मद रफी के युगल गाते। वाद्य के रूप में रसोई के बर्तन, पीढ़ा, दरवाजे और चुटकियों से संगत देते। उनके स्वर इतने मधुर और सधे हुए थे कि दादी को लगता कि रेडियो बज रहा है।
उस वक्त मनोरंजन के साधन के रूप में रेडियो ही मुख्य उपकरण हुआ करता था। घर में मर्फी रेडियो होना बड़े सम्मान और गर्व की बात होती थी। घर में सजे हुए मर्फी रेडियो में ही मैंने आकाशवाणी जबलपुर से बाबूजी माणिक लाल जी और पापा जी जवाहरलाल जी की कविताओं और वार्ताओं के प्रसारण सुने हैं। तब मैं अपनी सहेलियों के घर जा जाकर बताती कि मेरे दादा और पापा रेडियो में बोलेंगे। जब हम सहेलियों में लड़ाई होती तो एक मुद्दा यह भी होता कि तेरे पापा या दादा रेडियो में आते हैं क्या?
पापा जी जवाहरलाल 'तरुण' जी मध्य प्रदेश के शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय नरसिंहपुर में हिंदी के विभागाध्यक्ष थे। मेरा ज्यादातर बचपन मध्य प्रदेश के इसी नरसिंहपुर जिले में व्यतीत हुआ। नरसिंहपुर एक शांत-सा शहर। जिसकी हवाओं में धार्मिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक महक थी।
शहर के इस इकलौते महाविद्यालय में समस्त युवा अध्यनरत थे। पापा जी अपने अध्यापन के रोचक तरीके और विषय पर पकड़, विद्वत्ता के कारण विद्यार्थियों के मध्य अत्यधिक लोकप्रिय थे। इसका पता हमें तब चलता था, जब हम उनके साथ कहीं जाते थे तो अनेक युवा उनके चरण स्पर्श करते थे।
नरसिंहपुर शहर का नामकरण विष्णु भगवान के नौ अवतारों में से एक नरसिंह भगवान के नाम पर पड़ा। यहांँ नरसिंह भगवान का पांँच मंजिला मंदिर विद्यमान है। हमारे स्कूल जाने के रास्ते में ही यह मंदिर था तो हम सभी सहेलियांँ अपने-अपने बस्ते मंदिर परिसर में ही रखकर नित्य ही नरसिंह भगवान के दर्शन करते। तब शायद बाल मन में भगवान के दर्शन से ज्यादा वहांँ से पाए जाने वाली प्रसाद (जो ज्यादा पेड़े या मीठी चिरौंजी हुआ करते थे) के लिए मन लालायित रहता था।
पांँच मंजिल मंदिर में भगवान की मूर्ति बीच की मंजिल में स्थित थी। मूर्ति के नीचे वाला तलघर तो हमने स्वयं देखा था, जो सीलन की अजब-सी गंध से परिपूरित था। सबसे नीचे वाले तल के बारे में किंवदंती थी कि वहांँ खजाना है, जिसकी रक्षा सर्प करते हैं और उन सांँपों के पंख हैं। उड़ने वाले सर्प की कल्पना से ही हम बच्चे दहल जाते। वहीं मंदिर में दाहिनी ओर एक दीवार ज्यादा पुरानी नहीं थी। कहा जाता था कि वहांँ से मंडला तक जाने के लिए गुप्त दरवाजा और सुरंग थी। जिसका उपयोग दुश्मनों से मुकाबला करने के लिए देशभक्त किया करते थे। जिसे आजादी के पश्चात बंद कर दिया गया।
मैंने विद्यालय में सभी शिक्षकों के कुशल निर्देशन में अध्ययन किया। मैंने अबोधावस्था से ही घर में सभी को कोई न कोई किताब का पठन करते हुए देखा तो मेरे बाल मन में यह बात बैठ गई कि किताबों में जरूर कुछ अच्छी बात होगी, तभी तो सभी किताबों को पढ़ते रहते हैं। जब पहली कक्षा में अक्षरों को जोड़कर और फिर मात्रा के ज्ञान के पश्चात जब वाक्य पढ़ना सीखा तो धीरे-धीरे नंदन, चंपक से भी दोस्ती हो गई। उम्र के साथ यह दोस्ती कहानियों से उपन्यास और कविताओं की ओर बढ़ गई। मैं अध्ययन के साथ-साथ सांस्कृतिक गतिविधियों में भी भाग लेती और पुरस्कार प्राप्त करती। मुझे याद आ रहा है जब मैं कक्षा पांचवी में थी तब जिला स्तरीय निबंध प्रतियोगिता में मुझे जिले में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ था और किसी बड़े मंत्री के हाथों मुझे पुरस्कृत किया गया था। उस समय मुझे और पापा जी दोनों को ही पुरस्कार प्राप्त हुए थे। पापा जी को पुरस्कार क्यों प्राप्त हुआ यह मुझे अभी याद नहीं है। मुझे पुरस्कार के रूप में प्रमाण पत्र के साथ विल्सन पेन का जोड़ा दिया गया था। तब विल्सन पेन के अपने अलग ही जलवे थे। भई ब्रांडेड जो था।
पापा जी सुनाया करते थे कि उन्होंने शालेय जीवन में 'अरुणोदय' नाम से पत्रिका लिखी थी। मेरे मन में पत्रिका की बात घर कर गई और जैसे ही पांँचवी कक्षा की परीक्षा के पश्चात गर्मी की छुट्टियांँ आई तो हमने एक कॉपी लेकर सभी सहेलियों से उसमें कहानी और कविताएंँ लिखवाई और इस तरह हमने भी एक हस्तलिखित पत्रिका तैयार कर ली। जिसे हमने नाम दिया- "अरुणिमा"
जिसे बाद में हमारी प्रधानाध्यापिका सुश्री आशा तिवारी जी ने विशेष रूप से पुरस्कृत किया था।
तब पूरा मोहल्ला ही परिवार की तरह था। लोगों के घरों की छत ही नहीं दिल भी जुड़े हुए थे। सभी घरों में बेरोक टोक आना-जाना होता था।आसपास के सभी बच्चे एक साथ ही खेला करते थे। इसमें उम्र या ओहदा भी बाधा नहीं बनती थी। सो माली परिवार की बिटिया भी हमारी टीम में शामिल थी। हम छुपन छुपाई, चीटी धप, पिट्टू (सितोलिया), इंकी पिंकी व्हाट कलर के साथ-साथ कंचे, गुल्ली डंडा, और पतंगबाजी का भी आनंद लेते थे।
तब महिला मंडल में हर माह सुंदरकांड का पाठ होता था। मैं मम्मी के साथ सुंदरकांड के पाठ में जाया करती थी।
गर्मियों की लंबी दोपहर में मैं और मुझसे दो वर्ष बड़े भईया अनुराग घर पर ही कुछ नवाचार करते। हम अलमारी के दो अलग-अलग खंडों को सुंदर ढंग से सजाते (जिसे हम दुकान कहते थे)और किसका ज्यादा सुंदर सजा है, इसका निर्णय बड़े दादा भैया अंशुमान या जीजी संगीता करतीं। सजावट के लिए प्लास्टिक के फूल (जो ज्यादातर बारातियों को बांँटे जाते थे), भगवानों के चित्र, और कागज के स्व निर्मित खिलौनों का उपयोग करते। भैया और जीजी बारी-बारी से हमें विजेता घोषित करते। ताकि हममें लड़ाई न हो।
जीजी संगीता अनुजा अस्मिता 'शैली' को गोद में लेकर झूले में झूलती हुई "दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी अखियांँ प्यासी रे" गाया करतीं।
ऐसी अनेक मधुरिम यादों से हमारा बचपन सजा हुआ है।
हमें अच्छी तरह याद है कि पापा जी दैनिक स्नान के पश्चात सिर्फ अधो वस्त्र में ही रामचरितमानस का पाठ करने के लिए पूजा घर में पधारते। पाठ करते समय उनके स्वर के उतार-चढ़ाव से ही हम समझ जाते कि आज मानस का यह अंश करुण, वीर या रौद्र रस का प्रतिनिधित्व कर रहा है।
पापा जी अनेक सामाजिक, शैक्षणिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक राष्ट्रीय संस्थाओं में भी सक्रिय रहे। इन संस्थाओं के अनेक सदस्य व पदाधिकारी समय-समय पर घर पर पधारते और पापा जी से विभिन्न मुद्दों पर चर्चा करते।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पांँचवें सर संघ संचालक श्री के एस सुदर्शन जबलपुर के राबर्टसन कॉलेज में विज्ञान के विद्यार्थी थे। पापा जी बताते थे कि सुदर्शन जी से प्रथम मुलाकात यहीं हुई थी। फिर संबंध धीरे-धीरे प्रगाढ़ होते गए।
सुदर्शन जी स्वयं हमारे घर पधारते और पापा जी के साथ राष्ट्रहित, राष्ट्रवाद जैसे विषयों पर चर्चा करते पर हमारे बाल मन के लिए यह विषय समझ से परे थे। तब कैमरा भी बड़ा कीमती, विलासिता की वस्तु माना जाता था। उस समय की कोई यादगार स्मृति के रूप में कोई छाया छवि हमारे पास उपलब्ध नहीं है। छवि है तो बस हमारे हृदय में... सुदर्शन जी का मुस्कुराता हुआ सौम्य स्नेहिल चेहरा।
भगवती धर बाजपेई जी (संपादक युगधर्म) भी हमारे घर पधारते थे।जो बाद में भारतीय जनता पार्टी के जिला अध्यक्ष बने।
विश्व प्रसिद्ध दार्शनिक, चिंतक ओशो (मूल नाम रजनीश चंद्र मोहन) पापा जी से कुछ वर्ष सीनियर विद्यार्थी थे। जबलपुर के डी एन जैन महाविद्यालय में दोनों के मध्य अनेक दार्शनिक मुद्दों पर चर्चा और व्याख्या का उल्लेख पापा जी हमेशा करते थे।
साहित्यिक महानुभावों में से अनेक लेखक, कवि, वक्ता घर पर पधारते थे और पापा जी भी उनके घर जाते थे। घर पर ही कभी-कभी साहित्यिक गोष्ठी आयोजित हो जाया करती थी।
पापा जी के साहित्यिक गुरु श्री रामेश्वर शुक्ल 'अंचल'(आधुनिक काल छायावादोत्तर स्वच्छंद काव्य धारा के कवि) भी बड़े अधिकार से घर आते और पापा जी को कभी कविताएंँ सुनाने के लिए कहते और कभी किताब छपवाने में विलंब के लिए उलाहना भी देते। हमारे पापा जी अंचल जी को बड़े प्यार और सम्मान से 'पापा जी' संबोधित करते। गुरु शिष्य का यह आत्मीय संबंध बड़ा अनोखा था, जिसमें स्नेह के साथ-साथ डाँट और मार्गदर्शन सभी सम्मिलित था।
पापा जी जबलपुर में हरिशंकर परसाई जी से भी उनके निवास पर आत्मीय मुलाकातों का जिक्र करते थे।
वे उज्जैन में श्री शिवमंगल सिंह 'सुमन' जी से भी रूबरू हुए हैं और उन्हें अपनी पुस्तकें भेंट की हैं। सुमन उपनाम भले ही फूल की तरह कोमल हो पर वे बलिष्ठ देह यष्टि, घने-घने बाल, अत्यंत गौर वर्ण के स्वामी थे।
परसाई जी और सुमन जी किसी विशेष परिचय के मोहताज नहीं हैं।
हमारे दादाजी माणिक लाल जी 'मुसाफिर' चूँकि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और साहित्यकार थे, इस नाते उनका संपर्क ज्यादातर ऐसे ही लोगों से था। वे हमारे पापा जी को साथ लेकर इन लोगों के निवास जाया करते थे।
भवानी प्रसाद तिवारी (स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, सुप्रसिद्ध कवि, वक्ता, लेखक, लोकप्रिय साप्ताहिक 'प्रहरी' के संपादक) से प्रथम मुलाकात का जिक्र करते हुए कहते थे कि वे किशोरवय में हमारे दादाजी के साथ तिवारी जी के निवास गए थे, जहांँ बड़ी आत्मीयता के साथ उनका स्वागत किया गया। दादाजी ने परिचय कराया- "यह मेरा बेटा है इसने अभी मैट्रिक पास किया है।" तिवारी जी ने मुस्कुरा कर कहा- " तो ये माणिक का जवाहर है।"
इसी कड़ी में वे आगे बताते थे कि पद्मभूषण सेठ गोविंद दास (स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, साहित्यकार, नाटककार) की बड़ी सी हवेली जिसे महल कहा जा सकता है मैं भी दादाजी के साथ जाया करते थे। सेठ गोविंद दास जिन्होंने सौ से अधिक पुस्तकें, नाटक लिखे। गांँधी टोपी,धवल कुर्ता- धोती, काले का चश्मा और चेहरे पर गंभीरता उनकी पहचान थी।
उनकी बेटी रत्न कुमारी अपने पिता की सच्ची उत्तराधिकारी थीं ।उन्हें किसी कार्यक्रम में मैंने मुख्य अतिथि के रूप में देखा था। सामान्य कदकाठी, गेहुंँआ रंग, धवल साड़ी में सादा जीवन उच्च विचार को सार्थक करते हुए उनका व्यक्तित्व सचमुच अनुकरणीय लगा।
पापाजी भवानी प्रसाद मिश्र (तार सप्तक के कवि, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी) को भी स्वरचित कविताओं को सुनाने की बात बताते थे।
ब्यौहार राजेन्द्र सिंह भी हिंदी के मूर्धन्य साहित्यकार थे। हमारे दादाजी के साथ उनका मृत्यु पर्यंत प्रगाढ़ संबंध बना रहा। इस नाते पापा जी के साथ भी उनका आत्मीय व्यवहार था। संतुलित देह यष्टि, दरमियाना कद, गांधी टोपी, बंद गले का काला कोट, और अधो वस्त्र के रूप में सफेद धोती उनके सिग्नेचर परिधान थे।
गीत ऋषि गोपाल दास 'नीरज' जी के बारे में बताते हुए वे स्मृतियों में खो से जाते थे। उन्होंने कई बार नीरज जी के साथ मंच साझा किए हैं। नीरज जी के साथ उनका नियमित पत्र व्यवहार था। वे पत्र मैंने भी पढ़े हैं।
कायस्थ रतन डॉक्टर पूरनचंद श्रीवास्तव जब भी घर पधारते उनसे बुंदेली में ही बातचीत होती। हम बच्चे चाय या जलपान लेकर प्रस्तुत होते तो पापा जी बताते कि "बेटा ये बुंदेली के प्रसिद्ध साहित्यकार हैं। रानी दुर्गावती पर इनका खंडकाव्य बहुत प्रसिद्ध है। बुंदेली में सृजन कर उन्होंने बुंदेली को सम्वर्धित और संरक्षित किया।" पूरन चंद जी इकहरे तन पर सादे वस्त्र, बिखरे-बिखरे से बाल और थोड़े गंभीर स्वभाव वाले लगते थे।
पापा जी झलकन लाल वर्मा 'छैल' जी के बारे में भी चर्चा किया करते थे।
वे प्रो. हरि कृष्ण त्रिपाठी, कृष्णकांत चतुर्वेदी, रामेश्वर प्रसाद गुरु, संजीव वर्मा 'सलिल' आदि अनेक प्रतिष्ठित साहित्यकारों का भी हमारे 'नीराजन गेह' आना जाना चलता रहा।
अधिकतर चर्चाएंँ पापा जी मम्मी जी या रिश्तेदारों, दोस्तों से करते थे मगर वे चर्चाएंँ हमारे कानों पर भी पड़ती रहती थीं।
हमारे बालपन में धुंधली-सी यादें अभी भी बनी हुई हैं। हमारे मन में साहित्य के प्रति लगाव और सृजन के पौध के बीज अबोधावस्था में इन सभी साहित्यकारों की चर्चा सुनकर या दर्शन मात्र से स्वत: ही रुप गए थे। जो समय पाकर अंकुरित हुए।
जब हम गर्मियों में छत में बिस्तर लगाते थे, तब पापा जी देर रात तक हमें हमारे महापुरुषों की कहानी सुनाते थे। वीर शिवाजी, महाराणा प्रताप, रानी दुर्गावती आदि की कहानियांँ हमने उनके मुखारविंद से ही सुनीं और आत्मसात की।
बचपन की ऐसी अनेक स्मृतियांँ जीवन की धरोहर हैं।
नवनीता चौरसिया 'नवनीत'
जन्म -24/09/72
पिता- स्व. जवाहरलाल चौरसिया 'तरुण'
माता- स्व. हेमलता चौरसिया
पति-*श्री विनोद चौरसिया
संतान- वागीशा, सुधि
शिक्षा- एम. ए.- इतिहास (गोल्ड मेडलिस्ट) ,एम एड.
अभिरुचि- गद्य व पद्य की विभिन्न विधाओं में सृजन।
प्रतिलिपि साहित्यिक ऐप पर सतत लेखन।
प्रकाशन- 'मन नवनीत' एकल संग्रह
साझा संग्रह- दस-
वंदे मातरम, भारत के त्यौहार विश्व कीर्तिमान स्थापित पुस्तकों में सहभागिता, चंद्र विजय अभियान,फुल बगिया, बुंदेली प्रभा आदि तथा
विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन
सम्मान- कादंबरी सम्मान, पाथेय सृजन श्री अलंकरण, प्रसंग काव्य सृजन सम्मान, काव्य प्रतिभा सम्मान, प्रतिलिपि गोल्डन वेज सम्मान, विभिन्न स्थानीय संस्थाओं द्वारा सम्मान आदि।
डाक का पता-
26, गांँधी कॉलोनी जावरा जिला- रतलाम (मध्य प्रदेश)
पिन-457 226
०००
१२. नीलिमा रंजन, भोपाल, मध्य प्रदेश
स्मृतियों की होड़
बचपन के बारे में सोचें तो अतीत की गलियों में भटकने लगते हैं, अनगिनत स्मृतियाँ होड़ करती सी कानों में सरगोशी करती हैं कि पहले हम, पहले हम। मैं यादों के अश्व पर सवार मैं लगभग सात दशक पूर्व पहुँच जाती हूँ, पफ स्लीव्स और सफ़ेद लेस की झालर वाली फ्राक, कंधे तक कटे बालों को झटकती, लँगड़ी और सितौलिया में जीतकर खिलखिलाती, पराजित टीम को मुँह चिढ़ाती, अपने आप को मैं ही नहीं पहचान पा रही हूँ, और कोई तो इसकी कल्पना ही नहीं कर सकता ।
मामा से ननिहाल
सत्रह सदस्यों के सम्मिलित परिवार में पली-बढ़ी सबसे बड़ी मैं, दादी, पापा, चाचा, मम्मी, चाची, छोटे अविवाहित चाचा, हम आठ भाई बहन और तीन चचेरी बहनें। ग्रीष्मावकाश तो क्या, हर रविवार के साथ वर्ष भर मनाए जाने वाले सभी तीज त्यौहार वृहद् उत्सव सरीखे होते थे। गर्मी की छुट्टियाँ तो दो भागों में बँटी रहती थीं- मामा के घर जाना और फिर बुआ और उनके बच्चों का यहाँ भोपाल आना। मेरे नाना-नानी दोनों मेरी माँ की बाल्यावस्था में ही चल बसे थे किंतु हमें कभी इस बात का एहसास ही नहीं हुआ कि हम ननिहाल के सुख से वंचित रहे। निस्सन्देह यह हमारे मामाओं और मामियों का ही स्नेह था जिसने हमें आज तक बाँधे रखा है। उन दिनों वार्षिक परीक्षा संपन्न हो जाने के बाद तीस अप्रैल को परिणाम आता था और एक या दो मई को हमारा मामा के घर जाना लगभग तय सा होता था। परीक्षा पूरी होने और परिणाम के बीच हमारी सारी व्यवस्थाएँ हो जाती थीं । हम सभी की तैयारी के साथ ही मामा के परिवार जनों के लिए उपहार की तैयारी माँ इतनी कुशलता से कर लेती थीं कि हम को कभी सोचना ही नहीं पड़ा। साथ ही चाची के मायके जाने की व्यवस्था भी इसी प्रकार होती थी। चाची के साथ मेरा एक भाई जाता था और हम सब में से कोई एक दादी के लिए घर रुकता था। उन दिनों यह व्यवस्था सहज ही मानी जाती थी, मेरे बच्चों को तो काफ़ी बड़े होने तक यह ही नहीं पता था कि कौन मेरी सगी बहनें हैं और कौन चचेरी? ये संबंध आज भी उतने ही आत्मीय हैं। पापा और चाचा को ग्रीष्मावकाश की सुविधा नहीं थी तो वे हमें लेने या पहुँचाने चले जाते थे ।
रेल यात्रा का आनंद
रेल यात्रा लंबी होती थी पर उबाऊ नहीं और उसकी तैयारी, मैंने अपने बच्चों को जब कभी यात्राओं के बारे में बताया है तो उनको हँसी आती है कि रेल में जाने के लिए इतना आयोजन। अभी यात्रा तो प्रारंभ होने दीजिए, फिर आप सब भी लें उस आयोजन का स्वाद। अधिकतर एक या दो मई हमारी यात्रा प्रारंभ होती थी, भोपाल से दिल्ली और दिल्ली से बुलन्दशहर। हम सभी के पास माँ से छिपाकर साथ ले जाने के लिए रहता था बहुत कुछ जैसे काँच की अँटियाँ, गुल्लक के पैसे, गुड़ियों के कपड़े, गुलेल, कौड़ियाँ, विलायती इमली (उन दिनों हम सुल्तानिया इंफेंट्री लाइन्स में रहते थे और हमारी सारी कल्पनाएँ भी वहीं तक चल पातीं थीं) और भी ऐसा ही अगड़म-बगड़म जिसमें से कुछ तो माँ पापा से वहीं सेंसर हो जाता था। यात्रा के लिए टीन का बॉक्स ज़रूर होता था जिस पर आवश्यकता होने पर बैठा जा सके। होल्डाल, भोजन की डलिया और पानी की सुराही के बिना कोई यात्रा संभव ही नहीं हो सकती थी। भोजन की डलिया के मुख्य आकर्षण होती थी सूजी आटे की मठरी, शकरपारे और मीठी पूरियाँ। साथ ही रहता था मेथी-आलू का साग, सादी और बेसनी पूरियाँ, तली अरबी, अचार और लड्डू , मतलब एकदम दावत वाला वातावरण। हम भाई-बहनों के साथ सहयात्री भी अंत्याक्षरी, लूडो, साँप-सीढ़ी का आनंद लेते चलते। बड़ी होने के नाते मेरा कुछ अनुशासन तो चलता ही था पर साथ ही माँ के साथ यात्रा भर सबका ध्यान रखना, खाने-सोने की व्यवस्था करना भी मेरा काम रहता था। आज एसी कोच में मील्स का ऑर्डर देते और अलग-अलग बर्थ पर सोते समय अनेकों बार वह डलिया और एक बर्थ पर दो के सोने की व्यवस्था पीछे से मुस्कुराती सी लगती है।
जेब खर्च से ठाठ
हमारी ननिहाल की यात्रा का एक बड़ा आकर्षण होता था हम में से हरेक को रेल और बस यात्रा के बीच अपने अनुसार व्यय करने के लिए मिलने वाली राशि। वह राशि कभी बहुत अधिक नहीं होती थी किंतु उस राशि की घोषणा करने को यात्रा के एक दिन पूर्व पापा-चाचा का आदर-मान और उनके बिना कहे हर काम करने की तो जैसे होड़ लगी रहती थी। राशि हाथ में आते ही सबकी कल्पनाओं को मानो पंख लग जाते। ऐसा लगता था कि कब घर से रेलवे स्टेशन के लिए निकलें। रेल में बिठाकर सामान की गिनती करवा कर पापा उतर जाते। हममें से कुछ को तो बैठते ही बहुत तेज़ी से क्षुधा देवी त्रस्त करने लगतीं या फिर प्यास। हड़बड़ी में एकाध बार सुराही भी बेचारी शहीद हो जाती, फिर अगले स्टेशन से नई सुराही ले ली जाती। हर स्टेशन से चढ़ते खोमचे वाले सब की ऑंखें देखकर कभी उबले चने, काले अंगूर, खट्टी-मीठी लेमनचूस, नमक मिर्च लगे कटे खीरे, बिस्किट, केक, पत्तों पर कच्चे पक्के नमक लगे जामुन बच्चों को पकड़ाने में लग जाते। अब बारी थी हम सभी के कोष को व्यय करने की। इतना सरल नहीं था हमारी नन्ही सेना को क़ाबू में करना। बिना आपस में बात किए भी एक दूसरे की आँखें पढ़ना छोटे भी जानते थे और माँ की तो गरदन हिला देने से ही सब हिल ही जाते। शांति से यह निपटारे यात्रा पर्यंत चलते। हाँ, एक अघोषित नियम और था कि स्टेशन विशेष के प्रसिद्ध व्यंजन सबको माँ दिलवाएँगी। तो फिर झाँसी के भाजी बड़े-चटनी, ललितपुर की लस्सी, ग्वालियर के आलू बोंडे, आगरा के पेठे और दालमोठ और भी बहुत कुछ खाते-पीते खेलते यात्रा सहज ही संपन्न हो जाती। यदि रेल समय पर हो तो प्रात: ९ बजे तक दिल्ली पहुँच जाते थे। स्टेशन पर बड़े मामा के मुंशी जी के बेटे जगन मामा हमें लेने आते थे ताकि माँ को हम बच्चों के साथ बस लेने में सुविधा रहे। बुलंदशहर, दिल्ली से लगभग चालीस मील पर बसा सपनों के नगर सा। दिल्ली से बस में बैठाने से लेकर सामान इत्यादि का पूरा दारोमदार जगन मामा का होता। बस में बैठने के बाद घर पहुँच कर क्या क्या करना है, कौन कैसे मिलेगा, कौन रूठा होगा, सारी बातें मन में आती रहतीं ।
खाना-खजाना
बस अड्डे पर बड़े और छोटे दोनों मामा मिलते, साथ होते मामा के अर्दली दादा और मुंशी जी। बड़े मामा वकालत करते थे और म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन के मेयर भी हुआ करते थे । उनसे छोटे मामा भी वकील थे। वहाँ ऊपर कोट सड़क पर तिमंज़िला मकान था, नीचे बड़े से आँगन के चारों ओर बना बड़ा दालान, उसके दो ओर रहने सोने के कमरे, मामा जी के कार्यालय, तीसरी ओर चौका और भोजन करने की जगह व अचार, बड़ी, कचरी, पापड़ आदि रखने का छोटा सा स्टोर नुमा कमरा जहाँ बिना लालटेन दिन में भी कुछ दिखाई नहीं देता था। चौथी ओर गुसलखाने थे जिनमें बड़ी-बड़ी टंकियों में पानी भरा रहता था। आँगन के एक ओर आधी दीवार याद है जिसके पीछे एक ढँका कुआँ और हैण्डपम्प था। पहली मंज़िल पर खेलने के लिए जगह और छोटे मामा मामी के परिवार के कमरे थे। भोजन सबका साथ ही होता था। दूसरी मंज़िल पर मुंशी जी रहते थे लेकिन उनके घर की सीढ़ियाँ सीधे बाहर से ही जाती थीं । मामा के घर पहुँच कर मिलते प्रतीक्षारत ममेरे १२ भाई बहन (९ बड़े मामा के और ३ छोटे मामा के) और दोनों मामियाँ। कमरे में सामान रखवा कर सीधे नहाना होता था और फिर पेट पूजा। बड़ी मामी का स्पष्ट निर्देश रहता अन्यथा तो कोई नहाने को तैयार ही नहीं होता। नहा-धोकर सबसे पहले पेट-पूजा होती, चूल्हे की आँच की महक में साबुत लाल मिर्च से बघरी गर्मागर्म दाल, चावल, सब्ज़ियाँ, दिए में कोयले से बघरा रायता, तवे से उतरती गरम गरम रोटियाँ, कच्ची कैरी प्याज़ का कुचला, अचार, पापड़ और घी से तर कतरे मेवों से सजा हलवा। महाराजिन अम्मा और और बोलकर पेट से अधिक खिलवा देतीं साथ ही मामी का लाड़, अनंत।
बच्चों की महफ़िल
अब बारी आती कोषों के आदान-प्रदान की। हमारे साथ वहाँ ममेरे भाई-बहनें भी ख़ज़ाने लेकर तैयार रहते। आज भी वह प्यार मन में कहीं दस्तक देता है। वराण्डे से लगे एक बड़े कमरे में हम पूरी दोपहर बिता देते। बड़े मामा की एक बेटी मुझसे बड़ी थीं और एक छोटी, हम तीनों का गुट कैप्टन था। बैठकर गुड़ियों के कपड़े सिलते, चौपड़, शतरंज, पंचगुट्टे खेलते और दुनिया भर की बातें करते। भाइयों के अपने अलग खेल चलते। बीच-बीच में कुट्टी होती फिर मम्मी-मामियाँ मिट्ठी करातीं और छोटी उम्र के भाई-बहनों की देख-रेख हम बड़ी बहनें ही करते। वहाँ पहुँच माँ की अलग ठसक और हर पल छलकती हँसी से पहचान होती, जब पास-पड़ोस से दिन भर लोग आकर पूछते ,”लल्ली बिटिया आई हो, कब से तुम्हें देखना था। बाबू आयें तो घर आना ।” हम सब भी सामने आकर प्रणाम करते। तीसरे पहर कमरे में ही शरबत और तरबूज़-खरबूज़ की कटी फाँकें मिलती। पूरी तैयारी महाराजिन अम्माँ करतीं , परोसने का काम हम भाई-बहनों को बारी-बारी से करना होता। सूरज देवता के ढ़लते हम सभी आँगन में आ जाते और शुरू हो जातीं कंचे, सितौलिया, घोड़ा बादाम, पोशम्पा, नदी-पहाड़, लँगड़ी, छुपन-छुपाई, आईस-पाईस और ऐसे ही खेलों की बाज़ियाँ। मामा लोगों के आने के बाद रात का भोजन होता, रसे की सब्ज़ी , दो सूखी सब्ज़ियाँ पूरी या पराँठा,रात में पक्का खाना ही होता, (आज तो बच्चे भी रात में पूरी पराँठा मना कर देते हैं।), साथ होती आम की लौंजी, रबड़ी या अन्य कोई मीठा। भोजन के बाद दोनों मामा बैठते और नई नई गतिविधियाँ होतीं जैसे: पहाड़े, महानायकों की जीवनी से प्रश्न, भजन, नृत्य, परिचर्चा, रामचरितमानस मानस या राधेश्याम की रामायण की अंत्याक्षरी , महापुरुषों के द्वारा लगाए गए नारे। इनमें घर के सभी सदस्यों को भाग लेना होता। छोटे मामा गाते अच्छा थे , वे रामायण को फ़िल्मी गानों की तर्ज़ पर सुनाते थे।
मौज-मस्ती और खरीददारी
रात में आँगन में पानी का छिड़काव कर चारपाइयाँ बिछतीं, बिस्तर और मसहरी लगाई जातीं, तारों के नाम, सप्तर्षि और ध्रुव तारा जल्दी देख पाने की होड़ चलती रहती। प्रसन्न थके शरीर कब सो जाते पता नहीं चलता। प्रात: सूर्योदय से पूर्व ही बड़े मामा (वे आर्यसमाजी थे) की आवाज़ में गायत्री मंत्र का वाचन प्रारंभ होता। हम सब एक-एक कर उठते, बिस्तर घड़ी कर चारपाइयाँ उठाते और दैनिक कार्यक्रम निपटाते, बिना शोर-शराबे के। पूरे घर में मानो मंत्र से आच्छादित हो उठता। तैयार होकर कभी-कभी बाहर घूमने भी चले जाते। प्रात: कलेवा के लिए उपस्थित, भजिए-मुंगौड़ो के साथ गरम-गरम जलेबियाँ या कचौड़ियाँ और मलाई वाला दूध या समोसे-इमरतियाँ लस्सी और ना जाने क्या क्या। मौसमी फल हर भोजन में होते ही होते।
इन अवकाश के दिनों में कम से कम एक बार कुछ आयोजन ज़रूर होते। कम से कम एक बार रामायण, महाभारत या अन्य किसी पौराणिक पात्र की जीवनी से एक प्रसंग किया जाता। बाक़ायदा अभ्यास होता, मम्मी, मामी लोगों की साड़ियाँ देखी जातीं। मम्मी सिलाई अच्छी करतीं थीं तो साड़ियों से पोशाक और परदे हाथ से तैयार किए जाते। मामा लोग देखते, सराहते, शाबाशियाँ देते। आयोजन पूरा हो जाने के बाद सभी साड़ियाँ बिना फटे ज्यों की त्यों घड़ी कर जमा दी जातीं और इस प्रसंग की चर्चा चलती रहती। एक और रोमांचक दिन होता था खेतों पर जाने का। महिलाएँ और छोटे बच्चे घर पर रुकते और बड़े हम सब जाते। वहाँ सब्ज़ियाँ तोड़ना, नीचे गिरे जामुन और आम एकत्रित कर घर लाने का वह जोश आज भी उतना ही याद है। हम बच्चों के लिए एक बड़ा आकर्षण होता था, बुलंदशहर के बाज़ार में जाना और अपनी पसंद से कपड़े आदि ख़रीदना। मम्मी और दोनों मामी भी साथ जातीं। छोटी जगह और इतने सारे लोग। गिनती की दुकानें हुआ करतीं थीं और मामी को पता होता था कि कहाँ-कहाँ जाना है। हम सब मतलब ममेरे-फुफेरे भाई-बहन भी अपनी पसंद से कपड़े आदि लेकर घर आते और साथ में न्यौता दे आते मलाई क़ुल्फ़ी वाले को ।
उस समय सिले-सिलाए कपड़े तो मिलते नहीं थे तो वराण्डे में दर्ज़ी बिठाकर हम सभी के कपड़े सिलवाए जाते थे। मामा के बच्चों के भी वैसी ही डिजा़इन के कपड़े सिलवाए जाते थे वे दो फ्राकें सालों साल नई ही लगतीं। माह भर रूठना-मनाना, डाँटना-डाँट खाना, झिड़कना, शिकायतें करना चलता रहता और वापसी के लिए निकलते तृप्त, वर्ष भर के लिए अनगिनत यादों का अनमोल ख़ज़ाना लिए।
डॉ नीलिमा रंजन- जन्म ३ नवंबर १९५१ भोपाल, आत्मजा- स्व.सरला सक्सेना- स्व. जी.सी. सक्सेना, शिक्षा- एम. ए. अंग्रेजी, पी-एच.डी., संप्रति- सेवानिवृत्त प्राध्यापक अंग्रेजी, प्रकाशित पुस्तकें- युगे युगे शिशुपाल, अंगद उवाच, नैरंतर्य खंडकाव्य, अंग्रेजी कविता संग्रह लॉर्ड कृष्ण स्पीक्स, संपर्क- बी २१५, फ़ॉर्च्यून प्राइड एक्स्टेंशन, ई-८, त्रिलंगा, भोपाल मध्य पदेश चलभाष ९२२२९ ०९४०५ ।
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@पीयूष सेनशर्मा (Col retd)
Col Piyush Sen सेना से सेवानिवृत मूल निवासी जमशेदपुर से है, पिता सरकारी चिकत्सक के pd पर असीन थे बिलासपुर कोनी में, वही गुज़रा बचपन फिर दिल्ली में रामजस 2से स्कूल शिक्षा, और हंसराज college दिल्ली से cost and works accountancy करते सेना में select हुए, ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी चेन्नई से class 1गज़टेड अफसर पद पर नियुक्त हुए, विभिन्न दुर्गम परिस्थिति, ऑपरेशनल स्थिति में कार्यरत रहे 40 वर्ष l फिर मध्य प्रदेश सरकार के जिला सैनिक कल्याण अधिकारी के पद पर आसीन रहे l 2011 में सेवानिवृत हुए और साथ साथ विभिन्न राज्यों के सत्य साईं संगठन में सक्रिय योगदान देते रहे l
मैं Lt Col क्षितिज सेन एक बचपन का वाक्या साँझा जरूर करना चाहूँगा, उन दिनों पापा अहमदनगर में पोस्टेड थे, हम दोनों भाई बहन आर्मी स्कूल में पढ़ते थे, मैक इन्फ सेंटर एंड स्कूल होने के नाते पल्टन के बहुत यंग ऑफिसर्स कोर्स करने आते थे और मेरे मम्मी पापा बहुत सुहृदय थे इसलिए शाम होते प्रायः दस पंद्रह ऑफिसर्स हमारे घर धावा बोलते ही थे और मम्मी उनको खाना बना कर खिलाती, जो भी सब्जी मटन चिकन होता घर में वही बना कर खिलाती थी.
उन अंकल में से एक शुद्ध शाकाहारी थे इसलिए एक बार मम्मी ने उनके लिए पनीर की भुजिआ बनायीं थी और हमको बोला गया था देखो ये मत खाना,कम हैँ इसलिए केवल अभिमन्यु अंकल खायेंगे.टेबल पर खाना लगते ही मैंने मासूमियत से जोर से पूछ लिया, मम्मी कौन सा खाना कम हैँ हमको नहीं लेना, बस फिर क्या था पिताजी का चेहरा देखने लायक, बाकी अंकल लोग समझ गए सबने हँसते हुए कहा खाना कम है तो हम भी नहीं खायेंगे, पर मेरी मम्मी ने सम्हाल लिया स्थिति, बोली, हाँ बिलकुल पनीर की भुर्जी को कोई हाथ नहीं लगाएगा ये सिर्फ अभिमन्यु के लिए बनी हैँ बाकि खाना भरपूर हैँ जितना मन करें खाओ.उस दिन से फुसफूसा कर पूछ लेता था हूँ मैं, जोर से कभी नहीं.
एक वाक्या और, एक दिन घर पर पिताजी ने कॉमडेंट अंकल को खाने पर बुलाया, कई प्रकार के भोजन तो बने ही थे पर सौंफ दानी में आज कुछ एक्स्ट्रा देखकर मैंने पूछा माँ ये मैं खा लूँ?, माँ बोली नहीं कमांडेंट अंकल का गला ख़राब हैँ ये उनके लिए दवा हैँ, असल में वो पान स्वाद की खास टॉफ़ी पूना से मंगवाई थी. थोड़ी बची थी इसलिए माँ ने दवा कहकर खाने से रोका होगा. जैसे ही ओबेरॉय अंकल घर आये सीधे गुड इवनिंग अंकल कह कर मैंने उनसे कहा, आपका गला ख़राब हैँ न? मम्मी आपके लिए दवाई लायी है, मैं नहीं ख़ायूँगा, बस आपके लिए है,वो खूब जोर से हँसे और मम्मी को बोले मैम कौन सी दवा लायी हैँ जो क्षितिज नहीं खा सकता मम्मी झेपती हुई बोली अरे सब खा लेता हैँ इसलिए ये बहाना बनाया, फिर अंकल और मैंने दोनों ने सबसे पहले वो टॉफ़ी ही खाई.
अब समझ सकता हूँ मेरे मम्मी पापा को आज तक फ़ौज में क्यूँ याद करते हैँ पुराने ऑफिसर्स
@Lt Col क्षितिज सेन
१३. पुष्पा वर्मा, हैदराबाद, तेलंगाना
१४. भगवत प्रसाद तिवारी, जबलपुर
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पुनर्जन्म
सनातन धर्म के अनुसार जैसा कर्म पूर्व जन्म में किया हो, वैसा ही अगला जन्म चौरासी लाख योनियों में कहीं होता है। अपनी अधूरी इच्छाओं की पूर्ति हेतु मनुष्य योनि व अपने ही परिवार में भी जन्म होता है। मेरी दाई (दादी) यही मानती रहीं। मेरे बाबा की मौत कंजिया के मालगुजार से खरीदे छुलहा नाम के खेत पर उनके द्वारा पुनः कब्जा करने के मुकदमे के दौरान हुई थी। वे उस समय घर के सामने कुआँ निर्माण की अपनी तीव्र इच्छा की पूर्ति न कर पाए थे। दाई यह भी कहतीं कि मेरे बब्बू (पिताजी) के तीनों भाई पहले गुजरे थे, बाद में बाबा भी गुजरे। मेरा जन्म बाबा के गुजरने के साल भर बाद हुआ था। दाई कहती थीं कि स्वप्न में बाबा दिखाई दिए और कहा " मैं आ रहा हूँ, कुआँ निश्चित जगह पर ही बनाना है।" मेरे जन्म के साल भर होते-होते घर के सामने कुएँ का निर्माण हुआ। मुझे गोदी में लेकर दाई ने सब रस्म अदायगी की। मेरा नाम 'छदामी' रखा गया। दाई कहतीं कि जन्म बाद दीर्घायु हेतु मुझे मेरी मौसी दाई ने टुटके स्वरूप एक छदाम में खरीद लिया था।
थानेदार
मैं तीन साल का होनेवाला था। बब्बू गाँव के पटैल थे। पुलिस के सिपाही थानेदार गाँव में कोई वारदात होने पर गाँव आते तो हमारे घर के बाहर पड़े तख्त व बेंच पर बैठकर लोगों को बुला-बुलाकर पूछताछ करते व रुतबा दिखाते, किसी किसी को मार भी देते थे। १५ अगस्त १९४७ को देश स्वतंत्र हुआ। मेरा जन्म स्वतंत्र देश में २६ अगस्त १९४८ को हुआ था। तब भी गाँव के रईस व सरकारी मुहकमेवालों तथा जातिवाद का बोलबाला था। एक दिन परछी में थानेदार एक आदमी से कुछ पूछताछ कर रहे थे। दोषी कभी कुछ बोलता और कभी बोलता ही न था। मैं घर के अन्दर से बाहर बब्बू के पास आता, दाई मुझे बार-बार पकड़कर ले जातीं। इसी बीच जब मैं बब्बू के पास था तथाकथित मुल्जिम को थानेदार ने अपने हंटर से मार दिया, वह रोने लगा। मैं बब्बू की गोदी से भागकर रोनेवाले के पास चला गया, उसने मुझे गोदी में उठा लिया और दाई के पास ले जाने लगा। तभी थानेदार ने फिर हंटर से कूंदा, वह लड़खड़ा गया पर रुका नहीं मुझे दाई को दे दिया। बात आई गई हुई। मैं रोते हुए बाहर जाने को मचल गया। कुछ देर बाद थानेदार, सिपाही, कोटवार और बब्बू खाने के लिए बैठे, दाई परोस रहीं थीं। मैं दाई के आगे-पीछे घूम रहा था। इसी बीच थानेदार ने प्यार से मुझे अपने पास बुलाया, मैं न कुछ बोला और न गया। थानेदार ने अकड़कर कहा- ''मेरे पास आओ, तुम भी खा लो।'' मैंने गुस्से से उनके पास जाकर बोला- ''गंदे थानेदार।'' उसने मेरा हाथ पकड़ना चाहा, मैं एक तमाचा उसके गाल पर मारकर भागा। बब्बू ने मुझे डाँटकर पूछा- ''साहब को क्यों मारा?'' मैने कहा- "इन्होंने बाहर काका को मारा था इसलिए।" जबाब सुनकर सब सुन्न थे। तब थानेदार ने कहा- ''कोई बात नहीं मेरी गल्ती थी, मैंने बच्चे के सामने ज्यादती की थी, जो नहीं करनी थी।''
दिनचर्या
उम्र बढ़ने के साथ ही मुझ पर बब्बू-बऊ, दाई, दीदी, बुआओं, कुटुम्बीजनों, पड़ोसियों तथा गाँव के वातावरण का प्रभाव पड़ना शुरू हुआ। सबकी निश्चित दिनचर्या थी। बब्बू उठते ही सार (पशु शाला) में जाकर बैलों तथा भैसों को दाना-भूसा डालते। कभी-कभी मैं भी उनकी देखा-सीखी मदद करने का प्रयास करता। फिर वे नदी तरफ जाकर किसी ओट में टट्टी (शौच) कर, नदी के पानी से सफाई कर रेत-मिट्टी मलकर (तब साबुन उपलब्ध नहीं था) हाथ धोते। वहीं निंगुडी (नीम या बाबुल की टहनी) तोड़कर दातून करते हुए घर के अन्य सदस्यों को भी दातून लाकर देते। मौसमी खेती-बारी के हिसाब से खेतों तरफ जाते। जुताई आदि के समय बैलों को भी ले जाते। दाई-बऊ सुबह उठ जातीं लोटा लेकर अलग दिशा में टट्टी हेतु बाहर जातीं। शौच से आ घर में मुँह-हाथ धोतीं। कुम्हार सुअर पालते जो हर जगह मल को खाकर सफाई कर देते थे। औरतें दातून करतीं और जितवा से बिर्रा (गेहूँ-चना) की पिसाई करतीं, कभी कुनैता से धान दराई करतीं,कभी काड़ी -मूसर से चावल कुटाई करने आमने-सामने मचिया पर बैठतीं। फिर बऊ या बब्बू भैंस दुहते। ढोर खिरका जाने बाद गौशाला की सफाई होती। जंगल से लाई लकड़ी व गोबर से पाथे कंडे सुखाकर जलाए जाते थे। चूल्हे व सिगड़ी मिट्टी के बनते थे। कंडे हेतु गोबर बाड़ी में रखने के बाद शेष गोबर खाद के लिए तैयार गड्ढे में डाला जाता। यह काम मेहनत का होता, घर के सब सदस्य मिलकार करते, मैं यह सब लेटे-बैठे देखता, कभी उठकर मदद करने की कोशिश करता। गगरी-मटका को रस्सी से बाँधकर कुएँ से पानी भरा जाता था। दाई या बऊ मिट्टी के बने चूल्हा-सिगड़ी में लकड़ी-कंडे से आग सिलगाकर गाँव के कुम्हार द्वारा बनाई गई दुहनी (मिट्टी के बर्तन) में दूध गर्म करतीं। बऊ बिर्रा का आटा माढ़कर पानी लगा कल्ला (रपटनी) में पहले सेंक, फिर चूल्हे में खड़ी रखकर रोटी बनातीं। 'एक खड़ी, एक पड़ी, एक हाथ में डरी' रोटी बनाने की विधि थी। काँसे के बटुए में पानी गरम करने रखा जाता उसके ऊपर चावल की पोटली रखी जाती। भाप बनते चावल उबलते पानी में डाल दिया जाता फिर पसा कर पानी व माड़ अलग किया जाता। गाँव के पशु खिरका में इकट्ठा होते फिर चराने के लिए कभी ग्वालबाबा, कभी ग्वालिन दाई जंगल ले जाते और शाम होते लौटा लाते। यही लोग दीवाली की रात घर घर जा "हे हाहू" बोल बोलकर सबको जगाने का काम करते। घरों में दुधारु पशुओं को दुहकर सुबह-शाम दूध निकाला जाता था। खिरका में पशुओं के साथ सयाने भी जाते, आपस में हँसी-मजाक, लड़ाई-झगड़े भी होते। एक बार गाँव के ठाकुरों उत्तम सिंह, जनार्दन सिंह व गजराज सिंह ने गाँव के भूरा मनिहा बाबा और शारदा पंडित सहित कुछ और लोगों को लाठी-चाकू चलाकर मारा जिसमें भूरे बाबा की मृत्यु हो गई थी, कुछ दिन बड़ा डरावना वातावरण रहा, धीरे-धीरे सामान्य हो गया।
पाठशाला
गाँव में स्कूल था नहीं, सबने मिलकर छोटे बच्चों को गाँव में स्कूली शिक्षा दिलाने की ठानी। मोती बाबा ने अपना एक घर जहाँ कुआँ भी था, स्कूल को देने की घोषणा की, सबको नारियल चिरौंजी दाना बाँटा गया। हमारे घर के सामने एक घर काफी दिनों से खाली पड़ा था। उसकी सफाई, लिपाई-पुताई कर मेज-कुर्सी, ब्लेक बोर्ड, छड़ी, रूल, कलम-दावात व रजिस्टर का प्रबंध कर गाँव में रह रहे क्षत्रिय समाज ने एक क्षत्रिय परिवार के दामाद जिन्हें सब बरोंधावाले फूफा कहते थे, को पढ़ाने के लिए तय कर लिया। तय हुआ कि गरमी के बाद पाठशाला खुलेगी, पाठ्यक्रम के अनुसार पढ़ाई कराई जाएगी तथा गुरु जी के लिए हर लड़की-लड़का एक-एक मुट्ठी अनाज लाएँगे। जनवरी १९५३ में मेरे भाई का जन्म हुआ। मैं जब भी समय पाता, उसको देखता। एक दिन मुझे भी पाठशाला ले जाया गया। हमारे दाहिने हाथ से बाँया कान और बाँए हाथ से दाहिना कान पकड़ने में करीब १५-२० लड़का-लड़की हो गए थे। गुरू जी मेज के निकट कुर्सी पर बैठे थे, उनके सामने दोनों ओर टाट-फट्टी बिछी थीं जिन पर दाहिने तरफ लड़कों तथा बाईं तरफ लड़कियों को बैठना था। पहले दिन ८ लड़के व ६ लड़कियाँ आए। गाँव से बाबा मोती लाल व दशरमन गाँव के श्री राम सुजान शुक्ल कौंसलर विशेष अतिथि थे। जिनके बैठने के लिए कुर्सी, बेंच व दरी का प्रबंध था। पहले हम सबने खड़े होकर 'हे प्रभु आनंददाता! ज्ञान हमको दीजिये' प्रार्थना की। फिर कौंसलर साहब ने कहा कि पाठशाला को जल्दी ही सरकार से मान्यता प्राप्त होगी। बड़े जन चले गए तो गुरु जी ने हम बच्चों का बस्ता खुलवाकर देखा, सबका नाम पूछकर बैठाया और अ आ इ ई उ ऊ, इकनी एक दूनी दो आदि बुलवाया, फिर छुट्टी हो गई। मैं शरारती नहीं, एक झेंपू शर्मीले स्वभाव का बच्चा था यद्यपि गाँव के स्कूल में साथ में पढ़ रही गुलाब, गायत्री व श्यामल की चोटी जरूर खींच देता था। मेरे मित्र भी कम ही होते थे। गाँव में पंचम कुम्हार, पुरुषोत्तम तिवारी मेरे मित्र थे। पहली पहली बार स्कूल खुशी से गया, कुछ बच्चे रोते हुए आते दिखे पर मैं नहीं रोया कभी। साल कैसे निकल गया पता नहीं चला। अगले साल जुलाई १९५४ में कक्षा २ में आ गये। स्कूल १० बजे से ४ बजे तक लगता, बीच में खाने की छुट्टी होती थी। एक अर्दली राजभर समाज से आता जो परछी-कमरे सहित गुरू जी की मेज-कुर्सी साफ करने के अलावा हम लोगों की टाट पट्टी बिछाता व अरदली का काम करता। बुधवार को स्कूल १० बजे से १ बजे तक लगता। स्कूल जाने से दिनचर्या नियमित हो गई। सुबह उठते ही धरती माँ और दाई के चरण छूकर, कुछ लिखने-पढ़ने बैठता, पिछले दिन का बचा काम पूरा कर अगला पाठ याद करता। सुबह की दैनिक क्रियाएँ कर, नदी जाकर नहाता और अपने रोज के कपड़े खुद धो लाता, लोटे में जल लाकर पीपलवाले शिवलिंग और घर में रखे शिवलिंग पर चढ़ाने के बाद घर में एक छोटे सिंहासन में रखे भगवानों को नहलाता, चंदन घिसकर पहले भगवान को फिर खुद के माथे पर लगाकर बचा हुआ दोनों कानों व गले पर मल लेता, राम राम कहता रहता। इस तरह पूजा करना स्कूल जाने से पहले ही दाई व बब्बू साथ सीख गया था। पूजा करने के बाद बासी रोटी पर घी चुपड़कर नमक बुरककर खाता, दूध पीता और बस्ता व एक थैली में अनाज लेकर स्कूल चला जाता।
एक सीख
हम समय से कुछ पहले शाला पहुँचते और अपना मुट्ठी-दो मुट्ठी अनाज कमरे में रखी टोकनी में डाल देते, जिसे अर्दली कुठिया में भर देता। साल भर यही क्रम चलता। धीरे-धीरे आपस में मुकाबला होने लगा कि कौन ज्यादा अनाज लाया? एक दिन कंजिया (पड़ोसी गाँव) वाली लड़कियों ने 'हम लोगों से ज्यादा लाती हैं' कहकर मुझे चिढ़ाया। मैंने सोचा मुझे सबसे अधिक लाकर, सबसे आगे रहना है। मैंने उन तीनों से ज्यादा ले जाना शुरू कर दिया। एक दिन उनमें से एक ने पूछा 'चोरी से लाते हो या घर में सबको पता है?' उसने दाई को भी बता दिया। दाई ने 'कोई बात नहीं' कहकर सम्हाल लिया पर मुझे सीख मिली कि जो करो बड़ों को बताकर करो। गुरु जी हर दिन पिछले दिन का काम जरूर देखते थे। हम लड़के-लड़की भी आपस में एक दूसरे ने क्या कैसा किया देखते। सबमें आपस में स्नेह-प्रेम रहता था। एक साल बीतते बीतते पाठशाला सरकारी हो गई थी। एक नए गुरु जी आ गए। सत्र पूरा होने पर परीक्षा हुई, हम सब पास हो गए पर किसका क्या स्थान रहा, यह नहीं बताया गया।
एक और सीख
इस वर्ष पंचम कुम्हार को दूसरी और मुझे पहली रेंक का बताया गया था। वह निम्न जाति का होने के कारण हमारे घर न आता था जबकि मैं उसके घर निस्संकोच जाता था। उसके माँ-बाप कोई भेद-भाव नहीं मानते थे। उनके आँगन में हम जहाँ पढ़ते, वहीं भटे के तीन-चार पौधे थे जो बहुत फले थे। एक दिन मैंने उनमें से एक अच्छा गोल भटा सबकी आँख बचाकर तोड़कर अपने बस्ते में रख लिया। मैंने सोचा कि किसी ने नहीं देखा पर पंचम की माँ जिसे मैं दाई कहता था से यह छुपा न रह सका। जब मैं घर चलने को हुआ तो वह बोली- ''ये और भटे रख लो, बऊ को कहना भटे का भर्ता बना लेंगी। मेरे लिए भी मठा बचाकर रखेंगी मैं मटकिया भर मठा लूँगी। वह आई और मठा लेते समय बोली ''भटे बहुत हैं छिदमिया से कहना याद दिला देगा, मैं तोड़कर दे दूँगी मैं समझ गया कि मुझे भटा तोड़ते हुए देख लेने के बाद भी ने मुझे कुछ न कहा, न किसी से मेरी शिकायत की। मुझे झिझक सी लगी, तबसे मैं किसी की चीज उससे पूछे बिना न लेता।
खान-पान
मेरे घर में मेहमान के खाने-रहने व सोने का विशेष प्रबंध रहता था। मैं दाई के साथ ही रहता, एक ही बिस्तर में सोता। एक तकियादार पलंग बड़ी परछी में बिछा रहता था। बब्बू मोटी धोती व बण्डी पहनते, लाल रंग का छींटवाला गमछा हमेशा साथ रखते। नाश्ते में गुड़, नारियल व दूध पीते थे, चाय का चलन न था। दिन भर जहाँ भी काम होता रहते, दोपहर कभी-कभी नदी से नहा आते या घर में कुएँ के निकट एक बाल्टी पानी से नहा लेते और भगवान को प्रणाम कर रसोई घर में एक पीढ़े पर बैठते व दूसरा ऊँचे पीढ़े पर थाली रखते। बिना प्रणाम व आचमन किए भोजन न करते, प्रायः चुप रहकर खाते, भोजन की थाली काँसे की होती, लोटा-गिलास कभी काँसा तो कभी पीतल आदि के होते थे, स्टील का चलन न था। पहले दाल-चावल ही खाते, एकाध सब्जी, मठा, दही आदि जरूर होता, बऊ गर्म-गर्म रोटियाँ सेंकती जाती, परोसने का काम दाई, बहिन या बुआ करतीं। बब्बू फिर रोटी व चावल खाते। मैं कभी उन्हीं के साथ, कभी अलग बैठकर थाली में खाता। रोटी में शुद्ध घी बहुत होता था। मैं कटोरी में घी लेकर, बोरकर बोर-बोरकर रोटी-नमक खाता। अचार, सब्जी, दाल आदि बहुत कम खाता था। रात के खाने में दूध अवश्य होता था। दाई और बऊ सबेरे नहाकर आने बाद बासी जो भी होता खा लेतीन। किंतु दोपहर और रात का खाना बब्बू को खिलाने के बाद खातीं। खाने में चावल का पसावन प्रमुख होता।
घर-बाहर
घर में कौन कैसे रहता है, क्या करता, क्या पहनता-खाता-पीता है, कौन-किस काम से आता है, त्यौहारों में क्या होता, मेहमान कब आते-जाते, उनका स्वागत कैसे होता, एक दूसरे के साथ कैसा व्यवहार करते हैं आदि जानने की उत्सुकता बढ़ती ही जाती थी। हम चड्डी-बनियाइन के अलावा कमीज-पेंट, कुर्ता-पायजामा व मोजे-जूते भी पहनते थे। यदा-कदा गाँव निकल जाते, कुछ पड़ोसियों, कुछ गाँववालों से मिलते, कौन क्या है, पता लगता जाता। बब्बू गाँव के पटेल थे इसलिए भी मुझे सबसे प्रेम मिलता था। कुटुंब व पड़ोस के लोग, बुआ, दाई आदि सुनते-सुनते मैं भी पिता जी को 'बब्बू' कहने लगा था। परिवार में हमारा घर बड़ी पीढ़ी का था, इसलिए 'बड्डा घर' कहा जाता था। छोटी उम्र के बच्चे भी 'काका' कहलाते थे। गाँव में ब्राम्हण, ठाकुर (क्षत्रिय), पटेल (रजभर), बिहना (मुसलमान), ग्वाल, धोबी (रजक), ढीमर (बरऊ) ,बाबा जी (गोस्वामी), मनियार, नाई, कुम्हार (चकवैस), तेली (साहू), कोल और चमार जातियाँ रहती थीं। ब्राम्हणों में जगिनहा तिवारी, मनिहा-गुरैल्हा और कुछ दुबे भी थे। गाँव का हर घर कच्ची मिट्टी का खपरैलवाला होता, सबके घर के दरवाजे में लकड़ी के किवाड़ होते, कुछ गरीब लोग चटाई लगाते। घर के बाहर परछी हर घर में होती थी। हमारे कुछ घरों में व ठकुरासी में परछी बड़ी थी जिसमें तखत व बेंच रखी रहती थी।
सब जन होत न एक समान
गाँव के बीच में हनुमान जी की मढ़िया और नीम का बड़ा झाड़ था। यहाँ अखाड़े में नागपंचमी को कुश्ती होती थी, पत्थर के मुगदर पड़े रहते। पास ही बिहना की मढि़या, मनियार की मढि़या आदि थीं जिसे 'चौसठ जोगुनी' कहते थे। इसके अलावा कोल टोले में देवी की गांवाजारी मढि़या में देवी की कई मूर्तियाँ थीं, पीपल कैथा कै दो-तीन झाड़ थे। एक छोटी तलैया थी। गाँव के किनारे से लभेर नदी बहती है। नदी के किनारे पीपल के दो बड़े पेड़ थे, जिनके चारों ओर चबूतरा बना दिया गया था। एक पेड़ के चबूतरे पर शिवलिंग स्थापित था। नहान घाटों लाली कगरिया, निगुड़ी घाट व बेल घाट में पानी कब-कैसा है, उसके अनुसार पुरुष व स्रियाँ अलग-अलग घाट पर नहाते थे। ठाकुर घाट के पास श्मशान घाट में बरगद के ३-४ बड़े-बड़े झाड़ थे। गाँव के चारों तरफ खेती-बारी की जमीनें, अलग-अलग लोगों के आम के बगीचे, खजूर, जामुन, इमली आँवला, अमरूद के पेड़, कुछ गाँव के बाहर, कुछ घरों की बाड़ी के अंदर अब भी हैं। लोगों की हैसियत उसके घर और बैलों की जोड़ी से आँकी जाती थी। हम दो जोड़ी बैलवाले यानी दो हल के किसान थे, दो नौकर रहा करते एक श्यामल चौधरी जिसे हम काका कहते, दूसरा डुम्मा कोल जिसे सब डुम्मा भाई कहते। मौसम में जब जैसा काम आता हल चलाने, उन्हारी-स्यारी की फसलों में गहाई का, वे करते थे। साल में जितने दिन काम करते, उतने दिनों की मजदूरी लेते। तीज-त्यौहारों पर खाना खाने आते या परसा ले जाते। सबकी अच्छी खुराक होती, बड़े मजे से खाते। डुम्मा भाई तो काफी समय तक चावल रोटी पूड़ी बरा दाल कढी़ सब मस्त होकर खाते। मीठे में बिड़ैईं, गुझिया, लड्डू आदि जैसा त्योहार वैसा भोजन बनता। हर घर में साधनों के अनुरूप सब अच्छा खाते-पीते। पड़ोसियों व कुटुम्बियों में पकवानों का आदान-प्रदान होता। खाने के बाद में सुपाड़ी-तमाखू ,लौंग-इलायची व पान की माँग होती थी। जब गाय-भैसें जनतीं (बच्चा देतीं) तब कुछ दिनों दूध गाढ़ा निकलता जिसे 'तेली' कहते। इसे पकाकर तेली-सिवैंयो का न्यौता होता था। त्यौहारों में हर घर में पकवान ही पकवान होते। पुरुष आवश्यक सामान जुटा देते, औरतें ही साफ-सफाई, बनाई-धराई करतीं, लीपा-पोती करतीं। जब कुटुंब के लोग निमंत्रित होते तब उस घर की औरतें भी आकर न केवल बनाने बल्कि बर्तन धोने, रसोई-दालान साफ करने आदि में खुशी-खुशी हाथ बँटातीं। कुल मिलाकर पूरा गाँव खुश था, हर घर कुछ देने की दम और इच्छा रखता था, इक्के-दुक्के जो बेपरवाह होते, बाकी उन्हें भी सम्हाल ही लेते। कुछ लोगों की गलत आदतों से लड़ाई-झगड़े भी हो जाते, पहले तो समझ ही न आता यह क्या और कैसे हुआ पर बड़े लोग मिल-बैठकर गुत्थी सुलझा लेते। कहा जाता 'सब जन होत न एक समान, लेकिन सबका हो सम्मान।
पढ़ाई भी, पिटाई भी
गाँव में तीसरी कक्षा तक ही पढ़ाई होती थी। आगे पढ़ाई करने कछारगाँव जाना पड़ता था। गाँव से कक्षा ४ में चार विद्यार्थी मैं पुरुषोत्तम, तोडरलाल और पंचम चक्रवर्ती तथा कक्षा ५ में रामकृष्ण दुबे, कमल सिंह और तनकू राजभर थे। । रामकृष्ण घुर्रा घर से पैसेवाला व बहुत अकड़वाला था। ताश खेलना, बीड़ी पीना और गलत संगत उसके शौक थे। तोडरलाल व पुरुषोत्तम व पंचम चक्रवर्ती कभी उसकी तरफ़ होते, कभी मेरे साथ रहते। कुम्हारों में उनकी रीति अनुसार पंचम की शादी पहली में ही हो गई थी अब गवना भी होनेवाला था। सब छात्र उसको अक्सर चिढ़ाते, वह कभी स्कूल आता, कभी नहीं। तोडरलाल पढ़ाई से डरता, स्कूल जाने के नाम घर से निकलता, रास्ते के बगीचे में पूरे समय छिपा रहता, फिर जब हम लोग लौटते, हमारे साथ या उनके साथ घर आता। घुर्रा ने सबको धमकी दे रखी थी कि कोई घर में न बताना। 'आ बैल मोही मार' कौन खतरा मोल लेता, सब चुप रहते। मेरे बारे में उसने यह अफवाह फैला रखी थी कि मिलकर नहीं रहता, बीड़ी पीता है, घुर्रा के साथ ताश खेलता है, लड़कियों की संगत में रहता है आदि आदि। गाँव में इसी उम्र में सावधानी न बरतने से बच्चे बुरी संगत में पड़ जाते थे। एक दो बार पुरुषोत्तम व घुर्रा के साथ ऐसा हुआ भी। मैं बब्बू और बऊ की डाँट व भय से ऐसी संगत से बचा रहा और चौथी की परीक्षा में कक्षा में प्रथम रहा। मुझसे ५ साल बड़ी मेरी बैया की शादी छोटी उम्र में हो गई थी, तब मैंने पढ़ने स्कूल जाना शुरू ही किया था।प्राथमिक शाला में हर सुबह "जनगणमन अधिनायक जय हे" प्रार्थना होती थी, ५ कक्षाएँ, पाठक (शिक्षक) केवल ३ ही थे। रामसुजान शुक्ल दशरमन के तीसरे बेटे सुदर्शनप्रसाद शुक्ल जो मेरे बहनोई थे, कछारगाँव में पाँचवी कक्षा के शिक्षक थे। अधिपाठक साहू जी बहुत सख्त और अनुशासन प्रेमी थे, तनिक सी गलती पर पिटाई कर देते, बच्चों का सिर पकड़ दीवाल में दे मारते, हाथ ऊपर कर खड़े रखना, एक पैर से खड़ा रखना, हथेलियों पर रूल से पिटाई, कान खींचने के अलावा घुटने टेक खड़े रखना, कान पकड़ गुड्डी बन खड़े रखना उन्हें खूब भाता था। प्रार्थना करते वक्त हर कक्षा की अलग कतार होती। हर कक्षा में एक-दो लड़कियाँ होतीं, उन्हें या तो आगे खड़ा किया जाता या प्रार्थना स्टेज पर। शाला कप्तान झंडे के नीचे झंडा फहराने व सावधान-विश्राम आदि का अभ्यास कराता। प्रार्थना के बाद जिन लड़कों की शिकायत होती उन्हें रोककर समझाया व दण्डित किया जाता।
खेल और मेला
आम के मौसम में हम दो-चार साथी आमों के बगीचे की तरफ चले जाते। पुरुषोत्तम का एक घर खाली था उसके सामने ही नि:संतान मोती बाबा थे जो 'बड़ा काका' के नाम से जाने जाते थे, ने पहले अपने छोटे भाई प्यारे लाल की बेटीयाँ और फिर बेटे पुरुषोत्तम को गोद ले रखा था। उन्होंने कुआँ भी खुदवाया था। दोपहर में हम दोनों अपना बस्ता ले सीखते-खेलते, मोहल्ले की हम उम्र लड़कियाँ गुलाब, पुन्नई, सखी भी आ जातीं। हम लड़की-लड़का का भेद ही नहीं जानते थे, सब भोले बच्चे सहजता से खेलते रहते। स्कूल लगते ही वहाँ जाना बंद हो गया, बड़े लडके गुर्रा, कम्मू, तनकू, रामेश्वर, रामजी से भी मिलते। नदी के इस पार या उस पार कबड्डी, खोखो, गेंद भी खेलते पारियों में। बड़े लड़के जैसा कहते छोटे लड़के वैसा ही करते। नदी में बाढ़ आने पर देखते व पानी कम होते ही तैरना शुरू कर देते। अब मैं घर में दिन में कम ही रहता था। कछारगाँव में जब चौथी-पाँचवी पढ़ता था तो शाम को गेंद खेलते दो दल होते। चार-पाँच मिट्टी के टुकड़े एक के ऊपर दूसरा रखकर कपड़े की गेंद से एक छोर से मारकर उस ढेर को गिरा दूसरे छोर तक दौड़ लगाते, दूसरे दल के लड़के उस गेंद से ढेर गिरानेवाले को मारते, ढेर को न जोड़ पाएँ और गेंद लग जाए तो आउट। गिल्ली-डंडा, खो खो, कबड्डी भी खेलते। कबड्डी में त त त कर आने वाले को पकड़ने में मैं शायद ही चूकता, भले ही घसीटकर वह मध्य रेखा तक पहुँच जाते। छोटे-बड़े सब बच्चे एक साथ खेलते। बड़ों में पंजाब सिंह, छोटे, तम्बू मनिहा, रामकृष्ण दुबे बराबरी के लखन रजभर, बहादुर सिंह, पंचम चक्रवर्ती तथा छोटे में पुरुषोत्तम, सुकुन्नू आदि मेरे साथी थे। कक्का करोड़ी लाल के साथ एक दो बार कुम्ही-सतधारा मेला देखने गया, कठपुतली नाच देखा व जलेबी खाई।
झूठी शिकायत और पहला स्थान
एक बार मेरी शिकायत हुई कि यह बीड़ी पीता है जबकि यह सच न था। मुझे काफी देर तक गुड्डी तनाई गई। घर आकर मैंने बब्बू को बताया। दूसरे दिन बब्बू पाठशाला सीधे अधिपाठक पास पहुँचे और बिना कारण दंड दिए जाने पर आपत्ति कर बहनोई साहब को डाँट लगाई थी। उस वर्ष हम कंजिया, इमलई, इटली व कछारगाँव के ८-१० बच्चे पाँचवी में थे। बोर्ड परीक्षा के छ: महीने शेष थे। हम लोगों को दिन के अलावा रात में भी शिक्षक अपने घर पढ़ने बुलाते। ठंड में हम पैरा बिछाकर बैठते, अपने घर से ओढ़ने-बिछाने के कपड़े ले जाते और सुबह जल्दी उठ पाठक की निगरानी में रट्टा लगाते। सब अच्छे नंबरों से पास होना चाहते थे। अधिपाठक-पाठक व छात्र सब लगन से मेहनत करते। सबके अभिभावकों की भी दिलचस्पी थी। बोर्ड परीक्षा दशरमन गाँव में होती थी, आसपास के और भी स्कूलों के बच्चे आने थे। सब चाहते थे कि उनके स्कूल का विद्यार्थी नंबर एक आये। परीक्षा तिथि के १५ दिन पहले मुझे माता (चेचक) निकल आईं, स्कूल जाना बंद हो गया, परीक्षा के दिन भी बीमार था पर जिद्द थी कि परीक्षा देने जाऊँगा ही। बब्बू भी राजी हुए व एक घोड़े पर बैठाकर बब्बू दशरमन स्कूल लाए। सिहोरा से आए परीक्षक श्री झारिया जी ने मुझे बीमार देखकर परीक्षा में बैठने की अनुमति नहीं दी और कहा कि अमुक तारीख को भण्डरा में परीक्षा है, वहाँ आकर दे देना। परीक्षा के दिन जब भण्डरा गया तो चेचक न थी, केवल कमजोरी थी, हम एक दिन पहले ही घोड़े पर पहुँच गए। परीक्षा के दिन पता चला कि परीक्षक बीमार हैं, नहीं आ रहे, अब अमुक तारीख को मझगवां में परीक्षा होगी। मैं अपने स्कूल से अकेला ही था। तब तक मैं काफी स्वस्थ था व तैयारी भी अच्छी थी। दो दिन तक लिखित-मौखिक भाषा, गणित, सामाजिक अध्ययन, सामान्य विज्ञान विषयों की परीक्षा हुई। तीसरे दिन जब परीक्षाफल आया सब अवाक् रह गए, सभी विषयों में मैं ही प्रथम रहा, बब्बू भी वहीं लेने आ गए थे। हम खुशी खुशी घर आए व अगले साल कहाँ पढ़ना है, विचार होने लगा। सब बच्चे आगे की पढ़ाई के लिए बघराजी जानेवाले थे।
दुर्घटना
मैंने सिहोरा के ब्रम्हदत्त शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला में छठवीं में पढ़ने का फार्म भरा, चयन भी हो गया तभी एक दुर्घटना हुई। जामुन का मौसम था, गाँव में जो स्कूल मोती बाबा ने लिया था वहाँ की जामुन खूब फली थी। प्रवेश की तारीख के पहले हम कुछ लड़के जामुन के झाड़ पर चढ़ गए। मैं नीचे की डाल पर था, दो लड़के ऊपर की डाल पर थे। वह डाल टूटी तो एक लड़का ऊपर लटक गया पर दूसरा डाल सहित मेरे ऊपर गिरा। उसके भार तथा धक्के से मैं भी गिरा, सबसे नीचे मैं, मेरे ऊपर डगाल सहित राम विशाल (घुल्ली) गिरा, नीचे जमीन ठोस कंकड़-पत्थर वाली थी। दोनों को चोटें आईं, कई जगह छिला, मुँह और नाक से खून आ गया, आँखों में भी सूजन थी। हमें जुलाई के पहले सप्ताह में सिहोरा जाकर प्रवेश लेना था जबकि हम पहुँच सके दूसरे सप्ताह के बाद। वहाँ हमसे कहा गया दूसरे स्कूल में प्रवेश ले लो, सातवीं में भी अच्छे नंबरों पर प्रवेश मिलेगा, तब ले लेना। सिहोरा से १० मील दूर बहोरीबंद की तरफ कुआँ गाँव में दादी की छोटी बहिन रहती थीं। हम उनके घर रहे और कुआँ माध्यमिक शाला में छठवीं में नाम लिखवाया एक साल वहाँ पढ़े, फिर सातवीं में शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला सिहोरा में प्रवेश मिला।
मी टू
बचपन के १२-१३ वर्ष की आयु तक पारिवारिक-सामाजिक परिस्थितियों अनुकूल ही होता है। देहात में कुछ मध्यम आय वर्गीय ज्यादातर निम्न आय वर्गीय लोगों के लिए खेती व पशुपालन ही जीविका का साधन तथा जाति भेद से घिरा वातावरण था। यहाँ की हर याद कौतूहलपूर्ण है। परिवार में ही दाई, बऊ की छोटी-छोटी बातें कलह रूप लेकर, लड़ाई और गाली-गलौज तक पहुँच जातीं, दाई नाराज हो खाना न खाती, किसी से बोले बिना मुझे अपने पास से जाने न देतीं। फिर बब्बू-बऊ द्वारा उन्हें मनाने में घंटे दो घंटे नहीं, दो-तीन दिन लग जाते। मैं उस समय सहमा रहता, खुद भी न खाता। यह सबको फिर सामान्य बना देता। इस उम्र में कई-कई बार देखा दुखी हो पास-पड़ोस के में गाँव में भाग जाना, अति पीड़ा पहुँचाता। ५-६ साल की उम्र में पड़ोस के लड़के पत्ता (ताश) तथा लड़के-लड़कियों संग बहू बलंगा नामक खेल खेलते। यह सब स्कूल जाने पर बंद हो गया। गाँव में पढ़ते समय देखा कि कुछ सयाने दरबारी दुबे बाबा की परछी में चौपड़ खेलते है, कुछ बैठकर देखा करते हैं। एक बार निरंजन दुबे बिही देने के नाम अपनी बाड़ी ले गया, बिही खिलाकर कुछ गलत चेष्टाएँ की। उसकी बाड़ी से सटे चौधरी ने देखा तो तुरंत आकर मुझे अपने साथ ला घर में छोड़ा और कहा- 'अकेले न जाने दिया करें।' आजकल ऐसी कुचेष्टाओं को रोकने के लिए 'मी टू' आंदोलन होता है।
अंत भला तो सब भला
छठवीं पढ़ने के लिए कुआँ (कौड़िया) की माध्यमिक विद्यालय में मेरा नाम लिखवाया गया। मेरा सब खर्च बब्बू उन्हें देते। मौसी दाई का एक बेटा रामगोपाल तिवारी भी वहीं आठवीं कक्षा में पढता था। कक्षा शिक्षक राजेन्द्र प्रसाद पाठक थे। एक महीने में ही मैं स्कूल का अच्छा विद्यार्थी कहलाने लगा। पाठक जी पंडित भी थे, गाँव में पूजा आदि करवाते। तुलसी जयंती स्कूल में अच्छी तरह मनाई जाती। अखण्ड रामायण पाठ वे अपने घर में कराते। मैं भी चढ़-बढ़ हिस्सा लेता। मेरे रामायण गाने की सब प्रशंसा करते। संस्कृत के श्लोक पढ़ना भी उनसे सीखा। स्कूल में मंच से संस्कृत के श्लोक पढ़े, सबको पसंद आये। पंद्रह अगस्त में एक राष्ट्रीय गीत गवाया गया। तिमाही परीक्षा में प्रथम आया। कक्का रामगोपाल मुझे अपने से अधिक कामयाब होते देखकर चिढ़ते थे। मैं परिस्थितियों अनुसार ढल गया था, पाठक जी व उनकी माँ भी मेरा बहुत ध्यान रखतीं। दशहरा-दीवाली छुट्टी में घर आया था। पुरुषोत्तम व कुछ और लड़कों से मुलाकात हुई, बाद में वे फिर पढ़ने आए। मौसी, दाई लोग अपने खेत में भी ले जाते, जहाँ सब मिलकर धान काटते। गोपाल काका कभी साइकिल में पीछे बैठा ले जाते और लाते भी। एक दिन लौटते वक्त वह सायकल तेज चला रहे थे, मुझे डर लग रहा था। सायकिल ढलान में थी, डर के मारे अपने से उतरा तो गिर गया मेरे आगे के दाँत ओंठ से बाहर दंतौरी कट गई। सब तो चल ही रहा था। ठान लिया था अच्छे से अच्छे नंबर ले सिहोरा बी.डी. हाई स्कूल में ही पढ़ना है। जब हम रात में पढ़ने बैठते, गोपाल काका बत्ती बुझा देते और वह मेरे सोने के बाद बत्ती जलाकर खुद पढ़ते। यह बात मुझे अखरती। खैर अंत भला तो सब भला छठवीं में मुझे केवल छठवीं में ही नहीं पूरे स्कूल में सबसे ज्यादा नंबर मिले थे, आगे सातवीं पढ़ने के लिए सिहोरा चला गया।
परिचय भगवत प्रसाद तिवारी- जन्म- २६ अगस्त १९४८, इटौली (कंजिया) आत्मज- स्व। श्यामबाई-स्व. मोहनलाल तिवारी, जीवन संगिनी - स्व सावित्री बाई तिवारी, शिक्षा- बी.ई. (यांत्रिकी), व्यवसाय- पैतृक किसानी, अभिरुचि- धार्मिक साहित्य का स्वाध्याय। संपर्क- २३ नेहरू वार्ड, सी एम एस कम्पाउंड, घमापुर, जबलपुर म.प्र.।
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१५. भावना मयूर पुरोहित, हैदराबाद, तेलंगाना
सुहाना सावन
मेरा मैका मुंबई का है जहाँ बरसात अधिक होती है। हमने बचपन में बरसात के खूब मजे लिएहैं। हम बिलकुल छोटे थे तब बरसात के पानी में हमारे अभिभावक हमारे लिए कागज की नाव बनाकर पानी में छोड़ते थे हम बारिश में उससे खेलते-खेलते थे गुजराती बालगीत गाते थे-
मेरा मैका मुंबई का है जहाँ बरसात अधिक होती है। हमने बचपन में बरसात के खूब मजे लिएहैं। हम बिलकुल छोटे थे तब बरसात के पानी में हमारे अभिभावक हमारे लिए कागज की नाव बनाकर पानी में छोड़ते थे हम बारिश में उससे खेलते-खेलते थे गुजराती बालगीत गाते थे-
"आव रे बरसात!
धेबरियो परसाद
ऊनी ऊनी रोटली
ने कारेला नुं शाक।"
अर्थात्
आओ री बरसात!
तु है धेवर का प्रसाद
गरम गरम रोटियाँ
औ' करेले का साग।
जून माह में स्कूल शुरू होता है और जून माह से ही मुंबई में बारिश की शुरुआत होती है। स्कूल युनिफोर्म एवं अन्य शालेय खरीददारी के साथ हमें हमारे पापा डकबेग का रेनकोट और गमबूट (लॉंग बूट) भी दिलाते थे। कभी-कभी थोड़ा रिमझिम बारिश होता था तो हम जानबूझ कर रेनकोट नहीं लेकर जाते थे कि भीगने का मौका मिल जाए।
मेरे मामाओं का घर (ननिहाल) बोरीवली में हैं। हम सब कैन्हैरी कैव्स घूमने गये थे। बरसात की मौसम में सह्याद्रि पर्वत का रूप अद्भुत लगता था। रास्ते में करोंदे, जामुन, कैरी-आम आदि फलों तोड़ कर खाने का मजा अद्भुत था । अब तो बस याद ही शेष है।
मधुमती नदी में बाढ़
हमारा गाँव सौराष्ट्र में माधवपुर है। एक बार हम वहाँ ज्यादा रह गये थे। हम मधुमति नदी के किनारे घूमने गये थे। तब नदी में पानी जरा सा था। थोड़ी देर में काले बादलों से आकाश घिर गया। फिर थोड़ी ही देर में क्या जम कर बारिश बरसी कि पूछो मत। पाँच मिनट में नदी में बाढ़ आ गई। पानी पुरा मटमैले रंग का हो गया। गुजराती में इसे घोड़ापुर कहते है अर्थात घोड़े की तेज गति से नदी में पानी आ जाना। ऐसा जिंदगी में पहली बार देखा था। मजा तो आ रहा था पर अंदर से डर भी लगता था क्योंकि यातायात बंद हो गया था। चिंता हुई कि हम घर कैसे पहुँचेंगे? फिर हम सब भगवान की धुन लगाते रहे, थोड़ी देर में बारिश ने विराम लिया। काले बादल हटे। फिर बस आई और हम हमारे गाँव के घर में पहुँच गए।
पिताजी की बीमारी
अभी एक प्रसंग भारी मन से लिखती हूँ। बचपन से ही मुझे प्रकृति दर्शन का बेहद शौक है। जब तक अपने माता-पिता होते हैं तब तक हमारे अंदर का बचपन सलामत रहता है। एक बार मेरे भाई का फोन आया कि बहन हमारे पापा सीरियस है। मैंनें वोल्वो बस से मुंबई जाने का नक्की (निश्चय) किया। मुझे खिड़कीवाली टिकट मिली। मेरा मन भीतर से पापा रहेंगे या नहीं यह सोच कर छटपटा रहा था। मुझे तब उतना मेकअप का भी शौक नहीं था। अगले स्टेशन से एक फेन्सी महिला आई मुझे कहने लगी कि आन्टी मुझे वोमिटिंग (वमन, उबकाई) होता है मुझे खिड़की के पास बैठने दो। ऐसी व्यथा भरी अवस्था में भी मैंने प्रकृति दर्शन नहीं छोड़ा। मैंने कहा कि ए.सी. बस में खिड़की नहीं खुलती। बाहर पानी बरस रहा था, भीतर से मेरा मन पिता जी को देखने के लिए तरस रहा था। बरसात के साथ सफर बहुत ही लंबा लग रहा था। फिर भी मैं प्रकृति दर्शन करती रही थी। सह्याद्रि पर्वत डरावना लग रहा था। मुझे प्रकृति में मेरे पिताजी का दर्शन हो रहा था। घर पहुँची तो मेरे पिताजी तब जीवित थे। पिता जी को गले लगाते समय मेरे नैनो से सावन-भादों बरस पड़े थे।
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१६. मधुमिता साहा, राँची झारखंड
पति का नाम-श्री संदीप साहा
जन्म तिथि-3फरवरी
शिक्षा-स्नातक (अर्थशास्त्र)आनर्स
दायित्व:
मकस कहानिका हिन्दी पत्रिका की उपसंपादक
साहित्य कुंज के सचिव के पद पर
आवास-आनंद भवन,श्री नगर कॉलोनी, नामकुम-834010
राँची, झारखण्ड
मोबाइल नंबर- 9386299514
ई-मेल- madhumita.rnc2020@gmail.com
सरप्रराइज जन्मदिन पार्टी
बचपन की कुछ बातें हमारे मानस पटल पर यूँ सुनहरी यादें बनकर अंकित हो जाते है कि उन्हें भुलाना मुश्किल होता है। बचपन में मेरा जन्मदिन काफ़ी धूमधाम से मनाया जाता था। ये बात अलग है तब मम्मी-पापा मनाते थे और अब बच्चे। मेरा जन्मदिन आने वाला था और मैं अपनी फरमाइशों की लिस्ट के साथ-साथ अपनी सहेलियों की भी लिस्ट बना रही थी। मेरा जन्मदिन ३ फ़रवरी है। पापा ने १ तारीख को अचानक मम्मी से आकर कहा कि टिकटें हो चुकी हैं। हम सब कल पुरी के लिए निकल रहे हैं। मेरा तो सारा प्रोगाम ही चौपट हो गया। मैंने रूआँसे होकर मम्मी से कहा- ''क्या इस बार मेरा जन्मदिन नहीं मनाएँगे?''
मम्मी ने कहा- ''कोई बात नहीं, इस बार जन्म दिन नहीं, हम लोग बाहर घूमकर आते हैं। मुझे गुस्सा तो बहुत आ रहा था, कहीं जाने की इच्छा नहीं हो रही थी लेकिन जाना पड़ा। सारे रास्ते मैं गुमसुम बैठी रही। जन्मदिन न होने का गम जो था। समय पर हम लोग पुरी पहुँच गए।होटल में तरो-ताजा होकर मंदिर जाने का कार्यक्रम बना। मम्मी ने मेरी नई ड्रेस निकाली, मुझे दी और कहा कि पहनकर तैयार हो जाओ मंदिर जाना है। मैंने मम्मी से पूछा कि ये कब लिया? मम्मी मुस्कुराईं, मम्मी की रहस्यमयी मुस्कान मुझे समझ नहीं आई। हम सब मंदिर पहुँचे उस दिन ३ फ़रवरी था। पापा ने मेरे नाम से मंदिर में पूजा करवाई और कहा- ''कितना अच्छा है, आज जगन्नाथ मंदिर में तुम्हारी जन्मदिन की पूजा हो रही है।'' मुझे भी अच्छा लगा क्योंकि मुझे स्पेशल फील करवाया जा रहा था । हम सब फिर वापस होटल आए। मैने देखा पूरे हाल को गुब्बारे से सजा कर रखा गया था। पापा ने एक बड़ा सा केक मँगवाया था और उस दिन मेरी सरप्रराइज जन्मदिन पार्टी बहुत धूम-धाम से मनाई गई जो मेरे सब जन्मदिनों की पार्टियों से खास थी। मैं बेहद खुश थी। मम्मा-पापा ने मेरे लिये बहुत सारे उपहार लिए थे। उन्होनें मुझे गले लगाते हुए कहा- ''बेटा आपका जन्मदिन हम कैसे भूल सकते हैं? आप तो हमारे लिये खास हो। यह सुनकर मैं अपनी मम्मी-पापा से लिपट गई ।
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१७. मनीषा सहाय 'सुमन', राँची, झारखंड
कार्तिक की कुहासी भोर में तुलसी पूजन
मुझे हमेशा से सभी मौसमों में जाड़े का मौसम बहुत भाता रहा है। एक तो जब यह मौसम आता तो ढेर सारी छुट्टियाँ, वह भी बिना होमवर्क के साथ लाता है। पटना में हर वर्ष जाड़े के दिनों में शीत लहरी का चलना और गंगा से आती ठंडी जानलेवा हवाओं के कारण डी.एम. द्वारा स्कूल बंद किये जाने का समाचार हमारे मन को खुशियों से भर देता। कुहासे से भरी भोर देख कर मन प्रसन्न हो उठता, सुबह-सुबह छत पर जाकर कुहासे की आर्द्रता मुख पर महसूस करना और मुँह से गर्म भाप रूपी धुआँ छोड़ना हम सभी भाई-बहन का पसंदीदा खेल होता। हाँ, नीचे आने के लिये दादी और मम्मी की आवाज और नीचे पहुँचते बेशुमार डाँट हमारे साथ उनको भी पर्याप्त गरमाहट से भर देती। इन सभी के बीच में पापा, चाचा व ताऊ जी का चाय की चुस्की लेते हुए, अखबार में से छुपकर हमें चुपचाप रहकर खिसकने का इशारा करना, मनोबल को बढ़ाता, वहीं दादी का टोंकना- ''बाप की तरफ क्या देख रहे हो? मैं तुम्हारे बाप की भी माँ हूँ !''
बाप रे बाप! सचमुच उस समय घर में दादी का रुतबा आज के फिल्म की किसी महिला विलेन से कम नहीं था। मुझे याद है एक बार जाड़े के दिनों में दादी ने फरमान जारी किया 'कार्तिक माह' चढ़ रहा है, सभी बहुओं-बिटिओं को सुबह पाँच बजे भोर में तारों की छाँव में नहाकर तुलसी पूजन करना है, वह भी पूरे एक माह। मेरे लिये यह बड़ा एकसाईटिंग मामला था पर मेरी बड़ी चचेरी बहनों, मम्मी व चाची के लिये एक बड़ा सिरदर्द। आँगन के एक कोने मे लकड़ी का चूल्हा बना दिया गया, जिसमें बड़े से पीतल के हिडोंले में दो तीन बाल्टी पानी गर्म होने के लिये रख दिया जाता और सभी उसमें से पानी निकाल, नहा-धोकर सुबह तुलसी माता को दीप दान कर पूजा करते।
आरंभ के दो-चार दिन सब कुछ सामान्य रहा, फिर मम्मी व चाची ने कमर- पैर दर्द का बहाना कर समर्पण कर ऐलान कर दिया, उनसे यह न हो पाएगा। फिर धीरे- धीरे दोनों बड़ी बहनों ने बारी-बारी से अशुद्ध होने की बात कह साथ छोड़ दिया। अब बची मैं जो कि पाँचवी कक्षा में पढ़ती थी और दादी जो कि सब कुछ से निवृत हो चुकी थीं। हम दादी-पोती मिलकर पूरे माह तुलसी पूजन करते, फिर अँधेरे ही महावीर मंदिर जाकर 'पेहारी बाबा' के नाम का हवन-पूजन करते, कभी सूरज की पहली किरणों के साथ तो कभी कुहासों के बिखरते धुँए के साथ घर वापस लौटते, उस समय मुझे भी दादी के साथ वी.आई.पी. ट्रीटमेंट मिलता, आते ही गरमा-गरम दूध के साथ पोस्ता दाना/हल्दी और आटे का हलवा परोसा जाता। भले आज यह सब शायद ही किसी घर में होता हो पर उस समय के जाड़े का मेरा यह संस्मरण सबसे अनोखा और मजेदार है।
अरे हाँ! यादों में मैं कुछ इस तरह उलझ गई कि पूरे एक माह के बाद इसका उद्यापन करना और गंगा जी की पूजा पिता जी के साथ अँधेरे में ही गंगा जी में दीप-दान करना, पटना महावीर घाट पर लगे कार्तिक मेले से कपड़े की गुड़िया और खटिया खरीदना सब कुछ अविस्मरणीय है।
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१८. मनोरमा जैन 'पाखी', भिंड, मध्य प्रदेश
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१९. मीनाक्षी आनन्द 'शाकुंतलम्' अलीगढ़
बुद्धि के प्रकार
बात बचपन की है जब हम सभी भाई-बहन पढ़ते थे। हमारे साथ हमारे चाचा जी के बेटे भी रहते थे जो उस समय आगरा मेडिकल कॉलेज से एम. बी. बी. एस. कर रहे थे और मेरे सगे भाई फिजिक्स में एम. एस. सी. कर रहे थे। दोनों ही लगभग एक उम्र के थे और एक दूसरे को दर्शाते थे कि मैं तुमसे ज्यादा बुद्धिमान हूंँ और तरह-तरह से प्रमाण प्रस्तुत करते रहते थे अपनी बुद्धिमत्ता को साबित करने के लिए।
एक बार अपनी बुद्धि का प्रमाण देते हुए मेरे चाचा जी के बेटे ने हम सबसे कहा कि तुम सब लोग मुझे बुद्धि के प्रकार बताओ अर्थात बुद्धि कितने प्रकार की होती है? हम सभी लोग चुप हो गए। क्या बताते, बुद्धि कितने प्रकार की होती है अतः उन्होंने उत्तर दिया- ''बुद्धि तीन प्रकार की होती है- पहली कंबल बुद्धि, दूसरी कागज बुद्धि और तीसरी बाँस बुद्धि।''
भाई की बात सुनकर हम सभी लोग आश्चर्यचकित रह गए और यह जानने के लिए उत्सुक हुए कि इन विभिन्न बुद्धियों का क्या रहस्य है। भाई साहब ने हम लोगों को समझाना शुरू किया कि कंबल बुद्धि का मतलब जिसकी मोटी बुद्धि होती है जैसा कंबल होता है। यदि मोटी सलाई से उसमें छेद करें और सलाई को वापस निकाल देने पर कंबल वैसा ही हो जाता है जैसा वह पहले था। यानी कंबल बुद्धि वाले मनुष्य को कुछ भी समझा लो उसकी समझ में कुछ नहीं आता। दूसरे प्रकार की कागज बुद्धि यानी कागज पर अगर सलाई से छेद करो जितना बड़ा कागज पर सलाई का छेद बनता है उसकी बुद्धि में भी उतनी ही बात आती है न कम न ज्यादा , उसकी जानकारी बड़ी सीमित सी होती है। तीसरे प्रकार की बुद्धि को बाँस बुद्धि कहा जाता है क्योंकि ऐसी बुद्धि वाले व्यक्ति बहुत समझदार होते हैं थोड़ा सा बताने पर ही बहुत कुछ अपने आप सीख जाते हैं* जैसे यदि बाँस को थोड़ा सा छिला जाए तो वह अपने आप ही आगे तक छिलता चला जाता है। हम सबने उनकी बात को स्वीकार नहीं किया यह सोचते हुए कि कहीं यह अपने को बांँस बुद्धि वाला सदस्य तो नहीं समझते। अतः, मामला उच्च न्यायालय पहुंँच गया यानी पिताजी के पास, पिताश्री के दरबार में। सभी लोग मांँ के साथ पिताजी की बैठक में एकत्रित हो गए।
पापा ने मुस्कुराकर समझाना शुरू किया- ''बुद्धि के तीन प्रकार होते हैं यह मैं भी मानता हूंँ किंतु मेरे अनुसार १. व्यावहारिक बुद्धि, २. मध्यम बुद्धि और ३.अति बुद्धि।
मध्यम बुद्धि और अति बुद्धि का व्यक्तित्व होना अच्छी बात है किंतु समय अनुसार अपने आचरण और व्यवहार को बदलना व्यवहारिक बुद्धि कहलाता है। वही व्यक्ति उच्चतर और उत्तम व्यक्तित्व का मालिक होता है जो सही समय पर उचित बुद्धि का इस्तेमाल करें यानी व्यवहारिक बुद्धि का। इसके अतिरिक्त अति बुद्धि मनुष्य के लिए बहुत घातक भी होती है क्योंकि इस प्रकार की बुद्धि के मालिक को वे सही समय पर सही निर्णय नहीं लेने देती। मध्यम बुद्धि किसी को अपनी अधिकार सीमा में प्रवेश नहीं करने देती जबकि व्यावहारिक बुद्धि वाले व्यक्तित्व पर क्रोध और अहम् कभी अपना स्थान नहीं बना सकते।
अपने पिता की यह बात उस वक्त इतनी समझ में नहीं आई थी किन्तु अब जीवन के बहुत उतार-चढ़ाव देखने के पश्चात यह बात स्पष्ट होती है कि मनुष्य में व्यावहारिक बुद्धि का होना कितना आवश्यक है। अपनी कुशलता से उन्होंने सभी बच्चों के मध्य सामाजिक और व्यावहारिक व्यक्तित्व का ज्ञान, बुद्धि के प्रकार के माध्यम से सिखा दिया।
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मुकुल तिवारी "मुकुल', जबलपुर, मध्य प्रदेश
बचपन के दिन ""
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अतीत की स्मृतियों के झरोखे से यदि बचपन के दिन याद करें तो बहुत सारी बातें स्मृत हो आतीं हैं।बचपन के क्या दिन थे शायद ही कभी अब वे लौटकर आयेंगें।छल कपट से दूर निश्चल जीवन। कल क्या होगा कोई चिंता नहीं। वर्तमान का जीवन ही चिंता रहित आनंदमय। कक्षा पहली से आठवीं तक की स्मृतियाँ विचित्र होतीं हैं। जीवन का भोलापन जिसनें जो कहा मान लिया अपने दिमाग लगाने की अवश्यकता नहीं पड़ती थी। घर परिवार में सबसे बड़ी होनें के कारण बाल सुलभता ज्यादा दिन नहीं टिकी। दो बहन तीन भाई यानें पांच भाई बहनों का परिवार माता पिता तथा एक सहायक। एक दो लोग अचानक आने जाने वाले। यानें परिवार में लगभग नौ- दस सदस्यों का भोजन दोनों समय का यदि देखें तो लगभग बीस सदस्यों का भोजन चाय नाश्ता की व्यवस्था। परिवार में माँ, बुआ,बेटियाँ ही मिलकर भोजन तैयार करतीं थीं।रसोईघर एक बड़े कमरे के बराबर था। रसोई घर को चौका कहा जाता था। एक तरफ देशी मिट्टी का चूल्हा होता था। चूल्हे भी कई प्रकार के बनाये जाते थे। एसे चूल्हे जिसमें सामनें लकड़ी लगा कर जलाया जाता था जिसमें चाय बग़ैरह बनाई जाती थी,रोटी अथवा पूरी पराठे बनाएं जाते थे।एक बार में एक समान बनाया जा सकता था।ऐसे चूल्हे भी बनाये जाते थे जिसमें दो तरफ अथवा तीन चार तरफ से एक साथ दो या तीन चार चीजे एक साथ पकाई जा सकें ।आगे चावल किनारे की तरफ मोड़ पीछे भी कढ़ाई में सब्जी अथवा बटलोई में दाल पकाई जा सके। आगे तवा चढ़ा कर रोटी सेक कर अंगार में रोटी फुलाई जा सके जिससे फूली हुई चपाती बनें। क्या स्वादिष्ट भोजन बनता था चूल्हे में जिसके तो अब स्वाद ही याद हैं। अधिकांश खपरेल वाले घरों में बरसात के दिनों में छप्पर एवं मलगों से टपाटप पानी चूता था। बरान्डा मिट्टी की गुर्शि कंडा अथवा छोटी छोटी लकड़ियाँ जला कर सुखाया जाता था।आज भी मुझे याद है कि खपरों के बीच से धुँआ निकलता था। जो थोड़ी देर में बादलों में समा जाता था। बरसात में गिली लकड़ींयों को जला कर भोजन जमीन में बैठ कर बनाया जाता था। घर घर सोला चलता था। कई घरों में तो महिलायें धुली आध गीली आधी सूखी एक साड़ी पहन कर भोजन तैयार करतीं थीं।चूल्हे के थोड़ा आगे राख से एक रेखा खीची जाती थी जिसे लक्ष्मण रेखा कहा जाता था उसके अंदर वही महिला रहती थी जो रोटी सेकती थी। हाँ रेखा के बाहर से रोटी बेल कर डाला जा सकता था।कुछ वर्षो बाद लकड़ी के कोयले अथवा पत्थर के कोयले,बुरादा की अंगीठी में भोजन बनाया जानें लगा। पानी गरम करनें के लिये तांबे, पीतल के हमाम होते थे जिसके बीच में गोल पाइप होता था जो नीचे से बंद रहता थे बीच के पाइप में लकड़ी अथवा कोयला जलाया जाता था । जिसकी आँच से घेरे में लगी टंकी में पानी गरम होता था।रसोई में पीतल, तांबें और लोहे, चीनी मिट्टी,देशी मिट्टी के बर्तन होते थे उनके अलग अलग नाम भी होते थे जैसे तवा, कढ़ाई,करछुल,गंज,भगोना,भगोनी,बटुआ,बटलोई,लोटा,गिलास,चम्मच, चम्मचा,कटोरा,कटोरी,थाली,प्लेट,परात,तश्तरी,पीतल , कांसा जिसे फूल भी कहा जाता था अथवा लोहे के होते थे।देशी मिट्टी के बर्तन भी होते थे।सामान्यतः दही मिट्टी के कटोरे अथवा हँड़ीया में ही जमाया जाता था।सामान्यतःचकला, बेलन,मथानी लकड़ी के होते थे।जमीन में पाटे पर बैठकर समनें पाटे पर भोजन की थाली रख कर भोजन किया जाता था। जब भी भोजन के साथ लौकी की सब्जी बनती बच्चों को कटोरी में खाने दी जाती बच्चे दाल और अचार के साथ चुपचाप भोजन करते और माँ की आँख बचा कर लौकी की सब्जी की कटोरी पाटे के नीचे छिपा कर रख देते थे।माँ बाद में देखती तब तक बच्चे अपनीं शाला चले गये होते।शाला से लौटकर जब बच्चे आते तब सुबह की लौकी की सब्जी न खानें पर बहुत डाट पड़ती,अब तुमको सब्जी खानें नहीं मिलेगी चेतावनी भी मिलती। दोनों समय परिवार में सभी अपनी सुविधा अनुसार एक साथ भोजन करते थे।सोला के कारण अधिकांशतः शाम को पक्का भोजन अथार्थ पूड़ी या पराठा और साग (सब्जी),चटनी, बिजौरा,पापड़ आदि बनाये जाते थे। चटनी सिल बट्टे में बारीक पीसी जाती थी।चना,मूंग,उड़द , के पापड़,बरी,बिजोरा आलू चिप्स,आलू के सेव, आलू के पापड़, बेसन के सेव,चूड़ा,बेसन की बर्फी,मठरी,मीठे,नमकीन खुर्मा,काचौडी़ सब घर में बनये जाते थे।आटा और मसाला पीसनें की चक्की,चना दरनें की दरोती, खल बट्टा,धान दरनें की खरल एवं मुसर सभी साफ सुथरा, सुरक्षित एवं व्यवस्थित रखा जाता था।
घर में अधिकांशतःखादी के सादे कपड़े पहने जाते थे।बड़े भाई या बहन के कपड़े छोटे भाई बहन पहनते थे जब तक पहनने लायक होते थे।अधिकांशतः महिलायें ही पहनने के कपड़े सिलतीं थीं।घर परिवार का कामकाज निपटाकर महिलायें घर के हर सदस्य के लिये एक से बढ़कर एक डिजाइनदार स्वेटर ऊन की सलाई,क्रोशिया,सेटल,यू पिन आदि से बुनतीं थी।घर में दर्जी बुलाकर शर्ट, पेंट, कोट सिलवा लिये जाते थे।तब रेडिमेड का जमाना नहीं था।घरों में बीच में आँगन जिसमें बीच में तुलसा गिरुआ जिसमें तुलसी जी का पौधा लगा होता था।चारों तरफ बारांडे उसके पीछे कमरे होते थे जिसमें एक बैठक खाना अवश्य होता था जिसमें तखत, लकड़ीं की केन वाली कुर्सियां आराम कुर्सी,स्टूल ,लोहे अथवा पीतल का नक्काशीदार पीकदान होता था। सामान्यः आये हुएअतिथियों का स्वागत स्वच्छ जल एवं पान, सुपाड़ी से होता था।चाय नाश्ते का चलन बहुत कम था। घर पर सिर्फ साइकिल वाहन होता था। केरियर वाली साइकिल से बच्चे डंडे के बीच से पैर डाल कर साइकिल चलाना सीखते थे। इस कला को कैची साइकिल चलना कहा जाता था। कैची साइकिल सीखनें के बाद डंडे के ऊपर से दोनों तरफ पैर डाल कर साइकिल चलाना फिर गद्दी पर बैठ कर साइकिल चलना सीखा जाता था।आठवीं तक आते आते बच्चे पिता की साइकिल चलाना चोरी छिपे सीख लेते थे। कुछ दिन बाद उस बच्चे को साइकिल दिलावा दी जाती थी जिससे वह घर के लिये आटा पिसवा कर ला सके बाजार से सब्जी ला सके या किसी को बुला कर लाना है तो जल्दी से बुला कर ला सके
मोहल्ले पड़ोस के सभी बच्चे छुआछुअल्ल,लुका छिपी,टीपरेस,मार गेंद,पिट्टू, टिक टिक लाल कौन सा रंग, गोल घेरा,आँख मिचोनि आदि घर केअंदर खेले जानें वाले खेल,अट्ठू ,चीटा, चीटी धप्प,सांप सीढ़ी,लूडोआदि अनेंक खेल खेलते थे। इमली अथवा सीताफल,कुम्हडा, संतरा के बीज,कौड़ी,रेत सिप्पी आदि से अट्ठू खेला जाता था, हार जीत में सबको मजा आता था।दीक्षितपुरा वाले घर में कई वर्षों तक अखंड कैरम खेला जाता रहा। चौबीस घंटे चार या दो लोगों की जोड़ी सुविधा अनुसार खेलती रहती थी। इसमें आयु का कोई बंधन नहीं था। जिसे खेलना आता था जो खेलना चाहता था खेल सकता था। इसमें बच्चे और पुरुष साथ खेल सकते थे।आस पास पड़ोस के परिचित दूर दूर से कैरम खेलनें घर पर आया करते थे।घर में गाय भी पली थीं जिनका नाम श्यामा,सुरभि कपिला,रामा था बछड़े का नाम रामू था।गाय को चारा देना, बाल्टी में पानी देनें का कार्य बच्चे ही करते थें।घर परिवार में अपनें से बडा़ कोई आता भी था चाहे वह गरीब हो अथवा अमीर सब बच्चे खड़े हो कर नमस्ते करते थे। मोहल्ला पड़ोस के सभी पारिवारिक संबोधन से ही बुलाये जाते थे जैसे जिज्जी,दीदी बहन जी,बुआ जी,चाचा जी,ननिहाल में मामा जी मौसी जी आदि ।
बहुत बचपन की यदि याद करें तो नाना - नानी जी भी आते थे ठहरते थें। नाना जी पण्डित बेनी प्रसाद पांडे जी भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। मालगुजरी परिवार से थे। नानी श्रीमती शिवप्यारी देवी पांडे जी का मायका उत्तर प्रदेश के जहनाबाद के पास ग्राम मकरंदपुर का था। नानी की माता श्रीमती पार्वती दुबे जी पिता जी पण्डित विशम्भर नाथ दुबे जी आनरेरी मजिस्टेट् फतेहपुर, उत्तर प्रदेश के थे। कचहरी घर पर लगती थी।अपने जीवन में चार धाम की चार बार बैलगाड़ी से की थी।घर पर बैलगाड़ी, घोड़ा गाड़ी थे। हाथी भी घर की शोभा बढ़ाते थे।महावत बच्चों को पीठ में बठाते थे।शादी ब्याह में बारात बैलगाड़ी में जाती थी। आकर्षक जरी के गोटे,लाल पीले नीले हरे रंग के रेशमी,शाटन कपड़े से सजी डोली में बैठ कर दुल्हनर घरआती थी। घर की लड़की भी डोली में ही बिदा की जाती थी।डोली दोनों तरफ से कहार उठाते थे।बड़ा ही सुहाना दृश्य होता था।मुझे माँ के ममरे भाई एवं ममेरी बहन के विवाह में शामिल होना का अवसर मिला जिसकी स्मृतियाँ आज भी तरोताजा हैं।
हमारे बचपन में संचार क्रांति का उद्धभव नहीं हुआ था। लोग दूर रहते थे किंतु आत्मा से जुड़े रहते थे। हमेशा डाकिये का इंतजार रहता था। डाकिया पोस्ट कार्ड,नीले रंग का अंतर्देशीय पत्र,पीले रंग का लिफाफा अथवा तार संदेश लेकर आता था। डाकिये को देख कर सभी खुश हो जाते थे।रिश्तेदारों की याद आनें लगती थी। एक दूसरे से पूछनें लगते थे किसकी चिठ्ठी आई। सब हाल चाल जाननें बेताब हो जाते थे।पिता के भाई बहन तथा माता का मायका, बड़ी माँ का मायका,चाची का मायका,दादी का मायका,नानी के मायके तक से रिश्ते जुड़े रहते थे। बहुत आत्मीयता थी। पड़ोसी का दामाद पूरे मोहल्ले का दामाद माना जाता था। क्या आत्मीय और सुनहरे दिन थे कहा नहीं जा सकता।उपभोगतावादी जीवन नहीं था,साधन,सुविधायें कम थे किंतु संस्कारिता,आत्मीयता का आनंद बहुत था।रसात्मता बहुत थी। भारतीय संस्कृति तीज के त्योहार मिलजुल कर मनाये जाते थे। जीवन में आये हुए संकट में लोग एक दूसरे के साथ देते थे।सच है क्या बढियाँ बचपन के दिन थे।
डॉ.मुकुल तिवारी "मुकुल'
पण्डित बालमुकुंद त्रिपाठी मार्ग,
राम मन्दिर के पास, म.क्र.५०७ दीक्षितपुरा, जबलपुर,म.प्र .
मो. ९१३११०९४१४
व्हाट्स एप. ९४२४८३७५८५
०००
रेखा श्रीवास्तव, अमेठी, उत्तर प्रदेश
[09:43, 11/12/2025] रेखा श्रीवास्तव डॉ, अमेठी: मेरा बचपन
स्कूल में श्रुतलेख में गलती
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हम गाँव के प्राइमरी स्कूल में पढ़ते थे कक्षा चार में थे ।उस समय हिंदी अच्छी करने के लिए
फुटकर कठिन शब्द बोले जाते थे ।
जिसको दूर -दूर बैठकर लिखना होता था ।कक्षा में एक लड़का ओम प्रकाश था वह भी पढ़ने बहुत अच्छा था ।कभी मेरे ज्यादा अंक होते थे कभी उसके ।
उस दिन श्रुत लेख में मैंने रुड़की में बड़े ऊ की मात्रा लगा थी । जो मुझे आज तक याद है ।।
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पहला मेला
दशहरे का मेला देखने पिता जी के साथ साइकिल पर बैठकर पहली बार गए थे घर से छः किलोमीटर दूर मेला लगता था । बड़े उत्साह से तैयार होकर नई फ्राक पहन निकले। खूब मेला घूमा चाट टिक्की खाई बीन खरीदा गुब्बारे लिए।खुब खुश थे ।रावण को देखा सीता राम की चौकी भी ।घर वापस लौटने को थे कि अचानक दाहिना पैर साइकिल की तिली में फँस गया।
मैं रोने लगी पैर छिल गया था तब पास में ही बस…
[23:16, 11/12/2025] रेखा श्रीवास्तव डॉ, अमेठी: स्कूल की पहली मार
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कक्षा चार में स्कूल में जाड़े के दिन थे गुरु जी ने सवाल दिया था भिन्न का ।मेरा सवाल गलत हो गया ।एक चांटा गाल पर पड़ा था
आज तक याद है ।।
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पकड़ा गया झूठ
मेैं कक्षा सात में थी हर महीना मासिक टेस्ट लिया जाता था ।हर विषय में मेरे नम्बर अच्छे रहते थे ।एक से तीन में मेरा नाम अवश्य रहता था । अंग्रेजी का टेस्ट हुआ। हमें दस में से साढ़े तीन नम्बर ही मिले थे ।और हर महीने रिपोर्ट कार्ड पर अभिभावक से हस्ताक्षर कराना होता था ।उस महीने मैं डर से पापा का हस्ताक्षर खुद करके स्कूल में जमा कर दिया ।उस प्रिंसिपल सिराजुन्निशा मंसूर थीं । वे हर कक्षा का एक -एक कार्ड चेक करती ।उस समय उनके सामने
सब्जेक्ट टीचर भी उपस्थित रहती।जैसे ही मेरा कार्ड उनके हाथ आया तुरंत मेरा बुलावा आया उन्होंने पूछा किसका हस्ताक्षर है मैं कुछ बोल न सकी।सिर शर्म झुक ग…
[23:29, 11/12/2025] रेखा श्रीवास्तव डॉ, अमेठी: नींद का बहाना
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रोज घर में मास्टर जी शाम को ट्यूशन पढ़ाने आते थे ।कभी -कभी जब मन नहीं होता था पढ़ने का तो मैं जान बूझकर नींद का बहाना करने लगती ।मास्टर जी कहते अब इसे नींद आ रही है । जाओ आराम करो ।ऐसे पढ़ने से बच जाती थी ।
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२०. वसुधा वर्मा, मुंबई, महाराष्ट्र
बचपन के दिनों को स्वर्णिम युग कहे तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। माँ की गोद में खेलना, पिता की उँगली थामकर चलना सारी बातें याद आती हैं। मैं संयुक्त परिवार से हूँ, परिवार में दादाजी की अहम भूमिका रही। मेरी दादी स्वर्गीय इंद्र बहादुर जी कवि की मौसी थी। मेरे पिताजी चार भाई थे पर पिताजी, चाचाजी सभी बहुत छोटे थे। जब दादी जी का स्वर्गवास हो गया तब दादा जी ने कठिन समय में चारों बच्चों को सँभाला, उच्च शिक्षा-संस्कार दिए, चारों बेटे रॉबर्टसन कॉलेज (अब शासकीय विज्ञान महाविद्यालय) जबलपुर में पढ़े। घर में शुरू से शिक्षा का माहौल था। अपने पोते- पोतियों को रामायण सुनाना, भगवान के छोटे-छोटे भजन सुनाना दादाजी की दैनिक दिनचर्या थी। मेरी माँ चिरगाँव झाँसी से थीं। वह बहुत सुंदर भजन गाती थीं, पाक कला में भी बहुत कुशल थीं, रंगोली बनाना, तबला-हारमोनियम बजाना, क्रोशिया से कसीदाकारी तथा कढ़ाई करना आदि सभी कलाओं में वे बहुत निपुण थीं। उन्होंने नम्रता तथा सहनशीलता के संस्कारों का हम सब बच्चों को ज्ञान कराया। वह खुद मृदु भाषी थीं। मेरे घर में चाचा-चाची सभी बहुत ही अच्छे थे, सबकी वाणी में मधुरता थी, सब हमेशा एक दूसरे की मदद करने के लिए के लिए तत्पर रहते थे, सबमें एक दूसरे के लिए सेवा भाव भी गजब का था। यही बातें हम सब बच्चों में भी आईं।
हमारे परिवार मेंं सभी भाई-बहन घर के बगीचे में खेलते थे, बाहर जाने की हमें इजाजत नहीं थी। कभी चाचा चौधरी कॉमिक्स पढ़ते, कभी गुड्डा-गुड़िया के खेल खेलते, घर के सामने सिविल कोर्ट था, वहाँ जामुन का एक पेड़ था, खूब जामुन फलते थे वहाँ, हम देखते लेकिन जाने की इजाजत नहीं थी। जामुन देख लगता था कैसे जाकर जामुन तोड़ के खाएँ, एक दिन सभी ने तय किया दोपहर में अम्मा-चाची सोएँगी तब धीरे से गेट खोलकर बाहर जाकर जामुन खाएँगे। दोपहर में बाहर निकले, जामुन खाकर अपनी फ्रॉक के पॉकेट में रखे और घर आ गए कि किसी को पता नहीं चला पर अम्मा आईं और पूछा कि बाहर जाकर जामुन खाई तुम लोगों ने? सब भाई-बहनों ने मना कर दिया तब माँ ने कान पड़कर कपड़ों पर जामुन के दाग दिखाकर खूब डाँट लगाई, सभी से कान पकड़कर उठक-बैठक कराई और बाहर अकेले न जाने का वचन लिया। उस समय मैं कक्षा तीसरी में पढ़ती थी।
ये सभी संस्मरण कक्ष तीसरी से कक्ष सातवीं के हैं। बचपन के दिनों में अपनी सहेलियों के साथ कभी दोस्ती, कभी कट्टी होती थी। कट्टी हों तो हम लोग आपस में बात नहीं करते थे, पत्रों के माध्यम से बात होती थी, मेरा पत्र सहेली की किताब में और उसका पत्र मेरी किताब में रख दिया जाता था। एक बार कट्टी काफी लंबी चली, मेरी सहेली ने बहुत बड़ा पत्र लिखा और नीचे लिखा तुम ही अभागिन सहेली, उसे लिखना था 'तुम्हारी अभागिन सहेली' पर गलती से 'तुम्हारी' की जगह लिख दिया 'तुम ही'। मैंने पढ़ा, खूब हँसी, उसे जाकर बताया तो गले लग गई, बोली- 'गलती हो गई', माफ करो। फिर हममें कभी न छूटनेवाली दोस्ती हो गई, ऐसा था प्यारा बचपन।
मेरे चाचा जी बहुत खुश दिल इंसान थे, बच्चों को पढ़ाते-अच्छी बातें सिखाते थे पर बच्चों की कमजोरी पकड़ कर बहुत चिढ़ाते थे। मैं बहुत जल्दी चिढ़ जाती थी। इस कारण वह चिढ़ा कर मजा लेते थे। वह हमारी कक्षा शिक्षिका के ऊपर तुरंत कविता बना लेते थे। छठवीं कक्ष में मेरी शिक्षिका का नाम था लीना मेडम और सातवीं में मेरी शिक्षिका नेमा मैडम थीं। चाचा जी ने दोनों के ऊपर कविता बनाई जो मैं आप सबसे
साझा कर रही हूँ।
लीना मैडम पर-
वाह! वाह! री लीना ,
तुझे देख कर आ गया पसीना,
बदबू आती है जैसे हो स्टेशन बीना।
और नेमा मैडम पर-
हम गए सिनेमा, उते मिली नेमा
उनने बजाई चुटकी,
हमने मसक दई घुटकी।
इतना कहना कि मेरा रो रो के बुरा हाल होता था पर जब थोड़ी समझदार हुई तो बातों को याद कर बचपन की मीठी स्मृतियों में खो जाती हूँ। मेरे बड़े भाई जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, उन्हीं से जुड़ी बचपन की एक स्मृति, हम लोग घर में भगवान की पूजा करते, भजन गाते थे। एक दिन दादा बोला कि भगवान की पूजा हो गई हो तो चलो अब खुदा को दिखाते हैं। हम सभी बच्चे दौड़कर उनके साथ गए। घर में एक छोटी सी कोठलिया थी गाय की, वह उसमें ले गए, उन्होंने खुरपी से थोड़ी दीवाल खोदी और कहा यह देखो ये "खुदा" है। हम सब भौंचक्के से देखते रह गए। अब सोचते हैं तो बचपन की यादों के साथ दादा की छवि भी दिखती है।
बचपन में मेरी माँ नानी के घर जाती थी तो प्रायः मैं उनके साथ नहीं जाती थी। एक बार माँ के जबरदस्ती करने पर जैसे-तैसे नानी के घर जाने को तैयार हुई पर स्टेशन पर पहुँचते ही बहुत जिद्द की, ट्रेन में बैठे यात्रीगण बोले कि क्यों दूसरे की बच्ची को जबरदस्ती ले जा रहे हो?
तब तो समझ नहीं थी पर बाद में यह घटना याद आती तो बहुत तकलीफ होती रही। फिरअम्मा का पत्र आया कि तुम्हें कुछ चाहिए है, तो चिट्ठी द्वारा बताओ। हमने चिट्ठी लिखी उकि मुझे एक कुर्ता चाहिए और चिट्ठी रखकर सो गए सुबह, जब उठी तो पिताजी ने कुर्ता की जगह कुत्ता लिख दिया और सबको बताया। सब लोगों ने मुझे बहुत चिढ़ाया तो मुझे बहुत गुस्सा आया।
बचपन की मधुर स्मृतियों का कहाँ तक बखान करूँ? वास्तव में बचपन के दिन बहुत ही अच्छे होते हैं, न किसी बात की चिंता, न फिकर, खेलना, पढ़ना और मौज-मस्ती करना, कभी बारिश में भीगना, कभी तलब में नहाना, कभी मेला जाना यह सभी बचपन की मधुर यादें हैं।
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२१. विद्या श्रीवास्तव, भोपाल, मध्य प्रदेश
याद न जाए बचपन की
बचपन बीत गया, यौवन भी गुजर गया अब वृद्धावस्था की दहलीज पर आगे बढ़ रहे हैं किंतु इन पलों में बचपन ही मन पर छाया हुआ है, यौवन की भाग-दौड़, बच्चों का लालन-पालन और गृहस्थी के दायित्वों से भरे जीवन के थोड़े-बहुत पल ही याद हैं परंतु बचपन पूरी तरह से आज भी मन पर हावी है। न जाने क्या बात है बरसों बीत चुके हैं पर वह बचपन की कुछ यादें और शरारतें, आज भी नहीं भूली हैं, आज भी सपने में मायके की गलियाँ, जिस स्कूल में पढ़ते थे, जहाँ खेलते-कूदते रहे, वह दिन नहीं भुला पाते हैं, स्वप्न में भी गाँव की गलियों में ही जाते हैं, आज भी मार्केट जाते हैं, वह दुकान सपने में दिखती है, वे लोग दिखते हैं जिनसे बिछड़े हुए ६०-७० वर्ष के करीब हो रहे हैं। जीवन की आपाधापी में भी न तो वह घर भुलाया जा सका है, न वे संगी-सहेलियाँ, न माँ-बाप, न वे दिन।
मामी बनी खलनायिका
हमने अपने नानी-नाना, दादा-दादी को नहीं देखा। हमारे माँ-बाप ने भी नहीं देखा, पिता जी जब ६ माह के थे तब दादी गुजर गईं और मेरी माँ एक माह की थीं तभी नानी चली गईं। मेरे जन्म से पहले दादाजी और नाना जी भी चले गए, इसलिए हमने ननिहाल का सुख बहुत नहीं देखा। अपने जीवन में मामा के घर भी हम एक या दो बार माँ के साथ गए हैं। हमारे मामा लोग किसी कंपनी में काम करते थे और भोपाल से मुंबई बस गए थे। मुंबई में एक कंपनी थी इसका मुझे नाम याद है 'शापूर जी पालन जी'। इसी में दोनों मामाजी काम करने लगे, वहीं के हो गए और वहीं की मराठी लड़कियों से दोनों ने शादी कर ली। हम दो बार मामाजी के पास गए, तब बहुत छोटे थे पर हमने अपने मामा-मामी को लड़ते हुए ही देखा, मामी हम लोग को भी पसंद नहीं करती थी किंतु मेरे दोनों मामा मेरी माँ को बहुत चाहते थे। हमने देखा कि दो बार गए दोनों बार ही अच्छा माहौल नहीं रहा, कुछ स्मृतियाँ जहन में आज भी हैं। मामा जी की कैंटीन थी, मामा जी शाम को जब आते तो एक डब्बा बड़ा वाला या एक लोटा भरकर दूध की मलाई लाते, फल आदि लेकर आते, हम लोगों के लिए और कहते बच्चों को खिलाना परंतु हमारी मामी हमको और हमारी माँ को कुछ नहीं देती थी। मुझे इतना याद है कि मामी मलाई शाम को नाली में फेंक देती थी और फल खुद खाती और अपने को बच्चों को खिला देती थी। यह उस समय की बात है जब मुंबई जाना विदेश के समान होता था। हम जब मुंबई गए तो पूरा मोहल्ला हमको ऐसे देख रहा था जैसे हम अमेरिका वगैरा जा रहे हैं, लौटने पर भी सभी मोहल्ला इकट्ठा हुआ। उस समय वहाँ स्टील का चलन था, स्टील के बर्तन तब भोपाल मध्य प्रदेश में नहीं आए थे। हमारी माँ स्टील की भगोनी और कटोरियाँ लेकर आई थीं और कुछ रेशम और कुछ चीजें जो भोपाल में नहीं मिलती थी।
फोटो वाले काका जी
हम लोग तहसील प्लेस इछावर में रहते थे जहाँ हाई स्कूल था, हमने वहीं से पढ़ाई की है। यह उसी समय की बात है। नाना-नानी के घर की तो हमारे पास सिर्फ बुरी यादें ही हैं। हम अपने माता-पिता के साथ ही रहे। पिताजी अकेले थे तो हमने बुआ-चाचा आदि का भी कोई सुख नहीं देखा। माँ-पिताजी और बहन-भाई यही हमारा छोटा सा परिवार था। हम बाजार जाते थे, सामान खरीद कर लाते थे। उस समय छोटे स्थानों पर महिलाएँ बाजार में नहीं जाती थीं, पर्दा करती थीं। इछावर में सभी लोग जाने-पहचाने थे, घर से लेकर बाजार तक एक दूसरे से पहचान थी, छोटी जगह थी, बाबूजी की अच्छी प्रतिष्ठा थी, हम लोग सामान लेकर आते, अम्मा को पसंद करवाते और वापस करने जाते, साड़ियाँ और कपड़े भी घर लेकर आते थे, साड़ी की दुकानवाले हमारे बाबूजी के दोस्त थे, उनको हम 'काका जी' कहते थे, वह साड़ियों पर लगे फोटो निकाल कर हमें देते तो हम बड़े खुश होते थे। हमने उनका नाम फोटो वाले काका जी रख दिया था। अब ना काका जी है ना बाबूजी पर उनकी याद यदा-कदा आती रहती है। मार्केट में भी बाबूजी की अच्छी प्रतिष्ठा थी सभी लोग जानते थे कि यह लाला जी के बच्चे हैं हमें यह नहीं मालूम था मैं और मेरा छोटा भाई दोनों ही साथ घूमते थे हमें यह नहीं मालूम था कि जो सामान हम लाते हैं उसका पैसा कब और कैसे दिया जाता है हम तो बस जो अम्मा लिस्ट बना कर देती लाकर अम्मा को दे देते थे बाबूजी कब पैसे देते, कहाँ देते, कितने देते हमें कुछ नहीं मालूम।
चोरी, मार और माफी
अब मैं यहाँ पर अपनी एक छोटी सी शरारत और मासूमियत का एक उदाहरण एक याद आप लोगों के सामने रखती हूँ। उस दिन हम दोनों बहन-भाई मार्केट में घूम रहे थे, फुटपाथ पर एक सीताफलवाला बोरा बिछाकर सीताफल बेचता था। उस दिन वह उठकर शायद कहीं चाय पीने गया। हम दोनों भाई बहनों ने देखा कि दुकान पर सीताफल बेचनेवाला नहीं है, अपन दोनों यहाँ से सीताफल उठा लेते हैं और घर ले चलेंगे तो अम्मा बहुत खुश होंगी कि हम बिना पैसे के सीताफल ले आए। मैं लगभग १० साल की थी और मेरा छोटा भाई ८ साल का। मैं दूर खड़ी हो गई और मेरा छोटा भाई गया दुकान से तीन-चार सीताफल उठा लाया और अपने झोले में डाल दिए, फिर हमें झोला पकड़ा दिया। हम दोनों बहन-भाई बहुत खुश होते हुए घर आए। घर आकर अम्मा को बताया तो पहले तो अम्मा ने हमारी पिटाई की। फिर कहा कि शाम को तुम्हारे बाबूजी को आने दो, आज तुम्हारी सजा वह निश्चित करेंगे। हमने बहुत हाथ पैर जोड़े कि अम्मा! हम वापस जाकर उनको सीताफल दे आते हैं। अम्मा ने कहा कि नहीं, तुमने आज चोरी की है। आज तुम्हारे बाबूजी ही तुमको सही करेंगे। शाम को जैसे ही बाबूजी आए माँ ने सब बता दिया। बाबूजी ने हमें कान पकड़कर उठक-बैठक लगवाई और बोले कि चलो, सीताफल लेकर बाजार चलते हैं, अपने हाथ से उसको वापस करो। हम हाथ-पैर जोड़ रहे थे कि नहीं बाबूजी! हमारी बहुत बेइज्जती होगी, सब लोग बाजार में हँसी उड़ाएँगे। बाबूजी ने कहा की नहीं, तुमने आज जो हरकत की है वह इसी लायक है कि तुम्हारी बेज्जती होनी चाहिए। अब आगे-आगे बाबूजी और पीछे-पीछे हम दोनों मार्केट में गए। वह सीताफलवाला अपनी जगह पर बैठा था। बाबूजी ने उससे कहा कि देखो, आज बच्चों ने यह हरकत की है। वह बोला कि लालाजी, मैं तो सामने ही दुकान पर चाय पी रहा था, मैं देख भी रहा था और मैं पहचान भी गया था कि यह लाला जी के बच्चे हैं, जाने दो बच्चे हैं, मैं तो लाला जी से पैसे वसूल कर ही लूँगा। बाबूजी ने हमें सीताफल वाले से माफी माँगने को बोला और कहा कि आइंदा हम ऐसी हरकत नहीं करेंगे। उस दिन से हमें सबक मिल गया कि कभी चोरी नहीं करना चाहिए। हम समझ रहे थे कि कोई है नहीं, तो कौन देख रहा है? जब देखेगा ही नहीं तो किसी को कैसे पता चलेगा कि हमने सीताफल उठाए हैं। यह हमारी पहली सजा थी जो जीवन में हमेशा काम आई और अच्छी सीख देकर बाबूजी ने हमारा मार्गदर्शन किया।
दोषी की खोज
अब दूसरा संस्मरण यह है कि मैं और मेरा छोटा भाई जिसका मैंने अभी ऊपर जिक्र किया है, हमारी दोनों की बहुत लड़ाई होती थी। वह बहुत शैतान था। वह मुझे मार देता, मेरी पिटाई कर देता, नोंच देता और जोर-जोर से चिल्ला कर रोने लगता कि जीजी ने मारा। हमेशा बाबूजी तक शिकायत जाती तो दोनों को डाँट पड़ती। एक दिन बाबूजी ने दोनों को बुलाकर कहा। आज हम तुम दोनों को एक इनाम देनेवाले हैं। आज तुम दोनों एक दूसरे को मार लगाओ जो बहुत ज्यादा और अच्छा मारेगा, उसको शाम को हम बाजार घुमाने ले जाएँगे और इनाम भी देंगे। अब क्या था हमसे बाबूजी ने कहा- -पहले तुम मारो, तुम बड़ी हो। हमने धीरे से एक-दो चपत लगाकर भाई को मारा क्योंकि मैं कभी मारती नहीं थी, वैसे भी बहनें कभी अपने भाई को नहीं मारतीं, वे अपने छोटे भाई से बहुत प्यार करती हैं। फिर बाबूजी ने स्केल भाई के हाथ में दिया कि अब तुम मारो। भैया की तो आदत थी कि वही मुझे मारता था और मारकर सीधा बन जाता था उसने लपक कर मुझे १०-१२ स्केल मारकर, मुझे नोच डाला।
बाबूजी ने कहा कि आज मुझे समझ में आया कि मारता कौन है और पिटता कौन है? जब तुम हमारे सामने नहीं चूके, लपक के तुमने पिटाई करी दीदी की, तो तुम अकेले में क्या करते होगे? आज मेरी समझ में आ गया कि कलाकार कौन है और फिर बाबूजी ने भैया को दो-चार तमाचे लगाए और उठक-बैठक लगवाई। इस तरह बाबूजी ने अपनी होशियारी से पता लगा लिया कि वास्तव में शैतानी और मारपीट कौन करता है? ऐसी कई छोटी-छोटी यादें और बचपन की शरारतें हैं, जिनको शायद हम अपने आखिरी पलों तक भी नहीं भूल पाएँगे।
फुर्सत के पल, बचपन
भाग दौड़ की इस दुनिया में,
कुछ पल फुर्सत के मिल जाते,
बचपन के दिन वापस आते,
बचपन के दिन वापस आते,
तुम भी आते हम भी आते ,
अपनी अपनी व्यथा सुनाते,
कहते कहते खो जाते हम,
बीते बचपन की यादों में।
जो ना कभी फिर लौट के आए,
फुर्सत के वह प्यारे पल,
फुर्सत के वे प्यारे पल,
वह बारिश का पानी होता,
हम कागज की नाव बहाते,
भीग भाग कर हम घर आते,
मां के डर से छुपते छुपाते,
फिर एक नया बहाना घड़़ते,
फिर भी हम पकड़ा ही जाते,
ना धन दौलत ना बंगला गाड़ी,
ना धर्मो के बंधन होते,
बस खेल-खेल और खेल खेल,
छुक छुक कर चल पड़ती रेल,
काश कि फिर से रेल चलाएँ,
हम फिर से बच्चे बन जाएँ,
फुर्सत के पल ढूंढ के लाएँ।
फिर पत्तों की रोटी बनती,
पत्तों की ही सब्जी होती,
पॉलिश की डब्बी की तराजू,
माचिस का सोफा भी होता,
कोई सब्जी वाला बनता,
कोई डॉक्टर कोई मास्टर,
हम में से कोई बीमार भी होता,
हम मम्मी पापा बन जाते,
मां की साड़ी छुपा के लाते,
ना कोई झंझट न कोई संकट,
ना चेहरों पर चेहरे होते,
लड़ाई झगड़ा मार पिटाई,
घर में आकर फिर पिट जाते,
पिटकर भी मां से ही लिपटते,
हरकत फिर भी वही करते।
क्यों ना हम बच्चे ही रहते,
जीवन भर सच्चे तो रहते,
कहां खो गया अपना कल,
कहां खो गया प्यारा बचपन,
चलो आज फिर बच्चे बन जाएँ,
फुर्सत के पल ढूंढ के लाएँ,
छुक छुक करके रेल चलाएँ,
फुर्सत के पल ढूँढ के लाएँ
***
१.
फिर ना आए लौट के वे दिन,
फिर ना मिले संगी साथी,
जिनकी याद बहुत है आती,
ना दरस-परस, ना कोई खबर है
ना ही मिली कोई चिट्ठी-पाती।।
२.
बहुत याद आते हैं बचपन के दिन,
भुलाए न जाते वे प्यारे पल, छिन
यादों में वे ऐसे समाऐ,
लाख चाहा पर भूल न पाए,
हजार सावन आए-गए,
पर वो अमवा की डाली,
वो सावन के झूले,
फिर कभी लौट ना पाए।।
३.
मौसम आए गए,
वे दिन ना भुलाए गए,
पानी की बूंदों का आना,
दौड़ के घरों से आँगन में आना,
वो बारिश का पहला पानी,
और पानी में नहाना,
पानी बाबा आना
ककड़ी-भुट्टे लाना,
गाना और गुनगुनाना।।
***
विद्या श्रीवास्तव- जन्म १ अप्रैल १९४९ इछावर जिला सीहोर मध्य प्रदेश, आत्मजा- स्व। प्रेमलता श्रीवास्तव-स्वः. दीनदयाल श्रीवास्तव, शिक्षा- कला स्नातक, जीवनसाथी- स्व. राजेंद्र प्रसाद श्रीवास्तव, प्रकाशित पुस्तकें- साझा संकलन शब्दों के वंशज, काव्य कुंज, फुलबगिया, संपर्क- ३/२० रवि शंकर नगर, बोर्ड कॉलोनी, मेन रोड, विट्ठल मार्केट, भोपाल ४६२०१६ चलभाष- ८९८२७७१५९३ / ९४२४४००३१०
***
२२. विनोद जैन 'वाग्वर', सागवाड़ा डूंगरपुर राजस्थान
कक्ष में प्रथम
मेरा जन्म गाँव ठाकरडा, जिला डूँगरपुर में हुआ। पैतृक गाँव भीलूड़ा, जिला डूँगरपुर है जिसे छोड़ पापा परिवार सहित सागवाड़ा में आकर बस गए थे। मेरा पूरा बचपन सागवाड़ा में बीता। हम किराए के दो कमरों के मकान में रहते थे, पीछे की तरफ पहाड़ी और जंगल था।कक्षा १ से ८ तक का अध्ययन राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय नं ३ में किया। हम चार भाई-बहन १ कि.मी. दूर से पैदल विद्यालय जाते थे। परिवार की आर्थिक हालत कुछ खास नहीं थी, मम्मी सिलाई का कार्य करती थीं, सुविधाओं का अभाव था, सोने से पहले रोज एक बार पहाड़े बोलकर सबको सुनाने पड़ते थे। ईस कारण मैं स्कूल में सबसे अधिक अंक लाकर होशियार कहलाता था। मुझे पहाड़ों की पूरी पुस्तक जबानी याद थी। १ से ४० तक पहाड़े, फिर पाव यानि एक बटा चार,.आधा यानि एक बटा दो, पौना यानि तीन बटा चार, सवाया यानि एक सही एक.बटा चार, डेढा यानि एक सही एक बटा दो, फिर ढाई यानि दो सही एक बटा दो, ऊटा यानि तीन सही एक बटा दो, फिर ग्यारियाँ होती थी जिसे हम इस तरह बोलते थे इकवी रे इकवी राम शार इकतालीय अर्थात् २१ x २१ = ४४१ आदि। यह सब पूरे स्कूल में केवल मुझे ही याद थे।
चढ़ तो गया, उतरते न बना
मै पहली कक्षा में था पर बद्रीनारायण सर मुझे छठी क्लास तक में पहाड़े बुलवाने ले जाते थे। यह एक अलग ही आनन्द था। हम घर आकर बनियान-चड्डी में ही खेलते रहते थे, खिलौने तो मिलते ही नहीं थे क्योंकि पैसे की समस्या थी। पैतृक गाँव सागवाड़ा से ७ कि.मी. व ननिहाल १० कि.मी. के करीब था। जब भी भुआ या मामा के गाँव जाना होता छुट्टियों में खेलते-कूदते पैदल ही टिफिन लेकर चले जाते। भुआ और मामा के घर खूब मजे करते पर शाम की पहाड़ों की क्लास वहाँ भी लगती थी। घर का गाय-भैंस का शुद्ध दूध, खेतों में जाकर गन्ने का रस और ताजा गुड़ खाना, आम और ईमली का वो आनन्द अब कहाँ मिलता है? यह सब बिना पैसे मिलता था, आज तो वह सब मजा पैसे देकर भी नही मिल सकता। ताजा सेंके हुए भूट्टे, हरे चने, गेहूँ की फलियाँ खाने का अलग ही मजा था। बार-बार लड़ना-झगड़ना, बार-बार फिर मिलना जैसे कुछ हुआ ही न हो, खुशियों से भरा कष्ट प्रद जीवन हँसते-खेलते गुजरता गया। समय-समय पर पैदल पिकनिक जाना, जहाँ दिन भर खो खो, पकड़ा-पकड़ी आदि खेलना, गाना-बजाना और साथ में ले गये टिफिन खाने का अलग ही मजा, अलग ही आनन्द होता था। एक बार मैं आम की लालच में वृक्ष पर चढ़ तो गया पर उतरते ही नहीं बना फिर मुझे उतारने सर को आना पड़ा।
पिता का साया उठा
सब कुछ ठीक चल रहा था कि नवमी में आते ही पिता का साया सर से उठ गया। नवमी-दसवी की पढ़ाई भुआ के घर गाँव मे रहकर की, फिर ग्यारहवीं सागवाड़ा महिपाल स्कूल में कभी पतंग बेचकर तो, कभी बिस्किट चाकलेट बेचकर, फिर सिलाई का काम करते हुए आगे का अध्ययन जारी रखा। मातुश्री ने सिलाई का कार्य करते-करते हम सबको योग्य बनाया जिसके लिए सदैव माँ के ऋणी रहेंगे।
क्या सपने शुमार करूँ,
अपनों की क्या बात करूँ।
हर किसी ने दुत्कारा है,
मिलते ही फटकारा है।
पढ़-लिखकर होगा क्या बोलो ?
आ काम करो होटल खोलो।
पर मैंने हार नहीं मानी,
पढ़ने की जिद मन में ठानी।
पग पीछे नहीं हटाऊँगा
मैं भी साइकिल चलाऊँगा।
माँ से पच्चीस पैसे पाए
साइकिल किराए से ले आए। ,
पच्चीस मिनट तक दौड़ाई
गिर चोट पाँव में थी पाई।
टाँके थे लगे तीन पग में।
साईकिल लौटाई खा कसमें।
मम्मा ने डाँटा था जमकर
आँसू आए रोके थमकर।
टॉकीज देख था मन डोला
डोक्ला दे फिलम माँ से बोला।
सब जाते, मैं भी जाऊँगा,
बिन गए न खाना खाऊँगा।
दिन एक रहा जब मैं भूखा
तब देखी जय सन्तोषी माँ।
हुल्लड़ भी खूब मचाई थी
पिक्चर यह मन को भाई थी।
बिन टिकट गया इक दिन अंदर
आई थी शिकायत तब घर पर
मम्मी ने मार लगाई थी
यह सीख मुझे सिखलाई थी।
धोखा न कभी भी तुम देना
मेहनत कर जो पाओ वह लेना।
इज्जत की रोटी ही खाना
या फिर भूखे ही सो जाना।
जब काज-बटन का काम किया
पारले चाकलेट पा हँसा जिया।
आठवीं में पैण्ट मिल पहना
इतराए लगा पाया गहना।
कम नहीं किसी से हैं हम भी
यह सोच किया कुछ ऊधम भी।
एक बार पिटाई हुई भगे
मामा के घर पर पहुँच रुके।
नानी पहुँचाने घर आई
माँ को बातें कुछ समझाईं।
कर धमा चौकड़ी खुश थे हम
ऐसे गुजरा प्यारा बचपन।
***
शिप्रा सेन, जबलपुर, मध्य प्रदेश
मोंटेसेरी से Christ Church स्कूल में पदार्पण हुआ था कक्षा पहली में, नये यूनिफार्म, नयी शिक्षिकाएं, नूतन वातावरण, का एक अनोखा एहसास, कक्षा में एक शानदार लकड़ी के पेड़, का कटआउट था, जिसपर लाल लाल सेब हुक पर लटकते हुए देख, आकर्षित हुआ था बालमन l इन सेब से गिनती सिखाई जाती, जोड़ना घटाना, गुना भाग सब,बहुत मोहक पद्धति l
हिंदी लिखना सीख रहे थे, एक दिन वर्तनी परीक्षा में शब्द लिखना था पत्थर, अब कुछ समझ नहीं आ रहा था कैसे लिखे "प त थ र" लिख दिया पर कुछ कचोट रहा था ये गलत है,बस फिर क्या था रो रो कर बुरा हाल हो गया,मैडम परेशान,बोली कोई बात नहीं दूसरे शब्द लिखो एक गलत हुआ तो क्या, पर न जी, रोते रोते सो गई थी, परीक्षा कौन लिखे l मैडम ने फिर खूब प्यार से उच्चारण से समझा कर आधे शब्द कैसे प्रयोग करना जब सिखाया तब खुश हुई थी ये मोढ़ी,आज भी वर्मा मैडम को नित्य प्रतिदिन नमन करना नहीं भूलती l
अर्ध वार्षीकि परीक्षा का रिजल्ट आया, रैंक मिला 22, कुल 28 छात्रों में से, बस से उतरतें भागे पिताजी को दिखाने, रिपोर्ट कार्ड देखते ही जोरदार तमाचा गाल पर जड़ दिया, बाबा ने, इतना ख़राब रिजल्ट,बुद्धू कि तरह थोड़ी देर देखते हुए आंसुओं कि धार बहनें लगी, दादी ने पुचकारा प्यार से भोजन खिलाया और पिताजी को डाँटने लगी l
शाम को जब माँ दफ्तर से लौटी तो माँ से पूछा, माँ मैं इतने ज्यादा नंबर का रैंक लायी बाबा क्यूँ मारे? माँ बोली नंबर ज्यादा और रैंक हमेशा पहला दूसरा यानि कम अच्छा होता हैँ.मेरा प्रश्न था,पर माँ आपने या टीचर ने ऐसा तो, पहले कभी नहीं बताया था कि रैंक में हमेशा कम नंबर और मार्क्स ज्यादा होने
चाहिए? तो फिर मेरी गलती कहाँ थी, बाबा ने क्यूँ मारा??
अब माँ, बाबा, दादी, चाचा, सब एक दूसरे को देख रहे थे, शायद हर बच्चा अपनी अलग विचारशक्ति से संपन्न होते हैँ,और सारे बच्चों को एक ही मापदंड में अभिवावक तौलने कि गलती करते है, कुछ बच्चे तर्क सम्मत तरीके से समझते है, कुछ मार से सुधरते हैँ ,इस तरह के बच्चों को अमूमन समझने में थोड़ी मुश्किल जरूर होती हैँ, पर यही बचपन है l
उस दिन से पत्थर शब्द लिखने में कभी गलती नहीं हुई, और ये समझ सशक्त कर लिया कि, किसी को कारण बताये बिना सजा नहीं मिलनी चाहिए, न ही देनी चाहिए l
आज तक मैंने आपने शिक्षक जीवन के 19 साल, कभी किसी पर हाथ नहीं उठाया, बचपन शायद सीखता भी हैँ, और सीखाता भी है ll
शिप्रा सेनउन दिनों Christ Church स्कूल ने समय में बदलाव किया आठ से तीन और एक घंटे का लंच ब्रेक, हम स्कूल बस में आते थे इसलिए इतने भोर में माँ tiffin नहीं बना पाती थी, इसकारण प्रिंसिपल मैडम से अनुमति लिया था हम तीन बहन, मैं, दीदीभाई और बुला दीदी (हमारी ममेरी बहन) माँ के DRM ऑफिस में लंच के लिए जायेंगे.
माँ तीन डिब्बेवाला गुलाबी रंग का टिफ़िन लेकर आती थी सबसे बड़ा वाला दीदीभाई का, बीचवाला बुला दीदी और ऊपरवाला छोटा मेरा, क्यूँकि मुझे खाने से ज्यादा बम बहादुर चाचा ऑफिस के पीओन के साथ टाइपराइटर पर टाइप जो करना होता था फिर वापस समय से स्कूल में आना नहीं तो गेट बंद हो जायेगा
गेट के बाहर एक बूढ़ी अम्मा उबले बेर, भुट्टे, चना जोर गरम बेचती थी खूब खाने को मन करता था पर समय नहीं और पैसे भी नहीं |एक दिन माँ को खूब मिन्नत करके पैसे माँगे पर बेर खरीदने में देर हुई, गेट बंद हो गया, बस फिर जो छड़ी से मार पड़ी मिस जॉर्ज से , भूलना पड़ा उबले बेर पर इस उम्र में धुआँधार में जब देखा उबले बेर तुरंत एक पत्तल खरीद कर खा लिए और बचपन जी लिए
एक वाक्या और याद हैँ, हमको बाबा सिनेमा देखने नहीं देते थे, दीदीभाई और माँ ने एक इतवार, प्लान बनाया की आज बाबा को कहेंगे नानी घर जा रहे, और वहाँ न जाकर सिनेमा देखेंगे, रिक्शावाला राम अवतार ठीक आठ बजे रिज रोड हमारे घर आ गया, हम तीनो निकले और विनीत टाकीज़ पहुंचे पहली बार टिकट खिड़की से टिकट खरीदने का अनुभव हुआ, नौ से बारह का शो, पिक्चर थी तुलसी विवाह, फ़िल्म के इंटरवेल में माँ ने खूब स्वादिष्ट नाश्ता खिलाया, पिक्चर ख़त्म होते ही मैं छोटी थी 10 साल की इसलिए खींचते हुए दीदीभाई और माँ ले चली कृष्णा टाकीज़ 12 से 3 का शो, फ़िल्म दुश्मन, खूब मज़ा आया, कृष्णा टाल्कीज़ के आलूबोंडे इंटरवेल में गर्म गर्म अहा क्या स्वादिष्ट थे |पिक्चर खत्म होते अब अगला पड़ाव था ज्योति टॉकिंज़, प्यास से जान निकली जा रही पर पिक्चर छूट जाएगी इसलिए दीदीभाई के मुक्के से काम चलाना पड़ा. हॉल में घुसते ही अँधेरे में टोर्च के सहारे सीट पर बैठे फ़िल्म शुरु हो चुकी थी पाकीजा,,, गाना चल रहा था चलो दिलदार चलो, नदी का दृश्य प्यास से जान बेहाल गर्मी भी लग रही थी, मन किया नदी में छलांग लगा दूँ और गटगट पानी पी लूँ, माँ बोली इंटरवेल में ही मिलेगा, अभी चुप बैठो,,पिक्चर आधी निकल चुकी थी इसकारण इंटरवेल भी जल्दी हुआ, फिर खूब स्वादिष्ट समोसे और शरबत मिला, नहीं तो आज तय था बाबा को बता दूँगी |
इन सिनेमा घर से सिनेमा के गानों की किताब खरीदना, पोस्टर देखना टिकट की लाइन में लग कर टिकट खरीदना, सीट के नंबर ढूंढ़ना आज सब सपना जैसा लगता हैँ,सिनेमा हॉल की जगह दुकानों ने ले लिया है|
बचपन की यादें,सिनेमा घर के प्रोजेक्टर से रौशनी की तरह आकर मानस पटल पर चलचित्र बना रहे है, आनंद ही आनंद||
बचपन की यादें
मैं पीयूष, प्यार से दादी बुलाती थी जिशु क्यूँकि गुड फ्राइडे के दिन मृतप्राय अवस्था से घर पर डॉक्टर दादाजी ने प्रसूति कर माँ और पुत्र को बचाया था इसकारण जिशु नाम रखा गया पीयूष का अर्थ अमृत गंगा इसकारण दादा जी ने प्रचलित नाम दिया.
1957 बिलासपुर कोनी में उन दिनों पिताजी ITI में डॉक्टर थे. दो भाई और एक दीदी मुझसे बड़े थे स्कूल में उन दिनों स्लेट पर खड़िआ से लिखते थे, मेरे दोनों बड़े भाई दीदी रविवार के दिन लकड़ी कोयले से घिस कर हम चारो की स्लैट को काला चमकदार करते रहते थे. मैं उनको देखकर पूछता था ये कोयला कैसे बनाते है, मँझले भैया बोले लकड़ी को जला कर कोयला बनाते हैँ, अब छोटा मैं इतना बुद्धिमान हूँ किसीको इल्म ही नही था.
एक दिन जब दादा छोड़दा दीदी स्कूल गए तो पिताजी के study table के नीचे बैठ कर मैंने माचिस से कुछ लकड़ी जलाने की कोशिश की, ठीक से जल नहीं रही थी तो पिताजी के टेबल से कागज़ उठा कर जलाने का उपाय सही लगा, अब आग पकड़ ली पर बेतहाशा जलते हुए आग टेबल मे रखे खेल के सामान को अपने लपेट में लेने लगी, हर जगह धुआँ ही धुआँ,अब मैं डर कर अपने माँ की साड़ी पकड़ कर रोने लगा उधर हॉस्पिटल के कर्मचारी भागे डॉक्टर साब के घर से विचित्र धुआँ उठते देख.
माँ उन दिनों गर्भवती थी पर बेचारी बाल्टी भर भर पानी से आग बुझाने का प्रयास कर रही थी, सब लोग मदद करने आये पर मुझे सुरक्षित देख कर ईश्वर को धन्यवाद देने लगे. शाम को दादा छोड़दा दीदी की पिताजी ने क्लास ली क्यूँ इसको कोयला कैसे बनता हैँ बताया,फिर अंदर कमरे में तीनो ने मुझे इतना कूटा की आज तक बुद्धिमान होने पर संशय होता हैँ.
चटोरी विदिशा की यादें
उन दिनों हम नसीराबाद से अगरतला जा रहे थे.पूरी यूनिट मूव हो रही थी इसलिए पापा अजमेर चले जाते special ट्रैन में लोडिंग करवाने और क्षितिज केवल बाईस दिन का था, और मैं दो साल की, माँ दिन भर घर का समान पैक करती, और जो बेकार कचरा निकलता उसको पीछे के गार्डन में इकठ्ठा कर के जलाने की व्यवस्था करती उस दिन जब कचरे को आग लगाया मैंने माँ को उसमे फालतू समान फ़ेंकते देख, मेरे जूते चप्पल कपडे भी ले जाकर उसमे फेंक दिए.
शाम हो रही थी अगले दिन सुबह हमको रवाना होना था. नसीराबाद उन दिनों इतना छोटा था की कुछ भी नहीं मिलता था सब अजमेर से खरीदना होता पर अब माँ क्या करें, तुरंत प्राम गाडी में मुझे और क्षीतिज को बिठा कर धकेलती हुई बाजार भागी, रास्ते में एक आंटी के घर क्षितिज को रखकर दूध बोतल इत्यादि देकर मुझे बाजार लेकर गई और बाटा की एक ही दुकान थी वहाँ से जूते चप्पल और फिर एक दुकान से कुछ कपडे खरीद कर लायी,आते हुए क्षितिज को लिया फिर हम घर आये.
मिलिट्री स्पेशल ट्रैन में हम अगले दिन अगरतला के लिए निकल पड़े 12 दिन का सफर रुकते चलते असम के एक स्टेशन में ट्रैन जब रुकी तो हम लोग कुर्सी टेबल लगा कर आउटर में बैठे, पापा अरबी के पत्ते से पकौड़ी भजिए बनाते है,बता रहे थे सुनते ही मैंने भाग कर जंगली अरबी का एक पत्ता तोड़ कर खा लिया फिर क्या गला पकड़ लिया रो रो के बुरा हाल डॉक्टर अंकल साथ थे उन्होंने कहा अचार खिलाओ ठीक हो जाएगी फिर क्या था, मजे से इस चटोरी ने पूरे अचार की बोतल चट कर दी. बचपन के खाने के शौक ने सीखाया भी बहुत.
माँ की सहनशीलता, और तुरंत निर्णय लेने की क्षमता और निर्भीकता के हम दोनों भाई बहन आज भी कायल है.
@श्रीमती विदिशा सेनगुप्ता
०००
२३. संगीता भारद्वाज "मैत्री", भोपाल
गुड्डे-गुड़ियाँ
बचपन के दिन याद करते ही छोटे से शहर नरसिंहपुर में बिताया हुआ सुनहरा,सुंदर बचपन याद आ जाता है। बचपन के वे सारे लमहे, वो पल आंँखों में एक चलचित्र की भांँति जीवंत हो उठते हैं।हमारे पापा जी आदरणीय डॉक्टर प्रोफेसर श्री जवाहरलाल 'तरुण' नरसिंहपुर गवर्नमेंट स्नातकोत्तर कॉलेज में हिंदी के प्रोफेसर रहे और वहीं पदस्थ थे तो हम सब नरसिंहपुर में ही रहा करते थे। वे हमारे लिए बहुत निश्चिंतता के दिन थे। "बचपन के दिन भी क्या दिन थे, उड़ते फिरते तितली बनकर"। हम जैन मंदिर के क्वार्टर्स में रहा करते थे। उस समय मैं कक्षा चौथी या पांँचवी में रही होऊंँगी। हमारे घर के पीछेवाले रास्ते में एक कोने में पीपल का बड़ा पेड़ हुआ करता था और कुछ दूरी पर दूसरे कोने में दूसरा पीपल का बड़ा पेड़ था। अक्षय तृतीया यानी अक्ति के त्यौहार में हम सब गुड्डा-गुड़ियांँ सजाकर खूब धूमधाम से उनका विवाह उत्सव मनाया करते थे। घर से थाली, चम्मच, लोटा, डब्बा बजाते हुए हम सारे बच्चों की टोली धमा-चौकड़ी करते हुए बारात लेकर एक पीपल से दूसरे पीपल तक जाते थे , हमारी इस अनोखी बारात में नाचते गाते मस्ती करते हुए हम सब आगे बढ़ते जाते थे। कभी-कभी इस बारात में बड़े भी शामिल हो जाया करते थे और सभी लोग इस बारात को देखकर खुश होते और स्वागत करते, कभी-कभी सच के और कभी-कभी झूठ-मूठ के व्यंजन खिलाए जाते, फिर खुशी-खुशी गुड़िया की विदाई कर हम सब शाम होते-होते घर लौट आते थे। नाच-गाना, मस्ती और खुशी का तो ठिकाना ही न रहता था।अगले दो-तीन दिन तक इसी शादी और बारात की चर्चा हुआ करती थी।
भगवान की सेवा
हमारे क्वार्टर्स में कमरों में अलमारी बनी हुई थी, ऊपर दो हिस्सों में सामान रखा रहता और नीचे वाले खंड में दोनों छोटे भाई-बहन शिरीष और गुड्डी (नवनीता) अपने भगवान सजाते थे। उस समय की बाल बुद्धि के हिसाब से रंगीन कागजों की झालर, मोती माला और अन्य छोटे-छोटे सजावटी सामानों से कभी "भगवान राम जी का", कभी "शिवजी" का दरबार सजाया करते थे। मई के महीने में चूंँकि गर्मी बहुत होती है तो हाथ से चलनेवाले लकड़ी का "बिजना" (पंख) पानी में हल्का सा भिंगाकर भगवान को बड़े प्यार से वे झलते रहते थे। उन भोले भावों का तो कहना ही क्या कि भगवान को ठंडी हवा मिलती रहे हाय रे! भोला बचपन। इन मंदिरों का मुआयना करने का सौभाग्य जीजी यानि मुझे मिलता। मैं निर्धारित करती कि गुड्डी का मंदिर अधिक सुंदर सजा है या शिरीष का। मैं भी अपना बड़ी बहन होने का दायित्व निभाती, कभी शिरीष का मंदिर सुंदर कह देती, तो कभी गुड्डी को सुंदर मंदिर सजाने का श्रेय देती। दोनों ही खुश होकर मुझसे लिपट जाते। कितना निश्चल प्यार था हम नन्हें भाई बहनों का। आज सोचती हूंँ,तो लगता है, वही स्नेह-प्यार हमारी धरोहर है।
प्रभात फेरी
स्कूल के दिनों में मस्ती में भी एक अनुशासन था। कसकर तेल लगाकर चोटी बांँधना, स्कूल ड्रेस, जूते, मोजे और मेकअप का तो नाम ही नहीं था। बचपन से ही मैं पढ़ाई लिखाई में बहुत अच्छी थी और स्कूल के हर कार्यक्रमों में मेरा नाम सबसे आगे रहता था। फिर चाहे डांस हो, भाषण प्रतियोगिता, निबंध प्रतियोगिता, खेल-कूद, रस्सी-कूद, खो-खो, कबड्डी सभी खेलों में आगे बढ़कर हिस्सा लेती थी एक तो मेरी बहन जी (शिक्षिका) ने मुझे बिना बताए ही मेरा नाम काव्य पाठ में दे दिया। फिर एक दिन पहले मुझे पता चला कि मुझे काव्य पाठ में हिस्सा लेना है।
स्कूल की प्रार्थना से लेकर अंत में राष्ट्रगान तक मैं और मेरे एक दो साथी गाया करते थे, क्योंकि मैं बचपन से ही मस्त मौला हंँसमुख और मिलनसार स्वभाव की थी, स्कूल में हर शनिवार को बाल सभा में भी खूब चुटकुले सुनाया करती थी। सभी मुझे बहुत पसंद करते थे। उन दिनों बरसात के मौसम में कई बार एक-एक हफ्ते तक सूरज के दर्शन भी नहीं होते थे। पर्यावरण एकदम साफ-सुथरा उजला-उजला और हवा भी बहुत सेहतमंद थी। बारिशों में भीगना, रक्षाबंधन के बाद भुजरियांँ लेकर सभी परिचितों के घर जाना, बड़ों का हम बच्चों के सिर पर हाथ फेरना, इनाम के रूप में कुछ पैसे देना और उनका स्नेह आशीर्वाद, १५ अगस्त, २६ जनवरी की प्रभात फेरियाँ, सभी कुछ कितना सुखद लगता था। घर में मम्मीजी, पापा जी, हम सब भाई-बहन और दादाजी साथ रहते थे। घर के कामकाज से निपट कर मम्मी अक्सर स्वेटर बुनतीं और मैं उन्हें बुनते हुए देखा करती। पहले बुनाई, सिलाई, कढ़ाई और कुकिंग आदि स्कूलों में भी सिखाई जाती थी। मम्मी को बुनाई करते देख-देखकर मुझे भी बुनाई का शौक हुआ। मेरी सबसे छोटी बहन शैली जो हम सब की बहुत लाड़ली है। वह बहुत छोटी थी, तब उसके स्कूल ड्रेस के लिए फुल ऊनी लाल स्वेटर मैंने २ दिन में बुनकर तैयार की थी।
मैटिनी शो का मजा
मैं और मम्मी पिक्चर देखने के बहुत शौकीन थे। हम दोनों घर के पिछवाड़े से मेटनी शो देखने पैदल ही टॉकीज तक चले जाते थे और शाम को ५.३० बजे तक घर भी आ जाते थे। हम और मम्मी ने पतिता, हीररांँझा, शोर, मुग़ल-ए-आज़म, मदर इंडिया, आनंद आश्रम, ललकार, गाइड, मेरा गांँव मेरा देश,खून पसीना, धरम वीर, मेरा नाम जोकर, कटी पतंग, राजपूत, जॉनी मेरा नाम, जोकर, कसमे वादे, रामपुर का लक्ष्मण, आपकी कसम, चितचोर, आनंद, मि नटवरलाल, सफर शोले, दीवार आदि कई फिल्में देखी जिनके गाने और संवाद मुझे अभी तक याद हैं।अभी भी मम्मी से जब भी मैं मिलती हूंँ, तो मम्मी वही चर्चाएंँ हमेशा करती हैं। स्कूल में नृत्य में मैं मेरी सहेलियाँ सबसे आगे होते थे। "चलो गोरी चलिएँ हम नदिया किनारे/संध्या की बिरिया टिमक रहे तारे।।", "छनानना छानो रे आज/धरती ने उगला है सोने सा अनाज।।", "अराररा अर्क ताता।/झिमिर झिमिर पानी आया,/भर के डोर डबरा/डोले रे नागर डोले ततैया/डोल बैल कबरा।।", "मोरी चंदा चकोर नैना बनी आवे एकहुँ न/ मोरे मनवा के मोर नैना बनी आवे, एकहूंँ न।" यह ऐसे गीत हैं, जिन पर हम नृत्य करते,कभी अघाते नहीं थे। पूरे दिन चकरघिन्नी बने घूमते रहते थे।
मसाला कुटाई
पूरे दिन के स्कूल से जब शाम ५ बजे घर लौट कर आते थे, तो दादाजी कभी-कभी ५० पैसे देते थे। इन ५० पैसे से हम मर्चेंट के यहाँ से यानि मिठाई की दुकान से २५ पैसे का मावे (खोवे) का पेड़ा और २५ पैसे के बेसन के सेव दोना भर के लाते थे। मारे लाड़ के वे हलवाई भैया आधा पेड़ा ज्यादा दे देते थे। हमें तो मानो सारी दुनियाँ ही मिल जाती थी। खूब जी भर के खाते और खुश रहते थे। उस समय भोजन चूल्हे पर ही बना करता था। खाना बनने के बाद ठंडी रोटी को गर्म चूल्हे के आसपास टिका दिया जाता था। रोटियाँ लाल खरी हो जातीं थीं और जब हम स्कूल से घर लौटते,तो वही खरी रोटी को दाल के साथ मिक्स कर खूब सारा घी डालकर खाया करते थे। आज उस दाल रोटी और घी का स्वाद बड़े-बड़े व्यंजनों में नहीं मिलता। पहले हर मसाले घर में कूटे जाते थे। यहांँ तक कि ठेलों में नमक की डल्लियाँ भी ५-१० पैसे किलो बिका करती थीं, उन्हें भी खल-बट्टे में कूटकर छान कर नमक बनाते थे। मैं और मेरे बड़े भैया (अंशुमान) खल बट्टे में खड़ा धना,हल्दी, मिर्ची, नमक सभी कूटा करते थे और अपने मजबूत हाथों से पचास-पचास, सौ-सौ घन मारा करते थे। हमारी मम्मी सिल में मसाला पीसकर बढ़िया सब्जी बनाया करती थीं। मम्मी को देखकर मैं भी बहुत सारी चीजों को बनाना सीखती थीं और मम्मी जब मामा जी के यहांँ मंडला चली जाती थीं, तब भोजन बनाने की जिम्मेदारी मेरी रहती थी। साथ साथ क्रोशिया कवर,दो सूती यानि मैटी की कढ़ाई और ऊनी स्वेटर की बुनाई आदि भी किया करती थी।
स्कूल में बेहोश
एक बार का वाकया याद आता है। हम करीब ११ बजे स्कूल के लिए घर से पैदल ही निकलते थे तो पेट भर खाना खाकर ही स्कूल जाते थे। उस दिन शायद कुछ ज्यादा ही खा लिया था। स्कूल पहुंँचकर प्रार्थना की लाइन में लग गई। धूप कुछ तेज थी, एकदम से चक्कर खाकर गिर पड़ी। पूरे स्कूल और टीचर्स में हड़कंप मच गया कि संगीता बेहोश हो गई । डॉक्टर बुलाया गया, कुछ देर चेकअप के बाद डॉक्टर ने कहा- खाली पेट के कारण चक्कर आ गया होगा।जब कुछ देर में जब मेरी तंद्रा टूटी, तो मुझे पूरी बात समझाई गई। मैं जोर से हंँस पड़ी क्योंकि खाली पेट तो था ही नहीं और मेरी हंँसी सुनकर सभी की जान में जान आई। मुझे थोड़ी देर में घर पहुंँचा दिया गया । मैंने मम्मी को पूरी बात बताई तो वो भी हंँस पड़ीं। पता चला कि तेज धूप की वजह से कभी-कभी बच्चों को ऐसे चक्कर आ जाते हैं।
मीरा के कृष्ण
ऐसे ही जब मैं ११ वर्ष की रही होऊंँगी, हमारे परिचित रिप्पू भैया के यहांँ गणपति जी की झांँकी सजाई जाती थी। उनकी बहन मुझे मम्मी से पूछ कर अपने घर ले जाती और मैं भी गुझियाँ, पपड़ियांँ, खुरमा खाने की लालच में उनके साथ चली जाती। कृष्ण-राधा की झांँकी में मुझे कृष्ण के रूप में सजाया जाता क्योंकि मेरे बाल घुंँघराले ही थे, और चेहरा भी गोल मटोल था, तो कृष्ण रूप रखते ही सब मेरे सुंदर रूप पर मोहित हो जाते थे। मैं स्वयं अपने को देखकर आश्चर्य में पड़ जाती थी। उस समय बहुत दूर-दूर से लोग इस झांँकी को देखने आते थे। उन दिनों एक भक्तन जिन्हें सब मीराबाई कहा करते थे, जिनके पूरे बाल लटों जैसे थे, वे सच में कृष्ण भक्ति में ही लीन रहा करतीं थीं। दीन-दुनिया से उन्हें कोई सरोकार नहीं था। वह मेरा कृष्ण रूप देखकर स्वयं अपने कृष्ण की छवि का दर्शन करती थीं । मुझे खूब प्यार करतीं, भोग बनातीं और मुझे अपने हाथों से खिलातीं। बड़ा अद्भुत संयोग होता था। लोग उन्हें और मेरा कृष्ण रूप देखने के लिए बहुत उत्साहित रहते थे। हमारी झांँकी कृष्ण लीलाओं से भरपूर होती थीं और कई बार ईनाम भी जीतने का मौका मिला। कृष्ण झांँकियांँ कभी-कभी बरमान तक जाति थीं।स्कूल की तरफ से राम और लक्ष्मण बनने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ। वह लाल-नीली चमकीली ड्रेस मुझे बहुत सुंदर लगती थी।
नरसिंह मंदिर और साँप
नरसिंहपुर में एक प्रसिद्ध नरसिंह मंदिर है,जो पांँच मंजिला है। कभी भी उसके तलघर खुले नहीं थे। एक दिन पूरे शहर में हल्ला हो गया,कि नरसिंह मंदिर के तलघर खोले जा रहे हैं। बस फिर क्या था,पूरा शहर और आसपास के क्षेत्र से भीड़ उमड़ पड़ी। हम सभी तलघर देखने की उत्सुकता और भगवान की संपूर्ण मूर्ति देखने के उत्साह से मंदिर चल पड़े। मैंने बहुत छोटी सी उम्र में नरसिंह भगवान जी जिस पर विराजे हैं,वह आधार स्तंभ देखा और प्रणाम किया और उसके नीचे से जो पीछे का विशाल तालाब था, वह नजर आ रहा था। बहुत ही विचित्र और खौफनाक नजारा लग रहा था। कहते हैं इस तलघर के नीचे एक और तलघर है, जहांँ पर मूंँछोंवाले सांँप रहते हैं, नीचे जाने की हिम्मत किसी की भी नहीं थी। इस तलघर में गहरी सीलन की बदबू, यहांँ-वहांँ लटकते अजीब से पेड़-पौधे और सदियों पुराने डरावने जाले, ढेर सारे जीव जंतुओं के अवशेष देखकर सबके मन में एक अजीब सा डर उत्पन्न हो गया था। भगवान के दर्शनों के समय उन्हें वस्त्र पहना दिए जाते हैं, असली मूर्ति छुप जाती है परंतु मैंने पूरी मूर्ति देखी, जिसमें उनके चेहरे पर भाव साफअंकित थे और वह वीभत्स दृश्य जिसमें हिरण्यकश्यप का पेट फाड़कर आँते बाहर निकल रहीं हैं, देखकर सच में मन में एक अजीब सा डर समा गया। डर इतना गहरा बैठ गया कि कई दिनों तक सो भी नहीं पाये थे। तब पापा जी ने गायत्री मंत्र का जाप करने के लिए कहा तब कहीं जाकर मन शांत हुआ। वो डर आज भी मुझे कभी-कभी याद आ जाता है।
घुमक्कड़ी से डाँट
एक और छोटी सी घटना सहेलियों के साथ की है। पहले वह चमकीले कपड़े की फ्रॉक बना करती थी, वह स्पेशल फ्रॉक पहन कर हम हमारी सहेली के बर्थडे मनाने के लिए मम्मी से पूछकर उसके घर गए। बर्थडे सेलिब्रेशन के बाद वहांँ पर सभी सहेलियों ने मिलकर झलरया जाने का प्रोग्राम बना लिया। जहांँ खेत ही खेत थे, और ढेर सारे पेड़ बेर के भी पेड़ थे। चारों तक अमराई और कुछ दूरी पर बेर के पेड़ थे। हम सबने मिलकर खूब मस्ती की। बेर के पेड़ों में घुसकर खूब बेरें झोरीं। कांँटों से हाथ-पैर छिल गए। शाम को जब घर वापस आए, तो मम्मी ने पूछा कि हाथ-पैर छिल कैसे गए? तुम तो बर्थडे पार्टी में गई थी। जब उनको और पापा जी को पता चला, कि हम सब बच्चे खेतों में चले गए थे तो उन्हें चिंता हुई, क्योंकि वहांँ नहर और रहट का पानी बहुत गहरा होता है। पापा जी ने हमें खूब डांँटा और बाद में समझाया, कभी अपन सब साथ में चलेंगे, ऐसे अकेले नहीं जाना चाहिए। तब मुझे समझ में आया,कि जहांँ भेजा गया हो केवल वहीं जाना है, उसके अलावा कहीं और नहीं जाना चाहिए। बचपन में जिए गए वे दिन,वे वाकये और वो समय कभी भुलाया नहीं जा सकता। अपने मन में हमेशा बचपन को जिंदा रखना चाहिए।वे शरारतें, वे मस्तियांँ जीवन को सहज और सरल बना देतीं हैं। बड़ी से बड़ी मुश्किल में भी जिंदगी आसान लगने लगती है। बचपन जीवन का वह कुसुमित सुमन है , जो सबसे सुंदर और सुरभित होता है।
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द्वारा- श्री जयंत भारद्वाज AD-१६ भूमिका रेजिडेंसी, शिर्डी पुरम, जेके हॉस्पिटल रोड, भोपाल, मध्य प्रदेश
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२४. संजीव वर्मा 'सलिल', जबलपुर, मध्य प्रदेश
२५. संतोष शुक्ला, नवसारी, गुजरात
बचपन के दिन
चंचल बचपन, नटखट बचपन
रहता सदा छना छन छन छन
उछल कूद थी, भागा-दौड़ी
कभी रेल जाती थी दौड़ी
चेयर हो या आलू रेस
दौड़-भाग कर जीतो रेस
छुपन-छुपाई गिट्टी फोड़ो
गिरो पड़ो हिम्मत मत छोड़ो
इंटरवल की घंटी बजती
दौड़ सभी की घर की लगती
जैसे-तैसे खाना खाकर
झट विद्यालय पहुँचे जाकर
मिला न खाली यदि झट झूला
गाल हमारा फिर तो फूला
खेल कबड्डी टूटी हड्डी
कभी न लेकिन हुए फिसड्डी
बचपन की खुशियाँ अनंत हैं
मन में रहता नित बसंत है।
गलती मानी, की नहीं
परिवार और आसपास के वातावरण का बचपन पर बहुत प्रभाव पड़ता है। अम्मा, बाबू जी और आठ बहनों-भाइयों में कभी लड़ाई-झगड़ा और मार-पीट नहीं हुई। सब एक दूसरे से बहुत प्रेम करते थे। दो बहन और एक भाई तो ऐसे थे कि किसी और की गल्ती को अपनी बताकर उसको डाँट खाने से बचा लेते थे। एक बार की बात है बाबू जी ने चार चवन्नियाँ कमीज की साइड वाली जेब में रखी थीं, जब उनको नहीं मिलीं तब सबसे पूछताछ की गई, किसी ने ली होती तो बताता, नाराज हो कर कहा कि सबकी पिटाई होगी तभी पता चलेगा। मझले भाई गोपाल ने सबको मार न पड़े इसलिए कहा कि मैंने ली थी। बाबू जी! उसकी ईमानदारी पर बहुत खुश हुए। माँ ने कमीज धोते समय पाया कि जेब की सिलाई खुल जाने के कारण चवन्नियाँ नीचे चली गईं थी और दिखीं नहीं। बाबू जी ने गोपाल से कहा तुमने झूठ क्यों बोला उसने कहा कि सबको मार न पड़े इसलिए। भाई को गले लगाकर बाबू जी रोने लगे।
सामाजिक सौहार्द्र
बाबू जी एशिपा की सबसे बड़ी चीनी मिल में काम करते थे। फैक्ट्री एरिया में रहने के कारण बहुत सी सुख-सुविधा उपलब्ध थी जिनसे मिल एरिया से बाहर रहने वाले वंचित थे। पद के अनुसार बड़े -छोटे बँगले, क्वार्टर्स रहने के लिए मिलते थे। बाबू जी को जहाँ क्वॉर्टर मिला था वहाँ आमने-सामने और लाइन से सटे-सटे क्वार्टर्स थे। कुछ क्वार्टर्स के बाद गैप होता था। सामने की लाइन में तीन थे हमारी लाइन में छे। ये बाहर से तीन ही थे। अंदर एक में दो बने थे। इस वजह से पास-पास रहने के कारण लोग बहुत आत्मीयता से रहते थे। कोई कहीं का था तो कोई कहीं का लेकिन बाबा-दादी, चाचा-चाची, ताऊ-ताई, मौसा-मौसी, मामा-बुआ सभी अपने परिवार की तरह रहते थे। सभी के परिवार तो दूर रहते थे पड़ोसी ही सब अपने थे। मुस्लिम, ईसाई, पंजाबी, बंगाली, महाराष्ट्रियन, बिहारी आदि सभी एकता सूत्र में बँधे थे। इस फैक्ट्री में कन्फेक्सरी भी थी जहाँ लैमन ड्राफ्ट टांगी भी बनती थी। वहाँ काम करनेवाले मामा ने मुझे टाॅफी दी, मैंने ले तो ली पर खाई नहीं। ऐसे आत्मीय लोगों के बीच में बचपन बीता। यह उस समय की बात है जब केवल पीले बल्ब ही जलते थे।
जोर का झटका धीरे से लगा
मौसी की शादी में लखनऊ जा रहे थे। लखनऊ पहुँचते पहुँचते शाम हो गई। स्टेशन पर नीली रोशनी हो रही थी। सब लोग आगे बढ़ रहे थे लेकिन मैं बल्ब के नीचे रुककर अपनी फ्राक देख रही थी जो उस रोशनी में बहुत अच्छी लग रही थी। मेरे जूतों की आवाज बंद होने कारण मुड़कर देखा गया ,डाँट कर जल्दी चलने कौ कहा गया। मैं नीले प्रकाश में सुंदर दिखने वाली अपनी फ्राॅक को देखे जा रही थी। मेरी बड़ी बहन बाबा दादी कै पास लखीमपुर में रहती थीं और मैं अम्मा बाबू जी कै पास गोला में रहती थी। फैक्ट्री का एक प्राइमरी स्कूल था, मैं उसी में पढ़ती थी। हमारी बालपोथी हुआ करती थी। हम जब लखीमपुर से लौटते थे तब उसके पाठ मन ही मन दोहराने लगती थी, लौटते ही बाबू जी सब पूछते थे न बता पाने पर बहुत नाराज होते थे। मेरी छोटी बहन मेरी गोद में रोए जा रही थी, चुप ही नहीं हो रही थी। घर में एक टेबल लैंप था जिसमें रंगीन बल्ब लगा हुआ था, मेरी समझ में आया कि रोशनी कौ देख कर ये चुप हो जाएगी, मैंने लैंप हाथ में लेकर जैसे ही उसे जलाया बहुत जोर का करंट का झटका लगा और मैं गिर गई। वैसे लैंप में बहुत लंबा तार लगा था पर अम्मा जी ने उसी दिन लपेटकर मेज पर रख दिया था, इसलिए झटका लगतै ही उसका प्लग निकल गया और हम दोनों बच गए।
रेल यात्रा
हम लोगों को गोला से लखीमपुर जाना था। स्टेशन पर पहुँचने पर पता चला कि ट्रेन अगले ट्रैक पर आएगी। अम्मा बाबू जी और छोटे भाई और बहन थी। मेरी गोद में छोटी बहन थी, ट्रेन आने की हलचल शुरू हो गई। मैं प्लेटफार्म के किनारे से थोड़ी ही दूर पर थी। मैंने सोचा कोई उस ट्रैक पर जा ही नहीं रहा है, मैंने यह सोचा कि ये लोग बड़े हैं, जल्दी से चले जायेंगे इसलिए मैं जल्दी से पहली पटरी पार कर दूसरी तरफ चली गई। बाबू जी यह देख फुर्ती से मेरै पास आ गए कि किसी और न आता देख फिर इधर आएगी तभी धड़धड़ाती ट्रेन आ गई। बाबू जी के एक मित्र भी साथ में आए थे, उन्होंने अम्मा जी और भाई को बैठाया। ट्रेन चल पड़ी ,अगले स्टेशन पर बाबू जी मुझसे यहाँ से हिलना नहीं कहकर उन्हें देखने उतरे औेर अगले स्टेशन पर मुझे लेकर गए। लखीमपुर से आगे कानपुर भी जाना था लेकिन मुझे दादी बाबा के पास छोड़ दिया गया।
मुँहबोले नाते
तीन आवास गृहों में से एक में हमारा परिवार और दूसरे में सीजनल ड्यूटी वाले दो भाइयों का परिवार था। उसके बाद वाले आवास गृह में जो रहते थे वे मुँहबोले ताऊ-ताई थे उनके दो लड़कियाँ और एक छोटा लड़का था। दूसरे क्वार्टर में मुँहबोले मौसा-मौसी रहते थे, उनके कोई संतान नहीं थी लेकिन सब बच्चे उनके घर में खेलते थे। एक दो महिलाएँ उनके घर बच्चों को भेजने से मना करती थी। ताऊ हम सबको आम-जामुन के सीजन में बाग ले जाते थे। बहुत अच्छा वातावरण था। उनकी लड़कियाँ और हम लोग गुड्डा-गुड़िया खेलते, विधिवत उनकी शादी करते थे बाजे-गाजे के साथ। अम्मा जी बहुत सुंदर गुड्डे-गुड़िया बनाती थीं। सारा बचपन इसी क्वार्टर में बीता। फैक्ट्री में वार्षिकोत्सव मनाया जाता था। महिलाओं, पुरुषों और बच्चों के लिए अलग-अलग प्रतियोगिताएँ होती थीं । नाटकों का मंचन भी होता था। सुंदर-सुंदर पुरस्कार मिलते थे। मनोरंजन के लिए जब-तब चलचित्र भी दिखाए जाते थै। हमें प्रायः क्वार्टर आखीर का ही मिला, इसका लाभ भी मिलता था फुलवारी के लिए जगह मिल जाती थी। क्वार्टर्स की आखिरी लाइन के बाद मेन सड़क थी जहाँ से एक तरफ स्टेशन जाने का रास्ता था। वहाँ फैक्ट्री का गेट था। दूसरी तरफ के गेट से आगे मंदिर, चौराहा तथा वहीं से और आगे कई रास्ते थे। गेट से एक ओर गाँधी स्मारक विद्यालय था और आगे गन्ने लदे ट्रक-बैलगाड़ियाँ फैक्ट्री में जाते थे। मुख्य सड़क पर शंकर जी और रामचंद्र जी की बारातें निकलती थीं। हम लोग भाग- दौड़कर देखने जाते थै। फैक्ट्री के प्राइमरी स्कूल में मैं पढ़ती थी। वहाँ क्लब का बड़ा सा हाॅल था, आरंभ में दो-तीन कक्षाएँ, उसमें तथा कुछ बरामदे मैं लगती थीं। कुछ समय बाद नयी बिल्डिंग बनी तब से सब कक्षाएँ विधिवत कमरों में लगने लगीं। झूले, फिसल पट्टी तथा अन्य खेल -कूद के साधन थे। इंटरवल होता तो भाग-दौड़ कर घर पहुँचते और जल्द-से-जल्द भाग-दौड़कर झूलने लगते।
मिट्टी से खिलौने
क्लब के अध्यक्ष ही हमारे हेडमास्टर जी थे। मास्टर जी तो कई थे पर अब दो का ही नाम याद है, धनीराम मास्साब और अवध बिहारी मास्साब। हेडमास्टर जी गणित पढ़ाते थे। वे सवाल की आधी इबारत बोलकर रुक जाते थे। तब तक मैं सारी प्रक्रिया जल्दी से कर लेती थी। जैसे ही आगे का सवाल पूरा करते मैं झट से सवाल हल करके दिखाने ले जाती थी बच्चों में पहले दिखाने की होड़ लगती थी। हमारी कक्षा ५ की परीक्षा बोर्ड की थी। प्रयोगात्मक परीक्षा में मिट्टी से ३ चीजों में से एक बनानी थी। मैंने तीनों का प्रयास किया, कोई अच्छा बन ही नहीं पा रहा था, तब तक समय समाप्त हो गया। मुझे नहीं पता था कि मास्साब देख रहे हैं, उन्होंने कहा कि वाह! तुमने तो तीनों ही अच्छी बनाई कहकर मेरी प्रशंसा की। फैक्ट्री में वार्षिकोत्सव मनाया जाता था।
परीक्षा फल शून्य
मेरी कक्षा ६ और ७ की पढ़ाई आर्य कन्या पाठशाला में हुई। फैक्ट्री की तरफ से एक वाहन नियुक्त किया गया था जो एक निर्धारित समय और स्थान पर खड़ा रहता था, वहीं से लड़कियों को ले जाता और वापिसी में वहीं छोड़ता था। उस पाठशाला में शिक्षिकाओं के निवास की भी व्यवस्था थी। एक प्रधानाध्यापिका और कई अध्यापिकाएँ थी। उन्हें क्रमश: बदी उस्तानी जी और छोटी उस्मानी जी कहा जाता था। इंग्लिश की टीचर मुझे बहुत अच्छी लगतीं थीं, मुझे आज भी उनकी शक्ल याद है। सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होते थे। दादी के देहांत के बाद बड़ी बहन भी हम लोग के पास आ गई थीं। वो इसी पाठशाला मैं कक्षा ८ में पढ़तीं थीं। आठवीं की परीक्षा बोर्ड की थी। पाठशाला का पिछले वर्ष का परीक्षाफल शून्य था और उस वर्ष का भी शून्य रहा, फलतः बहन अनुत्तीर्ण रहीं। मैंने आठवीं कक्षा वहाँ पढ़ने से मना कर दिया कि हमें फेल नहीं होना।
सहशिक्षा
अब हम दोनों बहनों का गाँधी स्मारक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय की कक्षा ८ में नाम लिखवा दिया गया। यहाँ बालिका और बालक विभाग अलग-अलग लगते थे। बीच में गहरे नीले रंग का पर्दा लगा था। एक छोटी गुरू जी और एक बड़ी गुरू जी थीं। छुट्टी के समय पहले लडकियाँ निकलती थीं, फिर लड़के। दोनों गुरुओं की कड़ी निगरानी रहती थी। पढ़ाई अच्छी होती थी। इंटरवल के बाद इंग्लिश का पीरियड होता था,थोड़ी देर शोरगुल रहता था। एक दिन लड़कियाँ उन मास्साब की नकल बना रहीं थीं, तभी मास्साब आ गए और सबको खड़े रहने की सामूहिक दंड मिल गया। इसके पहले कभी कोई सजा नहीं पाई थी, बहुत खराब लग रहा था।
संतोष नाम लड़के और लड़की दोनों का होता है। इससे कई बार मैं उलझन में पड़ गई। सिर और आँख में दर्द के कारण चश्मा लगाना पड़ता था, उन्ही दिनों गाना नया-नया चला था 'चश्मे बद्दूर' तो शर्म के कारण चश्मा लगाकर नहीं आती थी बस्ते में रखकर लाती थी।
पढ़ते पढ़ते कक्षा १० में आ गए। स्वतंत्रता संग्राम का शताब्दी वर्ष मनाया जा रहा था अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रम हो रहे थे। रैली निकाली जा रही थी, मेरी बड़ी बहन भारत माता बनी थीं, एक छात्रा लक्ष्मीबाई। लड़के तात्पा टोपे, मंगल पांडे आदि बने थे। एक अन्य कार्यक्रम में बहन मेनका और मैं उर्वशी बने थे। ऐतिहासिक नाटक का मंचन भी हुआ था जिसमें मैंने हाड़ारानी का किरदार निभाया था। कक्षा स्तंभित रह गई थी जब मैंने इस किरदार के लिए अपना हाथ उठाया था क्योंकि इसके पहले मैंने भाषण न देने के कारण मास्साब से १० मिनट खड़े रहने की सजा पाई थी लेकिन मास्साब ने बाद में माफ कर दिया था। बच्चों को प्रोत्साहित करने के लिए सप्ताह में एक दिन इस प्रकार का आयोजन करते थे। कई प्रकार की खेल प्रतियोगिताएँ भी सम्पन्न हुई थीं , मुझे भी पुरस्कार प्राप्त हुए थे। दूसरे पहलू अध्ययन की ओर चलें तो आर्ट मेरी बहुत अच्छी थी पर नंबर अच्छे नहीं आते थे, कला का पीरियड प्रिंसिपल साहब लेते थे। गृह विज्ञान अनिवार्य विषय था, पाक कला की प्रयोगात्मक परीक्षा होती थी। घर में बड़ी बहन और अम्मा जी ने कभी मुझे कुछ करने ही नहीं दिया रसोई घर में। सिलाई, बुनाई और घर की साज-सज्जा में रुचि थी। जब नंबर कम आए तो मुझे बहुत बुरा लगा और मैंने रुचि लेना आरंभ कर दिया। प्रमुख बात यह रही कि नंबर ५८ प्रतिशत ही आ पाए, कभी ६० प्रतिशत नहीं ला पाई। उस समय प्रथम श्रेणी बहुत मुश्किल से आ पाती थी। बड़े शान से गुड सेकेंड डिविजन पर खुश होते थे।
डॉ.(श्रीमती) सन्तोष शुक्ला
एम.ए.द्वय(संस्कृत, हिन्दी)
विद्यावाचस्पति (संस्कृत)
जन्म---15.08.1942
जन्म स्थान-----लखीमपुर खीरी,
उत्तर प्रदेश
निवास स्थान
गुरुदेव भवन
प्रो० चिन्तामणि शुक्ल
58, कृपया पुरी
मथुरा
पति का नाम- स्व.श्री विजय कृष्ण शुक्ला
पिता का नाम - स्व.श्री ब्रज नारायण त्रिवेदी
माता का नाम स्व. श्रीमती सौभाग्यवती त्रिवेदी
प्रकाशन - साझा संकलन 'विहग प्रीति के', 'गीतिका है मनोरम सभी के लिए,' 'तन दोह मन मक्तिका ' में प्रकाशित रचनाएं।
काव्यांजलि तथा ज्ञान सवेरा पत्रिका में प्रकाशित रचनाएं।
एवं अप्रकाशित रचनाएं।
'दोहा है आशा किरण ' भाग ४ में प्रेषित दोहे।
प्रकाशित पुस्तकें
'काव्य कालिंदी '
' खुशियों की सौग़ात ' दोहा सतसई
छंद सोरठा ख़ास।
मेरा पता-
Santosh Shukla
C/o.
Manish Shukla
333 ,shaligram Bungalows
B/H Shital hotel
Gread
Navsari (Gujarat)
396424
Mobile number
9874142100
Santosh Shukla 42a@gmaili.com
***
२६. सरला वर्मा 'शील', भोपाल, मध्य प्रदेश
जन्म स्थान,, बसना जिला महासमुंद छत्तीसगढ़, 2 जून
1957,
शिक्षा, एम.ए.(समाजशास्त्र)
पिता, स्मृति शेष महावीर प्रसाद श्रीवास्तव,
माता, स्मृति शेष यशोदा देवी श्रीवास्तव,
जीवनसाथी, स्वर्गीय, आदरणीय श्री सुशील वर्मा,
प्रकाशित पुस्तक,, कविता संग्रह, जीतने की जिद, ममता की छाँव
साझा संकलन,,, फूल बगिया, चंद्रयान-३**
पता,, 456/एचआई जी , ई,,_7, मालती हॉस्पिटल के पीछे, अरेरा कॉलोनी भोपाल,
462016(मध्य प्रदेश)
संपर्क फोन,9770677453,
बचपन के दिन
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फिर याद आ गया, मुझे, बचपन का, जमाना,, वो मस्त जिंदगी थी सफर था वो सुहाना*
बचपन की सुनहरी यादों को लिपिबद्ध करने में स्वयं बचपन की देहरी ,आंगन बगिया ,खेल पढ़ाई सभी एक साथ मन: पटल पर टकराने लगे, कहां से आरंभ करें ,यादों की बाढ़ में सबसे पहले,,, बाबूजी जो सामने खड़े हैं, और मुझे 'मेरी जुगनू' कह कर बुला रहे है।
मैं कूदती फांदती उनकी गोद में जा बैठती,, अम्मा जब पान बना कर कहतीं, बाबूजी को देकर आओ, तब तो मुझे बहुत दुलारते,, क्योंकि मैं सभी भाई बहनों में छोटी थी। मेरे बाद मेरी छोटी बहन और, मुझमें 5 वर्ष का अंतर है । उनके दुलार की मिठास अभी भी याद करने पर, मुझे वही बचपन में ला खड़ा करता है।
हमारे घर से पाठशाला की दूरी करीब 1 किलोमीटर थी, पैदल ही बस्ता लेकर जाना होता था ।सरकारी स्कूलों में जमीन में टाट पट्टी पर बैठकर, बाल भारती, पाठ्य पुस्तक की कविताएं, और पहाड़े जोर-जोर से बोल कर याद करते थे।
सबसे अधिक मनोरंजक मजेदार पढ़ाई का आखिरी घंटा लगता था, जिसमें तरह-तरह खेल, खो-खो अंताक्षरी हुआ करते थे।
घर से गरम खाने का टिफिन ठीक 2:00 बजे मध्यान्ह में खाने की छुट्टी आता था,, खाना खाने के बाद भी 10 पैसे के चने, मुरमुरे या मिर्च का भजिया जरूरी होता था।
स्कूल से वापस लौटने में भी जल्दी-जल्दी पैदल चलने की होड़ होती,, घर पहले कौन पहुंचेगा , कभी-कभी इसी बात पर शर्त लग जाती थी,, सामने वाले पेड़ को पहले जाकर कौन छूएगा।
पढ़ाई लालटेन की रोशनी में होती थी,,, जमीन पर दरी बिछाकर लिखने पढ़ने में कोई असुविधा नहीं महसूस होतीथी।
प्राकृतिक सौंदर्य से घिरा हुआ गांव,, जहां आम के बड़े बगीचे,खलिहान
और खलिहान में एक झोपड़ी ,जहां एक खटिया और कुर्सी, पानी की मटकी
रखी रहती थी, रविवार के दोपहर को दो-तीनघंटे खलिहान में जाना पड़ता था। वहां खेतीहर मजदूर अपना भोजन बनाते, चावल (भात)और सिलबट्टे की चटनी,,
हम लोग कभी-कभी उसका भी स्वाद लिया करते थे। ,,, कभी-कभी पत्ते में चावल का आटा लपेटकर रोटी बनाई जाती थी, जिसे पनपूर्वा रोटी कहते हैं,, अंगार में सिकने के कारण उसका स्वाद , सोंधापन और मिठास जो व्यक्त नहीं किया जा सकता। खाने काआनंद लेते थे।
घर पर बैलगाड़ी थी, कभी-कभी हम मेला देखने या, शहर बैलगाड़ी में जाया करते थे,, गाड़ी में दरी गद्दा चादर बिछाकर गाड़ीसजाई जाती थी,, कभी-कभी गाड़ी वाहक के बगल में बैठकर बैलगाड़ी चलाया करतेथे।
बैलों के गले में बंधी रस्सी कुछ संभाल लेते थे।
गर्मी की छुट्टियों में आम के बगीचे में ,रखवाली को जाते वही ढेर सारे ,आम चूसने वाले बाल्टी में पानी भरकर डुबो दिए जाते थे, और वे बेहिसाब खाया करते थे।
आज भी सपने में वही घर आता है , जहां बचपन बीता
बड़े-बड़े बरामदे बड़ा सा आंगन ,भंडार गृह, तुलसी चौरा, गौशाला कुआं बहुत बड़ी बगिया फूलों वाली, हुआ करती थी ।घर के आगे पीछे,, आम ,जामुन, अनार करौंदे, सीताफल, आंवला अमरूद,, सब फल लगते,,
खुद पेड़ पर चढ़कर तोड़कर खाया करते थे।
घर के पीछे तरफ एक
सब्जियों की अलग बाड़ी थी,
इसमें टमाटर, धनिया, पालक, मेथी मटर बैंगन सेम, चने की भाजी, सभी कुछ लगाई जाती और ताजी-ताजी थोड़ी भी जाती थी। खेत में कभी-कभी गन्ना आलू और शकरकंद, लगाया जाता ,,जिसके लगाने की विधि भी बिल्कुल अलग है,,
अभी भी वह बावली कुंआ,
वहां बगीचे में नमी बनी रहती थी। सीताफल के मौसम में कच्चे सीताफल तोड़कर टोकनी में ,पैरा डालकर पकाए जाते थे सुबह उठकर पहले काम था ,कि देखें, किसके कितने सीताफल पक गए,, टोकनी रखने के भी अलग-अलग ठिकाने थे।
नित्य खाना चूल्हे की आज परिपकता था दूध मिट्टी की मटकी में ही पका था दही भी मटकी में ही जमता था,, दही रबड़ी मलाई सब स्वास्थ्य वर्धक और अमृतमय था,,,
शुद्ध शाकाहारी सात्विक भोजन दोनों समय गरम बनता था,, और हम क्या पूरा परिवार स्वस्थ और निरोग रहता था।
थोड़े बहुत सर्दी बुखार में अदरक शहद अदरक का रस ही काफी होता था। चोट में हल्दी प्याज का लेप लगा दिया जाता था।
आंगन के बीचो-बीच तुलसी चौरा था या अम्मा दादी शंकर जी को जल चढ़ाया करती थी और बगिया के फूल चढ़ाकर शिव चालीसा पढ़ती थी जो, सुन सुनकर हम सभी भाई बहनों को आज भी याद है।
सांध्य प्रार्थना तुलसी जी के सामने लाइन से खड़े होकर सब भाई बहन करते,,
""हे प्रभु आनंद दाता ज्ञान हमको दीजिए,, शीघ्र सारे दुर्गुणों को, दूर हमसे कीजिए लीजिए हमको शरण में ,हम सदाचारी बने, सत्य बोले झूठ त्यागे ,प्रेम आपस में करें, निंदा किसी की हम किसी से भूल कर भी ना करें, सत्य बोले झूठ त्यागे मेल आपस में रखें,
हे प्रभु आनंद दाता ज्ञान हमको दीजिए,
***,
प्रार्थना के पश्चात सभी बड़े छोटे एक दूसरे को अभिवादन करते।
बाबा दादी को कुछ विशेष दिनों में ,,जैसे राम जन्म में रामायण बालकांड निकालकर पढ़कर सुनाना ,शिवरात्रि के दिन शिव विवाह जरूर सुनाते थे ,राधे श्याम पढ़ते , पढ़ कर सुनाते थे,, रामायण के दोहा, चौपाई और छंद की लय बाबा से सीखी कैसे गाया जाता है,,
बाबा खुद हमारे साथ गाते थे । संध्या समय लालटेन की बत्ती कांच सब साफ करना,
बिस्तर लगाना ,मच्छरदानी लगाना सभी के काम बटे हुए थे,,, हम सब अपने अपने काम यथासमय कर लेते थे।
बचपन के दिनों को मैंने गीत माला में पिरोया है,,,
बचपन के दिन,,
फिर याद आ गया मुझे बचपन का जमाना,, वो मस्त जिंदगी थी,, सफर था वो सुहाना,,,,
१) खुद आम और अमरुद जामुन तोड़कर खाना,,आमों के बागानों में रखवाली को जाना,, चूल्हे की आंच में सुबह चिले का बनाना
***
फिर याद आ गया
वह पटियों से बने झूले में झूला झूलना,,, वो बहनों को बिठाकर रोज साइकिल चलाना,, कभी भूल ना पाएंगे खो-खो का खेलना
फिर याद आ गया
***
३) राखी और भाई दूज में पकवान बनाना,, वो रुमाल काढना और उन्हें ,,भेंट में देना,, मधुर याद को, रेशमीं रिश्तो में पिरोना,,
फिर याद आ गया
***
मन करता है बच्चों के साथ बचपन को जी लूं,,
संध्या के मंत्र, और आरती गालूं,,, अम्मा के जैसे बच्चों को सांचे में ढांलना
**
जीवन के खट्टे मीठे वादों को चख लिया,, कृष्णा की रहमतों से सब कुछ अदा हुआ,,,,
तेरी शरण हो कृष्णा मुझे पार लगाना तुम भूल न जाना करना ना बहाना,,,
वो मस्त जिंदगी थी सफर था वो सुहाना,,, फिर याद आ गया मुझे बचपन का जमाना,, वो मस्त जिंदगी थी सफर था वो सुहाना
**
बचपन के मधुर संस्मरणों के साथ आगे,,,
वहां बगीचे में नमी बनी रहती थी। सीताफल के मौसम में कच्चे सीताफल तोड़कर टोकनी में ,पैरा डालकर पकाए जाते थे सुबह उठकर पहले काम था ,कि देखें, किसके कितने सीताफल पक गए,, टोकनी रखने के भी अलग-अलग ठिकाने थे।
नित्य खाना चूल्हे की आज पर पकता था, दूध मिट्टी की मटकी में ही पकता था दही, भी, मटकी में ही जमता था,, दही रबड़ी मलाई सब स्वास्थ्य वर्धक और अमृतमय होता था,,,
शुद्ध शाकाहारी सात्विक भोजन दोनों समय गरम बनता था,, और हम क्या पूरा परिवार स्वस्थ और निरोग रहता था।
थोड़े बहुत सर्दी बुखार में अदरक शहद अदरक का रस ही काफी होता था। चोट में हल्दी प्याज का लेप लगा दिया जाता था।
आंगन के बीचो-बीच तुलसी चौरा था । अम्मा दादी शंकर जी को जल चढ़ाया करती थी ,और बगिया के फूल चढ़ाकर शिव चालीसा पढ़ती थी जो, सुन सुनकर हम सभी भाई बहनों को आज भी याद है।
सांध्य प्रार्थना तुलसी जी के सामने लाइन से खड़े होकर सब भाई बहन करते,,
""हे प्रभु आनंद दाता ज्ञान हमको दीजिए,, शीघ्र सारे दुर्गुणों को, दूर हमसे कीजिए लीजिए हमको शरण में ,हम सदाचारी बने, सत्य बोले झूठ त्यागे ,प्रेम आपस में करें, निंदा किसी की हम किसी से भूल कर भी ना करें, सत्य बोले झूठ त्यागे मेल आपस में रखें,
हे प्रभु आनंद दाता ज्ञान हमको दीजिए,
***,
प्रार्थना के पश्चात सभी बड़े छोटे एक दूसरे को अभिवादन करते।
बाबा दादी को कुछ विशेष दिनों में जैसे राम जन्म में रामायण बालकांड निकालकर पढ़कर सुनाना शिवरात्रि के दिन शिव विवाह जरूर सुनाते थे ,राधे श्याम पढ़ते , पढ़ कर सुनाते थे,, रामायण के दोहा, चौपाई और छंद की लय बाबा से सीखी कैसे गाया जाता है,,
बाबा खुद हमारे साथ गाते थे । संध्या समय लालटेन की बत्ती कांच सब साफ करना,
बिस्तर लगाना ,मच्छरदानी लगाना सभी के काम बटे हुए थे,,, हम सब अपने अपने काम यथासमय कर लेते थे।
बचपन में त्योहारों की अलग ही मस्ती होती थी ।प्रिय त्योहारों में राखी और दीपावली हुआ करती थी ,राखी में हमारा और हमारी बूआ का परिवार , हम साथ-साथ मनाते थे, राखी में भाइयों को हाथ की कड़ाई से बना रुमाल अवश्य भेंट करते थे,,
बुआ के बेटे और हम सब हम उम्र हुआ करते थे ,उन त्योहारों का आनंद आज भी मन को राखी उत्सव के उमंगो से भर देता है।
दूसरे दिन कजलिया विसर्जन में भी बाजे गाजे के साथ बड़े उत्साह से भजन गीत गाते विसर्जित किया जाता था।
दीपावली आई तो नए कपड़ों के साथ-साथ सबके बैग भी अलग-अलग होते। बैगों में पटाखे रखे जाते और पटाखे गिनती से बांटे जातेथे।
इसी तरह त्योहारों में होली का भी अलग आनंद होता ठंडाई घर पर बनती और बाहर चबूतरे में फाग गाया जाता,, फाग में हमारे बाबा की बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी होती थी।
गुझिया पपड़िया की मात्रा इतनी होती थी, कि एक सप्ताह तक हम वही खाते थे।
तीज पर्व का तो मतलब ही रात जागरण और फुलेहरा से होता था,, रात में ही फुलेहरा विसर्जन की योजना बना ली जाती नदी में स्नान,, करना उत्सव जैसा होता रात में ही कपड़ों की तैयारी हो जाती थी।
बचपन में अम्मा बाबूजी का अनुशासन मार्गदर्शन और मितव्ययिता, संस्कार, जीवन के हर उतार-चढ़ाव में जूझने की शक्ति देता है।
सच्चाई सन्मार्ग ,सादगी जैसे देवीय गुण कूट-कूट कर बचपन में ही भर दिए गए।
आज भी उन्हें संस्कारों पर चलकर सत्य मार्ग अपनाना और किसी विशेष परिस्थितियों में अपने संस्कारी फैसलों पर अडिग रहकर सुकून, संतुष्टि और शांति से जीवन जीना सिखाता है।
चलिए मैं बचपन की उन यादगार लम्हों से परिचित कराती हूं,, जहां बहुत कड़ाई से,, अम्मा अपनी आदेशों का पालन करवाती थी।
स्कूल का कोई भी सबक याद ना हो ,धूप में खड़ा कर देती थी,, जो सबक दिए गए हैं वह याद कर सुनाते थे, भाई बहन एक दूसरे को भी सुनाते थे, पर अम्मा को जानकारी रहती थी, कि हमें याद हुआ या नहीं।
घर में कपड़ों की दो दुकान थी एक खुले कपड़ों की और दूसरी रेडीमेड वस्त्रों की,,,
कुछ कपड़े घर पर सिलाई के लिए आते थे,, जिन्हें अम्मा सिलाई कर दी थी,,, मेरे संस्मरण में वह वाक्या आज भी कौंधता,, है ,जब मैंने कपड़ा काट कर झूठ कहा कि मैंने ,कपड़े नहीं काटे हैं।
तब अम्मा ने झूठ बोलने पर घर से बाहर कर दिया ,जब तक मैंने अपनी गलती नहीं मान ली ,, तब तकअम्मा ने घर के अंदर आने नहीं दिया,
बाल मां पर सच्चाई की बीज बोने वाली अम्मा की नई इतनी गहरी है कि कितनी भी आंच आ जाए,, सत्य का मार्ग नहीं छोड़ना,, सन्मार्ग पर ही शांति सफलता और संतुष्टि मिलती है यही संस्कार मिले।
हर सप्ताह बाबूजी पेशी लेते थे, उनको अपने काम का व्योरा देना पड़ता था। दंड और इनाम दोनों मिलता था।
कपड़े की दुकान में दोनों बड़े भैया संभालते थे,, भैया के बाहर जाने पर, हमें दुकान संभालने की जवाबदारी होती थी,,, बही खाते में उधारी वसूली लिखना सीखा।
दुकान में अखबार के अलावा पत्र पत्रिकाएं भी आते जिसमें धर्म योग अखंड ज्योति कल्याण माधुरी फिल्मी कलियां सब होता,,
फिल्मी पत्रिका देखते हुए बाबूजी की नजर पड़ गई ,तो किसी कर्मचारी के हाथ कहला भेजा कि उससे बोलो अखंड ज्योति पढ़ेगी ।फिल्मी पत्रिकाएं पढ़ना सख्त मना था। फिल्में देखने की मनाही थी ,चाहे वह देशभक्ति वाली हो या धार्मिक हो ।
हर शनिवार को बसना में हाट लगता है,, कपड़ों की सीमित दुकान होने की वजह से हमारा कपड़ों , का काम बहुत अच्छे से चलता था।
हर रविवार की सुबह पैसे गिनने का काम,,, के साथ-साथ₹१०, रुपए ५ रुपए और१०० रुपए के नोट के अलग-अलग बंडल बनाकर एक पर्ची में लिखकर तिजोरी में रख दिया जाता था।
इसी तरह पढ़ाई के साथ बचपन के स्मरणीय पलआज भी याद करने पर ताजे हो जाते हैं,, मधुर यादों के साथ प्रसन्नता ,खुशी भी दे जाते हैं।
सरला वर्मा 'शील'
भोपाल २०२५
२७. सरिता सोनी, भोपाल, मध्य प्रदेश
मातृवत बुआ
“हरे राम, हरे राम, राम-राम हरे हरे। हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे”। यह कीर्तन गाते हुई झाँझर बजाते हुए एक बुजुर्ग व्यक्ति सुबह ४ बजे रोज़ घर के सामने से निकला करते, उनके कीर्तन की मधुर ध्वनि से हमारी नींद खुला करती थी। बचपन सबका होता है पर मेरा बचपन कुछ अलग ही था। जब मैं छह माह की थी, तभी पिताजी ने बड़ी बुआ की गोद में डाल दिया था, होश संभालने पर उन्हीं बुआ को अपनी को माँ के रूप में देखा। हमारी बुआजी किसी कारणवश अपने ससुराल से विलग हो गई थीं, उन्होंने मायके को ही अपना सब कुछ समझ कर, वहीं अपना संपूर्ण जीवन व्यतीत किया। उनकी निराशा दूर करने के लिए ई ने मुझे उन्हें गोद दिया था। पिताजी-माताजी शहर में थे। ईश्वर की अनुकम्पा से हमारे गाँव में चारों ओर का परिवेश धार्मिक था, परिवार में दादा-दादी, चाचा-चाची बुआ और मेरे छोटे भाई-बहन थे।हमारी बुआ सात भाई-बहनों में सबसे बड़ी थीं, उन्होंने पूरे परिवार को एक सूत्र में जोड़कर रखा। दिन भर जितना काम करतीं, उतना ही जीवन को उल्लासपूर्वक जीतीं, हर त्योहार को मनाना, परंपराओं को निभाना और उसी में संतुष्टि रहती थीं। शुरू से सभी छोटे भाई-बहनों को उन्होंने ही सम्हाला, जब सब अपनी दुनिया में व्यस्त हो गए तो दादा-दादी अंत समय तक सेवा की। मुझे बचपन में बहुत लाड़-दुलार मिला।
आध्यात्मिकता सर्वोपरि
हर वर्ष हमारे घर के सामने ही राम लीला हुआ करती थी। उसे देख-देखकर हम बड़े हुए। राम भगवान की मूरत कब हमारे हृदय में समा गई पता ही नहीं चला। दादा जी कहा करते- ”यह लड़की कलेक्टर बनेगी”। मैं कलेक्टर तो नहीं बनीं पर उससे भी बढ़कर जीवन में मैंने बहुत कुछ पाया। भौतिक, पारिवारिक और आध्यात्मिक हर क्षेत्र में मुझ पर ईश्वर की कृपा बनी रहती है। मुझे अपने बचपन पर, अपने परिवार पर, अपने गाँव पर बोहुत ज़्यादा गर्व है क्यों कि आध्यात्मिक प्रगति की नींव वहीं पड़ी। आज गहन सन्तुष्टि है, एक आभार है भगवान के प्रति, ईश्वर ने मेरे जीवन में आध्यात्मिकता को सर्वोपरि रखा, मानव जीवन का उद्देश्य भी यही है।
बैलगाड़ी और माचना नदी
हमारी दुकान पर बैलगाड़ी से कुछ लोग सामान ख़रीदने आते थे तो हम बच्चे कभी-कभी ज़िद करके उनकी बैलगाड़ी में बैठकर उनके साथ कुछ दूर जाया करते थे। याद करके आज भी चेहरे पर हँसी आ जाती है। घर से थोड़ी दूर पर माचना नदी का सीढ़ी घाट था जहाँ हम सब जाकर भाई-बहन लहरों का आनंद लिया करते थे। कभी उसके किनारों की रेत में सीपियाँ, चिकने पत्थर आदि ढूँढ़ते, उनका संग्रह करते, नदी में पैर डालकर बैठे घंटों बतियाने का सुख अब दुर्लभ हो गया है पर याद बहुत आता है।
चमत्कार और आनंद
हमारे घर में ही भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा बहुत पुराने समय से है। घर में ही मंदिर उनका है, वहाँ अक्सर चमत्कार देखे और दादी जी के मुख से सुने भी। हमारा पूरा परिवार एकत्रित होकर दिवाली मनाता था। इस दिवाली का सभी को प्रति वर्ष इंतज़ार रहता था, पूजा में पूरे गाँव को न्योता दिया जाता था, पूरे गाँव में प्रसाद बाँटा जाता था। पटाखे सीमित होते थे, हम मिल-बाँटकर पटाखे फोड़ते थे पर उसका आनंद असीमित था।
वीडियो हाउस
गाँव मैं पहली बार एक विडियो हाउस खुला जहाँ एक रुपया टिकट थी। हमसभी बच्चे भी कभी-कभी दादाजी से छुपकर, बुआजी के साथ सिनेमा देखने जाते थे क्योंकि हमारे दादाजी सिनेमा के बिलकुल खिलाफ़ थे। उनका घर पर कड़ा अनुशासन था पर हमारी दादीजी कथा-कहानियों की बहुत शौक़ीन थी। उन्होंने उन दिनों चंद्रकांता सीरियल टेलीविजन पर पूरा देखा था। उन्होंने पहले से ही चंद्रकांता उपन्यास पढ़ रखा था।
किताबें और गाँधी जी
घर में किराने की दुकान थी। चाचा जी को जब भी आवश्यक कार्यों के लिए दुकान छोड़कर जाना पड़ता तो हम बच्चों में से किसी को भी दुकान पर बैठा कर चले जाते थे। सामान बाँधने के लिए जो रद्दी काग़ज़ ख़रीदे जाते उसमें किताबें ज़्यादा होती थीं जिनमें चित्र कथाएँ व धार्मिक कहानियाँ होतीं। मैंने दुकान पर बैठे-बैठे कई किताबें पढ़ीं, उनमें सबसे अच्छी किताब जिसने मुझे गाँधीजी के जीवन से प्रथम बार परिचित कराया वह थी गाँधी जी की आत्मकथा। वह किताब मुझे सत्य अहिंसा के सिद्धांत की गरिमा और ताक़त का उपहार दे गई।
गाँव से शहर और पापा का स्कूटर
“हरे राम, हरे राम, राम-राम हरे हरे। हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे”। यह कीर्तन गाते हुई झाँझर बजाते हुए एक बुजुर्ग व्यक्ति सुबह ४ बजे रोज़ घर के सामने से निकला करते, उनके कीर्तन की मधुर ध्वनि से हमारी नींद खुला करती थी। बचपन सबका होता है पर मेरा बचपन कुछ अलग ही था। जब मैं छह माह की थी, तभी पिताजी ने बड़ी बुआ की गोद में डाल दिया था, होश संभालने पर उन्हीं बुआ को अपनी को माँ के रूप में देखा। हमारी बुआजी किसी कारणवश अपने ससुराल से विलग हो गई थीं, उन्होंने मायके को ही अपना सब कुछ समझ कर, वहीं अपना संपूर्ण जीवन व्यतीत किया। उनकी निराशा दूर करने के लिए ई ने मुझे उन्हें गोद दिया था। पिताजी-माताजी शहर में थे। ईश्वर की अनुकम्पा से हमारे गाँव में चारों ओर का परिवेश धार्मिक था, परिवार में दादा-दादी, चाचा-चाची बुआ और मेरे छोटे भाई-बहन थे।हमारी बुआ सात भाई-बहनों में सबसे बड़ी थीं, उन्होंने पूरे परिवार को एक सूत्र में जोड़कर रखा। दिन भर जितना काम करतीं, उतना ही जीवन को उल्लासपूर्वक जीतीं, हर त्योहार को मनाना, परंपराओं को निभाना और उसी में संतुष्टि रहती थीं। शुरू से सभी छोटे भाई-बहनों को उन्होंने ही सम्हाला, जब सब अपनी दुनिया में व्यस्त हो गए तो दादा-दादी अंत समय तक सेवा की। मुझे बचपन में बहुत लाड़-दुलार मिला।
आध्यात्मिकता सर्वोपरि
हर वर्ष हमारे घर के सामने ही राम लीला हुआ करती थी। उसे देख-देखकर हम बड़े हुए। राम भगवान की मूरत कब हमारे हृदय में समा गई पता ही नहीं चला। दादा जी कहा करते- ”यह लड़की कलेक्टर बनेगी”। मैं कलेक्टर तो नहीं बनीं पर उससे भी बढ़कर जीवन में मैंने बहुत कुछ पाया। भौतिक, पारिवारिक और आध्यात्मिक हर क्षेत्र में मुझ पर ईश्वर की कृपा बनी रहती है। मुझे अपने बचपन पर, अपने परिवार पर, अपने गाँव पर बोहुत ज़्यादा गर्व है क्यों कि आध्यात्मिक प्रगति की नींव वहीं पड़ी। आज गहन सन्तुष्टि है, एक आभार है भगवान के प्रति, ईश्वर ने मेरे जीवन में आध्यात्मिकता को सर्वोपरि रखा, मानव जीवन का उद्देश्य भी यही है।
बैलगाड़ी और माचना नदी
हमारी दुकान पर बैलगाड़ी से कुछ लोग सामान ख़रीदने आते थे तो हम बच्चे कभी-कभी ज़िद करके उनकी बैलगाड़ी में बैठकर उनके साथ कुछ दूर जाया करते थे। याद करके आज भी चेहरे पर हँसी आ जाती है। घर से थोड़ी दूर पर माचना नदी का सीढ़ी घाट था जहाँ हम सब जाकर भाई-बहन लहरों का आनंद लिया करते थे। कभी उसके किनारों की रेत में सीपियाँ, चिकने पत्थर आदि ढूँढ़ते, उनका संग्रह करते, नदी में पैर डालकर बैठे घंटों बतियाने का सुख अब दुर्लभ हो गया है पर याद बहुत आता है।
चमत्कार और आनंद
हमारे घर में ही भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा बहुत पुराने समय से है। घर में ही मंदिर उनका है, वहाँ अक्सर चमत्कार देखे और दादी जी के मुख से सुने भी। हमारा पूरा परिवार एकत्रित होकर दिवाली मनाता था। इस दिवाली का सभी को प्रति वर्ष इंतज़ार रहता था, पूजा में पूरे गाँव को न्योता दिया जाता था, पूरे गाँव में प्रसाद बाँटा जाता था। पटाखे सीमित होते थे, हम मिल-बाँटकर पटाखे फोड़ते थे पर उसका आनंद असीमित था।
वीडियो हाउस
गाँव मैं पहली बार एक विडियो हाउस खुला जहाँ एक रुपया टिकट थी। हमसभी बच्चे भी कभी-कभी दादाजी से छुपकर, बुआजी के साथ सिनेमा देखने जाते थे क्योंकि हमारे दादाजी सिनेमा के बिलकुल खिलाफ़ थे। उनका घर पर कड़ा अनुशासन था पर हमारी दादीजी कथा-कहानियों की बहुत शौक़ीन थी। उन्होंने उन दिनों चंद्रकांता सीरियल टेलीविजन पर पूरा देखा था। उन्होंने पहले से ही चंद्रकांता उपन्यास पढ़ रखा था।
किताबें और गाँधी जी
घर में किराने की दुकान थी। चाचा जी को जब भी आवश्यक कार्यों के लिए दुकान छोड़कर जाना पड़ता तो हम बच्चों में से किसी को भी दुकान पर बैठा कर चले जाते थे। सामान बाँधने के लिए जो रद्दी काग़ज़ ख़रीदे जाते उसमें किताबें ज़्यादा होती थीं जिनमें चित्र कथाएँ व धार्मिक कहानियाँ होतीं। मैंने दुकान पर बैठे-बैठे कई किताबें पढ़ीं, उनमें सबसे अच्छी किताब जिसने मुझे गाँधीजी के जीवन से प्रथम बार परिचित कराया वह थी गाँधी जी की आत्मकथा। वह किताब मुझे सत्य अहिंसा के सिद्धांत की गरिमा और ताक़त का उपहार दे गई।
गाँव से शहर और पापा का स्कूटर
आठवीं कक्षा में वार्षिक परीक्षा में मैंने अपने बैतूल ज़िले में प्रथम स्थान प्राप्त किया, सब को लगा भविष्य में अध्ययन के लिए माता- पिता के पास भोपाल भेजना ही उचित होगा। तब मेरा गाँव मुझसे छूट गया, मानो बचपन ही रूठ गया। मैं भोपाल आ गई, नवमीं कक्षा में दाख़िला हुआ, जीवन का नया अध्याय शुरू हुआ। वह कुछ ऐसा था जैसे श्री कृष्ण को गोकुल छोड़ मथुरा आना पड़ा। आरंभ में भोपाल के जीवन से ताल-मेल बिठाना बहुत कठिन लगा, तभी से मन को मज़बूत बनाना सीखा। यहाँ वह सब सुख-साधन थे, जो गाँव में नहीं थे पर अपनत्व की भावना, गाँव की माटी की ख़ुशबू, सहजता-सरलता सब खो गई थी भोपाल में मेरे पिताजी शासकीय अभियंता थे। माता-पिता दोनों ही धार्मिक, पिताजी जैन ग्रंथों के विद्वान थे। उनसे जैन धर्म के अनमोल संस्कार मिले। धीरे-धीरे मैं शहरी परिवेश में ढल गई, यहाँ भी मुझे अपने दोनों भाइयों और माता-पिता का संरक्षण एवं भरपूर प्यार मिला। पापा हम चारों बच्चों को स्कूटर पर बैठाकर घुमाने-फिराने, पिक्चर दिखाने न्यू मार्केट ले जाया करते थे। हम पाँचों को एक साथ स्कूटर पर बैठना आज भी बहुत याद आता है।
आज मैं जीवन में आए हर सुख-दुख को समभाव से स्वीकार करते हुए एक अच्छे मुक़ाम पर हूँ, संतुष्ट हूँ। ससुराल में बहुत प्यारा परिवार मिला है। इसके लिए अपने माता-पिता, बुआजी, दादा-दादी, चाचा-चाची सभी की बहुत आभारी हूँ। विशेष रूप से अपने पतिदेव की जिन्होंने मुझे हर क़दम पर साहसी और मौज में रहना सिखाया तथा मुझे आगे बढ़ने के अवसर दिए। बचपन की स्मृतियाँ तो असीम हैं, उनका आनंद भी असीम है पर सबको लेखनी में उतारना संभाव नहीं क्योंकि स्थान सीमित है।
सरिता सोनी, HIG/४६०/अरेरा कॉलोनी भोपाल मध्य प्रदेश, चलभाष ९०३९०१२१७६।
जन्म- २५नवंबर १९७४, आत्मजा-श्रीमती पुण्य कुमारी सिंघई-श्री सुरेश चंद्र सिंघई, शिक्षा- एम.कॉम., जीवन साथी- श्री अतुल सोनी, संप्रति-गृहणी, शिक्षिका, डायरेक्टर ऑफ़ कात्यायनी आरगेनिक्स।
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२८. सुरेंद्र सिंह पंवार, जबलपुर, मध्य प्रदेश
प्राथमिक शिक्षा के चार साल
मैंने कच्ची या पक्की पहली नहीं पढ़ी, सीधे दूसरी कक्षा में दाखिला हुआ। और इसका श्रेय मेरे पिता को जाता है। वे एक प्रायमरी स्कूल शिक्षक रहे। घर में पढ़ने-पढ़ाने का माहौल रहा, मसलन नींव पक्की हो गई। मैंने जिस स्कूल में प्रारंभिक पढ़ाई की उसका नाम था 'प्राथमिक बालक शाला, काकागंज' । स्कूल का भवन आधा कच्चा, आधा पक्का था, शौचालयविहीन, पास के एक कुएँ से पानी लाकर पीने के पानी की टंकी भरी जाती थी। प्रार्थना के लिए थोड़ा सा मैदान था, वहीं बारी-बारी से ड्रिल इत्यादि होती थी। मेरे पिताजी भी उसी स्कूल में पढ़ाते थे जिसमें मुझे दाखिल कराया गया था। रोज पिताजी के साथ उनकी साईकिल पर स्कूल जाता और उन्हीं के साथ वापिस आता था। स्कूल के सभी शिक्षक जानने लगे और धीरे-धीरे स्कूल के विद्यार्थियों पर भी मेरा रौब बन गया।
कक्षा २ के हमारे गुरुजी थे, श्री दीप चंद्र जैन। एक दिन मेरे गुरु जी ने घर से कुछ सबक याद कर लाने को कहा। दूसरे दिन मैं बिना याद किए ही स्कूल पहुँच गया। मेरे गुरुजी कड़क थे। उन्होनें सबक याद न करने का कारण पूछा। कोई वजह नहीं थी, मैं चुप रहा। मैंने सोचा गुरुजी डाँट-डपट कर बिठा देंगे और फिर पिताजी के होने का अहंकार भी मन में कहीं रहा होगा। एक बात और थी, मेरे पिताजी पाँचवी कक्षा को पढ़ाते थे और वह कमरा मेरी कक्षा दूसरी के ठीक सामने रहा। उस कक्षा के दरवाजे और मेरी कक्षा के दरवाजे के मध्य एक छोटी सी दहलान मात्र थी। मेरे जैन गुरुजी ने मुझे अपनी कुर्सी के पास बुलाया और मुझे हाथ खोलने को कहा। मैंने बाजू में कक्षा पाँच के दरवाजे पर यह सोचकर नजर दौड़ाई कि वहाँ सामने मेरे पिता जी बैठे देख रहे हैंऔर मुझे यदि सजा मिलेगी तो वे रुकवा देंगे। जैन मास्साब की छड़ी हवा में लहराई और सटाक से मेरी हथेली पर पड़ी। मैं दर्द से कराह उठा था। घर पर कभी न तो डाँट पड़ी थी और न मार। आँखों में आँसू आ गए। मैंने रोते-रोते फिर अपने पिताजी के दरवाजे की तरफ देखा तो पाया कि उस कक्षा का एक लड़का कमरे का दरवाजा बंद कर रहा था। मैं समझ गया कि पिताजी के कहने पर ही ऐसा हुआ होगा। जैन मास्साब ने दूसरी हथेली पर भी एक बेंत रसीद किया। पिताजी की ठसक, जान -पहचान कुछ काम न आई। मुझे अपने पिताजी पर भी गुस्सा आई और लगा कि यदि पिताजी चाहते तो मेरी पिटाई रुक सकती थी। मैं सुबकता हुआ टाट-पट्टी पर बैठ गया और छुट्टी होने तक रोता रहा। घंटी बजने के बाद जब सब बच्चे चले गए तो जैन मास्साब मेरे पास आए। बाहर टंकी में से पानी लेकर मेरा मुँह धुलाया। मुझे याद है उन्होंने अपना रूमाल मुँह पौंछने के लिए दिया और यह हिदायत देकर कि कल से सबक याद करके आना, मुझे पिताजी के पास छोड़ गए। उन दोनों के बीच कोई बात नहीं हुईं। घर लौटते समय पिताजी ने मात्र इतना पूछा कि कौन सा सबक याद नहीँ था। अब क्या था, मेरी रुलाई का दौर शुरू हो गया। थोड़ी देर बाद उन्होंने कहा कि सबक तो तुम्हीं को याद करना होगा। वहाँ मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर पाऊँगा, आगे भी नहीं। एक सख्त शिक्षक और उतने ही कठोर पिता की वह बात बाल-मन पर छ्प गई। फिर कभी सबक अधूरे रहने या गृह-कार्य पूरा न कर पाने की सजा मैंने अपने जीवन में कभी नहीं भोगी।
कक्षा दूसरी का ही एक-और मजेदार वाकया याद आ गया। दो दिन बाद २ अक्टूबर को गाँधीजयन्ती थी। हमारे गुरुजी ने कहा कि जो बच्चे गाँधी जी के बारे में बोलना चाहें वे अपना नाम लिखवा दें। मैंने अपना नाम लिखवा दिया। घर आकर पिताजी को बताया तो उन्होंने गाँधी के बारे में पाँच वाक्य लिखवा दिए। मैंने उन्हें ज्यों का त्यों याद कर लिया। दूसरे दिन मैंने अपने गुरुजी को बताया तो उन्होंने मेरी पीठ ठोकी और वे पाँच वाक्य तख्ते (श्याम पट) पर लिख दिए। कक्षा के सभी बच्चों ने उन्हें अपनी स्लेट पर उतार लिया। दूसरे दिन बाल सभा में मेरे से पहले हमारी कक्षा का एक छात्र चंद्रभान कोरी खड़ा हुआ और उसने गाँधी जी के बारे में वे पाँचों वाक्य एक साँस में बोल दिए। मैं भौचक्का रह गया। मैंने तिरछी निगाह से पिताजी की ओर देखा, वे सहजता से मुस्करा रहे थे। खैर, मैंने भी वही भाषण दिया जो मेरा पूर्व वक्ता दे चुका था, परंतु पुनरावृत्ति होने से वह उतना प्रभावशाली नहीं रहा। मेरे हिस्से की तालियाँ मेरे साथी ने बटोर लीं। घर आकर मैंने पिताजी को बता दिया कि कैसे मेरी गलती से मेरा पहला भाषण आम हो गया। ऐसी ही छोटी-मोटी गलतियों को करते हुए मैं अगली पायदान पर जा पहुँचा।
कक्षा तीसरी मेरी प्राथमिक शिक्षा का बुनियादी साल था। कक्षा और पढ़ाई में खूब मन लगने लगा। पहाड़े, कविताएँ , मन गणित, शुद्धलेख, ये मेरे प्रिय रहे। छुट्टी के एक घंटे पूर्व 'दो एकम दो' से लेकर पन्द्रह तक के पहाड़े और बालभारती की सभी कविताओं का सस्वर पाठ मेरी दिनचर्या में सम्मिलित होगया और साल के अंत तक अद्धा, पौना, सवैया, वर्गफल और घनफल का भी अभ्यास हमारे जैन गुरुजी ने कराया। मेरी नींव तो पक्की हुई, उनके बहाने जीवन केअनमोल सबक भी सीखे। तीसरी कक्षा में रहते हुए 'बाल दिवस' को मैंने अपनी स्कूल के दायरे से निकल कर जिला स्तर की प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। स्कूल संकुल से दो प्रतिभागी भेजने थे। एक दिन पूर्व हुई चयन प्रक्रिया में मुझे द्वितीय स्थान मिला। प्रथम स्थान प्राप्त करने वाली एक लड़की रही, जिसका नाम तो याद नहीं, परंतु यह अवश्य याद है कि उसने अपनी कविता पढ़ने के बाद अपने हाथ में लिया गुलाब का फूल नेहरूजी के चित्र पर चढ़ा दिया था। मेरे पिताजी ने तब मुझे बताया कि उसके प्रथम आने का वही एक कारण रहा। १४ नवम्बर की शाम एक खुले मंच पर सागर के कलेक्टर उस कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे थे। मैदान प्रतिभागियों, अभिभावकों और शिक्षकों से खचाखच भरा था। हमारे साथ आए भगवान दास पटेल मास्साब ने भीड़ को देखते हुए पिताजी से संदेह व्यक्त करते हुए कहा, - 'मंच से भीड़ देखकर सुरेन्द्र सहम तो नहीं जायेगा?' पिता जी ने तनिक विचार किया और मुझसे बोले - ''मंच पर बीच में जो माइक लटक रहा है उसमें बोलना है।'' मैंने भी सिर हिलाया और अपने नाम को पुकारे जाने पर मंद-मंद कदमों से मंच पर जा पहुँचा। खादी का सफेद कुर्ता, पायजामा, काली अचकन और उस पर लगा लाल गुलाब का फूल, सिर पर सफेद गाँधी टोपी। मंच के मध्य में माइक, खड़े होने पर उस तक पहुँच पाना मुश्किल रहा। अतः, मैंने ऊपर की ओर देखते हुए अपनी कविता 'बाबा! मैं भी नेहरु बनूँगा' की प्रस्तुति दी। मेरा स्वर जैसे ही थमा , कलेक्टर साहब ने खड़े होकर और मुझे अपनी गोद में उठा लिया और मंच पर अपने साथ बिठा लिया। शेष कार्यक्रम में मैं उनके साथ ही बैठा रहा। अपने आयु वर्ग में प्रथम पुरुस्कार के रूप में पाँच बेशकीमती पुस्तकें और प्रमाण पत्र मिला, वहीं मंच और माइक के नाम से हमेशा हमेशा के लिए भय मुक्ति, अब हजारों की भीड़ में भी मंच से बोलने में मुझे डर नहीं लगता।
मेरे कक्षा चार में आते ही पिताजी का ट्रांसफर काकागंज स्कूल से मढ़िया नाका स्कूल में हो गया। लिहाजा पिताजी ने मेरे स्कूल ट्रांसफर के लिए आवेदन किया परंतु पिताजी के स्थान पर आये श्री गंगाराम यादव जी ने मुझे रोक लिया। वे मेरे घर से एक किलो मीटर दूर केशवगंज से आते थे और मेरे घर के सामने से निकलते थे। उन्होंने दो काम किए एक प्रतिदिन मुझे स्कूल से वापिस अपनी साईकिल पर लाते थे, स्कूल तो मैं अपने दोस्तों के साथ समय से पहुँच जाता था। दूसरे, उन्होंने प्रधान अध्यापक से निवेदन कर कक्षा चार अपने पास ले ली। इस तरह वे हमारे गुरुजी और पालक दोनों बन गए। यादव गुरुजी की भाषा पर अच्छी पकड़ थी और उन्हें सामाजिक विज्ञान का अच्छा ज्ञान रहा। वे बोर्ड पर गणित उतना अच्छा नहीं समझाते थे जितना स्लेट पर। बस क्या था मुझे जब मौका मिलता स्लेट पेन्सिल लेकर उनके पास पहुँच जाता था। वे अक्सर गणित के कालखंड में हेडमास्टर के साथ गप्प लड़ाते रहते और क्लास में अपने सहपाठियों को गणित समझाना मेरे जिम्मे रहता। इसका अप्रत्यक्ष लाभ मुझे मिला, मेरा अभ्यास बढ़ता रहा। एक बार यादव गुरुजी ने हमारी बालभारती में सम्मिलित 'अंधेर नगरी' एकांकी का मंचन कराया। भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा वर्ष १८८१ में लिखे उस मूल नाटक में वर्णित चेला गोवर्धन दास का किरदार निर्वाह करने का अवसर मुझे मिला। एकांकी का निर्देशन, मंच व्यवस्था, साज-सज्जा यादव गुरुजी ने ही की। रिहर्सल में एक-एक संवाद हम लोगों को रटवा दिए। मेरे अभिनय ने खूब तालियाँ बटोरीं। उस एकांकी का एक काव्यांश मुझे आज भी याद है 'अंधेर नगरी चौपट्ट राजा। टके सेर भाजी टके सेर खाजा'।
पांचवी में यादव मास्साब ने ही हमें पढ़ाया। साल भर खूब मेहनत की उन्होंने हम बच्चों पर। उस समय पाँचवी कक्षा की परीक्षा जिला शिक्षा मंडल लेता था। वार्षिक परीक्षा के पूर्व के विद्यार्थियों का मूल्यांकन करने के लिए दूसरे स्कूल के हेडमास्टर आते थे। हमारे यहाँ आए बड़े गुरुजी, यादव मास्साब के परिचित रहे। हमारी कक्षा में आते ही वे बोले- ''गंगाराम! मैं तुम्हें और तुम्हारी अध्यापन शैली से भली-भाँति परिचित हूँ। बस, मुझे एक-दो विद्यार्थियों से मिलवा दो, ताकि मैं अपनी औपचारिकता कर लूँ। यादव जी ने जी मास्साब कहकर मुझे बुलाया। अपनी जेब से रूमाल निकाला और मेरी आँखों पर बाँध दिया। बाहर से मूल्यांकन करने आए बड़े गुरुजी रोकने लगे 'अरे गंगाराम! यह क्या कर रहे हो'। उन्होंने बड़े गुरुजी की बात को अनसुना कर दिया। मेरी ऊँचाई कम थी इसलिए ब्लेक बोर्ड के सामने बेंच रखकर मुझे खड़ा कर दिया। वहाँ एक नक्शा लटकाया गया था। मुझे उसकी ऊपर और नीचे की डंडी पकड़ा दी और बोले, सुरेन्द्र! यह भारत का नक्शा है। तुम बाँए हाथ से उसकी ऊपर की डंडी को बीच में पकड़े हो और दाहिने हाथ में नीचे की डंडी। अब बड़े गुरु जी तुमसे इस नक्शे के बारे में कुछ पूछेंगे, वह तुम्हें बताना है'। मैंने स्वीकृति मे सिर हिलाया। बड़े गुरुजी ने पूछा - 'इस नक्शे में हिमालय पर्वत कहाँ है' ? मैंने दाहिने हाथ में पकडी डंडी को छोड़ा और उसे ऊपर की डंडी पर दो अंगुल बाँए तरफ और फिर दो अंगुल नीचे ले गया और उसे अर्ध चंद्राकार घुमाते हुए नक्शे के दाहिने हिस्से पर ले जाकर रोक दिया और कहा, 'यह हिमालय पर्वत है जो भारत के उत्तर में है'। फिर उन्होंने पूछा- 'बेटा! इसमें बताओ कि गंगा नदी कहाँ है' ? मैंने अपना दाहिना हाथ बाँई अंगुली से दो अंगुल बाँए तरफ डंडी पर और चार अंगुल नीचे रखा और बोला, - 'गुरुजी! गंगा नदी गंगोत्री से निकलती हैऔर बंगाल की खाड़ी में मिलती है।' गुरुजी की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी, वे बोले, - 'दिल्ली कहाँ है?' मैं सीधा खड़ा हुआ, ऊपर की डंडी पर मध्य से चार अंगुल बाँए और आठ अंगुल नीचे लाकर अंगुली रख दी और कहा - गुरुजी यह दिल्ली है, हमारे देश की राजधानी।
बड़े गुरूजी अपनी जगह पर खड़े हो गए। बोले, 'बस गंगाराम! अब मुझे कुछ नहीं पूछना। यादव मास्साब ने कहा- ' एक मिनट मास्साब! इस बच्चे से आखिरी प्रश्न मैं करना चाहता हूँ '? बोले,' सुरेन्द्र! इस नक्शे में सागर कहाँ है'? प्रश्न सुनकर जाते-जाते बड़े गुरुजी रुक गये। मैंने नक्शे की ऊपर की डंडी के मध्य से दो अंगुल बाँई तरफ नापा और दाहिने पंजे को एक बित्ता नीचे की तरफ लाया। उस बिंदु पर एक अंगुली रखकर बताया- 'यहाँ सागर है, हमारा जिला' । ब बाँई गुरूजी ताली बजाने लगे और उनके साथ हमारे सहपाठी भी। ब बाँई गुरूजी ने कोरी मूल्यांकन सूची पर अपने हस्ताक्षर कर अंक भरने का जिम्मा यादव गुरुजी को थमा दिया और यह कहते हुए चले गए- 'गंगाराम तुम पास हो गए।' उस साल हमारे स्कूल का पांचवी का रिजल्ट सेंट पर्सेंट रहा और मुझे जिले में दूसरा स्थान मिला।
उम्र के इस पड़ाव पर सोचता हूँ, यदि जैन गुरुजी के दो डंडे न पडे होते? ऐसा भी हो सकता था कि मुझे सजा पाते देख मेरे पिता का पुत्र मोह जागृत हो गया होता और उन्होंने अपनी कक्षा का दरवाजा बंद न किया होता और यह कि पिताजी अपने स्थानान्तरण होने पर मुझे भी अपने साथ ले गए होते तो....?अंत में, यदि यादव मास्साब जैसे शिक्षक व पालक का आशीर्वाद न मिला होता तो.... क्या मैं वह बन पाता जो बन सका?
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२९. सोनी वर्मा, राँची झारखंड
पिता का नाम — डॉ शशि भूषण ज़रूहार
पति का नाम — संजय कुमार वर्मा
शिक्षा—- B.A ., B ed
स्थान—- राँची
संप्रति —- मेकॅान महिला क्लब अध्यक्ष/श्री साहित्य कुंज 'राँची' (सलाहकार)
साहित्यिक उपलब्धियाँ —
-मेरी प्रतिनिधि कविताओं में प्रकाशन
-साहित्य संवाहक पत्रिका की आजीवन सदस्य
-केन्द्रीय राज्य रक्षा मंत्री संजय सेठ द्वारा सम्मनित
-साहित्य कुंज द्वारा सम्मानित
मो. 9934120696
पूरे जीवन काल में उम्र के इस पड़ाव पर आकर यदि बचपन को मुड़कर देखती हूँ तो यह दौर बहुत सारी यादों से महक उठता है। कभी बचपन को याद कर भावुक हो उठते हैं और उसी दुनिया में वापस लौटना चाहते हैं।
बछड़ों की समझदारी
बात उस समय की है जब मेरी उम्र सात या आठ वर्ष रही होगी, उस समय मेरे पिता की पोस्टिंग राँची में थी। वे पशुपालन विभाग में पशु चिकित्सक थे। हम सब एक सरकारी आवास गृह में निवास करते थे, जहाँ और भी कई विभागों के कर्मचारी रहते थे। मुर्गी पालन और डेयरी फ़ार्म दोनों उस जगह के निकट थे। मुझे बचपन से ही पशु-पक्षी बहुत प्रिय थे। मुर्गी फार्म में हजारों मुर्गियाँ बिना लड़े-झगड़े एक साथ रहती थीं और दाना चुगती थीं। एक अनोखी बात जो आज भी सोच कर मैं प्रसन्न होती हूँ कि हम मनुष्य की तरह ही पशु-क्षी भी समझदार होते हैं। एक बार मैं किन्हीं के साथ डेयरी फार्म दूध लेने गई, मैंने देखा लगभग सौ गाय थीं, वहाँ सबके बछड़े दूसरे जगह थे, जैसे ही दूध दुहने का समय आया, मैंने देखा दुहने वाले उन्हें नंबर से पुकार रहे हैं और उसी नंबर वाली गाय के बछड़े दूर से ही अपनी माँ को पहचान अपनी माता गाय के पास आकर खड़ा हो जाते हैं।
इमली तोड़ना
मेरे साथ मेरी सहेली और मेरा बड़ा भाई भी गए थे। वापसी में लौटते वक्त हम सब अपने पसंदीदा खेल इमली तोड़ने में लग गए। सभी कोशिश कर रहे थे कि पत्थर मार कर बड़ी से बड़ी और अधिक से अधिक इमलियाँ तोड़ लें। तभी मेरे बड़े भाई ने एक पत्थर उठा कर इमली तोड़ने की कोशिश की पर वह पत्थर सीधे मेरे सिर में लगा। अब क्या था मुझे तो दिन में ही तारे दिखने लगे, मैं जोर-जोर से रोने लगी, और मेरे भैया की हालत खराब थी। वह बार बार मुझे चुप कराने की कोशिश करता रहा, चोट से सर थोड़ा फूल गया पर ढेर सारी इमली देख कर मैं खुश थी और हम लोग घर आ गए।
पिताजी और चोट का दर्द
जैसे ही शाम हुई सिर में जोरों से हुए दर्द ने सारा राज खोल दिया। अब भाई की हालत ख़राब हो गई। वह बेचारा डर कर छुप गया । मैं पिताजी की लाड़ली थी। बस पिता जी को देखकर तो उनसे सहानुभूति की उम्मीद ले, मेरा कोमल मन भावुकता से भर गया था। जब सभी ने देखा तो घरेलू उपचार शुरु हुआ पर सब इस बात पर हँस रहे थे कि चोट दिन के बारह बजे लगी और दर्द मुझे शाम को सात बजे पिताजी के आने पर याद आया। पिताजी ने भइया को जोरदार डाँट लगाई और मुझसे खूब लाड़ लड़ाया और फिर क्या था मैं अपना सारा दर्द भूल गई। आज भी इस बात को याद कर हम भाई-बहन रोमांचित हो जाते हैं ।
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खंजन सिन्हा, भोपाल
सखी! आज मन की कलम से लिख रही हूँ। सखी बचपन बहुत याद आ रहा है, इसलिए पुरानी बातें मन में हिलोर रही है तो सोचा चलो, बचपन के गलियारे में घूमकर आते हैं जब हम तुम कक्षा चौथी में पढ़ते थे। याद है वे दिन सन् १९५९ की बात होगी, हम ९ वर्ष के होंगे। राइट टाउन में रहते थे। हमारा तुम्हारा घर आजू-बाजू में था। तुम्हारे बाबा श्री राय साहब हमारे बाबा श्री कन्हैया लाल खरे आपस में दोस्त थे। हमारे बाबा रेल्वे में गार्ड थे, ५५ वर्ष में रिटायर हो गये थे। तब उन्होंने हमारे स्वर्गीय पिता श्री इन्द्र बहादुर खरे जी के नाम से एक जनरल स्टोर खोला था। उस स्टोर का नाम इन्द्र स्टोर रखा था। याद है तुमको वो स्टोर?, हम घर के स्टोर से पेन, पैन्सिल, रबर आदि लेते हुए स्कूल जाते थे।
सितारोंवाली फ्रॉक
सखी शोभना! हम-तुम दोनों घर से एक साथ स्कूल जाते थे। मढा़ताल पुत्री शाला में पढ़ते थे। रास्ते भर वो नई फ्राक जिसमें सितारे जड़े थे।हमारी माँ ने खुद अपने हाथों से सिली थी, सितारे भी उन्हीं ने टाँके थे। सितारे रात की रोशनी में खूब जगमगाते थे। फ्राक की बात करते-करते कब स्कूल पहुँच जाते थे, पता ही न चलता था। स्कूल की बहिनजी बुलाकर फ्राक देखती थी। रास्ते में भी लोग बुला-बुलाकर हमारी फ्राक की तारीफ करती थीं, साथ में माँ की बहुत तारीफ करते थे कि कितनी सुन्दर फ्राक सिली है तुम्हारी माँ ने।
बचपन का सावन
अब तो सावन का महीना चल ही रहा है। रह-रहकर बचपन के दिन याद आ गए। वो बचपन की शैतानियाँ जब स्कूल से लौटते समय जान-बूझकर बारिश में भीगते थे, बस्ते को फ्राक में छुपाकर रखते थे कि कहीं कापी-किताबें न भीग जाए। घर और स्कूल के बीच रास्ते में सावन का मेला भरा रहता था। उसमें कुछ चीजें जैसे लाख के कड़े, लाख के चपेटे सुंदर-सुंदर रंगों से सजे रहते थे। कान की बाली, झुमके और न जाने क्या क्या चीजें मन मोह लेती थी।
मटरू की चाट
उस समय घर के लोग पैसे कम ही देते थे या कहो पैसे देने का कोई रिवाज नहीं था। यदि किसी दिन दोपट्टी (दो पैसे का रुपहला सिक्का), इकन्नी (चार पैसे का सिक्का) सोने से पीली और चाँदी सी सफेद रंग में मिलती थी तो उन पैसों से कुछ खरीद लेते थे। स्कूल के गेट के बाहर मटरू कक्का अपनी चाट का ठेला लगाए रहते थे, नाम के अनुरूप मटर की चाट बेचते थे, पीले उबले मटर जिस पर लाल कुटी मिर्च चटनी डाल कर हरे पत्ते के दोने में देते थे। कभी आम का अमावट (आम पापड़) खाते थे। जैसे ही डेढ़ बजे की आधी छुट्टी होती, कुछ बच्चे उनको घेरकर चाट जल्दी बनाने को बोलते थे कि अभी छुट्टी खतम हो जाऐगी, जल्दी दो मटरू कक्का। वैसे घर से खाने का डिब्बा लेकर जाते थे पर कभी-कभी खरीद भी लेते थे। स्कूल के गेट के दूसरी तरफ रेवा ठेला लगाता था हरे-हरे पत्ते पर उबले बेर, जिस पर बिरचुन नमक डालकर देते थे, याद करो तो अभी भी मुँह में पानी आ जाता है। बिरचुन ( सूखे बेर कूटकर चूर्ण) भी खूब खाते थे। देशी चीजें खाकर बड़े हुए हैं। शाम को पूरी छुट्टी के बाद जब घर की ओर रुख करते थे। स्कूल और घर के बीच सावन का मेला लगा रहता था, मढ़ाताल में सतना क्वार्टर के सामनेवाली सड़क पर यह मेला लगा रहता था, इसी के बाजू में हमारा स्कूल था।
मन भावन सावन
वह सावन आज फिर यादों में हिलोर मार रहा है। लगा हम उसी मेले में घूम रहे हैं, खैर सावन का मेला घूमते घर आते थे। घर आकर माँ (विद्यावती) और दादी अम्मा (मानकुँअर) को मेले के बारे में बताते थे। तब वे लोग हम लोगों को फिर से मेला दिखाकर मन पसंद चीजें दिलवाती थीं। कम पैसों में भी बहुत सारी छोटी-छोटी चीजों से हमको खुश करती थीं। क्या दिन थे वो भी? वह सावन अब लौटकर नहीं आता है। केवल यादों में समाया रहता है। काश! वो दिन फिर लौटते? हम-तुम दोनों सखी एक ही शहर में रहते हुए भी व्यस्तता के कारण नहीं मिल पाए। खैर! चलो सखी फिर मिलते हैं उस बचपन के सावन को जीवंत करते हैं-
आओ सखी!
जीवन की साँझ बेला में
कब कहाँ मिलना है
किसी पार्क के झूले पर बैठकर
कजरी गाते हुए ,
किसी मेले में या माॅल में
हम तुम्हारा इंतज़ार करेंगे
मेहंदी से सजे हाथों में
खनकती चूड़ियों के साथ
रुनझुन पायल के साथ
हम तब तक इंतजार करेंगे
जब तक कि तुम
इन आवाजों के साथ
बचपन की यादों को लेकर
मेरी बाँहों में न आओगी।
तुम्हारी सखी
खंजन
गर्मी का गरम कोट
बचपन बीता जबलपुर के राइट टाउन के घर में। हमारी प्रायमरी शिक्षा जबलपुर की ही मढा़ताल पुत्री शाला जो कि श्याम टाकीज के बाजू वाली सड़क पर थी, में हुई थी।अब वह टाकीज नहीं है, उसे तोड़कर एक माल और दुकानें बना दी गई हैं। बात सन् १९५७ अप्रेल के महीने की होगी। गर्मी अच्छी पड़ने लगी थी। हम मढा़ताल पुत्री शाला में और हमारे बड़े भाई अमिय रंजन खरे जार्ज टाऊन स्कूल में पढ़ते थे। दोनों के स्कूल का मैदान एक ही था। छोटा भाई मलय रंजन स्कूल नहीं जाता थे पर बीच-बीच में हम लोगों के पीछे चला आता थे। उस समय इतने नियम-कानून नहीं थे। मलय हमारी कक्षा में बैठ भी जाता। हम कक्षा दूसरी में और बड़े भाई कक्षा चौथी में पढ़ते थे।
माता के टीके
अप्रेल के महीने में हमको माता (चेचक) का टीका लगा था। यह टीका हाथ में कलाई और कुहनी के बीच लगता था। तीन टीके एक साथ लगे थे। हमको उस टीके के कारण बुखार आ गया, हम तीन दिन तक स्कूल नहीं गए। स्कूल की गैर हाजिरी के कारण डर लग रहा था कि बहिन जी डाँटेगी। उस समय माँ पढ़ाने के लिए अपने स्कूल निकल गई थीं यह कहकर कि आज तुम स्कूल जरूर जाना तुम्हारा बुखार ठीक हो गया है। उनके आदेश का भी पालन करना जरूरी था। माँ नियम की बहुत सख़्त थी कोई बहाना नहीं सुनती थी। तब हमारे बड़े भाई अमिय ने कहा कि स्कूल जरूर चलो। हमारा गरम कोट पहन लेना, जबकि गर्मी अच्छी खासी थी । हमने भी उनकी बात मान ली। हम भाई-बहिन स्कूल की तरफ चले, रास्ते में कुछ लोग देख भी रहे थे कि गरमी में कोट पर वह उम्र ऐसी थी कि किसी की परवाह नहीं रहती। अब भाई ने रास्ते में ही हमको समझाया कि जैसे ही बहिन जी हाथ आगे करने को बोलेंगी, रूल से तुमको हथेली पर मारेंगी कि स्कूल क्यों नहीं आई? रूल उठाते ही तुम अपने पहने हुए कोट की बाँहें ऊपर की ओर खिसका लेना, यह देखकर कर तुमको मार नहीं पड़ेगी। हाथ में जो टीके लगे थे वे पककर पीले थे। ऐसा हाथ देखकर तुम मार खाने से बच जाओगी। फिर ऐसा हमको सही लगा तो हमने कहा कि हाँ, ठीक है। जब स्कूल पहुँचे तो डाँट नहीं पड़ी, बहिन जी को पता था कि हमको टीका लगा है। डाँट खाने से बच गए हम।
डर कर गया घर
याद करो तो अब बहुत हँसी आती है पर डर बहिन जी से लगता ही था। अभी भी किसी बड़ी हस्ती से डर लगता है, पता नहीं बचपन में कभी-कभी कुछ नकारात्मक विचारों से उबर नहीं पाते, जीवन पर्यंत घर कर जाते हैं। शायद पिताश्री का अल्प आयु में निधन होना ही दिमाग में घर कर बैठा होगा। वो बचपन याद करो तो लगता है कि कितने मूर्ख थे जिसने जैसा बोला वैसा ही कर लेते थे, अपनी बुद्धि नहीं लगाते थे। यही बात जब भाई-बहिन बैठते तो ज़रूर बोलते थे कि भाई इतनी गर्मी में तुमने हमको अपना गरम कोट पहनाकर स्कूल ले गये थे। बाद में हम लोग बोल बोलकर हँसी का ठहाका लगाया करते थे। हमारी यादों के पिटारे से निकली एक याद यह भी है।
श्रीमती खंजन सिन्हा: जन्म- २४ सितम्बर जबलपुर म.प्र.
पिता -
आत्मजा - स्व.श्रीमती विद्यावती खरे,व्याख्याता-स्व.प्रो.कवि इन्द्र बहादुर खरे, शिक्षा- बी.एस-सी., पति -स्व.श्री कृष्ण कुमार सिन्हा, इंजीनियर, प्रकाशित पुस्तक- समर्पित भावनाएँ, चित्रकारी, संपर्क- एम ३०३ गौतम नगर, चेतक ब्रिज के पास, भोपाल म. प्र. ४६२०२३
चलभाष- ९१६५४७१११४ ईमेल- sinhakhanjan@360gmail.com
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०७. उमा जोशी, कुमायूं
गाँव में बचपन
पाँच साल में पाठशाला
तख्ती और कमेट कलम,
खड़िया से लिखा अ आ
उसे भरने का खूब प्रयास
फिर से घर तख्ती को,
काला कर, घोंटा लगा
चमका चमकाकर
रुल खींचकर,
कच्चा एक, पक्का एक
फिर कापी कलम बाँस की
पाँच पैसे की स्याही की टिक्की,
एक काँच की शीशी में घोल,
घर आने तक हाथ मुँह कपड़े
सब स्याह रंग में रंग गए,
हाथ धोने को साबुन नहीं,
राख और मिट्टी से रगड़ना
अहा! वो बचपन के दिन,
जहाँ जाओ, जैसे खाओ
खेलो कूदो, सारा गाँव घूमो,
शाम की रोटी खा
दूर चलकर स्कूल जा,
घर आकर खाना खा,
फिर रामलीला की तालीम
😄
रामलीला देखने को भी
एक बोरा बिछाकर,
आगे की जगह हथियाना
रावण दरबार की सखी बनना
लंका के राजा-महाराजा,
दिन-रात बजे रण का बाजा,
मांस-मदिरा सदा जिनका खाना,
है जहाँ में जिनकी धूम,
तुम हो आला, विषधर काला,
शेर बब्बर हो, उससे भी जब्बर हो .....
दूसरे दिन सीता की सखी बन गाना ,
''चलो सखी गौरी को पूजन जाएँ,
बेला चमेली तोड़े,
कुछ दिन बाद हम सखियाँ
अशोक वाटिका में सीता की रखवाली करतीं,
''सपने बानर लंका जारी''
बैलगाड़ी की सवारी
दमड़क,दमड़क की आवाज,
मेले की तैयारी, चवन्नी और अठन्नी लेकर खुश,
थोड़ी मूफली अम्मा के लिए,
एक पिपरी अपने लिए,
पी पी बजाते घर ,
नंगे पैर स्कूल,वा वा भई
न सर्दी न जुकाम,
बारिश में बन्धारे का पानी भरना,
कागज की नाव बना ,
कितनी कितनी दूर चलते,
हंसते खिलखिलाते पानी फेंकते
मेरी सहेली मंजू सुबह मुझे उठाती,
उठ उठ पानी लेने चल
मैं दे लात घूंसे ,ही ही ही
आज भी जो मुझे उठाता
वही मार खाता
फिर भी मंजू कभी नाराज़ न होती
स्कूल जाने में भी मुझे ही देर होती,
पर वो मेरे बिना न जाती
जुराब की बाल बना सेवन टाइम खेलते
कभी बैट बाल खेलते
कभी गिट्टी तो कभी दांणीं,
पढ़ना तो स्कूल में ही ठैरा
घर में भी पढ़ते हैं ये क्या पता
बस ईजा जो पढ़ाती
कोयले से लिखकर
अद्धा, पौना ,डेड़ो ढाम,
एक अद्धा अद्धा ,दो अद्धा एक, तीन अद्धा डेढ़
ऐसे और फिर रात में
खाना खाने के बाद
मट्ठा बनाते देखना कि थोड़ा गर्मागर्म मक्खन मिलेगा,
फिर और सोने से पहले
कथा सुनना , यही दिनचर्या
एकदम सरल,सहज , बेखौफ बचपन
सब अपने, किसी भी पेड़ से आम तोड़ खा
फ़िक्र और चिंता थी तो एक पेटभर खाने की
बाकी सब तो मां पिताजी सोचते,
गाड़ी की तो बस बातें सुनकर खुश,, देखने को कहां मिलती,
कभी हवाई जहाज आसमान में आता तो
दौड़े - दौड़े देखने जाते बाहर ,
ओ रे देखो ,ओ रे देखो
हवाई जहाज ,
फिर ऊपर को हाथ उठाकर कहते रुको रुको,
जैसे हमारी आवाज वो सुन रहे हों
फिर अम्मा एक किस्सा सुनाती ... कि एक गांव की गरीब मां का बेटा हवाई जहाज चलाता,
अब वो घर तो आ नहीं पाया, अपनी मां को पैसे की पोटली उसने ऊपर से सीधे अपने घर पर ही फेंकी , तब वो समझ गई कि मेरे बेटे ने पैसे दिये हैं
आज भी वो स्मृति वही है मेरे लिए, और सच भी लगता है,
अम्मा ईजा खेत में जाते,
मुझे घर अकेले डर लगता
अंधेरा होते ही मुझे कोई भी सामान भूत जैसे लगता,
मैं बहुत डरती, रोती
फिर मेरे बड़े भाई मुझे और डराते,
ईजा बाबूजी को चिट्ठी लिखती, मेरा मन रखती,
दीपू और हेमन्त को समझाना, गुड़िया को बहुत परेशान करते हैं, मैं खुश होती, अब तो दोनों को डांट पड़ेगी,
कक्षा एक में दो में तीन में प्रथम पास होती , हर वर्ष पास होने पर कंगन मिलते,
पांच में बोर्ड, पास हो गई, उसी साल सड़क बनने का काम , रोलर , बुलडोजर सब देखें , मजा आ गया
कल्पना में खो गई, सड़क बनेगी गांव में, गाडियां चलेंगी, फिर मामू के घर फटाफट पहुंच जाएंगे,
मामू फ्राक बनायेंगे।
हमारे बचपन में खाना कम, संस्कार ज्यादा खिलायें जाते,
ईजा (मां) सुलेख लिखाती
अहिंसा परमो धर्म।
परोपकाराय पुण्याय परपीडनम् ।
चरित्र की रक्षा यत्नपूर्वक करनी चाहिए
बस ये वाक्य पत्थर की लकीर हो गई
एक बार स्कूल में इंजेक्शन लगाने वाले आयें
हवा फैल गयी कि हुई लगाने वाले आ रहे हैं
फिर क्या था डर से हम भागने लगे, मंदिर के अंदर छिप गये। पर पता चल ही गया,
पकड़ पकड़ कर ले गए,
मार भी पड़ी,
लाइन में खड़ा किया, अब ... क्या करें
मन मारीच की तरह डरा ,इधर से रावण डर है तेरा ,उधर से रघुवर के बाण हैं दोनों तरफ से आई कजा
बहाना ढूंढ़ते मिल गया, डेढ़ दो सौ बच्चों के बीच से कराहते हुए निकली , बांह में उंगली रखकर,कि जैसे दर्द हो रहा हुई से,
आराम से बिना हुई लगाये बाहर , अरे मजा ही आ गया,कि मैं बहुत चालाक हूं।
घर जाकर जब पता चला कि मैं ऐसे भागी सुई नहीं लगाई , हाथ में निशान नहीं
सन्न रह गई।
जो मार पड़ी, हे भगवान आज के बाद कभी ऐसे झूठ और बहाने नहीं बनाउंगी।
अब शायद बचपन जा रहा है, गणित और विज्ञान में लगने लगा है।
ओहो! ये तो बचपन की
अनगिनत मोतियों की माला
द्रौपदी के चीर की तरह
बढ़ती ही रहेगी ,
बहुत बाक़ी है अभी
लेकिन अभी इतना ही
बाकी फिर कभी और।
🙏🙏🙏
डॉ. अरुणा पाण्डे सिहोरा जबलपुर
"बचपन की कितनी यादें कितनी बातें"
बचपन की कुछ यादें साझा कर रही हूँ। चलिए शुरुआत करती हूँ पहले दिन शाला जाने से, तब हम पाँच साल के थे। हमारी किताब-कॉपी, स्लेट-बत्ती, पैन, पेंसिल, कम्पास आदि की दुकान थी, बड़ी बुआ के नाम पर उसका नाम था "कमला जनरल स्टोर्स"। भले ही हमारी शालेय यात्रा प्रारंभ होने में एक साल बाकी था पर घर पर मम्मी स्व. श्रीमती हृदयेश्वरी पाण्डे ने गिनती, अक्षर, शब्द,पहाड़े, सवाल, सब पढ़ाना शुरू कर दिया थे। हम पापा स्व. श्री सुशील कुमार पाण्डे के साथ दुकान भी जाते थे, किताबें जमाने में पापा की मदद करने। एक दिन सुबह हम दुकान पर थे घर से हमारे दादा जी स्व. श्री अम्बिका प्रसाद पाण्डे आए और बोले अरुण स्कूल चलोगी? हमारे दादा जी बीमा एजेंट थे | उसी सिलसिले में उन्हें मिश्रा सर से मिलना था। हमने कहा हमारे पास बस्ता नहीं है। पापा ने एक स्लेट देकर कहा- ''ये ले जाओ।'' शासकीय प्राथमिक शाला खितौला बाजार सिहोरा दुकान के पास ही थी। हम एक हाथ में स्लेट और दूसरे में दादा जी का छाता पकड़कर दादा जी के साथ स्कूल पहुँच गए। जिस कक्षा में दादा जी गए वो लड़कों की तीसरी कक्षा थी। मिश्रा जी ने दादा जी को बड़े सम्मान से अंदर बुलाकर कुर्सी पर बिठाया। हम दादा जी के पीछे-पीछे, तभी आवाज आई- ''अरे उन्ना आई है।'' देखा तो वह हमारे बड़े भाई (बड़े पिताजी के बेटे) बब्बू भैया याने श्री सतीश पाण्डे थे। दादा जी और मिश्रा जी ने हमें भैया के पास जाकर बैठने को कहा। भैया ने स्लेट देखकर कहा इस पर कुछ लिखो।हमने कहा हमारे पास बत्ती (आजकल सब पेंसिल कहते हैं) नहीं है तो उनके किसी मित्र ने बिल्कुल छोटी सी बत्ती दी। हम लिखते रहे। सर से बात करके जब दादा जी घर जाने लगे तो पूछा- ''अरुण! घर चलोगी कि पढ़ोगी? हमने कहा हम पढ़ेंगे।'' फिर क्या, यह तो प्रतिदिन का काम हो गया भैया कहते उन्ना स्कूल चलोगी? हम हाँ कहते और अपना बस्ता लेकर चल देते, यह सिलसिला बहुत दिन चला। जब हमारा प्रवेश पहली कक्षा में हुआ तब पहले दिन स्कूल जाने पर हमने खूब पढ़ाया गिनती, पहाड़े, अक्षर सब और घर आकर कहा कि हम तो पढ़ाने लगे, अब हमें तनख्वाह मिलेगी। उस समय घर में बुआजी स्व. शैल तिवारी की शिक्षक के रूप में नियुक्ति और तनख्वाह की बात होती थी शायद वही मन पर बैठी थी। उसी दिन शाम को शाला के प्रधान- अध्यापक स्व. श्री बाजपेयी जी ने पापा से कहा कि सुशील तुम्हारी बिटिया को तो पहली कक्षा का सब आता है। हाँ, जब महाविद्यालय में नियुक्ति के बाद पहली तनख्वाह घर लेकर आई तो मम्मी ने कहा- ''अरुणा तुम तनख्वाह तो पढ़ाने की ही लाईं। ''
एक बार हमारे एक पड़ोसी चाचा ने पापा से कहा था कि सुशील अरुणा तो रास्ते के कागज उठाकर पढ़ती है। इस आदत से जुड़ी एक और मजेदार बात है। हम जब तीसरी कक्षा में थे तब पापा की नियुक्ति नवीन विद्या भवन जबलपुर में भाषा के शिक्षक के रूप में हुई। हम लोग सिहोरा में थे। पापा ने जबलपुर में श्री भवानी प्रसाद तिवारी जी के बंगले के बगल में सराफ जी के यहाँ घर किराये से लिया था। हमें तो पापा चौथी कक्षा में जबलपुर लाए पर एक साल तक पापा हर शनिवार को रात सिहोरा पहुँचते और सोमवार को सुबह जबलपुर आ जाते। सिहोरा के घर में रविवार को जो बड़े-बड़े कमरे थे, वहाँ मम्मी झाड़ू लगाती थीं और दो छोटे-छोटे कमरों और उनके बीच के छोटे से आँगन में झाड़ू लगाने का काम हमारा था जो हम कई घंटों में करते,जिन लिफाफों (अखबार के कागज के पुड़ों) में सामान आता था, हम उन सबको खोलकर सीधा करते और पढ़ते, पत्रिकाओं के पन्नों पर पान लिपटकर आते, हम उन्हें पढ़ते। एक बार पापा ने मम्मी से कहा कि अरुणा को झाड़ू लगाने में बहुत देर लगती है तो मम्मी ने बतलाया कि वो एक-एक कागज पढ़ती है। इसी के चलते दीपावली के पहले हमें एक कागज मिला जिसमें पापा ने हिसाब लिखा था बाकी से हमें मतलब नहीं था पर आँख अटक गयी ३:५० के पटाखे। आज सोचती हूँ कि सन् १९६५ में तीन रुपये पचास पैसे में टोकरी भर पटाखे आ जाते थे। हम सब भाई-बहनों को पर्याप्त संख्या में मिलते थे। उस समय दोनों बड़े पिताजी के तीन बेटे दो बेटियाँ हम और हमसे छोटा गुड्डू याने चार बेटे और तीन बेटियों को पटाखे बँट जाते थे। बड़े पिताजी लोगों के द्वारा लाए गए पटाखे मिलाकर तो इतने पटाखे हो जाते कि बड़ी एकादसी (गन्ना ग्यारस) तक कमी नहीं होती थी।
बातें तो कितनी हैं पर एक और बात कह अभी बात समाप्त करूँगी। बचपन से ही काम करने में कभीहीला-हवाली नहीं की थी। मम्मी सामान की सूची नहीं बनाती थीं। हमें सामान बतलातीं, फिर सुनतीं कि क्या-क्या बतलाया है। |हम कुछ भूल जाते तो दुबारा बतलातीं। हम दुकान पहुँचकर पापा को बतलाते, पापा सामान ला देते,तब के बाजार छोटे, जरूरी आवश्यकताओं की पूर्ति आराम से करते। सामान घर ले जाने से पहले पापा हमें दुकान के बगल में पाण्डे लॉज या सामने लक्ष्मीनारायण मिष्ठान प्रतिष्ठान से एक गुलाब जामुन लाकर देते। आज वो सब यादें मन और आँखें भिगा देती हैं। एक बार पापा के मित्र रफीक चाचा ने पापा को बतलाया कि अरुणा रास्ते भर सामान को दोहराती याने याद करती चलती । बचपन की ऐसी सहजता बड़े होते ही पता नहीं कहाँ चली जाती है?
***
मनोरमा जैन ''पाखी''
आँधी और अंकल
'बचपन' शब्द मात्र से ही मन खिल जाता है। क्या भूलें क्या याद करें की तर्ज पर कहें तो बिंदास, स्वतंत्र, चंचल, जिद्दी, गँभीर, शांत, ऊधमी, डाँट खाई, बेवजह और बावजह पिटे, जलील भी हुए, शाबाशी भी पाई और सफलता भी। बचपन से गीत-संगीत का शौक था। एक फोटो मिली धुंधली सी जिसमें लकड़ी के स्टूल पर पुराने जमाने का बड़ा सा रेडियो रखा था और हम वहाँ शायद उसके बटनों से छेड़छाड़ कर रहे थे। पता चला कि जब भी रेडियो चालू किया जाता, हम नन्हें पाँवों से ठुमक के पहुँच जाते उसके पास। उम्र शायद तीन साल की रही होगी।शायद बचपन ने जता दिया था हमारे शौक के बारे में कि बड़े होकर भी यह आदत न छूटने वाली। याद आती है कुछ और घटनाएँ जब पापा की दुकान मुहल्ले के मोड़ पर ही थी। चार-पाँच साल के बच्चों से तब मुहल्ले के बड़े-बुजुर्ग स्नेह रखते थे।अकेले आते-जाते देख पूछ लेते थे कि बेटा कितैं जाय रे? तो उस दिन हुआ यह कि मम्मी ने दुकान पर चाय भिजवाई थी शायद। आसमान में गहरे काले बादल और बिजली की हल्की सी कड़कड़ । पिता जी बोले कि घर जाओ। हम चल दिये घर। आधे रास्ते पहुँचे ही थे कि तेज आँधी आई...। च्छे से याद है कि उस समय पापा के दोस्तके घर के बाहर थे हम। हमारे पैर उखड़ रहे थे। हमें लगा हम उड़ जायेंगे। भयंकर आँधी, दो हाथ पर क्या था कुछ भी न दिख रहा था।हम बुक्का फाड़ के जोर से चिल्लाकर रोने लगे। अंकल के घर के बाहर शायद टीन शैड था, वहीं लगे लोहे के खंबे को कसकर पकड़ी थी पर हाथ छूटा जा रहा था। तभी सामने से सतपाल अंकल आए और बोले- ''लड़की! इधर आ, दिख न रहा आँधी आई है। उड़ जागी।" कहते हुए अपने सीने से कसकर लगाकर वहीं खँभे से लगकर बैठ गए। मैं डरी-सहमी हिचकियों से रो रही थी । उधर पिता जी चिंतित कि घर पहुँची या नहीं? जब आँधी हल्की हुई और बूँदाबाँदी शुरू हुई तो सतपाल अंकल बोले- ''चल घर।' तब तक पिता जी आ गए, बोले- ''अभी तक यहीं है।'' तब सतपाल अंकल ने बताया सब, फिर पिता जी के साथ घर पहुँचे।
सूअर की सवारी
उन्हीं दिनों की एक और घटना है... हमारी बेवकूफी की। दुकान के पास ही कॉर्नर पर एक व्यक्ति चाय का ठेला लगाता था। कभी पाव जितने बड़े अजवाइन जीरे के बिस्किट रखता तो सीजन पर भुट्टै भी। उसी के पास थोड़ी दूरी पर मोची ने अपनी छोटी सी दुकान सजा रखी थी। एक बोरी जिस पर सामने दो-तीन तरह की पालिश, ब्रश, जूतों को चमकाने वाली क्रीम ,टूटे-फटे जूते-चप्पल। जूते मरम्मत करने के औजार वगैरह। वैसे तो पिता जी के लिए घर से ही दोपहर की चाय -नाश्ता आता था जिसमें शकरपारे, मठरी, गुटेटा, साखें , बेसन के सेव- लड्डू ,गेहूँ आटे के लड्डू आदि मौसम के हिसाब से। सर्दी में सौंठ मेवा और गुड़ तथा गर्मी में खूब घी काली मिर्च ,इलायची और बूरे से बने लड्डू। जब कोई मेहमान या व्यापारी आता तो उसी चाय के ठेले से शाह जी के मेहमानों के लिए स्पेशल चाय आती थी। जब भी दुकान पर होती और मेहमान आते तो आर्डर लेकर फुर्ती से जाकर बोल आती। एक दिन जब मेहमान चले गए तो ठेलेवाले से जाकर कहा कि अपने कप ले आओ और आकर दुकान के दासे (दुकान के आगे लगा पत्थर का मोटा पटिया जहाँ ग्राहक जूते चप्पल उतारते हैं) पर बैठ गयी। पटिया हिलने लगा। मैं डर गई। मोची, चाय वाला और आसपास कै लोग चिल्लाने लगे ''उतर उतर..'' पर मुझे कुछ समझ न आ रहा था। जैसे आँख कान सब बंद। तभी मोची ने फटाक से आकर नीचे उतारा। तब तक पिता जी और दुकान पर बैठे ग्राहक भी आ गए। मुझे सुरक्षित देख सब हँसने लगे। मैं सोच रही थी कि आखिर हुआ क्या? तभी पिता जी की गुस्से वाली आवाज सुनाई पड़ी- ''घर जाओ और नहाकर कपड़े बदलना,समझी।" पापा को गुस्से में देख हालत खराब हो गई। तब मोची ने कहा- "बिटिया, सूअरा पे काहे बैठ गई? डर न लगा तोहे।"
अब बात स्कूल की- पापा के एक दोस्त थे हरिदास भूता। उनकी कोठी थी बहुत बड़ी, बड़ा सा मैदान और आसपास सरकारी क्वार्टर थे। वहीं उन्होंने स्कूल खोला .. भूता बाल बाड़ी, शायद पाँचवी कक्षा तक था वह। वहाँ एक मैडम थी कुरेशी, हम सब दीदी बोलते थे। वे गाती बहुत अच्छा थीं। 'बच्चों तुम हो खेल-खिलौने', 'ए मेरे वतन के लोगों' आदि गीत उनकी सुरीली आवाज में बहुत अच्छे लगते थे, वे थीं भी बहुत प्यारी, बच्चोंसेअच्छे से पेश आती थीं। उस समय भी हम बोडम ही थे। पता नहीं क्या संस्कार पड़े थे कि किसी की शिकायत न करती थी। किसी की भी बातों में आ जाती और स्कूल के बच्चे अपना उल्लू सीधा कर हमेशा फँसाते रहे। उस समय दो लड़कियाँ साथ पढ़ती थीं, नाम याद नहीं, अब्बल दर्जे की शरारती और झूठी, दोनों की आपस में पटती भी बहुत थी। उस दिन शायद मैं क्लास में अपना पाठ याद कर रही थी, तभी कुरेशी मैम आई तो सभी खड़े हुए। मैं भी पुस्तक बंद कर जल्दी से खड़ी हुई तो मेरा हाथ अपनी स्कर्ट से लगा।कुछ चिपचिपा सा लगा देखा तो घिन आई। मेरी स्कर्ट पर किसी ने ढेर सी नाक पौंछ दी थी। घिन के कारण उल्टी आने लगी। मेरी हालत देख कुरेशी मैम ने डाँटा क्या हो रहा है? कुछबोल न सकी। तभी देखा बगल में खड़ी दोनों लड़कियाँ हँसी दबाने की कोशिश कर रही हैं। समझ तो आ गया पर शिकायत कैसे करूँ? मैंने देखा तो था नहीं और वो दोनों झूठ बोलने में महारथी। आँख में आँसू भर कर वाशरूम जाने की इजाजत माँगी। उबकाई आई जा रही थी। तब कुरेशी मेम ने एक लड़की को साथ भेजा। जब स्कर्ट साफ कर रही थी तब उसने बताया कि जब मेरा ध्यान अपनी किताब पर था तब उन्होंने ही छींक आने पर .....छि। पीरियड खतम होने पर जब पूछा तो तन के खड़ी हो गईं।
'हा्ँ, किया तो?'
'हैंकी था तो उससे साफ क्यों न किया?'
'हमारी मर्जी,क्या कर लेगी?'
'मैम से शिकायत करेंगे।'
'अच्छा! ठहर..।' कहते हुए फटाफट स्याही वाला पैन निकालकर पूरी स्याही मेरी सफेद शर्ट पर छिड़क दी। 'ज्यादा बोली तो थोबड़े पे भी पोत देंगे।'
'पोतें क्या?' कहकर हँसने लगी। मैं डरपोक शुरू से थी शायद, कुछ न कह कर क्लास म़े आ गई, आँख में आँसू कि घर पर डाँट पड़ेगी लेकिन उसके पहले क्लास में सबके सामने सजा मिल गई कि शर्ट पर स्याही क्यों डाली उन लड़कियों की? हम सकते में थे कि हो क्या रहा है? असल में उन दोनों को लगा किकहीं हम शिकायत न कर द़ें तो वह दोनों अपनी शर्ट पर स्याही छिटककार आफिस में मेरी शिकायत पहले ही कर आईं थीं ।
परिवार के माहौल ,परिवेश का असर जाने-अनजाने पड़ताही है बच्चों के अबोध मन पर। स्कूल में भी अच्छा माहौल मिला था। घर में बचत की बात होती थी। स्कूल में भी बचत के बारे में बताया जाता था। कहानियाँ सुनाई जाती थी। दिमाग में बात बैठ गई कि यह तो अच्छी बात है। उस समय पाँच पैसे का सिक्का चलन में था। चीजें भी सस्ती थीं। सोचा कुछ तो करना चाहिये जिससे वक्त पर घर में मदद कर सकूँ।
बाल मन सोचने लगा कि कैसी बचत और कैसे करूँ घर में मदद? शायद गर्मियों के दिन थे। घर में चर्चा चल रही थी कि शक्कर इस बार ज्यादा खर्च हो रही है ... बाकी बातें समझ न आई। पर यह समझ आया कि घर में शक्कर खतम हो गयी और कोई आ गया तो क्या होगा? बचत और मदद तो सिखाई जा रही थी। पास में देखे कितने पैसे है? शायद एक रुपिया था। दस,पाँच के सब सिक्के मिला कर १०० पैसे, लेकर पहुँच गई मुहल्ले के आखिरी नुक्कड़ वाली दुकान पर। पंजाबी की दुकान थी, ग्राहक थे तो चुपचाप खड़ी हो गई। अंकल पिता जी को जानता था क्यों कि उधर से ही नशिया मंदिर जाते थे और जैन कालेज के पदाधिकारी भी थे तो १५ अगस्त, २६ जनवरी को हम लोगों को भी ले जाते थे। पंजाबी अंकल ने दो-तीन बार पूछा बेटे क्या चाहिये? बड़ी गंभीरता से कहा हमने- "अंकल जी! पहले इन लोगों का सामान दे दो।"
अंकल ग्राहक निबटाते बीच में नजर मार लेते। आखिरी ग्राहक को सौदा देकर पूछा- 'बताओ बेटा!माखन गोली या लालीपाप? हमने बड़ी गँभीरता से कहा- "नहीं अंकल जी,शक्कर चाहिए।"वह चौंक गए फिर बोले- ''कितनी दूँ?और तुम क्यों लेने आई..अभी तक तो राम सनेही भाई (हमारे घर के नौकर काका) आते थे''।हमने चुपचाप रेजगारी देकर कहा इसकी जितनी आए। वह चक्कर में पड़ गए फिर बोले किसमें ले जाओगी? शायद चुहल की थी पर हम उस समय बड़ा काम कर रहे थे। झट से स्कूल का टिफिन आगे कर दिया। पहले वह चकराए फिर हँस कर शक्कर दे दी। हम शान से घर आए और टिफिन छिपा कर रख दिया। दो तीन बार ऐसा किया। सस्ती थी शक्कर उस समय। एक दिन स्कूल से घर आई तो मम्मी गुस्से में ,उससे भी ज्यादा पिता जी। सहमी सी चुपचाप बस्ता रख कपड़े बदले। पिता जी की आवाज गूँजी- ''इधर आओ।''
हम सामने पहुँचे।
"चोरी करना कहाँ से सीखा? शर्म नहीं आती?"
''चोरी? हमने क्या चोरी की?'' डरे स्वर में पूछा।
पिता जी ने बगल में छिपा कर रखा टिफिन सामने किया।
पर ये चोरी नहीं की। तड़ाक एक चाँटा पड़ा गाल पर। जिसने खोज-बीन कर टिफिन पकड़ा वह सामने खड़ी हँस रही थी- ''झूठ मत बोलना..। इतनी शक्कर कहाँ से आई फिर।''
''वो घर में खतम हो जाती तो खरीद के लाए''। रोते हुए बोले हम।
''फिर झूठ ..एक और पड़ेगा।''
''आप पंजाबी अंकल से पूछ लो।''
''अच्छा! वो तो पूछेंगे ही.पर खरीद के क्यों लाई?''
तब बताया कि सुना था शक्कर ज्यादा खर्च हो रही है तो सोचा कभी कोई आया और शक्कर खतम हो गई तो हम दे देंगे चाय के लिए। बहुत भोलेपन और गँभीरता से सुबकते हुए कहा।
पहले सब चुप रहे फिर पूछा- ''यह दिमाग में कहाँ से आया?''
क्या कहती। शक्कर जब्त हुई। साथ ही यह भी कि एक बोरी शक्कर आ जाती है... तुम्हें सोचने की जरूरत नहीं।
उसी दिन किसी काम से पिताजी पंजाबी अंकल की दुकान पर गए तो उन्होंने पूछ लिया- ''सेठजी! बिटिया को क्यों भेजा सामान लेने को? और आप के यहाँ तो पूरा साल भर का स्टाक जाता है फिर ... वो चीनी?
पापा को तब यकीं हुआ और उन्होंने सब बता दिया,अंकल हँसने लगे। बाद में जब भी उधर जाती तो कहते- बेटा! शक्कर कितनी दूँ?
इसी बचत का एक और किस्सा हमारी बुद्धिमानी का- स्कूल आने जाने के लिए रिक्शा आता था।कुछ बच्चे पैदल आते थे। उनसे बात कर के लगा पैदल तो हम भी आ जा सकते हैं। बेकार रिक्शे की फीस क्यों दें? मन में ठान लिया। रिक्शे से वापिस आकर बोल दिया- ''भैया जी! कल से हम पैदल जाएँगे ,आप मत आना। ''अरे बेटा! ऐसे कैसे? स्कूल में तो किसी ने कहा नहीं? अपने पापा से पुछवाओ?"
''भैया! हमने कह दिया न ,आप मत आना।"
''ठीक है, कह कर वह चले गए।''
दूसरे दिन हम तैयार होकर बैठ गए। साढ़े सात..आठ..नौ..दस.। रिक्शा नहीं आया। अब कोई फायदा नहीं था। सो कपड़ेबदल कर खेल कूद में लग गए। घर वालों ने सोचा कि शायद स्कूल की छुट्टीहोगी किसी वजह से तीन दिन हो गए। हम सुबह उठते तैयार होते पर रिक्शे वाले भैया का अता-पता न था। चौथे दिन पिता जी अपने साथ ले गए, शिकायत की रिक्शा न आने की। रिक्शेवाले भैया को बुलाया गया, पड़ताल हुई। पता लगा कि हमने ही मना किया था। तब ध्यान आया कि हाँ ,पापा के पैसे बचाने को रिक्शेवाले भैया को हमने ही मना किया था। घर आकर सबने जो डाँट लगाई ..तौबा। लेकिन न तो बचत का भूत उतरा न अक्लमंदी वाली तिकड़में। वैसे हमने कुछ गलत तो नहीं किया न ? आप ही बताइये।
पाँचवी में आने पर स्कूल बदला था क्यों कि मेरी बड़ी बहन प्राइवेट स्कूल में पड़ती थी। नाम था नेहरू बाल बाड़ी। आठवीं से ग्यारहवीं तक कस्तूरबा बाल बाड़ी। इस स्कूल में आकर कुछ माहौल बदला। क्रियेटिवी शुरू हुई।संगीत का शौक यहाँ आकर पूरा होने लगा।कढ़ाई, सिलाई की छोटी जानकारियाँ भी मिली ।तब पता लगा कि मेरा मन इन में ज्यादा लगता है। पढ़ाई के साथ क्रियेटिवटी।कागज पर फूल पत्तियाँ उतरनी शुरू हुईं। तब अलग अलग तरह के कलर मिलते थे। एक डिब्बी में गोल टिकिया की शकल में, पेंसिल,मोमपेंसिल,वाटर कलर,आइल पेंट। मेरा सफर डिब्बी से शुरू हुआ,और एक्रीलिक कलर तक चला। कागज से शुरू हुये रंग कब तकिये और चादर पर उतरने लगे,फिर कुर्ते और साड़ी पर पता न लगा।यही हाल कढाई का था।छोटे से कपड़ेके टुकड़े से सीखना शुरू हुआ परीक्षाओं में रुमाल पर सभी स्टिच बनानी पड़ती थी। फिर एक बड़े कपड़े पर सारी स्टिच संजोई जो आज भी है मेरे पास.. यह भी साड़ी वर्क पर जाकर रुका।बुनाई भी तभी सीखी। असल में इस तरह की चीजें बच्चों में हुनर पैदा करती हैं।आज स्कूलों से यह सब हटा दिया गया है। इस स्कूल का एक वाक्या और बताते हैं। स्कूल में.वार्षिकोत्सव हुआ करता था।चूँकि पैदायशी शौक था संगीत नृत्य का तो पहुँच जाती।कोई फीस नहीं लगती थी। शाम चार से छ बजे तक। सीखते और ख्याली पुलाव पकते कि एक दिन स्टेज पर भरतनाट्यम करूँगी। असलियत में अंतर्मुखी थी बोलती ही न थी।गजब की संतुष्टि थी कि जो मिल गया उसी को मुकद्दर मान लिया। लीड रोल के लिए अलग लड़कियाँ बड़ी क्लासों से चुनी जाती थी मैं ग्रुप में रहती।और सदा पीछे जाकर खड़ी हो जाती। एक दिन सर ने देखा और बोले इधर आ सामने।डरते हुये लाइन से निकल कर सामने आई। पता न अब क्या गलती हुई हमसे!
यह स्टेप कर के दिखाना तो। यंत्रवत बड़ी आसानी से कर दिया।
"आप सभी को कितनी बार बताना पड़ा तब भी सही से न कर रहे हो..देखो मनो ने कर दिया। ऐसे ही करना है।
और हाँ..पीछे क्यों रहती हो..चलो सबसे आगे आओ।"
आत्मविश्वास आया तब खुद पर ।जो आज भी है कि हाँ कर सकती हूँ। परंतु जैसा उस समय भी हुआ .कुछ लड़कियाँ चिढ़ गयीं और हट गईं।बाद में मुझे एक लीड रोल मिला नृत्य नाटक प्ले था ।जिसमें मुझे एक दुकानदार का रोल प्ले करना था और गुड़ियों की खूबियाँ बताना था जैसे जापानी,पंजाबी भारतीय ..तो वह स्टेप भी सीखे।सबसे ज्यादा हिट शो हुआ था।स्कूलों के आपसी कंपटीशन में भी प्रथम प्राइज लेकर आता। इसके.लिए भी चयन सिर्फ एक आधार पर हुआ ।मुख से किर्रर्र की आवाज निकालनी थी जैसे चाबी भरते समय आती है। स्टेज पर जब चाबी भरने की आवाज गूंजती तो तालियों की आवाज से मन खुश हो जाता। खैर, यादें तो बहुत हैं क्या भूलूँ क्या याद करूँ। मेरे व्यक्तित्व में मेरे परिवार के संस्कार और स्कूल ,कॉलेज की शिक्षा का बहुत योगदान है, परिस्थितियों ने अंतर्मुखी बनाया ।
***
सरिता सोनी, भोपाल मध्य प्रदेश
बचपन के दिन
“हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे”।
कीर्तन करते झांझर बजाते हुए एक बुजुर्ग व्यक्ति सुबह ४ बजे रोज़ घर के सामने से निकला करते, उनके कीर्तन की मधुर ध्वनि से हमारी नींद खुला करती थी। बचपन सबका था पर मेरा कुछ अलग ही था।
जब मैं छह माह की थी, तभी पिताजी ने बड़ी बुआ की गोद में डाल दिया था, होश संभालने पर उन्हीं बुआ को माँ के रूप में देखा। हमारी बुआजी किसी कारणवश अपने ससुराल से विलग थीं ।उन्होंने मायके को ही अपना सब कुछ समझकर, वहीं अपना संपूर्ण जीवन व्यतीत किया। उनकी निराशा दूर करने के लिए ही मुझे उन्हें गोद दिया था। पिताजी-माताजी शहर में रहते थे। ईश्वर की अनुकम्पा से हमारे गाँव में चारों ओर का परिवेश धार्मिक था, परिवार में दादा-दादी, चाचा-चाची बुआ और मेरे छोटे भाई बहन थे।हमारी बुआ सात भाई-बहनों में सबसे बड़ी थीं। उन्होंने पूरे परिवार को सँजोकर रखा, दिन भर जितना काम करतीं, उतना ही जीवन को उल्लासपूर्वक जीतीं। हर त्योहार मना, परंपराओं को निभा कर उसी में संतुष्टि रहती थी। शुरू से सभी छोटे भाई-बहनों को सम्हाला थ, जब सब अपनी दुनिया में व्यस्त हो गए तो दादा-दादी को सम्हाला, अंत समय तक उनकी सेवा की, मुझे भी बचपन में बहुत लाड़-दुलार दिया।
हर वर्ष हमारे घर के सामने राम लीला हुआ करती थी, जिसे देख-देखकर हम बड़े हुए। भगवान राम की मूरत कब हमारे हृदय में समा गई पता ही नहीं चला। दादा जी कहा करते”यह लड़की कलेक्टर बनेगी”। मैं कलेक्टर तो नहीं बनीं पर उससे भी बढ़कर जीवन में मैंने बहुत कुछ पाया। भौतिक पारिवारिक और आध्यात्मिक हर क्षेत्र में मुझ पर ईश्वर की कृपा बनी रहती है। मुझे अपने बचपन, अपने परिवार, अपने गाँव पर बहुत गर्व है क्योंकि आध्यात्मिक प्रगति की नींव वहीं पड़ी। आज गहन सन्तुष्टि है, एक आभार है भगवान के प्रति, ईश्वर ने मेरे जीवन में आध्यात्मिकता को सर्वोपरि रखा, जीवन का वास्तविक उद्देश्य भी यही है।
बैलगाड़ी और माचना नदी
हमारी दुकान परकुछ लोग बैलगाड़ी से सामान ख़रीदने आते थे। हम बच्चे कभी-कभी ज़िद करके उनकी बैलगाड़ी में बैठकर उनके साथ कुछ दूर जाया करते। घर से थोड़ी दूर पर माचना नदी का सीढ़ी घाट था जहाँ हम सब भाई-बहन जाकर उसकी लहरों का आनंद लिया करते। कभी माचना नदी के किनारों की रेत में सीपियाँ और चिकने पत्थर ढूँढ़ते, उनका संग्रह करते, नदी में पैर डालकर बैठे घंटों बतियाते। वे दिन याद कर आज भी आनंद होता है।
पार्श्वनाथ भगवान का मंदिर।
भगवान पार्श्वनाथ की एक परकीं प्रतिमा चिरकाल से घर में मंदिर में विराजमान है। वहाँ घटित कई चमत्कार दादी जी के मुख से सुने और कुछ स्वयं भी देखे। हमारा पूरा परिवार एकत्रित होकर दिवाली मनाता था। इस दिवाली का प्रति वर्ष इंतज़ार रहता था। दिवाली की पूजा में पूरे गाँव को न्योता दिया जाता, पूरे गाँव में प्रसाद बाँटा जाता था, पटाखे सीमित होते थे, हम मिल-बाँटकर फोड़ते थे पर उसका आनंद असीमित था।
वीडियो हाउस
गांव मैं पहली बार एक विडियो हाउस खुला है जहाँ एक रुपया टिकट थीहमसभी बच्चे भी कभी कभी बुआजी के साथ सिनेमा देखने जाते थे पर दादाजी से छुपकर जातेथे हमारे दादाजी सिनेमा के बिलकुलखिलाफ़ थे उनका घरपर कड़ाअनुशासन थापर हमारी दादीजी कथा कहानियों की बहुत शौक़ीन थी उन्होंने उन दिनों चंद्रकांता सीरियल जो TV पर आता था पूरा देखा था उन्होंने पहले से ही चंद्रकांता उपन्यास पढ़ रखा था।
गांधी जी का जीवन परिचय
घर में किराने की दुकान थी जब भी चाचा जी को आवश्यक कार्यों के लिए दुकान छोड़कर जाना पड़ता तो हम बच्चों में से किसी को भी दुकान पर बैठा कर जाते थे जो भी रद्दी काग़ज़ उपयोग के लिए ख़रीदे जाते उसमें किताबें ज़्यादा होती जिनमें चित्र कथाएं धार्मिक कहानियां होती जो मैंने दुन पर बैठे बैठे बोहोत पढ़ी उसमें सबसे अच्छी किताब जिसने मुझे गांधीजी के जीवन से प्रथम वार परिचित कराया थी वह किताब मुझे सत्य अहिंसा के सिद्धांत की गरिमा और ताक़त उपहार दे गई है। स्मृतियाँ तो असीम हैं उनका आनंद भी असीम है पर सबकोलेखनी में उतारना सीमित है आठवी कक्षा में वार्षिक परीक्षा में मैंने अपनेबैतूल ज़िले मेप्रथम स्थान प्राप्त किया सब को लगा भविष्य में अध्ययन के लिए माता पिता के पास भोपाल भेजना ही उचित होगा और मेरा गाँव मुझ से छूट गया जैसे बचपन रूठ गया है नवमीकक्षा में भोपाल में दाख़िला हुआ जीवन का नया अध्याय शुरू हुआमैं भोपाल आ गई वह कुछ ऐसा था जैसे श्री कृष्ण को गोकुल छोड़ मथुरा आना पड़ा
जब भोपाल में मुझे वहाँ के जीवन से तालमेल बिठाना बोहोत कठिन लगा तभी से ही मन को मज़बूत बनाना सीखा यहाँ सब कुछ था जो गाँव में नहीं था पर वो भावना वो गाँव की माटी की ख़ुशबूवो सहजता सरलता सब खो गयी थीभोपाल में मेरे पिताजी शासकीय अभियंता थेमाता पिता दोनों ही धार्मिक, पिताजी का जैन ग्रंथों के विद्वान थे।उनसे जैन धर्म के अनमोल संस्कार मिलेधीरे धीरे मैं शहरी परिवेश में ढल गईयहाँ भी मुझे अपने दोनों भाइयों और माता पिता का संरक्षणएवं प्यार मिला है।
पापा का स्कूटर
पापा हम चारों को स्कूटर पर बैठाकर घुमाने फिराने पिक्चर दिखाने न्यू मार्केट ले जाया करते थेहम पांचोंको एक साथ स्कूटर पर बैठना आज भी बोहोत याद आता है। आज मैं जहाँ हम संतुष्ट हूँ जीवन में आए ही हर सुख दुख को स्वीकार करते हुए एक बोहोत ही अच्छे मुक़ाम पर हूँ ससुराल में बहुत प्यारा परिवार मिला है जहाँ पूर्णतः सुखी संतुष्ट हूँऔर इसके लिए अपने माता पिता बुआजी दादा दादी चाचा चाची सभी की बहुत आभारी हूँविशेष रूप से अपने पतिदेव की जिन्होंने मुझे हर क़दम पर साहसी और मौज में रहना सिखाया तथा मुझे आगे बढ़ने के अवसर दिए।
सरिता सोनी
पता। HIG/४६०/अरेराकॉलोनी भोपाल
परिचय
शिक्षा M कॉम
गृहणी शिक्षिका
डायरेक्टर ऑफ़ कात्यायनीआरगेनिक्स
जन्म २५नवंबर१९७४
पिता -श्रीसुरेशचंद्र सिंघई
माता-श्रीमती पुण्य कुमारी सिं घई
पति-श्री अतुल सोनी
दूरभाष ९०३९०१२१७६
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