शृंगारशतक -भर्तृहरि
भर्तृहरि की प्रसिद्ध रचना 'शृंगारशतकम्' में प्रेम और सौंदर्य का गहन चित्रण किया गया है। प्रस्तुत हैं उनकी कुछ पंक्तियाँ और उनका हिन्दी भावानुवाद। इन पक्तियों की गहन संवेदना और व्यथा बहुत जानी-पहचानी लगती है, दिल के बेहद क़रीब।
'सुप्ते ग्रामे नदति जलदे शान्तसंतापरम्यं
पांथेनात्मव्यसन करूनो द्स्त्रू गीतं निशीथे
स्फी तोत्कंठापरिगतधिया प्रोषितस्त्रीजनेन
ध्यानावेस्तिमितन नयनं श्रूयते रूद्यते च
ग्रामेस्मिन पथिकाय पांथ वसतिनैवाधुना दीयते
पश्यात्रेव विहारमंडपतले पान्थः प्रसुप्तो युवा
तेनोद्रीय खलेन गर्जति घने स्मृत्वा प्रियां तत्कृतं
येनाद्यपि करग्कदंडपतनाशंकी जनस्तिष्ठति।'
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सो रहा था गाँव, जब बरसी घटाएँ
विरह-पीड़ित शांत अरु संतप्त राही
गा उठा था गीत बरबस करुण स्वर में
रात आधी गीत सुनकर रो पड़ी थीं
विरह पीड़ित नारियाँ कर याद पति को
सलिल-धारा नयन से कर-कर प्रवाहित।
ग्रामवासी पथिक से बोले- 'न संभव
आश्रय देना तुम्हें इस गाँव में है।'
सामने सोया हुआ है युव पथिक वह
मेघ गर्जन सुन प्रिया को सुमिर खल ने
आर्तनाद विलाप कर था गीत गाया
सुन व्यथित स्त्रियों थे प्राण जाते।
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इस श्लोक में विरह जनित पीड़ा और उसके कारण होनेवाले सामाजिक प्रभाव का मार्मिक चित्रण है। यहाँ एक पथिक (राही) रात बिताने के लिए गाँव में आश्रय माँगता है, लेकिन गाँववाले उसे मना कर देते हैं। वे इसका कारण एक अन्य युवा पथिक की घटना को बताते हैं।
सरल हिंदी भावार्थ:पहली स्थिति (विरह का गायन): जब पूरा गाँव सो रहा था और बादल गरज रहे थे, तब विरह की अग्नि से शांत लेकिन अत्यंत दुखी एक पथिक ने आधी रात को अपनी पीड़ा में एक करुण गीत गाया। उस गीत को सुनकर गाँव की वे स्त्रियाँ, जिनके पति परदेश गए हुए थे (प्रोषितभर्तृका), अत्यंत उत्कंठित और भावुक हो गईं। वे ध्यानमग्न होकर उस गीत को सुनने लगीं और उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।
दूसरी स्थिति (गाँव वालों का मना करना): गाँव वाले कहते हैं— "हे पथिक! अब इस गाँव में किसी राही को रात रुकने के लिए जगह नहीं दी जाती। देखो, सामने उस विहार मंडप के नीचे एक युवा पथिक सोया हुआ है। उस दुष्ट (खल) ने बादलों के गरजने पर अपनी प्रेयसी को याद करके इतनी ज़ोर से विलाप किया और ऐसा करुण गीत गाया कि उसे सुनकर (विरह के दुख में) गाँव की स्त्रियों के प्राण निकलने जैसी स्थिति हो गई।"
प्रभाव- उस युवा पथिक के रुदन और गायन का प्रभाव इतना गहरा और दुखद था कि आज भी गाँव के लोग इस आशंका में रहते हैं कि यदि फिर से कोई पथिक यहाँ रुका और उसने वैसा ही विरह गीत गाया, तो स्त्रियों के हृदय पर वज्र गिरने जैसा कष्ट होगा। इसी डर के कारण गाँव में अब किसी बाहरी पथिक को ठहरने की अनुमति नहीं दी जाती।यह श्लोक विरह (Separation) की तीव्रता को दर्शाता है। एक व्यक्ति का दुख कैसे दूसरों के सोए हुए दुख को जगा देता है और समाज पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है, इसे यहाँ काव्य के माध्यम से समझाया गया है।
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